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शनिवार, 23 अगस्त 2025

* #प्राकृतिक चिकित्सा और आयुर्वेद में त्रिदोषों का महत्व*

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 * प्राकृतिक चिकित्सा और आयुर्वेद में त्रिदोषों का महत्व*


*परिचय- आयुर्वेद के अनुसार किसी भी प्रकार के रोग होने के 3 कारण होते हैं-*


*1. वात:- शरीर में वायु बनना।*


*2. पित्त:- शरीर के ताप का बढ़ना।*


*3. कफ:- शरीर में कफ दोष बन श्लेष्मा वृद्धि होना।*



*नोट:- किसी भी रोग के होने का कारण एक भी हो सकता है और दो भी हो सकता है या दोनों का मिश्रण भी हो सकता है या तीनों दोषों के कारण भी रोग हो सकता है।*जिन्हें प्रकृति की वृद्धि अनुसार दोष कहा गया है। इस दोषज प्रकृति दोष कम या अधिक तीनों का ही मिश्रण होता है। जो दोष अधिक मात्रा में होता है उसे उसी नाम से जाना जाता है।


*1. प्राकृतिक चिकित्सा सिद्धान्त अनुसार वात होने का कारण*


अनुचित असंतुलित भोजन, बेसन, मैदा, मैदा जैसा आटा तथा अधिक दालों का सेवन करने से शरीर में वात दोष प्रकुपित हो रोग उत्पन्न हो जाता है।दूषित भोजन, अधिक मांस का सेवन तथा बर्फ का सेवन करने के कारण वात दोष उत्पन्न हो जाता है।


आलस्य पूर्वक जीवन, सूर्यस्नान, तथा व्यायाम की कमी के कारण पाचन क्रिया दुर्बल हो जाती है जिसके कारण वात दोष उत्पन्न हो जाता है।

इन सभी कारणों से उदर में विबंध हो (दूषित वायु) बनने लगती है और यही वायु शरीर में जहां भी रुकती है, फंसती है या टकराती है, वहां शूल उत्पन्न होता है। यही शूल वात दोष कहलाता है।


*2. पित्त होने का कारण*


पित्त दोष होने का कारण मूल रुप से अनुचित भोजन शैली है जैसे- चीनी, नमक तथा मिर्चमसाले का अधिक सेवन करना।

मद कारक चीजों तथा दवाईयों का अधिक सेवन करने के कारण पित्त दोष उत्पन्न होता है।


दूषित भोजन तथा अधिक पके हुए भोजन का सेवन ही अधिक मात्रा में करने से पित्त दोष उत्पन्न होता है।


भोजन में कम से कम 75 से 80 प्रतिशत क्षारीय पदार्थ (फल, सब्जियां, अंकुरित इत्यादि अपक्वाहार) तथा 20 से 25 प्रतिशत अम्लीय पक्वाहार पदार्थ होने चाहिए। जब इसके विपरीत स्थिति होती है तो शरीर में अम्लता बढ़ जाती हैं और पित्त दोष उत्पन्न हो जाता है। इस तथ्य पर प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति में सौ प्रतिशत बल दिया जाता है।


*3.  कफ दोष होने का कारण*


तेल, मक्खन तथा घी आदि वसा युक्त चीजों को पचाने  के लिए अधिक कार्य करने तथा व्यायाम की आवश्यकता होती है और जब इसका अभाव होता है तो पाचनक्रिया कम हो जाती है और पाचनक्रिया की क्षमता से अधिक मात्रा में वसा युक्त खाद्य वाली वस्तुएं सेवन करते है तो कफ दोष उत्पन्न हो जाता है।


रात के समय में छाछ, दही और गरिष्ठ भोजन का सेवन करने से कफ दोष उत्पन्न हो जाता है।


*वात, पित्त और कफ के कारण होने वाले रोग निम्नलिखित हैं-*


*वात के कारण होने वाले रोग*


          अफारा, टांगों में दर्द, पेट में वायु बनना, जोड़ों में दर्द, लकवा, साइटिका, शरीर के अंगों का सुन्न हो जाना, शिथिल होना, कांपना, फड़कना, टेढ़ा हो जाना, दर्द, नाड़ियों में खिंचाव, कम सुनना, वात ज्वर तथा शरीर के किसी भी भाग में अचानक दर्द हो जाना आदि।


