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🎊 *संत ज्ञानेश्वरी गीता*🎊
अध्याय-2 *:#सांख्य योग, श्रीमद् भागवत गीता से।।
सांख्य योग:*
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*संजय उवाच*
*तं तथा कृपयाविष्टं अश्रुपूर्णा कुलेक्षणणम्।*
*विषीदन्तमिदं वाक्यं उवाच मधुसूदन:।।1।।*
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*तदोपरांत संजय ने राजा धृतराष्ट्र से कहा -महाराज ! सुने ।अर्जुन वहां से शोकाकुल होकर रोने लगा ।वहां कुल के सभी लोगों को देखकर उसके मन में महान मोह उत्पन्न हो गया और उसका मन उसी प्रकार द्रवित हो गया, जिस प्रकार जल में नमक घुल जाता है या हवा चलने से बादल छिन्न-भिन्न हो जाते हैं।*
*वह धैर्यवान था फिर भी उसका हृदय द्रवित हो गया।दयाभाव से ओतप्रोत अर्जुन कीचड़ में उलझे राजहंस की भांति म्लान दीखने लगा।*
*उसे इस तरह मोहग्रस्त देखकर भगवान कृष्ण उससे इसप्रकार कहने लगे।*
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*श्री भगवानुवाच*
*कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।*
*अनार्यजुष्टं अस्वर्ग्यं अकीर्तिकरं अर्जुन।।2।।*
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*श्री भगवान बोले हे- अर्जुन! थोड़ा सोचो की इस समरांगण में क्या तुम्हारा ऐसा करना और कहना शोभनीय है ?पहले इस बात का विचार करो कि तुम कौन हो और यह क्या कर रहे हो? तुम्हें आज हुआ क्या है? तुम्हें किस बात की कमी रह गई है? क्या तुम्हारा आरंभ किया हुआ कोई कार्य नष्ट हो गया है? तुम शोक किस लिए कर रहे हो? तुम तो कभी भी ऐसी- वैसी बातों की ओर ध्यान ही नहीं देते और न कभी धैर्य खोते हो ।तुम्हारा तो केवल नाम सुनकर ही अपयश कोसों दूर भाग जाता है। तुम शौर्य के भंडार हो, क्षत्रियों के शिरमौर हो।*
*तुम्हारे पराक्रम का डंका सारे त्रिभुवन में बज रहा है। तुमने युद्ध में साक्षात शंकर पर विजय प्राप्त की है और साढ़े तीन करोड़ निवात कवचों जैसे दैत्यों को जड़ से उखाड़ फेंका और चित्ररथ गंधर्वों का सामना कर उन्हें तुम्हारा यश गान गाने के लिए प्रवृत्त किया।*
*हे अर्जुन !तुम्हारे श्रेष्ठ कार्यों के विस्तार से यह त्रैलोक्य भी छोटा दिखाई देता है ।तुम्हारा पराक्रम इतना उच्च कोटि का और निर्दोष है। वही पराक्रमी, आज तुम समरांगण में अपनी वीरवृत्ति छोड़कर सिर झुकाकर बालकों की भांति रो रहे हो?हे अर्जुन! क्या कभी अंधेरा सूर्य को निगल सकता है?या कभी अमृत को मृत्यु आई है? क्या हवा बादलों से भयभीत है?क्या लकड़ी कभी अग्नि को निगल सकती है?क्या नमक ,पानी को कभी गला सकता है?क्या सांप को कभी मेंढक निगल सकता है?*
*अच्छा,यह बताओ कि क्या गीदड़ ने सिंह के साथ लड़ाई की है?ऐसी विलक्षण बातें क्या कभी संभव हुई है? लेकिन तुमने आज उन सबको सच करके दिखा दिया है, इसलिए हे अर्जुन!तुम इस मोह को अपने पास मत आने दो!मन को संभालकर उसे धीरज देकर सावधान हो जाओ।*
