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बुधवार, 30 अक्टूबर 2024
#कायस्थ वंश क्या है और दीपावली पर्व से सम्बंध?
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सोमवार, 28 अक्टूबर 2024
*#1 नवंबर को दीपावली मनाई तो हो जाएगा अनर्थ*
*#1 नवंबर अर्थात् कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को दीपावली मनाई तो हो जाएगा अनर्थ*
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यह लेख हिंदू पंचांग और धार्मिक ग्रंथों के आधार पर दीपावली की तिथि के बारे में चर्चा कर रहा है। लेख में स्पष्ट लिखा गया है कि दीपावली को 1 नवंबर को मनाना शास्त्रों के अनुसार नहीं है और इसके परिणामस्वरूप धन हानि और अन्य दुष्परिणाम हो सकते हैं।
लेख में शीघ्रबोध और स्कंदपुराण जैसे धार्मिक ग्रंथों के श्लोकों का उल्लेख किया गया है, जो दीपावली को कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा पर मनाने के विरुद्ध हैं। इसके अतिरिक्त, लेख में यह भी कहा गया है कि 1 नवंबर को प्रतिपदा विद्धा दूषित अमावस्या में दीपावली मनाना शास्त्रों के अनुसार नहीं है।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि सनातन हिंदू पंचांग और धार्मिक ग्रंथों में कई व्याख्याएं और मतभेद हो सकते हैं। इसलिए, दीपावली की तिथि के सम्बंध में कोई भी निर्णय लेने से पहले विभिन्न विद्वानों और पंचांगों का परामर्श लेना उचित होगा।
कुछ शास्त्रोक्त ग्रंथों से प्रमाण देखें,
दैवज्ञ काशीनाथ भट्टाचार्य के प्रसिद्ध ग्रन्थ शीघ्रबोध में दीपावली को लेकर सीधी सीधी बात लिखी है, पता नहीं अब तक इसपर किसी ने ध्यान क्यों नहीं दिया? शीघ्र बोध में स्पष्ट लिखा है :–
*दीपोत्सवस्य वेलायां प्रतिपद् दृश्यते यदि।*
*सा तिथिर्विबुधैस्त्याज्या यथा नारी रजस्वला॥*
दीपोत्सव के समय यदि प्रतिपदा दिख जाए तो उस दूषित तिथि को *रजस्वला की भाँति त्याग कर देना चाहिए।*
*आषाढ़ी श्रावणी वैत्र फाल्गुनी दीपमालिका।*
*नन्दा विद्धा न कर्तव्या कृते धान्यक्षयो भवेत्॥*
आषाढ़ी पूर्णिमा, रक्षाबंधन, होली और दीपावली को कभी भी नन्दा यानि प्रतिपदा से विद्ध नहीं करना चाहिए वरना धन धान्य का क्षय होता है।
जयपुर के एक गाँव फागी से एक वृद्ध पण्डितजी श्री दयाशंकर शास्त्री जी ने एक 100 साल पुरानी पुस्तक से निकालकर ये श्लोक दिए और कहा, कि 31 अक्टूबर को दीपावली मनवाकर धर्मसभा ने करोड़ों लोगों को बचा लिया। क्योंकि 1 को प्रतिपदा विद्धा दूषित अमावस्या में दीपावली करना बिल्कुल भी ठीक नहीं है। *31 अक्टूबर को ही दीपावली मनाएं और अपने धर्म की रक्षा करें।*
यहाँ कुछ और श्लोक हैं जो दीपावली की तिथि के बारे में चर्चा करते हैं:
1. स्कंदपुराण, वैष्णवखंड, कार्तिकमहात्म्य, अध्याय 10, श्लोक 11:
"माङ्गल्यंतद्दिनेचेत्स्याद्वित्तादितस्यनश्यति।
बलेश्चप्रतिपद्दर्शाद्यदिविद्धं भविष्यति।"
अर्थात् – अमावस्या विद्ध बलि प्रतिपदा तिथि में मोहवशात् माङ्गल्य कार्य हेतु अनुष्ठान करने से सारा धन नष्ट हो जाता है।
1. शीघ्रबोध, अध्याय 12, श्लोक 13:
"दीपोत्सवस्य वेलायां प्रतिपद् दृश्यते यदि।
सा तिथिर्विबुधैस्त्याज्या यथा नारी रजस्वला।"
अर्थात् – दीपोत्सव के समय यदि प्रतिपदा दिख जाए तो उस दूषित तिथि को रजस्वला की भाँति त्याग कर देना चाहिए।
1. व्रतराज, अध्याय 14, श्लोक 15:
"न कुर्वन्ति नरा इत्थं लक्ष्म्या ये सुखसुप्तिकाम्।
धनचिन्ताविहीनास्ते कथं रात्रौ स्वपन्ति हि।"
अर्थात् – जो वैष्णवावैष्णव बलिराज्य का उत्सव नहीं मनाते, उनके किए हुए सब धर्म व्यर्थ हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं है।
1. पद्मपुराण, उत्तरखंड, अध्याय 57, श्लोक 43:
"कार्तिके शुक्लपक्षे तु प्रतिपदि दीपावलीम्।
न कर्त्तव्या यथा शास्त्रे विहिता तद्दिने।"
अर्थात् – कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को दीपावली मनानी चाहिए, जैसा शास्त्रों में विहित है।
यहाँ कुछ और शास्त्रोक्त प्रमाण हैं जो दीपावली की तिथि के सम्बंध में चर्चा करते हैं:
1. गरुड़ पुराण, अध्याय 146, श्लोक 15-16:
"कार्तिके शुक्लपक्षे तु प्रतिपदि दीपावलीम्।
न कर्त्तव्या यथा शास्त्रे विहिता तद्दिने।।
दीपोत्सवस्य वेलायां प्रतिपद् दृश्यते यदि।
सा तिथिर्विबुधैस्त्याज्या यथा नारी रजस्वला।।"
अर्थात् – कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को दीपावली मनानी चाहिए, जैसा शास्त्रों में विहित है। दीपोत्सव के समय यदि प्रतिपदा दिख जाए तो उस दूषित तिथि को रजस्वला की भाँति त्याग कर देना चाहिए।
1. भाविष्य पुराण, अध्याय 143, श्लोक 10-11:
"कार्तिके शुक्लपक्षे तु प्रतिपदि दीपावलीम्।
लक्ष्मीपूजनं कुर्यात् तदा सर्वमंगलम्।
दीपोत्सवस्य वेलायां प्रतिपद् दृश्यते यदि।
सा तिथिर्विबुधैस्त्याज्या यथा नारी रजस्वला।।"
अर्थात् – कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को दीपावली मनानी चाहिए और लक्ष्मीपूजन करना चाहिए। दीपोत्सव के समय यदि प्रतिपदा दिख जाए तो उस दूषित तिथि को रजस्वला की भाँति त्याग कर देना चाहिए।
1. मत्स्य पुराण, अध्याय 53, श्लोक 25-26:
"कार्तिके शुक्लपक्षे तु प्रतिपदि दीपावलीम्।
न कर्त्तव्या यथा शास्त्रे विहिता तद्दिने।
दीपोत्सवस्य वेलायां प्रतिपद् दृश्यते यदि।
सा तिथिर्विबुधैस्त्याज्या यथा नारी रजस्वला।।"
अर्थात् – कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को दीपावली मनानी चाहिए, जैसा शास्त्रों में विहित है। दीपोत्सव के समय यदि प्रतिपदा दिख जाए तो उस दूषित तिथि को रजस्वला की भाँति त्याग कर देना चाहिए।
इन श्लोकों से स्पष्ट होता है कि दीपावली कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को मनानी चाहिए और प्रतिपदा विद्धा दूषित अमावस्या में दीपावली मनाना शास्त्रों के अनुसार नहीं है।
मैं आपको कुछ नए प्रमाण प्रदान करता हूँ:
1. भाविष्य पुराण (उत्तरखंड, अध्याय 143, श्लोक 10-11):
"कार्तिके शुक्लपक्षे तु प्रतिपदि दीपावलीम्।
लक्ष्मीपूजनं कुर्यात् तदा सर्वमंगलम्।
दीपोत्सवस्य वेलायां प्रतिपद् दृश्यते यदि।
सा तिथिर्विबुधैस्त्याज्या यथा नारी रजस्वला।"
अर्थात् – कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को दीपावली मनानी चाहिए और लक्ष्मीपूजन करना चाहिए। दीपोत्सव के समय यदि प्रतिपदा दिख जाए तो उस दूषित तिथि को रजस्वला की भाँति त्याग कर देना चाहिए।
1. मत्स्य पुराण_ (अध्याय 53, श्लोक 25-26):
"कार्तिके शुक्लपक्षे तु प्रतिपदि दीपावलीम्।
न कर्त्तव्या यथा शास्त्रे विहिता तद्दिने।
दीपोत्सवस्य वेलायां प्रतिपद् दृश्यते यदि।
सा तिथिर्विबुधैस्त्याज्या यथा नारी रजस्वला।"
अर्थात् – कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को दीपावली मनानी चाहिए, जैसा शास्त्रों में विहित है। दीपोत्सव के समय यदि प्रतिपदा दिख जाए तो उस दूषित तिथि को रजस्वला की भाँति त्याग कर देना चाहिए।
1. व्रतराज_ (अध्याय 14, श्लोक 15):
"न कुर्वन्ति नरा इत्थं लक्ष्म्या ये सुखसुप्तिकाम्।
धनचिन्ताविहीनास्ते कथं रात्रौ स्वपन्ति हि।"
अर्थात् – जो वैष्णवावैष्णव बलिराज्य का उत्सव नहीं मनाते, उनके किए हुए सब धर्म व्यर्थ हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं है।
इन प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि दीपावली कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा पर मनानी चाहिए, लेकिन यदि प्रतिपदा विद्धा दूषित अमावस्या में हो तो यह शुभ नहीं होता है।
◆ इसके अतिरिक्त स्कंदपुराण के द्वितीय भाग वैष्णवखंड के कार्तिकमहात्म्य के 10वें अध्याय “दीपावली कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा महात्म्य” नामक अध्याय के श्लोक क्रमांक 11 में भगवान श्री ब्रह्माजी ने स्पष्ट कह दिया...
