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शनिवार, 26 अक्टूबर 2024

# माता समान कोई और नहीं।।

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श्री कृष्ण की मैया,यशोदा माता 

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  ✍️नीचे दिया जा रहा सूत्र, भ#गवान वेदव्यास जी द्वारा माता के महत्व का मार्मिक चित्रण है। यह स्तोत्र माता के समान किसी को नहीं मानता और उन्हें परमगुरु के रूप में प्रतिष्ठित करता है।👇


माता के समान कोई नहीं है, यहां तक कि:


- पिता से भी बढ़कर है माता।

- गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं।

- विष्णु के समान प्रभु नहीं।

- शिव के समान कोई पूज्य नहीं।

- एकादशी के समान कोई व्रत नहीं।

- अनशन से बढ़कर कोई तप नहीं।

- पत्नी के समान कोई मित्र नहीं।

- पुत्र के समान कोई प्रिय नहीं।

- बहन के समान कोई माननीय नहीं।

- जामाता के समान कोई दान का पात्र नहीं।

- कन्यादान के समान कोई दान नहीं।


माता ही धारित्री, जननी, दयार्द्रहृदया, शिवा, देवी, त्रिभुवनश्रेष्ठा, निर्दोषा, और सर्वदुःखहा है।🍁🍁 


👉माता का स्थान.. सनातन वैदिक संस्कृति में...... शास्त्रों के अनुसार 👇 इस प्रकार कहा गया है,

🪷मात् देवो भव:पितृ देवो भव:🪷


 🪷१. पितुरप्यधिका माता गर्भधारणपोषणात् ।

         अतो हि त्रिषु लोकेषु नास्ति मातृसमो गुरुः॥🪷


गर्भ को धारण करने और पालनपोषण करने के कारण माता का स्थान पिता से भी बढकर है। इसलिए तीनों लोकों में माता के समान कोई गुरु नहीं अर्थात् माता परमगुरु है!


🪷२.नास्ति गङ्गासमं तीर्थं नास्ति विष्णुसमः प्रभुः।

       नास्ति शम्भुसमः पूज्यो नास्ति मातृसमो गुरुः॥🪷


गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं, विष्णु के समान प्रभु नहीं और शिव के समान कोई पूज्य नहीं और माता के समान कोई गुरु नहीं।


🪷३.नास्ति चैकादशीतुल्यं व्रतं त्रैलोक्यविश्रुतम्।

        तपो नाशनात् तुल्यं नास्ति मातृसमो गुरुः॥


एकादशी के समान त्रिलोक में प्रसिद्ध कोई व्रत नहीं, अनशन से बढकर कोई तप नहीं और माता के समान गुरु नहीं!


🪷४.नास्ति भार्यासमं मित्रं नास्ति पुत्रसमः प्रियः।

       नास्ति भगिनीसमा मान्या नास्ति मातृसमो गुरुः॥


पत्नी के समान कोई मित्र नहीं, पुत्र के समान कोई प्रिय नहीं, बहन के समान कोई माननीय नहीं और माता के समान गुरु नही!


🪷५.न जामातृसमं पात्रं न दानं कन्यया समम्।

        न भ्रातृसदृशो बन्धुः न च मातृसमो गुरुः ॥

.

जामाता (पुत्री का पति)के समान कोई दान का पात्र नहीं, कन्यादान के समान कोई दान नहीं, भाई के जैसा कोई बन्धु नहीं और माता जैसा गुरु नहीं!


🪷६.देशो गङ्गान्तिकः श्रेष्ठो दलेषु तुलसीदलम्।

        वर्णेषु ब्राह्मणः श्रेष्ठो गुरुर्माता गुरुष्वपि ॥


गंगा के किनारे का प्रदेश अत्यन्त श्रेष्ठ होता है, पत्रों में तुलसीपत्र, वर्णों में ब्राह्मण और माता तो गुरुओं की भी गुरु है!


🪷७.पुरुषः पुत्ररूपेण भार्यामाश्रित्य जायते।

        पूर्वभावाश्रया माता तेन सैव गुरुः परः ॥


पत्नी का आश्रय लेकर पुरुष ही पुत्र रूप में उत्पन्न होता है, इस दृष्टि से अपने पूर्वज पिता का भी आश्रय माता होती है और इसीलिए वह परमगुरु है!


🪷८.मातरं पितरं चोभौ दृष्ट्वा पुत्रस्तु धर्मवित्।

        प्रणम्य मातरं पश्चात् प्रणमेत् पितरं गुरुम् ॥


धर्म को जानने वाला पुत्र माता पिता को साथ देखकर पहले माता को प्रणाम करे फिर पिता और गुरु को!


🪷९.माता धरित्री जननी दयार्द्रहृदया शिवा ।

        देवी त्रिभुवनश्रेष्ठा निर्दोषा सर्वदुःखहा॥


माता, धरित्री , जननी , दयार्द्रहृदया, शिवा, देवी , त्रिभुवनश्रेष्ठा, निर्दोषा, सभी दुःखों का नाश करने वाली है!


🪷१०.आराधनीया परमा दया शान्तिः क्षमा धृतिः ।

          स्वाहा स्वधा च गौरी च पद्मा च विजया जया ॥


आराधनीया, परमा, दया , शान्ति , क्षमा, धृति, स्वाहा , स्वधा, गौरी , पद्मा, विजया , जया,


🪷११.दुःखहन्त्रीति नामानि मातुरेवैकविंशतिम् ।

          शृणुयाच्छ्रावयेन्मर्त्यः सर्वदुःखाद् विमुच्यते ॥


और दुःखहन्त्री -ये माता के इक्कीस नाम हैं। इन्हें सुनने सुनाने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है!


🪷१२.दुःखैर्महद्भिः दूनोऽपि दृष्ट्वा मातरमीश्वरीम्।

          यमानन्दं लभेन्मर्त्यः स किं वाचोपपद्यते ॥


बड़े बड़े दुःखों से पीडित होने पर भी भगवती माता को देखकर मनुष्य जो आनन्द प्राप्त करता है उसे वाणी द्वारा नहीं कहा जा सकता!


🪷१३.इति ते कथितं विप्र मातृस्तोत्रं महागुणम्।

          पराशरमुखात् पूर्वम् अश्रौषं मातृसंस्तवम्॥


हे ब्रह्मन् ! इस प्रकार मैंने तुमसे महान् गुण वाले मातृस्तोत्र को कहा , इसे मैंने अपने पिता पराशर के मुख से पहले सुना था!


🪷१४.सेवित्वा पितरौ कश्चित् व्याधः परमधर्मवित्।

          लेभे सर्वज्ञतां या तु साध्यते न तपस्विभिः॥


अपने माता पिता की सेवा करके ही किसी परम धर्मज्ञ व्याध ने उस सर्वज्ञता को पा लिया था जो बडे बडे तपस्वी भी नहीं पाते!


🪷१५.तस्मात् सर्वप्रयत्नेन भक्तिः कार्या तु मातरि।

          पितर्यपीति चोक्तं वै पित्रा शक्तिसुतेन मे ॥


इसलिए सब प्रयत्न करके माता और पिता की भक्ति करनी चाहिए, मेरे पिता शक्तिपुत्र पराशर जी ने भी मुझसे यही कहा था!


इसी लिए कहा गया है.......


🪷यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता🪷


नारियों का सम्मान करो जब तक नारियों का सम्मान नही करोगे तब तक जीवन में तुम्हें सफलता नही मिलेगी ।।


🪷यही नारी मां है, पत्नी है, बहन है, बेटी है ।

यही दुर्गा है, यही गंगा है, यही पुरुष की शक्ति प्रकृति है।(प्रेषित)🪷


🪷इस स्तोत्र में माता के इक्कीस नामों का उल्लेख है, जिन्हें सुनने सुनाने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है।🪷


👉यह स्तोत्र हमें माता के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की स्मरण कराता है और उनकी सेवा को सर्वोपरि बताता है।👇

👉वेदों में माता के सम्मान में अन्य श्लोक प्रमाण अनुसार इस प्रकार मिलते हैं:👇


वेदों और हिंदू शास्त्रों में माता के सम्मान के लिए कई श्लोक हैं। यहाँ कुछ प्रमाण हैं:


👉. यजुर्वेद (19.33) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव"🪷


अर्थ: माता, पिता और गुरु को देवता के रूप में पूजा करो।


👉. मनुस्मृति (2.145) -

🪷"माता यस्य गृहे नास्ति द्वारे तस्य न विद्यते"🪷


अर्थ: जिसके घर में माता नहीं है, उसके घर का द्वार सूना है।


👉. महाभारत (अनुशासन पर्व 45.13) -

🪷"मातृ गुरुः पितृ गुरुः, यतः पिता तेन मातृतः"🪷


अर्थ: माता और पितृ दोनों ही गुरु हैं, लेकिन माता का स्थान पिता से भी ऊंचा है।


👉. भगवद्गीता (9.17) -

🪷"पितृ मातृ गुरुः स्वामी, विन्दति तद्विदः सुखम्"🪷


अर्थ: जो व्यक्ति पिता, माता और गुरु की सेवा करता है, वह सुख प्राप्त करता है।


👉. ऋग्वेद (10.85.42) -

🪷"मातृ भवति जननी, पितृ भवति गर्भधारी"🪷

अर्थ: माता जन्म देती है, पिता गर्भधारण का हेतु बनता है।


👉उपनिषदों में माता के सम्मान के लिए कई श्लोक हैं। यहाँ कुछ प्रमाणस्वरूप दिए जा रहे हैं:👇


