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शनिवार, 26 अक्टूबर 2024

# माता समान कोई और नहीं।।

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श्री कृष्ण की मैया,यशोदा माता 

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  ✍️नीचे दिया जा रहा सूत्र, भ#गवान वेदव्यास जी द्वारा माता के महत्व का मार्मिक चित्रण है। यह स्तोत्र माता के समान किसी को नहीं मानता और उन्हें परमगुरु के रूप में प्रतिष्ठित करता है।👇


माता के समान कोई नहीं है, यहां तक कि:


- पिता से भी बढ़कर है माता।

- गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं।

- विष्णु के समान प्रभु नहीं।

- शिव के समान कोई पूज्य नहीं।

- एकादशी के समान कोई व्रत नहीं।

- अनशन से बढ़कर कोई तप नहीं।

- पत्नी के समान कोई मित्र नहीं।

- पुत्र के समान कोई प्रिय नहीं।

- बहन के समान कोई माननीय नहीं।

- जामाता के समान कोई दान का पात्र नहीं।

- कन्यादान के समान कोई दान नहीं।


माता ही धारित्री, जननी, दयार्द्रहृदया, शिवा, देवी, त्रिभुवनश्रेष्ठा, निर्दोषा, और सर्वदुःखहा है।🍁🍁 


👉माता का स्थान.. सनातन वैदिक संस्कृति में...... शास्त्रों के अनुसार 👇 इस प्रकार कहा गया है,

🪷मात् देवो भव:पितृ देवो भव:🪷


 🪷१. पितुरप्यधिका माता गर्भधारणपोषणात् ।

         अतो हि त्रिषु लोकेषु नास्ति मातृसमो गुरुः॥🪷


गर्भ को धारण करने और पालनपोषण करने के कारण माता का स्थान पिता से भी बढकर है। इसलिए तीनों लोकों में माता के समान कोई गुरु नहीं अर्थात् माता परमगुरु है!


🪷२.नास्ति गङ्गासमं तीर्थं नास्ति विष्णुसमः प्रभुः।

       नास्ति शम्भुसमः पूज्यो नास्ति मातृसमो गुरुः॥🪷


गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं, विष्णु के समान प्रभु नहीं और शिव के समान कोई पूज्य नहीं और माता के समान कोई गुरु नहीं।


🪷३.नास्ति चैकादशीतुल्यं व्रतं त्रैलोक्यविश्रुतम्।

        तपो नाशनात् तुल्यं नास्ति मातृसमो गुरुः॥


एकादशी के समान त्रिलोक में प्रसिद्ध कोई व्रत नहीं, अनशन से बढकर कोई तप नहीं और माता के समान गुरु नहीं!


🪷४.नास्ति भार्यासमं मित्रं नास्ति पुत्रसमः प्रियः।

       नास्ति भगिनीसमा मान्या नास्ति मातृसमो गुरुः॥


पत्नी के समान कोई मित्र नहीं, पुत्र के समान कोई प्रिय नहीं, बहन के समान कोई माननीय नहीं और माता के समान गुरु नही!


🪷५.न जामातृसमं पात्रं न दानं कन्यया समम्।

        न भ्रातृसदृशो बन्धुः न च मातृसमो गुरुः ॥

.

जामाता (पुत्री का पति)के समान कोई दान का पात्र नहीं, कन्यादान के समान कोई दान नहीं, भाई के जैसा कोई बन्धु नहीं और माता जैसा गुरु नहीं!


🪷६.देशो गङ्गान्तिकः श्रेष्ठो दलेषु तुलसीदलम्।

        वर्णेषु ब्राह्मणः श्रेष्ठो गुरुर्माता गुरुष्वपि ॥


गंगा के किनारे का प्रदेश अत्यन्त श्रेष्ठ होता है, पत्रों में तुलसीपत्र, वर्णों में ब्राह्मण और माता तो गुरुओं की भी गुरु है!