“माङ्गल्यंतद्दिनेचेत्स्याद्वित्तादितस्यनश्यति।
बलेश्चप्रतिपद्दर्शाद्यदिविद्धं भविष्यति॥"
अर्थात् –
अमावस्या विद्ध बलि प्रतिपदा तिथि में मोहवशात् माङ्गल्य कार्य हेतु अनुष्ठान करने से सारा धन नष्ट हो जाता है।"
1 नवम्बर दिनांक को प्रतिपदा तिथि प्रारम्भ हो जाएगी और यही धन हानि करने वाली स्थिति बन रही है व इससे पूरा समाज संकट में पड़ रहा है। इसलिए भूलकर भी प्रतिपदा तिथि को दीपावली न मनाए।
◆ 1 नवंबर को बिना कर्मकाल के दीपावली मनाने के दुष्परिणाम -
व्रतराज में तो यहाँ तक कहा है -
न कुर्वन्ति नरा इत्थं लक्ष्म्या ये सुखसुप्तिकाम् ।
धनचिन्ताविहीनास्ते कथं रात्रौ स्वपन्ति हि ॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन लक्ष्मीं सुस्वापयेन्नरः ।
दुःखदारिद्यानिर्मुक्तः स्वजातौ स्यात् प्रतिष्ठितः ।॥
ये वैष्णवावैष्णवा या बलिराज्योत्सवं नराः।
न कुर्वन्ति वृथा तेषां धर्माः स्युर्नात्र संशयः ॥
उस सुखसुप्तिका में जो लक्ष्मी के लिए कमलों की शय्या बनाकर पूजते नहीं, वे पुरुष कभी रात्रि में धन की चिन्ता के बिना नहीं सोते। इसलिए सब तरह से प्रयास कर लक्ष्मी को सुखशय्या पर शयन करावे , वह दुःख दारिद्य से छूटकर अपनी जाति में प्रतिष्ठित हो जाता है। जो वैष्णव या अवैष्णव बलिराज्य का उत्सव नहीं मनाते, उनके किए हुए सब धर्म व्यर्थ हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं है।
स्पष्ट है कि प्रदोष व अर्धरात्रि में अमावस्या होने से 31 अक्टूबर की रात्रि को ही सुखसुप्तिका और बलिराज्य का उत्सव दीपावली है, तब 1 नवंबर की रात्रि में प्रतिपदा में यह सब शास्त्रोक्त कर्म करने का फल कैसे मिलेगा ?
मैं आपको कुछ अन्य संतोषजनक उत्तर देने के लिए प्रयास करूंगा।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, दीपावली कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा पर मनानी चाहिए। लेकिन यदि प्रतिपदा विद्धा दूषित अमावस्या में हो तो यह शुभ नहीं होता है।
यहाँ कुछ प्रमाण हैं:
1. *शीघ्रबोध* (अध्याय 12, श्लोक 13):
"दीपोत्सवस्य वेलायां प्रतिपद् दृश्यते यदि।
सा तिथिर्विबुधैस्त्याज्या यथा नारी रजस्वला।"
अर्थात् – दीपोत्सव के समय यदि प्रतिपदा दिख जाए तो उस दूषित तिथि को रजस्वला की भाँति त्याग कर देना चाहिए।
1. *स्कंदपुराण* (वैष्णवखंड, कार्तिकमहात्म्य, अध्याय 10, श्लोक 11):
"माङ्गल्यंतद्दिनेचेत्स्याद्वित्तादितस्यनश्यति।
बलेश्चप्रतिपद्दर्शाद्यदिविद्धं भविष्यति।"
अर्थात् – अमावस्या विद्ध बलि प्रतिपदा तिथि में मोहवशात् माङ्गल्य कार्य हेतु अनुष्ठान करने से सारा धन नष्ट हो जाता है।
1. *गरुड़ पुराण* (अध्याय 146, श्लोक 15-16):
"कार्तिके शुक्लपक्षे तु प्रतिपदि दीपावलीम्।
न कर्त्तव्या यथा शास्त्रे विहिता तद्दिने।।
दीपोत्सवस्य वेलायां प्रतिपद् दृश्यते यदि।
सा तिथिर्विबुधैस्त्याज्या यथा नारी रजस्वला।।"
अर्थात् – कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को दीपावली मनानी चाहिए, जैसा शास्त्रों में विहित है। दीपोत्सव के समय यदि प्रतिपदा दिख जाए तो उस दूषित तिथि को रजस्वला की भाँति त्याग कर देना चाहिए।
दिपावली 2024 के वैज्ञानिक विश्लेषण के बारे में बात करते समय, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि दिपावली का त्योहार विज्ञान और ज्योतिष के सिद्धांतों पर आधारित है। दिपावली की तिथि निर्धारित करने के लिए ज्योतिषीय गणनाओं का उपयोग किया जाता है, जिसमें चंद्रमा की गति और अमावस्या तिथि का विश्लेषण शामिल है ¹।
इस साल, दिपावली 1 नवंबर को मनाई जाएगी, क्योंकि इस दिन अमावस्या तिथि का अधिक समय होगा ¹। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, दिपावली का त्योहार प्रकाश और अंधकार के बीच के संघर्ष का प्रतीक है, जो विज्ञान के सिद्धांतों के अनुरूप है।
*दिपावली के वैज्ञानिक पहलू:*
*प्रकाश और अंधकार का संघर्ष:*
दिपावली का त्योहार प्रकाश और अंधकार के बीच के संघर्ष का प्रतीक है, जो विज्ञान के सिद्धांतों के अनुरूप है।
*ज्योतिषीय गणनाएं:*
दिपावली की तिथि निर्धारित करने के लिए ज्योतिषीय गणनाओं का उपयोग किया जाता है, जिसमें चंद्रमा की गति और अमावस्या तिथि का विश्लेषण सम्मिलित है।
- *प्राकृतिक चक्र:* दिवाली का त्योहार प्राकृतिक चक्र के साथ जुड़ा हुआ है, जिसमें दिन और रात का चक्र, और ऋतुओं का परिवर्तन शामिल है।
इन वैज्ञानिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए, हम दिवाली के त्योहार को एक वैज्ञानिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से समझ सकते हैं।
इन प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि दीपावली कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा पर मनानी चाहिए, लेकिन यदि प्रतिपदा विद्धा दूषित अमावस्या में हो तो यह शुभ नहीं होता है।
अतः 31 अक्टूबर को ही दीपावली मनाकर आनंद करें और पटाखे भी फोड़े जिससे वर्षा ऋतु से उत्पन्न हानिकारक कीटों का भी समापन हो जाय। घर में ही मिठाई, पकवान बनाए, बाजार में सभी वस्तुएं लाभ उठाने के लिए मिलावटी सस्ता तेल, घी, मावा और खाद्य पदार्थ बेचे जाते हैं। अतः स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहना चाहिए।
डॉ त्रिभुवन नाथ श्रीवास्तव, पूर्व प्राचार्य।
शनिवार, 26 अक्टूबर 2024
# माता समान कोई और नहीं।।
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| श्री कृष्ण की मैया,यशोदा माता |
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✍️नीचे दिया जा रहा सूत्र, भ#गवान वेदव्यास जी द्वारा माता के महत्व का मार्मिक चित्रण है। यह स्तोत्र माता के समान किसी को नहीं मानता और उन्हें परमगुरु के रूप में प्रतिष्ठित करता है।👇
माता के समान कोई नहीं है, यहां तक कि:
- पिता से भी बढ़कर है माता।
- गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं।
- विष्णु के समान प्रभु नहीं।
- शिव के समान कोई पूज्य नहीं।
- एकादशी के समान कोई व्रत नहीं।
- अनशन से बढ़कर कोई तप नहीं।
- पत्नी के समान कोई मित्र नहीं।
- पुत्र के समान कोई प्रिय नहीं।
- बहन के समान कोई माननीय नहीं।
- जामाता के समान कोई दान का पात्र नहीं।
- कन्यादान के समान कोई दान नहीं।
माता ही धारित्री, जननी, दयार्द्रहृदया, शिवा, देवी, त्रिभुवनश्रेष्ठा, निर्दोषा, और सर्वदुःखहा है।🍁🍁
👉माता का स्थान.. सनातन वैदिक संस्कृति में...... शास्त्रों के अनुसार 👇 इस प्रकार कहा गया है,
🪷मात् देवो भव:पितृ देवो भव:🪷
🪷१. पितुरप्यधिका माता गर्भधारणपोषणात् ।
अतो हि त्रिषु लोकेषु नास्ति मातृसमो गुरुः॥🪷
गर्भ को धारण करने और पालनपोषण करने के कारण माता का स्थान पिता से भी बढकर है। इसलिए तीनों लोकों में माता के समान कोई गुरु नहीं अर्थात् माता परमगुरु है!
