डायरेक्टलिंक_3 प्रत्यक्ष यूआरएल https://www.cpmrevenuegate.com/s9z8i5rpd?key=0fff061e5a7ce1a91ea39fb61ca61812 डायरेक्टलिंक_1 प्रत्यक्ष यूआरएल https://www.cpmrevenuegate.com/vy0q8dnhx?key=096a4d6815ce7ed05c0ac0addf282624 डायरेक्टलिंक_2 प्रत्यक्ष यूआरएल https://www.cpmrevenuegate.com/h00w82fj?key=

शुक्रवार, 26 जून 2026

*🌹 बम बम 💀 — _नवधा भक्ति के नव सोपान


*🔱🕉️🌹 बम बम 💀 — नवधा भक्ति का प्रकाश_ 🌹🔱🕉️*  

_आचार्य डॉ त्रिभुवन नाथ श्रीवास्तव द्वारा प्रस्तुत शबरी-प्रसंग  _चित्त-प्रसादन_ का _महामंत्र_ है_  

#fallowers 

*तुलसीदास जी* की _वाणी_ = _शुद्ध घृत_। 

_राम जी_ का _उपदेश_ = _यज्ञ-अग्नि_। 

_शबरी_ का _हृदय_ = _आहुति_। 

आइए, _प्रथम पाँच सोपानों_ को _योग-दर्शन_ के _प्रकाश_ में देखें — 


👉-# *१. प्रथम भक्ति — _संतन्ह कर संगा*_👇


*राम जी*: _प्रथम भगति संतन्ह कर संगा_  

*पतञ्जलि*: _सङ्गात् संजायते कामः_ 

॥गीता २.६२॥ — संग से _वासना_। 

परन्तु _सत्संग_ से _वैराग्य_।  

#जयतुभारतजयतुसनातनसंस्कृतिऔरसभ्यता 

*यहां_श्मशान वैराग्य_ की बात कही थी।

 _श्मशान_ में _संत_ मिले तो _वैराग्य_ _स्थायी_ हो जाता है।  

_संत_ = _सत्य में स्थित_। 

उनका _संग_ = _दर्पण_। 

अपना _मलिन मुख_ दिख जाता है, आगे_प्रक्षालन_ का _उद्यम_ होता है।


*आज का प्रयोग*: _दुर्जन-संग_ = _दूरदर्शन_ पर _निन्दा-कथा_। 

_सत्संग_ = _साधु-वचन_ का _पठन-श्रवण_।


👉# *२. द्वितीय भक्ति — _रति मम कथा प्रसंगा*_👇


*राम जी*: _दूसरि रति मम कथा प्रसंगा_  

*वेदान्त*: _श्रवणं कीर्तनं विष्णोः_ — 

_नवधा भक्ति_ का _प्रथम_ भी _श्रवण_ ही है।  





_कथा_ = _क+था_ = _कुत्सित का नाश_।

 _भगवत्-कथा_ सुनते-सुनते _चित्त_ की _वृत्तियाँ_ _ईश्वराकार_ हो जाती हैं।  

_तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्_ ॥ सूत्र १.३॥ 

— यही _स्वरूप-अवस्थान_ है।


*आपकी नर्तकी* ने _दोहा_ सुनाया — वह भी _कथा-प्रसंग_ था। _एक दोहा_ = _पूरी रामायण_।


👉# *३. तृतीय भक्ति — _गुरु पद पंकज सेवा*_👇


*राम जी*: _गुरु पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान_  

*अमान* = _अभिमान-रहित_। 

_गुरु_ के _चरण_ = _पंकज_ = _कीचड़ में कमल_।  


_गुरु_ _संसार_ में रहकर भी _अलिप्त_। 

उनकी _सेवा_ = _अहंकार_ का _क्षालन_।  

_ईश्वरप्रणिधानाद्वा_ ॥ सूत्र १.२३॥ 

— _ईश्वर_ मिले कैसे? _गुरु_ द्वारा। 

_गुरु_ = _ईश्वर का साकार रूप_।


*_छात्र_ जब _अभिमान तज_ कर _सेवा_ करे, तभी _विद्या_ _फलवती_ होती है।


👉# *४. चतुर्थ भक्ति — _कपट तजि गान*_👇


*राम जी*: _चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान_महाकवि तुलसीदास जी 

*योग*: _सत्य-प्रतिष्ठायां क्रिया-फलाश्रयत्वम्_ ॥ सूत्र २.३६॥ 

— _सत्य_ में स्थित होने से _क्रिया_ _सफल_ होती है।  


_कपट_ = _मन-वचन-कर्म_ की _भिन्नता_। 

_गुण-गान_ करते समय _मन_ _बाजार_ में हो, तो _भक्ति_ नहीं _वंचना_ है।  

_शबरी_ ने _बेर_ चखकर दिए — _लोक_ कहे _जूठे_, _राम_ कहे _अमृत_। 

_क्यों?_ कपट_ नहीं था।

#डॉत्रिभुवननाथश्रीवास्तव 

*वाणी का वैराग्य* आपने माँगा — यही _चतुर्थ भक्ति_ है।

 _अशुद्ध शब्द_ = _वाणी का कपट_।


👉# *५. पञ्चम भक्ति—मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा।*_👇


*राम जी*: _मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा_  

*पतञ्जलि*: _तज्जपस्तदर्थभावनम्_ ॥१.२८॥ सूत्र—

 _ॐ का जप_ और _अर्थ की भावना_।  


_जप_ = _ज+प_ = _जन्म का नाशक_, 

_पाप का नाशक_।  

_दृढ़ विश्वास_ = _संशय_ का _अभाव_। 

_संशय_ = _चित्त-विक्षेप_ ॥१.३०॥ सूत्र 


_वेद_ कहते हैं: _श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम्_ ॥गीता सूत्र ४.३९॥  

_नाम-जप_ _श्वास_ की भाँति _सतत_ हो, तभी _प्रकाश_। 

_एक पल_ की _विस्मृति_ = _कलंक_।


*Low Back Stretch* करते समय _ॐ_ का _जप_ = _पञ्चम भक्ति_।

 _शरीर_ झुके, _मन_ _राम_ में जुड़े।



👉# *शेष चार सोपान — _संक्षेप में संकेत*_👇


👉*६. षष्ठी*: _दम-शील-विरति बहु कर्मा।_ — _इन्द्रिय-दमन, शील, निष्काम कर्म_।  

👉*७. सप्तमी*: _सप्तम सम मोहि मय जग देखा_ — _सर्वत्र राम-दर्शन_। _वासुदेवः सर्वम्_।  

