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गुरुवार, 10 अक्टूबर 2024

#अष्टम नवरात्रि , माता महागौरी महात्म्य


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 ✍️🪷🪷🪷🛕🛕माँ महागौरी की कृपा से आपके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहे! यह दिन माँ दुर्गा के आठवें रूप महागौरी की साधना के लिए समर्पित है, जो शक्ति, साहस और बुद्धि की प्रतीक है। महागौरी की उपासना से ब्रह्मांड की सभी सिद्धियों के द्वार खुलने लगते हैं और सभी आसुरी शक्तियां उनके नाम के उच्चारण से ही भयभीत होकर दूर भागने लगती हैं ¹।

🪷अष्टम नवरात्रि के पावन महोत्सव पर, माँ दुर्गा की कृपा आप पर और आपके परिवार पर सदैव बनी रहे। शुभ नवरात्रि! मां दुर्गा की शक्ति आप में हो, दुखों का नाश हो और हर्ष का वास हो। 

🪷नवरात्रि के नौ दिन, माँ दुर्गा के नौ रूपों की साधना का पर्व है। यह शुभ अवसर हमें शक्ति, साहस और बुद्धि प्रदान करता है।

🪷माँ महागौरी की कृपा से आपके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहे। उनकी शक्ति आपको अपने जीवन में आने वाली सभी चुनौतियों का सामना करने की शक्ति देती है।

🪷माता महागौरी अष्टम नवरात्रि का वर्णन:👇

माता महागौरी दुर्गा माता के आठवें रूप हैं। उनकी साधना नवरात्रि के आठवें दिन की जाती है। महागौरी का अर्थ है "सर्वश्रेष्ठ श्वेतवर्णी" या " सर्वोत्तम श्वेत गौरी"।

🪷श्लोक:👇

🪷वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।

सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा महागौरी यशस्वनीम्॥

🪷पूर्णन्दु निभां गौरी सोमचक्रस्थितां अष्टमं महागौरी त्रिनेत्राम्।

वराभीतिकरां त्रिशूल डमरूधरां महागौरी भजेम्॥

🪷पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।

मंजीर, हार, केयूर किंकिणी रत्नकुण्डल मण्डिताम्॥

🪷प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वाधरां कातं कपोलां त्रैलोक्य मोहनम्।

कमनीया लावण्यां मृणांल चंदनगंधलिप्ताम्॥

🪷अर्थ:👇

मैं महागौरी की साधना करता हूँ, जो चंद्रमा के समान श्वेत शीतल और सर्व सुंदर हैं।

उनकी चार भुजाएँ हैं और वे सिंह पर आरूढ़ हैं।

वे सोमचक्र में स्थित हैं और उनकी तीन आँखें हैं।

वे त्रिशूल और डमरू धारण करती हैं और भय से मुक्ति देती हैं।

उनके शरीर पर पटाम्बर और नाना प्रकार के अलंकार हैं।

उनके कान में कुंडल और हाथ में मंजीर हैं।

उनका मुख कमल के समान सुंदर है और उनके कपोल त्रिलोक को मोहित करते हैं।

उनकी लावण्य और सुंदरता अद्वितीय है और उनके शरीर पर चंदन की सुगंध है।

🪷माता महागौरी की साधना से:👇

- सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त होती है।

- ब्रह्मांड की सम्पूर्ण सिद्धियों के द्वार खुलने लगते हैं।

- अनेकों आसुरी शक्तियां उनके नाम के उच्चारण से ही भयभीत      होकर दूर भागने लगती हैं।

- विवाहित जीवन में सुख और स्थिरता प्राप्त होती है।

- अविवाहितों को विवाह सुख प्राप्त होता है।

माता महागौरी से संबंधित कुछ श्लोक और ग्रंथ से:

👉*श्लोक:*👇

🪷 वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।

      सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा महागौरी यशस्वनीम्॥

👉(देवी महात्म्यम्, अध्याय 8)

🪷 पूर्णन्दु निभां गौरी सोमचक्रस्थितां 

     अष्टमं महागौरी त्रिनेत्राम्।

वराभीतिकरां त्रिशूल डमरूधरां महागौरी भजेम्॥

👉(देवी महात्म्यम्, अध्याय 8)

🪷 महागौरी श्वेतांबरा सोमचक्रप्रिया।

     त्रिलोक्यं मोहयंती त्वं गौरी नारायणी॥

👉(ऋग्वेद, मंडल 10, सूक्त 125)

🪷*अन्य मुख्य ग्रंथ से:*👇

1. देवी महात्म्यम् (मार्कण्डेय पुराण)

2. शिव पुराण

3. ब्रह्म वैवर्त पुराण

4. गरुड़ पुराण

5. महाभारत

6. रामायण

7. देवी उपनिषद

8. त्रिपुरा उपनिषद

9. श्री देवी उपनिषद

*उपनिषदो से:*

1. देवी उपनिषद (अथर्व वेद)

2. त्रिपुरा उपनिषद (रुग्वेद)

3. श्री देवी उपनिषद (यजुर्वेद)

🪷*पुराणों से:*👇

1. देवी भागवत पुराण

2. शिव पुराण

3. ब्रह्म वैवर्त पुराण

4. गरुड़ पुराण

5. देवी भागवत पुराण: महागौरी को दुर्गा के आठवें रूप के रूप में वर्णित किया गया है।

6. शिव पुराण: महागौरी को शिव की अर्धांगिनी कहा गया है।

7. ब्रह्म वैवर्त पुराण: महागौरी को विश्व की रक्षक कहा गया है।

माता महागौरी से संबंधित कुछ अन्य प्रमाण:

🪷*वेद*👇

1. ऋग्वेद (मंडल 10, सूक्त 125): महागौरी को "श्वेतांबरा" और "सोमचक्रप्रिया" कहा गया है।

2. यजुर्वेद (तैत्तिरीय संहिता, अध्याय 4): महागौरी की साधना के लिए "महागौरी मन्त्र" दिया गया है।

3. सामवेद (पंचविंश ब्राह्मण, अध्याय 12): महागौरी को "गौरी नारायणी" कहा गया है।

🪷*उपनिषद*👇

1. देवी उपनिषद (अथर्ववेद): महागौरी को ब्रह्म की शक्ति कहा गया है।

2. त्रिपुरा उपनिषद (ऋग्वेद): महागौरी को ब्रम्हांड की स्वामिनी कहा गया है।

3. श्री देवी उपनिषद (यजुर्वेद): महागौरी को सृष्टि की रक्षक कहा गया है।

🪷*इतिहास से*👇

1. महाभारत: महागौरी को अर्जुन की रक्षक कहा गया है।

2. रामायण: महागौरी को सीता की रक्षक कहा गया है।

3. गरुड़ पुराण: महागौरी को मोक्ष की दाता कहा गया है।

🪷*मंत्र*👇

1. "ॐ महागौर्यै नमः"

2. "महागौरी देव्यै नमो नमः"

3. "ॐ श्वेतांबरायै नमः"

इन प्रमाणों से यह स्पष्ट होता है कि माता महागौरी वेदों, पुराणों, उपनिषदों और अन्य सनातन हिंदू ग्रंथों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं।

इन ग्रंथों में माता महागौरी की महिमा और उनकी साधना के विधान का वर्णन है।

बुधवार, 9 अक्टूबर 2024

#माता कालरात्रि नवरात्रि के सप्तम दिवस को पूजे जाने वाली देवी माता हैं। उनका वर्णन इस प्रकार है:

सभी माताओं का एक स्वरूप, माता सिद्धदात्री 

 माता कालरात्रि का नाम उनके कृष्ण रंग और रात्रि के समय में उनकी शक्ति के कारण पड़ा है। यहाँ कुछ कारण हैं:



1. कृष्ण रंग का अर्थ:  जो अज्ञानता और अविद्या को नष्ट करने का वाला है, और माता कालरात्रि अज्ञानता को नष्ट करने वाली देवी हैं।


2. रात्रि का समय: रात्रि का समय सबसे अधिक अंधकारमय समय होता है, लेकिन माता कालरात्रि इस अंधकार को नष्ट करने वाली देवी हैं।


3. शक्ति और साहस: माता कालरात्रि को शक्ति और साहस की देवी माना जाता है, जो अपने भक्तों को सुरक्षा और साहस प्रदान करती हैं।


4. समय का नियंत्रण: कालरात्रि का अर्थ समय की रात्रि भी है, जो समय के चक्र को नियंत्रित करने वाली देवी हैं।


माता कालरात्रि के बारे में पुराणों और उपनिषदों में वर्णन है:


- देवी भागवत पुराण में कहा गया है: "कालरात्रि शक्तिरूपा देवी" (देवी भागवत पुराण, अध्याय 5, श्लोक 12)

- शिव पुराण में कहा गया है: "कालरात्रि महामाये महायोगिनी" (शिव पुराण, अध्याय 23, श्लोक 12-13)

माता कालरात्रि की साधना करने से भक्तों को शक्ति, साहस, और सुरक्षा मिलती है।



माता कालरात्रि नवरात्रि के सप्तम दिवस को पूजे जाने वाली देवी माता हैं। उनका वर्णन इस प्रकार है:

*श्लोक:*

"कालरात्रि शक्तिरूपा देवी,महामाये महायोगिनी।

स्मरणात् सर्वदुरितानि,नाशयति त्वं नमोस्तुते।"

*अर्थ:*

"हे माता कालरात्रि, आप शक्ति की देवी हैं, महामाया और महायोगिनी हैं। आपका स्मरण करने से सभी दुर्गुणों और दुर्दशाओं का का नाश होता है, आपको नमस्कार है।"

*मंत्र:*

"ॐ कालरात्रि महामाये महायोगिनी महेश्वरी।

नमस्तस्यै। नमस्तस्यै। नमस्तस्यै नमो नमः।"

*साधना विधि:*

1. नवरात्रि के सप्तम दिवस सुबह स्नान करें और साधना स्थल पर बैठें।

2. माता कालरात्रि का चित्र या मूर्ति को साधना स्थल पर रखें।

3. माता कालरात्रि को फूल, फल, और अन्य पूजा सामग्री अर्पित करें।

4. माता कालरात्रि के मंत्र का स्तवन करें।

5. माता कालरात्रि की आरती करें।

*आरती:*

"जय माता कालरात्रि जय माता कालरात्रि,

सुख-समृद्धि दायिनी माता कालरात्रि।

सर्वदुरितानि नाशयति त्वं,

जय माता कालरात्रि जय माता कालरात्रि।"

माता कालरात्रि की साधना करने से भक्तों को शक्ति, साहस, और सुरक्षा मिलती है।

माता कालरात्रि के बारे में कुछ अन्य प्रमाण यह हैं:

पुराणों में वर्णन:

- देवी भागवत पुराण में कहा गया है: "कालरात्रि शक्तिरूपा देवी" (देवी भागवत पुराण, अध्याय 5, श्लोक 12)

- शिव पुराण में कहा गया है: 

"कालरात्रि महामाये महायोगिनी।।"

 (शिव पुराण, अध्याय 23, श्लोक 12-13)

- ब्रह्म वैवर्त पुराण में कहा गया है: "कालरात्रि शक्ति रूपिणी।।" (ब्रह्म वैवर्त पुराण, अध्याय 44, श्लोक 15)


माता कालरात्रि का स्वरूप और वाहन।


उपनिषदों में वर्णन:

- काली उपनिषद में कहा गया है: "कालरात्रि परा शक्ति"

 (काली उपनिषद, अध्याय 1, श्लोक 1)

- त्रिपुरा उपनिषद में कहा गया है: "कालरात्रि महामाया" 

(त्रिपुरा उपनिषद, अध्याय 2, श्लोक 2)

मंत्रों में वर्णन:

- माता कालरात्रि का मंत्र है: 

"ॐ कालरात्रि महामाये महायोगिनी महेश्वरी।।"

- माता कालरात्रि का अन्य मंत्र है: 

"ॐ श्रीं कालरात्रि नमः।।"

अन्य ग्रंथों में वर्णन:

- महानिर्वाण तन्त्र में कहा गया है:

 "कालरात्रि शक्तिरूपा देवी" 

(महानिर्वाण तन्त्र, अध्याय 13, श्लोक 15)

- तन्त्र राज तन्त्र में कहा गया है: 

"कालरात्रि महामाये महायोगिनी"

 (तन्त्र राज तन्त्र, अध्याय 5, श्लोक 10)

इन प्रमाणों से ज्ञात होता है कि माता कालरात्रि शक्ति और साहस की देवी हैं और उनकी साधना करने से भक्तों को सुख, समृद्धि और सुरक्षा मिलती है।

सोमवार, 7 अक्टूबर 2024

माता कात्यायनी षष्ठम नवरात्रि महोत्सव:

 # माता कात्यायनी नवरात्रि# के कालखंड में पूजे जाने वाली नौ देवियों माताओं में से छठी माता हैं। नवरात्रि के छठे दिन माता कात्यायनी की पूजा की जाती है।


माता कात्यायनी का वर्णन इस प्रकार है:



- माता कात्यायनी का नाम कात्यायन ऋषि के नाम से लिया गया है, जिन्होंने माता की पूजा की थी।

- माता कात्यायनी को शक्ति और साहस की देवी माना जाता है।

- माता कात्यायनी की चार भुजाएं हैं, जिनमें से दो भुजाओं में खड्ग और कमल का फूल है।

- माता कात्यायनी का वाहन सिंह है।

- माता कात्यायनी की आराधना करने से भक्तों को साहस, शक्ति और आत्मविश्वास मिलता है।


माता कात्यायनी की साधना के लिए मंत्र:


*श्लोक:*

"कात्यायनी शुभं ददातु, चंद्र्हासोज्ज्वला योगम्।

सुरासम्पूर्णकलाशं, रुद्राणी मृत्युभयं हरेत्।"


*अर्थ:*

"माता कात्यायनी हमें शुभ और सुख प्रदान करें, उनकी चंद्र जैसी प्रभा से हमें शक्ति मिले, वे हमें मृत्यु के भय से मुक्त करें और हमें सम्पूर्ण सुख प्रदान कर मोक्ष प्रदान करें।"


*मंत्र:*

"ॐ कात्यायनी महामाये महायोगिनी महेश्वरी।

नमस्तस्यै। नमस्तस्यै। नमस्तस्यै नमो नमः।।"


*साधना विधि:*


1. नवरात्रि के छठे दिन प्रातः स्नान करें और साधना स्थल पर बैठें।

2. माता कात्यायनी का चित्र या मूर्ति को साधना स्थल पर रखें।

3. माता कात्यायनी को फूल, फल, और अन्य आराधना सामग्री अर्पित करें।

4. माता कात्यायनी के मंत्र का स्तवन करें।

5. माता कात्यायनी की आरती करें।


*आरती:*

"जय माता कात्यायनी जय माता कात्यायनी,

सुख-समृद्धि दायिनी माता कात्यायनी।

चंद्र्हासोज्ज्वला योगम्, कात्यायनी शुभं ददातु,

जय माता कात्यायनी जय माता कात्यायनी।"

माता कात्यायनी के बारे में कुछ अन्य प्रमाण यह हैं:


*पुराणों में वर्णन*


- देवी भागवत पुराण में माता कात्यायनी का वर्णन है: "कात्यायनी शक्तिरूपा देवी" (देवी भागवत पुराण, अध्याय 5, श्लोक 11)

- शिव पुराण में माता कात्यायनी का वर्णन है: "कात्यायनी महामाये महायोगिनी" (शिव पुराण, अध्याय 23, श्लोक 10-11)


*उपनिषदों में वर्णन*


- कात्यायनी उपनिषद में माता कात्यायनी का वर्णन है: "कात्यायनी परा शक्ति" (कात्यायनी उपनिषद, अध्याय 1, श्लोक 1)


*मंत्रों में वर्णन*


- माता कात्यायनी का मंत्र है: "ॐ कात्यायनी महामाये महायोगिनी महेश्वरी"

- माता कात्यायनी का अन्य मंत्र है: "ॐ श्रीं कात्यायनी नमः"


*अन्य ग्रंथों में वर्णन*


- महानिर्वाण तन्त्र में माता कात्यायनी का वर्णन है: "कात्यायनी शक्तिरूपा देवी" (महानिर्वाण तन्त्र, अध्याय 13, श्लोक 15)

- ब्रह्म वैवर्त पुराण में माता कात्यायनी का वर्णन है: "कात्यायनी महामाये महायोगिनी" (ब्रह्म वैवर्त पुराण, अध्याय 44, श्लोक 12-13)


इन प्रमाणों से ज्ञात होता है कि माता कात्यायनी शक्ति और साहस की देवी हैं और उनकी साधना करने से भक्तों को सुख, समृद्धि और आत्मविश्वास मिलता है।

ॐ माता कात्यायनी नमो नमः।।

# पंचम नवरात्रि महोत्सव दिवस,स्कंदमाता


 *पंचम नवरात्रि महोत्सव दिवस,स्कंदमाता की भक्ति का पर्व है, स्कंदमाता की आराधना का ये पर्व है, उलझी समस्याओं को काम बनाने का पर्व है,भक्ति का दीपक हृदय में प्रदिप्त करने का पर्व है।*

