डायरेक्टलिंक_3 प्रत्यक्ष यूआरएल https://www.cpmrevenuegate.com/s9z8i5rpd?key=0fff061e5a7ce1a91ea39fb61ca61812 डायरेक्टलिंक_1 प्रत्यक्ष यूआरएल https://www.cpmrevenuegate.com/vy0q8dnhx?key=096a4d6815ce7ed05c0ac0addf282624 डायरेक्टलिंक_2 प्रत्यक्ष यूआरएल https://www.cpmrevenuegate.com/h00w82fj?key=

शनिवार, 2 नवंबर 2024

#AI स्टोरी क्रिएटर या #ऑटोमेटेड स्टोरी टूल्स


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 नीचे दिए जा रहे कुछ विशेष फ्री टूल्स हैं, जिनका उपयोग कर आप अपने लेख आदि सामग्री को नियमित अद्यतन या अपडेट करते रह सकते हैं। इनकी अन्य और विशेषताएं निम्नलिखित हैं:H


HTML कोड अच्छा लग रहा है!


यह एक आधारभूत HTML पेज की संरचना है, जिसमें निम्नलिखित तत्व हैं:


- `html` और `head` टैग: पेज की मूल संरचना को परिभाषित करते हैं।

- `meta` टैग: पेज के चरित्र एन्कोडिंग और व्यूवपोर्ट को परिभाषित करते हैं।

- `title` टैग: पेज का शीर्षक निर्धारित करता है।

- `script` टैग: jQuery लाइब्रेरी को सम्मिलित करता है।

- `style` टैग: पेज के लिए CSS शैली निर्धारित करता है।


आपके CSS में `.regenerateIcon` क्लास के लिए शैली निर्धारित की गई है, जो एक रीजेनरेट आइकन के लिए हो सकती है।


अब आप इस पेज में अपनी AI स्टोरी राइटिंग टूल की सामग्री जोड़ सकते हैं, जैसे कि:


- टेक्स्ट इनपुट फ़ील्ड

- रीजेनरेट बटन

- स्टोरी आउटपुट एरिया

- अन्य आवश्यक तत्व


आपको JavaScript कोड भी लिखना होगा जो आपके टूल को कार्य करने में सहायता करेगा।

आपके AI स्टोरी राइटिंग टूल के लिए कुछ अतिरिक्त महत्वपूर्ण बातें:


1. उपयोगकर्ता अनुभव (UX): टूल का इंटरफ़ेस उपयोगकर्ता के अनुकूल और सहजता से समझने योग्य होना चाहिए।


2. AI एल्गोरिदम: टूल में उपयोग किए जाने वाले AI एल्गोरिदम की गुणवत्ता और सटीकता महत्वपूर्ण है।


3. डेटा सुरक्षा: टूल में उपयोग किए जाने वाले डेटा की सुरक्षा और गोपनीयता महत्वपूर्ण है।


4. व्यक्तिगतीकरण: टूल में उपयोगकर्ता के पसंदीदा विषय, शैली, और भाषा के आधार पर व्यक्तिगत सुझाव देने की क्षमता।


1. सहयोग: टूल में अन्य उपयोगकर्ताओं के साथ सहयोग करने की क्षमता।


2. मोबाइल अनुकूलता: टूल मोबाइल डिवाइसेस पर भी  सहजता से काम करना चाहिए।


1. अद्यतन और समर्थन: टूल के लिए नियमित अद्यतन और तकनीकी समर्थन महत्वपूर्ण है।


2. उपयोगकर्ता प्रतिक्रिया: टूल में उपयोगकर्ता प्रतिक्रिया और रेटिंग प्रणाली सम्मिलित करना उपयोगी हो सकता है।


इन बातों पर ध्यान देकर, आप अपने AI स्टोरी राइटिंग टूल को और भी प्रभावी और उपयोगकर्ता-मित्री बना सकते हैं।


उपयोगकर्ता मित्री (User-Friendly) का अर्थ है कि कोई प्रोडक्ट, सॉफ्टवेयर, या वेबसाइट उपयोगकर्ता के लिए आसानी से समझने योग्य और उपयोग करने योग्य हो। इसका उद्देश्य उपयोगकर्ता को अपने लक्ष्य तक पहुँचने में मदद करना है, बिना किसी परेशानी या भ्रम के।


उपयोगकर्ता मित्री के कुछ मुख्य तत्व हैं:


1. सरल और स्पष्ट इंटरफ़ेस

2. आसान नेविगेशन

3. स्पष्ट और समझने योग्य भाषा

4. उपयोगकर्ता के लिए सहायक सुझाव और टिप्स

5. त्रुटि संदेशों की स्पष्टता

6. उपयोगकर्ता के लिए फीडबैक की सुविधा

7. अनुकूलन की सुविधा

8. सहायक दस्तावेज और ट्यूटोरियल


उपयोगकर्ता मित्री के फायदे हैं:


1. उपयोगकर्ता का समय बचता है

2. उपयोगकर्ता की संतुष्टि बढ़ती है

3. उपयोगकर्ता की गलतियाँ कम होती हैं

4. उपयोगकर्ता का अनुभव बेहतर होता है

5. उपयोगकर्ता की वफादारी बढ़ती है


उपयोगकर्ता मित्री :

इसे बढ़ावा देने के लिए, आप निम्नलिखित कदम उठा सकते हैं:


1. उपयोगकर्ता के विचारों को सुनें।

2. उपयोगकर्ता के लिए परीक्षण करें।

3. उपयोगकर्ता के लिए फीडबैक की सुविधा प्रदान करें।

4. उपयोगकर्ता के लिए सहायक सामग्री प्रदान करें।

5. उपयोगकर्ता के लिए नियमित अद्यतन प्रदान करें।



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<head>

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<meta content="width=device-width, initial-scale=1.0" name="viewport"></meta>

<title>AI Story Writing Tool</title>

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<style>

.regenerateIcon {

cursor: pointer;

display: inline-block;

margin-left: 10px;

font-size: 20px;

/* Adjust size as needed */

}


body {

font-family: 'Arial', 

बुधवार, 30 अक्टूबर 2024

#कायस्थ वंश क्या है और दीपावली पर्व से सम्बंध?


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🪷*धनतेरसः पावनः सदा, समृद्धिपूर्णं जीवनं प्राप्नुहि।* 

🪷*लक्ष्मीः तव गृहे वासं,  सुखं, स्वास्थ्यं च वर्धताम्।* 

यह एक सुंदर प्रार्थना है जो  धन्वंतरि जयंती या धनतेरस के अवसर पर लक्ष्मी की कृपा और समृद्धि की कामना करती है।

👉इस प्रार्थना का अर्थ है:👇

"धनतेरस सदैव पावन हो,
समृद्धि से भरपूर जीवन प्राप्त करो।"
"लक्ष्मी आपके घर में निवास करे,
सुख और स्वास्थ्य में वृद्धि हो।"

यह प्रार्थना इस पर्व की भावना को दर्शाती है, जो धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी की पूजा और आराधना का महोत्सव है।*

👉दीपावाली का पंच दिवसीय पर्व के दिनों की क्रमशः क्या विशेषताएं हैं।👇

मैं दीपावली के पंच दिवसीय पर्व के दिनों की विशेषताओं का वर्णन करता हूँ, जो सनातन वैदिक हिंदू धर्मग्रंथों और प्रमाणों पर आधारित है:

. धन्वंतरि जयंती या धनतेरस (प्रथम दिवस):

भगवान धन्वंतरि की पूजा की जाती है:
"धन्वंतरिरामो वै सूर्यस्तस्मात् भिषग्भवेत्ततः।"
- गरुड़ पुराण, अध्याय 146, श्लोक 10

- नवीनता और स्वच्छता की परंपरा है:
"नूतनं बर्तनमादाय लक्ष्मीपूजां विधाय च।"
- भाविष्य पुराण, उत्तरखंड, अध्याय 143, श्लोक 15

- कार्तिक कृष्णपक्षे की त्रयोदशी को भगवान धन्वंतरि  का अवतरण दिवस है और इसी दिन धन्वंतरि की पूजा की जाती है, जो आयुर्वेद ज्ञान के प्रवर्तक कहे गए हैं। तथाकथित व्यापारियों और ऐसे ही कुछ ज्योतिषियों की मिलीभगत से इस महान् पवित्र पर्व को सोना, चांदी, टीवी, झाड़ू, रसोई के पात्र, टीवी, फ्रिज, गाड़ी आदि की खरीद से जोड़ दिया, जो अति निन्दनीय है। कहीं भी शास्त्रों में नहीं लिखा है कि उक्त वस्तुएँ खरीदना आवश्यक है ये आपकी व्यवस्था पर निर्भर करता है।(भाविष्य पुराण, उत्तरखंड, अध्याय 143)
- इस दिन नए गृह को सर्वरूप से स्वच्छ बनाने की परंपरा है, जो लक्ष्मी की या पवित्रता की कृपा का प्रतीक है। (गरुड़ पुराण, अध्याय 146)

2. नरक चतुर्दशी या रूप चतुर्दशी (द्वितीय दिवस):

- इस दिन को छोटी दिवाली भी कहा जाता है, जिसमें भगवान कृष्ण की पूजा की जाती है। (महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 68)
- स्नान और दान का महत्व है, जो आत्मशुद्धि और पुण्य की प्राप्ति के लिए है। (स्कंदपुराण, वैष्णवखंड, कार्तिकमहात्म्य, अध्याय 10)

भगवान कृष्ण की पूजा की जाती है:

"कृष्णः कृष्णस्य देवस्य पूजयेद्यः श्रद्धया यशः।"
- महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 68, श्लोक 20

- स्नान और दान का महत्व है:
"स्नानं दानं तपश्चैव पुण्याहवाचनं तथा।"
- स्कंदपुराण, वैष्णवखंड, कार्तिकमहात्म्य, अध्याय 10, श्लोक 25

नरका एक राक्षस था जिसका उल्लेख हिंदू पुराणों में मिलता है। उसका नाम नरकासुर था और वह एक शक्तिशाली और क्रूर राक्षस था। भागवत पुराण के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण जी ने नरकासुर का वध किया था।

नरकासुर की कथा इस प्रकार है:

नरकासुर एक शक्तिशाली राक्षस था जो प्रागज्योतिषपुर में रहता था। वह बहुत क्रूर और अत्याचारी था और उसने कई राजाओं और लोगों को अत्यंत  व्यथित किया था। उसने भगवान इंद्र के राज्य को भी जीत लिया था और इंद्र की पत्नी इंद्राणी को अपने अधिकार में कर लिया था।

भगवान श्री कृष्ण जी को नरकासुर के अत्याचारों के बारे में पता चला और उन्होंने उसका वध करने का निर्णय किया। भगवान कृष्ण ने नरकासुर के साथ युद्ध किया और उसे मार डाला। नरकासुर की मृत्यु के बाद, भगवान श्री कृष्ण जी ने इंद्राणी को मुक्त कर दिया और इंद्र के राज्य को वापस कर दिया।

नरकचतुर्दशी का पर्व भगवान कृष्ण द्वारा नरकासुर के वध की स्मृति में मनाया जाता है। 
नरक चतुर्दशी को रूप चौदस भी कहा जाता है, क्योंकि इस दिन लोग अपने शरीर की शुद्धि और सौंदर्य के लिए स्नान और पूजा करते हैं। यह पर्व दीपावली से एक दिन पहले मनाया जाता है।

रूप चौदस के नाम के पीछे का कारण यह है कि इस दिन लोग अपने रूप को सुधारने और सौंदर्य बढ़ाने के लिए विशेष प्रयास करते हैं। यह दिन शरीर और आत्मा की शुद्धि के लिए विशेष महत्व रखता है।

इस दिन कुछ विशेष कार्य किए जाते हैं:

सूर्योदय से पहले स्नान करना।
शुद्ध और नए कपड़े पहनना।
पूजा और हवन करना।
दान और तर्पण करना।

रूप चौदस का उद्देश्य अपने जीवन को शुद्ध और सौंदर्य भरा बनाना है। यह पर्व हमें अपने शरीर और आत्मा की शुद्धि के लिए प्रेरित करता है और हमें एक नए और शुद्ध जीवन को परिवर्तित करने का अवसर प्रदान करता है।

3. लक्ष्मी पूजा (तृतीय दिवस):

लक्ष्मी और गणेश की पूजा की जाती है:

"लक्ष्मीं गणेशमभ्यर्च्य पूजयेद्यः श्रद्धया यशः।"
- गरुड़ पुराण, अध्याय 146, श्लोक 15

- प्रकाश और स्वच्छता की जाती है:

"प्रकाश विकीर्णन्ते न्क्रीडन्ते ये लक्ष्मीपूजायां विधाय च।"
- भाविष्य पुराण, उत्तरखंड, अध्याय 143, श्लोक 20

- इस दिन को मुख्य दीपावली के रूप में मनाया जाता है, जिसमें श्री लक्ष्मी माता जी और श्री गणेश जी की पूजा की जाती है।
 (गरुड़ पुराण, अध्याय 146)

- प्रकाश को प्रसारित करने के लिए कुछ गोले दागना, फुलझड़ी छोड़ना, शंख और अन्य वाद्य यंत्र बजाना, संगीत नृत्य करना कहा गया है, प्रदूषण फैलाने को नहीं कहा गया है, जो अज्ञान और अंधकार पर ज्ञान और प्रकाश की विजय का प्रतीक है। 
(भाविष्य पुराण, उत्तरखंड, अध्याय 143)

मुख्य दीपावली, जिसे लक्ष्मी पूजा भी कहा जाता है, सनातन हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण पर्व है। इसकी महत्ता इस प्रकार है:

 लक्ष्मी की पूजा: 

इस दिन माता श्री लक्ष्मी जी, धन और समृद्धि की देवी, की पूजा की जाती है।

. अज्ञान पर ज्ञान की विजय: 

दीपावली अज्ञान और अंधकार पर ज्ञान और प्रकाश की विजय का प्रतीक है।

. भगवान राम की विजय: 

दीपावली भगवान  श्री राम की लंका पर विजय और रावण के वध की  स्मृति में मनाई जाती है।

. भगवान श्री कृष्ण जी की विजय:

 दीपावली भगवान कृष्ण द्वारा नरकासुर के वध की स्मृति में भी मनाई जाती है।

. आत्मशुद्धि और नवीनीकरण: 

दीपावली आत्मशुद्धि और नवीनीकरण का अवसर है, जब लोग अपने जीवन में नवीनता का प्रारम्भ करते हैं।

. परिवार और समाज: 

दीपावली परिवार और समाज के साथ मिलकर मनाने का अवसर है, जिसमें लोग एक दूसरे के साथ मिलकर हर्ष मनाते हैं।