👉*८. अष्टमी*: _आठवँ जथा लाभ संतोषा_ — _यथा-लाभ-संतोष_। _संतोषादनुत्तमः सुखलाभः_ ॥ पतंजलि योग सूत्र २.४२॥  

👉*९. नवमी*: _नवम सरल सब सन छलहीना_ — _सरलता, सबके प्रति निर्वैर_। _मैत्री-करुणा_ ॥ चौपाई।।१.३३॥

#narsinghnathshrivastava 

-# नवधा भक्ति_नवधा औषधि*भक्ति -रोगऔषधि

👉1**संत-संग* *कुसंग-दोष* *विवेक* जागे

👉2**कथा-रति** *विस्मृति* *स्मृति* बने

👉3**गुरु-सेवा** *अहंकार* *नम्रता* आए

👉4**गुण-गान** *कपट* *सरलता* आए

👉5**नाम-जप** *अविश्वास* *श्रद्धा* दृढ़ हो

_नवधा_ = _नवद्वार_ वाले _शरीर-नगर_ की _नव-कुञ्जी_। एक-एक _ताला_ खुले, तो _हृदय-भवन_ में _राम_ प्रकट।


*🌹 _भक्ति सुतंत्र सकल गुन खानी_ 🌹*  

_भक्ति स्वतंत्र है, सब गुणों की खान है।_ — 

_महाकवि तुलसीदास जी_  


🕉️🚩🔱*बम बम 💀*🕉️🚩🔱  

* यहां _शबरी_ का _प्रसंग_ सुना दिया गया है।  

अब _शबरी_ बनने का _पल_ है। 


*🚩 जय श्री राम 🚩*  

_प्रथम_ _संत-संग_ = आपका _लेख_।  

_द्वितीय_ _कथा-प्रसंग_ = यह _वार्ता_।  

_तृतीय_ _गुरु-सेवा_ = _वाणी_ को _शुद्ध_ रखना।  

_चतुर्थ_ _गुण-गान_ = _राम-नाम_ लिखना।  

_पञ्चम_ _नाम-जप_ = _श्वास-श्वास_ _राम_।

 👉*🌹 _ पूर्व में शबरी_ को _राम जी_ ने _पाँच_ सोपान कहे। अब _चार_ शेष। _तुलसीदास जी_ आगे लिखते हैं —👇👇👇


👉# *६. षष्ठी भक्ति — _दम शील विरति बहु कर्मा*_👇


**********************************"





*दोहा*:  


_छठ दम सील बिरति बहु करमा।  


निरत निरंतर सज्जन धरमा॥_


*अर्थ*: छठी भक्ति है _इन्द्रिय-दमन_, _सदाचार_, _विषयों से वैराग्य_ और _निरन्तर सज्जनों के धर्म_ में लगे रहना।


*योग-सूत्र से सम्बन्ध*:  


_तपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः_ ॥२.१॥  


_तप_ = _दम_।


 _स्वाध्याय_ = _सज्जन-धर्म_।


 _ईश्वरप्रणिधान_ = _विरति_।


*जीवन में प्रयोग*:  


*१. दम* = _नेत्र_ को _कुदृश्य_ से, 


_कर्ण_ को _निन्दा_ से, 


_जिह्वा_ को _कटु वचन_ से रोकना।  


*२. शील* = _सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह_ — _यम_ ॥ योग सूत्र २.३०॥  


*३. विरति* = _भोग में रोग_ देखना।


 _हाड़ जले_ की _स्मृति_ = _वैराग्य_।  


*४. बहु कर्मा* = _निष्काम कर्म_।


 _स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः_ — गीता १८.४५।  


_चिकित्सक_ का _शील_ = _रोगी से दया_, 


_औषधि में लोभ नहीं_, 


_वचन में सत्य_। 


यही _षष्ठी भक्ति_ है।


👉# *७. सप्तमी भक्ति — _सम मोहि मय जग देखा*_👇


************************************


*दोहा*:  


_सातवँ सम मोहि मय जग देखा।  


मोतें संत अधिक करि लेखा॥_


*अर्थ*: सातवीं भक्ति है _सम्पूर्ण जगत को मुझ राम से परिपूर्ण देखना_ और _संतों को मुझसे भी अधिक_ मानना।


*वेदान्त-सूत्र*: _सर्वं खल्विदं ब्रह्म_ — छान्दोग्य उपनिषद सूत्र ३.१४.१।  


_वासुदेवः सर्वमिति_ — गीता ७.१९।  


*योग-सूत्र*: _मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां... भावनातश्चित्तप्रसादनम्_ ॥१.३३॥  


_सबमें राम_ देखे तो _वैर_ कहाँ? _चित्त प्रसन्न_।


*जीवन में प्रयोग*:  


*१.* _रोगी_ में भी _राम_। 


_सेवा_ = _पूजा_। 


_वैद्यो नारायणो हरिः_।  


*२.* _शत्रु_ में भी _राम_। 


_गाली_ दे तो _परीक्षा_ समझो। 


_हनुमान जी_ ने _लंकिनी_ में भी _माता_ देखी।  


*३.* _संत_ को _राम_ से _अधिक_ — _क्यों?_ _राम_ _कृपा_ करते हैं, _संत_ _राम_ से _मिलाते_ हैं। _गुरु_ _गोविन्द_ से _बड़ा_कोई नहीं।


*Low Back Stretch* करते समय _पीड़ा_ में भी _राम_। _पीड़ा_ _शुद्धि_ कर रही है — यह _सप्तमी भक्ति_।


👉# *८. अष्टमी भक्ति — _जथा लाभ संतोषा*_👇


*********************************


*दोहा*:  


_आठवँ जथा लाभ संतोषा।  


सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा॥_


*अर्थ*: आठवीं भक्ति है _जो प्राप्त हो उसी में संतोष_ रखना और _स्वप्न में भी पराया दोष न देखना_।