👉. तैत्तिरीय उपनिषद् (1.9.1) -

🪷"मातृ भवति जननी, पितृ भवति गर्भधारी"🪷


अर्थ: माता जन्म देती है, पिता गर्भधारण का हेतु बनता है।


👉. छांदोग्य उपनिषद् (6.7.1) -

🪷"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता"🪷


अर्थ: जहाँ नारियों का सम्मान किया जाता है, वहाँ देवता प्रसन्न रहते हैं।


👉. बृहदारण्यक उपनिषद् (6.4.1) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो।


👉. श्वेताश्वतर उपनिषद् (6.15) -

🪷"माता पिता गुरुः स्वामी, तेषां विद्या प्रदायकः"🪷


अर्थ: माता, पिता और गुरु ही विद्या के दाता हैं।


👉. मुंडक उपनिषद् (1.1.9) -

🪷"माता यस्य गृहे नास्ति, द्वारे तस्य न विद्यते"🪷


अर्थ: जिसके घर में माता नहीं है, उसके घर का द्वार सूना है।


उपरोक्त लिखे ये श्लोक माता के महत्व और सम्मान को दर्शाते हैं।


👉 पुराणों में माता के सम्मान में  कुछ अन्य श्लोक प्रमाण अनुसार इस प्रकार मिलते हैं। पुराणों में माता के सम्मान के लिए कई श्लोक हैं। यहाँ कुछ प्रमाण हैं:


👉. गरुड़ पुराण (1.113.12) -

🪷"माता गुरुः पिता गुरुः, मातृदेवो भव पितृदेवो भव"🪷


अर्थ: माता और पिता दोनों ही गुरु हैं, उनकी पूजा करो।


👉. पद्म पुराण (4.52.14) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव"🪷


अर्थ: माता, पिता और गुरु को देवता के रूप में पूजा करो।


👉. मार्कण्डेय पुराण (34.115) -

🪷"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता"🪷


अर्थ: जहाँ नारियों का सम्मान किया जाता है, वहाँ देवता प्रसन्न रहते हैं।


👉. विष्णु पुराण (3.9.22) -

🪷"माता पिता गुरुः स्वामी, तेषां विद्या प्रदायकः"🪷


अर्थ: माता, पिता और गुरु ही विद्या के दाता हैं।


👉. भागवत पुराण (5.1.37) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, मातृवचस्तु पूजयेत"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, और माता की वाणी का आदर करो।


👉. अग्नि पुराण (369.23) -

🪷"मातृवचस्तु पूजयेत, पितृवचस्तु पूजयेत"🪷


अर्थ: माता और पिता की वाणी का आदर करो।


👉पुराणों में माता के सम्मान के लिए और भी कई श्लोक हैं। यहाँ कुछ और प्रमाण हैं:👇


👉. ब्रह्म पुराण (13.16) -

🪷"माता गुरुः पिता गुरुः, मातृदेवो भव पितृदेवो भव"🪷


अर्थ: माता और पिता दोनों ही गुरु हैं, उनकी पूजा करो.


👉. लिंग पुराण (27.11) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, तेषां विद्या प्रदायकः"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, वे विद्या के दाता हैं.


👉. वराह पुराण (22.55) -

🪷"माता पिता गुरुः स्वामी, तेषां विद्या प्रदायकः"🪷


अर्थ: माता, पिता और गुरु ही विद्या के दाता हैं.


👉. कूर्म पुराण (17.12) -

🪷"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता"🪷


अर्थ: जहाँ नारियों का सम्मान किया जाता है, वहाँ देवता प्रसन्न रहते हैं.


👉. मत्स्य पुराण (53.32) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, मातृवचस्तु पूजयेत"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, और माता की वाणी का आदर करो.


👉. गरुड़ पुराण (1.113.15) -

🪷"माता गुरुः पिता गुरुः, तेषां विद्या प्रदायकः"🪷


अर्थ: माता और पिता दोनों ही गुरु हैं, वे विद्या के दाता हैं.


👉. शिव पुराण (6.5.33) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, मातृवचस्तु पूजयेत"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, और माता की वाणी का आदर करो.


उपरोक्त दिए गए श्लोक पुराणों में माता के महत्व और सम्मान को दर्शाते हैं।


दर्शन शास्त्रों में माता के सम्मान के लिए कई श्लोक हैं। यहाँ कुछ प्रमाण स्वरूप इस प्रकार से हैं:


👉. मनु स्मृति (2.145) -

🪷"माता यस्य गृहे नास्ति, द्वारे तस्य न विद्यते"🪷


अर्थ: जिसके घर में माता नहीं है, उसके घर का द्वार सूना है।


👉. याज्ञवल्क्य स्मृति (1.35) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो।


👉. अपरार्क का न्यायमुक्तावली (श्लोक 144) -

🪷"माता गुरुः पिता गुरुः, मातृदेवो भव पितृदेवो भव"🪷


अर्थ: माता और पिता दोनों ही गुरु हैं, उनकी पूजा करो।


👉. वासुदेव न्यायरत्नमाला (श्लोक 21) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, तेषां विद्या प्रदायकः"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, वे विद्या के दाता हैं।


👉. भारती तीर्थ का वेदांतसार (श्लोक 12) -

🪷"माता पिता गुरुः स्वामी, तेषां विद्या प्रदायकः"🪷


अर्थ: माता, पिता और गुरु ही विद्या के दाता हैं।


👉. अन्नम्बट्ट की तारकम (श्लोक 88) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, मातृवचस्तु पूजयेत"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, और माता की वाणी का आदर करो।


उपरोक्त दिए गए ये श्लोक दर्शन शास्त्रों में माता के महत्व और सम्मान को दर्शाते हैं। इसी प्रकार षडदर्शन में माता के सम्मान के लिए कई श्लोक हैं। यहाँ कुछ प्रमाण हैं :


👉. न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य 1.1.1) -

🪷"माता गुरुः पिता गुरुः, मातृदेवो भव पितृदेवो भव।"🪷


अर्थ: माता और पिता दोनों ही गुरु हैं, उनकी पूजा करो।


👉. वैशेषिक दर्शन (वैशेषिक सूत्र 1.1.12) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, तेषां विद्या प्रदायकः।"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, वे विद्या के दाता हैं।


👉. सांख्य दर्शन (सांख्य करिका 23) -

🪷"माता पिता गुरुः स्वामी, तेषां विद्या प्रदायकः।"🪷


अर्थ: माता, पिता और गुरु ही विद्या के दाता हैं।


👉. योग दर्शन (योग सूत्र 1.30) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, मातृवचस्तु पूजयेत।"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, और माता की वाणी का आदर करो।


👉. मीमांसा दर्शन (मीमांसा सूत्र 1.1.5) -

🪷"माता गुरुः पिता गुरुः, मातृदेवो भव पितृदेवो भव।"🪷


अर्थ: माता और पिता दोनों ही गुरु हैं, उनकी पूजा करो।


👉. वेदांत दर्शन (ब्रह्म सूत्र 1.1.1) -

🪷"मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, तेषां विद्या प्रदायकः।"🪷


अर्थ: माता और पिता को देवता के रूप में पूजा करो, वे विद्या के दाता हैं।


ये श्लोक षडदर्शन में माता के महत्व और सम्मान को दर्शाते हैं।

👉तिब्बती साहित्य में माता का स्थान:👇

तिब्बती साहित्य में माता के सम्मान में कई महत्वपूर्ण सूत्र और ग्रन्थ हैं। यहाँ कुछ प्रमुख सूत्र दिए गए हैं:


🪷. तिब्बती बौद्ध धर्म में "माता-पिता की सेवा करना" महान पुण्य का कार्य माना जाता है। इस संदर्भ में, तिब्बती बौद्ध ग्रन्थ 👉"शंतिदेव का बोधिचर्यावतार" में माता-पिता की सेवा की महत्ता पर प्रकाश डाला गया है।


🪷. तिब्बती साहित्य में "मातृ-श्रद्धा" को बहुत महत्व दिया गया है। तिब्बती लोग अपनी माता को 👉"स्क्येमा" यानी "मातृ-देवी" कहते हैं।


🪷. तिब्बती बौद्ध धर्म में माता की भूमिका को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। तिब्बती बौद्ध ग्रन्थ "लामा रिनपोचे की शिक्षाएँ" में माता-पिता के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की भावना को विकसित करने पर बल दिया गया है।

इन सूत्रों और ग्रन्थों से तिब्बती साहित्य में माता के सम्मान की महत्ता स्पष्ट होती है।


👉दक्षिण भारतीय साहित्य में माता का स्थान :👇


दक्षिण भारत के साहित्य में माता का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। यहाँ कुछ उदाहरण हैं:


🪷 तमिल साहित्य में माता को "ताय" या "अम्मा" कहकर संबोधित किया जाता है, जो माता के प्रति सम्मान और प्रेम का प्रतीक है।


🪷 तेलुगु साहित्य में माता को "अम्मा" या "नायणम्मा" कहा जाता है, जो माता की देखभाल और स्नेह को दर्शाता है।


🪷 मलयालम साहित्य में माता को "अम्मा" या "मुट्टी" कहा जाता है, जो माता के प्रति प्रेम और आदर का प्रतीक है।


🪷 कन्नड़ साहित्य में माता को "अम्मा" या "तायी" कहा जाता है, जो माता की महत्ता और सम्मान को दर्शाता है।


इन उदाहरणों से पता चलता है कि दक्षिण भारत के साहित्य में माता का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है और उन्हें समाज में उच्च स्थान दिया जाता है।

