डायरेक्टलिंक_3 प्रत्यक्ष यूआरएल https://www.cpmrevenuegate.com/s9z8i5rpd?key=0fff061e5a7ce1a91ea39fb61ca61812 डायरेक्टलिंक_1 प्रत्यक्ष यूआरएल https://www.cpmrevenuegate.com/vy0q8dnhx?key=096a4d6815ce7ed05c0ac0addf282624 डायरेक्टलिंक_2 प्रत्यक्ष यूआरएल https://www.cpmrevenuegate.com/h00w82fj?key=

शनिवार, 31 अगस्त 2024

#प्राकृतिक चिकित्सा शिविर#

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 29अगस्त से 01 सितम्बर 2024 तक चलने वाला निःशुल्क प्राकृतिक चिकित्सा शिविर, का आज का समापन हो गया है। यह चिकित्सा शिविर दूरस्थ पहाड़ी गांव में लगाया गया था। जहां धार्मिक पदयात्री अपनी 24 कोसीय पदयात्रा में आते हैं। जिन्हें पदयात्रा करते समय चोट, शारीरिक अस्वस्थता हो जाती है जिनका आवश्यकतानुसार उपचार किया जाता है। यह शिविर #विवेकानन्द योग प्राकृतिक चिकित्सा महाविद्यालय एवं चिकित्सालय, बाजोर, सीकर, राजस्थान द्वारा,प्रतिवर्ष यहां और खाटू श्याम मेले में प्रतिबार लगाया जाता है।

यह यात्रा का ज्ञान अधिक रोचक है! #अरावली पर्वतमाला में स्थित #टपकेश्वर महादेव मंदिर का मोबाईल फोन से खींचा हुआ चित्र देखकर मन प्रफुल्लित हो उठा। 27 कोसीय पदयात्रा में लाखों लोगों का सम्मिलित होना दर्शाता है कि इस मंदिर का धार्मिक महत्व कितना गहरा है।

मुझे इस विषय में कुछ और जानने की उत्सुकता है, जैसे:

 * पदयात्रा का मार्ग: यह पदयात्रा कितने दिनों की होती है? क्या इसमें कोई विशेष रूट या मार्ग निर्धारित होता है?

 * मंदिर का इतिहास: इस मंदिर का निर्माण कब हुआ था? इसके पीछे कौन सी पौराणिक कथा है?

 * #लोहार्गल तीर्थ: यह तीर्थ स्थान क्यों महत्वपूर्ण है? क्या यहां कोई विशेष पूजा या अनुष्ठान किए जाते हैं?

 * पदयात्रा का महत्व: इस पदयात्रा का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व क्या है? लोग क्यों इस पदयात्रा में भाग लेते हैं?

यदि आपके पास इस विषय में अधिक कुछ तथ्य है, तो कृपया साझा करें। मैं इस विषय के बारे में और जानने के लिए उत्सुक हूं।

अन्य कुछ प्रश्न जो आपके मन में हो सकते हैं:

 * क्या आपने कभी इस पदयात्रा में भाग लिया है?

 * आपने इस मंदिर के बारे में कहां सुना था?

 * आपको इस पदयात्रा में सबसे अच्छा क्या लगा?

आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी।

ध्यान दें: यदि आप चाहें तो आप मुझे इस मंदिर या पदयात्रा के बारे में कुछ और बता सकते हैं। मैं आपके मार्गदर्शन के आधार पर और अधिक तथ्यों को संग्रह करने का प्रयास करूंगा।


शनिवार, 24 अगस्त 2024

ककोड़ा के फल के उपयोग

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 शहरी लोग मटर पनीर और सड़े हुए मांस को खाने के अभ्यस्त हो चुके है। वो क्या जाने हमारे गांव के ककोड़ा का स्वाद, क्या आपके गांव में भी मिलते है ककोड़ा।
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हमारे गाँव के जंगल मे ये मिलती है। 101% शुद्ध जैविक सब्जी नाम तो सुना ही होगा ककोड़ा अब हम आपको इसके आश्चर्यकारी कार्य भी बता देते है।

ककोड़ा बेल में लगता है इसकी बेले  वर्षा ऋतु में हरी हो जाती है। इसकी जड़ें भूमि के अन्दर में पड़ी रहती है ये स्वतः ही उगने वाली सब्जी है। ककोड़ा मुख्यत दो प्रकार का होता है,

 एक, मीठा और 

दूसरा, कड़वा 

दोनो के फोटो आप देख सकते है। कड़वे वाले कि सब्जी अधिक स्वादिष्ट बनती है लेकिन ये कम मिलते है।

ककोड़ा / कंटोला सब्जी में कम मात्रा में कैलोरी और अच्छी मात्रा में रेशा या फाइबर होता है जो शरीर के बढ़े हुए भार को कम करने में लाभ (कंटोला के लाभ) करता है।

कंटोला पाचन के लिए लाभप्रद होता है, इसके सेवन से विबन्ध औरअजीर्ण जैसे अन्य पाचन समस्याओं से मुक्ति मिलती है।

ककोड़ा का पोषक महत्व:- 

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ककोरा सब्जी स्वास्थ्य का भंडार है। ये सब्जी शरीर को रोग प्रतिरोधी करने के साथ ही मल्टी विटामिन्स भी पहुंचाती है। काकाेरा का लोग सब्जी नहीं औषधि मानते हैं। आम भाषा में इसका नाम वनकरेला भी है। इस एक इस सब्जी में विटामिन बी 12 से लेकर विटामिन डी, कैल्शियम, जिंक, कॉपर और मैग्नीशियम जैसे पोषक तत्व भरपूर मात्रा में मिलते हैं। 

ककोरा इन रोगों में लाभ पहुंचाता है। 

ककोरा आपको कई  प्रकार के रोगों  से भी बचाता है। प्राकृतिक आयुर्विज्ञान में भी ककोरा का बहुत महत्व है:- 

1, ककोरा खाने से सिरशूल, बालों का झड़ना, कान का शूल, कास, उदर का संक्रमण या इंफेक्शन नहीं होता है।

2, ककोरा खाने से अर्श और पीलिया जैसे रोग भी दूर हो जाते हैं।

3, इसे खाने से पुराने रोग ठीक होते हैं।

4, वर्षा ऋतु में होने वाले कवक संक्रमण जैसे दद्रू,कंडू, से भी ककोरा लाभ पहुंचाता है।