*पित्त के कारण होने वाले रोग*


उदर, वक्ष, शरीर आदि में दाह होना, अम्लीय उदगार आना, पित्ती उछलना (आर्टिकरिया एलर्जी), रक्ताल्पता , चर्म रोग (कण्डू , स्फोटक तथा पीडिका आदि), कुष्ठरोग, यकृत के रोग, प्लीहा ग्रन्थि की वृद्धि हो जाना, शरीर में दुर्बलता आना, वृक्क तथा हृदय के रोग आदि।


*कफदोष के कारण होने वाले रोग*


कई बार कास व नासिका मार्ग से श्लेष्मा  निकलना, शीत लगना, श्वसन संस्थान सम्बंधी रोग (कास, श्वास आदि रोग), शरीर का फूलना, शरीर में मेद बढ़ना, प्रतिष्याय होना तथा फेफड़ों की टी.बी. आदि।


*वात से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार*


*भोजन चिकित्सा*


वात से पीड़ित रोगी को अपने भोजन में छिलका युक्त भोजन (बिना पकाया हुआ भोजन) फल, सलाद तथा पत्तेदार सब्जियों का अधिक प्रयोग करना चाहिए।


मुनक्का अंजीर, बेर, अदरक, तुलसी, गाजर, सोयाबीन, सौंफ तथा छोटी इलायची का भोजन में अधिक उपयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग शीघ्र ही ठीक हो जाता है।


रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन प्रातः के समय में लहसुन की 2-4 कलियां बिना दांतों से काटे खानी चाहिए तथा अपने भोजन में मक्खन का उपयोग करना चाहिए इसके फलस्वरूप वात रोग शीघ्र ही ठीक हो जाता है।


*उपवास*


वात रोग से पीड़ित रोगी को सबसे पहले कुछ दिनों तक सब्जियों या फलों का रस पीकर उपवास रखना चाहिए तथा इसके उपरान्त अन्य चिकित्सा करनी चाहिए।


*पित्त से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार*


*भोजन चिकित्सा*


पित्त रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन सब्जियों तथा फलों का रस पीना चाहिए।


पित्त रोग से पीड़ित रोगी को भूख न लग रही हो तो केवल फलों का रस तथा सब्जियों का रस पीना चाहिए और सलाद का अपने भोजन में उपयोग करना चाहिए। जिसके फलस्वरूप उसका रोग शीघ्र ही ठीक हो जाता है।

रोगी व्यक्ति को पूर्णतः स्वस्थ होने तक बिना पका हुआ भोजन करना चाहिए।


पित्त रोग से पीड़ित रोगी को अम्लीय, मसालेदार, नमकीन चीजें तथा मिठाईयां नहीं खानी चाहिए क्योंकि इन चीजों के सेवन से पित्त रोग और बिगड़ जाता है।


पित्त के रोगी के लिए गाजर का रस पीना  लाभकारी होता है, इसलिए रोगी को प्रतिदिन प्रातः काल और सायंकाल  के समय में कम से कम 1 गिलास गाजर का रस पीना चाहिए।


अनार, मुनक्का, अंजीर, जामुन, सिंघाड़ा, सौंफ तथा दूब का रस पीना पित्त रोगी के लिए बहुत ही लाभकारी होता है।


पित्त रोग से पीड़ित रोगी को सुबह के समय में लहसुन की 2-4 कलियां बिना दांतों से काटे खाने से बहुत लाभ मिलता है।


सोयाबीन तथा गाजर का सेवन प्रतिदिन करने से वात रोग शीघ्र ही ठीक होने लगता है।


*कफ से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार*


भोजन चिकित्सा*


कफ के रोग से पीड़ित रोगी को प्राकृतिक चिकित्सा काल के समय सबसे पहले अधिक वसा वाले पदार्थ, दूषित भोजन, तली-भुनी खाद्य पदार्थ आदि का सेवन नहीं करना चाहि क्योंकि इन चीजों का उपयोग कफ रोग में अधिक ही हानिकारक रहता है।


