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मंगलवार, 22 अक्टूबर 2024

# " प्रेम और परिवार के प्रति अपना दायित्व"

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नीचे दी जा रही एक घटना जैसी, एक बहुत ही भावपूर्ण और प्रेरक कहानी है जो परिवार के प्रति सकारात्मक, प्रेम और समर्थन की महत्ता को दर्शाती है।

इस कहानी में मोहन की दीदी और पापा ने अपने प्रेम और समर्थन से मोहन के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत किया है, जो उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण शिक्षा सिद्ध हुई।

कहानी के माध्यम से निम्नलिखित संदेश दिए गए हैं:

1. परिवार के प्रति स्वयं का दायित्व और स्नेह का महत्व।

2. अपने वचनों को पूरा करने की महत्ता।

3. समर्थन और सहयोग की भावना।

4. परिवार के सदस्यों के बीच आपसी समझ और संवेदना।


✍️👉"बेटा! थोड़ा भोजन खाकर जा ..!! दो दिन से तूने कुछ भी खाया नहीं है।" ये उस विवश माता के शब्द है  जो अपने बेटे को समझाने के लिये, कह रही है।


👉"देख मां ! मैंने मेरी बारहवीं बोर्ड की परीक्षा के बाद अवकाश में सेकेंड हैंड बाइक मांगी थी, और पापा ने देने को सुनिश्चित किया था। आज मेरे इस सत्र के अन्तिम परीक्षा प्रश्न पत्र के उपरान्त दीदी को कह देना कि जैसे ही मैं परीक्षा खंड से बाहर आऊंगा तब पैसा लेकर बाहर खडी रहे। मेरे मित्र की पुरानी बाइक आज ही मुझे लेनी है और हाँ, यदि दीदी वहाँ पैसे लेकर नहीं आयी तो मैं घर वापस नहीं आऊंगा।"


एक निर्धन घर में बेटे मोहन की हठ और माता की विवशता आमने सामने टकरा रही थी।


"बेटा! तेरे पिता तुझे मोटरसाइकिल लेकर देने ही वाले थे, लेकिन पिछले महीने हुई दुर्घटना के कारण,,,,,.


माता कुछ बोले उसके पहले मोहन बोला "मैं कुछ नहीं जानता .. मुझे तो मोटरसाइकिल चाहिये ही चाहिये ..!!"


ऐसा बोलकर मोहन अपनी माता को निर्धनता एवं विवशता की मझधार में छोड़ कर घर से बाहर निकल गया।


12वीं बोर्ड की परीक्षा के बाद भागवत 'सर' एक अनोखी परीक्षा का आयोजन करते थे।

लेकिन भागवत सर का विषय गणित था, किन्तु विद्यार्थियों को जीवन का भी गणित भी समझाते थे और उनके सभी विद्यार्थी विविधता से भरी ये परीक्षा अवश्य देने जाते थे। 


इस वर्ष परीक्षा का विषय था *मेरी पारिवारिक भूमिका*


मोहन परीक्षा खंड में आकर बैठ गया।उसने मन में गांठ बांध ली थी कि यदि मुझे मोटरसाइकिल लेकर नहीं देंगे तो मैं घर नहीं आऊंगा।


भागवत सर ने सभी  छात्रों को परीक्षा प्रश्न पत्र वितरित हो गया। उस प्रश्नपत्र में 10 प्रश्न थे। उत्तर देने के लिये एक घंटे का समय दिया गया था।


मोहन ने पहला प्रश्न पढा और उत्तर लिखना प्रारम्भ किया।


*प्रश्न संख्या १ :- आपके घर में आपके पिताजी, माताजी, बहन, भाई और आप कितने घंटे काम करते हो? सविस्तार बताइये?*


मोहन ने शीघ्र से उत्तर लिखना प्रारम्भ कर दिया।


उत्तर:

पिताजी प्रातः छह बजे अल्पाहार के साथ अपनी ओटोरिक्शा लेकर निकल जाते हैं और रात को नौ बजे वापस आते हैं। कभी कभार वर्दी में जाना पड़ता है। ऐसे में लगभग पंद्रह घंटे।


माता जी प्रातः चार बजे उठकर पिताजी का  अल्पाहार बनाकर, उपरान्त में घर का सारा काम करती हैं। दोपहर को सिलाई का काम करती है और सभी लोगों के सो जाने के बाद  ही वह सोती हैं। लगभग प्रतिदिन के सोलह घंटे।


दीदी प्रातः महाविद्यालय जाती हैं, शाम को 4 से 8 अंशकालिक वैतनिक सेवा करती हैं। रात्रि को माता जी को  घरेलू काम में सहायता करती हैं। लगभग बारह से तेरह घंटे।


मैं, प्रातः छह बजे उठता हूँ, और दोपहर विद्यालय से आकर भोजन करके सो जाता हूँ। सायं काल को अपने मित्रों के साथ टहलता हूँ। रात्रि को ग्यारह बजे तक पढता हूँ। लगभग दस घंटे।


(इससे मोहन को मन ही मन लगा, कि उनका कामकाज का औसत सबसे कम है।)


पहले प्रश्न के उत्तर के उपरान्त मोहन ने दूसरा प्रश्न पढा ..


*प्रश्न संख्या २ :- आपके घर की मासिक कुल आय कितनी है?*

उत्तर: पिता की आय लगभग दस हजार हैं। माता जी एवं दीदी मिलकर पांंच हजार जोडते हैं। कुल आय पंद्रह हजार।


*प्रश्न संख्या ३ :- मोबाइल रिचार्ज प्लान, आपकी मन अनुकूल दूरदर्शन पर आ रहे तीन धारावाहिक के नाम, नगर के एक सिनेमा हॉल का पता और अभी वहां चल रहे चलचित्र का नाम बताइये?*


सभी प्रश्नों के उत्तर सरल होने से तुरन्त दो मिनट में लिख दिये ..


*प्रश्न संख्या ४ :- एक किलो आलू और भिन्डी के अभी के मूल्य क्या है? एक किलो गेहूं, चावल और तेल का मूल्य बताइये? जहाँ पर घर का गेहूं पिसाने जाते हो उस आटा चक्की का पता दीजिये।*


मोहनभाई को इस प्रश्न का उत्तर नहीं आया। उसे समझ में आया कि हमारी दैनिक आवश्यक वस्तुओं के सम्बंध में तो उसे लेशमात्र भी ज्ञान नहीं है। माता जी जब भी कोई काम बताती थी तो मैं मना कर देता था। आज उसे ज्ञान हुआ कि अनावश्यक वस्तुएं ,मोबाइल रिचार्ज, चलचित्रों का ज्ञान इतना उपयोगी नहीं है। अपने घर के काम का उत्तरदायित्व लेने से या तो सहयोग कर साथ देने से हम भागते रहे हैं।


*प्रश्न संख्या ५ :- आप अपने घर में भोजन को लेकर कभी विवाद या क्रोध करते हो?*


उत्तर : हां, मुझे आलू के अतिरिक्त अन्य कोई भी सब्जी मन अनुकूल नहीं है। यदि माता जी और कोई सब्जी बनायें तो, मेरे घर में अनावश्यक विवाद होता है। कभी मैं बिना भोजन खायें  ही उठ खडा हो जाता हूँ। 