*तुम यह पागलपन छोड़ो। उठो और हाथ में धनुष बाण ले लो ।इस रणभूमि में तुम्हारी यह करुणा निरुपयोगी है ।अर्जुन! तुम तो सब कुछ जानते हो? तो इस समय क्यों नहीं विचार करते !जब युद्ध के लिए सभी तत्पर हो चुके हैं तब क्या युद्ध के समय दया उचित है ?तुम्हारा आज का यह व्यवहार तुम्हारी आज तक अर्जित की हुई कीर्ति को नष्ट करने वाला है तथा परमार्थ को भी बिगाड़ने वाला है।*
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*क्लैब्यं मा स्म गम: पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।*
*क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्वोत्तिष्ठ परंतप।।3।।*
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*श्री कृष्ण फिर बोले -इसलिए हे अर्जुन! तुम शोक मत करो और धैर्य धारण करो। अपने सगे- संबंधियों के सम्बन्ध में दुखी मत होओ। तुम्हारे लिए यह उचित नहीं है। तुमने आज तक जो यश प्राप्त किया है उसका इससे नाश हो जाएगा, इसलिए भाई कम से कम अब तो तुम अपने हित का विचार करो ।युद्ध के समय दीन वृत्ति से काम नहीं चलेगा। ये कौरव क्या आज ही तुम्हारे सम्बन्धी बने हैं? क्या यह बात तुम्हें इससे पहले ज्ञात नहीं थी? या तुम इन स्वगोत्रियों को पहचानते नहीं थे ? तो अब व्यर्थ ही क्यों दुखी हो रहे हो? क्या आज के युद्ध का प्रसंग तुम्हारे जीवन में नया है?*
*अरे, तुम लोगों का पारस्परिक क्लेश नित्य का है । तो आज ही यह क्या हो गया ?यह मोह तुम्हें ना जाने कैसे उत्पन्न हो गया? हे अर्जुन! नि: संदेह तुमने यह अनुचित कार्य किया है । यदि तुम इस मोह में उलझ गए तो आज तक प्राप्त की हुई कीर्ति से तो तो तुम हाथ धो ही बैठोगे, साथ ही परमार्थ से भी तुम वंचित हो जाओगे। तुम्हारे मन की यह दुर्बलता इस समय तुम्हारे लिए कल्याणकारी सिद्ध नहीं होगी। इससे तुम्हें कोई संबंध नहीं रखना चाहिए ।यह दुर्बलता क्षत्रियों के लिए संग्राम में अध:पतन ही है ।इस प्रकार दयालु भगवान अर्जुन को ठीक से समझने लगे, पूरा प्रयत्न कर रहे थे लेकिन इस पर अर्जुन ने क्या कहा ध्यान से सुनिए-*
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*कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन।*
*इषुभि: प्रतियोत्स्यामि पूर्जावरिसूदन।।4।।*
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*अर्जुन ने कहा- हे देव!इतनी सब बातें यहां कहने की कोई आवश्यकता ही नहीं है।मैं क्या कहना चाहता हूं, अल्प उसे सुनिए।इस युद्ध के सम्बन्ध में पहले आप ही विचार कीजिए।यह युद्ध ही नहीं,बल्कि विशुद्ध रूप में बड़ा पाप है।इसमें प्रवृत्त होने पर मुझे बड़ा पाप लगेगा। देखिए,मैं जानता हूं कि माता-पिता की सेवा करना तथा उन्हें सभी प्रकार से संतुष्ट रखना ही हमारा धर्म है।ऐसा होते हुए,उलटे उनको अपने हाथों से बंध कैसे कर सकता हूं?*