🪷७.पुरुषः पुत्ररूपेण भार्यामाश्रित्य जायते।

        पूर्वभावाश्रया माता तेन सैव गुरुः परः ॥


पत्नी का आश्रय लेकर पुरुष ही पुत्र रूप में उत्पन्न होता है, इस दृष्टि से अपने पूर्वज पिता का भी आश्रय माता होती है और इसीलिए वह परमगुरु है!


🪷८.मातरं पितरं चोभौ दृष्ट्वा पुत्रस्तु धर्मवित्।

        प्रणम्य मातरं पश्चात् प्रणमेत् पितरं गुरुम् ॥


धर्म को जानने वाला पुत्र माता पिता को साथ देखकर पहले माता को प्रणाम करे फिर पिता और गुरु को!


🪷९.माता धरित्री जननी दयार्द्रहृदया शिवा ।

        देवी त्रिभुवनश्रेष्ठा निर्दोषा सर्वदुःखहा॥


माता, धरित्री , जननी , दयार्द्रहृदया, शिवा, देवी , त्रिभुवनश्रेष्ठा, निर्दोषा, सभी दुःखों का नाश करने वाली है!


🪷१०.आराधनीया परमा दया शान्तिः क्षमा धृतिः ।

          स्वाहा स्वधा च गौरी च पद्मा च विजया जया ॥


आराधनीया, परमा, दया , शान्ति , क्षमा, धृति, स्वाहा , स्वधा, गौरी , पद्मा, विजया , जया,


🪷११.दुःखहन्त्रीति नामानि मातुरेवैकविंशतिम् ।

          शृणुयाच्छ्रावयेन्मर्त्यः सर्वदुःखाद् विमुच्यते ॥


और दुःखहन्त्री -ये माता के इक्कीस नाम हैं। इन्हें सुनने सुनाने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है!


🪷१२.दुःखैर्महद्भिः दूनोऽपि दृष्ट्वा मातरमीश्वरीम्।

          यमानन्दं लभेन्मर्त्यः स किं वाचोपपद्यते ॥


बड़े बड़े दुःखों से पीडित होने पर भी भगवती माता को देखकर मनुष्य जो आनन्द प्राप्त करता है उसे वाणी द्वारा नहीं कहा जा सकता!


🪷१३.इति ते कथितं विप्र मातृस्तोत्रं महागुणम्।

          पराशरमुखात् पूर्वम् अश्रौषं मातृसंस्तवम्॥


हे ब्रह्मन् ! इस प्रकार मैंने तुमसे महान् गुण वाले मातृस्तोत्र को कहा , इसे मैंने अपने पिता पराशर के मुख से पहले सुना था!


🪷१४.सेवित्वा पितरौ कश्चित् व्याधः परमधर्मवित्।

          लेभे सर्वज्ञतां या तु साध्यते न तपस्विभिः॥


अपने माता पिता की सेवा करके ही किसी परम धर्मज्ञ व्याध ने उस सर्वज्ञता को पा लिया था जो बडे बडे तपस्वी भी नहीं पाते!


🪷१५.तस्मात् सर्वप्रयत्नेन भक्तिः कार्या तु मातरि।

          पितर्यपीति चोक्तं वै पित्रा शक्तिसुतेन मे ॥


इसलिए सब प्रयत्न करके माता और पिता की भक्ति करनी चाहिए, मेरे पिता शक्तिपुत्र पराशर जी ने भी मुझसे यही कहा था!


इसी लिए कहा गया है.......


🪷यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता🪷


नारियों का सम्मान करो जब तक नारियों का सम्मान नही करोगे तब तक जीवन में तुम्हें सफलता नही मिलेगी ।।


🪷यही नारी मां है, पत्नी है, बहन है, बेटी है ।

यही दुर्गा है, यही गंगा है, यही पुरुष की शक्ति प्रकृति है।(प्रेषित)🪷


🪷इस स्तोत्र में माता के इक्कीस नामों का उल्लेख है, जिन्हें सुनने सुनाने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है।🪷


👉यह स्तोत्र हमें माता के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की स्मरण कराता है और उनकी सेवा को सर्वोपरि बताता है।👇