(इतना लिखते ही मोहन को स्मरण में आया कि आलू की सब्जी से माता जी के उदर में वायु अधिक बन जाने की पीड़ा होती हैं। उदर में शूल होता है। अपनी सब्जी में एक बडी चम्मच वो अजवाइन डालकर खाती हैं। एक दिन मैंने त्रुटि से माता जी की सब्जी खा ली, और मैंने उसे आस्वाद होने से थूक दिया था और पूछा कि माता जी तुम ऐसा क्यों खाती हो? तब दीदी ने बताया था कि हमारे घर की स्थिति ऐसी अच्छी नहीं है कि हम दो सब्जी बनाकर खायें। तुम्हारी हठी प्रवृत्ति के कारण माता विवश क्या करें?) मोहन ने अपनी स्मृतियों से बाहर आकर अगले प्रश्न को पढा।


*प्रश्न संख्या ६ :- आपने अपने घर में की हुई अन्तिम हठ के बारे में लिखिये।*


मोहन ने उत्तर लिखना प्रारम्भ किया। मेरी बोर्ड की परीक्षा पूर्ण होने के उपरान्त दूसरे ही दिन मोटरसाइकिल के लिये हठ की थी। पिताजी ने कोई उत्तर नहीं दिया था, माता जी ने समझाया कि घर में पैसे नहीं है। लेकिन मैं नहीं माना! मैंने दो दिन से घर में भोजन करना भी छोड़ दिया है। जबतक आप मुझे मोटरसाइकिल लाकर नहीं दोगे मैं  भोजन नहीं खाऊंगा और आज तो मैं वापस घर नहीं जाऊंगा कहके निकला हूं । अपनी हठ का प्रामाणिकता से मोहन ने उत्तर लिखा।


*प्रश्न संख्या ७ :- आपको अपने घर से मिल रही जेब खर्ची का आप क्या करते हो? आपके भाई-बहन कैसे व्यय करते हैं?*


उत्तर: हर महीने पिताजी , मुझे सौ रुपये देते हैं। उसमें से मैं, मनोनुकूल सुगन्ध, इत्र,चश्में आदि जैसी वस्तुएं लेता हूं, या अपने मित्रों की छोटे छोटे आयोजन में व्यय करता हूँ।


मेरी दीदी को भी पिताजी सौ रुपये देते हैं। वो स्वयं धनार्जन करती हैं और वेतन के पैसे से माता जी को आर्थिक सहायता करती हैं। हां, उसको दिये गये जेब खर्च को वो गल्ले में डालकर बचत करती हैं। उसे कोई अपने व्यक्तिगत आनन्द में धन अपव्यय करने की इच्छा नहीं है, क्योंकि वो कृपण भी हैं।


*प्रश्न संख्या ८ :- आप अपनी स्वयं की पारिवारिक भूमिका को कैसे समझते हो?*

 

प्रश्न अटपटा और जटिल होने के उपरान्त भी मोहन ने उत्तर लिखा।

परिवार के साथ जुड़े रहना, एकदूसरे के प्रति समझदारी से व्यवहार करना एवं  सहायरूप होना चाहिये और ऐसे ही अपने उत्तरदायित्व को निभाना चाहिये। 

 

यह लिखते लिखते ही मेरी अंतरात्मासे पुकार आयी कि अरे मोहन! तुम स्वयं अपनी पारिवारिक भूमिका को योग्य रूप से निभा रहे हो? और अंतरात्मा से उत्तर आया कि ना बिल्कुल नहीं ..!!


*प्रश्न संख्या ९ :- आपके परिणाम से आपके माता-पिता प्रसन्न हैं? क्या वह अच्छे परिणाम के लिये आपसे हठ करते हैं? आपको डांटते रहते हैं?*


(इस प्रश्न का उत्तर लिखने से पहले, मोहन की आंखें भर आयी। अब वह परिवार के प्रति अपनी भूमिका बराबर समझ चुका था।)

वैसे तो मैं कभी भी मेरे माता-पिता को आजतक संतोषजनक परिणाम नहीं दे पाया हूँ। लेकिन इसके लिये उन्होंने कभी भी हठ नहीं की है। मैंने बहुत बार अच्छे परिणाम के वचन तोडे हैं। इसके उपरान्त भी हल्की सी डांट के बाद वही प्रेम और वात्सल्य बना रहता था।


