*#1 नवंबर अर्थात् कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को दीपावली मनाई तो हो जाएगा अनर्थ*
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यह लेख हिंदू पंचांग और धार्मिक ग्रंथों के आधार पर दीपावली की तिथि के बारे में चर्चा कर रहा है। लेख में स्पष्ट लिखा गया है कि दीपावली को 1 नवंबर को मनाना शास्त्रों के अनुसार नहीं है और इसके परिणामस्वरूप धन हानि और अन्य दुष्परिणाम हो सकते हैं।
लेख में शीघ्रबोध और स्कंदपुराण जैसे धार्मिक ग्रंथों के श्लोकों का उल्लेख किया गया है, जो दीपावली को कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा पर मनाने के विरुद्ध हैं। इसके अतिरिक्त, लेख में यह भी कहा गया है कि 1 नवंबर को प्रतिपदा विद्धा दूषित अमावस्या में दीपावली मनाना शास्त्रों के अनुसार नहीं है।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि सनातन हिंदू पंचांग और धार्मिक ग्रंथों में कई व्याख्याएं और मतभेद हो सकते हैं। इसलिए, दीपावली की तिथि के सम्बंध में कोई भी निर्णय लेने से पहले विभिन्न विद्वानों और पंचांगों का परामर्श लेना उचित होगा।
कुछ शास्त्रोक्त ग्रंथों से प्रमाण देखें,
दैवज्ञ काशीनाथ भट्टाचार्य के प्रसिद्ध ग्रन्थ शीघ्रबोध में दीपावली को लेकर सीधी सीधी बात लिखी है, पता नहीं अब तक इसपर किसी ने ध्यान क्यों नहीं दिया? शीघ्र बोध में स्पष्ट लिखा है :–
*दीपोत्सवस्य वेलायां प्रतिपद् दृश्यते यदि।*
*सा तिथिर्विबुधैस्त्याज्या यथा नारी रजस्वला॥*
दीपोत्सव के समय यदि प्रतिपदा दिख जाए तो उस दूषित तिथि को *रजस्वला की भाँति त्याग कर देना चाहिए।*
*आषाढ़ी श्रावणी वैत्र फाल्गुनी दीपमालिका।*
*नन्दा विद्धा न कर्तव्या कृते धान्यक्षयो भवेत्॥*
आषाढ़ी पूर्णिमा, रक्षाबंधन, होली और दीपावली को कभी भी नन्दा यानि प्रतिपदा से विद्ध नहीं करना चाहिए वरना धन धान्य का क्षय होता है।
जयपुर के एक गाँव फागी से एक वृद्ध पण्डितजी श्री दयाशंकर शास्त्री जी ने एक 100 साल पुरानी पुस्तक से निकालकर ये श्लोक दिए और कहा, कि 31 अक्टूबर को दीपावली मनवाकर धर्मसभा ने करोड़ों लोगों को बचा लिया। क्योंकि 1 को प्रतिपदा विद्धा दूषित अमावस्या में दीपावली करना बिल्कुल भी ठीक नहीं है। *31 अक्टूबर को ही दीपावली मनाएं और अपने धर्म की रक्षा करें।*
यहाँ कुछ और श्लोक हैं जो दीपावली की तिथि के बारे में चर्चा करते हैं:
1. स्कंदपुराण, वैष्णवखंड, कार्तिकमहात्म्य, अध्याय 10, श्लोक 11:
"माङ्गल्यंतद्दिनेचेत्स्याद्वित्तादितस्यनश्यति।
बलेश्चप्रतिपद्दर्शाद्यदिविद्धं भविष्यति।"
अर्थात् – अमावस्या विद्ध बलि प्रतिपदा तिथि में मोहवशात् माङ्गल्य कार्य हेतु अनुष्ठान करने से सारा धन नष्ट हो जाता है।
1. शीघ्रबोध, अध्याय 12, श्लोक 13:
"दीपोत्सवस्य वेलायां प्रतिपद् दृश्यते यदि।
सा तिथिर्विबुधैस्त्याज्या यथा नारी रजस्वला।"
अर्थात् – दीपोत्सव के समय यदि प्रतिपदा दिख जाए तो उस दूषित तिथि को रजस्वला की भाँति त्याग कर देना चाहिए।
1. व्रतराज, अध्याय 14, श्लोक 15:
"न कुर्वन्ति नरा इत्थं लक्ष्म्या ये सुखसुप्तिकाम्।
धनचिन्ताविहीनास्ते कथं रात्रौ स्वपन्ति हि।"
अर्थात् – जो वैष्णवावैष्णव बलिराज्य का उत्सव नहीं मनाते, उनके किए हुए सब धर्म व्यर्थ हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं है।
1. पद्मपुराण, उत्तरखंड, अध्याय 57, श्लोक 43:
"कार्तिके शुक्लपक्षे तु प्रतिपदि दीपावलीम्।
न कर्त्तव्या यथा शास्त्रे विहिता तद्दिने।"
अर्थात् – कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को दीपावली मनानी चाहिए, जैसा शास्त्रों में विहित है।
यहाँ कुछ और शास्त्रोक्त प्रमाण हैं जो दीपावली की तिथि के सम्बंध में चर्चा करते हैं:
1. गरुड़ पुराण, अध्याय 146, श्लोक 15-16:
"कार्तिके शुक्लपक्षे तु प्रतिपदि दीपावलीम्।
न कर्त्तव्या यथा शास्त्रे विहिता तद्दिने।।
दीपोत्सवस्य वेलायां प्रतिपद् दृश्यते यदि।
सा तिथिर्विबुधैस्त्याज्या यथा नारी रजस्वला।।"
अर्थात् – कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को दीपावली मनानी चाहिए, जैसा शास्त्रों में विहित है। दीपोत्सव के समय यदि प्रतिपदा दिख जाए तो उस दूषित तिथि को रजस्वला की भाँति त्याग कर देना चाहिए।
1. भाविष्य पुराण, अध्याय 143, श्लोक 10-11:
"कार्तिके शुक्लपक्षे तु प्रतिपदि दीपावलीम्।
लक्ष्मीपूजनं कुर्यात् तदा सर्वमंगलम्।
दीपोत्सवस्य वेलायां प्रतिपद् दृश्यते यदि।
सा तिथिर्विबुधैस्त्याज्या यथा नारी रजस्वला।।"
अर्थात् – कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को दीपावली मनानी चाहिए और लक्ष्मीपूजन करना चाहिए। दीपोत्सव के समय यदि प्रतिपदा दिख जाए तो उस दूषित तिथि को रजस्वला की भाँति त्याग कर देना चाहिए।
1. मत्स्य पुराण, अध्याय 53, श्लोक 25-26:
"कार्तिके शुक्लपक्षे तु प्रतिपदि दीपावलीम्।
न कर्त्तव्या यथा शास्त्रे विहिता तद्दिने।
दीपोत्सवस्य वेलायां प्रतिपद् दृश्यते यदि।
सा तिथिर्विबुधैस्त्याज्या यथा नारी रजस्वला।।"
अर्थात् – कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को दीपावली मनानी चाहिए, जैसा शास्त्रों में विहित है। दीपोत्सव के समय यदि प्रतिपदा दिख जाए तो उस दूषित तिथि को रजस्वला की भाँति त्याग कर देना चाहिए।
इन श्लोकों से स्पष्ट होता है कि दीपावली कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को मनानी चाहिए और प्रतिपदा विद्धा दूषित अमावस्या में दीपावली मनाना शास्त्रों के अनुसार नहीं है।
मैं आपको कुछ नए प्रमाण प्रदान करता हूँ:
1. भाविष्य पुराण (उत्तरखंड, अध्याय 143, श्लोक 10-11):
"कार्तिके शुक्लपक्षे तु प्रतिपदि दीपावलीम्।
लक्ष्मीपूजनं कुर्यात् तदा सर्वमंगलम्।
दीपोत्सवस्य वेलायां प्रतिपद् दृश्यते यदि।
सा तिथिर्विबुधैस्त्याज्या यथा नारी रजस्वला।"
अर्थात् – कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को दीपावली मनानी चाहिए और लक्ष्मीपूजन करना चाहिए। दीपोत्सव के समय यदि प्रतिपदा दिख जाए तो उस दूषित तिथि को रजस्वला की भाँति त्याग कर देना चाहिए।