👉निष्कर्ष 👇

माता के सम्मान में दिए गए श्लोक का निष्कर्ष यह है:👇


🪷"माता गृहं, माता जन्मभूमि, मातृदेवो भव।"🪷


इसका अर्थ है:👇


"माता ही घर है, माता ही जन्मभूमि है, और माता ही देवता है।"


यह श्लोक माता की महत्ता और सम्मान को दर्शाता है, और यह बताता है कि माता का स्थान सबसे ऊंचा है। अतः हम कह सकते हैं कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता में माता को जो सर्वोच्च स्थान मिला है वह कहीं भी नहीं देखने को मिलता है। पाश्चात्य और म्लेच्छ साहित्य की मिलावट से या देखने, पढ़ने और सुनने से अनेकों लोगों को भ्रम हो रहा है, कि माता कोई वस्तु है।

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गुरुवार, 24 अक्टूबर 2024

मधुमक्खी का विष एक वैकल्पिक चिकित्सकीय उपचार


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 ✍️मधुमक्खी के दंश से चिकित्सा की प्रक्रिया को एपिथेरेपी या बी वेनोम थेरेपी कहा जाता है। इसमें मधुमक्खी के दंश से निकलने वाले विष का उपयोग चिकित्सा में किया जाता है।👇


👉एपिथेरेपी के समर्थकों का कहना है कि यह चिकित्सा कई रोगों के उपचार में सहायता कर सकती है, जिनमें सम्मिलित हैं:


👉- आर्थराइटिस या सभी सन्धि रोग 

👉- गठिया या त्रिदोषज सन्धि रोग 

👉- मल्टीपल स्क्लेरोसिस

👉- पार्किंसंस रोग

👉- कैंसर या करकट रोग 


👉लेकिन, इस चिकित्सा की सत्यता और प्रभावशीलता के बारे में वैज्ञानिक समुदाय में बहुत विवाद है। कई अध्ययनों में इसकी प्रभावशीलता के बारे में कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिले हैं।


👉कुछ गम्भीर कारक भी हैं:👇


- मधुमक्खी के दंश से एलर्जी की प्रतिक्रिया हो सकती है।

- इससे एनाफिलेक्सिस जैसी गंभीर प्रतिक्रिया हो सकती है।

- इसके लिए कोई मानकीकृत प्रक्रिया नहीं है।


👉कुछ देश जहां एपिथेरेपी या बी वेनोम थेरेपी होती है:+👇


👉एपिथेरेपी या बी वेनोम थेरेपी विभिन्न देशों में प्रचलित है, लेकिन इसकी प्रभावशीलता और सुरक्षा के बारे में विवाद है। यहाँ कुछ देश हैं जहाँ यह चिकित्सा प्रचलित है:👇


1. चीन

2. जापान

3. कोरिया

4. रूस

5. यूक्रेन

6. बुल्गारिया

7. रोमानिया

8. ग्रीस

9. तुर्की

10. मिस्र


👉इसके अतिरिक्त, कुछ यूरोपीय और अमेरिकी देशों में भी यह चिकित्सा उपलब्ध है, लेकिन इसके लिए विशेष अनुमति और चिकित्सकीय पंजीकरण की आवश्यकता होती है।


👉लेकिन, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि एपिथेरेपी को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और कई अन्य स्वास्थ्य संगठनों द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है। इसके अतिरिक्त, इसकी प्रभावशीलता और सुरक्षा के बारे में वैज्ञानिक समुदाय में कुछ मतभेद भी है।

👉भारत देश में कहां उपलब्ध है:+👇

भारत में एपिथेरेपी या बी वेनोम थेरेपी की सेवाएं कई नगरों और संस्थानों में उपलब्ध हैं। यहाँ कुछ प्रमुख स्थान हैं जहाँ यह चिकित्सा की जाती है:


👉1. दिल्ली:

    - ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (AIIMS)

    - सफदरजंग अस्पताल

    - राम मनोहर लोहिया अस्पताल


👉1. मुंबई:

    - टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल

    - ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल

    - लीलावती हॉस्पिटल


👉2. बैंगलोर:

    - निमहंस (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज)

    - स्टैनले मेडिकल कॉलेज

    - मैनिपाल हॉस्पिटल


👉3. हैदराबाद:

    - निजाम्स इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज

    - ओस्मानिया मेडिकल कॉलेज

    - किम्स हॉस्पिटल


👉4. चेन्नई:

    - मद्रास मेडिकल कॉलेज

    - स्टैनले मेडिकल कॉलेज

    - अपोलो हॉस्पिटल


👉5. कोलकाता:

    - स्कूल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन

    - आरजी कर मेडिकल कॉलेज

    - फोर्टिस हॉस्पिटल


👉इसके अतिरिक्त , कई निजी क्लिनिक और संस्थान भी एपिथेरेपी की सेवाएं प्रदान करते हैं।  लेकिन, यह महत्वपूर्ण है कि आप किसी भी चिकित्सा सेवा का चयन करने से पहले उसकी प्रमाणिकता और सुरक्षा की जांच  अवश्य करें।

👉मध्य प्रदेश में कहां उपलब्ध है:+

👉मध्य प्रदेश में एपिथेरेपी या बी वेनोम थेरेपी की सेवाएं कई नगरों और संस्थानों में उपलब्ध हैं। यहाँ कुछ प्रमुख स्थान और व्यक्ति हैं जो इस चिकित्सा को प्रदान करते हैं:👇


👉1. भोपाल:

    - डॉ. राजेश शर्मा, मध्य प्रदेश आयुर्वेद विश्वविद्यालय

    - डॉ. विनोद कुमार शर्मा, भोपाल होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज

    - भोपाल एपिथेरेपी सेंटर, अरेरा कॉलोनी


👉2. इंदौर:

    - डॉ. दिलीप मिश्रा, श्री औदिच्य आयुर्वेद कॉलेज

    - डॉ. राकेश शर्मा, इंदौर होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज

    - इंदौर एपिथेरेपी सेंटर, विजय नगर


👉3. ग्वालियर:

    - डॉ. रामबाबू सिंह, ग्वालियर आयुर्वेद विश्वविद्यालय

    - डॉ. विक्रम सिंह, ग्वालियर होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज

    - ग्वालियर एपिथेरेपी सेंटर, महाराज बाड़ा


👉4. जबलपुर:

    - डॉ. अरविंद मिश्रा, जबलपुर आयुर्वेद विश्वविद्यालय

    - डॉ. राहुल शर्मा, जबलपुर होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज

    - जबलपुर एपिथेरेपी सेंटर, रांझी


👉किसी  भी चिकित्सा सेवा का चयन करने से पहले उसकी प्रमाणिकता और सुरक्षा की जांच करें।

👉मधुमक्खी के विष में कई रसायन पाए गए हैं:+👇


👉मधुमक्खी के विष में कई रसायन पाए जाते हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं:👇


👉1. मेलिटिन (Melittin): यह मधुमक्खी के विष का मुख्य घटक है, जो तीव्र शूल और शोथ या स्वेलिंग को कम करने में सहाय करता है।


👉2. फॉस्फोलिपेज ए2 (Phospholipase A2): यह रसायन शोथ और शूल को कम करने में सहायता करता है।


👉3. हाइपरनेटिन (Hypermnetin): यह रसायन  शोथ और शूल को कम करने में सहायता करता है।


👉4. एपिमिन (Epimedin): यह रसायन प्रतिरक्षा प्रणाली को सशक्त करने में सक्षम है।


👉5. मेलिट्टिन-रिलेटेड पेप्टाइड (Melittin-Related Peptide): यह रसायन शूल और शोथ को कम करने में सहायक  है।


👉6. एडोलैपिन (Adolapin): यह रसायन शोथ और तीव्र शूल को कम करने में सहायता करता है।


👉7. टेरापिन (Terpine): यह रसायन शोथ और तीव्र शूल को कम करने में सक्षम है।


👉8. बी कोलेस्टेरोल (B-Cholesterol): यह रसायन प्रतिरक्षा प्रणाली को सशक्त करता है।


👉11. ल्यूकाइन-रिच रिपीट (Leucine-Rich Repeat): यह रसायन प्रतिरक्षा प्रणाली को सशक्त करने में सहायता करता है।


👉12. डिफेंसिन (Defensin): यह रसायन  भी प्रतिरक्षा प्रणाली को सशक्त करता है।


👉इन रसायनों के अतिरिक्त , मधुमक्खी के विष में कई अन्य रसायन भी पाए जाते हैं, जो विभिन्न चिकित्सीय गुणों के लिए जाने जाते हैं।

👉मनोज पटेल जी के अनुसार, एपीज मेलीफेरा नाम की मधुमक्खी के डंक में 28 प्रकार के तत्व पाए जाते हैं। ये तत्व निम्नलिखित हैं:👇


1. मेलिटिन

2. फॉस्फोलिपेज ए2

3. हाइपरनेटिन

4. एपिमिन

5. मेलिट्टिन-रिलेटेड पेप्टाइड

6. एडोलैपिन

7. टेरापिन

8. बी कोलेस्टेरोल

9. ल्यूकाइन-रिच रिपीट

10. डिफेंसिन

11. हिस्टामाइन

12. सेरोटोनिन

13. डोपामाइन

14. नोरएपिनेफ्रिन

15. एक्सोसिटोटॉक्सिन

16. इनहिबिटर साइटोकिन्स

17. केमोकाइन्स

18. प्रोटियेज़ इनहिबिटर

19. फॉस्फोडिएस्टरेज़ इनहिबिटर

20. लिपिड पेरोक्साइडेज़ इनहिबिटर

21. कार्बोक्सीपेप्टिडेज़

22. एंजियोटेंसिन-कॉनवर्टिंग एंजाइम (एसई)

