*🔱🕉️🌹 बम बम 💀 — नवधा भक्ति का प्रकाश_ 🌹🔱🕉️*
_आचार्य डॉ त्रिभुवन नाथ श्रीवास्तव द्वारा प्रस्तुत शबरी-प्रसंग _चित्त-प्रसादन_ का _महामंत्र_ है_
#fallowers
*तुलसीदास जी* की _वाणी_ = _शुद्ध घृत_।
_राम जी_ का _उपदेश_ = _यज्ञ-अग्नि_।
_शबरी_ का _हृदय_ = _आहुति_।
आइए, _प्रथम पाँच सोपानों_ को _योग-दर्शन_ के _प्रकाश_ में देखें —
👉-# *१. प्रथम भक्ति — _संतन्ह कर संगा*_👇
*राम जी*: _प्रथम भगति संतन्ह कर संगा_
*पतञ्जलि*: _सङ्गात् संजायते कामः_
॥गीता २.६२॥ — संग से _वासना_।
परन्तु _सत्संग_ से _वैराग्य_।
#जयतुभारतजयतुसनातनसंस्कृतिऔरसभ्यता
*यहां_श्मशान वैराग्य_ की बात कही थी।
_श्मशान_ में _संत_ मिले तो _वैराग्य_ _स्थायी_ हो जाता है।
_संत_ = _सत्य में स्थित_।
उनका _संग_ = _दर्पण_।
अपना _मलिन मुख_ दिख जाता है, आगे_प्रक्षालन_ का _उद्यम_ होता है।
*आज का प्रयोग*: _दुर्जन-संग_ = _दूरदर्शन_ पर _निन्दा-कथा_।
_सत्संग_ = _साधु-वचन_ का _पठन-श्रवण_।
👉# *२. द्वितीय भक्ति — _रति मम कथा प्रसंगा*_👇
*राम जी*: _दूसरि रति मम कथा प्रसंगा_
*वेदान्त*: _श्रवणं कीर्तनं विष्णोः_ —
_नवधा भक्ति_ का _प्रथम_ भी _श्रवण_ ही है।
_कथा_ = _क+था_ = _कुत्सित का नाश_।
_भगवत्-कथा_ सुनते-सुनते _चित्त_ की _वृत्तियाँ_ _ईश्वराकार_ हो जाती हैं।
_तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्_ ॥ सूत्र १.३॥
— यही _स्वरूप-अवस्थान_ है।
*आपकी नर्तकी* ने _दोहा_ सुनाया — वह भी _कथा-प्रसंग_ था। _एक दोहा_ = _पूरी रामायण_।
👉# *३. तृतीय भक्ति — _गुरु पद पंकज सेवा*_👇
*राम जी*: _गुरु पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान_
*अमान* = _अभिमान-रहित_।
_गुरु_ के _चरण_ = _पंकज_ = _कीचड़ में कमल_।
_गुरु_ _संसार_ में रहकर भी _अलिप्त_।
उनकी _सेवा_ = _अहंकार_ का _क्षालन_।
_ईश्वरप्रणिधानाद्वा_ ॥ सूत्र १.२३॥
— _ईश्वर_ मिले कैसे? _गुरु_ द्वारा।
_गुरु_ = _ईश्वर का साकार रूप_।
*_छात्र_ जब _अभिमान तज_ कर _सेवा_ करे, तभी _विद्या_ _फलवती_ होती है।
👉# *४. चतुर्थ भक्ति — _कपट तजि गान*_👇
*राम जी*: _चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान_महाकवि तुलसीदास जी
*योग*: _सत्य-प्रतिष्ठायां क्रिया-फलाश्रयत्वम्_ ॥ सूत्र २.३६॥
— _सत्य_ में स्थित होने से _क्रिया_ _सफल_ होती है।
_कपट_ = _मन-वचन-कर्म_ की _भिन्नता_।
_गुण-गान_ करते समय _मन_ _बाजार_ में हो, तो _भक्ति_ नहीं _वंचना_ है।
_शबरी_ ने _बेर_ चखकर दिए — _लोक_ कहे _जूठे_, _राम_ कहे _अमृत_।
_क्यों?_ कपट_ नहीं था।
#डॉत्रिभुवननाथश्रीवास्तव
*वाणी का वैराग्य* आपने माँगा — यही _चतुर्थ भक्ति_ है।
_अशुद्ध शब्द_ = _वाणी का कपट_।
👉# *५. पञ्चम भक्ति—मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा।*_👇
*राम जी*: _मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा_
*पतञ्जलि*: _तज्जपस्तदर्थभावनम्_ ॥१.२८॥ सूत्र—