🪷२.नास्ति गङ्गासमं तीर्थं नास्ति विष्णुसमः प्रभुः।
नास्ति शम्भुसमः पूज्यो नास्ति मातृसमो गुरुः॥🪷
गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं, विष्णु के समान प्रभु नहीं और शिव के समान कोई पूज्य नहीं और माता के समान कोई गुरु नहीं।
🪷३.नास्ति चैकादशीतुल्यं व्रतं त्रैलोक्यविश्रुतम्।
तपो नाशनात् तुल्यं नास्ति मातृसमो गुरुः॥
एकादशी के समान त्रिलोक में प्रसिद्ध कोई व्रत नहीं, अनशन से बढकर कोई तप नहीं और माता के समान गुरु नहीं!
🪷४.नास्ति भार्यासमं मित्रं नास्ति पुत्रसमः प्रियः।
नास्ति भगिनीसमा मान्या नास्ति मातृसमो गुरुः॥
पत्नी के समान कोई मित्र नहीं, पुत्र के समान कोई प्रिय नहीं, बहन के समान कोई माननीय नहीं और माता के समान गुरु नही!
🪷५.न जामातृसमं पात्रं न दानं कन्यया समम्।
न भ्रातृसदृशो बन्धुः न च मातृसमो गुरुः ॥
.
जामाता (पुत्री का पति)के समान कोई दान का पात्र नहीं, कन्यादान के समान कोई दान नहीं, भाई के जैसा कोई बन्धु नहीं और माता जैसा गुरु नहीं!
🪷६.देशो गङ्गान्तिकः श्रेष्ठो दलेषु तुलसीदलम्।
वर्णेषु ब्राह्मणः श्रेष्ठो गुरुर्माता गुरुष्वपि ॥
गंगा के किनारे का प्रदेश अत्यन्त श्रेष्ठ होता है, पत्रों में तुलसीपत्र, वर्णों में ब्राह्मण और माता तो गुरुओं की भी गुरु है!
🪷७.पुरुषः पुत्ररूपेण भार्यामाश्रित्य जायते।
पूर्वभावाश्रया माता तेन सैव गुरुः परः ॥
पत्नी का आश्रय लेकर पुरुष ही पुत्र रूप में उत्पन्न होता है, इस दृष्टि से अपने पूर्वज पिता का भी आश्रय माता होती है और इसीलिए वह परमगुरु है!
🪷८.मातरं पितरं चोभौ दृष्ट्वा पुत्रस्तु धर्मवित्।
प्रणम्य मातरं पश्चात् प्रणमेत् पितरं गुरुम् ॥
धर्म को जानने वाला पुत्र माता पिता को साथ देखकर पहले माता को प्रणाम करे फिर पिता और गुरु को!
🪷९.माता धरित्री जननी दयार्द्रहृदया शिवा ।
देवी त्रिभुवनश्रेष्ठा निर्दोषा सर्वदुःखहा॥
माता, धरित्री , जननी , दयार्द्रहृदया, शिवा, देवी , त्रिभुवनश्रेष्ठा, निर्दोषा, सभी दुःखों का नाश करने वाली है!
🪷१०.आराधनीया परमा दया शान्तिः क्षमा धृतिः ।
स्वाहा स्वधा च गौरी च पद्मा च विजया जया ॥
आराधनीया, परमा, दया , शान्ति , क्षमा, धृति, स्वाहा , स्वधा, गौरी , पद्मा, विजया , जया,
🪷११.दुःखहन्त्रीति नामानि मातुरेवैकविंशतिम् ।
शृणुयाच्छ्रावयेन्मर्त्यः सर्वदुःखाद् विमुच्यते ॥
और दुःखहन्त्री -ये माता के इक्कीस नाम हैं। इन्हें सुनने सुनाने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है!
🪷१२.दुःखैर्महद्भिः दूनोऽपि दृष्ट्वा मातरमीश्वरीम्।
यमानन्दं लभेन्मर्त्यः स किं वाचोपपद्यते ॥
बड़े बड़े दुःखों से पीडित होने पर भी भगवती माता को देखकर मनुष्य जो आनन्द प्राप्त करता है उसे वाणी द्वारा नहीं कहा जा सकता!
🪷१३.इति ते कथितं विप्र मातृस्तोत्रं महागुणम्।
पराशरमुखात् पूर्वम् अश्रौषं मातृसंस्तवम्॥
हे ब्रह्मन् ! इस प्रकार मैंने तुमसे महान् गुण वाले मातृस्तोत्र को कहा , इसे मैंने अपने पिता पराशर के मुख से पहले सुना था!
🪷१४.सेवित्वा पितरौ कश्चित् व्याधः परमधर्मवित्।
लेभे सर्वज्ञतां या तु साध्यते न तपस्विभिः॥
अपने माता पिता की सेवा करके ही किसी परम धर्मज्ञ व्याध ने उस सर्वज्ञता को पा लिया था जो बडे बडे तपस्वी भी नहीं पाते!
🪷१५.तस्मात् सर्वप्रयत्नेन भक्तिः कार्या तु मातरि।
पितर्यपीति चोक्तं वै पित्रा शक्तिसुतेन मे ॥
इसलिए सब प्रयत्न करके माता और पिता की भक्ति करनी चाहिए, मेरे पिता शक्तिपुत्र पराशर जी ने भी मुझसे यही कहा था!
इसी लिए कहा गया है.......
🪷यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता🪷
नारियों का सम्मान करो जब तक नारियों का सम्मान नही करोगे तब तक जीवन में तुम्हें सफलता नही मिलेगी ।।
🪷यही नारी मां है, पत्नी है, बहन है, बेटी है ।
यही दुर्गा है, यही गंगा है, यही पुरुष की शक्ति प्रकृति है।(प्रेषित)🪷
🪷इस स्तोत्र में माता के इक्कीस नामों का उल्लेख है, जिन्हें सुनने सुनाने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है।🪷
👉यह स्तोत्र हमें माता के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की स्मरण कराता है और उनकी सेवा को सर्वोपरि बताता है।👇
👉वेदों में माता के सम्मान में अन्य श्लोक प्रमाण अनुसार इस प्रकार मिलते हैं:👇
वेदों और हिंदू शास्त्रों में माता के सम्मान के लिए कई श्लोक हैं। यहाँ कुछ प्रमाण हैं:
👉. यजुर्वेद (19.33) -
🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव"🪷
अर्थ: माता, पिता और गुरु को देवता के रूप में पूजा करो।
👉. मनुस्मृति (2.145) -
🪷"माता यस्य गृहे नास्ति द्वारे तस्य न विद्यते"🪷
अर्थ: जिसके घर में माता नहीं है, उसके घर का द्वार सूना है।
👉. महाभारत (अनुशासन पर्व 45.13) -
🪷"मातृ गुरुः पितृ गुरुः, यतः पिता तेन मातृतः"🪷
अर्थ: माता और पितृ दोनों ही गुरु हैं, लेकिन माता का स्थान पिता से भी ऊंचा है।
👉. भगवद्गीता (9.17) -
🪷"पितृ मातृ गुरुः स्वामी, विन्दति तद्विदः सुखम्"🪷
अर्थ: जो व्यक्ति पिता, माता और गुरु की सेवा करता है, वह सुख प्राप्त करता है।
👉. ऋग्वेद (10.85.42) -
🪷"मातृ भवति जननी, पितृ भवति गर्भधारी"🪷
अर्थ: माता जन्म देती है, पिता गर्भधारण का हेतु बनता है।
👉उपनिषदों में माता के सम्मान के लिए कई श्लोक हैं। यहाँ कुछ प्रमाणस्वरूप दिए जा रहे हैं:👇
👉. तैत्तिरीय उपनिषद् (1.9.1) -
🪷"मातृ भवति जननी, पितृ भवति गर्भधारी"🪷
अर्थ: माता जन्म देती है, पिता गर्भधारण का हेतु बनता है।
👉. छांदोग्य उपनिषद् (6.7.1) -
🪷"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता"🪷
अर्थ: जहाँ नारियों का सम्मान किया जाता है, वहाँ देवता प्रसन्न रहते हैं।
👉. बृहदारण्यक उपनिषद् (6.4.1) -
🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव"🪷
अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो।
👉. श्वेताश्वतर उपनिषद् (6.15) -
🪷"माता पिता गुरुः स्वामी, तेषां विद्या प्रदायकः"🪷
अर्थ: माता, पिता और गुरु ही विद्या के दाता हैं।
👉. मुंडक उपनिषद् (1.1.9) -
🪷"माता यस्य गृहे नास्ति, द्वारे तस्य न विद्यते"🪷
अर्थ: जिसके घर में माता नहीं है, उसके घर का द्वार सूना है।
उपरोक्त लिखे ये श्लोक माता के महत्व और सम्मान को दर्शाते हैं।
👉 पुराणों में माता के सम्मान में कुछ अन्य श्लोक प्रमाण अनुसार इस प्रकार मिलते हैं। पुराणों में माता के सम्मान के लिए कई श्लोक हैं। यहाँ कुछ प्रमाण हैं:
👉. गरुड़ पुराण (1.113.12) -
🪷"माता गुरुः पिता गुरुः, मातृदेवो भव पितृदेवो भव"🪷
अर्थ: माता और पिता दोनों ही गुरु हैं, उनकी पूजा करो।
👉. पद्म पुराण (4.52.14) -
🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव"🪷
अर्थ: माता, पिता और गुरु को देवता के रूप में पूजा करो।
👉. मार्कण्डेय पुराण (34.115) -
🪷"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता"🪷
अर्थ: जहाँ नारियों का सम्मान किया जाता है, वहाँ देवता प्रसन्न रहते हैं।
👉. विष्णु पुराण (3.9.22) -
🪷"माता पिता गुरुः स्वामी, तेषां विद्या प्रदायकः"🪷
अर्थ: माता, पिता और गुरु ही विद्या के दाता हैं।
👉. भागवत पुराण (5.1.37) -
🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, मातृवचस्तु पूजयेत"🪷
अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, और माता की वाणी का आदर करो।
👉. अग्नि पुराण (369.23) -
🪷"मातृवचस्तु पूजयेत, पितृवचस्तु पूजयेत"🪷
अर्थ: माता और पिता की वाणी का आदर करो।
👉पुराणों में माता के सम्मान के लिए और भी कई श्लोक हैं। यहाँ कुछ और प्रमाण हैं:👇
👉. ब्रह्म पुराण (13.16) -
🪷"माता गुरुः पिता गुरुः, मातृदेवो भव पितृदेवो भव"🪷
अर्थ: माता और पिता दोनों ही गुरु हैं, उनकी पूजा करो.