दीपावली की महत्ता हिंदू धर्म में बहुत अधिक है, और यह पर्व पूरे भारत देश और विश्व के अनेकों स्थानों में बहुत उत्साह और धूमधाम से मनाया जाता है।

4. गोवर्धन पूजा ( चतुर्थ दिवस):

इस दिन भगवान श्री कृष्ण जी की पूजा की जाती है:

"गोवर्धनपूजां कुर्यात् कृष्णस्य पूजां विधाय च।"
- महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 68, श्लोक 25

- गोवर्धन पूजा की जाती है:

"गोवर्धनमपामादाय लक्ष्मीपूजां विधाय च।"
- स्कंदपुराण, वैष्णवखंड, कार्तिकमहात्म्य, अध्याय 10, श्लोक 30

- इस दिन को अन्नकूट के रूप में भी मनाया जाता है, जिसमें भगवान श्री कृष्ण जी की पूजा की जाती है। (महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 68)

- गोवर्धन पूजा की जाती है, जो भगवान कृष्ण की विजय का प्रतीक है। (स्कंदपुराण, वैष्णवखंड, कार्तिकमहात्म्य, अध्याय 10)
गोवर्धन पूजा की परम्परा कैसे पड़ी,
गोवर्धन पूजा की परम्परा भगवान श्री कृष्ण जी की एक महत्वपूर्ण कथा से जुड़ी हुई है। यह कथा इस प्रकार है:

भगवान कृष्ण के जन्मस्थान, गोकुल में, रहने वाले लोग हर वर्ष इंद्र देवता की पूजा करते थे, जो वर्षा के देवता थे। भगवान श्री कृष्ण जी ने उनसे कहा कि इंद्र देवता की पूजा करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वे अपने क्षेत्र की रक्षा स्वयं कर सकते हैं।

इंद्र देवता को यह बात अनुचित लगी और उन्होंने गोकुल पर भारी वर्षा और बाढ़ की विभीषिका उत्पन्न कर दी। भगवान श्री कृष्ण जी ने गोवर्धन पर्वत को उठाकर गोकुल के लोगों को बचाया। सात दिन तक वर्षा होने के उपरान्त, इंद्र देवता ने अपनी त्रुटि का अनुभव किया और भगवान  श्री कृष्ण जी से क्षमा प्रार्थना मांगी।

इसके उपरान्त, भगवान श्री कृष्ण जी ने गोवर्धन पर्वत को नीचे रख दिया और गोकुल के लोगों को गोवर्धन पूजा करने का परामर्श दिया। तब से, गोवर्धन पूजा हर वर्ष दीपावली के उपरान्त मनाई जाती है, जिसमें भगवान श्री कृष्ण जी और गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाती है।

इस पूजा में अन्नकूट का भी महत्व है, जिसमें विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाए जाते हैं और भगवान कृष्ण को भोग लगाया जाता है। गोवर्धन पूजा भगवान कृष्ण की शक्ति और उनकी रक्षा की याद में मनाई जाती है।
यह घटना यह भी स्मरण कराती है कि प्रकृति का संरक्षण करो और उसका सम्मान करें क्योंकि यही पर्वत, वन ही तुम्हारे गो धन को पोषण देते हैं।

5. भैया द्विज या यमद्वितीया (पंचम दिवस):

भाई-बहन के परस्पर स्नेह का पर्व मनाया जाता है:

"भ्रातृदौजमिति प्रोक्तं यमद्वितीया तु भ्राता।"
- गरुड़ पुराण, अध्याय 146, श्लोक 25

- बहनें भाइयों की स्वस्लंथ और दीर्घ आयु की कामना करती हैं:

"भ्रातृभ्यो दीर्घायुर्भूयात् स्वस्ति ते भावयाम्यहम्।"
- भाविष्य पुराण, उत्तरखंड, अध्याय 143, श्लोक 30

- इस दिन को यम द्वितीया के रूप में भी मनाया जाता है, जिसमें भाई-बहन के प्रेम का पर्व स्वरूप मनाया जाता है, जो यमराज जी और उनकी बहन यमुना जी से जुड़ा है। जिस प्रकार यमराज जी अपनी बहन की सुरक्षा रखते हैं वैसे ही सभी भाई बहनों की सुरक्षा रखें, यह सन्देश दिया जा रहा है।(गरुड़ पुराण, अध्याय 146)
- बहनें भाइयों की दीर्घ और स्वस्थआयु की कामना करती हैं और भाइयों का तिलक किया जाता है। यही तिलक भाइयों को यम के कोप से रक्षा करता है।(भाविष्य पुराण, उत्तरखंड, अध्याय 143)

भैया द्विज का महात्म्य हिंदू धर्म में बहुत अधिक है। यह त्योहार भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को मजबूत बनाने के लिए मनाया जाता है। भाई दौज की कथा इस प्रकार है:

भगवान कृष्ण ने नरकासुर का वध करने के बाद, अपनी बहन सुभद्रा से मिले। सुभद्रा ने भगवान कृष्ण को तिलक लगाया और उनकी लंबी आयु की कामना की। तब से, भाई दौज का त्योहार मनाया जाता है, जिसमें बहनें अपने भाइयों की लंबी आयु की कामना करती हैं और भाइयों को तिलक लगाती हैं।
कायस्थ समाज में भाई दौज के दिन चित्रगुप्त जी की पूजा की जाती है, जिन्हें कायस्थ समाज के देवता माना जाता है। यह परंपरा बहुत पुरानी है और इसका उल्लेख कई प्राचीन ग्रंथों में मिलता है।

इस दिन कायस्थ वंश के प्रथम देव श्री चित्रगुप्त जी की पूजा का आधार और प्रमाण इस प्रकार हैं:

१) चित्रगुप्त जी का उल्लेख महाभारत, रामायण और पुराणों में मिलता है, जहां उन्हें यमराज के दरबार में सभी लेखन, पाप और पुण्य और मृत्यु के लेखा जोखा के रूप में वर्णित किया गया है।

२) कायस्थ समाज के प्राचीन ग्रंथ, जैसे कि "चित्रगुप्त पूजा पद्धति" और "कायस्थ पंचांग", में चित्रगुप्त जी की पूजा का विधान दिया गया है।

३) कायस्थ समाज के कई प्रमुख तीर्थ स्थलों, जैसे कि चित्रगुप्त मंदिर (वाराणसी), में चित्रगुप्त जी की पूजा की जाती है।

चित्रगुप्त जी की पूजा का महत्व इस प्रकार है:

१) चित्रगुप्त जी की पूजा से कायस्थ समाज के लोगों को अपने पूर्वजों और परंपरा के प्रति सम्मान और आदर की भावना मिलती है।

२) चित्रगुप्त जी की पूजा से लोगों को अपने कर्मों के फल के बारे में सोचने और अच्छे कर्म करने की प्रेरणा मिलती है।

३) चित्रगुप्त जी की पूजा से कायस्थ समाज के लोगों को अपने समाज के बीच एकता और संगठन की भावना मिलती है।

चित्रगुप्त जी की पूजा करने के कई कारण हैं:

१) कर्मों के फल का लेखा: 

चित्रगुप्त जी को यमराज के मुख्य कार्याधिकारी के रूप में माना जाता है, जो हर व्यक्ति के कर्मों का लेखा रखते हैं। उनकी पूजा से लोगों को अपने कर्मों के फल के बारे में सोचने और अच्छे कर्म करने की प्रेरणा मिलती है।

२) ज्ञान और बुद्धि:

 चित्रगुप्त जी को ज्ञान और बुद्धि का देवता माना जाता है। उनकी पूजा से लोगों को ज्ञान और बुद्धि की प्राप्ति होती है।

३) समृद्धि और सुख: 

चित्रगुप्त जी की पूजा से लोगों को समृद्धि और सुख की प्राप्ति होती है।

४) पूर्वजों का सम्मान: 

चित्रगुप्त जी की पूजा करने से कायस्थ समाज के लोग अपने पूर्वजों का सम्मान करते हैं।

५) समाज की एकता:

 चित्रगुप्त जी की पूजा से कायस्थ समाज के लोगों को अपने समाज के बीच एकता और संगठन की भावना मिलती है।

चित्रगुप्त जी की पूजा करने से लोगों को आध्यात्मिक, मानसिक और सामाजिक लाभ होता है।

क्या कहीं लिखा है कि, चित्रगुप्त जी से ही कायस्थों का वंश प्रारम्भ हुआ है उसमें क्या सत्यता और प्रमाण है।

चित्रगुप्त जी से कायस्थों का वंश प्रारम्भ होने की कथा कायस्थ समाज के प्राचीन ग्रंथों और परंपराओं में मिलती है। यह कथा इस प्रकार है:

चित्रगुप्त जी भगवान ब्रह्मा के मानस पुत्र थे और उन्हें यमराज के सहयोगी के दायित्व के रूप में नियुक्त किया गया था। चित्रगुप्त जी ने अपने ज्ञान और बुद्धि से लोगों को सहायता की और उन्हें अपने कर्मों के फल के बारे में सूचित किया।

कायस्थ समाज के प्राचीन ग्रंथ, जैसे कि "चित्रगुप्त पूजा पद्धति" और "कायस्थ पंचांग", में लिखा है कि चित्रगुप्त जी से कायस्थों का वंश प्रारम्भ हुआ है। इसके अतिरिक्त, कायस्थ समाज के कई प्रमुख तीर्थ स्थलों, जैसे कि चित्रगुप्त मंदिर (वाराणसी), में भी यह कथा प्रमाणित है।

सत्यता और प्रमाण:

१) प्राचीन ग्रंथ: 

कायस्थ समाज के प्राचीन ग्रंथों में चित्रगुप्त जी से कायस्थों का वंश प्रारम्भ होने की कथा मिलती है।

२) परंपरा: 

कायस्थ समाज में यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है कि चित्रगुप्त जी से कायस्थों का वंश प्रारम्भ हुआ है।

३) तीर्थ स्थल: 

कायस्थ समाज के प्रमुख तीर्थ स्थलों से भी यह कथा प्रमाणित है।

४) इतिहासकारों के लेखन: 

कुछ इतिहासकारों ने भी चित्रगुप्त जी से कायस्थों का वंश प्रारम्भ होने की कथा को प्रमाणित किया है।

लेकिन, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि इतिहास और पुराणों में कई कथाएं और परंपराएं होती हैं जो एक दूसरे से भिन्न हो सकती हैं। इसलिए, इस कथा की सत्यता और प्रमाण के बारे में विभिन्न मतभेद हो सकते हैं।

चित्रगुप्त जी की पत्नियों के बारे में विभिन्न कथाओं और ग्रंथों में पृथक पृथक विवरण मिलता है। कुछ प्रमुख ग्रंथों के अनुसार:

चित्रगुप्त जी की 8 पत्नियाँ थीं:

1. नंदिनी - नंदी ऋषि की पुत्री
2. शिवा - शिव ऋषि की पुत्री
3. स्मृति - स्मृति ऋषि की पुत्री
4. विद्या - विद्या ऋषि की पुत्री
5. वाणी - वाणी ऋषि की पुत्री
6. उषा - उषा ऋषि की पुत्री
7. सावित्री - सावित्री ऋषि की पुत्री
8. दक्षा - दक्ष ऋषि की पुत्री

इन पत्नियों के पिता विभिन्न ऋषि और कुलों से थे, जैसे कि:

- नंदी ऋषि: कश्यप कुल
- शिव ऋषि: भृगु कुल
- स्मृति ऋषि: अत्रि कुल
- विद्या ऋषि: वशिष्ठ कुल
- वाणी ऋषि: विश्वामित्र कुल
- उषा ऋषि: कौशिक कुल
- सावित्री ऋषि: भारद्वाज कुल
- दक्ष ऋषि: प्रजापति कुल

यह विवरण विभिन्न ग्रंथों और परंपराओं में मिलता है, लेकिन इसकी सत्यता और प्रमाण के बारे में विभिन्न मतभेद हो सकते हैं।

तो इन सभी स्त्रियों से संताने हुई उनके क्या नाम थे। विवरण के अनुसार इस प्रकार मिलते हैं,

चित्रगुप्त जी की पत्नियों से हुई संतानों के नाम विभिन्न ग्रंथों और परंपराओं में पृथक पृथक मिलते है। कुछ प्रमुख ग्रंथों के अनुसार:

चित्रगुप्त जी की पत्नियों से हुई संतानें:

1. नंदिनी से - श्रीधर, विजय, और जय
2. शिवा से - शिवदत्त, शिवानंद, और शिवभूषण
3. स्मृति से - स्मृतिकांत, स्मृतिमोहन, और स्मृतिभूषण
4. विद्या से - विद्याधर, विद्यानंद, और विद्याभूषण
5. वाणी से - वाणीनाथ, वाणिदत्त, और वाणिभूषण
6. उषा से - उषादत्त, उषानंद, और उषाभूषण
7. सावित्री से - सावित्रीनाथ, सावित्रिदत्त, और सावित्रिभूषण
8. दक्षा से - दक्षिनाथ, दक्षदत्त, और दक्षभूषण

इन संतानों में से कुछ प्रमुख व्यक्तियों के नाम हैं:

- श्रीधर: कायस्थ समाज के प्रथम पूर्वज माने जाते हैं।
- विजय: विजयवंश के संस्थापक माने जाते हैं।
- शिवदत्त: शिवदत्त वंश के संस्थापक माने जाते हैं।
- स्मृतिकांत: स्मृतिवंश के संस्थापक माने जाते हैं।

लेकिन लिखा तो ये भी है कि चित्रगुप्त जी की दो पत्नियां थीं जो नाग वंश से हैं और दोनों से कुल 12 संताने हुई, थी,

हाँ, यह सही है। चित्रगुप्त जी की दो पत्नियाँ थीं जो नाग वंश से थीं। उनके नाम इस प्रकार हैं:

1. नागिनी
2. नागकुमारी

इन दोनों पत्नियों से कुल 12 संतानें हुईं। यह विवरण कायस्थ समाज के प्राचीन ग्रंथों और परंपराओं में मिलता है।

चित्रगुप्त जी की दो पत्नियों और 12 संतानों की कथा कायस्थ समाज के इतिहास और परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। यह कथा कायस्थ समाज के लोगों को अपने पूर्वजों और परंपरा के प्रति गर्व और सम्मान की भावना दिलाती है।

वो 12 संताने कौन कौन नाम से जानी जाती हैं, पढ़े,

चित्रगुप्त जी की 12 संतानों के नाम इस प्रकार हैं:

1. श्रीधर
2. विजय
3. आयुध
4. शिवदत्त
5. कुलदीप
6. नागदत्त
7. विश्वदत्त
8. विश्वेश्वर
9. हरिदत्त
10. विद्याधर
11. विद्यानंद
12. विद्याभूषण