कफ से पीड़ित रोगी को दूध तथा दही वाले पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इन चीजों के सेवन से रोगी की स्थिति और भी गंभीर हो जाती है।


कफ रोग से पीड़ित रोगी को दूध नही पीना चाहिए और यदि उसका मन दूध पीने को करता है तो दूध में अदरख या सोंठ चूर्ण डालकर सेवन करना चाहिए।


कफ रोग से पीड़ित रोगी को ताजे आंवले का रस प्रतिदिन प्रातः के समय में पीना चाहिए जिसके फलस्वरूप उसका रोग शीघ्र  ठीक हो जाता है। यदि आंवले का रस न मिल रहा हो तो सूखे आंवले को चूसना चाहिए।


मुनक्का, कच्ची पालक, अंजीर तथा अमरूद का सेवन कफ रोग में  अधिक लाभदायक होता है।


अदरक, तुलसी, अंजीर तथा सोयाबीन का कफ रोग में प्रयोग करने से रोगी को अच्छा लाभ मिलता है।


लहसुन तथा शहद का प्रयोग भी कफ रोग में लाभदायक होता है और इससे रोगी का कफ रोग शीघ्र ही ठीक हो जाता है।

सोमवार, 4 अगस्त 2025

अपामार्ग या लटजीरा या चिरचिटा या #chafftree,::::::::::::

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 #अपामार्ग या लटजीरा या चिरचिटा या #chafftree,::::::::::::

यह पौधा पेट की लटकती त्वचा, वसा, सड़े हुए दाँत, गठिया, अस्थमा, अर्श रोग, मेदोवृद्धि, केश पालित्य, वृक्क या किडनी रोग आदि 20 रोगों के लिए किसी वरदान से कम नही,,,


आज हम जानते हैं इसके सम्बन्ध में नीचे दिए गए विवरण से,,,,,

अपामार्ग का वानस्पतिक परिचय:

अपामार्ग (Achyranthes aspera) एक खरपतवार है, लगभग सभी खरपतवार का अर्थ होता है जो क्षार पदार्थ से भरपूर होते हैं। अल्पतः स्वाद में कटु होते हैं। शरीर से अम्लता में संतुलन बनाते हैं।जो भारत सहित संसार के उष्णकटिबंधीय भागों में पाया जाता है। इसे priklly chaif flower के नाम से भी जाना जाता है। यह एक वार्षिक जड़ी-बूटी है जो 2 मीटर तक ऊंची हो सकती है। इसके तने कोणीय, सरल और धारीदार होते हैं, और पत्तियां अंडाकार होती हैं। फूल हरे-श्वेत रंग के होते हैं, और बीज लाल-भूरे रंग के होते हैं। अपामार्ग का उपयोग वनौषधि के रूप में विभिन्न प्रकार के रोगों के उपचार के लिए किया जाता है, जैसे कि दंत शूल, चर्म रोग, और मुंह के छाले।
वानस्पतिक परिचय:
  • वानस्पतिक नाम: अचिरांथेस एस्पेरा (Achyranthes aspera)।
  • परिवार: ऐमारेन्थेसी (Amaranthaceae)।
  • सामान्य नाम: अपामार्ग, चिरचिटा, लटजीरा, प्रिकली चैफ फ्लावर।
  • पौधे का प्रकार: वार्षिक जड़ी-बूटी।
  • ऊंचाई: 2 मीटर तक।
  • तने: कोणीय, सरल, धारीदार, बैंगनी रंग के।
  • पत्तियां: अंडाकार, बारीक रूप से जुड़ी हुई, दोनों ओर से।
  • फूल: हरे-श्वेत रंग के।
  • बीज: लाल-भूरे रंग के, उप-बेलनाकार, आधार पर गोल।
  • उपयोग: औषधीय, विशेष रूप से प्राकृतिक चिकित्सा, आयुर्वेद, यूनानी और होम्योपैथी में। 
  • अन्य महत्वपूर्ण तथ्य:
  • अपामार्ग में श्लेष्मा वृद्धि या कफ को कम करने, शोथ रोधी, मधुमेहरोधी, और गर्भपातरोधी गुण होते हैं। 
  • इसका उपयोग क्षार  बनाने के लिए भी किया जाता है।
  • यह पौधा भारत में व्यापक रूप से पाया जाता है और इसका उपयोग विभिन्न प्रकार के रोगों के उपचार के लिए किया जाता है।
  • इसके बीजों को कपड़ों में चिपकने और निकालने में कठिनाई होने के कारण इसे विशेष माना जाता  है। वानस्पतिक गुण के अनुसार।