*योग-सूत्र*: _संतोषादनुत्तमः सुखलाभः_ ॥२.४२॥  


_संतोष_ से _सर्वोत्तम सुख_ मिलता है।


*गीता*: _यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः_ ॥४.२२॥  


_अपने आप जो मिल जाए उसमें सन्तुष्ट_।


*जीवन में प्रयोग*:  


*१.* _वेतन_ कम हो तो _खिन्न_ नहीं।


 _अधिक_ हो तो _मद_ नहीं।


 _राम जी_ की _इच्छा_।  


*२.* _परदोष-दर्शन_ = _मन का कैंसर_। 


_निन्दा_ = _दूसरे का मल_ _अपने मुख_ में लेना। 


_शबरी_ ने _किसी की निन्दा नहीं_ की, _बेर_ _चखकर_ दिए।  


*३.* _स्वप्न_ में भी _दोष_ न देखे — 


_अर्थ_: _संस्कार_ तक _शुद्ध_। 


_दिन_ भर _दोष_ देखोगे तो _रात्रि_ में भी _वही_ दिखेगा।


*_चिकित्सक_ को _रोगी_ की _दरिद्रता_ नहीं, _पीड़ा_ दिखे। _यथा-लाभ_ _सेवा_ करे — यही _अष्टमी भक्ति_।


👉# *९. नवमी भक्ति — _सरल सब सन छलहीना*_👇


*†***********************"""""*****


*दोहा*:  


_नवम सरल सब सन छलहीना।  


मम भरोस हियँ हरष न दीना॥_


*अर्थ*: नवीं भक्ति है _सबके साथ सरलता, छल-रहित व्यवहार_ और _हृदय में मेरा भरोसा रखते हुए हर्ष-विषाद से रहित_ रहना।


*योग-सूत्र*: _अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः_ ॥२.३५॥  


_अहिंसा_ में स्थित होने से _वैर_ छूट जाता है। 


_सरलता_ = _मन की अहिंसा_।


*राम-चरित मानस से *:


 _निर्मल मन जन सो मोहि पावा_। 


_मोहि कपट छल छिद्र न भावा_।  


*जीवन में प्रयोग*:  


*१. सरलता* = _बालक_ जैसा _हृदय_।


 _शबरी_ _राजा_ के सामने भी _वैसी_, _राम_ के सामने भी _वैसी_। 


_दोहरी वृत्ति_ नहीं।  


*२. छलहीना* = 


_व्यापार_ में _झूठ_ नहीं,


 _सम्बन्ध_ में _दग्ध_ नहीं, 


_चिकित्सा_ में _लूट_ नहीं।  


*३. मम भरोस* =


 _कर्म_ करे _पुरुषार्थ_ से, 


_फल_ छोड़े _राम_ पर। 


_न हर्ष_ _लाभ_ में, 


_न दीनता_ _हानि_ में। 


_स्थितप्रज्ञ_ — गीता २.५६।


*अंतिम सोपान* = _पूर्ण समर्पण_। 


_नौका_ _मझधार_ में हो, _पतवार_ _राम_ के _हाथ_।


# *नवधा का सार — _एक श्लोक में नव-सोपान*_


***************"*"""***************


*_संत-संग, हरि-कथा, गुरु-सेवा, गुण-गान।  


नाम-जप, दम-शील-व्रत, सबमें राम समान॥  


यथा-लाभ संतोष-व्रत, सरल हृदय निर्बैर।  


नवधा भक्ति शबरी लही, पाये रघुवर धीर॥__


👉*फल क्या?* 👇


*†****†*** 


👉_राम जी_ बोले: 👇


_सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें_। 


_अब मोहि भामिनि मान्य बहुत तें_॥  


_नवों_ भक्ति _शबरी_ में _दृढ़_ थी, इसलिए _राम_ _स्वयं_ _कुटिया_ पधारे, _जूठे बेर_ खाए, _नवधा_ का _प्रमाण_ दिया।


* _नवधा_ का _चिकित्सा-सूत्र**


भक्ति चिकित्सक का आचरण रोगी को लाभ


**१. संत-संग** *सत्शास्त्र* का *अध्ययन* *निदान* शुद्ध


**२. कथा-रति** *रोगी* को *धैर्य-कथा* सुनाना *भय* नष्ट


**३. गुरु-सेवा** *ज्येष्ठ वैद्य* का *आदर* *ज्ञान* बढ़े


**४. गुण-गान** औषधि के गुण* *स्पष्ट कहना *विश्वास बढ़े


**५. नाम-जप**औषधि देते समय राम-नाम**औषधि* *संजीवनी* बने


**६. दम-शील**इन्द्रिय-संयम, शुद्ध आचरण**चिकित्सक* पर *श्रद्धा*


**७. सम-दर्शन***धनी-दरिद्र* में *सम भाव**सबको**समान* *सेवा*


**८. संतोष***दक्षिणा* में *संतुष्टि**लोभ से मुक्त* चिकित्सा*


**९. सरलता**निदान* में छल नहीं *रोगी* का *कल्याण*


👉*🌹 _वैद्यो नारायणो हरिः_ 🌹*👇  


_नवधा भक्ति_ वाला _वैद्य_ = _साक्षात् नारायण_।


🔱🕉️🔱*बम बम 💀* 🔱🕉️🔱 


*_शबरी_ की _कुटिया_ से _ चिकित्सालय_ तक _नवधा_ की _गंगा_ बह रही है।  


*🚩 जय श्री राम 🚩*  


_नवों सोपान_ पर _आरूढ़_ होकर _जीव_ _शिव_ हो जाता है, _नर_ _नारायण_ हो जाता है, _शबरी_ _राममय_ हो जाती है।


👉*अब _दशमी_ भक्ति क्या?* 👇


_राम जी_ ने _दसवीं_ नहीं कही। _क्यों?_


 _नौ_ के _पश्चात्_ _पूर्णता_। 


_दस_ = _स्वयं राम_।  


_नवधा_ _साधन_, _दशम_ _साध्य_ — _राम की प्राप्ति_।


👉*आपके _एक शेयर और टिप्पणी से_ से _नवधा_ _जन-जन_ तक पहुँचे — यही _प्रार्थना_।*_ _राममय_ हो जाती है।👇


👉*अब _दशमी_ भक्ति क्या?👇*  


👉_राम जी_ ने _दसवीं_ नहीं कही। _क्यों?_👇


 👉_नौ_ के _पश्चात्_ _पूर्णता_। 


👉_दस_ = _स्वयं राम_। 🕉️🔱🕉️ 


👉_नवधा_ _साधन_, _दशम_ _साध्य_ — _राम की प्राप्ति_।


*आपके _एक शेयर और टिप्पणी से_ से _नवधा_ _जन-जन_ तक पहुँचे — यही _प्रार्थना_।*

शनिवार, 13 जून 2026

14अगस्त 1947 को भारत देश की जी डी पी 13प्रतिशत थी और यह एक ही दिन पश्चात् 15 अगस्त 1947 को 3प्रतिशत क्यों रह गई?