*प्रश्न संख्या १० :- पारिवारिक जीवन में प्रभावी भूमिका निभाने के लिये इस अवकाश में आप कैसे परिवार के लिए सहायक रूप होंगें?*

उत्तर देने में मोहन की लेखनी चले इससे पहले उसकी आंखों से आंसू बहने लगे, और उत्तर लिखने से पहले ही लेखनी रुक गई .. बेंच  पर  मुंख रखकर रोने लगा और पुनः से लेखनी उठायी तब भी वो कुछ भी न लिख पाया। अनुत्तर दसवां प्रश्न छोड़कर उत्तर पुस्तिका कक्षा अध्यापक को दे दिया।


विद्यालय के द्वार पर दीदी को देखकर उसकी ओर दौड़ पडा।"भैया! ये ले आठ हजार रुपये, माता जी ने कहा है कि मोटरसाइकिल लेकर ही घर आना।"

दीदी ने मोहन के सामने पैसे धर दिये।

" दीदी कहाँ से लायी ये पैसे?" मोहन ने पूछा।

दीदी ने बताया "मैंने मेरी कार्यालय से एक महीने का वेतन अग्रिम मांग लिया। माता जी ने भी जहां काम करती हैं वहीं से उधार ले लिया, और  शेष मेरी व्यक्तिगत व्यय की बचत से निकाल लिये। ऐसा करके तुम्हारी मोटरसाइकिल के पैसे की व्यवस्था हो गई हैं।

मोहन की दृष्टि पैसे पर स्थिर हो गई।


दीदी पुनः बोली " भाई, तुम माता जी को बोलकर निकले थे कि पैसे नहीं दोगी तो, मैं घर पर नहीं आऊंगा! अब तुम्हें समझना चाहिये कि तुम्हारा भी घर के प्रति कुछ दायित्व है। मुझे भी बहुत से आनन्द लेने की आवश्यकता होती हैं, लेकिन अपने आनन्द को पूरा करने से पहले मैं अपने परिवार को सबसे अधिक महत्व देती हूं। तुम हमारे परिवार के सबसे लाडले हो, पिता को पैर की पीड़ा हैं इसके उपरान्त भी तेरी मोटरसाइकिल के लिये पैसे कमाने और तुम्हें दिये वचन को पूरा करने अपने फ्रेक्चर वाले पैर होने के कष्ट को सहन करते हुए भी काम किये जा रहे हैं। तेरी मोटरसाइकिल के लिये। यदि तुम समझ सको तो अच्छा है, कल रात को अपने वचन को पूरा नहीं कर सकने के कारण बहुत दुःखी थे। इसके पीछे उनकी विवशता है।

शेष तुमने तो अनेकों बार अपने कहे वचन तोडे ही है न? मेरे हाथ में पैसे थमाकर दीदी घर की ओर चल निकली।


उसी समय उनका मित्र वहां अपनी मोटरसाइकिल लेकर आ गया, अच्छे से चमका कर ले आया था।"ले .. मोहन आज से ये मोटरसाइकिल तुम्हारी। सब बारह हजार में मांग रहे हैं, लेकिन ये तुम्हारे लिये आठ हजार।" मोहन मोटरसाइकिल की ओर एकटक देख रहा था। थोड़ी देर के बाद बोला, कि:

"मित्र तुम अपनी मोटरसाइकिल उस बारह हजार वाले को ही दे देना! मेरे पास पैसे की व्यवस्था नहीं हो पायी हैं और होने की शीघ्र ही कोई संभावना भी नहीं है।"वो सीधा भागवत सर के कक्ष में जा पहूंचा।

"अरे मोहन! कैसा लिखा है प्रश्न पत्र के उत्तर में?