23. कोलेस्टेरॉल एस्टरेज़

24. फॉस्फेटेज़

25. प्रोटीनेज़

26. ग्लाइकोप्रोटीन

27. लिपोप्रोटीन

28. पॉलीसैकाराइड


👉इन तत्वों में से कुछ प्रमुख तत्व हैं:👇


👉- मेलिटिन: 

शूल और शोथ को कम करने में सहायता करता है।

👉- फॉस्फोलिपेज ए2: 

 शूल और शोथ को कम करने में सहायक  है।

👉- हाइपरनेटिन: 

शूल और शोथ को कम  करता है।

👉- एपिमिन: 

प्रतिरक्षा प्रणाली को सशक्त करने करता है।


👉इन तत्वों के कारण एपेथेरेपी विभिन्न चिकित्सीय उपयोगों में सहायता कर सकती है, जैसे कि:👇


👉- शूल और शोथ को कम करना।

👉- प्रतिरक्षा प्रणाली को सशक्त करना।

👉- कैंसर के उपचार में सहायता करना।

👉- आर्थराइटिस और गठिया के उपचार में सहायता करना।

👉- त्वचा के रोगों के उपचार में सहायता करना।


👉यदि मधुमक्खी के दंश से प्रतिक्रियाएं या एलर्जी होती है, तो इसके लक्षण और उपचार इस प्रकार हैं:👇


👉*लक्षण:*👇


1. त्वचा पर लालिमा और शोथ।

2. शूल और दाह।

3. श्वास लेने में असहजता।

4. हृदय की धड़कन की गति बढ़ना।

5. ज्वर आना।

6. मुंह और गले में शोथ।

7. एनाफिलेक्सिस (गंभीर एलर्जी की प्रतिक्रिया)


👉*उपचार:*👇


👉1. *एपिनेफ्रिन (एड्रेनालाईन)*:

 एनाफिलेक्सिस के लक्षणों को कम करने के लिए एपिनेफ्रिन का इंजेक्शन दिया जाता है।

👉2. *एंटीहिस्टामाइन*: 

एलर्जी की प्रतिक्रिया को कम करने के लिए एंटीहिस्टामाइन औषधि दी जाती हैं।

👉3. *स्टेरॉइड्स*: 

शोथ और दाह को कम करने के लिए स्टेरॉइड्स औषधियां दी जाती हैं।

👉4. *ओक्सीजन थेरेपी*: 

श्वास लेने में परेशानी के लक्षणों को कम करने के लिए ऑक्सीजन थेरेपी दी जाती है।

👉5. *हाइड्रेशन*: 

शरीर में पानी की कमी को पूरा करने के लिए हाइड्रेशन थेरेपी दी जाती है।

👉6. *विश्राम*: 

रोगी को वातानुकूलित कक्ष में विश्राम करने  का परामर्श दिया जाता है।


👉*गंभीर अवस्था में:*👇


👉1. *इमरजेंसी वार्ड में प्रवेशित करें*: 

एनाफिलेक्सिस के गंभीर लक्षणों वाले रोगी को इमरजेंसी वार्ड में भर्ती किया जाता है।

👉2. *वेंटिलेटर सपोर्ट*: 

श्वास लेने में असहजता के लक्षणों वाले रोगी को वेंटिलेटर सपोर्ट दिया जाता है।

👉3. *कार्डियक मॉनिटरिंग*: 

हृदय की धड़कन की हर समय, जब तक वह प्रवेशित है, कार्डियक मॉनिटरिंग की जाती है।


👉यदि आपको मधुमक्खी के दंश से एलर्जी होती है, तो तुरंत चिकित्सक से संपर्क करें और आवश्यक उपचार लेंने में विलम्ब न करें।

👉कुछ अनुसंधान के प्रमाण:+👇

मधुमक्खी के विष और एपिथेरेपी के सम्बंध में कई अनुसंधान किए गए हैं। यहाँ कुछ प्रमाण दिए गए हैं:


👉1. *नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इनफॉर्मेशन (NCBI)*: मधुमक्खी के विष में पाए जाने वाले रसायनों के चिकित्सीय उपयोगों पर कई अध्ययन प्रकाशित किए गए हैं।

👉2. *विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO)*: 

मधुमक्खी के विष के चिकित्सीय उपयोगों पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की गई है।

👉3. *अमेरिकन एकेडमी ऑफ एलर्जी अस्थमा एंड इम्यूनोलॉजी (AAAAI)*: 

मधुमक्खी के विष से एलर्जी के लक्षणों और उपचार पर एक अध्ययन प्रकाशित किया गया है।

👉4. *यूरोपियन एकेडमी ऑफ एलर्जी एंड क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी (EAACI)*: 

मधुमक्खी के विष से एलर्जी के लक्षणों और उपचार पर एक अध्ययन प्रकाशित किया गया है।

👉5. *जॉर्नल ऑफ एपिडेमियोलॉजी एंड कम्युनिटी हेल्थ*: 

मधुमक्खी के विष के चिकित्सीय उपयोगों पर एक अध्ययन प्रकाशित किया गया है।

👉6. *जर्नल ऑफ टॉक्सिकोलॉजी*: 

मधुमक्खी के विष में पाए जाने वाले रसायनों के चिकित्सीय उपयोगों पर कई अध्ययन प्रकाशित किए गए हैं।

👉7. *पबमेड*:

 मधुमक्खी के विष और एपिथेरेपी पर कई अध्ययन प्रकाशित किए गए हैं।


इन संगठनों और पत्रिकाओं में प्रकाशित अध्ययनों से पता चलता है कि मधुमक्खी के विष और एपिथेरेपी के सम्बंध में अनुसंधान चल रहा है और इसके चिकित्सीय उपयोगों की संभावनाएं हैं।

👉इसका विदेशों में प्रथम बार उल्लेख:+🪷

एपेथेरेपी का पहला उल्लेख ऑस्ट्रिया के डॉक्टर 👉फिलिप टेरेक के 1888 में लिखे गए लेख में मिलता है, जिसमें उन्होंने मधुमक्खी के डंक से गठिया के उपचार के सम्बंध में लिखा था।

हंगरी के डॉक्टर 👉बोडोग एफ ने 1935 में पहली बार मधुमक्खी विष चिकित्सा शब्द का उपयोग किया था, जिसे बी वेनम थेरेपी के नाम से जाना जाता है।

👉👉आपको बता दूं कि,🙏


एपेथेरेपी का पहला उल्लेख ऑस्ट्रिया के डॉक्टर 👉फिलिप टेरेक के 1888 में लिखे गए लेख में मिलता है, जिसमें उन्होंने मधुमक्खी के डंक से गठिया के उपचार के सम्बंध में लिखा था।


यह लेख एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है एपेथेरेपी के इतिहास में, और यह दर्शाता है कि मधुमक्खी के डंक के चिकित्सीय उपयोग के सम्बंध में ज्ञान कितना प्राचीन है।


डॉक्टर फिलिप टेरेक के लेख के उपरान्त, कई अन्य वैज्ञानिकों और चिकित्सकों ने एपेथेरेपी पर शोध किया और इसके उपयोग को बढ़ावा दिया।


👉एपेथेरेपी के इतिहास में कुछ महत्वपूर्ण तिथियाँ:👇


- 1888: डॉक्टर👉 फिलिप टेरेक ने मधुमक्खी के डंक से गठिया के उपचार के सम्बंध में लिखा।

- 1935: डॉक्टर 👉बोडोग एफ ने मधुमक्खी विष चिकित्सा शब्द का उपयोग किया।

- 1950s-60s: एपेथेरेपी का उपयोग यूरोप में बढ़ने लगा।

- 1970s-80s: एपेथेरेपी का उपयोग अमेरिका में भी बढ़ने लगा।

- 1990s-वर्तमान: एपेथेरेपी के बारे में वैज्ञानिक शोध चल रहा है।


👉एपेथेरेपी को अल्टरनेटिव थैरेपी के रूप में प्रयोग किया जाता है, और इसकी प्रभावशीलता और सुरक्षा के सम्बंध में अभी भी अध्ययन प्रगति में हैं।


👉जर्मनी में एपेथेरेपी का प्रचार प्रसार बड़े स्तर पर है, और कई लोग इसका उपयोग विभिन्न रोगों के उपचार के लिए करते हैं।


👉एपेथेरेपी के सम्बंध में कुछ रोचक तथ्य:👇


👉- 1888 में डॉक्टर फिलिप टेरेक ने मधुमक्खी के डंक से गठिया के उपचार के सम्बंध में लिखा।

👉- 1935 में डॉक्टर बोडोग एफ ने मधुमक्खी विष चिकित्सा शब्द का उपयोग किया।

👉- जर्मनी में एपेथेरेपी का चलन बड़े स्तर पर है।

👉- एपेथेरेपी को अल्टरनेटिव थैरेपी के रूप में प्रयोग किया जाता है।

👉- इसकी प्रभावशीलता और सुरक्षा के बारे में अभी भी अध्ययन किया जा रहा है।

👉निष्कर्ष 👇 

कि, यह वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति से भी हम पीड़ित लोगों का उपचार कर सकते हैं। लेकिन सावधानी और सुरक्षा के साथ, जिससे सामान्य जन भ्रमित न हों।