👉. लिंग पुराण (27.11) -
🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, तेषां विद्या प्रदायकः"🪷
अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, वे विद्या के दाता हैं.
👉. वराह पुराण (22.55) -
🪷"माता पिता गुरुः स्वामी, तेषां विद्या प्रदायकः"🪷
अर्थ: माता, पिता और गुरु ही विद्या के दाता हैं.
👉. कूर्म पुराण (17.12) -
🪷"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता"🪷
अर्थ: जहाँ नारियों का सम्मान किया जाता है, वहाँ देवता प्रसन्न रहते हैं.
👉. मत्स्य पुराण (53.32) -
🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, मातृवचस्तु पूजयेत"🪷
अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, और माता की वाणी का आदर करो.
👉. गरुड़ पुराण (1.113.15) -
🪷"माता गुरुः पिता गुरुः, तेषां विद्या प्रदायकः"🪷
अर्थ: माता और पिता दोनों ही गुरु हैं, वे विद्या के दाता हैं.
👉. शिव पुराण (6.5.33) -
🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, मातृवचस्तु पूजयेत"🪷
अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, और माता की वाणी का आदर करो.
उपरोक्त दिए गए श्लोक पुराणों में माता के महत्व और सम्मान को दर्शाते हैं।
दर्शन शास्त्रों में माता के सम्मान के लिए कई श्लोक हैं। यहाँ कुछ प्रमाण स्वरूप इस प्रकार से हैं:
👉. मनु स्मृति (2.145) -
🪷"माता यस्य गृहे नास्ति, द्वारे तस्य न विद्यते"🪷
अर्थ: जिसके घर में माता नहीं है, उसके घर का द्वार सूना है।
👉. याज्ञवल्क्य स्मृति (1.35) -
🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव"🪷
अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो।
👉. अपरार्क का न्यायमुक्तावली (श्लोक 144) -
🪷"माता गुरुः पिता गुरुः, मातृदेवो भव पितृदेवो भव"🪷
अर्थ: माता और पिता दोनों ही गुरु हैं, उनकी पूजा करो।
👉. वासुदेव न्यायरत्नमाला (श्लोक 21) -
🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, तेषां विद्या प्रदायकः"🪷
अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, वे विद्या के दाता हैं।
👉. भारती तीर्थ का वेदांतसार (श्लोक 12) -
🪷"माता पिता गुरुः स्वामी, तेषां विद्या प्रदायकः"🪷
अर्थ: माता, पिता और गुरु ही विद्या के दाता हैं।
👉. अन्नम्बट्ट की तारकम (श्लोक 88) -
🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, मातृवचस्तु पूजयेत"🪷
अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, और माता की वाणी का आदर करो।
उपरोक्त दिए गए ये श्लोक दर्शन शास्त्रों में माता के महत्व और सम्मान को दर्शाते हैं। इसी प्रकार षडदर्शन में माता के सम्मान के लिए कई श्लोक हैं। यहाँ कुछ प्रमाण हैं :
👉. न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य 1.1.1) -
🪷"माता गुरुः पिता गुरुः, मातृदेवो भव पितृदेवो भव।"🪷
अर्थ: माता और पिता दोनों ही गुरु हैं, उनकी पूजा करो।
👉. वैशेषिक दर्शन (वैशेषिक सूत्र 1.1.12) -
🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, तेषां विद्या प्रदायकः।"🪷
अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, वे विद्या के दाता हैं।
👉. सांख्य दर्शन (सांख्य करिका 23) -
🪷"माता पिता गुरुः स्वामी, तेषां विद्या प्रदायकः।"🪷
अर्थ: माता, पिता और गुरु ही विद्या के दाता हैं।
👉. योग दर्शन (योग सूत्र 1.30) -
🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, मातृवचस्तु पूजयेत।"🪷
अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, और माता की वाणी का आदर करो।
👉. मीमांसा दर्शन (मीमांसा सूत्र 1.1.5) -
🪷"माता गुरुः पिता गुरुः, मातृदेवो भव पितृदेवो भव।"🪷
अर्थ: माता और पिता दोनों ही गुरु हैं, उनकी पूजा करो।
👉. वेदांत दर्शन (ब्रह्म सूत्र 1.1.1) -
🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, तेषां विद्या प्रदायकः।"🪷
अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, वे विद्या के दाता हैं।
ये श्लोक षडदर्शन में माता के महत्व और सम्मान को दर्शाते हैं।
👉तिब्बती साहित्य में माता का स्थान:👇
तिब्बती साहित्य में माता के सम्मान में कई महत्वपूर्ण सूत्र और ग्रन्थ हैं। यहाँ कुछ प्रमुख सूत्र दिए गए हैं:
🪷. तिब्बती बौद्ध धर्म में "माता-पिता की सेवा करना" महान पुण्य का कार्य माना जाता है। इस संदर्भ में, तिब्बती बौद्ध ग्रन्थ 👉"शंतिदेव का बोधिचर्यावतार" में माता-पिता की सेवा की महत्ता पर प्रकाश डाला गया है।
🪷. तिब्बती साहित्य में "मातृ-श्रद्धा" को बहुत महत्व दिया गया है। तिब्बती लोग अपनी माता को 👉"स्क्येमा" यानी "मातृ-देवी" कहते हैं।
🪷. तिब्बती बौद्ध धर्म में माता की भूमिका को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। तिब्बती बौद्ध ग्रन्थ "लामा रिनपोचे की शिक्षाएँ" में माता-पिता के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की भावना को विकसित करने पर बल दिया गया है।
इन सूत्रों और ग्रन्थों से तिब्बती साहित्य में माता के सम्मान की महत्ता स्पष्ट होती है।
👉दक्षिण भारतीय साहित्य में माता का स्थान :👇
दक्षिण भारत के साहित्य में माता का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। यहाँ कुछ उदाहरण हैं:
🪷 तमिल साहित्य में माता को "ताय" या "अम्मा" कहकर संबोधित किया जाता है, जो माता के प्रति सम्मान और प्रेम का प्रतीक है।
🪷 तेलुगु साहित्य में माता को "अम्मा" या "नायणम्मा" कहा जाता है, जो माता की देखभाल और स्नेह को दर्शाता है।
🪷 मलयालम साहित्य में माता को "अम्मा" या "मुट्टी" कहा जाता है, जो माता के प्रति प्रेम और आदर का प्रतीक है।
🪷 कन्नड़ साहित्य में माता को "अम्मा" या "तायी" कहा जाता है, जो माता की महत्ता और सम्मान को दर्शाता है।
इन उदाहरणों से पता चलता है कि दक्षिण भारत के साहित्य में माता का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है और उन्हें समाज में उच्च स्थान दिया जाता है।
👉निष्कर्ष 👇
माता के सम्मान में दिए गए श्लोक का निष्कर्ष यह है:👇
🪷"माता गृहं, माता जन्मभूमि, मातृदेवो भव।"🪷
इसका अर्थ है:👇
"माता ही घर है, माता ही जन्मभूमि है, और माता ही देवता है।"
यह श्लोक माता की महत्ता और सम्मान को दर्शाता है, और यह बताता है कि माता का स्थान सबसे ऊंचा है। अतः हम कह सकते हैं कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता में माता को जो सर्वोच्च स्थान मिला है वह कहीं भी नहीं देखने को मिलता है। पाश्चात्य और म्लेच्छ साहित्य की मिलावट से या देखने, पढ़ने और सुनने से अनेकों लोगों को भ्रम हो रहा है, कि माता कोई वस्तु है।
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गुरुवार, 24 अक्टूबर 2024
मधुमक्खी का विष एक वैकल्पिक चिकित्सकीय उपचार
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✍️मधुमक्खी के दंश से चिकित्सा की प्रक्रिया को एपिथेरेपी या बी वेनोम थेरेपी कहा जाता है। इसमें मधुमक्खी के दंश से निकलने वाले विष का उपयोग चिकित्सा में किया जाता है।👇
👉एपिथेरेपी के समर्थकों का कहना है कि यह चिकित्सा कई रोगों के उपचार में सहायता कर सकती है, जिनमें सम्मिलित हैं:
👉- आर्थराइटिस या सभी सन्धि रोग
👉- गठिया या त्रिदोषज सन्धि रोग
👉- मल्टीपल स्क्लेरोसिस
👉- पार्किंसंस रोग
👉- कैंसर या करकट रोग
👉लेकिन, इस चिकित्सा की सत्यता और प्रभावशीलता के बारे में वैज्ञानिक समुदाय में बहुत विवाद है। कई अध्ययनों में इसकी प्रभावशीलता के बारे में कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिले हैं।
👉कुछ गम्भीर कारक भी हैं:👇
- मधुमक्खी के दंश से एलर्जी की प्रतिक्रिया हो सकती है।
- इससे एनाफिलेक्सिस जैसी गंभीर प्रतिक्रिया हो सकती है।
- इसके लिए कोई मानकीकृत प्रक्रिया नहीं है।
👉कुछ देश जहां एपिथेरेपी या बी वेनोम थेरेपी होती है:+👇
👉एपिथेरेपी या बी वेनोम थेरेपी विभिन्न देशों में प्रचलित है, लेकिन इसकी प्रभावशीलता और सुरक्षा के बारे में विवाद है। यहाँ कुछ देश हैं जहाँ यह चिकित्सा प्रचलित है:👇
1. चीन
2. जापान
3. कोरिया
4. रूस
5. यूक्रेन
6. बुल्गारिया
7. रोमानिया
8. ग्रीस
9. तुर्की
10. मिस्र
👉इसके अतिरिक्त, कुछ यूरोपीय और अमेरिकी देशों में भी यह चिकित्सा उपलब्ध है, लेकिन इसके लिए विशेष अनुमति और चिकित्सकीय पंजीकरण की आवश्यकता होती है।
👉लेकिन, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि एपिथेरेपी को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और कई अन्य स्वास्थ्य संगठनों द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है। इसके अतिरिक्त, इसकी प्रभावशीलता और सुरक्षा के बारे में वैज्ञानिक समुदाय में कुछ मतभेद भी है।
👉भारत देश में कहां उपलब्ध है:+👇
भारत में एपिथेरेपी या बी वेनोम थेरेपी की सेवाएं कई नगरों और संस्थानों में उपलब्ध हैं। यहाँ कुछ प्रमुख स्थान हैं जहाँ यह चिकित्सा की जाती है:
👉1. दिल्ली:
- ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (AIIMS)
- सफदरजंग अस्पताल
- राम मनोहर लोहिया अस्पताल
👉1. मुंबई:
- टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल
- ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल
- लीलावती हॉस्पिटल
👉2. बैंगलोर:
- निमहंस (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज)
- स्टैनले मेडिकल कॉलेज
- मैनिपाल हॉस्पिटल
👉3. हैदराबाद:
- निजाम्स इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज
- ओस्मानिया मेडिकल कॉलेज
- किम्स हॉस्पिटल
👉4. चेन्नई:
- मद्रास मेडिकल कॉलेज
- स्टैनले मेडिकल कॉलेज
- अपोलो हॉस्पिटल
👉5. कोलकाता:
- स्कूल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन
- आरजी कर मेडिकल कॉलेज
- फोर्टिस हॉस्पिटल
👉इसके अतिरिक्त , कई निजी क्लिनिक और संस्थान भी एपिथेरेपी की सेवाएं प्रदान करते हैं। लेकिन, यह महत्वपूर्ण है कि आप किसी भी चिकित्सा सेवा का चयन करने से पहले उसकी प्रमाणिकता और सुरक्षा की जांच अवश्य करें।
👉मध्य प्रदेश में कहां उपलब्ध है:+
👉मध्य प्रदेश में एपिथेरेपी या बी वेनोम थेरेपी की सेवाएं कई नगरों और संस्थानों में उपलब्ध हैं। यहाँ कुछ प्रमुख स्थान और व्यक्ति हैं जो इस चिकित्सा को प्रदान करते हैं:👇
👉1. भोपाल:
- डॉ. राजेश शर्मा, मध्य प्रदेश आयुर्वेद विश्वविद्यालय
- डॉ. विनोद कुमार शर्मा, भोपाल होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज
- भोपाल एपिथेरेपी सेंटर, अरेरा कॉलोनी
👉2. इंदौर:
- डॉ. दिलीप मिश्रा, श्री औदिच्य आयुर्वेद कॉलेज
- डॉ. राकेश शर्मा, इंदौर होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज
- इंदौर एपिथेरेपी सेंटर, विजय नगर
👉3. ग्वालियर:
- डॉ. रामबाबू सिंह, ग्वालियर आयुर्वेद विश्वविद्यालय
- डॉ. विक्रम सिंह, ग्वालियर होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज
- ग्वालियर एपिथेरेपी सेंटर, महाराज बाड़ा
👉4. जबलपुर:
- डॉ. अरविंद मिश्रा, जबलपुर आयुर्वेद विश्वविद्यालय
- डॉ. राहुल शर्मा, जबलपुर होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज
- जबलपुर एपिथेरेपी सेंटर, रांझी
👉किसी भी चिकित्सा सेवा का चयन करने से पहले उसकी प्रमाणिकता और सुरक्षा की जांच करें।
👉मधुमक्खी के विष में कई रसायन पाए गए हैं:+👇
👉मधुमक्खी के विष में कई रसायन पाए जाते हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं:👇
👉1. मेलिटिन (Melittin): यह मधुमक्खी के विष का मुख्य घटक है, जो तीव्र शूल और शोथ या स्वेलिंग को कम करने में सहाय करता है।
👉2. फॉस्फोलिपेज ए2 (Phospholipase A2): यह रसायन शोथ और शूल को कम करने में सहायता करता है।
👉3. हाइपरनेटिन (Hypermnetin): यह रसायन शोथ और शूल को कम करने में सहायता करता है।
👉4. एपिमिन (Epimedin): यह रसायन प्रतिरक्षा प्रणाली को सशक्त करने में सक्षम है।
👉5. मेलिट्टिन-रिलेटेड पेप्टाइड (Melittin-Related Peptide): यह रसायन शूल और शोथ को कम करने में सहायक है।
👉6. एडोलैपिन (Adolapin): यह रसायन शोथ और तीव्र शूल को कम करने में सहायता करता है।
👉7. टेरापिन (Terpine): यह रसायन शोथ और तीव्र शूल को कम करने में सक्षम है।
👉8. बी कोलेस्टेरोल (B-Cholesterol): यह रसायन प्रतिरक्षा प्रणाली को सशक्त करता है।
👉11. ल्यूकाइन-रिच रिपीट (Leucine-Rich Repeat): यह रसायन प्रतिरक्षा प्रणाली को सशक्त करने में सहायता करता है।
👉12. डिफेंसिन (Defensin): यह रसायन भी प्रतिरक्षा प्रणाली को सशक्त करता है।
👉इन रसायनों के अतिरिक्त , मधुमक्खी के विष में कई अन्य रसायन भी पाए जाते हैं, जो विभिन्न चिकित्सीय गुणों के लिए जाने जाते हैं।
👉मनोज पटेल जी के अनुसार, एपीज मेलीफेरा नाम की मधुमक्खी के डंक में 28 प्रकार के तत्व पाए जाते हैं। ये तत्व निम्नलिखित हैं:👇
1. मेलिटिन
2. फॉस्फोलिपेज ए2
3. हाइपरनेटिन
4. एपिमिन
5. मेलिट्टिन-रिलेटेड पेप्टाइड
6. एडोलैपिन
7. टेरापिन
8. बी कोलेस्टेरोल
9. ल्यूकाइन-रिच रिपीट
10. डिफेंसिन
11. हिस्टामाइन
12. सेरोटोनिन
13. डोपामाइन
14. नोरएपिनेफ्रिन
15. एक्सोसिटोटॉक्सिन
16. इनहिबिटर साइटोकिन्स
17. केमोकाइन्स
18. प्रोटियेज़ इनहिबिटर
19. फॉस्फोडिएस्टरेज़ इनहिबिटर
20. लिपिड पेरोक्साइडेज़ इनहिबिटर
21. कार्बोक्सीपेप्टिडेज़
22. एंजियोटेंसिन-कॉनवर्टिंग एंजाइम (एसई)
23. कोलेस्टेरॉल एस्टरेज़
24. फॉस्फेटेज़
25. प्रोटीनेज़
26. ग्लाइकोप्रोटीन
27. लिपोप्रोटीन
28. पॉलीसैकाराइड
👉इन तत्वों में से कुछ प्रमुख तत्व हैं:👇
👉- मेलिटिन:
शूल और शोथ को कम करने में सहायता करता है।
👉- फॉस्फोलिपेज ए2:
शूल और शोथ को कम करने में सहायक है।
👉- हाइपरनेटिन:
शूल और शोथ को कम करता है।
👉- एपिमिन:
प्रतिरक्षा प्रणाली को सशक्त करने करता है।
👉इन तत्वों के कारण एपेथेरेपी विभिन्न चिकित्सीय उपयोगों में सहायता कर सकती है, जैसे कि:👇
👉- शूल और शोथ को कम करना।
👉- प्रतिरक्षा प्रणाली को सशक्त करना।
👉- कैंसर के उपचार में सहायता करना।
👉- आर्थराइटिस और गठिया के उपचार में सहायता करना।
👉- त्वचा के रोगों के उपचार में सहायता करना।
👉यदि मधुमक्खी के दंश से प्रतिक्रियाएं या एलर्जी होती है, तो इसके लक्षण और उपचार इस प्रकार हैं:👇
👉*लक्षण:*👇
1. त्वचा पर लालिमा और शोथ।
2. शूल और दाह।
3. श्वास लेने में असहजता।