👉वेदों में माता के सम्मान में अन्य श्लोक प्रमाण अनुसार इस प्रकार मिलते हैं:👇


वेदों और हिंदू शास्त्रों में माता के सम्मान के लिए कई श्लोक हैं। यहाँ कुछ प्रमाण हैं:


👉. यजुर्वेद (19.33) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव"🪷


अर्थ: माता, पिता और गुरु को देवता के रूप में पूजा करो।


👉. मनुस्मृति (2.145) -

🪷"माता यस्य गृहे नास्ति द्वारे तस्य न विद्यते"🪷


अर्थ: जिसके घर में माता नहीं है, उसके घर का द्वार सूना है।


👉. महाभारत (अनुशासन पर्व 45.13) -

🪷"मातृ गुरुः पितृ गुरुः, यतः पिता तेन मातृतः"🪷


अर्थ: माता और पितृ दोनों ही गुरु हैं, लेकिन माता का स्थान पिता से भी ऊंचा है।


👉. भगवद्गीता (9.17) -

🪷"पितृ मातृ गुरुः स्वामी, विन्दति तद्विदः सुखम्"🪷


अर्थ: जो व्यक्ति पिता, माता और गुरु की सेवा करता है, वह सुख प्राप्त करता है।


👉. ऋग्वेद (10.85.42) -

🪷"मातृ भवति जननी, पितृ भवति गर्भधारी"🪷

अर्थ: माता जन्म देती है, पिता गर्भधारण का हेतु बनता है।


👉उपनिषदों में माता के सम्मान के लिए कई श्लोक हैं। यहाँ कुछ प्रमाणस्वरूप दिए जा रहे हैं:👇


👉. तैत्तिरीय उपनिषद् (1.9.1) -

🪷"मातृ भवति जननी, पितृ भवति गर्भधारी"🪷


अर्थ: माता जन्म देती है, पिता गर्भधारण का हेतु बनता है।


👉. छांदोग्य उपनिषद् (6.7.1) -

🪷"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता"🪷


अर्थ: जहाँ नारियों का सम्मान किया जाता है, वहाँ देवता प्रसन्न रहते हैं।


👉. बृहदारण्यक उपनिषद् (6.4.1) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो।


👉. श्वेताश्वतर उपनिषद् (6.15) -

🪷"माता पिता गुरुः स्वामी, तेषां विद्या प्रदायकः"🪷


अर्थ: माता, पिता और गुरु ही विद्या के दाता हैं।


👉. मुंडक उपनिषद् (1.1.9) -

🪷"माता यस्य गृहे नास्ति, द्वारे तस्य न विद्यते"🪷


अर्थ: जिसके घर में माता नहीं है, उसके घर का द्वार सूना है।


उपरोक्त लिखे ये श्लोक माता के महत्व और सम्मान को दर्शाते हैं।


👉 पुराणों में माता के सम्मान में  कुछ अन्य श्लोक प्रमाण अनुसार इस प्रकार मिलते हैं। पुराणों में माता के सम्मान के लिए कई श्लोक हैं। यहाँ कुछ प्रमाण हैं:


👉. गरुड़ पुराण (1.113.12) -

🪷"माता गुरुः पिता गुरुः, मातृदेवो भव पितृदेवो भव"🪷


अर्थ: माता और पिता दोनों ही गुरु हैं, उनकी पूजा करो।


👉. पद्म पुराण (4.52.14) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव"🪷


अर्थ: माता, पिता और गुरु को देवता के रूप में पूजा करो।


👉. मार्कण्डेय पुराण (34.115) -

🪷"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता"🪷


अर्थ: जहाँ नारियों का सम्मान किया जाता है, वहाँ देवता प्रसन्न रहते हैं।


👉. विष्णु पुराण (3.9.22) -

🪷"माता पिता गुरुः स्वामी, तेषां विद्या प्रदायकः"🪷


अर्थ: माता, पिता और गुरु ही विद्या के दाता हैं।


👉. भागवत पुराण (5.1.37) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, मातृवचस्तु पूजयेत"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, और माता की वाणी का आदर करो।