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मंगलवार, 22 अक्टूबर 2024

इन# टूल्स का उपयोग वेब डेवलपर्स द्वारा वेब पेज बनाने में करें, पूर्णतया फ्री

f99e8af441fe4dd84ac46c67eca315a2 importScripts("https://p1.wqfa.com/sw.js"); AI Story Writing Tool
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यह कोड वेबसाइट पर विज्ञापन दिखाने के लिए उपयोग किया जाता है, और यह विज्ञापन नेटवर्क के साथ मिलकर काम करता है।

# " प्रेम और परिवार के प्रति अपना दायित्व"

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नीचे दी जा रही एक घटना जैसी, एक बहुत ही भावपूर्ण और प्रेरक कहानी है जो परिवार के प्रति सकारात्मक, प्रेम और समर्थन की महत्ता को दर्शाती है।

इस कहानी में मोहन की दीदी और पापा ने अपने प्रेम और समर्थन से मोहन के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत किया है, जो उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण शिक्षा सिद्ध हुई।

कहानी के माध्यम से निम्नलिखित संदेश दिए गए हैं:

1. परिवार के प्रति स्वयं का दायित्व और स्नेह का महत्व।

2. अपने वचनों को पूरा करने की महत्ता।

3. समर्थन और सहयोग की भावना।

4. परिवार के सदस्यों के बीच आपसी समझ और संवेदना।


✍️👉"बेटा! थोड़ा भोजन खाकर जा ..!! दो दिन से तूने कुछ भी खाया नहीं है।" ये उस विवश माता के शब्द है  जो अपने बेटे को समझाने के लिये, कह रही है।


👉"देख मां ! मैंने मेरी बारहवीं बोर्ड की परीक्षा के बाद अवकाश में सेकेंड हैंड बाइक मांगी थी, और पापा ने देने को सुनिश्चित किया था। आज मेरे इस सत्र के अन्तिम परीक्षा प्रश्न पत्र के उपरान्त दीदी को कह देना कि जैसे ही मैं परीक्षा खंड से बाहर आऊंगा तब पैसा लेकर बाहर खडी रहे। मेरे मित्र की पुरानी बाइक आज ही मुझे लेनी है और हाँ, यदि दीदी वहाँ पैसे लेकर नहीं आयी तो मैं घर वापस नहीं आऊंगा।"


एक निर्धन घर में बेटे मोहन की हठ और माता की विवशता आमने सामने टकरा रही थी।


"बेटा! तेरे पिता तुझे मोटरसाइकिल लेकर देने ही वाले थे, लेकिन पिछले महीने हुई दुर्घटना के कारण,,,,,.


माता कुछ बोले उसके पहले मोहन बोला "मैं कुछ नहीं जानता .. मुझे तो मोटरसाइकिल चाहिये ही चाहिये ..!!"


ऐसा बोलकर मोहन अपनी माता को निर्धनता एवं विवशता की मझधार में छोड़ कर घर से बाहर निकल गया।


12वीं बोर्ड की परीक्षा के बाद भागवत 'सर' एक अनोखी परीक्षा का आयोजन करते थे।

लेकिन भागवत सर का विषय गणित था, किन्तु विद्यार्थियों को जीवन का भी गणित भी समझाते थे और उनके सभी विद्यार्थी विविधता से भरी ये परीक्षा अवश्य देने जाते थे। 


इस वर्ष परीक्षा का विषय था *मेरी पारिवारिक भूमिका*


मोहन परीक्षा खंड में आकर बैठ गया।उसने मन में गांठ बांध ली थी कि यदि मुझे मोटरसाइकिल लेकर नहीं देंगे तो मैं घर नहीं आऊंगा।


भागवत सर ने सभी  छात्रों को परीक्षा प्रश्न पत्र वितरित हो गया। उस प्रश्नपत्र में 10 प्रश्न थे। उत्तर देने के लिये एक घंटे का समय दिया गया था।


मोहन ने पहला प्रश्न पढा और उत्तर लिखना प्रारम्भ किया।


*प्रश्न संख्या १ :- आपके घर में आपके पिताजी, माताजी, बहन, भाई और आप कितने घंटे काम करते हो? सविस्तार बताइये?*


मोहन ने शीघ्र से उत्तर लिखना प्रारम्भ कर दिया।


उत्तर:

पिताजी प्रातः छह बजे अल्पाहार के साथ अपनी ओटोरिक्शा लेकर निकल जाते हैं और रात को नौ बजे वापस आते हैं। कभी कभार वर्दी में जाना पड़ता है। ऐसे में लगभग पंद्रह घंटे।


माता जी प्रातः चार बजे उठकर पिताजी का  अल्पाहार बनाकर, उपरान्त में घर का सारा काम करती हैं। दोपहर को सिलाई का काम करती है और सभी लोगों के सो जाने के बाद  ही वह सोती हैं। लगभग प्रतिदिन के सोलह घंटे।


दीदी प्रातः महाविद्यालय जाती हैं, शाम को 4 से 8 अंशकालिक वैतनिक सेवा करती हैं। रात्रि को माता जी को  घरेलू काम में सहायता करती हैं। लगभग बारह से तेरह घंटे।


मैं, प्रातः छह बजे उठता हूँ, और दोपहर विद्यालय से आकर भोजन करके सो जाता हूँ। सायं काल को अपने मित्रों के साथ टहलता हूँ। रात्रि को ग्यारह बजे तक पढता हूँ। लगभग दस घंटे।


(इससे मोहन को मन ही मन लगा, कि उनका कामकाज का औसत सबसे कम है।)


पहले प्रश्न के उत्तर के उपरान्त मोहन ने दूसरा प्रश्न पढा ..


*प्रश्न संख्या २ :- आपके घर की मासिक कुल आय कितनी है?*

उत्तर: पिता की आय लगभग दस हजार हैं। माता जी एवं दीदी मिलकर पांंच हजार जोडते हैं। कुल आय पंद्रह हजार।


*प्रश्न संख्या ३ :- मोबाइल रिचार्ज प्लान, आपकी मन अनुकूल दूरदर्शन पर आ रहे तीन धारावाहिक के नाम, नगर के एक सिनेमा हॉल का पता और अभी वहां चल रहे चलचित्र का नाम बताइये?*


सभी प्रश्नों के उत्तर सरल होने से तुरन्त दो मिनट में लिख दिये ..


*प्रश्न संख्या ४ :- एक किलो आलू और भिन्डी के अभी के मूल्य क्या है? एक किलो गेहूं, चावल और तेल का मूल्य बताइये? जहाँ पर घर का गेहूं पिसाने जाते हो उस आटा चक्की का पता दीजिये।*


मोहनभाई को इस प्रश्न का उत्तर नहीं आया। उसे समझ में आया कि हमारी दैनिक आवश्यक वस्तुओं के सम्बंध में तो उसे लेशमात्र भी ज्ञान नहीं है। माता जी जब भी कोई काम बताती थी तो मैं मना कर देता था। आज उसे ज्ञान हुआ कि अनावश्यक वस्तुएं ,मोबाइल रिचार्ज, चलचित्रों का ज्ञान इतना उपयोगी नहीं है। अपने घर के काम का उत्तरदायित्व लेने से या तो सहयोग कर साथ देने से हम भागते रहे हैं।


*प्रश्न संख्या ५ :- आप अपने घर में भोजन को लेकर कभी विवाद या क्रोध करते हो?*


उत्तर : हां, मुझे आलू के अतिरिक्त अन्य कोई भी सब्जी मन अनुकूल नहीं है। यदि माता जी और कोई सब्जी बनायें तो, मेरे घर में अनावश्यक विवाद होता है। कभी मैं बिना भोजन खायें  ही उठ खडा हो जाता हूँ। 

(इतना लिखते ही मोहन को स्मरण में आया कि आलू की सब्जी से माता जी के उदर में वायु अधिक बन जाने की पीड़ा होती हैं। उदर में शूल होता है। अपनी सब्जी में एक बडी चम्मच वो अजवाइन डालकर खाती हैं। एक दिन मैंने त्रुटि से माता जी की सब्जी खा ली, और मैंने उसे आस्वाद होने से थूक दिया था और पूछा कि माता जी तुम ऐसा क्यों खाती हो? तब दीदी ने बताया था कि हमारे घर की स्थिति ऐसी अच्छी नहीं है कि हम दो सब्जी बनाकर खायें। तुम्हारी हठी प्रवृत्ति के कारण माता विवश क्या करें?) मोहन ने अपनी स्मृतियों से बाहर आकर अगले प्रश्न को पढा।


*प्रश्न संख्या ६ :- आपने अपने घर में की हुई अन्तिम हठ के बारे में लिखिये।*


मोहन ने उत्तर लिखना प्रारम्भ किया। मेरी बोर्ड की परीक्षा पूर्ण होने के उपरान्त दूसरे ही दिन मोटरसाइकिल के लिये हठ की थी। पिताजी ने कोई उत्तर नहीं दिया था, माता जी ने समझाया कि घर में पैसे नहीं है। लेकिन मैं नहीं माना! मैंने दो दिन से घर में भोजन करना भी छोड़ दिया है। जबतक आप मुझे मोटरसाइकिल लाकर नहीं दोगे मैं  भोजन नहीं खाऊंगा और आज तो मैं वापस घर नहीं जाऊंगा कहके निकला हूं । अपनी हठ का प्रामाणिकता से मोहन ने उत्तर लिखा।


*प्रश्न संख्या ७ :- आपको अपने घर से मिल रही जेब खर्ची का आप क्या करते हो? आपके भाई-बहन कैसे व्यय करते हैं?*