आज हम आपको ऐसे पौधे के सम्बन्ध में बताएँगे जिसका तना, पत्ती, बीज, फूल, और जड़ पौधे का हर भाग औषधि है, इस पौधे को अपामार्ग या चिरचिटा (Chaff Tree), लटजीरा कहते है। अपामार्ग या चिरचिटा (Chaff Tree) का पौधा भारत के सभी सूखे क्षेत्रों में उत्पन्न होता है यह गांवों में अधिक मिलता है खेतों के आसपास घास के साथ प्रायः पाया जाता है इसे साधारण बोलचाल की भाषा में आंधीझाड़ा या चिरचिटा (Chaff Tree) भी कहते हैं-अपामार्ग की ऊंचाई लगभग 60 से 120 सेमी होती है, प्रायः लाल और श्वेत दो प्रकार के अपामार्ग देखने को मिलते हैं-श्वेत अपामार्ग के डंठल व पत्ते हरे रंग के, भूरे और श्वेत रंग के धब्बे युक्त होते हैं इसके अतिरिक्त फल चपटे होते हैं जबकि लाल अपामार्ग (RedChaff Tree) का डंठल लाल रंग का और पत्तों पर लाल-लाल रंग के धब्बे होते हैं।

 

अपामार्ग का पौधा 

अपामार्ग का पौधा 

अपामार्ग का पौधा 

अपामार्ग का पौधा 

इस पर बीज नुकीले कांटे के समान लगते है इसके फल चपटे और कुछ गोल चावल के समान होते हैं दोनों प्रकार के अपामार्ग के गुणों में समानता होती है। श्वेत अपामार्ग(White chaff tree) श्रेष्ठ माना जाता है इनके पत्ते गोलाई लिए हुए 1 से 5 इंच लंबे होते हैं चौड़ाई आधे इंच से ढाई इंच तक होती है- पुष्प मंजरी की लंबाई लगभग एक फुट होती है, जिस पर फूल लगते हैं, फल शीतकाल में लगते हैं और गर्मी में पककर सूख जाते हैं इनमें से चावल के दानों के समान बीज निकलते हैं इसका पौधा वर्षा ऋतु में उत्पन्न होकर गर्मी में सूख जाता है।

 

अपामार्ग तीखा, कडुवा तथा प्रकृति में उष्ण होता है। यह पाचनशक्तिवर्द्धक, विरेचक (पतले मल लाने वाला), रुचिकारक, शूल-निवारक, विष, कृमि व अश्मरी नाशक, रक्तशोधक (रक्त को शुद्ध करने वाला), ज्वरनाशक, श्वास रोग नाशक, क्षुधा को नियंत्रित करने वाला होता है तथा सुखपूर्वक प्रसव हेतु एवं गर्भधारण में उपयोगी है।

 अपामार्ग या चिरचिटा (Chaff Tree) के 20 अद्भुत लाभ :

1. Rhematoid arthritis या गठिया रोग :

 

अपामार्ग (चिचड़ा) के पत्ते को पीसकर, गर्म करके  सन्धि शूल स्थान या गठिया में बांधने से शूल व शोथ दूर होती है।

 

2. पित्त की अश्मरी या गालब्लैडर स्टोन:

 

पित्त की पथरी में चिरचिटा की जड़ आधा से 10 ग्राम कालीमिर्च के साथ या जड़ का काढ़ा कालीमिर्च के साथ 15 ग्राम से 50 ग्राम की मात्रा में प्रातः-सायं- खाने से पूरा लाभ होता है। काढ़ा यदि गर्म-गर्म ही पिएं तो लाभ होगा।