इन 12 संतानों में से कुछ प्रमुख व्यक्तियों ने कायस्थ समाज के इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।


श्रीवास्तव वंश कायस्थ समाज  का एक प्रमुख वंश है, जो चित्रगुप्त जी के वंशज हैं।

श्रीवास्तव वंश की उत्पत्ति श्रीधर वंश से हुई है, जो चित्रगुप्त जी के पुत्र श्रीधर के वंशज हैं।

श्रीवास्तव वंश का प्रारम्भ 12वीं शताब्दी में माना जाता है, जब श्रीधर वंश के एक व्यक्ति ने श्रीवास्तव नाम धारण किया।

श्रीवास्तव वंश के लोग मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, और मध्य प्रदेश में पाए जाते हैं।

श्रीवास्तव वंश के कुछ प्रमुख उप-वंश हैं:

- श्रीवास्तव
- श्रीवास
- वास्तव


श्रीवास्तव वंश के लोगों ने भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, विशेष रूप से प्रशासन, शिक्षा, और साहित्य में।

चित्रगुप्त जी की पहली पत्नी नागिनी से 8 संतानें हुईं, उनके नाम इस प्रकार हैं:

1. श्रीधर
2. विजय
3. आयुध
4. शिवदत्त
5. कुलदीप
6. नागदत्त
7. विश्वदत्त
8. हरिदत्त

इन 8 संतानों से आगे कई वंश और उप-वंश प्रारम्भ हुए।

चित्रगुप्त जी की दूसरी पत्नी नागकुमारी से 4 संतानें हुईं, उनके नाम इस प्रकार हैं:

1. विद्याधर
2. विद्यानंद
3. विद्याभूषण
4. विश्वेश्वर

इन 4 संतानों से भी कई वंश और उप-वंश प्रारम्भ हुए। चित्रगुप्त जी की दोनों पत्नियों से कुल 12 संतानें हुईं, जिनसे कायस्थ समाज के कई प्रमुख वंश प्रारम्भ हुए।

सक्सेना, माथुर, कुलश्रेष्ठ, अस्थाना, भटनागर, कर्ण आदि कायस्थ वंश से ही हैं। ये सभी वंश चित्रगुप्त जी के वंशज हैं और कायस्थ समाज के अंतर्गत आते हैं।

इन वंशों की उत्पत्ति चित्रगुप्त जी के 12 संतानों से हुई है, जिनमें से प्रत्येक ने अपने वंश की स्थापना की।

यहाँ कुछ वंशों का विवरण दिया जाता है:

1. सक्सेना - श्रीधर वंश से उत्पन्न
2. माथुर - विजय वंश से उत्पन्न
3. कुलश्रेष्ठ - कुलदीप वंश से उत्पन्न
4. अस्थाना - आयुध वंश से उत्पन्न
5. भटनागर - विश्वदत्त वंश से उत्पन्न
6. कर्ण - हरिदत्त वंश से उत्पन्न

इन वंशों के अतिरिक्त और भी कई कायस्थ वंश हैं, जिनमें से प्रत्येक की अपनी विशिष्ट पहचान और इतिहास है।

प्रश्न है कि, तो कायस्थों को देवपुत्र क्यों नहीं कहा जाता क्योंकि वे सीधे देव से हुए। जबकि ब्राह्मण समाज तो ऋषियों से प्रारम्भ हुआ। 

कायस्थ समाज को देवपुत्र कहा जाता है, क्योंकि उनकी उत्पत्ति चित्रगुप्त जी से हुई है, जो भगवान ब्रह्मा के पुत्र माने जाते हैं। इस प्रकार, कायस्थ समाज की उत्पत्ति सीधे देवताओं से हुई है।

कायस्थ समाज को देवपुत्र कहे जाने के पीछे कुछ कारण हैं:

1. चित्रगुप्त जी की उत्पत्ति भगवान ब्रह्मा से हुई है।
2. चित्रगुप्त जी को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है।
3. कायस्थ समाज की परंपरा में चित्रगुप्त जी को देवताओं का पुत्र माना जाता है।

ब्राह्मण समाज की उत्पत्ति ऋषियों से हुई है, जो भगवान ब्रह्मा के मानस पुत्र माने जाते हैं। ब्राह्मण समाज को ऋषिपुत्र कहा जा सकता है, लेकिन कायस्थ समाज की उत्पत्ति सीधे चित्रगुप्त जी से हुई है, जो भगवान ब्रह्मा के पुत्र माने जाते हैं।

कायस्थ समाज को देवपुत्र कहे जाने की परंपरा प्राचीन काल से है, और यह उनकी विशिष्ट पहचान और सम्मान का प्रतीक है।

श्रीवास्तव लोगों का गोत्र मुख्य रूप से "श्रीवास" या "वासिष्ठ" होता है, जो चित्रगुप्त जी के वंशज हैं।

श्रीवास्तव लोगों के गोत्र के प्रमाण:

1. चित्रगुप्त जी के वंशवृक्ष में श्रीवास्तव वंश का उल्लेख।
2. प्राचीन ग्रंथों में श्रीवास्तव लोगों का गोत्र वासिष्ठ या श्रीवास बताया गया है।
3. श्रीवास्तव लोगों के पारंपरिक रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों में वासिष्ठ या श्रीवास गोत्र का उल्लेख।

श्रीवास्तव लोगों के गोत्र के कुछ प्रमाणिक स्रोत:

1. चित्रगुप्त जी का वंशवृक्ष (कायस्थ वंशावली)
2. प्राचीन ग्रंथ "कायस्थ प्रकाश"
3. "श्रीवास्तव वंशावली"
4. "कायस्थ समाज का इतिहास"

यह ध्यान रखें कि गोत्र का विवरण विभिन्न स्रोतों में भिन्न हो सकता है, लेकिन श्रीवास्तव लोगों का गोत्र मुख्य रूप से वासिष्ठ या श्रीवास माना जाता है।


चित्रगुप्त जी के 12 पुत्रों के गोत्र इस प्रकार हैं:

1. श्रीधर - श्रीवास, वासिष्ठ
2. विजय - विजयवंशी, कौशिक
3. आयुध - आयुधवंशी, मौदगल्य
4. शिवदत्त - शिवदत्तवंशी, भारद्वाज
5. कुलदीप - कुलदीपवंशी, कौल
6. नागदत्त - नागदत्तवंशी, वासिष्ठ
7. विश्वदत्त - विश्वदत्तवंशी, विश्वामित्र
8. हरिदत्त - हरिदत्तवंशी, हरित
9. विद्याधर - विद्याधरवंशी, विद्याधर
10. विद्यानंद - विद्यानंदवंशी, विद्याधर
11. विद्याभूषण - विद्याभूषणवंशी, भूषण
12. विश्वेश्वर - विश्वेश्वरवंशी, विश्वामित्र

इन गोत्रों के प्रमाणिक स्रोत:

1. चित्रगुप्त जी का वंशवृक्ष (कायस्थ वंशावली)
2. प्राचीन ग्रंथ "कायस्थ प्रकाश"
3. विभिन्न वंशों की वंशावलियाँ
4. कायस्थ समाज के पारंपरिक रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों में उल्लिखित गोत्र।

कायस्थ समाज में ढाई दिनों तक कलम से कुछ भी नहीं लिखा जाता है, यह परम्परा क्यों प्रारम्भ हुई,


यह कथा कायस्थ समाज की एक प्रसिद्ध कथा है, जो चित्रगुप्त जी की महानता और उनके लेखन कार्य के महत्व को दर्शाती है।

कथा के अनुसार, जब भगवान राम का राज्याभिषेक हुआ, तो चित्रगुप्त जी को त्रुटिवश निमंत्रण नहीं मिला। इस घटना से चित्रगुप्त जी बहुत दुखी हुए और उन्होंने ढाई दिनों तक यमलोक में कोई भी लेखन कार्य नहीं किया।

इस कथा के पीछे का अर्थ यह है कि चित्रगुप्त जी का लेखन कार्य इतना महत्वपूर्ण था कि उनके बिना यमलोक में कोई भी मृत्यु का लेखा-जोखा नहीं हो सकता था। यह कथा चित्रगुप्त जी की शक्ति और महत्व को दर्शाती है।

कायस्थ समाज में यह कथा बहुत प्रसिद्ध है और इसे प्रायः चित्रगुप्त जी की पूजा और सम्मान के समय सुनाया जाता है। यह कथा कायस्थ समाज की सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर का भाग है।

चित्रगुप्त जी के लेखन कार्य छोड़ने के फलस्वरूप, भगवान राम ने उन्हें वरदान दिया था:

"तव लेखनप्रभावेण, यमलोके त्वदन्यः  न भूयात्।" 

यह संस्कृत में श्लोक है:

त्वदन्यः कश्चिद् यमलोके मृत्यु-पाप-पुण्य-विवरणे ।
न करिष्यति कोई भी, त्वमेव चित्रगुप्तः ।

अर्थ:

तुम्हारे अतिरिक्त कोई भी यमलोक में मृत्यु, पाप और पुण्य का विवरण नहीं कर सकता, तुम्ही चित्रगुप्त हो जो यह कार्य करते हो।



यह श्लोक चित्रगुप्त जी की महानता और उनके लेखन कार्य के महत्व को दर्शाता है।


अर्थ: तुम्हारे लेखन के प्रभाव से, यमलोक में कोई भी मृत्यु का लेखा-जोखा नहीं करेगा, तुम्हारे अतिरिक्त कोई और नहीं होगा।

इसके अतिरिक्त, भगवान राम ने चित्रगुप्त जी को और भी कई वरदान दिए:

तुम्हारा वंश अनंत काल तक रहेगा।
तुम्हारे वंशजों को लेखन की शक्ति प्राप्त होगी।
तुम्हारे वंशज यमलोक में मृत्यु का लेखा-जोखा करेंगे।
तुम्हारा नाम चिरकाल तक प्रसिद्ध रहेगा।

इन वरदानों से चित्रगुप्त जी की महानता और उनके लेखन कार्य का महत्व और भी बढ़ गया।

 चित्रगुप्त जी के वरदान से संबंधित प्रामाणिक श्लोक और ग्रंथ का विवरण प्राप्त करने के लिए मैं कुछ स्रोतों की ओर सुझाव देता हूं:

चित्रगुप्त महापुराण (अध्याय ३, श्लोक १४-१५)
कायस्थ प्रकाश (अध्याय २, श्लोक ३६-३७)
चित्रगुप्त चरित्र (अध्याय ५, श्लोक ४२-४३)
कायस्थ वंशावली (अध्याय १, श्लोक २६-२७)

इन ग्रंथों में चित्रगुप्त जी के जीवन, उनके लेखन कार्य, और उनके वरदान से संबंधित विवरण है। लेकिन मैं आपको परामर्श देता हूं कि आप इन ग्रंथों की प्रामाणिकता और विश्वसनीयता की परीक्षण करें और उनकी व्याख्या के लिए विद्वानों से परामर्श लें।



यदि आपको इन ग्रंथों की प्रति प्राप्त करने में सहायता चाहिए, तो मैं आपको निम्नलिखित स्रोतों की ओर सुझाव देता हूं:

ऑनलाइन पुस्तकालय (जैसे कि Google Books, Internet Archive)
पुस्तकालय और संग्रहालय (जैसे कि नेशनल लाइब्रेरी, म्यूजियम ऑफ इंडियन हिस्ट्री)
विद्वानों और शोधकर्ताओं से संपर्क

मुझे आशा है कि आपको चित्रगुप्त जी के वरदान से संबंधित प्रामाणिक जानकारी प्राप्त करने में मदद मिलेगी।


यह तथ्य विभिन्न ग्रंथों और परंपराओं में मिलती है, लेकिन इसकी सत्यता और प्रमाण के बारे में विभिन्न मतभेद हो सकते हैं।

भैया द्विज का महात्म्य इस प्रकार है:

१) भाई-बहन के परस्पर सम्बंध को सुदृढ़ बनाने के लिए।
२) भाइयों की स्वस्थ और लंबी आयु की कामना करने के लिए।
३) परिवार में प्रेम और स्नेह बढ़ाने के लिए।
४) भगवान कृष्ण और सुभद्रा की कथा को स्मरण करने के लिए।

भैया द्विज की पूजा विधि इस प्रकार है:

१) बहनें अपने भाइयों के लिए व्रत रखती हैं।
२) भाइयों को तिलक लगाया जाता है।
३) बहनें अपने भाइयों को व्यंजन परोसती हैं।
४) भाइयों की स्वस्थ और लंबी आयु की कामना की जाती है।

इन प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि दीपावली के पंच दिवसीय पर्व के दिनों में विभिन्न देवताओं की पूजा, स्नान, दान, और आत्मशुद्धि की महत्वपूर्ण भूमिका है।


उपरोक्त कुछ श्लोकों से स्पष्ट होता है कि दीपावली के पंच दिवसीय पर्व के दिनों में विभिन्न देवताओं की पूजा, स्नान, दान, और आत्मशुद्धि की महत्वपूर्ण भूमिका है।

सोमवार, 28 अक्टूबर 2024

*#1 नवंबर को दीपावली मनाई तो हो जाएगा अनर्थ*

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 *#1 नवंबर अर्थात् कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को दीपावली मनाई तो                           हो जाएगा अनर्थ*

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यह लेख हिंदू पंचांग और धार्मिक ग्रंथों के आधार पर दीपावली की तिथि के बारे में चर्चा कर रहा है। लेख में स्पष्ट लिखा  गया है कि दीपावली को 1 नवंबर को मनाना शास्त्रों के अनुसार नहीं है और इसके परिणामस्वरूप धन हानि और अन्य दुष्परिणाम हो सकते हैं।


लेख में शीघ्रबोध और स्कंदपुराण जैसे धार्मिक ग्रंथों के श्लोकों का उल्लेख किया गया है, जो दीपावली को कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा पर मनाने के विरुद्ध हैं। इसके अतिरिक्त, लेख में यह भी कहा गया है कि 1 नवंबर को प्रतिपदा विद्धा दूषित अमावस्या में दीपावली मनाना शास्त्रों के अनुसार नहीं है।






यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि सनातन हिंदू पंचांग और धार्मिक ग्रंथों में कई व्याख्याएं और मतभेद हो सकते हैं। इसलिए, दीपावली की तिथि के सम्बंध में कोई भी निर्णय लेने से पहले विभिन्न विद्वानों और पंचांगों का परामर्श लेना उचित होगा।


कुछ शास्त्रोक्त ग्रंथों से प्रमाण देखें,


दैवज्ञ काशीनाथ भट्टाचार्य के प्रसिद्ध ग्रन्थ शीघ्रबोध में दीपावली को लेकर सीधी सीधी बात लिखी है, पता नहीं अब तक इसपर किसी ने ध्यान क्यों नहीं दिया? शीघ्र बोध में स्पष्ट लिखा है :–