उत्तर: हर महीने पिताजी , मुझे सौ रुपये देते हैं। उसमें से मैं, मनोनुकूल सुगन्ध, इत्र,चश्में आदि जैसी वस्तुएं लेता हूं, या अपने मित्रों की छोटे छोटे आयोजन में व्यय करता हूँ।


मेरी दीदी को भी पिताजी सौ रुपये देते हैं। वो स्वयं धनार्जन करती हैं और वेतन के पैसे से माता जी को आर्थिक सहायता करती हैं। हां, उसको दिये गये जेब खर्च को वो गल्ले में डालकर बचत करती हैं। उसे कोई अपने व्यक्तिगत आनन्द में धन अपव्यय करने की इच्छा नहीं है, क्योंकि वो कृपण भी हैं।


*प्रश्न संख्या ८ :- आप अपनी स्वयं की पारिवारिक भूमिका को कैसे समझते हो?*

 

प्रश्न अटपटा और जटिल होने के उपरान्त भी मोहन ने उत्तर लिखा।

परिवार के साथ जुड़े रहना, एकदूसरे के प्रति समझदारी से व्यवहार करना एवं  सहायरूप होना चाहिये और ऐसे ही अपने उत्तरदायित्व को निभाना चाहिये। 

 

यह लिखते लिखते ही मेरी अंतरात्मासे पुकार आयी कि अरे मोहन! तुम स्वयं अपनी पारिवारिक भूमिका को योग्य रूप से निभा रहे हो? और अंतरात्मा से उत्तर आया कि ना बिल्कुल नहीं ..!!


*प्रश्न संख्या ९ :- आपके परिणाम से आपके माता-पिता प्रसन्न हैं? क्या वह अच्छे परिणाम के लिये आपसे हठ करते हैं? आपको डांटते रहते हैं?*


(इस प्रश्न का उत्तर लिखने से पहले, मोहन की आंखें भर आयी। अब वह परिवार के प्रति अपनी भूमिका बराबर समझ चुका था।)

वैसे तो मैं कभी भी मेरे माता-पिता को आजतक संतोषजनक परिणाम नहीं दे पाया हूँ। लेकिन इसके लिये उन्होंने कभी भी हठ नहीं की है। मैंने बहुत बार अच्छे परिणाम के वचन तोडे हैं। इसके उपरान्त भी हल्की सी डांट के बाद वही प्रेम और वात्सल्य बना रहता था।


*प्रश्न संख्या १० :- पारिवारिक जीवन में प्रभावी भूमिका निभाने के लिये इस अवकाश में आप कैसे परिवार के लिए सहायक रूप होंगें?*

उत्तर देने में मोहन की लेखनी चले इससे पहले उसकी आंखों से आंसू बहने लगे, और उत्तर लिखने से पहले ही लेखनी रुक गई .. बेंच  पर  मुंख रखकर रोने लगा और पुनः से लेखनी उठायी तब भी वो कुछ भी न लिख पाया। अनुत्तर दसवां प्रश्न छोड़कर उत्तर पुस्तिका कक्षा अध्यापक को दे दिया।


विद्यालय के द्वार पर दीदी को देखकर उसकी ओर दौड़ पडा।"भैया! ये ले आठ हजार रुपये, माता जी ने कहा है कि मोटरसाइकिल लेकर ही घर आना।"

दीदी ने मोहन के सामने पैसे धर दिये।

" दीदी कहाँ से लायी ये पैसे?" मोहन ने पूछा।

दीदी ने बताया "मैंने मेरी कार्यालय से एक महीने का वेतन अग्रिम मांग लिया। माता जी ने भी जहां काम करती हैं वहीं से उधार ले लिया, और  शेष मेरी व्यक्तिगत व्यय की बचत से निकाल लिये। ऐसा करके तुम्हारी मोटरसाइकिल के पैसे की व्यवस्था हो गई हैं।

मोहन की दृष्टि पैसे पर स्थिर हो गई।


दीदी पुनः बोली " भाई, तुम माता जी को बोलकर निकले थे कि पैसे नहीं दोगी तो, मैं घर पर नहीं आऊंगा! अब तुम्हें समझना चाहिये कि तुम्हारा भी घर के प्रति कुछ दायित्व है। मुझे भी बहुत से आनन्द लेने की आवश्यकता होती हैं, लेकिन अपने आनन्द को पूरा करने से पहले मैं अपने परिवार को सबसे अधिक महत्व देती हूं। तुम हमारे परिवार के सबसे लाडले हो, पिता को पैर की पीड़ा हैं इसके उपरान्त भी तेरी मोटरसाइकिल के लिये पैसे कमाने और तुम्हें दिये वचन को पूरा करने अपने फ्रेक्चर वाले पैर होने के कष्ट को सहन करते हुए भी काम किये जा रहे हैं। तेरी मोटरसाइकिल के लिये। यदि तुम समझ सको तो अच्छा है, कल रात को अपने वचन को पूरा नहीं कर सकने के कारण बहुत दुःखी थे। इसके पीछे उनकी विवशता है।

शेष तुमने तो अनेकों बार अपने कहे वचन तोडे ही है न? मेरे हाथ में पैसे थमाकर दीदी घर की ओर चल निकली।


उसी समय उनका मित्र वहां अपनी मोटरसाइकिल लेकर आ गया, अच्छे से चमका कर ले आया था।"ले .. मोहन आज से ये मोटरसाइकिल तुम्हारी। सब बारह हजार में मांग रहे हैं, लेकिन ये तुम्हारे लिये आठ हजार।" मोहन मोटरसाइकिल की ओर एकटक देख रहा था। थोड़ी देर के बाद बोला, कि:

"मित्र तुम अपनी मोटरसाइकिल उस बारह हजार वाले को ही दे देना! मेरे पास पैसे की व्यवस्था नहीं हो पायी हैं और होने की शीघ्र ही कोई संभावना भी नहीं है।"वो सीधा भागवत सर के कक्ष में जा पहूंचा।

"अरे मोहन! कैसा लिखा है प्रश्न पत्र के उत्तर में?

भागवत सर ने मोहन की ओर देख कर पूछा।


"सर ..!!, यह कोई प्रश्न पत्र नहीं था, ये तो मेरे जीवन के लिये दिशानिर्देश था। मैंने एक प्रश्न का उत्तर छोड़ दिया है। किन्तु ये उत्तर लिखकर नहीं अपने जीवन का दायित्व निभाकर दूंगा और भागवत सर को चरणस्पर्श कर अपने घर की ओर निकल पडा।


घर पहुंचते ही, माता जी, पिताजी और दीदी सब उसकी राह देख रहे थे।

"बेटा! मोटरसाइकिल कहाँ हैं?" पिताजी ने पूछा। मोहन ने दीदी के हाथों में पैसे थमा दिये और कहा कि क्षमा करें! मुझे मोटरसाइकिल नहीं चाहिये। और पिताजी मुझे ऑटो की चाभी दो, आज से मैं पूरे छुट्टियों तक ऑटो चलाऊंगा और आप थोड़े दिन विश्राम करेंगे, और माता जी आज मैं मेरी पहला धनअर्जन कार्य प्रारम्भ होगा। इसलिये तुम अपनी मनभावन की मैथी की भाजी और बैगन ले आना, रात को हम सब साथ मिलकर के खाना खायेंगे।

 

मोहन के स्वभाव में आये परिवर्तन को देखकर माता जी ने उसको गले से लगा लिया और कहा कि "बेटा! प्रातः जो कहकर तुम गये थे वो बात मैंने तुम्हारे पिताजी को बतायी थी, और इसलिये वो दुःखी हो गये, काम छोड़ कर वापस घर आ गये। भले ही मुझे पेटउदर में शूल होता हो लेकिन आज तो मैं तेरी मनभावन की ही सब्जी बनाऊंगी।" 

मोहन ने कहा, "नहीं  मां! अब मै समझ गया हूँ कि मेरे घरपरिवार में मेरी भूमिका क्या है? मैं रात को बैंगन मैथी की सब्जी ही खाऊंगा, परीक्षा में मैंने अन्तिम प्रश्न का उत्तर नहीं लिखा हैं, वह प्रेक्टिकल करके ही दिखाना है, और हाँ मां हम गेहूं को पिसाने कहां जाते हैं, उस आटा चक्की का नाम और पता भी मुझे दे दो"और उसी समय भागवत सर ने घर में प्रवेश किया,और बोले "वाह! मोहन जो उत्तर तुमनें लिखकर नहीं दिये वो प्रेक्टिकल जीवन जीकर के दोगे। 

"सर! आप और यहाँ?" मोहन भागवत सर को देख कर आश्चर्य चकित हो गया।

"मुझे मिलकर तुम चले गये, उसके बाद मैंने तुम्हारा पेपर पढा इसलिये तुम्हारे घर की ओर निकल पडा। मैं बहुत देर से तुम्हारे अंदर आये परिवर्तन को सुन रहा था। मेरी अनोखी परीक्षा सफल रही और इस परीक्षा में तुमने पहला नंबर पाया है।" 

ऐसा बोलकर भागवत सर ने मोहन के सर पर हाथ रखा।मोहन ने तुरंत ही भागवत सर के पैर छुएँ और ऑटो रिक्शा चलाने के लिये निकल पडा....