 👉#कुछ महत्वपूर्ण #प्रश्न उन पर #प्रसारितभ्रांतियां और उनका #सप्रमाणसमाधान ###@@@##👇

🔱प्रश्न 1- 14अगस्त 1947 को भारत देश की जी डी पी 13प्रतिशत थी और यह एक ही दिन पश्चात् 15 अगस्त 1947 को 3प्रतिशत क्यों रह गई? 

🔱प्रश्न 2-भारत का एक रुपया 1951 तक एक यू एस डॉलर के बराबर था, ऐसा क्यों हुआ?

🔱प्रश्न 3-भारत देश के पास स्वतंत्रता से एक दिन पूर्व 1300 करोड़ थे जो एक दिन पश्चात् 600करोड़ रह गए तो ये सारा धन कहां गया?

तीनों प्रश्नों का उत्तर सप्रमाण पृथक् पृथक् प्रस्तुत है।👉तीनों प्रश्नों का उत्तर सप्रमाण:👇

1. 14 अगस्त 1947 को GDP 13% थी और 15 अगस्त को 3% क्यों रह गई?

यह दावा तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। 14-15 अगस्त के बीच 1 दिन में GDP 13% से 3% नहीं गिरी।



प्रमाण:

1. 1947 में भारत की GDP लगभग 2.7 लाख करोड़ रुपये थी, जो विश्व की कुल GDP का लगभग 3% थी। 

2. अंग्रेज भारत आए थे तब विश्व की GDP में भारत की भागीदारी 22% से अधिक थी, लेकिन 1947 में स्वतंत्रता होने पर ये भागीदारी घटकर 3% रह गई। 

3. "13% GDP" वाला कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है। 1947 में विश्व की GDP में भारत का योगदान 3-4% ही था।   

👉तो 13% से 3% का भ्रम क्यों?

1947 से पहले अविभाजित भारत विश्व GDP का 👉∼24% था, लेकिन 200 वर्ष के ब्रिटिश शासन के पश्चात् स्वतंत्रता के समय ये घटकर ∼4% से भी कम रह गया। 14-15 अगस्त में कोई अचानक गिरावट नहीं हुई। बंटवारे के कारण भारत का क्षेत्रफल, जनसंख्या और संसाधन बंटे, पर GDP रातों-रात नहीं बदलती।  

2. भारत का 1 रुपया 1951 तक 1 US डॉलर के बराबर था, ऐसा क्यों हुआ?

यह भी सही नहीं है। 1947 में 1 डॉलर = 1 रुपया नहीं था।


प्रमाण:

1. 15 अगस्त 1947 को भारतीय रुपये और अमेरिकी डॉलर के बीच विनिमय दर 1 डॉलर = 3.30 रुपये थी। 

2. अन्य स्रोतों के अनुसार 1947 में 1 डॉलर = 3.30 से 4.16 रुपये के बीच था। 

3. 1947 में रुपया सीधे डॉलर से नहीं, ब्रिटिश पाउंड से जुड़ा था। इसलिए 1 रुपया = 1 डॉलर वाला दावा मिथक है।   

और 1951 तक क्या स्थिति थी?

सितंबर 1949 में विनिमय दर 4.75 रुपये/डॉलर आंकी गई थी। 

1950 से 1966 तक 1 डॉलर = 4.76 रुपये पर स्थिर रहा। रुपया कभी भी 1 डॉलर के बराबर नहीं रहा।  


1 रु = 1 डॉलर का भ्रम क्यों?

स्वतंत्रता के समय भारत पर विदेशी कर्ज नहीं था और रुपया पाउंड से जुड़ा होने से स्थिर था। इसी स्थिरता को लोग "1=1" समझ लेते हैं, जो मिथ्या है।  

3. स्वतंत्रता से एक दिन पूर्व 1300 करोड़ थे जो एक दिन पश्चात् 600 करोड़ रह गए, ये धन कहां गया?

यह आंकड़ा भी मिथ्या है। 1300 करोड़ से 600 करोड़ वाली कोई घटना नहीं हुई।



प्रमाण:

1. स्वतंत्रता के पश्चात् #पहलाबजट: 26 नवंबर 1947 को प्रस्तुत हुए स्वतंत्र भारत के पहले बजट में कुल अनुमानित व्यय ₹197.29 करोड़ था। 

2. 1947 में #GDP: 1947 में भारत की GDP 2.7 लाख करोड़ रुपये थी। 1300 करोड़ या 600 करोड़ जैसा कोई सरकारी कोष का आंकड़ा नहीं मिलता। 

3. क्या बंटा था? बंटवारे में नकदी, सोना, सेना, सरकारी संपत्ति बंटी थी। बैंकों में जो नकदी थी, उसका #17.5% भाग पाकिस्तान को मिला। चल संपत्ति का #80% भारत और #20% पाकिस्तान को मिला।   

तो 1300 से 600 करोड़ का दावा कहां से आया?