5, ककोरा का लाभ अंगघात, शोथ, चेतना शून्यता और नेत्रों की समस्या होने पर भी किया जाता है।

6, ज्वर आने पर भी आप ककोरा की सब्जी या सूप ले या खा सकते हैं।

7, उच्चरक्तचाप या ब्लडप्रेशर, मधुमेह , यकृत दोष, पाचन तंत्र सम्बन्धी विकार और कैंसर जैसे गंभीर रोगों से भी बचाने में सहायता करता है।

यदि आपके पास ककोड़ा के बारे में उपर्युक्त तथ्य के अतिरिक्त अन्य कोई ज्ञान योग्य तथ्य है तो कृपा कर शेयर अवश्य करें।

शुक्रवार, 23 अगस्त 2024

टॉयफाइड ज्वर और उसकी प्राकृतिक चिकित्सा

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  #टाइफाईड #(Typhoid)


परिचय: इस रोग के होने का सबसे प्रमुख कारण बैक्टीरिया का संक्रमण है। यह बैक्टीरिया व्यक्ति के शरीर में भोजन नली तथा पाचन तंत्र में चले जाते हैं और फिर वहां से वे रक्त में चले जाते हैं और कुछ दिनों के बाद व्यक्ति को रोग ग्रस्त कर देते हैं। इस रोग में रोगी के शरीर पर गुलाबी रंग के छोटे-छोटे दानों जैसे धब्बे निकल जाते हैं। इस रोग में रोगी की प्लीहा बढ़ जाती है और उसके पेट में असामान्यता बढ़ जाती है। इस रोग में व्यक्ति को सायं काल के समय में अधिक ज्वर हो जाता है और यह ज्वर कई दिनों तक रहता है।


#टाइफाईड #रोग के लक्षण-


1,टाइफाईड रोग से पीड़ित रोगी के शरीर में हर समय ज्वर रहता है तथा यह ज्वर सायंकाल के समय और भी तेज हो जाता है।

2,टाइफाईड रोग से पीड़ित रोगी के सिर में शूल भी रहता है।

3,टाइफाईड रोग से पीड़ित रोगी को कभी-कभी वमन भी हो जाती है तथा उसका जी मिचलाता रहता है।

4,टाइफाईड रोग के रोगी को भूख नहीं लगती तथा उसकी जीभ पर मलिनता की परत सी दिखाई देती है।

5,टाइफाईड रोग से पीड़ित रोगी के शरीर की मांस-पेशियों में शूल होता रहता है।


6,टाइफाईड रोग से पीड़ित रोगी को विबंध तथा अतिसार की समस्या भी हो जाती है।


#टाइफाईड रोग होने का कारण-


1,टाइफाईड रोग एक प्रकार के जीवाणु के संक्रमण के कारण होता है इस जीवाणु का नाम साल्मोनेला टाइफी ( एस. टाइफी) नामक जीवाणु के कारण होने वाला रोग है।टाइफाइड बुखार आंतों के मार्ग (आंतों/आंत) और कभी-कभी रक्तप्रवाह का एक जीवाणु संक्रमण है जो साल्मोनेला टाइफी बैक्टीरिया के कारण होता है। बैक्टीरिया का यह प्रकार केवल मनुष्यों में रहता है। यह एक असामान्य रोग है।  इसे आंतों का ज्वर,मोतीझरा ज्वरऔर अंग्रेजी भाषा में Enteric fever तीव्र ज्वर कहा जाता है, जो कुछ सप्ताह तक बना रहता है, जो सालमोनिला टाइफोसा (Salmonella Typhosa) नामक जीवाणु द्वारा उत्पन्न होता है। रोग के प्रमुख लक्षणों में ज्वर, सिर पीड़ा, दुर्बलता, प्लीहा की (Spleenomegaly) तथा त्वचा पर दानों का उभड़ना होता है। मोती के झरने से साद्दश्य होने के कारण यह मोतझरा ज्वर कहलाया है। इसमें ज्वर 102 से 104 डिग्री फॉरेनहाइट तक चढ़ता है।

2, यह जीवाणु दूध तथा मक्खन में तेजी से पनपता है। जब कोई व्यक्ति इसके संक्रमण से प्रभावित चीजों का सेवन कर लेता है तो उसे टाइफाईड रोग हो जाता है।


3, यह जीवाणु पानी, नालियों में उत्पन्न होने वाले खाद्य पदार्थ, मक्खियों के शरीर से, मल-मूत्र से उत्पन्न होता है। जब कोई व्यक्ति इन वस्तुओं के सम्पर्क में आता है तो उसे टाइफाईड रोग हो जाता है।


4,जिन व्यक्तियों को टाइफाईड रोग हो चुका हो उसके सम्पर्क में यदि कोई स्वस्थ व्यक्ति आ जाता है तो उसे भी टाइफाईड रोग हो जाता है।

5, यह जीवाणु किसी प्रकार से व्यक्ति के शरीर में पहुंच जाता है तो यह उसके शरीर के अंदर एक प्रकार का विष का निर्माण करता है जो रक्त के द्वारा स्नायु प्रणाली जैसे सारे अंगों में फैल जाता है जिसके कारण रोगी के शरीर में रक्तविषाक्तता की अवस्था प्रकट हो जाती है और उसे #टाइफाईड रोग हो जाता है।


टाइफाईड रोग का#प्राकृतिक चिकित्सा#से उपचार-

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1,टाइफाईड रोग को ठीक करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को तब तक उपवास रखना चाहिए, जब तक कि उसके शरीर में टाइफाईड रोग होने के लक्षण दूर न हो जाए। फलों में तरबूज और अंगूर जो विटामिन सी, ए और बी6, जैसे पोषक तत्व अच्छी मात्रा में होते हैं जो टाइफाइड ज्वर के तापमान को कम करने में सहायता करते हैं। इसलिए, इन फलों या फलों के रस को टाइफाइड के रोगी के दैनिक आहार में सम्मिलित किया जाना चाहिए।सोयाबीन दाल का सूप और दूध रोग से लड़ते हुए बलवान बनाते हैं। इनके साथ ही # पके हुए केले, सेब, पपीता और इसी जैसे अन्य फल टाइफाइड में खाने के लिए अच्छे होते हैं। जहां तक ​​आहार की बात है, तो आपको दलिया, पके हुए आलू, दाल का सूप, टोफू, मशरूम और अच्छे पके चावल(भात) जैसे सहजता से पचने वाले खाद्य पदार्थ लेने चाहिए।