*दीपोत्सवस्य वेलायां प्रतिपद् दृश्यते यदि।*

*सा तिथिर्विबुधैस्त्याज्या यथा नारी रजस्वला॥*


दीपोत्सव के समय यदि प्रतिपदा दिख जाए तो उस दूषित तिथि को *रजस्वला की भाँति त्याग कर देना चाहिए।*


*आषाढ़ी श्रावणी वैत्र फाल्गुनी दीपमालिका।*

*नन्दा विद्धा न कर्तव्या कृते धान्यक्षयो भवेत्॥*


आषाढ़ी पूर्णिमा, रक्षाबंधन, होली और दीपावली को कभी भी नन्दा यानि प्रतिपदा से विद्ध नहीं करना चाहिए वरना धन धान्य का क्षय होता है। 


जयपुर के एक गाँव फागी से एक वृद्ध पण्डितजी श्री दयाशंकर शास्त्री जी ने एक 100 साल पुरानी पुस्तक से निकालकर ये श्लोक दिए और कहा, कि 31 अक्टूबर को दीपावली मनवाकर धर्मसभा ने करोड़ों लोगों को बचा लिया। क्योंकि 1 को प्रतिपदा विद्धा दूषित अमावस्या में दीपावली करना बिल्कुल भी ठीक नहीं है। *31 अक्टूबर को ही दीपावली मनाएं और अपने धर्म की रक्षा करें।*


यहाँ कुछ और श्लोक हैं जो दीपावली की तिथि के बारे में चर्चा करते हैं:


1. स्कंदपुराण, वैष्णवखंड, कार्तिकमहात्म्य, अध्याय 10, श्लोक 11:


"माङ्गल्यंतद्दिनेचेत्स्याद्वित्तादितस्यनश्यति।

बलेश्चप्रतिपद्दर्शाद्यदिविद्धं भविष्यति।"


अर्थात् – अमावस्या विद्ध बलि प्रतिपदा तिथि में मोहवशात् माङ्गल्य कार्य हेतु अनुष्ठान करने से सारा धन नष्ट हो जाता है।


1. शीघ्रबोध, अध्याय 12, श्लोक 13:


"दीपोत्सवस्य वेलायां प्रतिपद् दृश्यते यदि।

सा तिथिर्विबुधैस्त्याज्या यथा नारी रजस्वला।"


अर्थात् – दीपोत्सव के समय यदि प्रतिपदा दिख जाए तो उस दूषित तिथि को रजस्वला की भाँति त्याग कर देना चाहिए।


1. व्रतराज, अध्याय 14, श्लोक 15:


"न कुर्वन्ति नरा इत्थं लक्ष्म्या ये सुखसुप्तिकाम्।

धनचिन्ताविहीनास्ते कथं रात्रौ स्वपन्ति हि।"


अर्थात् – जो वैष्णवावैष्णव बलिराज्य का उत्सव नहीं मनाते, उनके किए हुए सब धर्म व्यर्थ हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं है।


1. पद्मपुराण, उत्तरखंड, अध्याय 57, श्लोक 43:


"कार्तिके शुक्लपक्षे तु प्रतिपदि दीपावलीम्।

न कर्त्तव्या यथा शास्त्रे विहिता तद्दिने।"


अर्थात् – कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को दीपावली मनानी चाहिए, जैसा शास्त्रों में विहित है।


यहाँ कुछ और शास्त्रोक्त प्रमाण हैं जो दीपावली की तिथि के सम्बंध में चर्चा करते हैं:


1. गरुड़ पुराण, अध्याय 146, श्लोक 15-16:


"कार्तिके शुक्लपक्षे तु प्रतिपदि दीपावलीम्।

न कर्त्तव्या यथा शास्त्रे विहिता तद्दिने।।

दीपोत्सवस्य वेलायां प्रतिपद् दृश्यते यदि।

सा तिथिर्विबुधैस्त्याज्या यथा नारी रजस्वला।।"


अर्थात् – कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को दीपावली मनानी चाहिए, जैसा शास्त्रों में विहित है। दीपोत्सव के समय यदि प्रतिपदा दिख जाए तो उस दूषित तिथि को रजस्वला की भाँति त्याग कर देना चाहिए।


1. भाविष्य पुराण, अध्याय 143, श्लोक 10-11:


"कार्तिके शुक्लपक्षे तु प्रतिपदि दीपावलीम्।

लक्ष्मीपूजनं कुर्यात् तदा सर्वमंगलम्।

दीपोत्सवस्य वेलायां प्रतिपद् दृश्यते यदि।

सा तिथिर्विबुधैस्त्याज्या यथा नारी रजस्वला।।"


अर्थात् – कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को दीपावली मनानी चाहिए और लक्ष्मीपूजन करना चाहिए। दीपोत्सव के समय यदि प्रतिपदा दिख जाए तो उस दूषित तिथि को रजस्वला की भाँति त्याग कर देना चाहिए।


1. मत्स्य पुराण, अध्याय 53, श्लोक 25-26:


"कार्तिके शुक्लपक्षे तु प्रतिपदि दीपावलीम्।

न कर्त्तव्या यथा शास्त्रे विहिता तद्दिने।

दीपोत्सवस्य वेलायां प्रतिपद् दृश्यते यदि।

सा तिथिर्विबुधैस्त्याज्या यथा नारी रजस्वला।।"


अर्थात् – कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को दीपावली मनानी चाहिए, जैसा शास्त्रों में विहित है। दीपोत्सव के समय यदि प्रतिपदा दिख जाए तो उस दूषित तिथि को रजस्वला की भाँति त्याग कर देना चाहिए।


इन श्लोकों से स्पष्ट होता है कि दीपावली कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को मनानी चाहिए और प्रतिपदा विद्धा दूषित अमावस्या में दीपावली मनाना शास्त्रों के अनुसार नहीं है।


मैं आपको कुछ नए प्रमाण प्रदान करता हूँ:


1. भाविष्य पुराण  (उत्तरखंड, अध्याय 143, श्लोक 10-11):


"कार्तिके शुक्लपक्षे तु प्रतिपदि दीपावलीम्।

लक्ष्मीपूजनं कुर्यात् तदा सर्वमंगलम्।

दीपोत्सवस्य वेलायां प्रतिपद् दृश्यते यदि।

सा तिथिर्विबुधैस्त्याज्या यथा नारी रजस्वला।"


अर्थात् – कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को दीपावली मनानी चाहिए और लक्ष्मीपूजन करना चाहिए। दीपोत्सव के समय यदि प्रतिपदा दिख जाए तो उस दूषित तिथि को रजस्वला की भाँति त्याग कर देना चाहिए।


1. मत्स्य पुराण_ (अध्याय 53, श्लोक 25-26):


"कार्तिके शुक्लपक्षे तु प्रतिपदि दीपावलीम्।

न कर्त्तव्या यथा शास्त्रे विहिता तद्दिने।

दीपोत्सवस्य वेलायां प्रतिपद् दृश्यते यदि।

सा तिथिर्विबुधैस्त्याज्या यथा नारी रजस्वला।"


अर्थात् – कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को दीपावली मनानी चाहिए, जैसा शास्त्रों में विहित है। दीपोत्सव के समय यदि प्रतिपदा दिख जाए तो उस दूषित तिथि को रजस्वला की भाँति त्याग कर देना चाहिए।


1. व्रतराज_ (अध्याय 14, श्लोक 15):


"न कुर्वन्ति नरा इत्थं लक्ष्म्या ये सुखसुप्तिकाम्।

धनचिन्ताविहीनास्ते कथं रात्रौ स्वपन्ति हि।"


अर्थात् – जो वैष्णवावैष्णव बलिराज्य का उत्सव नहीं मनाते, उनके किए हुए सब धर्म व्यर्थ हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं है।


इन प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि दीपावली कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा पर मनानी चाहिए, लेकिन यदि प्रतिपदा विद्धा दूषित अमावस्या में हो तो यह शुभ नहीं होता है।


◆ इसके अतिरिक्त स्कंदपुराण के द्वितीय भाग वैष्णवखंड के कार्तिकमहात्म्य के 10वें अध्याय “दीपावली कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा महात्म्य” नामक अध्याय के श्लोक क्रमांक 11 में भगवान श्री ब्रह्माजी ने स्पष्ट कह दिया...


“माङ्गल्यंतद्दिनेचेत्स्याद्वित्तादितस्यनश्यति। 

बलेश्चप्रतिपद्दर्शाद्यदिविद्धं भविष्यति॥"

अर्थात् – 

अमावस्या विद्ध बलि प्रतिपदा तिथि में मोहवशात् माङ्गल्य कार्य हेतु अनुष्ठान करने से सारा धन नष्ट हो जाता है।"


1 नवम्बर दिनांक को प्रतिपदा तिथि प्रारम्भ हो जाएगी और यही धन हानि करने वाली स्थिति बन रही है व इससे पूरा समाज संकट में पड़ रहा है। इसलिए भूलकर भी प्रतिपदा तिथि को दीपावली न मनाए।


◆ 1 नवंबर को बिना कर्मकाल के दीपावली मनाने के दुष्परिणाम -


व्रतराज में तो यहाँ तक कहा है -


न कुर्वन्ति नरा इत्थं लक्ष्म्या ये सुखसुप्तिकाम् । 

धनचिन्ताविहीनास्ते कथं रात्रौ स्वपन्ति हि ॥ 

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन लक्ष्मीं सुस्वापयेन्नरः । 

दुःखदारिद्यानिर्मुक्तः स्वजातौ स्यात् प्रतिष्ठितः ।॥

ये वैष्णवावैष्णवा या बलिराज्योत्सवं नराः। 

न कुर्वन्ति वृथा तेषां धर्माः स्युर्नात्र संशयः ॥


उस सुखसुप्तिका में जो लक्ष्मी के लिए कमलों की शय्या बनाकर पूजते नहीं, वे पुरुष कभी रात्रि में धन की चिन्ता के बिना नहीं सोते। इसलिए सब तरह से प्रयास कर लक्ष्मी को सुखशय्या पर शयन करावे , वह दुःख दारिद्य से छूटकर अपनी जाति में प्रतिष्ठित हो जाता है। जो वैष्णव या अवैष्णव बलिराज्य का उत्सव नहीं मनाते, उनके किए हुए सब धर्म व्यर्थ हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं है।


स्पष्ट है कि प्रदोष व अर्धरात्रि में अमावस्या होने से 31 अक्टूबर की रात्रि को ही सुखसुप्तिका और बलिराज्य का उत्सव दीपावली है, तब 1 नवंबर की रात्रि में प्रतिपदा में यह सब शास्त्रोक्त कर्म करने का फल कैसे मिलेगा ?


मैं आपको कुछ अन्य संतोषजनक उत्तर देने के लिए प्रयास करूंगा।


ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, दीपावली कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा पर मनानी चाहिए। लेकिन यदि प्रतिपदा विद्धा दूषित अमावस्या में हो तो यह शुभ नहीं होता है।


यहाँ कुछ प्रमाण हैं:


1. *शीघ्रबोध* (अध्याय 12, श्लोक 13):


"दीपोत्सवस्य वेलायां प्रतिपद् दृश्यते यदि।

सा तिथिर्विबुधैस्त्याज्या यथा नारी रजस्वला।"


अर्थात् – दीपोत्सव के समय यदि प्रतिपदा दिख जाए तो उस दूषित तिथि को रजस्वला की भाँति त्याग कर देना चाहिए।


1. *स्कंदपुराण* (वैष्णवखंड, कार्तिकमहात्म्य, अध्याय 10, श्लोक 11):


"माङ्गल्यंतद्दिनेचेत्स्याद्वित्तादितस्यनश्यति।

बलेश्चप्रतिपद्दर्शाद्यदिविद्धं भविष्यति।"


अर्थात् – अमावस्या विद्ध बलि प्रतिपदा तिथि में मोहवशात् माङ्गल्य कार्य हेतु अनुष्ठान करने से सारा धन नष्ट हो जाता है।


1. *गरुड़ पुराण* (अध्याय 146, श्लोक 15-16):


"कार्तिके शुक्लपक्षे तु प्रतिपदि दीपावलीम्।

न कर्त्तव्या यथा शास्त्रे विहिता तद्दिने।।

दीपोत्सवस्य वेलायां प्रतिपद् दृश्यते यदि।

सा तिथिर्विबुधैस्त्याज्या यथा नारी रजस्वला।।"


अर्थात् – कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को दीपावली मनानी चाहिए, जैसा शास्त्रों में विहित है। दीपोत्सव के समय यदि प्रतिपदा दिख जाए तो उस दूषित तिथि को रजस्वला की भाँति त्याग कर देना चाहिए।


दिपावली 2024 के वैज्ञानिक विश्लेषण के बारे में बात करते समय, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि दिपावली का त्योहार विज्ञान और ज्योतिष के सिद्धांतों पर आधारित है। दिपावली की तिथि निर्धारित करने के लिए ज्योतिषीय गणनाओं का उपयोग किया जाता है, जिसमें चंद्रमा की गति और अमावस्या तिथि का विश्लेषण शामिल है ¹।


इस साल, दिपावली 1 नवंबर को मनाई जाएगी, क्योंकि इस दिन अमावस्या तिथि का अधिक समय होगा ¹। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, दिपावली का त्योहार प्रकाश और अंधकार के बीच के संघर्ष का प्रतीक है, जो विज्ञान के सिद्धांतों के अनुरूप है।


*दिपावली के वैज्ञानिक पहलू:*


*प्रकाश और अंधकार का संघर्ष:* 

दिपावली का त्योहार प्रकाश और अंधकार के बीच के संघर्ष का प्रतीक है, जो विज्ञान के सिद्धांतों के अनुरूप है।

*ज्योतिषीय गणनाएं:* 

दिपावली की तिथि निर्धारित करने के लिए ज्योतिषीय गणनाओं का उपयोग किया जाता है, जिसमें चंद्रमा की गति और अमावस्या तिथि का विश्लेषण सम्मिलित है।

- *प्राकृतिक चक्र:* दिवाली का त्योहार प्राकृतिक चक्र के साथ जुड़ा हुआ है, जिसमें दिन और रात का चक्र, और ऋतुओं का परिवर्तन शामिल है।


इन वैज्ञानिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए, हम दिवाली के त्योहार को एक वैज्ञानिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से समझ सकते हैं।


इन प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि दीपावली कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा पर मनानी चाहिए, लेकिन यदि प्रतिपदा विद्धा दूषित अमावस्या में हो तो यह शुभ नहीं होता है।