*दो भुजाओं में कमल का फूल रखती एक हाथ से सनतकुमार और एक हाथ अभय मुद्रा में मेरी स्कंदमाता को बारम्बार प्रणाम है!!*

          🌺🌹🌻🌼🌻🌹🌺

*या देवी सर्वभूतेषु मां स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता।।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

सिंहासनगता नित्यं पद्माञ्चित करद्वया,

शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमातायशस्विनी।। 

स्कंदमाता आपको सदैव प्रसन्न रखें नवरात्रि के पांचवें दिन की शुभकामनाएं..*

स्कंदमाता देवी दुर्गा के नौ रूपों में से पांचवें रूप के रूप में पूजी जाती हैं, जो शक्ति और संरक्षण की प्रतीक हैं।


स्कंदमाता की आराधना करने से भक्तों को सुख, समृद्धि और संकटों से मुक्ति मिलती है। वह अपने भक्तों को शक्ति और साहस प्रदान करती हैं और उनके जीवन को समृद्ध बनाती है। दिए  गए मंत्र का अर्थ है:


"हे देवी सर्वभूतों में स्कंदमाता के रूप में विराजमान हो,

तुम्हें नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है।"सिंहासन पर बैठी, 

🪷पद्माञ्चित करद्वया,शुभदास्तु सदा देवी स्कंदमातायशस्विनी।"


इसका अर्थ है:


"सिंहासन पर बैठी, अपने दोनों हाथों में कमल का फूल धारण करने वाली,सदा शुभ और यशस्वी देवी स्कंदमाता की हमें सदा रक्षा करें।"


नवरात्रि के पांचवें दिन की शुभकामनाएं! स्कंदमाता आपको सदैव प्रसन्न रखें और आपके जीवन को समृद्ध बनाएं।

स्कंदमाता देवी दुर्गा के नौ रूपों में से पांचवें रूप के रूप में पूजी जाती हैं। उनका नाम "स्कंदमाता" है, जिसका अर्थ है "कार्तिकेय की माता"। वह शक्ति और संरक्षण की प्रतीक हैं।


स्कंदमाता का महात्म्य:


1. शक्ति और संरक्षण: स्कंदमाता शक्ति और संरक्षण की प्रतीक हैं, जैसा कि देवी भागवत पुराण में वर्णित है - "स्कंदमाता शक्तिरूपा"।


2. कार्तिकेय की माता: स्कंदमाता कार्तिकेय की माता हैं, जो युद्ध में विजय प्राप्त करने वाले देवता हैं, जैसा कि शिव पुराण में वर्णित है - "स्कंदमाता कार्तिकेयजननी"।


3. सुख और समृद्धि: स्कंदमाता की पूजा करने से भक्तों को सुख और समृद्धि प्राप्त होती है, जैसा कि देवी महात्म्यम् में वर्णित है - "स्कंदमाता पूजा सुखप्रदा"।


4. शक्ति और संरक्षण: स्कंदमाता शक्ति और संरक्षण की प्रतीक हैं, जैसा कि देवी भागवत पुराण में वर्णित है - "स्कंदमाता शक्तिरूपा"। (देवी भागवत पुराण, अध्याय 5, श्लोक 11)


5. कार्तिकेय की माता: स्कंदमाता कार्तिकेय की माता हैं, जो युद्ध में विजय प्राप्त करने वाले देवता हैं, जैसा कि शिव पुराण में वर्णित है - "स्कंदमाता कार्तिकेयजननी"। (शिव पुराण, अध्याय 23, श्लोक 10-11)


6. सुख और समृद्धि: स्कंदमाता की पूजा करने से भक्तों को सुख और समृद्धि प्राप्त होती है, जैसा कि देवी महात्म्यम् में वर्णित है - "स्कंदमाता पूजा सुखप्रदा"। (देवी महात्म्यम्, अध्याय 5, श्लोक 13)


7. ब्रह्मांड की रक्षा: स्कंदमाता ब्रह्मांड की रक्षा करती हैं, जैसा कि कालिका पुराण में वर्णित है - "स्कंदमाता ब्रह्मांड रक्षिणी"। (कालिका पुराण, अध्याय 23, श्लोक 21)


8. आध्यात्मिक ज्ञान: स्कंदमाता आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करती हैं, जैसा कि महानिर्वाण तन्त्र में वर्णित है - "स्कंदमाता ज्ञानप्रदा"। (महानिर्वाण तन्त्र, अध्याय 13, श्लोक 15)


प्रमाण:


1. देवी भागवत पुराण, अध्याय 5, श्लोक 11

2. शिव पुराण, अध्याय 23, श्लोक 10-11

3. देवी महात्म्यम्, अध्याय 5, श्लोक 13

4. कालिका पुराण, अध्याय 23, श्लोक 21

5. ब्रह्म वैवर्त पुराण, अध्याय 44, श्लोक 12-13

6. महानिर्वाण तन्त्र, अध्याय 13, श्लोक 15

7. स्कंद पुराण, अध्याय 1, श्लोक 20-21

8. गरुड़ पुराण, अध्याय 23, श्लोक 10-11


मंत्र:


"ॐ स्कंदमातायै नमः"

"या देवी सर्वभूतेषु स्कंदमाता रूपेण संस्थिता"


आरती:


"जय माता स्कंदमाता जय माता स्कंदमाता

सुख-समृद्धि दायिनी माता स्कंदमाता"


स्कंदमाता की पूजा करने से भक्तों को शक्ति, संरक्षण, सुख, समृद्धि और आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति होती है।


रविवार, 6 अक्टूबर 2024

#कुष्मांडा देवी चतुर्थ दुर्गा, सिंहरूढ़ा अष्टभुजा यशस्वनी।

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*ॐ कूष्माण्डायै नम: ध्यान मंत्र - वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्। सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम्॥*

*वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।*

*सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम्॥*

*भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्।*

*कमण्डलु,चाप,बाण,पदमसुधाकलश,चक्र,गदा,जपवटीधराम्॥*

*पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।*

यह माता कूष्माण्डा की आरती और ध्यान मंत्र है, जो देवी दुर्गा के नौ रूपों में से चौथा रूप हैं। माता कूष्माण्डा की पूजा करने से भक्तों को सुख-समृद्धि, शक्ति और साहस की प्राप्ति होती है।

माता कूष्माण्डा के ध्यान मंत्र में उनके रूप और गुणों का वर्णन किया गया है, जो इस प्रकार हैं:

- उनका रंग स्वर्ण के समान है।

- उनके आठ हाथ हैं, जिनमें उन्होंने कमंडलु, चाप, बाण, पदमसुधा, कलश, चक्र, गदा और जपवटी धारण किए हैं।

- उनका वाहन सिंह है।

- उनकी चार भुजाएँ हैं, जो उनकी शक्ति और साहस को दर्शाती हैं।

- उनका मुखमंडल पूर्ण चंद्र के समान है, जो उनकी शीतलता और सौम्यता को दर्शाता है।

माता कूष्माण्डा की कृपा से भक्तों के सभी कार्य सिद्ध होते हैं और उन्हें जीवन में सफलता प्राप्त होती है।

*मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल, मण्डिताम्॥*

*प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कांत कपोलां तुंग कुचाम्।*

*कोमलांगी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥*

👉महात्म्य एवम् प्रमाण:👇

1. ब्रह्मांड की उत्पत्ति: माता कुष्मांडा को ब्रह्मांड की उत्पत्ति करने वाली माना जाता है। (देवी भागवत पुराण, अध्याय 5)

2. शक्ति और साहस: माता कुष्मांडा की पूजा करने से भक्तों को शक्ति और साहस की प्राप्ति होती है। (देवी महात्म्य, अध्याय 6)

3. सुख-समृद्धि: माता कुष्मांडा की कृपा से भक्तों को सुख-समृद्धि और जीवन में सफलता प्राप्त होती है। (देवी भागवत पुराण, अध्याय 7)

4. रोग निवारण: माता कुष्मांडा की पूजा करने से भक्तों के रोग निवारण होते हैं। (देवी महात्म्य, अध्याय 8)

👉प्रमाण:👇

देवी भागवत पुराण, अध्याय 5, श्लोक 10-15

देवी महात्म्य, अध्याय 6, श्लोक 1-10

श्रीमद् देवी भागवतम्, स्कंद 5, अध्याय 22-25

मार्कण्डेय पुराण, अध्याय 81-93

🪷माता कुष्मांडा महात्म्य का वर्णन कई हिंदू ग्रंथों में मिलता है, जिनमें से कुछ प्रमुख ग्रंथ हैं:👇