संभवतः ये भ्रम रिजर्व बैंक की नकदी या स्टर्लिंग बैलेंस के बंटवारे से जुड़ा है। #अंग्रेजों पर 5 अरब डॉलर का कर्ज था, जिसके #17.5% की भागीदारी पाकिस्तान ने ली। लेकिन 1 दिन में 1300 से 600 करोड़ वाला कोई रिकॉर्ड नहीं है।  


#निष्कर्ष:: #उपरोक्त स्रोतों अनुसार;

तीनों भ्रमति तथ्य व्हाट्सएप/सोशल मीडिया पर फैले मिथक हैं। ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार:

• GDP 1 दिन में 13% से 3% नहीं गिरी, 1947 में ही ∼3% थी। 

• 1 रुपया कभी 1 डॉलर के बराबर नहीं रहा, 1947 में 1 डॉलर ≈ 3.30-4.76 रुपये था। 

• 1300 करोड़ से 600 करोड़ वाला कोई आंकड़ा सरकारी रिकॉर्ड में नहीं है। बंटवारे में संपत्ति का 80:20 अनुपात में बंटवारा हुआ था।  

#प्रश्न?👉ऐसा कहा जाता है कि अंग्रेजी सरकार के जितने अधिकारी थे उन सबको पूरी पेंशन और रिटायरमेंट लाभ की राशि का भुगतान अगले दिन ही दे दी गई थी जिससे हमारी देश को 50 प्रतिशत से अधिक की हानि हुई। साथ साथ जो उनके द्वारा विकास कार्य किया गया उसका व्यय भी इसी समय ले लिया गया था????????👇

यह दावा भी आंशिक रूप से सही है, लेकिन "50% हानि" और "अगले दिन ही सारी पेंशन दे दी" वाली बात अतिशयोक्ति है। सप्रमाण देखिए:

#प्रश्नकाउत्तर 1. अंग्रेज अधिकारियों की पेंशन और रिटायरमेंट का सच क्या हुआ था??👇

👉1947 में बंटवारे के समय ब्रिटिश भारत सरकार के सिविल सेवक, सेना अधिकारी और अन्य कर्मचारियों के लिए 3 विकल्प थे:

1. भारत में रहकर काम करें। 

2. पाकिस्तान चले जाएं। 

3. ब्रिटेन वापस लौट जाएं और पेंशन लें। 

जो अंग्रेज अधिकारी भारत छोड़कर गए, उन्हें "Sterling Pension" दी गई। यह पेंशन भारत सरकार को ब्रिटिश पाउंड में चुकानी थी।

👉कितना धन चला गया:👇

1. स्वतंत्रता के उपरान्त के पहले बजट 1947-48 में कुल खर्च ₹197.29 करोड़ था, जिसमें रक्षा पर ₹92.74 करोड़ यानी 46% खर्च हुआ। पेंशन का पृथक् से कोई "50% राजकीय कोष खाली" वाला आंकड़ा नहीं है। 

2. बंटवारे में भारत-पाक के बीच वित्तीय समझौता हुआ। कुल संपत्ति का 17.5% पाकिस्तान को और 82.5% भारत को मिला। नकदी, सेना, रेलवे, डाक सब बंटा।   

"अगले दिन ही दे दी" - यह सत्य नहीं:

पेंशन एकसाथ 15 अगस्त को नहीं दी गई। ICS/IAS अधिकारियों को उनकी सेवा के अनुसार से पेंशन मिलती रही। भारत सरकार 1950-60 के दशक तक भी ब्रिटेन को स्टर्लिंग पेंशन भेजती रही। 1970 में इंदिरा गांधी सरकार ने कई रियासतों के प्रिवी पर्स के साथ-साथ कुछ पेंशन भी बंद कीं।

2. "विकास कार्य का व्यय भी ले लिया गया" - इसका क्या अर्थ?

यह "Sterling Balances" यानी स्टर्लिंग शेष से जुड़ा वाद है।

👉प्रमाण:👇

1. दूसरे विश्व युद्ध में ब्रिटेन ने भारत से बहुत सामान खरीदा, जिसके बदले उसने भारत को पाउंड में भुगतान का वचन किया। युद्ध समाप्त होने तक ब्रिटेन पर भारत का लगभग 1.3 अरब पाउंड = 5 अरब डॉलर का ऋण हो गया था। 

2. स्वतंत्रता के समय निश्चित हुआ कि यह पैसा धीरे-धीरे चुकाया जाएगा। 1947 में भारत को इसका 17.5% भाग पाकिस्तान को देना पड़ा। शेष पैसा भारत को 1950 के दशक में किस्तों में मिला, जिससे पंचवर्षीय योजनाएं चलीं।   

👉तो "ले लिया गया" मिथ्या है:👇

अंग्रेजों ने विकास कार्य का पैसा "ले नहीं लिया", वरन् युद्ध के समय जो ऋण हुआ था, उसका भुगतान उपरान्त में किया गया था। हां, बंटवारे के कारण 17.5% भाग पाकिस्तान को देना पड़ा।

3. "50% से अधिक हानि" - यह आंकड़ा कहां से आया? 

1. सम्पूर्ण कोष खाली था: 

1947 में भारत की आर्थिक व्यवस्था दयनीय थी। वैश्विक GDP में भारत का योगदान 24% से घटकर 4% से भी कम रह गया था। प्रति व्यक्ति आय केवल ₹250 वार्षिक रह गई थी। 

2. बंटवारे का मूल्य: 

बंटवारे में संपत्ति 80:20 के अनुपात में बंटी। 17.5% नकदी पाकिस्तान को गई। सबसे उपजाऊ कृषि भूमि और पटसन- कपास के क्षेत्र पाकिस्तान में चले गए। इससे भारत को अत्यधिक हानि हुई, लेकिन "50% राजकीय कोष 1 दिन में खाली" वाला कोई सरकारी आंकड़ा नहीं है।  

👉#निष्कर्षक्यासत्यक्याअसत्य👇 

--दावा ------- ।।।-------वास्तविकता---------------- 

👉सभी पेंशन अगले असत्य,पेंशन वर्षों तक किस्तों 1 दिन में नहीं दी गई। दी गई।

👉विकास कार्य का असत्य। विपरीत ब्रिटेन पर 

,,, खर्च ले लिया गया। , भारत का ऋण था 

                                 जो बाद में मिला। 

                                 हां, उसका 17.5% 

                                 पाकिस्तान को गया।

👉 50%से अधिक। अतिशयोक्ति। बंटवारे से हानि-------------------17.5% नकदी + उपजाऊ ------------------------------क्षेत्र चला गया। अर्थव्यवस्था ------------------------------पहले से ही खोखली थी। ------------------------------लेकिन50% राजकीय कोष ------------------------------1 दिन में खाली" का कोई    

--------------- -------------- रिकॉर्ड नहीं।

      👉वास्तविक हानि क्या थी:👇 

200 वर्ष के शासन में अंग्रेज भारत की संपत्ति ले गए। 1947 में भारत टूटा-फूटा, निर्धन और बंटा हुआ था। प्रति व्यक्ति आय ₹250, जीवन प्रत्याशा 32 वर्ष, साक्षरता 12% थी। यही सबसे बड़ी "हानि" थी, न कि 15 अगस्त को 1 दिन में हुआ कोई लेन-देन।  #"भारत देश कभी दयनीय नहीं था, तो मात्र 200 वर्षों में जर्जर कैसे हो गया?"