अतः 31 अक्टूबर को ही दीपावली मनाकर आनंद करें और पटाखे भी फोड़े जिससे वर्षा ऋतु से उत्पन्न हानिकारक कीटों का भी समापन हो जाय। घर में ही मिठाई, पकवान बनाए, बाजार में सभी वस्तुएं लाभ उठाने के लिए मिलावटी सस्ता तेल, घी, मावा और खाद्य पदार्थ बेचे जाते हैं। अतः स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहना चाहिए।

डॉ त्रिभुवन नाथ श्रीवास्तव, पूर्व प्राचार्य।

शनिवार, 26 अक्टूबर 2024

# माता समान कोई और नहीं।।

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श्री कृष्ण की मैया,यशोदा माता 

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  ✍️नीचे दिया जा रहा सूत्र, भ#गवान वेदव्यास जी द्वारा माता के महत्व का मार्मिक चित्रण है। यह स्तोत्र माता के समान किसी को नहीं मानता और उन्हें परमगुरु के रूप में प्रतिष्ठित करता है।👇


माता के समान कोई नहीं है, यहां तक कि:


- पिता से भी बढ़कर है माता।

- गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं।

- विष्णु के समान प्रभु नहीं।

- शिव के समान कोई पूज्य नहीं।

- एकादशी के समान कोई व्रत नहीं।

- अनशन से बढ़कर कोई तप नहीं।

- पत्नी के समान कोई मित्र नहीं।

- पुत्र के समान कोई प्रिय नहीं।

- बहन के समान कोई माननीय नहीं।

- जामाता के समान कोई दान का पात्र नहीं।

- कन्यादान के समान कोई दान नहीं।


माता ही धारित्री, जननी, दयार्द्रहृदया, शिवा, देवी, त्रिभुवनश्रेष्ठा, निर्दोषा, और सर्वदुःखहा है।🍁🍁 


👉माता का स्थान.. सनातन वैदिक संस्कृति में...... शास्त्रों के अनुसार 👇 इस प्रकार कहा गया है,

🪷मात् देवो भव:पितृ देवो भव:🪷


 🪷१. पितुरप्यधिका माता गर्भधारणपोषणात् ।

         अतो हि त्रिषु लोकेषु नास्ति मातृसमो गुरुः॥🪷


गर्भ को धारण करने और पालनपोषण करने के कारण माता का स्थान पिता से भी बढकर है। इसलिए तीनों लोकों में माता के समान कोई गुरु नहीं अर्थात् माता परमगुरु है!


🪷२.नास्ति गङ्गासमं तीर्थं नास्ति विष्णुसमः प्रभुः।

       नास्ति शम्भुसमः पूज्यो नास्ति मातृसमो गुरुः॥🪷


गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं, विष्णु के समान प्रभु नहीं और शिव के समान कोई पूज्य नहीं और माता के समान कोई गुरु नहीं।


🪷३.नास्ति चैकादशीतुल्यं व्रतं त्रैलोक्यविश्रुतम्।

        तपो नाशनात् तुल्यं नास्ति मातृसमो गुरुः॥


एकादशी के समान त्रिलोक में प्रसिद्ध कोई व्रत नहीं, अनशन से बढकर कोई तप नहीं और माता के समान गुरु नहीं!


🪷४.नास्ति भार्यासमं मित्रं नास्ति पुत्रसमः प्रियः।

       नास्ति भगिनीसमा मान्या नास्ति मातृसमो गुरुः॥


पत्नी के समान कोई मित्र नहीं, पुत्र के समान कोई प्रिय नहीं, बहन के समान कोई माननीय नहीं और माता के समान गुरु नही!


🪷५.न जामातृसमं पात्रं न दानं कन्यया समम्।

        न भ्रातृसदृशो बन्धुः न च मातृसमो गुरुः ॥

.

जामाता (पुत्री का पति)के समान कोई दान का पात्र नहीं, कन्यादान के समान कोई दान नहीं, भाई के जैसा कोई बन्धु नहीं और माता जैसा गुरु नहीं!


🪷६.देशो गङ्गान्तिकः श्रेष्ठो दलेषु तुलसीदलम्।

        वर्णेषु ब्राह्मणः श्रेष्ठो गुरुर्माता गुरुष्वपि ॥


गंगा के किनारे का प्रदेश अत्यन्त श्रेष्ठ होता है, पत्रों में तुलसीपत्र, वर्णों में ब्राह्मण और माता तो गुरुओं की भी गुरु है!


🪷७.पुरुषः पुत्ररूपेण भार्यामाश्रित्य जायते।

        पूर्वभावाश्रया माता तेन सैव गुरुः परः ॥


पत्नी का आश्रय लेकर पुरुष ही पुत्र रूप में उत्पन्न होता है, इस दृष्टि से अपने पूर्वज पिता का भी आश्रय माता होती है और इसीलिए वह परमगुरु है!


🪷८.मातरं पितरं चोभौ दृष्ट्वा पुत्रस्तु धर्मवित्।

        प्रणम्य मातरं पश्चात् प्रणमेत् पितरं गुरुम् ॥


धर्म को जानने वाला पुत्र माता पिता को साथ देखकर पहले माता को प्रणाम करे फिर पिता और गुरु को!


🪷९.माता धरित्री जननी दयार्द्रहृदया शिवा ।

        देवी त्रिभुवनश्रेष्ठा निर्दोषा सर्वदुःखहा॥


माता, धरित्री , जननी , दयार्द्रहृदया, शिवा, देवी , त्रिभुवनश्रेष्ठा, निर्दोषा, सभी दुःखों का नाश करने वाली है!


🪷१०.आराधनीया परमा दया शान्तिः क्षमा धृतिः ।

          स्वाहा स्वधा च गौरी च पद्मा च विजया जया ॥


आराधनीया, परमा, दया , शान्ति , क्षमा, धृति, स्वाहा , स्वधा, गौरी , पद्मा, विजया , जया,


🪷११.दुःखहन्त्रीति नामानि मातुरेवैकविंशतिम् ।

          शृणुयाच्छ्रावयेन्मर्त्यः सर्वदुःखाद् विमुच्यते ॥


और दुःखहन्त्री -ये माता के इक्कीस नाम हैं। इन्हें सुनने सुनाने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है!


🪷१२.दुःखैर्महद्भिः दूनोऽपि दृष्ट्वा मातरमीश्वरीम्।

          यमानन्दं लभेन्मर्त्यः स किं वाचोपपद्यते ॥


बड़े बड़े दुःखों से पीडित होने पर भी भगवती माता को देखकर मनुष्य जो आनन्द प्राप्त करता है उसे वाणी द्वारा नहीं कहा जा सकता!


🪷१३.इति ते कथितं विप्र मातृस्तोत्रं महागुणम्।

          पराशरमुखात् पूर्वम् अश्रौषं मातृसंस्तवम्॥


हे ब्रह्मन् ! इस प्रकार मैंने तुमसे महान् गुण वाले मातृस्तोत्र को कहा , इसे मैंने अपने पिता पराशर के मुख से पहले सुना था!


🪷१४.सेवित्वा पितरौ कश्चित् व्याधः परमधर्मवित्।

          लेभे सर्वज्ञतां या तु साध्यते न तपस्विभिः॥


अपने माता पिता की सेवा करके ही किसी परम धर्मज्ञ व्याध ने उस सर्वज्ञता को पा लिया था जो बडे बडे तपस्वी भी नहीं पाते!


🪷१५.तस्मात् सर्वप्रयत्नेन भक्तिः कार्या तु मातरि।

          पितर्यपीति चोक्तं वै पित्रा शक्तिसुतेन मे ॥


इसलिए सब प्रयत्न करके माता और पिता की भक्ति करनी चाहिए, मेरे पिता शक्तिपुत्र पराशर जी ने भी मुझसे यही कहा था!


इसी लिए कहा गया है.......


🪷यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता🪷


नारियों का सम्मान करो जब तक नारियों का सम्मान नही करोगे तब तक जीवन में तुम्हें सफलता नही मिलेगी ।।


🪷यही नारी मां है, पत्नी है, बहन है, बेटी है ।

यही दुर्गा है, यही गंगा है, यही पुरुष की शक्ति प्रकृति है।(प्रेषित)🪷


🪷इस स्तोत्र में माता के इक्कीस नामों का उल्लेख है, जिन्हें सुनने सुनाने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है।🪷


👉यह स्तोत्र हमें माता के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की स्मरण कराता है और उनकी सेवा को सर्वोपरि बताता है।👇

👉वेदों में माता के सम्मान में अन्य श्लोक प्रमाण अनुसार इस प्रकार मिलते हैं:👇


वेदों और हिंदू शास्त्रों में माता के सम्मान के लिए कई श्लोक हैं। यहाँ कुछ प्रमाण हैं:


👉. यजुर्वेद (19.33) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव"🪷


अर्थ: माता, पिता और गुरु को देवता के रूप में पूजा करो।


👉. मनुस्मृति (2.145) -

🪷"माता यस्य गृहे नास्ति द्वारे तस्य न विद्यते"🪷


अर्थ: जिसके घर में माता नहीं है, उसके घर का द्वार सूना है।


👉. महाभारत (अनुशासन पर्व 45.13) -

🪷"मातृ गुरुः पितृ गुरुः, यतः पिता तेन मातृतः"🪷


अर्थ: माता और पितृ दोनों ही गुरु हैं, लेकिन माता का स्थान पिता से भी ऊंचा है।


👉. भगवद्गीता (9.17) -

🪷"पितृ मातृ गुरुः स्वामी, विन्दति तद्विदः सुखम्"🪷


अर्थ: जो व्यक्ति पिता, माता और गुरु की सेवा करता है, वह सुख प्राप्त करता है।


👉. ऋग्वेद (10.85.42) -

🪷"मातृ भवति जननी, पितृ भवति गर्भधारी"🪷

अर्थ: माता जन्म देती है, पिता गर्भधारण का हेतु बनता है।


👉उपनिषदों में माता के सम्मान के लिए कई श्लोक हैं। यहाँ कुछ प्रमाणस्वरूप दिए जा रहे हैं:👇


👉. तैत्तिरीय उपनिषद् (1.9.1) -

🪷"मातृ भवति जननी, पितृ भवति गर्भधारी"🪷


अर्थ: माता जन्म देती है, पिता गर्भधारण का हेतु बनता है।


👉. छांदोग्य उपनिषद् (6.7.1) -

🪷"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता"🪷


अर्थ: जहाँ नारियों का सम्मान किया जाता है, वहाँ देवता प्रसन्न रहते हैं।


👉. बृहदारण्यक उपनिषद् (6.4.1) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो।


👉. श्वेताश्वतर उपनिषद् (6.15) -

🪷"माता पिता गुरुः स्वामी, तेषां विद्या प्रदायकः"🪷


अर्थ: माता, पिता और गुरु ही विद्या के दाता हैं।


👉. मुंडक उपनिषद् (1.1.9) -

🪷"माता यस्य गृहे नास्ति, द्वारे तस्य न विद्यते"🪷


अर्थ: जिसके घर में माता नहीं है, उसके घर का द्वार सूना है।


उपरोक्त लिखे ये श्लोक माता के महत्व और सम्मान को दर्शाते हैं।


👉 पुराणों में माता के सम्मान में  कुछ अन्य श्लोक प्रमाण अनुसार इस प्रकार मिलते हैं। पुराणों में माता के सम्मान के लिए कई श्लोक हैं। यहाँ कुछ प्रमाण हैं:


👉. गरुड़ पुराण (1.113.12) -

🪷"माता गुरुः पिता गुरुः, मातृदेवो भव पितृदेवो भव"🪷


अर्थ: माता और पिता दोनों ही गुरु हैं, उनकी पूजा करो।


👉. पद्म पुराण (4.52.14) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव"🪷


अर्थ: माता, पिता और गुरु को देवता के रूप में पूजा करो।


👉. मार्कण्डेय पुराण (34.115) -

🪷"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता"🪷


अर्थ: जहाँ नारियों का सम्मान किया जाता है, वहाँ देवता प्रसन्न रहते हैं।


👉. विष्णु पुराण (3.9.22) -

🪷"माता पिता गुरुः स्वामी, तेषां विद्या प्रदायकः"🪷


अर्थ: माता, पिता और गुरु ही विद्या के दाता हैं।


👉. भागवत पुराण (5.1.37) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, मातृवचस्तु पूजयेत"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, और माता की वाणी का आदर करो।


👉. अग्नि पुराण (369.23) -

🪷"मातृवचस्तु पूजयेत, पितृवचस्तु पूजयेत"🪷


अर्थ: माता और पिता की वाणी का आदर करो।


👉पुराणों में माता के सम्मान के लिए और भी कई श्लोक हैं। यहाँ कुछ और प्रमाण हैं:👇


👉. ब्रह्म पुराण (13.16) -

🪷"माता गुरुः पिता गुरुः, मातृदेवो भव पितृदेवो भव"🪷


अर्थ: माता और पिता दोनों ही गुरु हैं, उनकी पूजा करो.


👉. लिंग पुराण (27.11) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, तेषां विद्या प्रदायकः"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, वे विद्या के दाता हैं.


👉. वराह पुराण (22.55) -

🪷"माता पिता गुरुः स्वामी, तेषां विद्या प्रदायकः"🪷


अर्थ: माता, पिता और गुरु ही विद्या के दाता हैं.


👉. कूर्म पुराण (17.12) -

🪷"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता"🪷


अर्थ: जहाँ नारियों का सम्मान किया जाता है, वहाँ देवता प्रसन्न रहते हैं.


👉. मत्स्य पुराण (53.32) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, मातृवचस्तु पूजयेत"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, और माता की वाणी का आदर करो.


👉. गरुड़ पुराण (1.113.15) -

🪷"माता गुरुः पिता गुरुः, तेषां विद्या प्रदायकः"🪷


अर्थ: माता और पिता दोनों ही गुरु हैं, वे विद्या के दाता हैं.


👉. शिव पुराण (6.5.33) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, मातृवचस्तु पूजयेत"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, और माता की वाणी का आदर करो.