*देवता तथा साधु संतों को मुझे प्रणाम करना चाहिए,हो सके तो उनकी पूजा करनी चाहिए, लेकिन यह सब छोड़कर अपने ही मुंह से उनकी निंदा कैसे की जाए?उसी प्रकार हमारे ये गोत्रज एवं कुलगुरु हमारे लिए सदैव पूजनीय रहे हैं।उनमें से भीष्म तथा द्रोणाचार्य से मुझे अधिक लाभ हुआ है। भगवन्! जिनके लिए मैं स्वप्न में भी शत्रुता का भाव नहीं ला सकता, उनका यहां प्रत्यक्ष बध कैसे किया जाए?*
*अब अधोजीवित रहने में नाम की भी शोभा नहीं है। आज तक जिनसे यह विद्या प्राप्त की है, उसका उपयोग उन गुरुओं पर पर ही करना क्या हमारा कर्तव्य है? मैं अर्जुन- द्रोणाचार्य का शिष्य हूं। उन्होंने ही मुझे धनुर्विद्या सिखाई है। इस उपकार के प्रति आभार प्रकट करने के बजाय क्या मैं उनकी हत्या करूं? जिनकी कृपा प्रसाद का वर मुझे प्राप्त करना चाहिए उनसे ही मैं कृतघ्नता करूं, क्या मैं भस्मासुर हूं?*
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*गुरून हत्वा हि महानुभावांछ्रयो भोक्तुं भैक्ष्यमपहीप लोके।*
*हत्वार्थ कामांस्तु गुरूनिहैव भुंजीय भोगान् रुधिरप्रतिग्धान्।।5।।*
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*अर्जुन ने आगे कहा -भगवन !सुना है कि समुद्र बहुत गंभीर है लेकिन इसके विपरीत कि उसकी गंभीरता भी नाम मात्र की है, लेकिन आचार्य द्रोण की ऐस विलक्षण है कि उससे कभी क्षोभ होता ही नहीं।*
*प्रेम -भाव का विचार करते समय माता का नाम मुख्य रूप से सामने आना उचित है, लेकिन द्रोणाचार्य तो प्रत्यक्ष प्रेम ही हैं। करुणा का उद्भव इन्हीं से हुआ है ।यह सभी गुणों के भंडार हैं ।उन्हें विद्या का आसीम सागर ही कहना उचित है।* अर्जुन ने कहा- इन आचार्य का बहुत अधिक महत्व है और इनकी हम लोगों पर विशेष कृपा भी है। अब आप ही बताएं की क्या हम लोग उनकी हत्या करने का विचार भी कभी मन में ला सकते हैं ।यदि मेरे प्राण चले जाएं तब भी मुझे यह विचार कभी अच्छा नहीं लग सकता कि पहले तो युद्ध में मैं ऐसे लोगों की हत्या करूं और राज्य के सुखों को भोगूं।*
*यदि मैं समझू कि सुख -भोगों का महत्व इन आचार्य से बढ़कर है तो विचार इतना भीषण है कि मुझे तो ये सुख भोग दूर ही रहें तो अच्छा है ।इससे अच्छा तो भीख मांग कर निर्वाह कर लेना उचित है, वरन् देश छोड़कर गुफाओं में रहना अच्छा है ।लेकिन इन पर शस्त्र उठाना अनुचित है।*
*हे प्रभु! जिन पहाड़ों पर हाल ही में पानी चढ़ा है उन वनों से उनके हृदयों पर प्रहार करना तब उनके रक्त से सैन भोग प्राप्त करना ऐसे भोग को लेकर कोई क्या करें ऐसा भोग क्या आनंददायी है?इसीलिए यह विचार मुझे नहीं पता भाता।*
*अर्जुन ने तब ये बातें कहकर श्री कृष्ण से पूछा - ये सब बातें आप समझ गए न?*
*उसे अपने मन में इस बात का विश्वास नहीं होता था कि श्रीकृष्ण ने मेरी ये सब बातें ध्यान से सुनी हैं।यह बात ध्यान में आते ही अर्जुन मन में घबराया और पूछा-भगवन्! आप मेरी बातों पर अल्पत:भी ध्यान नहीं देते,इसका क्या कारण है?*

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