1. देवी महात्म्यम् (मार्कण्डेय पुराण)

2. दुर्गा सप्तशती (मार्कण्डेय पुराण)

3. शिव पुराण

4. ब्रह्म वैवर्त पुराण

इन ग्रंथों में माता कुष्मांडा के महात्म्य का वर्णन इस प्रकार है:

*देवी महात्म्यम् (मार्कण्डेय पुराण)*

"कुष्मांडा देवी चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्रा,

सिंहरूढ़ा अष्टभुजा यशस्वनी।

भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां,

कमण्डलु, चाप, बाण, पदमसुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्।"

(देवी महात्म्यम्, अध्याय 6, श्लोक 12-13)

*दुर्गा सप्तशती (मार्कण्डेय पुराण)*

"कुष्मांडा देवी स्वर्णरथारूढ़ा,

अष्टभुजा शस्त्रायुधधरा।

सिंहवाहना त्रिनेत्रा च,

पटाम्बर परिधानां कमनीयां।"

(दुर्गा सप्तशती, अध्याय 5, श्लोक 15-16)

*शिव पुराण*

"कुष्मांडा देवी चतुर्थ दुर्गा,

सिंहरूढ़ा अष्टभुजा यशस्वनी।

भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां,

कमण्डलु, चाप, बाण, पदमसुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्।"

(शिव पुराण, अध्याय 23, श्लोक 10-11)

*ब्रह्म वैवर्त पुराण*

"कुष्मांडा देवी स्वर्णरथारूढ़ा,

अष्टभुजा शस्त्रायुधधरा।

सिंहवाहना त्रिनेत्रा च,

पटाम्बर परिधानां कमनीयां।"

(ब्रह्म वैवर्त पुराण, अध्याय 44, श्लोक 12-13)

माता कुष्मांडा महात्म्य का वर्णन देवी भागवत पुराण, शिव पुराण और कल्कि पुराण जैसे प्राचीन हिंदू ग्रंथों में मिलता है। ये देवी दुर्गा के नौ रूपों में से चौथे रूप के रूप में पूजी जाती हैं।

कुष्मांडा का अर्थ है "ब्रह्मांड को अपने उदर में धारण करने वाली"। वह शक्ति और सृजन की प्रतीक है, जो ब्रह्मांड को बनाए रखने में मदद करती है।

कुष्मांडा की पूजा करने से व्यक्ति को स्वास्थ्य, संपत्ति और सुख की प्राप्ति होती है। वह अपने भक्तों को संकट से बचाती हैं और उनके जीवन को समृद्ध बनाती हैं।

🪷देवी कुष्मांडा की महिमा का वर्णन करते हुए शिव पुराण में कहा गया है:👇

"कुष्मांडा शुभदा स्वाहा, स्मरणमात्रेण भक्तानाम्।

अभीप्सितार्थसिद्ध्यर्थम्, न्वार्णमेकविंशाक्षरम्।"

इसका अर्थ है: "कुष्मांडा का स्मरण करने से ही भक्तों की इच्छाएँ पूरी हो जाती हैं।"

इस प्रकार, माता कुष्मांडा की महिमा और शक्ति का वर्णन प्राचीन ग्रंथों में विस्तार से मिलता है।


इन ग्रंथों में माता कुष्मांडा के महात्म्य का वर्णन करते हुए उनके रूप, गुणों और शक्तियों का वर्णन किया गया है।

          🌺🌹🌻🌼🌻🌹🌺

*निर्भीकता और सौम्‍यता की देवी माँ कूष्माण्डा आपको सदैव उर्जावान रखे आदिस्वरूपा व आदिशक्ति  माता  कूष्माण्डा के चरण आपके घर में आएं, आप हर्ष से सम्पूर्ण हो जाएं।

बुधवार, 2 अक्टूबर 2024

नवदुर्गा रूपी साधना से पायें अपार सुख समृद्धि और मोक्ष

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नवरात्रि सनातन वैदिक धर्म का एक महत्वपूर्ण महापर्व है, जो वर्ष में चार बार क्रमशः, चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से रामनवमी तक, आषाढ़ माह शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तिथि तक,आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तिथि तक और चतुर्थ है,  माघ माह शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से नवमी तक मनाई जातो है। इनमें आषाढ़ माह और माघ माह की नवरात्रि गुप्त मानी जाती है। जिन्हें साधकों द्वारा शान्ति पूर्वक एकान्त में पूर्ण किया जाता है।यह महापर्व देवी दुर्गा की आराधना और पूजा के लिए विशेष रूप से मनाया जाता है।


नवरात्रि का महात्म्य:


1. देवी दुर्गा की आराधना: नवरात्रि के समय देवी दुर्गा के नौ रूपों की साधना की जाती है, जो शक्ति और साहस की प्रतीक हैं।


2. शक्ति की आराधना: नवरात्रि शक्ति की आराधना का पर्व है, जो जीवन में शक्ति और साहस की आवश्यकता को दर्शाता है।


3. आत्मशुद्धि: नवरात्रि के कालखंड में व्रत, पूजा, और ध्यान के माध्यम से आत्मशुद्धि की जाती है।


4. नवीकरण: नवरात्रि नवीकरण का महापर्व है, जो जीवन में नवीनता और परिवर्तन की आवश्यकता को दर्शाता है।

5.

🌹नवरात्रि क्या है??? और नवरात्र का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक रहस्य🌹....


नवरात्र शब्द से नव अहोरात्रों (विशेष रात्रियां) का बोध होता है। इस समय शक्ति के नव रूपों की उपासना की जाती है। 'रात्रि' शब्द सिद्धि का प्रतीक है।


भारत के प्राचीन ऋषियों-मुनियों ने रात्रि को दिन की अपेक्षा अधिक महत्व दिया है, इसलिए दीपावली, होलिका, शिवरात्रि और नवरात्र आदि उत्सवों को रात में ही मनाने की परंपरा है। यदि रात्रि का कोई विशेष रहस्य न होता,... तो ऐसे उत्सवों को रात्रि न कह कर दिन ही कहा जाता। लेकिन नवरात्र के दिन, नवदिन नहीं कहे जाते।

मनीषियों ने वर्ष में 4 बार नवरात्रों का विधान बनाया है। विक्रम संवत के पहले दिन अर्थात चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (पहली तिथि) से नौ दिन अर्थात नवमी तक और इसी प्रकार ठीक छह मास उपरान्त आश्विन मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से महानवमी अर्थात विजयादशमी के एक दिन पूर्व तक, इसी प्रकार दो अन्य गुप्त नवरात्रि होती हैं। परंतु सिद्धि और साधना की दृष्टि से शारदीय नवरात्रों को अधिक महत्वपूर्ण माना गया है।इन नवरात्रों में लोग अपनी आध्यात्मिक और मानसिक शक्ति संचय करने के लिए अनेक प्रकार के व्रत, संयम, नियम, यज्ञ, भजन, पूजन, योग साधना आदि करते हैं। कुछ साधक इन रात्रियों में पूरी रात पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर आंतरिक त्राटक या बीज मंत्रों के जाप द्वारा विशेष सिद्धियां प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

नवरात्रों में शक्ति के 51 पीठों पर भक्तों का समुदाय बड़े उत्साह से शक्ति की उपासना के लिए एकत्रित होता है। जो उपासक इन शक्ति पीठों पर नहीं पहुंच पाते, वे अपने निवास स्थल पर ही शक्ति का आह्वान करते हैं।

आजकल अधिकांश उपासक शक्ति पूजा रात्रि में नहीं, पुरोहित को दिन में ही बुलाकर संपन्न करा देते हैं। सामान्य भक्त ही नहीं, पंडित और साधु-महात्मा भी अब नवरात्रों में पूरी रात जागना नहीं चाहते। न कोई आलस्य को त्यागना चाहता है। कम ही उपासक आलस्य को त्याग कर आत्मशक्ति, मानसिक शक्ति और यौगिक शक्ति की प्राप्ति के लिए रात्रि के समय का उपयोग करते देखे जाते हैं।मनीषियों ने रात्रि के महत्व को अत्यंत सूक्ष्मता के साथ वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में समझने और समझाने का प्रयत्न किया। रात्रि में प्रकृति के अधिक सारे अवरोध समाप्त हो जाते हैं। आधुनिक विज्ञान भी इस बात से सहमत है। हमारे ऋषि - मुनि आज से कितने ही हजारों वर्ष पूर्व ही प्रकृति के इन वैज्ञानिक रहस्यों को जान चुके थे।

