*ॐ कूष्माण्डायै नम: ध्यान मंत्र - वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्। सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम्॥*
*वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।*
*सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम्॥*
*भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्।*
*कमण्डलु,चाप,बाण,पदमसुधाकलश,चक्र,गदा,जपवटीधराम्॥*
*पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।*
यह माता कूष्माण्डा की आरती और ध्यान मंत्र है, जो देवी दुर्गा के नौ रूपों में से चौथा रूप हैं। माता कूष्माण्डा की पूजा करने से भक्तों को सुख-समृद्धि, शक्ति और साहस की प्राप्ति होती है।
माता कूष्माण्डा के ध्यान मंत्र में उनके रूप और गुणों का वर्णन किया गया है, जो इस प्रकार हैं:
- उनका रंग स्वर्ण के समान है।
- उनके आठ हाथ हैं, जिनमें उन्होंने कमंडलु, चाप, बाण, पदमसुधा, कलश, चक्र, गदा और जपवटी धारण किए हैं।
- उनका वाहन सिंह है।
- उनकी चार भुजाएँ हैं, जो उनकी शक्ति और साहस को दर्शाती हैं।
- उनका मुखमंडल पूर्ण चंद्र के समान है, जो उनकी शीतलता और सौम्यता को दर्शाता है।
माता कूष्माण्डा की कृपा से भक्तों के सभी कार्य सिद्ध होते हैं और उन्हें जीवन में सफलता प्राप्त होती है।
*मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल, मण्डिताम्॥*
*प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कांत कपोलां तुंग कुचाम्।*
*कोमलांगी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥*
👉महात्म्य एवम् प्रमाण:👇
1. ब्रह्मांड की उत्पत्ति: माता कुष्मांडा को ब्रह्मांड की उत्पत्ति करने वाली माना जाता है। (देवी भागवत पुराण, अध्याय 5)
2. शक्ति और साहस: माता कुष्मांडा की पूजा करने से भक्तों को शक्ति और साहस की प्राप्ति होती है। (देवी महात्म्य, अध्याय 6)
3. सुख-समृद्धि: माता कुष्मांडा की कृपा से भक्तों को सुख-समृद्धि और जीवन में सफलता प्राप्त होती है। (देवी भागवत पुराण, अध्याय 7)
4. रोग निवारण: माता कुष्मांडा की पूजा करने से भक्तों के रोग निवारण होते हैं। (देवी महात्म्य, अध्याय 8)
👉प्रमाण:👇
देवी भागवत पुराण, अध्याय 5, श्लोक 10-15
देवी महात्म्य, अध्याय 6, श्लोक 1-10
श्रीमद् देवी भागवतम्, स्कंद 5, अध्याय 22-25
मार्कण्डेय पुराण, अध्याय 81-93
🪷माता कुष्मांडा महात्म्य का वर्णन कई हिंदू ग्रंथों में मिलता है, जिनमें से कुछ प्रमुख ग्रंथ हैं:👇
1. देवी महात्म्यम् (मार्कण्डेय पुराण)
2. दुर्गा सप्तशती (मार्कण्डेय पुराण)
3. शिव पुराण
4. ब्रह्म वैवर्त पुराण
इन ग्रंथों में माता कुष्मांडा के महात्म्य का वर्णन इस प्रकार है:
*देवी महात्म्यम् (मार्कण्डेय पुराण)*
"कुष्मांडा देवी चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्रा,
सिंहरूढ़ा अष्टभुजा यशस्वनी।
भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां,
कमण्डलु, चाप, बाण, पदमसुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्।"
(देवी महात्म्यम्, अध्याय 6, श्लोक 12-13)
*दुर्गा सप्तशती (मार्कण्डेय पुराण)*
"कुष्मांडा देवी स्वर्णरथारूढ़ा,
अष्टभुजा शस्त्रायुधधरा।
सिंहवाहना त्रिनेत्रा च,
पटाम्बर परिधानां कमनीयां।"
(दुर्गा सप्तशती, अध्याय 5, श्लोक 15-16)
*शिव पुराण*
"कुष्मांडा देवी चतुर्थ दुर्गा,
सिंहरूढ़ा अष्टभुजा यशस्वनी।
भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां,
कमण्डलु, चाप, बाण, पदमसुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्।"
(शिव पुराण, अध्याय 23, श्लोक 10-11)
*ब्रह्म वैवर्त पुराण*
"कुष्मांडा देवी स्वर्णरथारूढ़ा,
अष्टभुजा शस्त्रायुधधरा।
सिंहवाहना त्रिनेत्रा च,
पटाम्बर परिधानां कमनीयां।"
(ब्रह्म वैवर्त पुराण, अध्याय 44, श्लोक 12-13)
माता कुष्मांडा महात्म्य का वर्णन देवी भागवत पुराण, शिव पुराण और कल्कि पुराण जैसे प्राचीन हिंदू ग्रंथों में मिलता है। ये देवी दुर्गा के नौ रूपों में से चौथे रूप के रूप में पूजी जाती हैं।
कुष्मांडा का अर्थ है "ब्रह्मांड को अपने उदर में धारण करने वाली"। वह शक्ति और सृजन की प्रतीक है, जो ब्रह्मांड को बनाए रखने में मदद करती है।
कुष्मांडा की पूजा करने से व्यक्ति को स्वास्थ्य, संपत्ति और सुख की प्राप्ति होती है। वह अपने भक्तों को संकट से बचाती हैं और उनके जीवन को समृद्ध बनाती हैं।
🪷देवी कुष्मांडा की महिमा का वर्णन करते हुए शिव पुराण में कहा गया है:👇
"कुष्मांडा शुभदा स्वाहा, स्मरणमात्रेण भक्तानाम्।
अभीप्सितार्थसिद्ध्यर्थम्, न्वार्णमेकविंशाक्षरम्।"
इसका अर्थ है: "कुष्मांडा का स्मरण करने से ही भक्तों की इच्छाएँ पूरी हो जाती हैं।"
इस प्रकार, माता कुष्मांडा की महिमा और शक्ति का वर्णन प्राचीन ग्रंथों में विस्तार से मिलता है।
इन ग्रंथों में माता कुष्मांडा के महात्म्य का वर्णन करते हुए उनके रूप, गुणों और शक्तियों का वर्णन किया गया है।
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*निर्भीकता और सौम्यता की देवी माँ कूष्माण्डा आपको सदैव उर्जावान रखे आदिस्वरूपा व आदिशक्ति माता कूष्माण्डा के चरण आपके घर में आएं, आप हर्ष से सम्पूर्ण हो जाएं।


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