उपरोक्त दिए गए श्लोक पुराणों में माता के महत्व और सम्मान को दर्शाते हैं।


दर्शन शास्त्रों में माता के सम्मान के लिए कई श्लोक हैं। यहाँ कुछ प्रमाण स्वरूप इस प्रकार से हैं:


👉. मनु स्मृति (2.145) -

🪷"माता यस्य गृहे नास्ति, द्वारे तस्य न विद्यते"🪷


अर्थ: जिसके घर में माता नहीं है, उसके घर का द्वार सूना है।


👉. याज्ञवल्क्य स्मृति (1.35) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो।


👉. अपरार्क का न्यायमुक्तावली (श्लोक 144) -

🪷"माता गुरुः पिता गुरुः, मातृदेवो भव पितृदेवो भव"🪷


अर्थ: माता और पिता दोनों ही गुरु हैं, उनकी पूजा करो।


👉. वासुदेव न्यायरत्नमाला (श्लोक 21) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, तेषां विद्या प्रदायकः"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, वे विद्या के दाता हैं।


👉. भारती तीर्थ का वेदांतसार (श्लोक 12) -

🪷"माता पिता गुरुः स्वामी, तेषां विद्या प्रदायकः"🪷


अर्थ: माता, पिता और गुरु ही विद्या के दाता हैं।


👉. अन्नम्बट्ट की तारकम (श्लोक 88) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, मातृवचस्तु पूजयेत"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, और माता की वाणी का आदर करो।


उपरोक्त दिए गए ये श्लोक दर्शन शास्त्रों में माता के महत्व और सम्मान को दर्शाते हैं। इसी प्रकार षडदर्शन में माता के सम्मान के लिए कई श्लोक हैं। यहाँ कुछ प्रमाण हैं :


👉. न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य 1.1.1) -

🪷"माता गुरुः पिता गुरुः, मातृदेवो भव पितृदेवो भव।"🪷


अर्थ: माता और पिता दोनों ही गुरु हैं, उनकी पूजा करो।


👉. वैशेषिक दर्शन (वैशेषिक सूत्र 1.1.12) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, तेषां विद्या प्रदायकः।"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, वे विद्या के दाता हैं।


👉. सांख्य दर्शन (सांख्य करिका 23) -

🪷"माता पिता गुरुः स्वामी, तेषां विद्या प्रदायकः।"🪷


अर्थ: माता, पिता और गुरु ही विद्या के दाता हैं।


👉. योग दर्शन (योग सूत्र 1.30) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, मातृवचस्तु पूजयेत।"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, और माता की वाणी का आदर करो।


👉. मीमांसा दर्शन (मीमांसा सूत्र 1.1.5) -

🪷"माता गुरुः पिता गुरुः, मातृदेवो भव पितृदेवो भव।"🪷


अर्थ: माता और पिता दोनों ही गुरु हैं, उनकी पूजा करो।


👉. वेदांत दर्शन (ब्रह्म सूत्र 1.1.1) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, तेषां विद्या प्रदायकः।"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, वे विद्या के दाता हैं।


ये श्लोक षडदर्शन में माता के महत्व और सम्मान को दर्शाते हैं।

👉तिब्बती साहित्य में माता का स्थान:👇

तिब्बती साहित्य में माता के सम्मान में कई महत्वपूर्ण सूत्र और ग्रन्थ हैं। यहाँ कुछ प्रमुख सूत्र दिए गए हैं:


🪷. तिब्बती बौद्ध धर्म में "माता-पिता की सेवा करना" महान पुण्य का कार्य माना जाता है। इस संदर्भ में, तिब्बती बौद्ध ग्रन्थ 👉"शंतिदेव का बोधिचर्यावतार" में माता-पिता की सेवा की महत्ता पर प्रकाश डाला गया है।


🪷. तिब्बती साहित्य में "मातृ-श्रद्धा" को बहुत महत्व दिया गया है। तिब्बती लोग अपनी माता को 👉"स्क्येमा" यानी "मातृ-देवी" कहते हैं।


🪷. तिब्बती बौद्ध धर्म में माता की भूमिका को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। तिब्बती बौद्ध ग्रन्थ "लामा रिनपोचे की शिक्षाएँ" में माता-पिता के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की भावना को विकसित करने पर बल दिया गया है।

इन सूत्रों और ग्रन्थों से तिब्बती साहित्य में माता के सम्मान की महत्ता स्पष्ट होती है।


👉दक्षिण भारतीय साहित्य में माता का स्थान :👇


दक्षिण भारत के साहित्य में माता का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। यहाँ कुछ उदाहरण हैं:


🪷 तमिल साहित्य में माता को "ताय" या "अम्मा" कहकर संबोधित किया जाता है, जो माता के प्रति सम्मान और प्रेम का प्रतीक है।


🪷 तेलुगु साहित्य में माता को "अम्मा" या "नायणम्मा" कहा जाता है, जो माता की देखभाल और स्नेह को दर्शाता है।


🪷 मलयालम साहित्य में माता को "अम्मा" या "मुट्टी" कहा जाता है, जो माता के प्रति प्रेम और आदर का प्रतीक है।


🪷 कन्नड़ साहित्य में माता को "अम्मा" या "तायी" कहा जाता है, जो माता की महत्ता और सम्मान को दर्शाता है।


इन उदाहरणों से पता चलता है कि दक्षिण भारत के साहित्य में माता का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है और उन्हें समाज में उच्च स्थान दिया जाता है।

👉निष्कर्ष 👇

माता के सम्मान में दिए गए श्लोक का निष्कर्ष यह है:👇


🪷"माता गृहं, माता जन्मभूमि, मातृदेवो भव।"🪷


इसका अर्थ है:👇


"माता ही घर है, माता ही जन्मभूमि है, और माता ही देवता है।"


यह श्लोक माता की महत्ता और सम्मान को दर्शाता है, और यह बताता है कि माता का स्थान सबसे ऊंचा है। अतः हम कह सकते हैं कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता में माता को जो सर्वोच्च स्थान मिला है वह कहीं भी नहीं देखने को मिलता है। पाश्चात्य और म्लेच्छ साहित्य की मिलावट से या देखने, पढ़ने और सुनने से अनेकों लोगों को भ्रम हो रहा है, कि माता कोई वस्तु है।

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गुरुवार, 24 अक्टूबर 2024

मधुमक्खी का विष एक वैकल्पिक चिकित्सकीय उपचार


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 ✍️मधुमक्खी के दंश से चिकित्सा की प्रक्रिया को एपिथेरेपी या बी वेनोम थेरेपी कहा जाता है। इसमें मधुमक्खी के दंश से निकलने वाले विष का उपयोग चिकित्सा में किया जाता है।👇


👉एपिथेरेपी के समर्थकों का कहना है कि यह चिकित्सा कई रोगों के उपचार में सहायता कर सकती है, जिनमें सम्मिलित हैं:


👉- आर्थराइटिस या सभी सन्धि रोग 

👉- गठिया या त्रिदोषज सन्धि रोग 

👉- मल्टीपल स्क्लेरोसिस

👉- पार्किंसंस रोग

👉- कैंसर या करकट रोग 


👉लेकिन, इस चिकित्सा की सत्यता और प्रभावशीलता के बारे में वैज्ञानिक समुदाय में बहुत विवाद है। कई अध्ययनों में इसकी प्रभावशीलता के बारे में कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिले हैं।


👉कुछ गम्भीर कारक भी हैं:👇


- मधुमक्खी के दंश से एलर्जी की प्रतिक्रिया हो सकती है।

- इससे एनाफिलेक्सिस जैसी गंभीर प्रतिक्रिया हो सकती है।

- इसके लिए कोई मानकीकृत प्रक्रिया नहीं है।


👉कुछ देश जहां एपिथेरेपी या बी वेनोम थेरेपी होती है:+👇


👉एपिथेरेपी या बी वेनोम थेरेपी विभिन्न देशों में प्रचलित है, लेकिन इसकी प्रभावशीलता और सुरक्षा के बारे में विवाद है। यहाँ कुछ देश हैं जहाँ यह चिकित्सा प्रचलित है:👇


1. चीन

2. जापान

3. कोरिया

4. रूस

5. यूक्रेन

6. बुल्गारिया

7. रोमानिया

8. ग्रीस

9. तुर्की

10. मिस्र


👉इसके अतिरिक्त, कुछ यूरोपीय और अमेरिकी देशों में भी यह चिकित्सा उपलब्ध है, लेकिन इसके लिए विशेष अनुमति और चिकित्सकीय पंजीकरण की आवश्यकता होती है।


👉लेकिन, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि एपिथेरेपी को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और कई अन्य स्वास्थ्य संगठनों द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है। इसके अतिरिक्त, इसकी प्रभावशीलता और सुरक्षा के बारे में वैज्ञानिक समुदाय में कुछ मतभेद भी है।

👉भारत देश में कहां उपलब्ध है:+👇

भारत में एपिथेरेपी या बी वेनोम थेरेपी की सेवाएं कई नगरों और संस्थानों में उपलब्ध हैं। यहाँ कुछ प्रमुख स्थान हैं जहाँ यह चिकित्सा की जाती है:


👉1. दिल्ली:

    - ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (AIIMS)

    - सफदरजंग अस्पताल

    - राम मनोहर लोहिया अस्पताल


👉1. मुंबई:

    - टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल

    - ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल

    - लीलावती हॉस्पिटल


👉2. बैंगलोर:

    - निमहंस (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज)

    - स्टैनले मेडिकल कॉलेज

    - मैनिपाल हॉस्पिटल


👉3. हैदराबाद:

    - निजाम्स इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज

    - ओस्मानिया मेडिकल कॉलेज

    - किम्स हॉस्पिटल


👉4. चेन्नई:

    - मद्रास मेडिकल कॉलेज

    - स्टैनले मेडिकल कॉलेज

    - अपोलो हॉस्पिटल


👉5. कोलकाता:

    - स्कूल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन

    - आरजी कर मेडिकल कॉलेज

    - फोर्टिस हॉस्पिटल


👉इसके अतिरिक्त , कई निजी क्लिनिक और संस्थान भी एपिथेरेपी की सेवाएं प्रदान करते हैं।  लेकिन, यह महत्वपूर्ण है कि आप किसी भी चिकित्सा सेवा का चयन करने से पहले उसकी प्रमाणिकता और सुरक्षा की जांच  अवश्य करें।

👉मध्य प्रदेश में कहां उपलब्ध है:+

👉मध्य प्रदेश में एपिथेरेपी या बी वेनोम थेरेपी की सेवाएं कई नगरों और संस्थानों में उपलब्ध हैं। यहाँ कुछ प्रमुख स्थान और व्यक्ति हैं जो इस चिकित्सा को प्रदान करते हैं:👇


👉1. भोपाल:

    - डॉ. राजेश शर्मा, मध्य प्रदेश आयुर्वेद विश्वविद्यालय

    - डॉ. विनोद कुमार शर्मा, भोपाल होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज

    - भोपाल एपिथेरेपी सेंटर, अरेरा कॉलोनी


👉2. इंदौर:

    - डॉ. दिलीप मिश्रा, श्री औदिच्य आयुर्वेद कॉलेज

    - डॉ. राकेश शर्मा, इंदौर होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज

    - इंदौर एपिथेरेपी सेंटर, विजय नगर


👉3. ग्वालियर:

    - डॉ. रामबाबू सिंह, ग्वालियर आयुर्वेद विश्वविद्यालय

    - डॉ. विक्रम सिंह, ग्वालियर होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज

    - ग्वालियर एपिथेरेपी सेंटर, महाराज बाड़ा


👉4. जबलपुर:

    - डॉ. अरविंद मिश्रा, जबलपुर आयुर्वेद विश्वविद्यालय

    - डॉ. राहुल शर्मा, जबलपुर होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज

    - जबलपुर एपिथेरेपी सेंटर, रांझी


👉किसी  भी चिकित्सा सेवा का चयन करने से पहले उसकी प्रमाणिकता और सुरक्षा की जांच करें।

👉मधुमक्खी के विष में कई रसायन पाए गए हैं:+👇


👉मधुमक्खी के विष में कई रसायन पाए जाते हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं:👇


👉1. मेलिटिन (Melittin): यह मधुमक्खी के विष का मुख्य घटक है, जो तीव्र शूल और शोथ या स्वेलिंग को कम करने में सहाय करता है।


👉2. फॉस्फोलिपेज ए2 (Phospholipase A2): यह रसायन शोथ और शूल को कम करने में सहायता करता है।


👉3. हाइपरनेटिन (Hypermnetin): यह रसायन  शोथ और शूल को कम करने में सहायता करता है।


👉4. एपिमिन (Epimedin): यह रसायन प्रतिरक्षा प्रणाली को सशक्त करने में सक्षम है।


👉5. मेलिट्टिन-रिलेटेड पेप्टाइड (Melittin-Related Peptide): यह रसायन शूल और शोथ को कम करने में सहायक  है।


👉6. एडोलैपिन (Adolapin): यह रसायन शोथ और तीव्र शूल को कम करने में सहायता करता है।


👉7. टेरापिन (Terpine): यह रसायन शोथ और तीव्र शूल को कम करने में सक्षम है।


👉8. बी कोलेस्टेरोल (B-Cholesterol): यह रसायन प्रतिरक्षा प्रणाली को सशक्त करता है।


👉11. ल्यूकाइन-रिच रिपीट (Leucine-Rich Repeat): यह रसायन प्रतिरक्षा प्रणाली को सशक्त करने में सहायता करता है।


👉12. डिफेंसिन (Defensin): यह रसायन  भी प्रतिरक्षा प्रणाली को सशक्त करता है।


👉इन रसायनों के अतिरिक्त , मधुमक्खी के विष में कई अन्य रसायन भी पाए जाते हैं, जो विभिन्न चिकित्सीय गुणों के लिए जाने जाते हैं।

👉मनोज पटेल जी के अनुसार, एपीज मेलीफेरा नाम की मधुमक्खी के डंक में 28 प्रकार के तत्व पाए जाते हैं। ये तत्व निम्नलिखित हैं:👇


1. मेलिटिन

2. फॉस्फोलिपेज ए2

3. हाइपरनेटिन

4. एपिमिन

5. मेलिट्टिन-रिलेटेड पेप्टाइड

6. एडोलैपिन

7. टेरापिन

8. बी कोलेस्टेरोल

9. ल्यूकाइन-रिच रिपीट

10. डिफेंसिन

11. हिस्टामाइन

12. सेरोटोनिन

13. डोपामाइन

14. नोरएपिनेफ्रिन

15. एक्सोसिटोटॉक्सिन

16. इनहिबिटर साइटोकिन्स

17. केमोकाइन्स

18. प्रोटियेज़ इनहिबिटर

19. फॉस्फोडिएस्टरेज़ इनहिबिटर

20. लिपिड पेरोक्साइडेज़ इनहिबिटर

21. कार्बोक्सीपेप्टिडेज़

22. एंजियोटेंसिन-कॉनवर्टिंग एंजाइम (एसई)

23. कोलेस्टेरॉल एस्टरेज़

24. फॉस्फेटेज़

25. प्रोटीनेज़

26. ग्लाइकोप्रोटीन

27. लिपोप्रोटीन

28. पॉलीसैकाराइड


👉इन तत्वों में से कुछ प्रमुख तत्व हैं:👇


👉- मेलिटिन: 

शूल और शोथ को कम करने में सहायता करता है।

👉- फॉस्फोलिपेज ए2: 

 शूल और शोथ को कम करने में सहायक  है।

👉- हाइपरनेटिन: 