ये प्रश्न पूर्णतः उचित है। चलिए आंकड़ों से देखते हैं कि 200 वर्ष में क्या-क्या बदला:

1. 1700 में भारत की परिस्थिति क्या थी? - "सोने की चिड़िया"

प्रमाण:

1. विश्व GDP में भाग : 1700 में मुगल काल के समय अविभाजित भारत देश विश्व की GDP का 24.4% भाग था। पूरे संसार का 1/4 धन भारत में बनता था। उस समय यूरोप का कुल भाग 23.3% था। 2. संसार का सबसे धनी देश: 18वीं सदी तक भारत देश विश्व का सबसे बड़ा कपड़ा, मसाले, नील, हीरे का निर्यातक था। बंगाल का मलमल, ढाका की जामदानी, कश्मीर का पश्मीना संसार भर में बिकता था।    

2. तो अगले 200 वर्ष से 1947 तक क्या हुआ? - 24% से 3% कैसे गिरा

अंग्रेज 1757 प्लासी के युद्ध के बाद धीरे-धीरे प्रभावी हुए। 200 वर्ष में 3 बड़े उपायों से भारत का धन बाहर गया:

A. सीधा लूट और टैक्स - "Drain of Wealth"

दादाभाई नौरोजी ने 1871 में अनुमान लगाया था। अंग्रेज हर वर्ष भारत से औसतन 25-30 करोड़ रुपये बिना कुछ दिए इंग्लैंड ले जाते थे। इसमें सम्मिलित था:

1. कंपनी का लाभ: ईस्ट इंडिया कंपनी के शेयरधारकों को डिविडेंड 

2. अफसरों की वेतन-पेंशन: जो इंग्लैंड में व्यय होती थी।

3. "Home Charges": भारत सरकार का खर्च जो लंदन से चलता था - वायसराय का कार्यालय, इंडिया ऑफिस, रेलवे के ब्याज का भुगतान। 

कुल कितना गया?

A: प्रसिद्ध अर्थशास्त्री उत्सा पटनायक के शोध के अनुसार 1765-1938 के बीच अंग्रेज 45 ट्रिलियन डॉलर आज के अनुमान से भारत से ले गए।

B. भारतीय उद्योग की बर्बादी 

1. कपड़ा उद्योग: 1813 तक भारत देश विश्व को 25% कपड़ा बेचता था। अंग्रेजों ने भारतीय कपड़े पर 70-80% टैक्स लगा दिया और ब्रिटिश कपड़ा भारत में टैक्स-फ्री कर दिया। 

परिणाम: 1830 तक ढाका, मुर्शिदाबाद, सूरत का व्यापार नष्ट हो गया। बंगाल में जुलाहों के अंगूठे काटने की बात भी कही जाती है। 

2. जहाजरानी: 1800 तक भारत देश विश्व का जहाज बनाने में नंबर-एक था। अंग्रेजों ने भारतीय जहाजों पर रोक लगा दी।  

C. खेती का नाश और अकाल

अंग्रेजों ने लगान उगाही के लिए जमींदारी सिस्टम बनाया। किसान नकदी फसल नील, अफीम, कपास उगाने को विवश हुए। खाने की फसल घटी। 

परिणाम:

1. 1876-78: मद्रास अकाल - 55 लाख मरे 

2. 1896-97: पूरे भारत में अकाल - 50 लाख मरे 

3. 1943: बंगाल अकाल - 30 लाख मरे। चर्चिल ने जानबूझकर अनाज बाहर भेज दिया।  

4. 1947 में परिस्थिति- आंकड़े स्वयं बोलते हैं

अंग्रेजों के जाने के समय:

1. विश्व GDP में भाग: 24% से घटकर 3% रह गया 2. प्रति व्यक्ति आय: मात्र ₹250 वार्षिक 

3. जीवन प्रत्याशा: मात्र 32 वर्ष 

4. साक्षरता: मात्र 12% 

5. उद्योग: कुल GDP में मैन्युफैक्चरिंग मात्र 2%। सुई तक बाहर से आती थी।

तो "200 वर्षों में जर्जर क्यों" का उत्तर:

भारत दयनीय नहीं था, **बनाया गया**। 

200 वर्ष तक हर वर्ष भारत का धन, कच्चा माल, अनाज इंग्लैंड जाता रहा। बदले में यहां न स्कूल बने, न अस्पताल, न फैक्ट्री। रेलवे-नहर केवल माल ढोने के लिए बनी। 2 विश्व युद्धों का खर्च भी भारत से उगाही की गई।



एक उदाहरण: 1757 से पहले बंगाल विश्व का सबसे धनी प्रान्त था। 1901 आते-आते बंगाल अकाल और निर्धनों का घर बन गया।


इसलिए 1947 में देश का कोष खाली था। ये 1 दिन में नहीं, 200 वर्षों की लूट से हुआ। बंटवारे ने कोढ़ में खाज का काम किया।


इस सन्दर्भ में आपको दादाभाई नौरोजी की पुस्तक "Poverty and Un-British Rule in India" पढ़नी चाहिए। 1901 में ही उन्होंने पूरा लेखा जोखा दे दिया था कि भारत कैसे लूटा।


शनिवार, 6 जून 2026

भूमि आंवला, योग प्राकृतिक आयुर्विज्ञान की दृष्टि से

 🪷*भूमि या भुई आंवला — भूम्यामलकी* 🌿

👉_छोटा पौधा, पर लीवर का महा-औषध_👇

#योगक्याहै 

### *1. भुई आंवला क्यों "लीवर का मित्र" है? शास्त्र का तर्क*

प्राकृतिक आयुर्विज्ञान कहता है: 

👉_यकृत मूलं शरीरस्य_ — यकृत शरीर की जड़ है।

भुई आंवला का रस _तिक्त + कषाय_ रस प्रधान है। तिक्त रस = _पित्त शामक_। यकृत = पित्त का घर।