2,इसके उपरान्त दालचीनी के काढ़े में काली मिर्च और मधु मिलाकर औषधि के रूप में लेना चाहिए। इससे रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक लाभ मिलता है।

3,टाइफाईड रोग से पीड़ित व्यक्ति को ज्वर होने पर उसे लहसुन का काढ़ा बनाकर पिलाना चाहिए, इससे रोगी व्यक्ति को अधिक लाभ मिलता है।


4,टाइफाईड रोग से पीड़ित व्यक्ति को उपवास रखना चाहिए तथा इसके बाद धीरे-धीरे फल खाने प्रारम्भ करने चाहिए तथा इसके बाद सामान्य भोजन सलाद, फल तथा अंकुरित मूंग और मसूर दाल, दही को भोजन के रूप में लेना चाहिए। इस प्रकार से उपचार करने से टाइफाईड रोग शीघ्र ही ठीक हो जाता है।


5,टाइफाईड रोग से पीड़ित रोगी के ज्वर को ठीक करने के लिए प्रतिदिन रोगी को गुनगुने पानी का एनिमा देना चाहिए तथा इसके बाद उसके पेट पर मिट्टी की गीली पट्टी लगानी चाहिए। 

6,रोगी को आवश्यकतानुसार गर्म या ठंडा कटिस्नान तथा जलनेति भी कराना चाहिए जिसके फलस्वरूप टाइफाईड रोग शीघ्र ही ठीक हो जाता है।

7,यदि टाइफाईड रोग का प्रभाव अधिक तीव्र हो तो रोगी के माथे पर ठण्डी गीली पट्टी रखनी चाहिए तथा उसके शरीर पर स्पंज, गीली चादर लपेटनी चाहिए। इसके बाद उसे गर्मपाद स्नान क्रिया करानी चाहिए।

8,टाइफाईड रोग से पीड़ित रोगी को जिस समय ज्वर तेज नहीं हो उस समय उसे कुंजल क्रिया करानी चाहिए। इससे टाइफाईड रोग में अधिक लाभ मिलता है।

9,यदि टाइफाईड रोग से पीड़ित रोगी को ठण्ड लग रही हो तो उसके पास में गर्म पानी की बोतल रखकर उसे कम्बल उढ़ा देना चाहिए। इससे रोगी को शीघ्र अधिक लाभ मिलता है।


10,रोगी के शरीर पर घर्षण क्रिया करने से भी टाइफाईड रोग शीघ्र ही ठीक हो जाता है।

11,टाइफाईड रोग से पीड़ित रोगी को पूर्ण रूप से विश्राम करना चाहिए, क्योंकि इस ज्वर को पूर्णतः ठीक होने 3से 4सप्ताह लगते हैं।इसके बाद रोगी का उपचार प्राकृतिक चिकित्सा से करना चाहिए।

12,टाइफाईड रोग से पीड़ित रोगी को सूर्यतप्त नीली बोतल का पानी हर 2-2 घंटे पर पिलाने से उसका ज्वर शीघ्र ही ठीक हो जाता है और टाइफाईड रोग भी ठीक होने लगता है।


13, सीत्कारी प्राणायाम, शीतली प्राणायाम, शवासन तथा ओमध्यान करने से भी रोगी को लाभ मिलता है।


15,टाइफाईड रोग से पीड़ित व्यक्ति को ठंडा स्पंज स्नान या ठंडा फ्रिक्शन स्नान कराने से उसके शरीर में स्फूर्ति उत्पन्न होती है और उसका ज्वर भी कम होने लगता है।


16,रोगी की रीढ़ की हड्डी पर बर्फ पानी की शीतल पट्टी रखने से ज्वर कम हो जाता है टाइफाईड रोग ठीक होने लगता है।

17,टाइफाईड रोग से पीड़ित रोगी को खुला हवादार कक्ष रहने के लिए, हल्के ढीले वस्त्र पहनने के लिए तथा पर्याप्त विश्राम करना बहुत आवश्यक है।


18,जब रोगी व्यक्ति का ज्वर उतर जाता है और जीभ की श्वेत मलिनता कम हो जाती है तो उसे फलों का ताजा रस पीकर उपवास तोड़ देना चाहिए और इसके बाद फलों के ताजे रस को कच्चे सलाद, अंकुरित दालों व सूप का सेवन करना चाहिए ऐसा करने से उसे पुनः ज्वर नहीं होता है और टाइफाईड रोग संपूर्णता से ठीक हो जाता है।कॉर्नेल यूनिवर्सिटी की एक स्टडी में बताया गया कि टमाटर का जूस साल्मोनेला टाइफी नाम के बैक्टीरिया को समाप्त कर सकता है। यह बैक्टीरिया ही टाइफाइड ज्वर का कारण बनता है। साथ ही टमाटर का जूस पाचन तंत्र और मूत्र वा मूत्रमार्ग में होने वाले संक्रमण को भी समाप्त कर सकता है।


19,टाइफाईड रोग से पीड़ित रोगी को संतरे का रस दिन में 2 बार पीना चाहिए इससे ज्वर शीघ्र ही ठीक हो जाता है।

20,टाइफाईड रोग से पीड़ित रोगी को तुलसी के पत्तों का सेवन कराने से अधिक लाभ मिलता है।


21,तुलसी की पत्तियों को उबालकर उसमें कालीमिर्च पाउडर और थोड़ी चीनी मिलाकर पीने से टाइफाईड रोग में लाभ मिलता है।

22,टाइफाईड रोग से पीड़ित रोगी को दूध नहीं पीना चाहिए लेकिन यदि उसे दूध पीने की इच्छा हो तो दूध में पानी मिलाकर हल्का कर लेना चाहिए तथा इसमें 1 चम्मच मधु मिलाकर पीना चाहिए। इसमें चीनी बिल्कुल भी नहीं मिलानी चाहिए।

23,टाइफाईड रोग से पीड़ित रोगी को अपने चारों ओर स्वच्छता पर विशेष ध्यान देना चाहिए और प्राकृतिक चिकित्सा से अपना उपचार कराना चाहिए।


24,टाइफाईड रोग से पीड़ित रोगी का ज्वर 3 दिन तक सामान्य स्थिति में रहे तो रोगी को पानी मिलाकर दूध पिलाना चाहिए या छैने का पानी तथा डबलरोटी के छोटे-छोटे टुकड़े को खिलाना चाहिए और रोगी को पूर्ण रूप से विश्राम करने के लिए कहना चाहिए। इस प्रकार से अपना उपचार प्राकृतिक चिकित्सा से कराने से रोगी कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।