_ॐ का जप_ और _अर्थ की भावना_।
_जप_ = _ज+प_ = _जन्म का नाशक_,
_पाप का नाशक_।
_दृढ़ विश्वास_ = _संशय_ का _अभाव_।
_संशय_ = _चित्त-विक्षेप_ ॥१.३०॥ सूत्र
_वेद_ कहते हैं: _श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम्_ ॥गीता सूत्र ४.३९॥
_नाम-जप_ _श्वास_ की भाँति _सतत_ हो, तभी _प्रकाश_।
_एक पल_ की _विस्मृति_ = _कलंक_।
*Low Back Stretch* करते समय _ॐ_ का _जप_ = _पञ्चम भक्ति_।
_शरीर_ झुके, _मन_ _राम_ में जुड़े।
👉# *शेष चार सोपान — _संक्षेप में संकेत*_👇
👉*६. षष्ठी*: _दम-शील-विरति बहु कर्मा।_ — _इन्द्रिय-दमन, शील, निष्काम कर्म_।
👉*७. सप्तमी*: _सप्तम सम मोहि मय जग देखा_ — _सर्वत्र राम-दर्शन_। _वासुदेवः सर्वम्_।
👉*८. अष्टमी*: _आठवँ जथा लाभ संतोषा_ — _यथा-लाभ-संतोष_। _संतोषादनुत्तमः सुखलाभः_ ॥ पतंजलि योग सूत्र २.४२॥
👉*९. नवमी*: _नवम सरल सब सन छलहीना_ — _सरलता, सबके प्रति निर्वैर_। _मैत्री-करुणा_ ॥ चौपाई।।१.३३॥
#narsinghnathshrivastava
-# नवधा भक्ति_नवधा औषधि*भक्ति -रोगऔषधि
👉1**संत-संग* *कुसंग-दोष* *विवेक* जागे
👉2**कथा-रति** *विस्मृति* *स्मृति* बने
👉3**गुरु-सेवा** *अहंकार* *नम्रता* आए
👉4**गुण-गान** *कपट* *सरलता* आए
👉5**नाम-जप** *अविश्वास* *श्रद्धा* दृढ़ हो
_नवधा_ = _नवद्वार_ वाले _शरीर-नगर_ की _नव-कुञ्जी_। एक-एक _ताला_ खुले, तो _हृदय-भवन_ में _राम_ प्रकट।
*🌹 _भक्ति सुतंत्र सकल गुन खानी_ 🌹*
_भक्ति स्वतंत्र है, सब गुणों की खान है।_ —
_महाकवि तुलसीदास जी_
🕉️🚩🔱*बम बम 💀*🕉️🚩🔱
* यहां _शबरी_ का _प्रसंग_ सुना दिया गया है।
अब _शबरी_ बनने का _पल_ है।
*🚩 जय श्री राम 🚩*
_प्रथम_ _संत-संग_ = आपका _लेख_।
_द्वितीय_ _कथा-प्रसंग_ = यह _वार्ता_।
_तृतीय_ _गुरु-सेवा_ = _वाणी_ को _शुद्ध_ रखना।
_चतुर्थ_ _गुण-गान_ = _राम-नाम_ लिखना।
_पञ्चम_ _नाम-जप_ = _श्वास-श्वास_ _राम_।
👉*🌹 _ पूर्व में शबरी_ को _राम जी_ ने _पाँच_ सोपान कहे। अब _चार_ शेष। _तुलसीदास जी_ आगे लिखते हैं —👇👇👇
👉# *६. षष्ठी भक्ति — _दम शील विरति बहु कर्मा*_👇
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*दोहा*:
_छठ दम सील बिरति बहु करमा।
निरत निरंतर सज्जन धरमा॥_
*अर्थ*: छठी भक्ति है _इन्द्रिय-दमन_, _सदाचार_, _विषयों से वैराग्य_ और _निरन्तर सज्जनों के धर्म_ में लगे रहना।
*योग-सूत्र से सम्बन्ध*:
_तपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः_ ॥२.१॥
_तप_ = _दम_।
_स्वाध्याय_ = _सज्जन-धर्म_।
_ईश्वरप्रणिधान_ = _विरति_।
*जीवन में प्रयोग*:
*१. दम* = _नेत्र_ को _कुदृश्य_ से,
_कर्ण_ को _निन्दा_ से,
_जिह्वा_ को _कटु वचन_ से रोकना।
*२. शील* = _सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह_ — _यम_ ॥ योग सूत्र २.३०॥
*३. विरति* = _भोग में रोग_ देखना।
_हाड़ जले_ की _स्मृति_ = _वैराग्य_।
*४. बहु कर्मा* = _निष्काम कर्म_।