 

3. यकृत का बढ़ना या हेपेटाइटिस :

 

अपामार्ग का क्षार मठ्ठे के साथ एक चुटकी की मात्रा से बच्चे को देने से बच्चे की यकृत रोग मिट जाते हैं।

 

4. पक्षाघात या पैरालिसिस (लकवा) :

 

एक ग्राम कालीमिर्च के साथ चिरचिटा की जड़ को दूध में पीसकर नाक में टपकाने से पक्षाघात ठीक हो जाता है।

 

5. उदर वृद्धि होना या उदर त्वचा लटकना :

 

चिरचिटा (अपामार्ग) की जड़ 5 ग्राम से लेकर 10 ग्राम या जड़ का काढ़ा 15 ग्राम से 50 ग्राम की मात्रा में प्रातः-सायं कालीमिर्च के साथ खाना खाने से पहले पीने से आमाशय का ढीलापन में कमी आकर पेट का आकार कम हो जाता है।

 

6. अर्श रोग या हीमोरॉइड्स या पाइल्स :

 

अपामार्ग की 6 पत्तियां, कालीमिर्च 5 नग को जल के साथ पीस छानकर प्रातः-सायं सेवन करने से अर्श रोग में लाभ हो जाता है और उसमें बहने वाला रक्त रुक जाता है।

रक्त अर्श पर अपामार्ग की 10 से 20 ग्राम जड़ को चावल के पानी के साथ पीस-छानकर 2 चम्मच मधु मिलाकर पिलाना गुणकारी हैं।

 

7. मेदोवृद्धि या ओबेसिटी:

 

अधिक भोजन करने के कारण जिनका शारीरिक भार बढ़ रहा हो, उन्हें भूख कम करने के लिए अपामार्ग के बीजों को चावलों के समान भात या खीर बनाकर नियमित सेवन करना चाहिए। इसके प्रयोग से शरीर की वसा धीरे-धीरे कम होने लगेगी।

 

8. शारीरिक दुर्बलता :

 

अपामार्ग के बीजों को भूनकर इसमें बराबर की मात्रा में मिश्री मिलाकर पीस लें। 1 कप गौ दुग्ध के साथ 2 चम्मच की मात्रा में प्रातः-सायं नियमित सेवन करने से शरीर में पुष्टता आती है।

 

9. सिर शूल:

 

अपामार्ग की जड़ को पानी में घिसकर बनाए गए लेप को मस्तक पर लगाने से सिर शूल दूर होता है।

 

10. संतान प्राप्ति हेतु:

 

अपामार्ग की जड़ के चूर्ण को एक चम्मच की मात्रा में दूध के साथ मासिक-स्राव के उपरान्त नियमित रूप से 21 दिन तक सेवन करने से गर्मधारण होता है। दूसरे प्रयोग के रूप में ताजे पत्तों के 2 चम्मच रस को 1 कप दूध के साथ मासिक-स्राव के उपरान्त नियमित सेवन से भी गर्भ स्थिति की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।

 

11. विषम ज्वर या मलेरिया :

 

अपामार्ग के पत्ते और कालीमिर्च बराबर मात्रा में लेकर पीस लें, उपरान्त इसमें थोड़ा-सा गुड़ मिलाकर मटर के दानों के बराबर की गोलियां बना लें। जब मलेरिया फैल रहा हो, उन दिनों एक-एक गोली प्रातः-सायं भोजन के उपरान्त नियमित रूप से सेवन करने से इस ज्वर का शरीर पर आक्रमण नहीं होगा। इन गोलियों का दो-चार दिन सेवन पर्याप्त होता है, साथ साथ जबतक ज्वर रहे गर्म पानी ही पीना है।

 

12. पालित्य रोग या गंजापन :

 

सरसों के तेल में अपामार्ग के पत्तों को जलाकर एकरस कर लें और  लेप बना लें। इसे गंजे स्थानों पर नियमित रूप से लेप करते रहने से पुन: बाल उगने की संभावना होती है।

 

13. दंतशूल और दंत गुहा या खाँच ( डेंटल कैविटी) :