25, #पथ्य क्या करें:#

केला और पपीता,सभी कच्ची सब्जियां और फल का सेवन अच्छी प्रकार से स्वच्छ करके करें। इसके अतिरिक्त आपको तले हुए भोजन नहीं करना चाहिए, जैसे- समोसे, पकोडे, लड्डू और हलवा आदि। चटकदार और मसाले से परिपूर्ण भोजन जैसे- अचार, चटनी और तीव्र गन्ध वाली सब्जियों जैसे गोभी, शलगम, शिमला मिर्च, मूली, प्याज और कच्चे लहसुन का सेवन ना करे।

#डॉ त्रिभुवन नाथ श्रीवास्तव#

गुरुवार, 22 अगस्त 2024

देशी गाय के गव्यों से बनाए और धन कमाए।

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 यहां ईश्वर सृष्टि कामधेनु गौशाला में ये स्वास्थ्य वर्धक और रोगनाशक कुछ औषधियां बनाई जाती हैं तथा यहां का देशी गाय का घी पूर्ण वैदिक प्रकार से निर्मित होता है। इनका प्रयोग करें और रोग भगाएं।

शून्य समाधि और प्राप्ति का उपाय

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 🪷 शून्य समाधि 🪷

शून्य समाधि एक उच्च स्तर की आध्यात्मिक अवस्था है, जिसमें आत्मा और परमात्मा के बीच का अंतर समाप्त हो जाता है। यह एक ऐसी अवस्था है, जहां व्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत पहचान समाप्त हो जाती है और वह परमात्मा में एकता महसूस करता है।

शून्य समाधि के दौरान, व्यक्ति का मन और आत्मा एक साथ मिल जाते हैं और व्यक्ति को एक उच्च स्तर की शांति और संतुष्टि का अनुभव होता है। यह अवस्था व्यक्ति को अपने असली स्वरूप को समझने और परमात्मा के साथ एकता का अनुभव करने में मदद करती है।



शून्य समाधि के कुछ लक्षण हैं:

- आत्म-जागरूकता का समाप्ति।

- व्यक्तिगत पहचान का समाप्ति।

- परमात्मा के साथ एकता का अनुभव।

- उच्च स्तर की शांति और संतुष्टि

- समय और स्थान की भावना का समाप्ति।

शून्य समाधि को प्राप्त करने के लिए, व्यक्ति को नियमित ध्यान और आध्यात्मिक अभ्यास करने की आवश्यकता होती है। यह अवस्था व्यक्ति को अपने जीवन में गहरी बदलाव लाने और परमात्मा के साथ एकता का अनुभव करने में मदद करती है।

योग से शून्य की ओर जाने का मतलब है अपने मन और शरीर को शांति और एकाग्रता की ओर ले जाना। यहाँ कुछ योग आसन और तकनीकें हैं जो आपको शून्य की ओर ले जा सकती हैं:

1.भ्रूमध्यस्थान: अपनी आंखों के बीच में ध्यान केंद्रित करें और अपने मन को शांति की ओर ले जाएं।

2. उद्धरण: अपने शरीर को सीधा रखें और अपने मन को शांति की ओर ले जाएं।

3. शवासन: अपने शरीर को आराम दें और अपने मन को शांति की ओर ले जाएं।

4. प्रत्याहार: अपने मन को बाहरी चीजों से वापस लें और अपने अंदर की ओर ध्यान केंद्रित करें।

5. ध्यान: अपने मन को एकाग्र करें और अपने अंदर की ओर ध्यान केंद्रित करें।

6. प्राणायाम: अपने सांसों को नियंत्रित करें और अपने मन को शांति की ओर ले जाएं।

7. मंत्र: एक मंत्र को गायें और अपने मन को शांति की ओर ले जाएं।

8. अंतःप्रेक्षा : अपने मन में एक शांति और शांति का स्थान देखें और अपने आप को वहां ले जाएं।

इन योग आसन और तकनीकों को करने से, आप अपने मन और शरीर को शांति और एकाग्रता की ओर ले जा सकते हैं और शून्य की ओर जा सकते हैं।

सोमवार, 19 अगस्त 2024

*चित्तौड़गढ की रानी द्वारा हुमायूं को राखी भेजने की झूठी कथा * *का तथ्यात्मक विश्लेषण*

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 *चित्तौड़गढ की रानी द्वारा हुमायूं को राखी भेजने की झूठी कथा * *का तथ्यात्मक विश्लेषण*

* *गर्म रक्त चमड़ी की गन्ध याद रखना हिंदुओं ।*

                *राखी का ऐतिहासिक झूठ*

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सन 1535 दिल्ली का शासक है बाबर का बेटा हुमायूँ .... उसके सामने देश में दो सबसे बड़ी चुनौतियां हैं , पहला अफगान शेर खाँ और दूसरा गुजरात का शासक बहादुरशाह .... पर तीन वर्ष पूर्व सन 1532 में चुनार दुर्ग पर घेरा डालने के समय शेर खाँ ने हुमायूँ का अधिपत्य स्वीकार कर लिया है और अपने बेटे को एक सेना के साथ उसकी सेवा में दे चुका है।

अफीम का नशेड़ी हुमायूं शेर खां की ओर से निश्चिन्त है । हाँ पश्चिम से बहादुर शाह का बढ़ता दबाव उसे कभी कभी विचलित करता है।हुमायूँ के व्यक्तित्व का सबसे बड़ा दोष है कि वह घोर नशेड़ी है। इसी नशे के कारण ही वह पिछले तीन वर्षों से दिल्ली में ही पड़ा हुआ है और उधर बहादुर शाह अपनी शक्ति बढ़ाता जा रहा है। वह मालवा को जीत चुका है और मेवाड़ भी उसके अधीन है। अब दरबारी अमीर, सामन्त और उलेमा हुमायूँ को धैर्य से बैठने नहीं दे रहे। बहादुर शाह की बढ़ती शक्ति से सब भयभीत हैं। अन्ततः हुमायूँ उठता है और मालवा की ओर बढ़ता है।