दिन में यदि पुकार दी जाए तो वह दूर तक नहीं जाएगी , किंतु रात्रि को पुकार दी जाए तो वह दूर तक जाती है। इसके पीछे दिन के कोलाहल के अतिरिक्त एक वैज्ञानिक तथ्य यह भी है कि दिन में सूर्य की किरणें ध्वनि की तरंगों और रेडियो तरंगों को आगे बढ़ने से रोक देती हैं। रेडियो इस बात का जीता - जागता उदाहरण है। कम शक्ति के रेडियो स्टेशनों को दिन में पकड़ना अर्थात सुनना कठिन होता है , जबकि सूर्यास्त के बाद छोटे से छोटा रेडियो स्टेशन भी सरलता से सुना जा सकता है।

वैज्ञानिक सिद्धांत यह है कि सूर्य की किरणें दिन के समय रेडियो तरंगों को जिस प्रकार रोकती हैं , उसी प्रकार मंत्र जाप की विचार तरंगों में भी दिन के समय अवरोध पड़ता है। इसीलिए ऋषि - मुनियों ने रात्रि का महत्व दिन की अपेक्षा विशेष अधिक बताया है। मंदिरों में घंटे और शंख की ध्वनि के कंपन से दूर - दूर तक वातावरण कीटाणुओं से रहित हो जाता है। यह रात्रि का वैज्ञानिक रहस्य है। जो इस वैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखते हुए रात्रियों में संकल्प और उच्च अवधारणा के साथ अपने शक्तिशाली विचार तरंगों को वायुमंडल में भेजते हैं , उनकी कार्यसिद्धि अर्थात मनोकामना सिद्धि , उनके शुभ संकल्प के अनुसार उचित समय और ठीक विधि के अनुसार करने पर अवश्य होती है।

नवरात्र या नवरात्रि::

संस्कृत व्याकरण के अनुसार नवरात्रि कहना त्रुटिपूर्ण हैं। नौ रात्रियों का समाहार, समूह होने के कारण से द्वन्द समास होने के कारण यह शब्द पुलिंग रूप 'नवरात्र' में ही शुध्द है।

नवरात्र क्या है

पृथ्वी द्वारा सूर्य की परिक्रमा के काल में एक वर्ष की चार संधियाँ हैं। उनमें मार्च व सितंबर माह में पड़ने वाली गोल संधियों में वर्ष के चार मुख्य नवरात्र पड़ते हैं। इस समय रोगाणु आक्रमण की सर्वाधिक संभावना होती है। ऋतु संधियों में प्रायः शारीरिक रोग बढ़ते हैं, अत: उस समय स्वस्थ रहने के लिए, शरीर को शुध्द रखने के लिए और तनमन को निर्मल और पूर्णत: स्वस्थ रखने के लिए की जाने वाली प्रक्रिया का नाम 'नवरात्र' है।

नौ दिन या रात

अमावस्या की रात से अष्टमी तक या पड़वा से नवमी की दोपहर तक व्रत नियम चलने से नौ रात यानी 'नवरात्र' नाम सार्थक है। यहाँ रात गिनते हैं, इसलिए नवरात्र यानि नौ रातों का समूह कहा जाता है।रूपक के द्वारा हमारे शरीर को नौ मुख्य द्वारों वाला कहा गया है। इसके भीतर निवास करने वाली जीवनी शक्ति का नाम ही दुर्गा देवी है। इन मुख्य इन्द्रियों के अनुशासन, स्वच्छ्ता, तारतम्य स्थापित करने के प्रतीक रूप में, शरीर तंत्र को पूरे वर्ष के लिए सुचारू रूप से क्रियाशील रखने के लिए नौ द्वारों की शुध्दि का पर्व नौ दिन मनाया जाता है। इनको व्यक्तिगत रूप से महत्व देने के लिए नौ दिन नौ दुर्गाओं के लिए कहे जाते हैं।

शरीर को सुचारू रखने के लिए विरेचन, स्वच्छता या शुध्दि प्रतिदिन तो हम करते ही हैं किन्तु अंग-प्रत्यंगों की पूरी तरह से भीतरी सफाई करने के लिए हर छ: माह के अंतर से स्वच्छता अभियान चलाया जाता है। सात्विक आहार के व्रत का पालन करने से शरीर की शुध्दि, साफ सुथरे शरीर में शुध्द बुद्धि, उत्तम विचारों से ही उत्तम कर्म, कर्मों से सच्चरित्रता और क्रमश: मन शुध्द होता है। स्वच्छ मन मंदिर में ही तो ईश्वर की शक्ति का स्थायी निवास होता है।

नौ देवियाँ / नव देवी

नौ दिन अर्थात हिन्दी माह चैत्र और आश्विन के शुक्ल पक्ष की पड़वा यानि पहली तिथि से नौवी तिथि तक प्रत्येक दिन की एक देवी अर्थात् नौ द्वार वाले दुर्ग के भीतर रहने वाली जीवनी शक्ति रूपी दुर्गा के नौ रूप हैं-

1. शैलपुत्री

2. ब्रह्मचारिणी

3. चंद्रघंटा

4. कूष्माण्डा

5. स्कन्दमाता

6. कात्यायनी

7. कालरात्रि

8. महागौरी

9. सिध्दीदात्री

इनका नौ जड़ी बूटी या विशेष व्रत की चीजों से भी सम्बंध है, जिन्हे नवरात्र के व्रत में प्रयोग किया जाता है-

1. कुट्टू (शैलान्न)

2. दूध-दही,

3. चौलाई (चंद्रघंटा)

4. पेठा (कूष्माण्डा)

5. श्यामक चावल (स्कन्दमाता)

6. हरी तरकारी (कात्यायनी)

7. काली मिर्च व तुलसी (कालरात्रि)

8. साबूदाना (महागौरी)

9. आंवला(सिध्दीदात्री)

क्रमश: ये नौ प्राकृतिक व्रत खाद्य पदार्थ हैं।

अष्टमी या नवमी::

यह कुल परम्परा के अनुसार तय किया जाता है। भविष्योत्तर पुराण में और देवी भावगत के अनुसार, बेटों वाले परिवार में या पुत्र की चाहना वाले परिवार वालों को नवमी में व्रत खोलना चाहिए। वैसे अष्टमी, नवमी और दशहरे के चार दिन बाद की चौदस, इन तीनों की महत्ता 'दुर्गासप्तशती' में कही गई है।

नवरात्रि के समय की जाने वाली गतिविधियाँ:


1. देवी दुर्गा की साधना 

2. व्रत और उपवास

3. ध्यान और योग

4. हवन और यज्ञ



5. कन्या भोज 



6. गरबा और डांडिया नृत्य


नवरात्रि के नौ दिनों के कालखंड में देवी दुर्गा के नौ रूपों की आराधना की जाती है:


दिन 1: शैलपुत्री

दिन 2: ब्रह्मचारिणी

दिन 3: चंद्रघंटा 

दिन 4: कूष्मांडा

दिन 5: स्कंदमाता

दिन 6: कात्यायनी

दिन 7: कालरात्रि

दिन 8: महागौरी

दिन 9: सिद्धिदात्री

दिन 10: विजयदशमी मनाई जाती है। इस दिन प्रभु श्री राम ने असुराधिपति महावीर रावण का, विश्व कल्याण हेतु किया था।


नवरात्रि का पर्व हमें शक्ति, साहस, और आत्मशुद्धि की ओर ले जाता है।

यहाँ कुछ शास्त्रोक्त ग्रंथों से प्रमाण हैं जो नवरात्रि के महत्व को दर्शाते हैं:


1. *श्रीमद्देवी भागवत*: "नवरात्रि पर्व के समय देवी दुर्गा की आराधना करने से सभी पापों का नाश होता है और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति होती है।"


2. *मार्कण्डेय पुराण*: "नवरात्रि पर्व के समय देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा करने से सभी कार्यों में सफलता मिलती है।"


3. *शिव पुराण*: "नवरात्रि पर्व के कालखंड भगवान शिव की आराधना करने से सभी पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।"


4. *ब्रह्म पुराण*: "नवरात्रि पर्व के कालखंड में देवी दुर्गा की पूजा करने से सभी कार्यों में सफलता मिलती है और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।"


5. *कल्कि पुराण*: "नवरात्रि पर्व के समय देवी दुर्गा की आराधना करने से सभी पापों का नाश होता है और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति होती है।"


ये शास्त्रोक्त ग्रंथ नवरात्रि के महत्व को दर्शाते हैं और देवी दुर्गा की आराधना के महत्व को प्रकट करते हैं।

माता शैलपुत्री का महात्म्य हिंदू धर्म के कई ग्रंथों में वर्णित है। यहाँ कुछ प्रमाण श्लोक हैं:

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*श्रीमद्देवी भागवत (स्कंद 5, अध्याय 12)*


"शैलपुत्री या परा देवी प्रथम दुर्गा भवेत् |

हिमवान् सुता सा भीमा शैलात् प्रभवती ||"


अर्थ: शैलपुत्री देवी प्रथम दुर्गा है, जो हिमवान की पुत्री है और शैल से प्रभावित होती है।


*मार्कण्डेय पुराण (अध्याय 78)*


"शैलपुत्री च या देवी प्रथम दुर्गा भवेत् |

शैलात् प्रभवती सा देवी सर्वशक्तिः ||"


अर्थ: शैलपुत्री देवी प्रथम दुर्गा है, जो शैल से प्रभावित होती है और सर्वशक्ति है।


*देवी महात्म्यम् (अध्याय 1)*


"शैलपुत्री या देवी च प्रथम दुर्गा भवेत् |

वन्दे ताम् शैलपुत्रीं या देवी सर्वशक्तिः ||"


अर्थ: मैं शैलपुत्री देवी की वन्दना करता हूँ, जो प्रथम दुर्गा है और सर्वशक्ति है।


*ब्रह्म पुराण (अध्याय 143)*


"शैलपुत्री देवी प्रथम दुर्गा भवेत् |

हिमवान् सुता सा भीमा शैलात् प्रभवती ||"


अर्थ: शैलपुत्री देवी प्रथम दुर्गा है, जो हिमवान की पुत्री है और शैल से प्रभावित होती है।

माता शैलपुत्री का महात्म्य हिंदू सनातन संस्कृति धर्म के कई ग्रंथों में वर्णित है। यहाँ कुछ प्रमाण श्लोक हैं:


श्रीमद्देवी भागवत (स्कंद 5, अध्याय 12)


"शैलपुत्री या देवेशी वंदे तां शिवशंखधारिणीम् |

चंद्रघंटेति या कीर्त्तिता शिवा त्वं शिवमूर्त्तिभिः ||"


अर्थ: शैलपुत्री देवी की मैं वंदना करता हूँ, जो शिव की अर्धांगिनी है और शंख धारण करती है। वह चंद्रघंटा के नाम से भी जानी जाती है और शिव की ही पूर्णता है।


मार्कण्डेय पुराण (अध्याय 78)


"शैलपुत्री महादेवी यपर्वतात् जाता |

वंदे तां शिवशंखधारिणीम् शिवा त्वं शिवमूर्त्तिभिः ||"


अर्थ: पर्वत से उत्पन्न हुई शैलपुत्री महादेवी की मैं वंदना करता हूँ, जो शिव की अर्धांगिनी है और शंख धारण करती है। वह शिवमय है।


देवी महात्म्य (अध्याय 1)


"शैलपुत्री या देवेशी प्रथम दुर्गा स्वरूपिणी |

वंदे तां शिवशंखधारिणीम् शिवा त्वं शिवमूर्त्तिभिः ||"


अर्थ: शैलपुत्री देवी पहली दुर्गा का स्वरूप है, जो शिव की अर्धांगिनी है और शंख धारण करती है। वह शिव की एक रूप है।


इन श्लोकों के प्रमाणों से ज्ञात होता है कि माता शैलपुत्री देवी दुर्गा का प्रथम रूप है, जो हिमवान की पुत्री है और शैल से प्रभावित होती है। वह सर्वशक्ति है और सभी शक्तियों की अधिष्ठात्री है।

नवरात्रि के पहले दिन माँ दुर्गा के शैलपुत्री रूप की साधना और पूजा की जाती है, जो पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं ¹ ²। शैलपुत्री का अर्थ है "पर्वत की बेटी"। वह भगवान शिव की पत्नी और भगवान गणेश और कार्तिकेय की माता हैं ¹।


*माँ शैलपुत्री की विशेषताएँ:*

- _वृषारूढ़ा_: वह वृष (बैल) पर सवार होती हैं ¹ ²

- _शूलधरा_: उनके हाथ में एक त्रिशूल होता है ¹ ²

- _चन्द्रार्धकृतशेखरा_: उनके सिर पर एक अर्धचंद्र होता है ¹ ²


*माँ शैलपुत्री की पूजा का महत्व:*

माँ शैलपुत्री की साधना से भक्तों को अपनी इच्छाओं की पूर्ति और जीवन में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है ¹ ²। उनकी पूजा से व्यक्ति को अपने जीवन के उद्देश्य की प्राप्ति में सहायता मिलती है और वह अपने लक्ष्यों की दिशा में आगे बढ़ सकता है ¹।


*माँ शैलपुत्री का मंत्र:*

"वंदे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।

वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्री यशस्विनीम्।" ¹ ²

माता ब्रह्मचारिणी देवी दुर्गा के नौ रूपों में से दूसरा रूप हैं। उनका नाम "ब्रह्मचारिणी" है, जिसका अर्थ है "ब्रह्म की उपासना करने वाली" या "ब्रह्म की शोध में लगी हुई"।


माता ब्रह्मचारिणी के रूप का वर्णन इस प्रकार है:


वे सदैव तपस्या में लीन रहती हैं और उनके हाथ में एक कमंडलु (पानी का पात्र) और एक रुद्राक्ष की माला होती है।

उनका वस्त्र श्वेत वर्ण का होता है, जो उनकी निरामयता और तपस्या की भावना को दर्शाता है।

उनके चेहरे पर शांति और ध्यान की मुद्रा होती है, जो उनकी आध्यात्मिक शक्ति को दर्शाती है।

वे अपने पैरों में खड़ाऊँ पहनती हैं, जो उनकी तपस्या और संयम की भावना को दर्शाती हैं।


माता ब्रह्मचारिणी की पूजा से भक्तों को तपस्या, संयम, और आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति होती है। उनकी पूजा से व्यक्ति को अपने जीवन में संयम और अनुशासन की भावना में सहायता मिलती है।

माता चंद्रघंटा देवी दुर्गा जी के नौ रूपों में से तीसरा रूप हैं। उनका नाम "चंद्रघंटा" है, जिसका अर्थ है "चंद्र की घंटा"।


माता चंद्रघंटा का रूप:


- उनका रंग स्वर्ण के समान है।

- उनके दस हाथ हैं, जिनमें उन्होंने तलवार, ढाल, कमल, धनुष, बाण, अभय मुद्रा, वरद मुद्रा, गदा, चक्र और त्रिशूल धारण किए हैं।

- उनका वाहन सिंह है।

- उनकी घंटा चंद्र के आकार की है, जो उनके माथे पर स्थित है।


माता चंद्रघंटा का बीज मंत्र:


"ॐ ऐं ह्रीं चंद्रघंटायै नमः"


माता चंद्रघंटा का मंत्र:


"पिंडजप्रवरारूढा चंद्रप्रख्या प्रसीदतु में।

श्रियं देवी चंद्रघंटेत्येवं नुतां नुतां सेवामहे।"


माता चंद्रघंटा की पूजा करने से भक्तों को सुख-समृद्धि, शक्ति और साहस की प्राप्ति होती है। उनकी कृपा से भक्तों के सभी कार्य सिद्ध होते हैं और उन्हें जीवन में सफलता प्राप्त होती है।

माता स्कंदमाता देवी दुर्गा के नौ रूपों में से पांचवां रूप हैं। उनका नाम "स्कंदमाता" है, जिसका अर्थ है "स्कंद (कार्तिकेय) की माता"।


माता स्कंदमाता के रूप का वर्णन इस प्रकार है:


वे अपने बाएं हाथ में अपने पुत्र कार्तिकेय (स्कंद) को पकड़े हुए हैं।

उनका दाहिना हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में होता है।

उनके चेहरे पर मातृत्व की भावना और स्नेह का भाव होता है।

वे एक सिंह पर सवार होती हैं, जो उनकी शक्ति और साहस को दर्शाता है।

उनके वस्त्र साफ़ और सुंदर होते हैं, जो उनकी पवित्रता और शुद्धता को दर्शाते हैं।


माता स्कंदमाता की पूजा से भक्तों को सुख-समृद्धि, संतान की प्राप्ति, और जीवन में सफलता की प्राप्ति होती है। उनकी पूजा से व्यक्ति को अपने जीवन में साहस, स्नेह, और मातृत्व की भावना में सहायता मिलती है।

माता कात्यायनी देवी दुर्गा के नौ रूपों में से छठा रूप हैं। उनका नाम "कात्यायनी" है, जिसका अर्थ है "महर्षि कात्यायन की पुत्री"।