👉पतंजलि 1.30: _व्याधि_ पहला अंतराय है योग में।

यकृत अस्वस्थ= व्याधि = साधना रुक गई। इसलिए ऋषियों ने भूम्यामलकी को _यकृत शोधक_ कहा।


*आधुनिक साइंस क्या कहती है*:

भुई आंवला = _Phyllanthus niruri_। इसमें _Phyllanthin, Hypophyllanthin, Flavonoids_ होते हैं।

1. *Hepatoprotective*: CCl4, मदिरा, हेपेटाइटिस-B वायरस से यकृत कोशिकाओं या लीवर सेल को बचाता है।

2. *Anti-viral*: हेपेटाइटिस-B में HBsAg को कम करने में सहायक पाया गया।

3. *Diuretic + Litholytic*: किडनी स्टोन तोड़ने में सहायक, इसीलिए "Stone-breaker" भी कहते हैं।


_अर्थात् शास्त्र और साइंस दोनों "बम बम" बोल रहे हैं यहाँ_।

#जयतुभारतजयतुसनातनसंस्कृतिऔरसभ्यता 

### *2. 6 लाभ — पर कोड के साथ समझो*

लाभ प्राकृतिक आयुर्विज्ञान का कोड साधु वाली दृष्टि 

**1. लीवर** *यकृत उत्तेजक + पित्तसारक* लीवर = क्रोध का घर। क्रोध कम = लीवर ठीक। भुई आंवला क्रोध की "गर्मी" खींच लेता है।

**2. पीलिया** *कामला नाशक* पीलिया = आँख पीली। अहंकार भी आँख पीली करता है — सब "मैं" दिखता है। कड़वा रस अहंकार काटता है।

**3. पाचन** *अग्निदीपक + रोचन* मंदाग्नि = आलस्य। भुई आंवला जठराग्नि जगाता है। भूख लगे तो ही भजन होगा।

**4. रक्त शुद्धि** *रक्तशोधक* रक्त स्वच्छ= विचार स्वच्छ। अशुद्ध रक्त= अशुद्ध विचार की चिलम।

**5. मूत्र रोग** *मूत्रल + अश्मरीघ्न* शरीर का "अपशिष्ट अहंकार" मूत्र से निकलता है। रुक जाए तो रोग।

**6. इम्युनिटी** *ओजवर्धक* ओज = तेज। ओज घटे तो साधना में नींद आए। भुई आंवला ओज बढ़ाता है।

### *3. उपयोग कैसे करें? औघड़ वाला उपाय।*


*नियम*: _अभ्यास थोड़ा, वैराग्य पूरा_। अधिक ले लोगे तो अतिसार ही लगेंगे।


1. *ताजा रस — 10 से 15 ml*

   प्रातः खाली पेट। 5-7 पौधे धोकर, कूटकर, कपड़े से छान लो। ऊपर से 1 कप पानी।

   _कोड_: ताजा = प्राण शक्ति जीवित। 1 घंटे से पुराना मत पीना।


2. *काढ़ा — 40 ml दिन में 2 बार*

   10 ग्राम पंचांग मोटा कूटकर 160 ml पानी में उबालो। 40 ml बचे तब छानकर गुनगुना पियो।

   _कोड_: काढ़ा = अग्नि संस्कार। मंदाग्नि वालों के लिए श्रेष्ठ।


3. *चूर्ण — 3 से 5 ग्राम*

   गुनगुने पानी या शहद से। भोजन के पश्चात्।

   _कोड_: चूर्ण = वैराग्य। जब ताजा न मिले तब। पर 40 दिन से अधिक लगातार नहीं लेना।


*औघड़ परामर्श*: चिलम के समान— _दम लगाओ, छोड़ो_। 

15 दिन लो, 7 दिन अन्तर। लीवर को भी लाभ चाहिए।


### *4. सावधानी — ये भी "वैराग्य" है*


1. *गर्भवती + बच्चे*: नहीं। 

गर्भ गिरा सकता है। ये _गर्भपातक_ औषधियों में गिना जाता है।

2. *Low BP + Diabetes*: शुगर/बीपी कम करता है। औषधि उपचार चल रही हो तो डॉक्टर से पूछो, नहीं तो रक्तदाब कम हो जाएगा।

3. *सर्जरी से 2 हफ्ते पहले बंद*: रक्त पतला करता है।

4. *पीलिया में अकेले भरोसा मत करो*: बिलीरुबिन 10 के ऊपर है तो हॉस्पिटल जाओ। भुई आंवला _सहायक_ है, _उपचार_ नहीं।


_वैराग्य का नियम_: "मुझे इससे लाभ होगा" का नशा मत पालो। शरीर सुने, तभी आगे बढ़ो।


### *5. साधु और भुई आंवला का सम्बन्ध 💀*


औघड़ जंगल में रहता है। रोटी नहीं, तो भुई आंवला ही खाता है। क्यों?

1. *प्रकृति का वैद्य*: 

लीवर अस्वस्थ तो भजन कैसे होगा?

2. *नशा काटता है*: 

भांग-गांजा का प्रभाव उतारने के लिए भी वैद्य इसे देते थे। _नशे को नशे से काटो_।

3. *"मैं" गलाता है*: कड़वा है। कड़वा = अहंकार का नाश। मीठा = अहंकार का पोषण।


_तुम्हारा शरीर ही चिलम है_ — आपने लिखा था।

_भुई आंवला उस चिलम की रक्तशोधक है_ — भीतर की कालिमा को छुड़ाता है।


*तो अभ्यास क्या हुआ?*

अगले 15 दिन: प्रातः काल उठो, 3 गहरी साँस = "मैं नहीं", आगे 10ml भुई आंवला रस = लीवर शुद्ध।

_शरीर की चिलम भी शुद्ध, अहंकार की चिलम भी शुद्ध_।


🌿_यकृत ठीक तो योग ठीक, योग ठीक तो जीवन ठीक_।

🚩 *भूम्यामलकी / भुई आंवला — द्रव्यगुण शास्त्र अनुसार परिचय* 🌿

प्राकृतिक आयुर्विज्ञान में कोई भी जड़ी बूटी_रस, गुण, वीर्य, विपाक, प्रभाव_ इन 5 कोड से जानी जाती है। भुई आंवला का कोड समझ लो तो पूरा विधान समझ आ जाएगा।