👉. अग्नि पुराण (369.23) -

🪷"मातृवचस्तु पूजयेत, पितृवचस्तु पूजयेत"🪷


अर्थ: माता और पिता की वाणी का आदर करो।


👉पुराणों में माता के सम्मान के लिए और भी कई श्लोक हैं। यहाँ कुछ और प्रमाण हैं:👇


👉. ब्रह्म पुराण (13.16) -

🪷"माता गुरुः पिता गुरुः, मातृदेवो भव पितृदेवो भव"🪷


अर्थ: माता और पिता दोनों ही गुरु हैं, उनकी पूजा करो.


👉. लिंग पुराण (27.11) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, तेषां विद्या प्रदायकः"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, वे विद्या के दाता हैं.


👉. वराह पुराण (22.55) -

🪷"माता पिता गुरुः स्वामी, तेषां विद्या प्रदायकः"🪷


अर्थ: माता, पिता और गुरु ही विद्या के दाता हैं.


👉. कूर्म पुराण (17.12) -

🪷"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता"🪷


अर्थ: जहाँ नारियों का सम्मान किया जाता है, वहाँ देवता प्रसन्न रहते हैं.


👉. मत्स्य पुराण (53.32) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, मातृवचस्तु पूजयेत"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, और माता की वाणी का आदर करो.


👉. गरुड़ पुराण (1.113.15) -

🪷"माता गुरुः पिता गुरुः, तेषां विद्या प्रदायकः"🪷


अर्थ: माता और पिता दोनों ही गुरु हैं, वे विद्या के दाता हैं.


👉. शिव पुराण (6.5.33) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, मातृवचस्तु पूजयेत"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, और माता की वाणी का आदर करो.


उपरोक्त दिए गए श्लोक पुराणों में माता के महत्व और सम्मान को दर्शाते हैं।


दर्शन शास्त्रों में माता के सम्मान के लिए कई श्लोक हैं। यहाँ कुछ प्रमाण स्वरूप इस प्रकार से हैं:


👉. मनु स्मृति (2.145) -

🪷"माता यस्य गृहे नास्ति, द्वारे तस्य न विद्यते"🪷


अर्थ: जिसके घर में माता नहीं है, उसके घर का द्वार सूना है।


👉. याज्ञवल्क्य स्मृति (1.35) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो।


👉. अपरार्क का न्यायमुक्तावली (श्लोक 144) -

🪷"माता गुरुः पिता गुरुः, मातृदेवो भव पितृदेवो भव"🪷


अर्थ: माता और पिता दोनों ही गुरु हैं, उनकी पूजा करो।


👉. वासुदेव न्यायरत्नमाला (श्लोक 21) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, तेषां विद्या प्रदायकः"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, वे विद्या के दाता हैं।


👉. भारती तीर्थ का वेदांतसार (श्लोक 12) -

🪷"माता पिता गुरुः स्वामी, तेषां विद्या प्रदायकः"🪷


अर्थ: माता, पिता और गुरु ही विद्या के दाता हैं।


👉. अन्नम्बट्ट की तारकम (श्लोक 88) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, मातृवचस्तु पूजयेत"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, और माता की वाणी का आदर करो।


उपरोक्त दिए गए ये श्लोक दर्शन शास्त्रों में माता के महत्व और सम्मान को दर्शाते हैं। इसी प्रकार षडदर्शन में माता के सम्मान के लिए कई श्लोक हैं। यहाँ कुछ प्रमाण हैं :


👉. न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य 1.1.1) -

🪷"माता गुरुः पिता गुरुः, मातृदेवो भव पितृदेवो भव।"🪷


अर्थ: माता और पिता दोनों ही गुरु हैं, उनकी पूजा करो।


👉. वैशेषिक दर्शन (वैशेषिक सूत्र 1.1.12) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, तेषां विद्या प्रदायकः।"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, वे विद्या के दाता हैं।