माता कात्यायनी के रूप का वर्णन इस प्रकार है:


वे अपने चार हाथों में खड्ग, कमल, अभय मुद्रा और वरद मुद्रा धारण करती हैं।

उनका वाहन सिंह है, जो उनकी शक्ति और साहस को दर्शाता है।

उनके वस्त्र मोहक और सुंदर होते हैं, जो उनकी पवित्रता और शुद्धता को दर्शाते हैं।

उनके चेहरे पर शांति और कृपा का भाव होता है।

उनकी आँखें दया और करुणा से भरी होती हैं।


माता कात्यायनी की पूजा से भक्तों को सुख-समृद्धि, जीवन में सफलता, और आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति होती है। उनकी पूजा से व्यक्ति को अपने जीवन में साहस, आत्मविश्वास, और आध्यात्मिक शक्ति के विकास में सहायता मिलती है।


माता कात्यायनी का मंत्र है:

"चंद्र्हासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।

कात्यायनी शुभं दात्री सुरनुता भक्तिमम्।"


इस मंत्र का जाप करने से भक्तों को माता कात्यायनी की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है।

माता कालरात्रि देवी दुर्गा के नौ रूपों में से सातवां रूप हैं। उनका नाम "कालरात्रि" है, जिसका अर्थ है "घनघोर रात्रि या महारात्रि"।


माता कालरात्रि के रूप का वर्णन इस प्रकार है:


वे अपने चार हाथों में तलवार, खड्ग, अभय मुद्रा और वरद मुद्रा धारण करती हैं।

उनका वाहन गर्दभ (गदहा) है, जो उनकी शक्ति और साहस को दर्शाता है।

उनके वस्त्र काले रंग के होते हैं, जो उनके नाम के अनुसार हैं।

उनके चेहरे पर क्रोध और तीव्रता का भाव होता है।

उनकी आँखें लाल और भयानक होती हैं।

उनके बाल खुले और विकराल होते हैं।


माता कालरात्रि की पूजा से भक्तों को सुख-समृद्धि, जीवन में सफलता, और आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति होती है। उनकी पूजा से व्यक्ति को अपने जीवन में साहस, आत्मविश्वास, और आध्यात्मिक शक्ति के विकास में सहायता मिलती है।


माता कालरात्रि का श्लोक है:


"कालरात्रि श्यामा ताम्रोस्त्री विद्युत्सेना समन्विता।

शुभं कार्तिक्यणी त्वत्सेवयंतु नित्यम् कुलीना।"


इस श्लोक का अर्थ है:


"हे माता कालरात्रि, आप काले रंग की हो, ताम्रवर्णी हो, और विद्युत्सेना के समान प्रकाशमान हो। आपकी सेवा करने वाले भक्तों को सुख-समृद्धि और आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति होती है।"


माता कालरात्रि का मंत्र है:


"ॐ माहाकाली देव्यै नमः"


इस मंत्र का जप करने से भक्तों को माता कालरात्रि की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है।

माता महागौरी देवी दुर्गा के नौ रूपों में से आठवां रूप हैं। उनका नाम "महागौरी" है, जिसका अर्थ है "महान गौरवर्णी" या "महाश्वेत"।


माता महागौरी के रूप का वर्णन इस प्रकार है:


वे अपने चार हाथों में तलवार, डमरू, अभय मुद्रा और वरद मुद्रा धारण करती हैं।

उनका वाहन वृषभ (बैल) है, जो उनकी शक्ति और साहस को दर्शाता है।

उनके वस्त्र श्वेत रंग के होते हैं, जो उनकी शुद्धता और पवित्रता को दर्शाते हैं।

उनके चेहरे पर शांति और कृपा का भाव होता है।

उनकी आँखें दया और करुणा से भरी होती हैं।

उनके बाल सुंदर और विन्यस्त होते हैं।


माता महागौरी की पूजा से भक्तों को सुख-समृद्धि, जीवन में सफलता, और आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति होती है। उनकी पूजा से व्यक्ति को अपने जीवन में साहस, आत्मविश्वास, और आध्यात्मिक शक्ति के विकास में सहायता मिलती है।


माता महागौरी का श्लोक है:


"श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरा श्वेतपद्मधारिणी।

श्वेतमाल्यानुलेपना श्वेतस्रग्धारा शुभां कार्तिक्यणी।"


इस श्लोक का अर्थ है:


"हे माता महागौरी, आप श्वेत वृषभ पर सवार हो, श्वेत वस्त्र धारण करती हो, और श्वेत पुष्पों से सुसज्जित हुई हो। आप श्वेतमाला और श्वेत स्रगधारा से सुसज्जित हुई हो। आपकी सेवा करने वाले भक्तों को सुख-समृद्धि और आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति होती है।"


माता महागौरी का मंत्र है:


"ॐ महागौर्यै नमः"


इस मंत्र का जप करने से भक्तों को माता महागौरी की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है।

माता सिद्धिदात्री देवी दुर्गा के नौ रूपों में से नौवी रात्रि का रूप हैं। उनका नाम "सिद्धिदात्री" है, जिसका अर्थ है "सिद्धियों की दाता"।


माता सिद्धिदात्री के रूप का वर्णन इस प्रकार है:


वे अपने चार हाथों में गदा, चक्र, अभय मुद्रा और वरद मुद्रा धारण करती हैं।

उनका वाहन कमल है, जो उनकी शुद्धता और पवित्रता को दर्शाता है।

उनके वस्त्र सुंदर और विन्यस्त होते हैं।

उनके चेहरे पर शांति और कृपा का भाव होता है।

उनकी आँखें दया और करुणा से भरी होती हैं।

उनके बाल सुंदर और विन्यस्त होते हैं।

माता सिद्धदात्री 

माता सिद्धिदात्री की पूजा से भक्तों को सुख-समृद्धि, जीवन में सफलता, और आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति होती है। उनकी पूजा से व्यक्ति को अपने जीवन में साहस, आत्मविश्वास, और आध्यात्मिक शक्ति के विकास में सहायता मिलती है।


माता सिद्धिदात्री का श्लोक है:


"कलौ काली कलौ त्वम् काली महाकाली त्वम्।

सर्वभूतानां त्वम् सिद्धिर्भूतिर्भूतिर्भविष्यति।"


इस श्लोक का अर्थ है:


"हे माता सिद्धिदात्री, आप कलियुग में भी काली हो, महाकाली हो। आप सभी जीवों की सिद्धि और भूति हो, और आप ही भविष्य में भी सिद्धि प्रदान करोगी।"


माता सिद्धिदात्री का मंत्र है:


"ॐ सिद्धिदात्र्यै नमः"


इस मंत्र का जप करने से भक्तों को माता सिद्धिदात्री की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है।

देवी दुर्गा के नौ रूपों का पृथक वर्णन और श्लोक इस प्रकार हैं:


1. शैलपुत्री


वर्णन: शैलपुत्री देवी दुर्गा के नौ रूपों में से पहला रूप हैं। उनका नाम "शैलपुत्री" है, जिसका अर्थ है "पर्वत की पुत्री"। वे अपने चार हाथों में त्रिशूल, डमरू, अभय मुद्रा और वरद मुद्रा धारण करती हैं।


श्लोक:

"वन्दे वांच्छितलाभाय चंद्रार्धव्रतसमन्विताम्।

नवम्यां दुर्गां मध्यमां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्।"


2. ब्रह्मचारिणी


वर्णन: ब्रह्मचारिणी देवी दुर्गा के नौ रूपों में से दूसरा रूप हैं। उनका नाम "ब्रह्मचारिणी" है, जिसका अर्थ है "ब्रह्म की उपासना करने वाली"। वे अपने चार हाथों में कमंडलु, रुद्राक्ष माला, अभय मुद्रा और वरद मुद्रा धारण करती हैं।


श्लोक:

"ध्यानं धारयामि देवी त्वां ब्रह्मचारिण्यनुत्तमाम्।

तपस्या अधिज्ञानया त्वां नुतां नुतां सेवामहे।"


3. चंद्रघंटा


वर्णन: चंद्रघंटा देवी दुर्गा के नौ रूपों में से तीसरा रूप हैं। उनका नाम "चंद्रघंटा" है, जिसका अर्थ है "चंद्र की घंटा"। वे अपने चार हाथों में तलवार, ढाल, अभय मुद्रा और वरद मुद्रा धारण करती हैं।


श्लोक:

"पिंडजप्रवरारूढा चंद्रप्रख्या प्रसीदतु में।

श्रियं देवी चंद्रघंटेत्येवं नुतां नुतां सेवामहे।"