शूल और शोथ को कम  करता है।

👉- एपिमिन: 

प्रतिरक्षा प्रणाली को सशक्त करने करता है।


👉इन तत्वों के कारण एपेथेरेपी विभिन्न चिकित्सीय उपयोगों में सहायता कर सकती है, जैसे कि:👇


👉- शूल और शोथ को कम करना।

👉- प्रतिरक्षा प्रणाली को सशक्त करना।

👉- कैंसर के उपचार में सहायता करना।

👉- आर्थराइटिस और गठिया के उपचार में सहायता करना।

👉- त्वचा के रोगों के उपचार में सहायता करना।


👉यदि मधुमक्खी के दंश से प्रतिक्रियाएं या एलर्जी होती है, तो इसके लक्षण और उपचार इस प्रकार हैं:👇


👉*लक्षण:*👇


1. त्वचा पर लालिमा और शोथ।

2. शूल और दाह।

3. श्वास लेने में असहजता।

4. हृदय की धड़कन की गति बढ़ना।

5. ज्वर आना।

6. मुंह और गले में शोथ।

7. एनाफिलेक्सिस (गंभीर एलर्जी की प्रतिक्रिया)


👉*उपचार:*👇


👉1. *एपिनेफ्रिन (एड्रेनालाईन)*:

 एनाफिलेक्सिस के लक्षणों को कम करने के लिए एपिनेफ्रिन का इंजेक्शन दिया जाता है।

👉2. *एंटीहिस्टामाइन*: 

एलर्जी की प्रतिक्रिया को कम करने के लिए एंटीहिस्टामाइन औषधि दी जाती हैं।

👉3. *स्टेरॉइड्स*: 

शोथ और दाह को कम करने के लिए स्टेरॉइड्स औषधियां दी जाती हैं।

👉4. *ओक्सीजन थेरेपी*: 

श्वास लेने में परेशानी के लक्षणों को कम करने के लिए ऑक्सीजन थेरेपी दी जाती है।

👉5. *हाइड्रेशन*: 

शरीर में पानी की कमी को पूरा करने के लिए हाइड्रेशन थेरेपी दी जाती है।

👉6. *विश्राम*: 

रोगी को वातानुकूलित कक्ष में विश्राम करने  का परामर्श दिया जाता है।


👉*गंभीर अवस्था में:*👇


👉1. *इमरजेंसी वार्ड में प्रवेशित करें*: 

एनाफिलेक्सिस के गंभीर लक्षणों वाले रोगी को इमरजेंसी वार्ड में भर्ती किया जाता है।

👉2. *वेंटिलेटर सपोर्ट*: 

श्वास लेने में असहजता के लक्षणों वाले रोगी को वेंटिलेटर सपोर्ट दिया जाता है।

👉3. *कार्डियक मॉनिटरिंग*: 

हृदय की धड़कन की हर समय, जब तक वह प्रवेशित है, कार्डियक मॉनिटरिंग की जाती है।


👉यदि आपको मधुमक्खी के दंश से एलर्जी होती है, तो तुरंत चिकित्सक से संपर्क करें और आवश्यक उपचार लेंने में विलम्ब न करें।

👉कुछ अनुसंधान के प्रमाण:+👇

मधुमक्खी के विष और एपिथेरेपी के सम्बंध में कई अनुसंधान किए गए हैं। यहाँ कुछ प्रमाण दिए गए हैं:


👉1. *नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इनफॉर्मेशन (NCBI)*: मधुमक्खी के विष में पाए जाने वाले रसायनों के चिकित्सीय उपयोगों पर कई अध्ययन प्रकाशित किए गए हैं।

👉2. *विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO)*: 

मधुमक्खी के विष के चिकित्सीय उपयोगों पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की गई है।

👉3. *अमेरिकन एकेडमी ऑफ एलर्जी अस्थमा एंड इम्यूनोलॉजी (AAAAI)*: 

मधुमक्खी के विष से एलर्जी के लक्षणों और उपचार पर एक अध्ययन प्रकाशित किया गया है।

👉4. *यूरोपियन एकेडमी ऑफ एलर्जी एंड क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी (EAACI)*: 

मधुमक्खी के विष से एलर्जी के लक्षणों और उपचार पर एक अध्ययन प्रकाशित किया गया है।

👉5. *जॉर्नल ऑफ एपिडेमियोलॉजी एंड कम्युनिटी हेल्थ*: 

मधुमक्खी के विष के चिकित्सीय उपयोगों पर एक अध्ययन प्रकाशित किया गया है।

👉6. *जर्नल ऑफ टॉक्सिकोलॉजी*: 

मधुमक्खी के विष में पाए जाने वाले रसायनों के चिकित्सीय उपयोगों पर कई अध्ययन प्रकाशित किए गए हैं।

👉7. *पबमेड*:

 मधुमक्खी के विष और एपिथेरेपी पर कई अध्ययन प्रकाशित किए गए हैं।


इन संगठनों और पत्रिकाओं में प्रकाशित अध्ययनों से पता चलता है कि मधुमक्खी के विष और एपिथेरेपी के सम्बंध में अनुसंधान चल रहा है और इसके चिकित्सीय उपयोगों की संभावनाएं हैं।

👉इसका विदेशों में प्रथम बार उल्लेख:+🪷

एपेथेरेपी का पहला उल्लेख ऑस्ट्रिया के डॉक्टर 👉फिलिप टेरेक के 1888 में लिखे गए लेख में मिलता है, जिसमें उन्होंने मधुमक्खी के डंक से गठिया के उपचार के सम्बंध में लिखा था।

हंगरी के डॉक्टर 👉बोडोग एफ ने 1935 में पहली बार मधुमक्खी विष चिकित्सा शब्द का उपयोग किया था, जिसे बी वेनम थेरेपी के नाम से जाना जाता है।

👉👉आपको बता दूं कि,🙏


एपेथेरेपी का पहला उल्लेख ऑस्ट्रिया के डॉक्टर 👉फिलिप टेरेक के 1888 में लिखे गए लेख में मिलता है, जिसमें उन्होंने मधुमक्खी के डंक से गठिया के उपचार के सम्बंध में लिखा था।


यह लेख एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है एपेथेरेपी के इतिहास में, और यह दर्शाता है कि मधुमक्खी के डंक के चिकित्सीय उपयोग के सम्बंध में ज्ञान कितना प्राचीन है।


डॉक्टर फिलिप टेरेक के लेख के उपरान्त, कई अन्य वैज्ञानिकों और चिकित्सकों ने एपेथेरेपी पर शोध किया और इसके उपयोग को बढ़ावा दिया।


👉एपेथेरेपी के इतिहास में कुछ महत्वपूर्ण तिथियाँ:👇


- 1888: डॉक्टर👉 फिलिप टेरेक ने मधुमक्खी के डंक से गठिया के उपचार के सम्बंध में लिखा।

- 1935: डॉक्टर 👉बोडोग एफ ने मधुमक्खी विष चिकित्सा शब्द का उपयोग किया।

- 1950s-60s: एपेथेरेपी का उपयोग यूरोप में बढ़ने लगा।

- 1970s-80s: एपेथेरेपी का उपयोग अमेरिका में भी बढ़ने लगा।

- 1990s-वर्तमान: एपेथेरेपी के बारे में वैज्ञानिक शोध चल रहा है।


👉एपेथेरेपी को अल्टरनेटिव थैरेपी के रूप में प्रयोग किया जाता है, और इसकी प्रभावशीलता और सुरक्षा के सम्बंध में अभी भी अध्ययन प्रगति में हैं।


👉जर्मनी में एपेथेरेपी का प्रचार प्रसार बड़े स्तर पर है, और कई लोग इसका उपयोग विभिन्न रोगों के उपचार के लिए करते हैं।


👉एपेथेरेपी के सम्बंध में कुछ रोचक तथ्य:👇


👉- 1888 में डॉक्टर फिलिप टेरेक ने मधुमक्खी के डंक से गठिया के उपचार के सम्बंध में लिखा।

👉- 1935 में डॉक्टर बोडोग एफ ने मधुमक्खी विष चिकित्सा शब्द का उपयोग किया।

👉- जर्मनी में एपेथेरेपी का चलन बड़े स्तर पर है।

👉- एपेथेरेपी को अल्टरनेटिव थैरेपी के रूप में प्रयोग किया जाता है।

👉- इसकी प्रभावशीलता और सुरक्षा के बारे में अभी भी अध्ययन किया जा रहा है।

👉निष्कर्ष 👇 

कि, यह वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति से भी हम पीड़ित लोगों का उपचार कर सकते हैं। लेकिन सावधानी और सुरक्षा के साथ, जिससे सामान्य जन भ्रमित न हों।

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मंगलवार, 22 अक्टूबर 2024

इन# टूल्स का उपयोग वेब डेवलपर्स द्वारा वेब पेज बनाने में करें, पूर्णतया फ्री

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यह एक जावास्क्रिप्ट कोड है जो वेबसाइट पर विज्ञापन दिखाने के लिए उपयोग किया जाता है। यह कोड दो भागों में विभाजित है:

*जावास्क्रिप्ट भाग:*

```
<script type="text/javascript" src="(link unavailable)"></script>
```

यह जावास्क्रिप्ट कोड (link unavailable) से एक विज्ञापन लोड करता है, जो निम्नलिखित विवरणों के साथ आता है:

- `section=General`: विज्ञापन की श्रेणी
- `pub=515167`: पब्लिशर का आईडी
- `format=300x250`: विज्ञापन का आकार (300x250 पिक्सल)
- `ga=g`: अन्य विज्ञापन संबंधी पैरामीटर

*नॉन-जावास्क्रिप्ट भाग (नोस्क्रिप्ट):*

```
<noscript>
  <a href="(link unavailable)" target="_blank">
    <img src="//ylx-aff.advertica-cdn.com/pub/300x250.png" 
         style="border:none;margin:0;padding:0;vertical-align:baseline;" 
         alt="ylliX - Online Advertising Network" />
  </a>
</noscript>
```

यह भाग तब काम करता है जब विजिटर के ब्राउज़र में जावास्क्रिप्ट अक्षम होता है। इसमें एक इमेज टैग होता है जो ylliX विज्ञापन नेटवर्क का लोगो दिखाता है, और एक लिंक होता है जो यลลिक्स की वेबसाइट पर ले जाता है।

यह कोड वेबसाइट पर विज्ञापन दिखाने के लिए उपयोग किया जाता है, और यह विज्ञापन नेटवर्क के साथ मिलकर काम करता है।

# " प्रेम और परिवार के प्रति अपना दायित्व"

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नीचे दी जा रही एक घटना जैसी, एक बहुत ही भावपूर्ण और प्रेरक कहानी है जो परिवार के प्रति सकारात्मक, प्रेम और समर्थन की महत्ता को दर्शाती है।

इस कहानी में मोहन की दीदी और पापा ने अपने प्रेम और समर्थन से मोहन के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत किया है, जो उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण शिक्षा सिद्ध हुई।

कहानी के माध्यम से निम्नलिखित संदेश दिए गए हैं:

1. परिवार के प्रति स्वयं का दायित्व और स्नेह का महत्व।

2. अपने वचनों को पूरा करने की महत्ता।

3. समर्थन और सहयोग की भावना।

4. परिवार के सदस्यों के बीच आपसी समझ और संवेदना।


✍️👉"बेटा! थोड़ा भोजन खाकर जा ..!! दो दिन से तूने कुछ भी खाया नहीं है।" ये उस विवश माता के शब्द है  जो अपने बेटे को समझाने के लिये, कह रही है।


👉"देख मां ! मैंने मेरी बारहवीं बोर्ड की परीक्षा के बाद अवकाश में सेकेंड हैंड बाइक मांगी थी, और पापा ने देने को सुनिश्चित किया था। आज मेरे इस सत्र के अन्तिम परीक्षा प्रश्न पत्र के उपरान्त दीदी को कह देना कि जैसे ही मैं परीक्षा खंड से बाहर आऊंगा तब पैसा लेकर बाहर खडी रहे। मेरे मित्र की पुरानी बाइक आज ही मुझे लेनी है और हाँ, यदि दीदी वहाँ पैसे लेकर नहीं आयी तो मैं घर वापस नहीं आऊंगा।"


एक निर्धन घर में बेटे मोहन की हठ और माता की विवशता आमने सामने टकरा रही थी।


"बेटा! तेरे पिता तुझे मोटरसाइकिल लेकर देने ही वाले थे, लेकिन पिछले महीने हुई दुर्घटना के कारण,,,,,.


माता कुछ बोले उसके पहले मोहन बोला "मैं कुछ नहीं जानता .. मुझे तो मोटरसाइकिल चाहिये ही चाहिये ..!!"


ऐसा बोलकर मोहन अपनी माता को निर्धनता एवं विवशता की मझधार में छोड़ कर घर से बाहर निकल गया।


12वीं बोर्ड की परीक्षा के बाद भागवत 'सर' एक अनोखी परीक्षा का आयोजन करते थे।

लेकिन भागवत सर का विषय गणित था, किन्तु विद्यार्थियों को जीवन का भी गणित भी समझाते थे और उनके सभी विद्यार्थी विविधता से भरी ये परीक्षा अवश्य देने जाते थे। 


इस वर्ष परीक्षा का विषय था *मेरी पारिवारिक भूमिका*


मोहन परीक्षा खंड में आकर बैठ गया।उसने मन में गांठ बांध ली थी कि यदि मुझे मोटरसाइकिल लेकर नहीं देंगे तो मैं घर नहीं आऊंगा।


भागवत सर ने सभी  छात्रों को परीक्षा प्रश्न पत्र वितरित हो गया। उस प्रश्नपत्र में 10 प्रश्न थे। उत्तर देने के लिये एक घंटे का समय दिया गया था।


मोहन ने पहला प्रश्न पढा और उत्तर लिखना प्रारम्भ किया।


*प्रश्न संख्या १ :- आपके घर में आपके पिताजी, माताजी, बहन, भाई और आप कितने घंटे काम करते हो? सविस्तार बताइये?*


मोहन ने शीघ्र से उत्तर लिखना प्रारम्भ कर दिया।


उत्तर:

पिताजी प्रातः छह बजे अल्पाहार के साथ अपनी ओटोरिक्शा लेकर निकल जाते हैं और रात को नौ बजे वापस आते हैं। कभी कभार वर्दी में जाना पड़ता है। ऐसे में लगभग पंद्रह घंटे।


माता जी प्रातः चार बजे उठकर पिताजी का  अल्पाहार बनाकर, उपरान्त में घर का सारा काम करती हैं। दोपहर को सिलाई का काम करती है और सभी लोगों के सो जाने के बाद  ही वह सोती हैं। लगभग प्रतिदिन के सोलह घंटे।


दीदी प्रातः महाविद्यालय जाती हैं, शाम को 4 से 8 अंशकालिक वैतनिक सेवा करती हैं। रात्रि को माता जी को  घरेलू काम में सहायता करती हैं। लगभग बारह से तेरह घंटे।


मैं, प्रातः छह बजे उठता हूँ, और दोपहर विद्यालय से आकर भोजन करके सो जाता हूँ। सायं काल को अपने मित्रों के साथ टहलता हूँ। रात्रि को ग्यारह बजे तक पढता हूँ। लगभग दस घंटे।


(इससे मोहन को मन ही मन लगा, कि उनका कामकाज का औसत सबसे कम है।)


पहले प्रश्न के उत्तर के उपरान्त मोहन ने दूसरा प्रश्न पढा ..