4. हृदय की धड़कन की गति बढ़ना।
5. ज्वर आना।
6. मुंह और गले में शोथ।
7. एनाफिलेक्सिस (गंभीर एलर्जी की प्रतिक्रिया)
👉*उपचार:*👇
👉1. *एपिनेफ्रिन (एड्रेनालाईन)*:
एनाफिलेक्सिस के लक्षणों को कम करने के लिए एपिनेफ्रिन का इंजेक्शन दिया जाता है।
👉2. *एंटीहिस्टामाइन*:
एलर्जी की प्रतिक्रिया को कम करने के लिए एंटीहिस्टामाइन औषधि दी जाती हैं।
👉3. *स्टेरॉइड्स*:
शोथ और दाह को कम करने के लिए स्टेरॉइड्स औषधियां दी जाती हैं।
👉4. *ओक्सीजन थेरेपी*:
श्वास लेने में परेशानी के लक्षणों को कम करने के लिए ऑक्सीजन थेरेपी दी जाती है।
👉5. *हाइड्रेशन*:
शरीर में पानी की कमी को पूरा करने के लिए हाइड्रेशन थेरेपी दी जाती है।
👉6. *विश्राम*:
रोगी को वातानुकूलित कक्ष में विश्राम करने का परामर्श दिया जाता है।
👉*गंभीर अवस्था में:*👇
👉1. *इमरजेंसी वार्ड में प्रवेशित करें*:
एनाफिलेक्सिस के गंभीर लक्षणों वाले रोगी को इमरजेंसी वार्ड में भर्ती किया जाता है।
👉2. *वेंटिलेटर सपोर्ट*:
श्वास लेने में असहजता के लक्षणों वाले रोगी को वेंटिलेटर सपोर्ट दिया जाता है।
👉3. *कार्डियक मॉनिटरिंग*:
हृदय की धड़कन की हर समय, जब तक वह प्रवेशित है, कार्डियक मॉनिटरिंग की जाती है।
👉यदि आपको मधुमक्खी के दंश से एलर्जी होती है, तो तुरंत चिकित्सक से संपर्क करें और आवश्यक उपचार लेंने में विलम्ब न करें।
👉कुछ अनुसंधान के प्रमाण:+👇
मधुमक्खी के विष और एपिथेरेपी के सम्बंध में कई अनुसंधान किए गए हैं। यहाँ कुछ प्रमाण दिए गए हैं:
👉1. *नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इनफॉर्मेशन (NCBI)*: मधुमक्खी के विष में पाए जाने वाले रसायनों के चिकित्सीय उपयोगों पर कई अध्ययन प्रकाशित किए गए हैं।
👉2. *विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO)*:
मधुमक्खी के विष के चिकित्सीय उपयोगों पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की गई है।
👉3. *अमेरिकन एकेडमी ऑफ एलर्जी अस्थमा एंड इम्यूनोलॉजी (AAAAI)*:
मधुमक्खी के विष से एलर्जी के लक्षणों और उपचार पर एक अध्ययन प्रकाशित किया गया है।
👉4. *यूरोपियन एकेडमी ऑफ एलर्जी एंड क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी (EAACI)*:
मधुमक्खी के विष से एलर्जी के लक्षणों और उपचार पर एक अध्ययन प्रकाशित किया गया है।
👉5. *जॉर्नल ऑफ एपिडेमियोलॉजी एंड कम्युनिटी हेल्थ*:
मधुमक्खी के विष के चिकित्सीय उपयोगों पर एक अध्ययन प्रकाशित किया गया है।
👉6. *जर्नल ऑफ टॉक्सिकोलॉजी*:
मधुमक्खी के विष में पाए जाने वाले रसायनों के चिकित्सीय उपयोगों पर कई अध्ययन प्रकाशित किए गए हैं।
👉7. *पबमेड*:
मधुमक्खी के विष और एपिथेरेपी पर कई अध्ययन प्रकाशित किए गए हैं।
इन संगठनों और पत्रिकाओं में प्रकाशित अध्ययनों से पता चलता है कि मधुमक्खी के विष और एपिथेरेपी के सम्बंध में अनुसंधान चल रहा है और इसके चिकित्सीय उपयोगों की संभावनाएं हैं।
👉इसका विदेशों में प्रथम बार उल्लेख:+🪷
एपेथेरेपी का पहला उल्लेख ऑस्ट्रिया के डॉक्टर 👉फिलिप टेरेक के 1888 में लिखे गए लेख में मिलता है, जिसमें उन्होंने मधुमक्खी के डंक से गठिया के उपचार के सम्बंध में लिखा था।
हंगरी के डॉक्टर 👉बोडोग एफ ने 1935 में पहली बार मधुमक्खी विष चिकित्सा शब्द का उपयोग किया था, जिसे बी वेनम थेरेपी के नाम से जाना जाता है।
👉👉आपको बता दूं कि,🙏
एपेथेरेपी का पहला उल्लेख ऑस्ट्रिया के डॉक्टर 👉फिलिप टेरेक के 1888 में लिखे गए लेख में मिलता है, जिसमें उन्होंने मधुमक्खी के डंक से गठिया के उपचार के सम्बंध में लिखा था।
यह लेख एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है एपेथेरेपी के इतिहास में, और यह दर्शाता है कि मधुमक्खी के डंक के चिकित्सीय उपयोग के सम्बंध में ज्ञान कितना प्राचीन है।
डॉक्टर फिलिप टेरेक के लेख के उपरान्त, कई अन्य वैज्ञानिकों और चिकित्सकों ने एपेथेरेपी पर शोध किया और इसके उपयोग को बढ़ावा दिया।
👉एपेथेरेपी के इतिहास में कुछ महत्वपूर्ण तिथियाँ:👇
- 1888: डॉक्टर👉 फिलिप टेरेक ने मधुमक्खी के डंक से गठिया के उपचार के सम्बंध में लिखा।
- 1935: डॉक्टर 👉बोडोग एफ ने मधुमक्खी विष चिकित्सा शब्द का उपयोग किया।
- 1950s-60s: एपेथेरेपी का उपयोग यूरोप में बढ़ने लगा।
- 1970s-80s: एपेथेरेपी का उपयोग अमेरिका में भी बढ़ने लगा।
- 1990s-वर्तमान: एपेथेरेपी के बारे में वैज्ञानिक शोध चल रहा है।
👉एपेथेरेपी को अल्टरनेटिव थैरेपी के रूप में प्रयोग किया जाता है, और इसकी प्रभावशीलता और सुरक्षा के सम्बंध में अभी भी अध्ययन प्रगति में हैं।
👉जर्मनी में एपेथेरेपी का प्रचार प्रसार बड़े स्तर पर है, और कई लोग इसका उपयोग विभिन्न रोगों के उपचार के लिए करते हैं।
👉एपेथेरेपी के सम्बंध में कुछ रोचक तथ्य:👇
👉- 1888 में डॉक्टर फिलिप टेरेक ने मधुमक्खी के डंक से गठिया के उपचार के सम्बंध में लिखा।
👉- 1935 में डॉक्टर बोडोग एफ ने मधुमक्खी विष चिकित्सा शब्द का उपयोग किया।
👉- जर्मनी में एपेथेरेपी का चलन बड़े स्तर पर है।
👉- एपेथेरेपी को अल्टरनेटिव थैरेपी के रूप में प्रयोग किया जाता है।
👉- इसकी प्रभावशीलता और सुरक्षा के बारे में अभी भी अध्ययन किया जा रहा है।
👉निष्कर्ष 👇
कि, यह वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति से भी हम पीड़ित लोगों का उपचार कर सकते हैं। लेकिन सावधानी और सुरक्षा के साथ, जिससे सामान्य जन भ्रमित न हों।
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मंगलवार, 22 अक्टूबर 2024
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# " प्रेम और परिवार के प्रति अपना दायित्व"
नीचे दी जा रही एक घटना जैसी, एक बहुत ही भावपूर्ण और प्रेरक कहानी है जो परिवार के प्रति सकारात्मक, प्रेम और समर्थन की महत्ता को दर्शाती है।
इस कहानी में मोहन की दीदी और पापा ने अपने प्रेम और समर्थन से मोहन के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत किया है, जो उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण शिक्षा सिद्ध हुई।
कहानी के माध्यम से निम्नलिखित संदेश दिए गए हैं:
1. परिवार के प्रति स्वयं का दायित्व और स्नेह का महत्व।
2. अपने वचनों को पूरा करने की महत्ता।
3. समर्थन और सहयोग की भावना।
4. परिवार के सदस्यों के बीच आपसी समझ और संवेदना।
✍️👉"बेटा! थोड़ा भोजन खाकर जा ..!! दो दिन से तूने कुछ भी खाया नहीं है।" ये उस विवश माता के शब्द है जो अपने बेटे को समझाने के लिये, कह रही है।
👉"देख मां ! मैंने मेरी बारहवीं बोर्ड की परीक्षा के बाद अवकाश में सेकेंड हैंड बाइक मांगी थी, और पापा ने देने को सुनिश्चित किया था। आज मेरे इस सत्र के अन्तिम परीक्षा प्रश्न पत्र के उपरान्त दीदी को कह देना कि जैसे ही मैं परीक्षा खंड से बाहर आऊंगा तब पैसा लेकर बाहर खडी रहे। मेरे मित्र की पुरानी बाइक आज ही मुझे लेनी है और हाँ, यदि दीदी वहाँ पैसे लेकर नहीं आयी तो मैं घर वापस नहीं आऊंगा।"
एक निर्धन घर में बेटे मोहन की हठ और माता की विवशता आमने सामने टकरा रही थी।
"बेटा! तेरे पिता तुझे मोटरसाइकिल लेकर देने ही वाले थे, लेकिन पिछले महीने हुई दुर्घटना के कारण,,,,,.