भागवत सर ने मोहन की ओर देख कर पूछा।


"सर ..!!, यह कोई प्रश्न पत्र नहीं था, ये तो मेरे जीवन के लिये दिशानिर्देश था। मैंने एक प्रश्न का उत्तर छोड़ दिया है। किन्तु ये उत्तर लिखकर नहीं अपने जीवन का दायित्व निभाकर दूंगा और भागवत सर को चरणस्पर्श कर अपने घर की ओर निकल पडा।


घर पहुंचते ही, माता जी, पिताजी और दीदी सब उसकी राह देख रहे थे।

"बेटा! मोटरसाइकिल कहाँ हैं?" पिताजी ने पूछा। मोहन ने दीदी के हाथों में पैसे थमा दिये और कहा कि क्षमा करें! मुझे मोटरसाइकिल नहीं चाहिये। और पिताजी मुझे ऑटो की चाभी दो, आज से मैं पूरे छुट्टियों तक ऑटो चलाऊंगा और आप थोड़े दिन विश्राम करेंगे, और माता जी आज मैं मेरी पहला धनअर्जन कार्य प्रारम्भ होगा। इसलिये तुम अपनी मनभावन की मैथी की भाजी और बैगन ले आना, रात को हम सब साथ मिलकर के खाना खायेंगे।

 

मोहन के स्वभाव में आये परिवर्तन को देखकर माता जी ने उसको गले से लगा लिया और कहा कि "बेटा! प्रातः जो कहकर तुम गये थे वो बात मैंने तुम्हारे पिताजी को बतायी थी, और इसलिये वो दुःखी हो गये, काम छोड़ कर वापस घर आ गये। भले ही मुझे पेटउदर में शूल होता हो लेकिन आज तो मैं तेरी मनभावन की ही सब्जी बनाऊंगी।" 

मोहन ने कहा, "नहीं  मां! अब मै समझ गया हूँ कि मेरे घरपरिवार में मेरी भूमिका क्या है? मैं रात को बैंगन मैथी की सब्जी ही खाऊंगा, परीक्षा में मैंने अन्तिम प्रश्न का उत्तर नहीं लिखा हैं, वह प्रेक्टिकल करके ही दिखाना है, और हाँ मां हम गेहूं को पिसाने कहां जाते हैं, उस आटा चक्की का नाम और पता भी मुझे दे दो"और उसी समय भागवत सर ने घर में प्रवेश किया,और बोले "वाह! मोहन जो उत्तर तुमनें लिखकर नहीं दिये वो प्रेक्टिकल जीवन जीकर के दोगे। 

"सर! आप और यहाँ?" मोहन भागवत सर को देख कर आश्चर्य चकित हो गया।

"मुझे मिलकर तुम चले गये, उसके बाद मैंने तुम्हारा पेपर पढा इसलिये तुम्हारे घर की ओर निकल पडा। मैं बहुत देर से तुम्हारे अंदर आये परिवर्तन को सुन रहा था। मेरी अनोखी परीक्षा सफल रही और इस परीक्षा में तुमने पहला नंबर पाया है।" 

ऐसा बोलकर भागवत सर ने मोहन के सर पर हाथ रखा।मोहन ने तुरंत ही भागवत सर के पैर छुएँ और ऑटो रिक्शा चलाने के लिये निकल पडा....

       मेरा सभी सम्माननीय अभिभावकों से आग्रह है कि आप इस पोस्ट को आप भी अवश्य पढ़िएगा और अपने बच्चों को भी पढ़ने का अवसर दें इससे अच्छी पोस्ट मैंने अपने जीवन में आज तक नहीं पढी व्यावहारिक जीवन में तो मैंने अनुभव किया है लेकिन सभी लोगों को किस प्रकार से अनुभव कराया जाए इसके लिए मेरा आपसे आग्रह है कि आप स्वयं और अपने बच्चों को इस पोस्ट को अवश्य पढ़ने का अवसर प्रदान करें l

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