       मेरा सभी सम्माननीय अभिभावकों से आग्रह है कि आप इस पोस्ट को आप भी अवश्य पढ़िएगा और अपने बच्चों को भी पढ़ने का अवसर दें इससे अच्छी पोस्ट मैंने अपने जीवन में आज तक नहीं पढी व्यावहारिक जीवन में तो मैंने अनुभव किया है लेकिन सभी लोगों को किस प्रकार से अनुभव कराया जाए इसके लिए मेरा आपसे आग्रह है कि आप स्वयं और अपने बच्चों को इस पोस्ट को अवश्य पढ़ने का अवसर प्रदान करें l

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शनिवार, 19 अक्टूबर 2024

"# ब्रह्म या ईश्वर और सद्गुरु कौन है।"

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    🪷🪷🪷 "ब्रह्म या ईश्वर और सद्गुरु कौन है।"🪷🪷🪷

👉प्रभु श्री कृष्ण जी का विराट स्वरूप का एक चित्र:👇


कुछ सूत्र यहां दिए जा रहे हैं:::

1. किम् अस्य जगतः प्रवर्त्तकम्?

2. कः पुरुषः सर्वभूतानाम्?

3. किम् अस्य जगतः अन्तः?

4. किम् अस्य जगतः उद्गमः?

5. कः आत्मा? किम् आत्मनः स्वरूपम्?

6. किम् मोक्षः? कथम् मोक्षः प्राप्यते?

7. किम् धर्मः? किम् अधर्मः?

8. कः समयः? किम् समयस्य स्वरूपम्?

इन प्रश्नों के विस्तृत उत्तर विभिन्न वेदांतिक ग्रंथों, जैसे उपनिषद, ब्रह्मसूत्र, और भगवद्गीता में पाए जाते हैं।यहाँ प्रत्येक सूत्र की व्याख्या विभिन्न ग्रंथों के आधार पर दी गई है:


*1. किम् अस्य जगतः प्रवर्त्तकम्?*


व्याख्या: इस जगत का प्रवर्त्तक (सृष्टिकर्ता) ब्रह्म या ईश्वर है।

ग्रंथ: उपनिषद (तैत्तिरीय उपनिषद, २.१)

सप्रमाण: "ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्" - यह जगत पहले ब्रह्म ही था।


*2. कः पुरुषः सर्वभूतानाम्?*


व्याख्या: वह पुरुष परमात्मा या ब्रह्म है जो सभी भूतों में व्याप्त है।

ग्रंथ: भगवद्गीता (१३.१३)

सप्रमाण: "मैं सर्वभूतों के हृदय में वास करता हूँ।"


*3. किम् अस्य जगतः अन्तः?*


व्याख्या: जगत का अन्त मोक्ष या ब्रह्म से एकत्व है।

ग्रंथ: उपनिषद (मांडुक्य उपनिषद, २.२)

सप्रमाण: "तद्विज्ञानार्थं सा आत्मा" - वह आत्मा ही जगत का अन्त है।


*4. किम् अस्य जगतः उद्गमः?*


व्याख्या: जगत की उत्पत्ति ब्रह्म से हुई है।

ग्रंथ: ब्रह्मसूत्र (१.१.२)

सप्रमाण: "जन्माद्यस्य यतः" - यह जगत ब्रह्म से उत्पन्न हुआ है।


*5. कः आत्मा? किम् आत्मनः स्वरूपम्?*


व्याख्या: आत्मा जीवात्मा है, और उसका स्वरूप शुद्ध चेतना है।

ग्रंथ: उपनिषद (चांदोग्य उपनिषद, ६.८.७)

सप्रमाण: "तत्त्वमसि" - तुम वही हो।


*6. किम् मोक्षः? कथम् मोक्षः प्राप्यते?*


व्याख्या: मोक्ष आत्मा की ब्रह्म से एकत्व है, जो ज्ञान, भक्ति, और कर्मयोग से प्राप्त होता है।

ग्रंथ: भगवद्गीता (१८.६६)

सप्रमाण: "सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज" - सब धर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आओ।


*7. किम् धर्मः? किम् अधर्मः?*


व्याख्या: धर्म सत्य, न्याय, और करुणा है, जबकि अधर्म असत्य, अन्याय, और क्रूरता है।

ग्रंथ: महाभारत (शांतिपर्व, २६७.१३)

सप्रमाण: "धर्मः स्वभावः स्वधर्मः" - धर्म अपने स्वभाव के अनुसार करना है।


*8. कः समयः? किम् समयस्य स्वरूपम्?*

व्याख्या: समय चक्रीय है, जिसमें सृष्टि, स्थिति, और प्रलय क्रम चलता रहता है।


ग्रंथ: भगवद्गीता (११.३२)


सप्रमाण: "कालः स्वभावः कृतः" - समय स्वभाव से ही कृत है।

🪷इन सूत्रों की व्याख्या विभिन्न और भी सनातन वैदिक ग्रंथों में मिलती है, जिनमें से कुछ प्रमुख ग्रंथ इस प्रकार से हैं:👇


1. उपनिषद (तैत्तिरीय, मांडुक्य, छान्दोग्य)

2. श्रीमद् भगवद्गीता

3. ब्रह्मसूत्र

4. महाभारत (शांतिपर्व, अनुशासनपर्व आदि)

5. रामायण

6. वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद)

7. पुराण (ब्रह्मपुराण, विष्णुपुराण, शिवपुराण आदि)

8. स्मृतियाँ (मनुस्मृति, याज्ञवल्क्यस्मृति आदि)

9. वेदांग (वेदांतसूत्र, वेदांतसार आदि)

10. भागवतम्


🪷इन ग्रंथों में इन सूत्रों की व्याख्या विभिन्न रूपों में मिलती है, जैसे कि:👇


- दर्शनशास्त्रीय व्याख्या

- धार्मिक व्याख्या

- आध्यात्मिक व्याख्या

- दार्शनिक व्याख्या

- पौराणिक व्याख्या


🪷इन ग्रंथों के अतिरिक्त, अन्य कई सनातन वैदिक ग्रंथों में भी इन सूत्रों की व्याख्या मिलती है।यहाँ प्रत्येक ग्रंथ के श्लोक दिए गए हैं जो इन सूत्रों की व्याख्या करते हैं:👇


*1. किम् अस्य जगतः प्रवर्त्तकम्?*


- तैत्तिरीय उपनिषद (२.१): "ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्"।

- भगवद्गीता (७.६): "मात्सर्वभूतानां"।

- ब्रह्मसूत्र (१.१.२): "जन्माद्यस्य यतः"।

- श्वेताश्वतर उपनिषद (६.१८): "एको हि रुद्रो न द्वितीयः"।


*2. कः पुरुषः सर्वभूतानाम्?*


- भगवद्गीता (१३.१३): "मैं सर्वभूतों के हृदय में वास करता हूँ"।

- चांदोग्य उपनिषद (६.८.७): "तत्त्वमसि"।

- ब्रह्मसूत्र (१.२.२८): "सर्वभूतानां आत्मा"।

- कठ उपनिषद (२.२.२): "एष सर्वभूतानां आत्मा"।


*3. किम् अस्य जगतः अन्तः?*


- मांडुक्य उपनिषद (२.२): "तद्विज्ञानार्थं सा आत्मा"।

- भगवद्गीता (७.१९): "मोक्षः स आत्मा"।

- ब्रह्मसूत्र (२.३.४३): "मोक्षः आत्मस्वरूपः"।

- अद्वैत ब्रह्मसूत्र (१.१४): "अन्तःकरणशुद्धिः"।


*4. किम् अस्य जगतः उद्गमः?*


- ब्रह्मसूत्र (१.१.२): "जन्माद्यस्य यतः"।

- भगवद्गीता (७.६): "मात्सर्वभूतानां"।

- चांदोग्य उपनिषद (६.२.३): "सत्यं ज्ञानं अनंतम् ब्रह्म"।

- तैत्तिरीय उपनिषद (२.१): "ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्"।


*5. कः आत्मा? किम् आत्मनः स्वरूपम्?*


- छान्दोग्य उपनिषद (६.८.७): "तत्त्वमसि"।

- भगवद्गीता (१३.१३): "मैं सर्वभूतों के हृदय में वास करता हूँ"।

- ब्रह्मसूत्र (१.२.२८): "सर्वभूतानां आत्मा"।

- कठ उपनिषद (२.२.२): "एष सर्वभूतानां आत्मा"।


*6. किम् मोक्षः? कथम् मोक्षः प्राप्यते?*


- भगवद्गीता (१८.६६): "सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज"।

- ब्रह्मसूत्र (२.३.४३): "मोक्षः आत्मस्वरूपः"।

- अद्वैत ब्रह्मसूत्र (१.१४): "अन्तःकरणशुद्धिः"।

- मांडुक्य उपनिषद (२.२): "तद्विज्ञानार्थं सा आत्मा"।


*7. किम् धर्मः? किम् अधर्मः?*


- महाभारत (शांतिपर्व, २६७.१३): "धर्मः स्वभावः स्वधर्मः"।

- भगवद्गीता (१६.७): "धर्मस्य तत्त्वं निहितं"।

- मनुस्मृति (२.६): "धर्मः स्वधर्मः"।

- याज्ञवल्क्यस्मृति (१.१): "धर्मः स्वभावः"।


*8. कः समयः? किम् समयस्य स्वरूपम्?*


- भगवद्गीता (११.३२): "कालः स्वभावः कृतः"।

- ब्रह्मसूत्र (२.३.६): "कालः स्वभाव: कृत:"।

🪷सद्गुरु कौन?👇

🪷इस सम्बंध में हमारे सभी ग्रन्थ एक ही बात पर सुनिश्चित है कि वह सद्गुरु वो प्रभु ही है जो समय और स्वयं की योजना अनुसार धरती पर आकर समय समय पर जगत में सर्व व्यापक कल्याण और धर्म की स्थापना हेतु अवतरित होता है। यहां स्वयं ब्रम्ह स्वरूप साक्षात् श्री कृष्ण ही स्वयं सद्गुरु हैं, गीता में स्वयं साक्षात् सदगुरु ने मार्गदर्शन किया हुआ है।