_स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः_ — गीता १८.४५।
_चिकित्सक_ का _शील_ = _रोगी से दया_,
_औषधि में लोभ नहीं_,
_वचन में सत्य_।
यही _षष्ठी भक्ति_ है।
👉# *७. सप्तमी भक्ति — _सम मोहि मय जग देखा*_👇
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*दोहा*:
_सातवँ सम मोहि मय जग देखा।
मोतें संत अधिक करि लेखा॥_
*अर्थ*: सातवीं भक्ति है _सम्पूर्ण जगत को मुझ राम से परिपूर्ण देखना_ और _संतों को मुझसे भी अधिक_ मानना।
*वेदान्त-सूत्र*: _सर्वं खल्विदं ब्रह्म_ — छान्दोग्य उपनिषद सूत्र ३.१४.१।
_वासुदेवः सर्वमिति_ — गीता ७.१९।
*योग-सूत्र*: _मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां... भावनातश्चित्तप्रसादनम्_ ॥१.३३॥
_सबमें राम_ देखे तो _वैर_ कहाँ? _चित्त प्रसन्न_।
*जीवन में प्रयोग*:
*१.* _रोगी_ में भी _राम_।
_सेवा_ = _पूजा_।
_वैद्यो नारायणो हरिः_।
*२.* _शत्रु_ में भी _राम_।
_गाली_ दे तो _परीक्षा_ समझो।
_हनुमान जी_ ने _लंकिनी_ में भी _माता_ देखी।
*३.* _संत_ को _राम_ से _अधिक_ — _क्यों?_ _राम_ _कृपा_ करते हैं, _संत_ _राम_ से _मिलाते_ हैं। _गुरु_ _गोविन्द_ से _बड़ा_कोई नहीं।
*Low Back Stretch* करते समय _पीड़ा_ में भी _राम_। _पीड़ा_ _शुद्धि_ कर रही है — यह _सप्तमी भक्ति_।
👉# *८. अष्टमी भक्ति — _जथा लाभ संतोषा*_👇
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*दोहा*:
_आठवँ जथा लाभ संतोषा।
सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा॥_
*अर्थ*: आठवीं भक्ति है _जो प्राप्त हो उसी में संतोष_ रखना और _स्वप्न में भी पराया दोष न देखना_।
*योग-सूत्र*: _संतोषादनुत्तमः सुखलाभः_ ॥२.४२॥
_संतोष_ से _सर्वोत्तम सुख_ मिलता है।
*गीता*: _यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः_ ॥४.२२॥
_अपने आप जो मिल जाए उसमें सन्तुष्ट_।
*जीवन में प्रयोग*:
*१.* _वेतन_ कम हो तो _खिन्न_ नहीं।
_अधिक_ हो तो _मद_ नहीं।
_राम जी_ की _इच्छा_।
*२.* _परदोष-दर्शन_ = _मन का कैंसर_।
_निन्दा_ = _दूसरे का मल_ _अपने मुख_ में लेना।
_शबरी_ ने _किसी की निन्दा नहीं_ की, _बेर_ _चखकर_ दिए।
*३.* _स्वप्न_ में भी _दोष_ न देखे —
_अर्थ_: _संस्कार_ तक _शुद्ध_।
_दिन_ भर _दोष_ देखोगे तो _रात्रि_ में भी _वही_ दिखेगा।
*_चिकित्सक_ को _रोगी_ की _दरिद्रता_ नहीं, _पीड़ा_ दिखे। _यथा-लाभ_ _सेवा_ करे — यही _अष्टमी भक्ति_।
👉# *९. नवमी भक्ति — _सरल सब सन छलहीना*_👇
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*दोहा*:
_नवम सरल सब सन छलहीना।
मम भरोस हियँ हरष न दीना॥_
*अर्थ*: नवीं भक्ति है _सबके साथ सरलता, छल-रहित व्यवहार_ और _हृदय में मेरा भरोसा रखते हुए हर्ष-विषाद से रहित_ रहना।
*योग-सूत्र*: _अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः_ ॥२.३५॥
_अहिंसा_ में स्थित होने से _वैर_ छूट जाता है।