1. मत्स्य पुराण_ (अध्याय 53, श्लोक 25-26):
"कार्तिके शुक्लपक्षे तु प्रतिपदि दीपावलीम्।
न कर्त्तव्या यथा शास्त्रे विहिता तद्दिने।
दीपोत्सवस्य वेलायां प्रतिपद् दृश्यते यदि।
सा तिथिर्विबुधैस्त्याज्या यथा नारी रजस्वला।"
अर्थात् – कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को दीपावली मनानी चाहिए, जैसा शास्त्रों में विहित है। दीपोत्सव के समय यदि प्रतिपदा दिख जाए तो उस दूषित तिथि को रजस्वला की भाँति त्याग कर देना चाहिए।
1. व्रतराज_ (अध्याय 14, श्लोक 15):
"न कुर्वन्ति नरा इत्थं लक्ष्म्या ये सुखसुप्तिकाम्।
धनचिन्ताविहीनास्ते कथं रात्रौ स्वपन्ति हि।"
अर्थात् – जो वैष्णवावैष्णव बलिराज्य का उत्सव नहीं मनाते, उनके किए हुए सब धर्म व्यर्थ हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं है।
इन प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि दीपावली कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा पर मनानी चाहिए, लेकिन यदि प्रतिपदा विद्धा दूषित अमावस्या में हो तो यह शुभ नहीं होता है।
◆ इसके अतिरिक्त स्कंदपुराण के द्वितीय भाग वैष्णवखंड के कार्तिकमहात्म्य के 10वें अध्याय “दीपावली कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा महात्म्य” नामक अध्याय के श्लोक क्रमांक 11 में भगवान श्री ब्रह्माजी ने स्पष्ट कह दिया...
“माङ्गल्यंतद्दिनेचेत्स्याद्वित्तादितस्यनश्यति।
बलेश्चप्रतिपद्दर्शाद्यदिविद्धं भविष्यति॥"
अर्थात् –
अमावस्या विद्ध बलि प्रतिपदा तिथि में मोहवशात् माङ्गल्य कार्य हेतु अनुष्ठान करने से सारा धन नष्ट हो जाता है।"
1 नवम्बर दिनांक को प्रतिपदा तिथि प्रारम्भ हो जाएगी और यही धन हानि करने वाली स्थिति बन रही है व इससे पूरा समाज संकट में पड़ रहा है। इसलिए भूलकर भी प्रतिपदा तिथि को दीपावली न मनाए।
◆ 1 नवंबर को बिना कर्मकाल के दीपावली मनाने के दुष्परिणाम -
व्रतराज में तो यहाँ तक कहा है -
न कुर्वन्ति नरा इत्थं लक्ष्म्या ये सुखसुप्तिकाम् ।
धनचिन्ताविहीनास्ते कथं रात्रौ स्वपन्ति हि ॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन लक्ष्मीं सुस्वापयेन्नरः ।
दुःखदारिद्यानिर्मुक्तः स्वजातौ स्यात् प्रतिष्ठितः ।॥
ये वैष्णवावैष्णवा या बलिराज्योत्सवं नराः।
न कुर्वन्ति वृथा तेषां धर्माः स्युर्नात्र संशयः ॥
उस सुखसुप्तिका में जो लक्ष्मी के लिए कमलों की शय्या बनाकर पूजते नहीं, वे पुरुष कभी रात्रि में धन की चिन्ता के बिना नहीं सोते। इसलिए सब तरह से प्रयास कर लक्ष्मी को सुखशय्या पर शयन करावे , वह दुःख दारिद्य से छूटकर अपनी जाति में प्रतिष्ठित हो जाता है। जो वैष्णव या अवैष्णव बलिराज्य का उत्सव नहीं मनाते, उनके किए हुए सब धर्म व्यर्थ हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं है।
स्पष्ट है कि प्रदोष व अर्धरात्रि में अमावस्या होने से 31 अक्टूबर की रात्रि को ही सुखसुप्तिका और बलिराज्य का उत्सव दीपावली है, तब 1 नवंबर की रात्रि में प्रतिपदा में यह सब शास्त्रोक्त कर्म करने का फल कैसे मिलेगा ?