*प्रश्न संख्या २ :- आपके घर की मासिक कुल आय कितनी है?*

उत्तर: पिता की आय लगभग दस हजार हैं। माता जी एवं दीदी मिलकर पांंच हजार जोडते हैं। कुल आय पंद्रह हजार।


*प्रश्न संख्या ३ :- मोबाइल रिचार्ज प्लान, आपकी मन अनुकूल दूरदर्शन पर आ रहे तीन धारावाहिक के नाम, नगर के एक सिनेमा हॉल का पता और अभी वहां चल रहे चलचित्र का नाम बताइये?*


सभी प्रश्नों के उत्तर सरल होने से तुरन्त दो मिनट में लिख दिये ..


*प्रश्न संख्या ४ :- एक किलो आलू और भिन्डी के अभी के मूल्य क्या है? एक किलो गेहूं, चावल और तेल का मूल्य बताइये? जहाँ पर घर का गेहूं पिसाने जाते हो उस आटा चक्की का पता दीजिये।*


मोहनभाई को इस प्रश्न का उत्तर नहीं आया। उसे समझ में आया कि हमारी दैनिक आवश्यक वस्तुओं के सम्बंध में तो उसे लेशमात्र भी ज्ञान नहीं है। माता जी जब भी कोई काम बताती थी तो मैं मना कर देता था। आज उसे ज्ञान हुआ कि अनावश्यक वस्तुएं ,मोबाइल रिचार्ज, चलचित्रों का ज्ञान इतना उपयोगी नहीं है। अपने घर के काम का उत्तरदायित्व लेने से या तो सहयोग कर साथ देने से हम भागते रहे हैं।


*प्रश्न संख्या ५ :- आप अपने घर में भोजन को लेकर कभी विवाद या क्रोध करते हो?*


उत्तर : हां, मुझे आलू के अतिरिक्त अन्य कोई भी सब्जी मन अनुकूल नहीं है। यदि माता जी और कोई सब्जी बनायें तो, मेरे घर में अनावश्यक विवाद होता है। कभी मैं बिना भोजन खायें  ही उठ खडा हो जाता हूँ। 

(इतना लिखते ही मोहन को स्मरण में आया कि आलू की सब्जी से माता जी के उदर में वायु अधिक बन जाने की पीड़ा होती हैं। उदर में शूल होता है। अपनी सब्जी में एक बडी चम्मच वो अजवाइन डालकर खाती हैं। एक दिन मैंने त्रुटि से माता जी की सब्जी खा ली, और मैंने उसे आस्वाद होने से थूक दिया था और पूछा कि माता जी तुम ऐसा क्यों खाती हो? तब दीदी ने बताया था कि हमारे घर की स्थिति ऐसी अच्छी नहीं है कि हम दो सब्जी बनाकर खायें। तुम्हारी हठी प्रवृत्ति के कारण माता विवश क्या करें?) मोहन ने अपनी स्मृतियों से बाहर आकर अगले प्रश्न को पढा।


*प्रश्न संख्या ६ :- आपने अपने घर में की हुई अन्तिम हठ के बारे में लिखिये।*


मोहन ने उत्तर लिखना प्रारम्भ किया। मेरी बोर्ड की परीक्षा पूर्ण होने के उपरान्त दूसरे ही दिन मोटरसाइकिल के लिये हठ की थी। पिताजी ने कोई उत्तर नहीं दिया था, माता जी ने समझाया कि घर में पैसे नहीं है। लेकिन मैं नहीं माना! मैंने दो दिन से घर में भोजन करना भी छोड़ दिया है। जबतक आप मुझे मोटरसाइकिल लाकर नहीं दोगे मैं  भोजन नहीं खाऊंगा और आज तो मैं वापस घर नहीं जाऊंगा कहके निकला हूं । अपनी हठ का प्रामाणिकता से मोहन ने उत्तर लिखा।


*प्रश्न संख्या ७ :- आपको अपने घर से मिल रही जेब खर्ची का आप क्या करते हो? आपके भाई-बहन कैसे व्यय करते हैं?*


उत्तर: हर महीने पिताजी , मुझे सौ रुपये देते हैं। उसमें से मैं, मनोनुकूल सुगन्ध, इत्र,चश्में आदि जैसी वस्तुएं लेता हूं, या अपने मित्रों की छोटे छोटे आयोजन में व्यय करता हूँ।


मेरी दीदी को भी पिताजी सौ रुपये देते हैं। वो स्वयं धनार्जन करती हैं और वेतन के पैसे से माता जी को आर्थिक सहायता करती हैं। हां, उसको दिये गये जेब खर्च को वो गल्ले में डालकर बचत करती हैं। उसे कोई अपने व्यक्तिगत आनन्द में धन अपव्यय करने की इच्छा नहीं है, क्योंकि वो कृपण भी हैं।


*प्रश्न संख्या ८ :- आप अपनी स्वयं की पारिवारिक भूमिका को कैसे समझते हो?*

 

प्रश्न अटपटा और जटिल होने के उपरान्त भी मोहन ने उत्तर लिखा।

परिवार के साथ जुड़े रहना, एकदूसरे के प्रति समझदारी से व्यवहार करना एवं  सहायरूप होना चाहिये और ऐसे ही अपने उत्तरदायित्व को निभाना चाहिये। 

 

यह लिखते लिखते ही मेरी अंतरात्मासे पुकार आयी कि अरे मोहन! तुम स्वयं अपनी पारिवारिक भूमिका को योग्य रूप से निभा रहे हो? और अंतरात्मा से उत्तर आया कि ना बिल्कुल नहीं ..!!


*प्रश्न संख्या ९ :- आपके परिणाम से आपके माता-पिता प्रसन्न हैं? क्या वह अच्छे परिणाम के लिये आपसे हठ करते हैं? आपको डांटते रहते हैं?*


(इस प्रश्न का उत्तर लिखने से पहले, मोहन की आंखें भर आयी। अब वह परिवार के प्रति अपनी भूमिका बराबर समझ चुका था।)

वैसे तो मैं कभी भी मेरे माता-पिता को आजतक संतोषजनक परिणाम नहीं दे पाया हूँ। लेकिन इसके लिये उन्होंने कभी भी हठ नहीं की है। मैंने बहुत बार अच्छे परिणाम के वचन तोडे हैं। इसके उपरान्त भी हल्की सी डांट के बाद वही प्रेम और वात्सल्य बना रहता था।


*प्रश्न संख्या १० :- पारिवारिक जीवन में प्रभावी भूमिका निभाने के लिये इस अवकाश में आप कैसे परिवार के लिए सहायक रूप होंगें?*

उत्तर देने में मोहन की लेखनी चले इससे पहले उसकी आंखों से आंसू बहने लगे, और उत्तर लिखने से पहले ही लेखनी रुक गई .. बेंच  पर  मुंख रखकर रोने लगा और पुनः से लेखनी उठायी तब भी वो कुछ भी न लिख पाया। अनुत्तर दसवां प्रश्न छोड़कर उत्तर पुस्तिका कक्षा अध्यापक को दे दिया।


विद्यालय के द्वार पर दीदी को देखकर उसकी ओर दौड़ पडा।"भैया! ये ले आठ हजार रुपये, माता जी ने कहा है कि मोटरसाइकिल लेकर ही घर आना।"

दीदी ने मोहन के सामने पैसे धर दिये।

" दीदी कहाँ से लायी ये पैसे?" मोहन ने पूछा।

दीदी ने बताया "मैंने मेरी कार्यालय से एक महीने का वेतन अग्रिम मांग लिया। माता जी ने भी जहां काम करती हैं वहीं से उधार ले लिया, और  शेष मेरी व्यक्तिगत व्यय की बचत से निकाल लिये। ऐसा करके तुम्हारी मोटरसाइकिल के पैसे की व्यवस्था हो गई हैं।

मोहन की दृष्टि पैसे पर स्थिर हो गई।


दीदी पुनः बोली " भाई, तुम माता जी को बोलकर निकले थे कि पैसे नहीं दोगी तो, मैं घर पर नहीं आऊंगा! अब तुम्हें समझना चाहिये कि तुम्हारा भी घर के प्रति कुछ दायित्व है। मुझे भी बहुत से आनन्द लेने की आवश्यकता होती हैं, लेकिन अपने आनन्द को पूरा करने से पहले मैं अपने परिवार को सबसे अधिक महत्व देती हूं। तुम हमारे परिवार के सबसे लाडले हो, पिता को पैर की पीड़ा हैं इसके उपरान्त भी तेरी मोटरसाइकिल के लिये पैसे कमाने और तुम्हें दिये वचन को पूरा करने अपने फ्रेक्चर वाले पैर होने के कष्ट को सहन करते हुए भी काम किये जा रहे हैं। तेरी मोटरसाइकिल के लिये। यदि तुम समझ सको तो अच्छा है, कल रात को अपने वचन को पूरा नहीं कर सकने के कारण बहुत दुःखी थे। इसके पीछे उनकी विवशता है।

शेष तुमने तो अनेकों बार अपने कहे वचन तोडे ही है न? मेरे हाथ में पैसे थमाकर दीदी घर की ओर चल निकली।


उसी समय उनका मित्र वहां अपनी मोटरसाइकिल लेकर आ गया, अच्छे से चमका कर ले आया था।"ले .. मोहन आज से ये मोटरसाइकिल तुम्हारी। सब बारह हजार में मांग रहे हैं, लेकिन ये तुम्हारे लिये आठ हजार।" मोहन मोटरसाइकिल की ओर एकटक देख रहा था। थोड़ी देर के बाद बोला, कि:

"मित्र तुम अपनी मोटरसाइकिल उस बारह हजार वाले को ही दे देना! मेरे पास पैसे की व्यवस्था नहीं हो पायी हैं और होने की शीघ्र ही कोई संभावना भी नहीं है।"वो सीधा भागवत सर के कक्ष में जा पहूंचा।

"अरे मोहन! कैसा लिखा है प्रश्न पत्र के उत्तर में?

भागवत सर ने मोहन की ओर देख कर पूछा।


"सर ..!!, यह कोई प्रश्न पत्र नहीं था, ये तो मेरे जीवन के लिये दिशानिर्देश था। मैंने एक प्रश्न का उत्तर छोड़ दिया है। किन्तु ये उत्तर लिखकर नहीं अपने जीवन का दायित्व निभाकर दूंगा और भागवत सर को चरणस्पर्श कर अपने घर की ओर निकल पडा।


घर पहुंचते ही, माता जी, पिताजी और दीदी सब उसकी राह देख रहे थे।

"बेटा! मोटरसाइकिल कहाँ हैं?" पिताजी ने पूछा। मोहन ने दीदी के हाथों में पैसे थमा दिये और कहा कि क्षमा करें! मुझे मोटरसाइकिल नहीं चाहिये। और पिताजी मुझे ऑटो की चाभी दो, आज से मैं पूरे छुट्टियों तक ऑटो चलाऊंगा और आप थोड़े दिन विश्राम करेंगे, और माता जी आज मैं मेरी पहला धनअर्जन कार्य प्रारम्भ होगा। इसलिये तुम अपनी मनभावन की मैथी की भाजी और बैगन ले आना, रात को हम सब साथ मिलकर के खाना खायेंगे।

 

मोहन के स्वभाव में आये परिवर्तन को देखकर माता जी ने उसको गले से लगा लिया और कहा कि "बेटा! प्रातः जो कहकर तुम गये थे वो बात मैंने तुम्हारे पिताजी को बतायी थी, और इसलिये वो दुःखी हो गये, काम छोड़ कर वापस घर आ गये। भले ही मुझे पेटउदर में शूल होता हो लेकिन आज तो मैं तेरी मनभावन की ही सब्जी बनाऊंगी।" 

मोहन ने कहा, "नहीं  मां! अब मै समझ गया हूँ कि मेरे घरपरिवार में मेरी भूमिका क्या है? मैं रात को बैंगन मैथी की सब्जी ही खाऊंगा, परीक्षा में मैंने अन्तिम प्रश्न का उत्तर नहीं लिखा हैं, वह प्रेक्टिकल करके ही दिखाना है, और हाँ मां हम गेहूं को पिसाने कहां जाते हैं, उस आटा चक्की का नाम और पता भी मुझे दे दो"और उसी समय भागवत सर ने घर में प्रवेश किया,और बोले "वाह! मोहन जो उत्तर तुमनें लिखकर नहीं दिये वो प्रेक्टिकल जीवन जीकर के दोगे। 

"सर! आप और यहाँ?" मोहन भागवत सर को देख कर आश्चर्य चकित हो गया।

"मुझे मिलकर तुम चले गये, उसके बाद मैंने तुम्हारा पेपर पढा इसलिये तुम्हारे घर की ओर निकल पडा। मैं बहुत देर से तुम्हारे अंदर आये परिवर्तन को सुन रहा था। मेरी अनोखी परीक्षा सफल रही और इस परीक्षा में तुमने पहला नंबर पाया है।" 

ऐसा बोलकर भागवत सर ने मोहन के सर पर हाथ रखा।मोहन ने तुरंत ही भागवत सर के पैर छुएँ और ऑटो रिक्शा चलाने के लिये निकल पडा....

       मेरा सभी सम्माननीय अभिभावकों से आग्रह है कि आप इस पोस्ट को आप भी अवश्य पढ़िएगा और अपने बच्चों को भी पढ़ने का अवसर दें इससे अच्छी पोस्ट मैंने अपने जीवन में आज तक नहीं पढी व्यावहारिक जीवन में तो मैंने अनुभव किया है लेकिन सभी लोगों को किस प्रकार से अनुभव कराया जाए इसके लिए मेरा आपसे आग्रह है कि आप स्वयं और अपने बच्चों को इस पोस्ट को अवश्य पढ़ने का अवसर प्रदान करें l

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केला और उसके लाभ

 केले के गुणकारी लाभ अधिक ही हैं! 🙏 यह एक ऐसा फल है जो हमारे शरीर को कई प्रकार से लाभ पहुंचाता है। आइए, इसके लाभों को विस्तार से जानते ह...