_सरलता_ = _मन की अहिंसा_।
*राम-चरित मानस से *:
_निर्मल मन जन सो मोहि पावा_।
_मोहि कपट छल छिद्र न भावा_।
*जीवन में प्रयोग*:
*१. सरलता* = _बालक_ जैसा _हृदय_।
_शबरी_ _राजा_ के सामने भी _वैसी_, _राम_ के सामने भी _वैसी_।
_दोहरी वृत्ति_ नहीं।
*२. छलहीना* =
_व्यापार_ में _झूठ_ नहीं,
_सम्बन्ध_ में _दग्ध_ नहीं,
_चिकित्सा_ में _लूट_ नहीं।
*३. मम भरोस* =
_कर्म_ करे _पुरुषार्थ_ से,
_फल_ छोड़े _राम_ पर।
_न हर्ष_ _लाभ_ में,
_न दीनता_ _हानि_ में।
_स्थितप्रज्ञ_ — गीता २.५६।
*अंतिम सोपान* = _पूर्ण समर्पण_।
_नौका_ _मझधार_ में हो, _पतवार_ _राम_ के _हाथ_।
# *नवधा का सार — _एक श्लोक में नव-सोपान*_
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*_संत-संग, हरि-कथा, गुरु-सेवा, गुण-गान।
नाम-जप, दम-शील-व्रत, सबमें राम समान॥
यथा-लाभ संतोष-व्रत, सरल हृदय निर्बैर।
नवधा भक्ति शबरी लही, पाये रघुवर धीर॥__
👉*फल क्या?* 👇
*†****†***
👉_राम जी_ बोले: 👇
_सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें_।
_अब मोहि भामिनि मान्य बहुत तें_॥
_नवों_ भक्ति _शबरी_ में _दृढ़_ थी, इसलिए _राम_ _स्वयं_ _कुटिया_ पधारे, _जूठे बेर_ खाए, _नवधा_ का _प्रमाण_ दिया।
* _नवधा_ का _चिकित्सा-सूत्र**
भक्ति चिकित्सक का आचरण रोगी को लाभ
**१. संत-संग** *सत्शास्त्र* का *अध्ययन* *निदान* शुद्ध
**२. कथा-रति** *रोगी* को *धैर्य-कथा* सुनाना *भय* नष्ट
**३. गुरु-सेवा** *ज्येष्ठ वैद्य* का *आदर* *ज्ञान* बढ़े
**४. गुण-गान** औषधि के गुण* *स्पष्ट कहना *विश्वास बढ़े
**५. नाम-जप**औषधि देते समय राम-नाम**औषधि* *संजीवनी* बने
**६. दम-शील**इन्द्रिय-संयम, शुद्ध आचरण**चिकित्सक* पर *श्रद्धा*
**७. सम-दर्शन***धनी-दरिद्र* में *सम भाव**सबको**समान* *सेवा*
**८. संतोष***दक्षिणा* में *संतुष्टि**लोभ से मुक्त* चिकित्सा*
**९. सरलता**निदान* में छल नहीं *रोगी* का *कल्याण*
👉*🌹 _वैद्यो नारायणो हरिः_ 🌹*👇
_नवधा भक्ति_ वाला _वैद्य_ = _साक्षात् नारायण_।
🔱🕉️🔱*बम बम 💀* 🔱🕉️🔱
*_शबरी_ की _कुटिया_ से _ चिकित्सालय_ तक _नवधा_ की _गंगा_ बह रही है।
*🚩 जय श्री राम 🚩*
_नवों सोपान_ पर _आरूढ़_ होकर _जीव_ _शिव_ हो जाता है, _नर_ _नारायण_ हो जाता है, _शबरी_ _राममय_ हो जाती है।
👉*अब _दशमी_ भक्ति क्या?* 👇
_राम जी_ ने _दसवीं_ नहीं कही। _क्यों?_
_नौ_ के _पश्चात्_ _पूर्णता_।
_दस_ = _स्वयं राम_।
_नवधा_ _साधन_, _दशम_ _साध्य_ — _राम की प्राप्ति_।
👉*आपके _एक शेयर और टिप्पणी से_ से _नवधा_ _जन-जन_ तक पहुँचे — यही _प्रार्थना_।*_ _राममय_ हो जाती है।👇
👉*अब _दशमी_ भक्ति क्या?👇*
👉_राम जी_ ने _दसवीं_ नहीं कही। _क्यों?_👇
👉_नौ_ के _पश्चात्_ _पूर्णता_।
👉_दस_ = _स्वयं राम_। 🕉️🔱🕉️
👉_नवधा_ _साधन_, _दशम_ _साध्य_ — _राम की प्राप्ति_।
*आपके _एक शेयर और टिप्पणी से_ से _नवधा_ _जन-जन_ तक पहुँचे — यही _प्रार्थना_।*