मैं आपको कुछ अन्य संतोषजनक उत्तर देने के लिए प्रयास करूंगा।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, दीपावली कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा पर मनानी चाहिए। लेकिन यदि प्रतिपदा विद्धा दूषित अमावस्या में हो तो यह शुभ नहीं होता है।
यहाँ कुछ प्रमाण हैं:
1. *शीघ्रबोध* (अध्याय 12, श्लोक 13):
"दीपोत्सवस्य वेलायां प्रतिपद् दृश्यते यदि।
सा तिथिर्विबुधैस्त्याज्या यथा नारी रजस्वला।"
अर्थात् – दीपोत्सव के समय यदि प्रतिपदा दिख जाए तो उस दूषित तिथि को रजस्वला की भाँति त्याग कर देना चाहिए।
1. *स्कंदपुराण* (वैष्णवखंड, कार्तिकमहात्म्य, अध्याय 10, श्लोक 11):
"माङ्गल्यंतद्दिनेचेत्स्याद्वित्तादितस्यनश्यति।
बलेश्चप्रतिपद्दर्शाद्यदिविद्धं भविष्यति।"
अर्थात् – अमावस्या विद्ध बलि प्रतिपदा तिथि में मोहवशात् माङ्गल्य कार्य हेतु अनुष्ठान करने से सारा धन नष्ट हो जाता है।
1. *गरुड़ पुराण* (अध्याय 146, श्लोक 15-16):
"कार्तिके शुक्लपक्षे तु प्रतिपदि दीपावलीम्।
न कर्त्तव्या यथा शास्त्रे विहिता तद्दिने।।
दीपोत्सवस्य वेलायां प्रतिपद् दृश्यते यदि।
सा तिथिर्विबुधैस्त्याज्या यथा नारी रजस्वला।।"
अर्थात् – कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को दीपावली मनानी चाहिए, जैसा शास्त्रों में विहित है। दीपोत्सव के समय यदि प्रतिपदा दिख जाए तो उस दूषित तिथि को रजस्वला की भाँति त्याग कर देना चाहिए।
दिपावली 2024 के वैज्ञानिक विश्लेषण के बारे में बात करते समय, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि दिपावली का त्योहार विज्ञान और ज्योतिष के सिद्धांतों पर आधारित है। दिपावली की तिथि निर्धारित करने के लिए ज्योतिषीय गणनाओं का उपयोग किया जाता है, जिसमें चंद्रमा की गति और अमावस्या तिथि का विश्लेषण शामिल है ¹।
इस साल, दिपावली 1 नवंबर को मनाई जाएगी, क्योंकि इस दिन अमावस्या तिथि का अधिक समय होगा ¹। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से, दिपावली का त्योहार प्रकाश और अंधकार के बीच के संघर्ष का प्रतीक है, जो विज्ञान के सिद्धांतों के अनुरूप है।
*दिपावली के वैज्ञानिक पहलू:*
*प्रकाश और अंधकार का संघर्ष:*
दिपावली का त्योहार प्रकाश और अंधकार के बीच के संघर्ष का प्रतीक है, जो विज्ञान के सिद्धांतों के अनुरूप है।
*ज्योतिषीय गणनाएं:*
दिपावली की तिथि निर्धारित करने के लिए ज्योतिषीय गणनाओं का उपयोग किया जाता है, जिसमें चंद्रमा की गति और अमावस्या तिथि का विश्लेषण सम्मिलित है।
- *प्राकृतिक चक्र:* दिवाली का त्योहार प्राकृतिक चक्र के साथ जुड़ा हुआ है, जिसमें दिन और रात का चक्र, और ऋतुओं का परिवर्तन शामिल है।
इन वैज्ञानिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए, हम दिवाली के त्योहार को एक वैज्ञानिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से समझ सकते हैं।
इन प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि दीपावली कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा पर मनानी चाहिए, लेकिन यदि प्रतिपदा विद्धा दूषित अमावस्या में हो तो यह शुभ नहीं होता है।
अतः 31 अक्टूबर को ही दीपावली मनाकर आनंद करें और पटाखे भी फोड़े जिससे वर्षा ऋतु से उत्पन्न हानिकारक कीटों का भी समापन हो जाय। घर में ही मिठाई, पकवान बनाए, बाजार में सभी वस्तुएं लाभ उठाने के लिए मिलावटी सस्ता तेल, घी, मावा और खाद्य पदार्थ बेचे जाते हैं। अतः स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहना चाहिए।
डॉ त्रिभुवन नाथ श्रीवास्तव, पूर्व प्राचार्य।





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