इस समय बहादुरशाह चित्तौड़ दुर्ग पर घेरा डाले हुए है। चित्तौड़ में किशोर राणा विक्रमादित्य के नाम पर राजमाता कर्णावती शासन कर रहीं हैं। उनके लिए यह विकट घड़ी है। सात वर्ष पूर्व खनुआ के युद्ध मे महाराणा सांगा के साथ अनेक योद्धा सरदार वीरगति प्राप्त कर चुके हैं। रानी के पास कुछ है तो विक्रमादित्य और उदयसिंह के रुप में दो अबोध बालक और एक राजपूतनी का अदम्य साहस। सैन्य बल में चित्तौड़ बहादुर शाह के समक्ष खड़ा भी नहीं हो सकता परन्तु साहसी राजपूतों ने बहादुर शाह के समक्ष शीश झुकाने से मना कर दिया है।

 इधर बहादुर शाह से उलझने को निकला हुमायूँ अब चित्तौड़ की ओर मुड़ गया है। अभी वह सारंगपुर में है तभी उसे बहादुर शाह का सन्देश मिलता है जिसमें उसने लिखा है, "चित्तौड़ के विरुद्ध मेरा यह अभियान विशुद्ध जेहाद है। जब तक मैं काफिरों के विरुद्ध जेहाद पर हूँ तब तक मुझ पर हमला गैर-इस्लामिल है। अतः हुमायूँ को चाहिए कि वह अपना अभियान रोक दे।”

हुमायूँ का बहादुर शाह से कितना भी बैर हो पर दोनों का संप्रदाय या मजहब एक है सो हुमायूँ ने बहादुर शाह के जेहाद का समर्थन किया है। अब वह सारंगपुर में ही डेरा लगा के बैठ गया है और आगे नहीं बढ़ रहा।

इधर चित्तौड़ राजमाता ने कुछ राजपूत नरेशों से सहायता मांगी है। पड़ोसी राजपूत नरेश सहायता के लिए आगे आये हैं परन्तु वे जानते हैं कि बहादुरशाह को हराना अब सम्भव नहीं। पराजय निश्चित है सो सबसे आवश्यक है चित्तौड़ के भविष्य को सुरक्षित करना। इसीलिए लिए रात के अंधेरे में बालक युवराज उदयसिंह को पन्ना धाय के साथ गुप्त मार्ग से निकाल कर बूंदी पहुँचा दिया जाता है।

अब राजपूतों के पास एकमात्र विकल्प है वह युद्ध, जो पूरे विश्व में केवल वही कर सकते हैं। शाका और जौहर…...

आठ मार्च 1535 राजपूतों ने अपना अद्भुत जौहर दिखाने की ठान ली है। सूर्योदय के साथ किले का द्वार खुलता है। पूरी राजपूत सेना माथे पर केसरिया पगड़ी बांधे निकली है। आज सूर्य भी रुक कर उनका शौर्य देखना चाहता है । आज हवाएं उन अतुल्य स्वाभिमानी योद्धाओं के चरण छूना चाहती हैं । आज धरा अपने वीर पुत्रों को हृदय से लिपटा लेना चाहती है । आज इतिहास स्वयं पर गर्व करना चाहता है । आज भारत स्वयं के भारत होने पर गर्व करना चाहता है।

इधर मृत्यु का आलिंगन करने निकले वीर राजपूत बहादुरशाह की सेना पर विद्युतगति से तलवार भाँज रहे हैं और उधर किले के अंदर महारानी कर्णावती के पीछे असंख्य देवियाँ मुंह में गंगाजल और तुलसी पत्र लिए अग्निकुंड में समा रही हैं। यह जौहर है। वह जौहर जो केवल राजपूत देवियाँ जानती हैं। वह जौहर जिसके कारण भारत अब भी भारत है।

किले के बाहर गर्म रक्त की गंध फैल गयी है और किले के अंदर अग्नि में समाहित होती क्षत्राणियों की देहों की....!

पूरा वायुमंडल उठा है और घृणा से नाक सिकोड़ कर खड़ी प्रकृति जैसे चीख कर कह रही है- “भारत की आने वाली पीढ़ियों! इस दिन को स्मरण रखना और स्मरण रखना इस गन्ध को। जीवित जलती अपनी माताओं के देह की गंध जब तक तुम्हें सुमिरित कराती रहेगी, तुम्हारी सभ्यता जियेगी। जिस दिन यह गन्ध भूल जाओगे तुम्हें फारस होने में देर नहीं लगेंगी…”

दो घण्टे तक चले युद्ध में स्वयं से चार गुने शत्रुओं को मार कर राजपूतों ने वीरगति पाई है और अंदर किले में असंख्य देवियों ने अपनी राख से भारत के मस्तक पर स्वाभिमान का टीका लगाया है। युद्ध समाप्त हो चुका। राजपूतों ने अपनी सभ्यता दिखा दी । अब बहादुरशाह अपनी सभ्यता दिखायेगा।

अगले तीन दिन तक बहादुर शाह की सेना चित्तौड़ दुर्ग को लुटती रही। किले के अंदर असैनिक कार्य करने वाले लुहार, कुम्हार, पशुपालक, व्यवसायी इत्यादि पकड़ पकड़ कर काटे गए। उनकी स्त्रियों को लूटा गया। उनके बच्चों को भाले की नोक पर टांग कर खेल खेला गया। चित्तौड़ को तहस नहस कर दिया गया,

और उधर सारंगपुर में बैठा बाबर का बेटा हुमायूँ इस जेहाद को चुपचाप देखता रहा और प्रसन्न होता रहा।

 युग बीत गए पर भारत की धरती राजमाता कर्णावती के जलते शरीर की गंध नहीं भूली। 👉🛕👉आगे कुछ गद्दारों ने इस गन्ध को भुलाने के लिए कथा गढ़ी- “राजमाता कर्णावती ने हुमायूँ के पास राखी भेज कर सहायता मांगी थी।”👇🇮🇳🪷

*अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए मुँह में तुलसी दल ले कर अग्निकुंड में उतर जाने वाली देवियाँ अपने पति के हत्यारे के बेटे से सहायता नहीं मांगती पार्थ! राखी की इस झूठी कथा के षड्यंत्र में कभी मत उलझना।*


🚩🏹⚔️🇮🇳

गुरुवार, 15 अगस्त 2024

वेदों का अध्ययन क्यों करें?