माता कुछ बोले उसके पहले मोहन बोला "मैं कुछ नहीं जानता .. मुझे तो मोटरसाइकिल चाहिये ही चाहिये ..!!"
ऐसा बोलकर मोहन अपनी माता को निर्धनता एवं विवशता की मझधार में छोड़ कर घर से बाहर निकल गया।
12वीं बोर्ड की परीक्षा के बाद भागवत 'सर' एक अनोखी परीक्षा का आयोजन करते थे।
लेकिन भागवत सर का विषय गणित था, किन्तु विद्यार्थियों को जीवन का भी गणित भी समझाते थे और उनके सभी विद्यार्थी विविधता से भरी ये परीक्षा अवश्य देने जाते थे।
इस वर्ष परीक्षा का विषय था *मेरी पारिवारिक भूमिका*
मोहन परीक्षा खंड में आकर बैठ गया।उसने मन में गांठ बांध ली थी कि यदि मुझे मोटरसाइकिल लेकर नहीं देंगे तो मैं घर नहीं आऊंगा।
भागवत सर ने सभी छात्रों को परीक्षा प्रश्न पत्र वितरित हो गया। उस प्रश्नपत्र में 10 प्रश्न थे। उत्तर देने के लिये एक घंटे का समय दिया गया था।
मोहन ने पहला प्रश्न पढा और उत्तर लिखना प्रारम्भ किया।
*प्रश्न संख्या १ :- आपके घर में आपके पिताजी, माताजी, बहन, भाई और आप कितने घंटे काम करते हो? सविस्तार बताइये?*
मोहन ने शीघ्र से उत्तर लिखना प्रारम्भ कर दिया।
उत्तर:
पिताजी प्रातः छह बजे अल्पाहार के साथ अपनी ओटोरिक्शा लेकर निकल जाते हैं और रात को नौ बजे वापस आते हैं। कभी कभार वर्दी में जाना पड़ता है। ऐसे में लगभग पंद्रह घंटे।
माता जी प्रातः चार बजे उठकर पिताजी का अल्पाहार बनाकर, उपरान्त में घर का सारा काम करती हैं। दोपहर को सिलाई का काम करती है और सभी लोगों के सो जाने के बाद ही वह सोती हैं। लगभग प्रतिदिन के सोलह घंटे।
दीदी प्रातः महाविद्यालय जाती हैं, शाम को 4 से 8 अंशकालिक वैतनिक सेवा करती हैं। रात्रि को माता जी को घरेलू काम में सहायता करती हैं। लगभग बारह से तेरह घंटे।
मैं, प्रातः छह बजे उठता हूँ, और दोपहर विद्यालय से आकर भोजन करके सो जाता हूँ। सायं काल को अपने मित्रों के साथ टहलता हूँ। रात्रि को ग्यारह बजे तक पढता हूँ। लगभग दस घंटे।
(इससे मोहन को मन ही मन लगा, कि उनका कामकाज का औसत सबसे कम है।)
पहले प्रश्न के उत्तर के उपरान्त मोहन ने दूसरा प्रश्न पढा ..
*प्रश्न संख्या २ :- आपके घर की मासिक कुल आय कितनी है?*
उत्तर: पिता की आय लगभग दस हजार हैं। माता जी एवं दीदी मिलकर पांंच हजार जोडते हैं। कुल आय पंद्रह हजार।
*प्रश्न संख्या ३ :- मोबाइल रिचार्ज प्लान, आपकी मन अनुकूल दूरदर्शन पर आ रहे तीन धारावाहिक के नाम, नगर के एक सिनेमा हॉल का पता और अभी वहां चल रहे चलचित्र का नाम बताइये?*
सभी प्रश्नों के उत्तर सरल होने से तुरन्त दो मिनट में लिख दिये ..
*प्रश्न संख्या ४ :- एक किलो आलू और भिन्डी के अभी के मूल्य क्या है? एक किलो गेहूं, चावल और तेल का मूल्य बताइये? जहाँ पर घर का गेहूं पिसाने जाते हो उस आटा चक्की का पता दीजिये।*
मोहनभाई को इस प्रश्न का उत्तर नहीं आया। उसे समझ में आया कि हमारी दैनिक आवश्यक वस्तुओं के सम्बंध में तो उसे लेशमात्र भी ज्ञान नहीं है। माता जी जब भी कोई काम बताती थी तो मैं मना कर देता था। आज उसे ज्ञान हुआ कि अनावश्यक वस्तुएं ,मोबाइल रिचार्ज, चलचित्रों का ज्ञान इतना उपयोगी नहीं है। अपने घर के काम का उत्तरदायित्व लेने से या तो सहयोग कर साथ देने से हम भागते रहे हैं।
*प्रश्न संख्या ५ :- आप अपने घर में भोजन को लेकर कभी विवाद या क्रोध करते हो?*
उत्तर : हां, मुझे आलू के अतिरिक्त अन्य कोई भी सब्जी मन अनुकूल नहीं है। यदि माता जी और कोई सब्जी बनायें तो, मेरे घर में अनावश्यक विवाद होता है। कभी मैं बिना भोजन खायें ही उठ खडा हो जाता हूँ।
(इतना लिखते ही मोहन को स्मरण में आया कि आलू की सब्जी से माता जी के उदर में वायु अधिक बन जाने की पीड़ा होती हैं। उदर में शूल होता है। अपनी सब्जी में एक बडी चम्मच वो अजवाइन डालकर खाती हैं। एक दिन मैंने त्रुटि से माता जी की सब्जी खा ली, और मैंने उसे आस्वाद होने से थूक दिया था और पूछा कि माता जी तुम ऐसा क्यों खाती हो? तब दीदी ने बताया था कि हमारे घर की स्थिति ऐसी अच्छी नहीं है कि हम दो सब्जी बनाकर खायें। तुम्हारी हठी प्रवृत्ति के कारण माता विवश क्या करें?) मोहन ने अपनी स्मृतियों से बाहर आकर अगले प्रश्न को पढा।
*प्रश्न संख्या ६ :- आपने अपने घर में की हुई अन्तिम हठ के बारे में लिखिये।*
मोहन ने उत्तर लिखना प्रारम्भ किया। मेरी बोर्ड की परीक्षा पूर्ण होने के उपरान्त दूसरे ही दिन मोटरसाइकिल के लिये हठ की थी। पिताजी ने कोई उत्तर नहीं दिया था, माता जी ने समझाया कि घर में पैसे नहीं है। लेकिन मैं नहीं माना! मैंने दो दिन से घर में भोजन करना भी छोड़ दिया है। जबतक आप मुझे मोटरसाइकिल लाकर नहीं दोगे मैं भोजन नहीं खाऊंगा और आज तो मैं वापस घर नहीं जाऊंगा कहके निकला हूं । अपनी हठ का प्रामाणिकता से मोहन ने उत्तर लिखा।
*प्रश्न संख्या ७ :- आपको अपने घर से मिल रही जेब खर्ची का आप क्या करते हो? आपके भाई-बहन कैसे व्यय करते हैं?*
उत्तर: हर महीने पिताजी , मुझे सौ रुपये देते हैं। उसमें से मैं, मनोनुकूल सुगन्ध, इत्र,चश्में आदि जैसी वस्तुएं लेता हूं, या अपने मित्रों की छोटे छोटे आयोजन में व्यय करता हूँ।
मेरी दीदी को भी पिताजी सौ रुपये देते हैं। वो स्वयं धनार्जन करती हैं और वेतन के पैसे से माता जी को आर्थिक सहायता करती हैं। हां, उसको दिये गये जेब खर्च को वो गल्ले में डालकर बचत करती हैं। उसे कोई अपने व्यक्तिगत आनन्द में धन अपव्यय करने की इच्छा नहीं है, क्योंकि वो कृपण भी हैं।
*प्रश्न संख्या ८ :- आप अपनी स्वयं की पारिवारिक भूमिका को कैसे समझते हो?*
प्रश्न अटपटा और जटिल होने के उपरान्त भी मोहन ने उत्तर लिखा।
परिवार के साथ जुड़े रहना, एकदूसरे के प्रति समझदारी से व्यवहार करना एवं सहायरूप होना चाहिये और ऐसे ही अपने उत्तरदायित्व को निभाना चाहिये।
यह लिखते लिखते ही मेरी अंतरात्मासे पुकार आयी कि अरे मोहन! तुम स्वयं अपनी पारिवारिक भूमिका को योग्य रूप से निभा रहे हो? और अंतरात्मा से उत्तर आया कि ना बिल्कुल नहीं ..!!