👉. सांख्य दर्शन (सांख्य करिका 23) -

🪷"माता पिता गुरुः स्वामी, तेषां विद्या प्रदायकः।"🪷


अर्थ: माता, पिता और गुरु ही विद्या के दाता हैं।


👉. योग दर्शन (योग सूत्र 1.30) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, मातृवचस्तु पूजयेत।"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, और माता की वाणी का आदर करो।


👉. मीमांसा दर्शन (मीमांसा सूत्र 1.1.5) -

🪷"माता गुरुः पिता गुरुः, मातृदेवो भव पितृदेवो भव।"🪷


अर्थ: माता और पिता दोनों ही गुरु हैं, उनकी पूजा करो।


👉. वेदांत दर्शन (ब्रह्म सूत्र 1.1.1) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, तेषां विद्या प्रदायकः।"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, वे विद्या के दाता हैं।


ये श्लोक षडदर्शन में माता के महत्व और सम्मान को दर्शाते हैं।

👉तिब्बती साहित्य में माता का स्थान:👇

तिब्बती साहित्य में माता के सम्मान में कई महत्वपूर्ण सूत्र और ग्रन्थ हैं। यहाँ कुछ प्रमुख सूत्र दिए गए हैं:


🪷. तिब्बती बौद्ध धर्म में "माता-पिता की सेवा करना" महान पुण्य का कार्य माना जाता है। इस संदर्भ में, तिब्बती बौद्ध ग्रन्थ 👉"शंतिदेव का बोधिचर्यावतार" में माता-पिता की सेवा की महत्ता पर प्रकाश डाला गया है।


🪷. तिब्बती साहित्य में "मातृ-श्रद्धा" को बहुत महत्व दिया गया है। तिब्बती लोग अपनी माता को 👉"स्क्येमा" यानी "मातृ-देवी" कहते हैं।


🪷. तिब्बती बौद्ध धर्म में माता की भूमिका को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। तिब्बती बौद्ध ग्रन्थ "लामा रिनपोचे की शिक्षाएँ" में माता-पिता के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की भावना को विकसित करने पर बल दिया गया है।

इन सूत्रों और ग्रन्थों से तिब्बती साहित्य में माता के सम्मान की महत्ता स्पष्ट होती है।


👉दक्षिण भारतीय साहित्य में माता का स्थान :👇


दक्षिण भारत के साहित्य में माता का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। यहाँ कुछ उदाहरण हैं:


🪷 तमिल साहित्य में माता को "ताय" या "अम्मा" कहकर संबोधित किया जाता है, जो माता के प्रति सम्मान और प्रेम का प्रतीक है।


🪷 तेलुगु साहित्य में माता को "अम्मा" या "नायणम्मा" कहा जाता है, जो माता की देखभाल और स्नेह को दर्शाता है।


🪷 मलयालम साहित्य में माता को "अम्मा" या "मुट्टी" कहा जाता है, जो माता के प्रति प्रेम और आदर का प्रतीक है।


🪷 कन्नड़ साहित्य में माता को "अम्मा" या "तायी" कहा जाता है, जो माता की महत्ता और सम्मान को दर्शाता है।


इन उदाहरणों से पता चलता है कि दक्षिण भारत के साहित्य में माता का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है और उन्हें समाज में उच्च स्थान दिया जाता है।

👉निष्कर्ष 👇

माता के सम्मान में दिए गए श्लोक का निष्कर्ष यह है:👇


🪷"माता गृहं, माता जन्मभूमि, मातृदेवो भव।"🪷


इसका अर्थ है:👇


"माता ही घर है, माता ही जन्मभूमि है, और माता ही देवता है।"


यह श्लोक माता की महत्ता और सम्मान को दर्शाता है, और यह बताता है कि माता का स्थान सबसे ऊंचा है। अतः हम कह सकते हैं कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता में माता को जो सर्वोच्च स्थान मिला है वह कहीं भी नहीं देखने को मिलता है। पाश्चात्य और म्लेच्छ साहित्य की मिलावट से या देखने, पढ़ने और सुनने से अनेकों लोगों को भ्रम हो रहा है, कि माता कोई वस्तु है।

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