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 वेदों का अध्ययन  इस युग मे भी क्यों आवश्यक? वेदों के अध्ययन की क्या आवश्यकता है? ज़ब गीता, भागवत के आधार पर हर प्रश्न का उत्तर ही नहीं, उनका समाधान भी आज सरल, सहज रूप से उपलब्ध है!

श्री कृष्ण ने 5200 वर्ष पूर्व महाभारत के युद्ध के रणक्षेत्र मे अर्जुन को भगवदगीता का ज्ञान दिया, क्या उस समय वेद नहीं थे?

क्या, भगवान वेदों को नहीं जानते थे?

जानते थे तो गीता के ज्ञान की क्या आवश्यकता थी? वेद का ज्ञान ही दे देते! कि हे, अर्जुन वेद का अध्ययन करो और अपने कर्तव्य का पालन करो!

लेकिन, भगवान ने ऐसा नहीं किया, क्योंकि  भगवान जानते थे कि कलियुग प्रारम्भ होने जा रहा है और कलियुग मे लोग वेद नहीं समझ सकतें!

क्यों नहीं समझ सकतें?

इसके तीन कारण है -

1. कलियुग मे व्यक्ति की आयु कम ही है! वेद सतयुग के लिए अनुकूल थे,ज़ब व्यक्ति की आयु 1-1 लाख वर्ष हुवा करती थी! तब वेदों के अध्ययन के लिए, उन्हें समझने के लिए, पर्याप्त समय मिल जाता था।

लेकिन, कलियुग मे अधिक से अधिक 100 वर्ष की ही आयु मनुष्य की रह गई है! इस छोटी सी आयु मे वेदों का सांगोपांग अध्ययन संभव नहीं!

2. व्यक्ति की स्मृति ( स्मरण शक्ति) अधिक ही कम रह जायेगी, जो वेदों के अध्ययन  के लिए इतनी कम स्मृति से समझ पाना संभव नहीं है!

3. कलियुग मे लोग छोटी छोटी बातों के लिए लड़ते रहेंगे, उनका मन सदैव विचलित रहेगा, विक्षुब्ध रहेगा। ऐसे वातावरण मे व्यक्ति वेदों का अध्ययन  नहीं कर पायेगा!

इस कारण भगवान ने दया कर, वेदों का सार बताया, गीता के रूप मे।

जो वो भी 15 वीं शताब्दी के आते आते सामान्य व्यक्ति तो क्या, विद्वानों के लिए भी गीता का अध्ययन  असम्भव होने लगा, तब भगवान ने दया करके  मानव जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य,आत्म साक्षात्कार के लिए अत्यधिक सरल साधन प्रदान किया, हरे कृष्ण महामंत्र के जप एवं कीर्तन करने का, स्वयं अपने ही भक्त के रूप ( चैतन्य महाप्रभु के रूप मे) अवतार लेकर , इसका व्यवहारिक प्रदर्शन भी किया, जिसे युग धर्म कहा जाता है! और  इस युग धर्म के विस्तार के लिए श्रीलप्रभुपाद ने इसे पूरे विश्व मे प्रसार प्रचार  किया! और जो लोग धर्म का दर्शन समझकर, आश्वस्त होना चाहते थे, उनको  श्रीमदभागवत गीता की सरल ,वैज्ञानिक ढंग से, स्पष्ट टीकाएँ लिखकर प्रस्तुत की! केवल इनके अध्ययन से एवं  हरे कृष्ण महामंत्र के नियमित जप एवं कीर्तन से व्यक्ति, मानव जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि, कृष्ण प्रेम, प्राप्त कर सकता है, तो वेदों को पढ़ने की कहा  आवश्यकता है? जो समझ ही नहीं आये!

हाँ, यदि अपवाद स्वरूप कोई ऐसा तीव्र बुद्धि का भाग्यशाली व्यक्ति हो, जो आज की कठिन परिस्थितियों  में वेदों का अध्ययन  कर सकने में समर्थ ही हो, और साथ साथ वेदों के प्रयोजन का मूल उद्देश्य आज के युग की सामान्य जनता को समझा सकता है तो अवश्य ही उसे यह सर्वजन हिताय कार्य करने में  मानवता के व्यापक हितों के लिए विलम्ब नहीं  करना चाहिए!

कुल वेद संख्या में चार हैं, जिनका संक्षिप्त परिचय 👇 इस प्रकार है:

हिंदू धर्म में चार प्रमुख वेद हैं: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। प्रत्येक वेद में श्लोकों की संख्या और उनके ऋषि इस प्रकार हैं:


*ऋग्वेद*


- श्लोकों की संख्या: 10,589

- ऋषि: लगभग 400 ऋषि, जिनमें से प्रमुख हैं:

    - वसिष्ठ

    - विश्वामित्र

    - कण्व

    - माधुच्छंदा

    - गृत्समद


*यजुर्वेद*


- श्लोकों की संख्या: 1,975

- ऋषि:

    - याज्ञवल्क्य

    - विश्वामित्र

    - वामदेव

    - अत्रि

    - भारद्वाज


*सामवेद*


- श्लोकों की संख्या: 1,811

- ऋषि:

    - जैमिनी

    - व्यास

    - कण्व

    - माधुच्छंदा

    - शाण्डिल्य


*अथर्ववेद*


- श्लोकों की संख्या: 5,976

- ऋषि:

    - अंगिरा

    - भृगु

    - अत्रि

    - कुश्रीव

    - व्याघ्रपद


यह ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि वेदों की श्लोक संख्या और ऋषियों के नाम विभिन्न संस्करणों और सम्प्रदायों में भिन्न हो सकते हैं।

इन सभी वेदों में मुख्य विषय ये बताए गए हैं:

सनातन वैदिक धर्म में चार प्रमुख वेद हैं, जिनमें से प्रत्येक वेद के विषय इस प्रकार हैं:


*ऋग्वेद*


- देवताओं की स्तुति और साधना।

- प्राकृतिक शक्तियों की साधना।

- धार्मिक अनुष्ठानों का वर्णन।

- जीवन के उद्देश्य और लक्ष्यों का वर्णन।

- आध्यात्मिक ज्ञान और दर्शन।


*यजुर्वेद*


- यज्ञ और हवन की विधि।

- धार्मिक अनुष्ठानों का वर्णन।

- देवताओं की स्तुति और साधना।

- जीवन के उद्देश्य और लक्ष्यों का वर्णन।

- कर्म और धर्म का महत्व।


*सामवेद*


- संगीत और गायन की विधि।

- धार्मिक अनुष्ठानों में संगीत का महत्व।

- देवताओं की स्तुति और साधना।

- आध्यात्मिक ज्ञान और दर्शन।

- जीवन के उद्देश्य और लक्ष्यों का वर्णन।


*अथर्ववेद*


- तन्त्र मंत्र और आध्यात्मिक शक्तियों का वर्णन।

- आयुर्वेद और चिकित्सा का वर्णन, इसी को उपवेद भी कहा गया है।

- धार्मिक अनुष्ठानों का वर्णन।

- जीवन के उद्देश्य और लक्ष्यों का वर्णन।

- आध्यात्मिक ज्ञान और दर्शन।


यह ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि वेदों के विषय विभिन्न संस्करणों और सम्प्रदायों में भिन्न हो सकते हैं।

आशा है आप को यह संक्षिप्त सार अवश्य लाभान्वित करेगा।

बुधवार, 14 अगस्त 2024

दो व्यक्तित्व

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🪷रामायण में दो ऐसे भी व्यक्तित्व थे... एक विभीषण और एक कैकई ...; विभीषण रावण के राज्य में रहता था ... तो भी वह नहीं बिगड़ा ...; कैकई राम के राज्य में रहती थी ... लेकिन वो भी नहीं सुधरी .. ; सुधारना और बिगड़ना केवल मनुष्य की सोच और स्वभाव पर निर्भर करता है ...!🪷    

🪷मन में शांति चाहिए तो ... ध्यान केवल उन पर रखो जिसको प्राप्त कर लिया है ... उन पर नहीं जिनको खो दिया है ... !!🌷                           🪷🪷 जैसी प्रभु की ईच्छा 🪷🪷

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बुधवार, 7 अगस्त 2024

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शनिवार, 3 अगस्त 2024

धर्म क्या है?

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 🪷🛕🪷धर्म क्या है ? - धर्म किसे कहते हैं  ??


धर्म एक संस्कृत शब्द है। धर्म का अर्थ बहुत व्यापक है।  जो धारण करने योग्य है, वही धर्म कहलाता है।जैसे हम किसी नियम को, व्रत को धारण करते हैं इत्यादि। इस अनुसार धर्म का अर्थ है कि जो सबको धारण किए हुए है अर्थात "धारयति- इति धर्म:"! अर्थात जो सबको संभाले हुए है वे धर्म ।धर्म के बिना यह सारा संसार सारी सृष्टी चल ही नही सकती जैसे पृथ्वी समस्त प्राणियों को धारण किए हुए है  यह पृथ्वी का धर्म / व्रत है। हर वस्तु का धर्म गुण होता है जैसे पानी का धर्म शीतलता। अग्नि का धर्म जलना और प्रकाश करना। पशु पक्षियों का धर्म निश्चित है लेकिन मनुष्य धर्म गुण  अपनाने में स्वतंत्र है। तभी वे मनुष्य से अमनुषय या पशु भी बन जाता है।धर्म वे नियम या कर्म है जिस पर चलना पुण्य  और जिन पर न चलना पाप कहलाता है।  हर व्यक्ति पूर्व जन्म के संस्कारों से या जन्म के बाद शिक्षा से धर्म और अधर्म के गुण प्राप्त करता है। अगर वे जीवन में  मनुष्यता के गुण लेकर चलता है तो उसे धार्मिक व्यक्ति कह सकते हैं। ईश्वर ने जो हर मनुष्य के हृदय में मनुष्यता के गुण दिये है उन गुणों पर चलने और अपनाने से ही  व्यक्ति को धार्मिक कहा जा सकता है। वास्तव में धर्म आत्म उन्नती व आत्म कल्याण का एक मात्र पवित्र मार्ग है। उससे हट कर सभी क्रिया कलाप पाखण्ड है या सम्प्रदाय कहलाते है धर्म नहीं। जिसका कोई लाभ नहीं। 

मनुष्य के क्या गुण है ? उसके लिए क्या धारण करने योग्य है ? जिससे वे आपना लोक व परलोक सुधार सकता है और मनुष्य कहला सकता है ? वे हैं धैर्य रखना दया करना क्षमा करना सत्यता मन और कर्मो में क्रोध न करना चोरी न करना इन्द्रियों पर कंट्रोल करना शारीरिक मानसिक स्वच्छता ज्ञान बढ़ाना यह सब धर्म है धर्म के नियम है जो इन को धारण करने से वे धार्मिक कहलाता है।

बाहरी चिन्ह मनुष्य को धार्मिक नहीं बनाते अपितु आत्मिक व मानसिक गुण व्यक्ति को धार्मिक बनाते है। तिलक,टीका,भगवा,टोपी, भस्म, पगड़ी  लगा लेने से कोई धर्मात्मा या धार्मिक नहीं बनता। धर्म सभी काल में सभी स्थान पर सभी व्यक्तियों के लिए  एक ही है क्योंकि धर्म के नियम सत्य तर्क विज्ञान और अटल सृष्टि नियमों पर आधारित होते है ।


धर्म का कोई नाम नही होता जहाँ नाम है वे धर्म नही सम्प्रदाय है। धर्म की परिभाषा इस प्रकार भी कि गई है, ***

"जो पक्ष पात रहित न्याय सत्य का ग्रहण, असत्य का सर्वथा परित्याग रूप आचार व्यवहार हैं उसी का नाम धर्म और उससे विपरीत का अधर्म हैं।"

जो ईश्वर आज्ञा के विरुद्ध नहीं हैं और आत्मा की पुकार को सुन कर कार्य करना उसको ही धर्म मानना चाहिए। जो व्यवहार स्वयं को प्रिय नही वे दुसरो से भी न करना धर्म है। इन बातों को जो व्यक्ति मत संघ संस्था नहीं मानती वे सभी मज़हब या सम्प्रदाय कहलाते है  जिनके अपने पृथक पृथक नियम भिन्न भिन्न शिक्षाएँ व सिद्धांत है। किसी विशेष स्थान पर जाना और माथा टेकना पूजा या नाम रटना धर्म नही। 

 महार्षि मनु ने धर्म के दस लक्ष्मण बताऐ हैं जिन को अपना कर ही मनुष्य धार्मिक कहला सकता है, जो कि इस प्रकार है :- 

*"धृति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचम् इन्द्रियनिग्रह धी 

   विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्।* "  