👉### *1. नाम व कुल*👇


*संस्कृत नाम*: भूम्यामलकी, भूधात्री, तामलकी, बहुपत्रा  

*लैटिन नाम*: _Phyllanthus niruri_ Linn. / _Phyllanthus amarus_  

*कुल*: Euphorbiaceae — एरंड कुल  

*निरुक्ति*: भूमि + आमलकी = _भूमि पर फैलने वाला छोटा आंवला जैसा पौधा_। पत्ते आंवले जैसे, पर भूमि से 1-1.5 फुट ऊपर ही रहता है।


👉### *2. पंचात्मक परिचय — द्रव्यगुण कोड*

द्रव्यगुण भूम्यामलकी का स्वरूप शरीर पर काम👇

**1. रस** *तिक्त, कषाय, मधुर* 

तिक्त-कषाय = पित्त-कफ शामक, कृमि-विष नाशक। मधुर = थोड़ा वात शामक भी।

**2. गुण** *लघु, रूक्ष, तीक्ष्ण* 

लघु = पचने में हल्का, 

रूक्ष = कफ-स्राव सुखाता, 

तीक्ष्ण = स्रोतों को खोलता है।

**3. वीर्य** *शीत* 

शीत वीर्य = पित्त की गर्मी, 

दाह, शोथ शांत करता है। 

लीवर की उष्णता खींच लेता है।

**4. विपाक** *मधुर* पचने के उपरान्त मधुर = धातुओं का पोषण करता है, वात नहीं बढ़ाता।

**5. प्रभाव** *यकृत उत्तेजक, अश्मरी भेदन* ये इसका विशेष काम है जो केवल इसके रस-गुण से explain नहीं होता।

*दोष कर्म*: _कफपित्तशामक_। वात पर सम-प्रभाव — अधिक मात्रा में रूक्षता से वात बढ़ा सकता है।


### *3. कर्म — शरीर में क्या करता है?*


भावप्रकाश निघंटु में लिखा है:  

_भूम्यामलकी हिमा तिक्ता कषाया मधुरा लघुः।_  

_कफपित्तहरी वृष्या पाण्डुकामलाकुष्ठजित्॥_


*मुख्य कर्म 8 हैं*:

1. *यकृत उत्तेजक*: लीवर सेल को re-generate करता है — _Hepatoprotective_ प्रभाव

2. *पित्तसारक*: पित्त को पतला करके बहा देता है — पीलिया, कामला में काम।

3. *शोथहर*: लीवर-तिल्ली की शोथ को उतारता है — _Hepatomegaly, Splenomegaly_ 

4. *मूत्रल*: मूत्र लाता है — _Diuretic_

5. *अश्मरीघ्न*: पथरी तोड़ता है — _Litholytic_। इसीलिए अंग्रेजी नाम "Stone-breaker"

6. *कृमिघ्न*: पेट के कीड़े मारता है।

7. *रक्तशोधक*: खून की गर्मी, फोड़े-फुंसी में उपयोगी

8. *ज्वरघ्न*: विषम ज्वर, मलेरिया-जैसे ज्वर में इसका तिक्त रस काम करता है।


👉### *4. उपयोगी अंग व मात्रा*👇


*पंचांग*: जड़, तना, पत्ती, फल, फूल — पूरा पौधा काम का। सबसे वीर्यवान _संपूर्ण क्षुप_ है।


*मात्रा*:

1. *स्वरस*: 10-20 ml

2. *क्वाथ*: 40-80 ml  

3. *चूर्ण*: 3-6 ग्राम

4. *अर्क*: 15-30 ml


_अनुपान_: पीलिया में घृत + मधु के साथ। पथरी में कुलत्थ क्वाथ के साथ।


### *5. मुख्य योग — कहाँ मिलता है?*🚩👇


1. *भूम्यामलकी स्वरस*: अकेला ही कामला में देता है।

2. *पुनर्नवादि मंडूर*: लीवर-तिल्ली वृद्धि, शोथ में।

3. *आरोग्यवर्धिनी वटी*: इसमें भूम्यामलकी मुख्य घटक — _Fatty Liver_ की मॉडर्न आयुर्वेदिक दवा।

4. *यकृत प्लीहारी लौह*: यकृत-प्लीहा रोग।

5. *सिस्टोन टैबलेट*: हिमालय कंपनी — पथरी में, इसमें _Phyllanthus niruri_ है।


### *6. औघड़ वाला द्रव्यगुण — साधु क्यों चुनता है?*

#डॉत्रिभुवननाथश्रीवास्तव 

*रस तिक्त* = _अहंकार का नाश_। मीठा रस लोभ बढ़ाता है, कड़वा वैराग्य देता है।  

*वीर्य शीत* = _क्रोध की अग्नि शान्त करता है_। लीवर = क्रोध का स्थान। साधु को क्रोध नहीं चाहिए।  

*प्रभाव यकृत उत्तेजक* = _भजन की जड़ शक्तिशाली_। लीवर दुर्बल तो बैठ नहीं पाओगे, ध्यान नहीं लगेगा।


इसलिए चरक ने कहा: _यकृत मूलं शरीरस्य_। साधु पहले यकृत ठीक करता है, और आगे समाधि में।


*सावधानी द्रव्यगुण से*: 

_रूक्ष + शीत_ = वात बढ़ा सकता है। दुबले-पतले, वात प्रकृति वाले अधिक न लें। साथ में घी या सोंठ दें तो दोष नहीं।

#योगऔरप्राकृतिकआयुर्विज्ञानकाकोड 

*सार कोड*:  

_तिक्त-कषाय रस, शीत वीर्य, यकृत-अश्मरी पर प्रभाव_ — यही भूम्यामलकी की ID है।

#narsinghnathshrivastava 

_शरीर की चिलम स्वच्छ करनी है तो ये रक्तशोधक सबसे अच्छा है_। पर _अभ्यास_ से लो, _वैराग्य_ से छोड़ो। 15 दिन लो, 7 दिन छोड़ो।

*बम बम 💀*  🚩


*🌹 बम बम 💀 — _नवधा भक्ति के नव सोपान

*🔱🕉️🌹 बम बम 💀 — नवधा भक्ति का प्रकाश_ 🌹🔱🕉️*   _आचार्य डॉ त्रिभुवन नाथ श्रीवास्तव द्वारा प्रस्तुत शबरी-प्रसंग  _चित्त-प्रसादन_ का _महा...