 

इसके 2-3 पत्तों के रस में रूई को भिगोकर गोल बनाकर दांतों में लगाने से दांतों के शूल में लाभ पहुंचता है तथा पुरानी से पुरानी दंत गुहा या खाँच को भरने में सहायता करता है।

 

14. कण्डू या स्केबीज :

 

अपामार्ग के पंचांग (जड़, तना, पत्ती, फूल और फल) को पानी में उबालकर काढ़ा बनाएं और इससे स्नान करें। नियमित रूप से स्नान करते रहने से कुछ ही दिनों त्वचा से कण्डू दूर जाएगी।


15. अर्ध कपारी या अर्ध सिर शूल में :

 

इसके बीजों के चूर्ण को सूंघने मात्र से ही अर्ध कपारी, मस्तक की जड़ता में लाभ मिलता है। इस चूर्ण को सुंघाने से मस्तक के अंदर एकत्रित हुआ श्लेष्मा तनु या पतला होकर नाक के द्वारा निकल जाता है और वहां पर उत्पन्न हुए कृमि भी निकल जाते हैं।

 

16. जीर्ण कास या ब्रोंकाइटिस :

 

जीर्ण कास विकारों और वायु प्रणाली दोषों में अपामार्ग (चिरचिटा) की क्षार, पिप्पली, अतीस, कुपील, देशी गाय का घृत और मधु के साथ प्रातः-सायं सेवन करने से वायु प्रणाली शोथ (ब्रोंकाइटिस) में पूर्ण लाभ मिलता है।

 

17. कास :

 

कास बार-बार पीड़ित करती हो, कफ निकलने में कष्ट हो, कफ गाढ़ा व लेसदार हो गया हो, इस अवस्था में या न्यूमोनिया की अवस्था में आधा ग्राम अपामार्ग क्षार व आधा ग्राम शर्करा दोनों को 30 मिलीलीटर गर्म पानी में मिलाकर प्रातः-सायं सेवन करने से 7 दिन में अधिकांश में लाभ होता है।

 

18. वृक्क का शूल:

 

अपामार्ग (चिरचिटा) की 5-10 ग्राम ताजी जड़ को पानी में पीसकर रस बनाकर पिलाने से बड़ा लाभ होता है। यह औषधि मूत्राशय कीपीड़ा का प्रमुख कारण अश्मरी को टुकड़े-टुकड़े करके निकाल देती है। वृक्क के पीड़ा के लिए यह प्रधान औषधि है।

 

19. वृक्क या किडनी के रोग :

 

5 ग्राम से 10 ग्राम चिरचिटा की जड़ का काढ़ा 1 से 50 ग्राम प्रातः-सायं मुलेठी, गोखरू और पाठा के साथ खाने से वृक्क की अश्मरी या किडनी स्टोन समाप्त हो जाती है या 2 ग्राम अपामार्ग (चिरचिटा) की जड़ को पानी के साथ पीस लें। इसे प्रतिदिन पानी के साथ प्रातः- सायं पीने से अश्मरी रोग ठीक होता है।

 

20. तमक श्वास या अस्थमा :

 

चिरचिटा की जड़ को किसी लकड़ी की सहायता से मिट्टी हटाकर निकाल लेना चाहिए। ध्यान रहे कि जड़ में लोहा नहीं छूना चाहिए। इसे सुखाकर पीस लेते हैं। यह चूर्ण लगभग एक ग्राम की मात्रा में लेकर मधु के साथ खाएं इससे श्वास रोग का निर्मूलन सम्भव हो जाता है।

अपामार्ग (चिरचिटा) का क्षार 0.24 ग्राम की मात्रा में पान में रखकर खाने अथवा 1 ग्राम मधु में मिलाकर चाटने से छाती पर एकत्रित श्लेष्मा या कफ को हटाकर श्वास रोग नष्ट करता है।

#डॉ त्रिभुवन नाथ श्रीवास्तव, पूर्व प्राचार्य, विवेकानंद योग प्राकृतिक चिकित्सा महाविद्यालय एवम् चिकित्सालय, बाजोर, सीकर, राजस्थान।


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