*प्रश्न संख्या ९ :- आपके परिणाम से आपके माता-पिता प्रसन्न हैं? क्या वह अच्छे परिणाम के लिये आपसे हठ करते हैं? आपको डांटते रहते हैं?*
(इस प्रश्न का उत्तर लिखने से पहले, मोहन की आंखें भर आयी। अब वह परिवार के प्रति अपनी भूमिका बराबर समझ चुका था।)
वैसे तो मैं कभी भी मेरे माता-पिता को आजतक संतोषजनक परिणाम नहीं दे पाया हूँ। लेकिन इसके लिये उन्होंने कभी भी हठ नहीं की है। मैंने बहुत बार अच्छे परिणाम के वचन तोडे हैं। इसके उपरान्त भी हल्की सी डांट के बाद वही प्रेम और वात्सल्य बना रहता था।
*प्रश्न संख्या १० :- पारिवारिक जीवन में प्रभावी भूमिका निभाने के लिये इस अवकाश में आप कैसे परिवार के लिए सहायक रूप होंगें?*
उत्तर देने में मोहन की लेखनी चले इससे पहले उसकी आंखों से आंसू बहने लगे, और उत्तर लिखने से पहले ही लेखनी रुक गई .. बेंच पर मुंख रखकर रोने लगा और पुनः से लेखनी उठायी तब भी वो कुछ भी न लिख पाया। अनुत्तर दसवां प्रश्न छोड़कर उत्तर पुस्तिका कक्षा अध्यापक को दे दिया।
विद्यालय के द्वार पर दीदी को देखकर उसकी ओर दौड़ पडा।"भैया! ये ले आठ हजार रुपये, माता जी ने कहा है कि मोटरसाइकिल लेकर ही घर आना।"
दीदी ने मोहन के सामने पैसे धर दिये।
" दीदी कहाँ से लायी ये पैसे?" मोहन ने पूछा।
दीदी ने बताया "मैंने मेरी कार्यालय से एक महीने का वेतन अग्रिम मांग लिया। माता जी ने भी जहां काम करती हैं वहीं से उधार ले लिया, और शेष मेरी व्यक्तिगत व्यय की बचत से निकाल लिये। ऐसा करके तुम्हारी मोटरसाइकिल के पैसे की व्यवस्था हो गई हैं।
मोहन की दृष्टि पैसे पर स्थिर हो गई।
दीदी पुनः बोली " भाई, तुम माता जी को बोलकर निकले थे कि पैसे नहीं दोगी तो, मैं घर पर नहीं आऊंगा! अब तुम्हें समझना चाहिये कि तुम्हारा भी घर के प्रति कुछ दायित्व है। मुझे भी बहुत से आनन्द लेने की आवश्यकता होती हैं, लेकिन अपने आनन्द को पूरा करने से पहले मैं अपने परिवार को सबसे अधिक महत्व देती हूं। तुम हमारे परिवार के सबसे लाडले हो, पिता को पैर की पीड़ा हैं इसके उपरान्त भी तेरी मोटरसाइकिल के लिये पैसे कमाने और तुम्हें दिये वचन को पूरा करने अपने फ्रेक्चर वाले पैर होने के कष्ट को सहन करते हुए भी काम किये जा रहे हैं। तेरी मोटरसाइकिल के लिये। यदि तुम समझ सको तो अच्छा है, कल रात को अपने वचन को पूरा नहीं कर सकने के कारण बहुत दुःखी थे। इसके पीछे उनकी विवशता है।
शेष तुमने तो अनेकों बार अपने कहे वचन तोडे ही है न? मेरे हाथ में पैसे थमाकर दीदी घर की ओर चल निकली।
उसी समय उनका मित्र वहां अपनी मोटरसाइकिल लेकर आ गया, अच्छे से चमका कर ले आया था।"ले .. मोहन आज से ये मोटरसाइकिल तुम्हारी। सब बारह हजार में मांग रहे हैं, लेकिन ये तुम्हारे लिये आठ हजार।" मोहन मोटरसाइकिल की ओर एकटक देख रहा था। थोड़ी देर के बाद बोला, कि:
"मित्र तुम अपनी मोटरसाइकिल उस बारह हजार वाले को ही दे देना! मेरे पास पैसे की व्यवस्था नहीं हो पायी हैं और होने की शीघ्र ही कोई संभावना भी नहीं है।"वो सीधा भागवत सर के कक्ष में जा पहूंचा।
"अरे मोहन! कैसा लिखा है प्रश्न पत्र के उत्तर में?
भागवत सर ने मोहन की ओर देख कर पूछा।
"सर ..!!, यह कोई प्रश्न पत्र नहीं था, ये तो मेरे जीवन के लिये दिशानिर्देश था। मैंने एक प्रश्न का उत्तर छोड़ दिया है। किन्तु ये उत्तर लिखकर नहीं अपने जीवन का दायित्व निभाकर दूंगा और भागवत सर को चरणस्पर्श कर अपने घर की ओर निकल पडा।
घर पहुंचते ही, माता जी, पिताजी और दीदी सब उसकी राह देख रहे थे।
"बेटा! मोटरसाइकिल कहाँ हैं?" पिताजी ने पूछा। मोहन ने दीदी के हाथों में पैसे थमा दिये और कहा कि क्षमा करें! मुझे मोटरसाइकिल नहीं चाहिये। और पिताजी मुझे ऑटो की चाभी दो, आज से मैं पूरे छुट्टियों तक ऑटो चलाऊंगा और आप थोड़े दिन विश्राम करेंगे, और माता जी आज मैं मेरी पहला धनअर्जन कार्य प्रारम्भ होगा। इसलिये तुम अपनी मनभावन की मैथी की भाजी और बैगन ले आना, रात को हम सब साथ मिलकर के खाना खायेंगे।
मोहन के स्वभाव में आये परिवर्तन को देखकर माता जी ने उसको गले से लगा लिया और कहा कि "बेटा! प्रातः जो कहकर तुम गये थे वो बात मैंने तुम्हारे पिताजी को बतायी थी, और इसलिये वो दुःखी हो गये, काम छोड़ कर वापस घर आ गये। भले ही मुझे पेटउदर में शूल होता हो लेकिन आज तो मैं तेरी मनभावन की ही सब्जी बनाऊंगी।"
मोहन ने कहा, "नहीं मां! अब मै समझ गया हूँ कि मेरे घरपरिवार में मेरी भूमिका क्या है? मैं रात को बैंगन मैथी की सब्जी ही खाऊंगा, परीक्षा में मैंने अन्तिम प्रश्न का उत्तर नहीं लिखा हैं, वह प्रेक्टिकल करके ही दिखाना है, और हाँ मां हम गेहूं को पिसाने कहां जाते हैं, उस आटा चक्की का नाम और पता भी मुझे दे दो"और उसी समय भागवत सर ने घर में प्रवेश किया,और बोले "वाह! मोहन जो उत्तर तुमनें लिखकर नहीं दिये वो प्रेक्टिकल जीवन जीकर के दोगे।
"सर! आप और यहाँ?" मोहन भागवत सर को देख कर आश्चर्य चकित हो गया।
"मुझे मिलकर तुम चले गये, उसके बाद मैंने तुम्हारा पेपर पढा इसलिये तुम्हारे घर की ओर निकल पडा। मैं बहुत देर से तुम्हारे अंदर आये परिवर्तन को सुन रहा था। मेरी अनोखी परीक्षा सफल रही और इस परीक्षा में तुमने पहला नंबर पाया है।"
ऐसा बोलकर भागवत सर ने मोहन के सर पर हाथ रखा।मोहन ने तुरंत ही भागवत सर के पैर छुएँ और ऑटो रिक्शा चलाने के लिये निकल पडा....
मेरा सभी सम्माननीय अभिभावकों से आग्रह है कि आप इस पोस्ट को आप भी अवश्य पढ़िएगा और अपने बच्चों को भी पढ़ने का अवसर दें इससे अच्छी पोस्ट मैंने अपने जीवन में आज तक नहीं पढी व्यावहारिक जीवन में तो मैंने अनुभव किया है लेकिन सभी लोगों को किस प्रकार से अनुभव कराया जाए इसके लिए मेरा आपसे आग्रह है कि आप स्वयं और अपने बच्चों को इस पोस्ट को अवश्य पढ़ने का अवसर प्रदान करें l
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