1.धृति-सुख,दुःख ,हानि,लाभ,मान,अपमान मे धैर्य रखना

2.क्षमा- शरीर मे सामर्थ्य होने पर भी अभद्रों का प्रतिकार न करना या प्रतिशोध न लेना क्षमा है।

3.दम-मन मे अच्छी बातो का चिंतन करना अनुचित बातों को दबाना  या हटाना। 

4.अस्तेय-बिना दूसरे की आज्ञाके कोई वस्तु न लेना चोरी न करना। 

5.शौच-शरीर की आत्मिक और आंतरिक और बाह्य शारीरिक शुद्धि रखना।

6-इन्द्रियनिग्रह: हाथ,पांव,आंख,मुख,नाक आदिको अच्छे कार्यो मे लगाना।इन्द्रियों को संयम में रखना। 

7.धी-बुद्धि बढाने हेतू प्रयत्न करना।

8.विद्या-ईश्वर द्वारा बनाये गए प्रत्येक पदार्थ का ज्ञान प्राप्त करना तथा उनसे उपयोग लेना

9.सत्य-जो हम जानते है उसको वैसा ही अपने द्वारा कहना मानना सत्य कहलाता है। सदैव सत्य ही बोलना। 

10.अक्रोध-इच्छा से उत्पन्न क्रोध का त्याग करना ही अक्रोध है।

महर्षि पतंजलि ने अनुशासन को धर्म कहा जो योग द्वारा प्रप्त किया जा सकता है। 

महर्षि पतंजलि ने योग को 'चित्त की वृत्तियों के निरोध' (योगः चित्तवृत्तिनिरोधः) के रूप में परिभाषित किया है। उन्होंने 'योगसूत्र' नाम से योगसूत्रों का एक संकलन किया है, जिसमें उन्होंने पूर्ण कल्याण तथा शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शुद्धि के लिए आठ अंगों वाले योग का एक मार्ग विस्तार से बताया है। अष्टांग योग (आठ अंगों वाला योग), यह आठ आयामों वाला मार्ग है। योग के ये आठ अंग हैं:-

१) यम, २) नियम, ३) आसन, ४) प्राणायाम, ५) प्रत्याहार, ६) धारणा ७) ध्यान ८) समाधि

यम:- (अर्थात् वाह्य विश्व का अनुशासन)

1. अहिंसा – शब्दों से, विचारों से और कर्मों से किसी को हानि नहीं पहुँचाना।

2.  सत्य – विचारों में सत्यता, परम-सत्य में स्थित रहना।

3.  अस्तेय – चोर-प्रवृति का न होना।

4.  ब्रह्मचर्य – दो अर्थ हैं:

* चेतना को ब्रह्म के ज्ञान में स्थिर करना।

* सभी इन्द्रिय-जनित सुखों में संयम बरतना।

5. अपरिग्रह –  आवश्यकता से अधिक संचय नहीं करना।

2. नियम:-(अर्थात् आंतरिक विश्व का अनुशासन)

1. शौच – शरीर और मन की आंतरिक और बाह्य शुद्धि।

2. संतोष =अपनी स्थिति में सदा सन्तुष्ट रहना।

3.  तप – स्वयं से अनुशाषित रहना।

4.  स्वाध्याय – आत्मचिंतन करना।

5.  ईश्वर-प्रणिधान – ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण, पूर्ण श्रद्धा     

यह पांच यम और पाँच  नियम ही धर्म की यात्रा का आरम्भ है। 

धर्म मूल रूप में संस्कृत शब्द है। इंग्लिश की पुस्तकों में धर्म का अर्थ  परिभाषा के रूप में नही मिलता। इंग्लिश में Man का अर्थ भी नही है।धर्म को इंग्लिश में विश्वास / belief अर्थात पृथक पृथक विश्वासों को धर्म कहा है,वहाँ एक व स्पष्ट परिभाषा नही मिलती । मानव के लिये इंग्लिश में अर्थ human  लिखा और human का अर्थ शारीरिक ढाँचा। जबकि उनके अनुसार बन्दर आदि भी मानव कहलाएँगे। 

जबकि वैदिक ग्रंथों में मानव को “मनुर्भव “ कहा गया है अर्थात जिसमें मनुष्यता के गुण हो वही मनुष्य कहलाने योग्य है। मानव कि परिभाषा “जो प्राणी विचार करके उचित और अनुचित को सोच विचार कर कार्य करता है वे मनुष्य कहलाता है  “ जो इसके विपरित कार्य करेगा वे पशु कहलायेगा। जिस समाज में हम रह रहे हैं वे धर्म  की सिद्धांतो पर ही चल रहा है और जो गिरावट देख रहे हैं वे धर्म पर न चलने वाले सम्प्रदायों के कारण हुई जिन्होंने अपने अपने नियम व सिद्धांत गढ़ लिए और मनुष्य जाति को गुटों में बाँट दिया ।धर्म और सम्प्रदाय को एक मानने से ही कुछ लोग धर्म को  रोग कह देते है।  

महर्षि दयानन्द सरस्वती के अनुसार *मनुष्य किसे कहते हैं!*

मनुष्य उसी को कहना जो मननशील होकर अपनी आत्मा के समान अन्यों के सुख – दुख और हानि – लाभ को समझे । अन्यायकारी बलवान से न डरे और धर्मात्मा निर्बल से भी डरता रहे । इतना ही नहीं किन्तु अपने सर्व सामर्थ्य से धर्मात्माओं – कि चाहे वे महाअनाथ , निर्बल क्यों न हों – उनकी रक्षा , उन्नति , प्रियाचरण और अधर्मी चाहे चक्रवर्ती महाबलवान और गुणवान भी हो तथापि उसका नाश , अवनति और अप्रियाचरण सदा किया करे अर्थात जहां तक हो सके वहां तक अन्यायकारियों के बल की हानि और न्यायकारियों के बल की उन्नति सर्वदा किया करें । इस काम में चाहे कितना ही दारुण दुख प्राप्त हो , चाहे प्राण भी भले ही जावें परन्तु इस मनुष्यरुप धर्म से पृथक कभी न होवे । डॉ त्रिभुवन नाथ श्रीवास्तव, पूर्व प्राचार्य।

केला और उसके लाभ

 केले के गुणकारी लाभ अधिक ही हैं! 🙏 यह एक ऐसा फल है जो हमारे शरीर को कई प्रकार से लाभ पहुंचाता है। आइए, इसके लाभों को विस्तार से जानते ह...