4. कूष्मांडा


वर्णन: कूष्मांडा देवी दुर्गा के नौ रूपों में से चौथा रूप हैं। उनका नाम "कूष्मांडा" है, जिसका अर्थ है "कुम्हड़े की देवी"। वे अपने चार हाथों में कमंडलु, कलश, अभय मुद्रा और वरद मुद्रा धारण करती हैं।


श्लोक:

सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।

दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्मांडा शुभदास्तु मे।


 5. स्कंदमाता


वर्णन: स्कंदमाता देवी दुर्गा के नौ रूपों में से पांचवां रूप हैं। उनका नाम "स्कंदमाता" है, जिसका अर्थ है "स्कंद की माता"। वे अपने चार हाथों में स्कंद, कमल, अभय मुद्रा और वरद मुद्रा धारण करती हैं।


श्लोक:

पटाम्बरपरिधाना च पटद्वय समन्विता।

कात्यायनी शुभं दात्री सुरनुता भक्तिमम्।


6. कात्यायनी


वर्णन: कात्यायनी देवी दुर्गा के नौ रूपों में से छठा रूप हैं। उनका नाम "कात्यायनी" है, जिसका अर्थ है "महर्षि कात्यायन की पुत्री"। वे अपने चार हाथों में तलवार, कमल, अभय मुद्रा और वरद मुद्रा धारण करती हैं।


श्लोक:

चंद्र्हासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।

देवी दुर्गा के दो रूपों का वर्णन और श्लोक इस प्रकार हैं:


7. माता कात्यायनी


वर्णन: माता कात्यायनी देवी दुर्गा के नौ रूपों में से छठा रूप हैं। उनका नाम "कात्यायनी" है, जिसका अर्थ है "महर्षि कात्यायन की पुत्री"। वे अपने चार हाथों में तलवार, कमल, अभय मुद्रा और वरद मुद्रा धारण करती हैं। उनका वाहन सिंह है, जो उनकी शक्ति और साहस को दर्शाता है।


श्लोक:

"चंद्र्हासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना।

कात्यायनी शुभं दात्री सुरनुता भक्तिमम्।"


8. माता कालरात्रि


वर्णन: माता कालरात्रि देवी दुर्गा के नौ रूपों में से सातवां रूप हैं। उनका नाम "कालरात्रि" है, जिसका अर्थ है "काले रंग की रात"। वे अपने चार हाथों में तलवार, खड्ग, अभय मुद्रा और वरद मुद्रा धारण करती हैं। उनका वाहन गर्दभ (गदहा) है, जो उनकी शक्ति और साहस को दर्शाता है।


श्लोक:

"कालरात्रि श्यामा ताम्रोस्त्री विद्युत्सेना समन्विता।

शुभं कार्तिक्यणी त्वत्सेवयंतु नित्यम् कुलीना।"


इन मंत्रों का जाप करने से भक्तों को माता कात्यायनी और माता कालरात्रि की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है।

देवी दुर्गा के नौ रूपों में से प्रथम सात माताओं के बीज मंत्र इस प्रकार हैं:


1. शैलपुत्री - "ॐ ऐं ह्रीं शैलपुत्र्यै नमः"


2. ब्रह्मचारिणी - "ॐ दुम् दुर्गायै नमः"


3. चंद्रघंटा - "ॐ ऐं ह्रीं चंद्रघंटायै नमः"


4. कूष्मांडा - "ॐ कूम् कूष्मांडायै नमः"


5. स्कंदमाता - "ॐ स्कंदमात्रे नमः"


6. कात्यायनी - "ॐ कात्यायनी च विद्महे"


7. कालरात्रि - "ॐ माहाकाली देव्यै नमः"


इन बीज मंत्रों का जाप करने से भक्तों को माता की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है।

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2024

2 अक्टूबर/जन्मदिन,,लाल बहादुर शास्त्री



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 2 अक्टूबर/जन्मदिन,,लाल बहादुर शास्त्री 

लालबहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1904 में मुगलसराय (उत्तर प्रदेश) में एक कायस्थ परिवार में मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव के यहाँ हुआ था। उनके पिता प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे अत: सब उन्हें मुंशीजी ही कहते थे। 

बाद में उन्होंने राजस्व विभाग में लिपिक (क्लर्क) की नौकरी कर ली थी । लालबहादुर की माँ का नाम रामदुलारी था। परिवार में सबसे छोटा होने के कारण बालक लालबहादुर को परिवार वाले प्यार में नन्हें कहकर ही बुलाया करते थे। 

जब नन्हें अठारह महीने का हुआ दुर्भाग्य से पिता का निधन हो गया। उनकी माँ रामदुलारी अपने पिता हजारीलाल के घर मिर्ज़ापुर चली गयीं। 

कुछ समय बाद उसके नाना भी नहीं रहे। बिना पिता के बालक नन्हें की परवरिश करने में उसके मौसा रघुनाथ प्रसाद ने उसकी माँ का बहुत सहयोग किया। ननिहाल में रहते हुए उसने प्राथमिक शिक्षा ग्रहण की। उसके बाद की शिक्षा हरिश्चन्द्र हाई स्कूल और काशी विद्यापीठ में हुई। 



काशी विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि मिलने के बाद उन्होंने जन्म से चला आ रहा जातिसूचक शब्द श्रीवास्तव सदा सदा के लिये हटा दिया और अपने नाम के आगे 'शास्त्री' लगा लिया। इसके पश्चात् शास्त्री शब्द लालबहादुर के नाम का पर्याय ही बन गया।

1928 में उनका विवाह मिर्जापुर निवासी गणेशप्रसाद की पुत्री ललिता से हुआ। ललिता शास्त्री से उनके छ: सन्तानें हुईं, दो पुत्रियाँ-कुसुम व सुमन और चार पुत्र-हरिकृष्ण, अनिल, सुनील व अशोक।

उनके चार पुत्रों में से दो-अनिल शास्त्री और सुनील शास्त्री अभी हैं, शेष दो दिवंगत हो चुके हैं। अनिल शास्त्री कांग्रेस पार्टी के एक वरिष्ठ नेता हैं जबकि सुनील शास्त्री भारतीय जनता पार्टी में चले गये।

जवाहरलाल नेहरू का उनके प्रधानमन्त्री के कार्यकाल के मध्य 27 मई, 1964 को देहावसान हो जाने के उपरान्त अपनी स्वच्छ छवि के कारण शास्त्रीजी को 1964 में देश का प्रधानमन्त्री बनाया गया। उन्होंने 9 जून 1964 को भारत के प्रधान मन्त्री का पद भार ग्रहण किया।

लाल बहादुर शास्त्री जी भारत के दूसरे प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने 9 जून 1964 से 11 जनवरी 1966 तक देश की बागडोर संभाली थी। उनका जन्म 1904 में मुगलसराय, उत्तर प्रदेश में हुआ था ¹। वह एक महान नेता थे जिन्होंने देश की स्वतंत्रता के बाद उत्तर प्रदेश के संसदीय सचिव के रूप में कार्य किया था।

शास्त्री जी ने काशी विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि प्राप्त की थी और गोविंद बल्लभ पंत के मंत्रिमंडल में पुलिस और परिवहन मंत्रालय संभाला था। उन्होंने 1951 में अखिल भारत कांग्रेस कमेटी के महासचिव के रूप में कार्य किया था और 1952, 1957, और 1962 के चुनावों में कांग्रेस पार्टी को भारी बहुमत से जिताने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी ¹।।

उनके शासनकाल में 1965 का भारत पाक युद्ध प्रारम्भ हो गया। इससे तीन वर्ष पूर्व चीन का युद्ध भारत हार चुका था। शास्त्रीजी ने अप्रत्याशित रूप से हुए इस युद्ध में नेहरू की तुलना में राष्ट्र को उत्तम नेतृत्व प्रदान किया और पाकिस्तान को अच्छी प्रकार से पराजय दी। इसकी कल्पना पाकिस्तान ने कभी सपने में भी नहीं की थी। इसी कालखण्ड में भारत देश में अन्न की कमी का अनुभव किया गया था और अमेरिका ने भारत को गेंहू देने से मना कर दिया था। फलस्वरूप शास्त्री जी के आह्वान पर सम्पूर्ण भारत देश ने सोमवार का व्रत रखकर अपने देश में अन्न की कमी का समाधान कर लिया। आपके द्वारा ही कहा गया था कि,"जय जवान जय किसान"।

ताशकन्द में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री अयूब ख़ान के साथ युद्ध समाप्त करने के समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद 11 जनवरी 1966 की रात में ही रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गयी।उनकी सादगी, देशभक्ति और निष्ठा के लिये मरणोपरान्त उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

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