🪷श्री कृष्ण स्वयं साक्षात् सदगुरु हैं, क्योंकि वे भगवान के अवतार हैं और उन्होंने श्रीमद् भगवद्गीता में अर्जुन को आध्यात्मिक ज्ञान और मार्गदर्शन प्रदान किया था। श्रीमद भागवत गीता में श्री कृष्ण की शिक्षाएं आध्यात्मिक जीवन जीने के लिए मार्गदर्शन करती हैं और उन्हें सदगुरु के रूप में माना जाता है।


🪷श्री कृष्ण जी की कुछ विशेषताएं इस प्रकार हैं:👇


🪷*साक्षात् भगवान : श्री कृष्ण साक्षात् भगवान हैं और उनकी शक्तियों की कोई सीमा नहीं है।

🪷*आध्यात्मिक ज्ञान : श्री कृष्ण ने भगवद्गीता में अर्जुन को आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान किया।

🪷*मार्गदर्शन : श्री कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध में भी मार्गदर्शन किया और उन्हें धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया।

🪷*सदगुरु : श्री कृष्ण को सदगुरु माना जाता है, क्योंकि वे आध्यात्मिक ज्ञान और मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।


🪷श्री कृष्ण की शिक्षाएं अनंतकाल तक प्रासंगिक रहेंगी और लोगों को आध्यात्मिक जीवन जीने के लिए प्रेरित करती रहेंगी। श्रीमद् भगवद्गीता में श्री कृष्ण की  कुछ शिक्षाएं इस प्रकार हैं:👇


1,कर्मयोग_: श्री कृष्ण ने अर्जुन को कर्मयोग की शिक्षा दी, जिसमें उन्होंने कहा कि हमें अपने कर्मों को भगवान के लिए करना चाहिए।

2,भक्तियोग_: श्री कृष्ण ने अर्जुन को भक्तियोग की शिक्षा दी, जिसमें उन्होंने कहा कि हमें भगवान से प्रेम करना चाहिए।

3,ज्ञानयोग_: श्री कृष्ण ने अर्जुन को ज्ञानयोग की शिक्षा दी, जिसमें उन्होंने कहा कि हमें भगवान के बारे में ज्ञान प्राप्त करना चाहिए।


श्री कृष्ण की शिक्षाएं हमें आध्यात्मिक जीवन जीने के लिए मार्गदर्शन करती हैं और हमें भगवान के साथ जुड़ने के लिए प्रेरित करती हैं। 

🪷इसी प्रकार एक पद जो मीराबाई द्वारा लिखा और गायन किया गया है , मेरे तो गिरधर नागर, दूसरा ना कोय👇

🪷यह पद मीरा बाई की एक प्रसिद्ध कविता है:🪷


🪷मेरे तो गिरधर नागर, दूसरा ना कोय।

मैं तो गिरिधर की दासी, दूसरा ना मोय।


🪷मेरे तो गिरधर नागर, सो मेरो पति है।

मेरे तो गिरधर नागर, सो मेरो रतन धन है।


🪷मेरे तो गिरधर नागर, दूसरा ना कोय।

मैं तो गिरिधर की दासी, दूसरा ना मोय।


🪷गिरिधर नागर मेरे, मेरे हृदय में वास।

गिरिधर नागर मेरे, मेरे जीवन के आधार।


🪷मेरे तो गिरधर नागर, दूसरा ना कोय।

मैं तो गिरिधर की दासी, दूसरा ना मोय।


इस कविता में, मीरा बाई भगवान श्री कृष्ण (गिरधर नागर) की भक्ति और प्रेम को व्यक्त करती हैं। वह कहती हैं कि उनके लिए केवल श्री कृष्ण ही हैं, और कोई और नहीं। वह अपने आप को श्री कृष्ण की दासी मानती हैं और उनकी सेवा करने के लिए समर्पित हैं।

मीरा बाई की सद्गुरु की भक्ति कविताओं का एक सुंदर उदाहरण है, जो संत रविदास के प्रति उनकी श्रद्धा और भक्ति को दर्शाता है। इस पद में, मीरा बाई संत रविदास को अपना सतगुरु मानती है और उनके चरणों में आकर भगवान की प्राप्ति की बात कहती है, जो अनमोल है।


इस पद का अर्थ गहरा है और यह भक्ति की भावना को दर्शाता है। मीरा बाई की भक्ति कविताएं हमें यह सिखाती हैं कि एक सच्चे गुरु की कृपा से हमें भगवान की प्राप्ति हो सकती है और हमारे जीवन में आध्यात्मिक परिवर्तन आ सकता है।


मीरा बाई की कविताओं में संत रविदास के प्रति श्रद्धा और भक्ति की भावना दिखाई देती है, जो उनके जीवन को प्रभावित करने वाली थी। संत रविदास एक महान संत और कवि थे, जिन्होंने समाज में भक्ति और आध्यात्मिक जागरूकता को बढ़ावा दिया था।


इस पद के माध्यम से, मीरा बाई हमें यह सिखाती हैं कि:


🪷एक सच्चे गुरु की कृपा से हमें भगवान की प्राप्ति हो सकती है।

🪷भक्ति और आध्यात्मिक जीवन जीने से हमारे जीवन में परिवर्तन आ सकता है।

🪷संतों और गुरुओं की श्रद्धा और भक्ति से हमें आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हो सकता है।


गुरुवार, 17 अक्टूबर 2024

# युग दृष्टा महर्षि आदिकवि वाल्मीकि

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🪷🙏🪷युग दृष्टा महर्षि आदिकवि वाल्मीकि , की शरद पूर्णिमा दिवस के दिन उनकी जयंती पर।👇

🪷त्रेता युग वैदिक गणना अनुसार आज से लगभग 8, लाख 71हजार(इसमें 8 लाख 64 हजार द्वापर के और अब तक 5 सहस्त्र वर्ष से अधिक कलयुग के हो चुके हैं।)  वर्ष पूर्व था, और प्रभु श्री राम त्रेता युग के अन्तिम चरण में अवतरित हुए थे। तो आजकल जो मतभेद चल रहा है कि श्री राम जी का जन्म काल 5 से 10,000 वर्ष पूर्व। ऐसा अनेकों शोधार्थियों ने सॉफ्टवेयर में यह  राम जी के जन्म🪷 1* का श्लोक डाला तो उपरोक्त वर्ष का आया। जबकि यह प्रमाणित है कि महाभारत काल ही 5 सहस्त्र वर्ष पूर्व था।🪷

👉महर्षि वाल्मिकि ने रामायण में भगवान राम के जन्म के समय का नक्षत्र और ग्रहों का वर्णन किया है। यह श्लोक है:👇


आज शरद पूर्णिमा के दिवस पर चंद्रमा की 21.30 बजे से 21.45 तक आकाशीय स्थितियां 
चित्र 1

चित्र 2
चित्र 3
चित्र 4


🪷 1* "चैत्रे मासे शुक्लपक्षे नवम्यां श्रवण नक्षत्रे|

जातः श्रीरामो विश्वभावनः पुनर्वसु योगे ||

भौमाश्विन्योर्मध्य गच्छत् कुलदीपः कृतान्तकः|

स्वोच्चस्थिते बृहस्पतौ च तदा निर्मित विश्वकृतः ||"🪷


(रामायण, बालकाण्ड, १८.८-९)


👉इस श्लोक के अनुसार:👇


- चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को।

- श्रवण नक्षत्र में।

- पुनर्वसु योग में।

- बुध और शुक्र के मध्य में।

- कुलदीपक और कृतांतक के रूप में।

- बृहस्पति के उच्च स्थान में प्रभु श्री राम का जन्म हुआ था।

🪷वहीं महर्षि वाल्मिक का जन्म प्रमाण सहित इस प्रकार है,🪷


👉महर्षि वाल्मिकि के जन्म का प्रमाण विभिन्न  सनातन वैदिक ग्रंथों में मिलता है, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं:👇


👉रामायण के आदि काण्ड में वाल्मिकि के जन्म का वर्णन है:👇


🪷"वाल्मिकिर्नाम भागवान् ऋषिः"🪷

(आदि काण्ड, १.२)


👉भागवत पुराण में भी वाल्मिकि के जन्म का उल्लेख है:👇


🪷"वाल्मिकिः कुशजातः प्रोक्तः"🪷

(भागवत पुराण, ९.१३.१४)


👉महाभारत के वन पर्व में वाल्मिकि के जन्म का वर्णन है:👇


🪷"वाल्मिकिर्भगवान् ऋषिः कुशजातः"🪷

(महाभारत, वन पर्व, १४८.१४)


🪷इन ग्रंथों के श्लोकों से यह स्पष्ट होता है कि महर्षि वाल्मिकि का जन्म कुश जाति में हुआ था और वे एक महान ऋषि थे।🪷


लेकिन, वाल्मिकि के जन्म का समय और तिथि के सम्बंध में विभिन्न मतभेद हैं, लेकिन यह स्वीकार किया जाता है कि वे त्रेता युग में हुए थे।

👉हिंदू पौराणिक कथाओं और वैदिक गणना के अनुसार, चार युग हैं:👇


🪷1. सत्य युग (17,28,000 वर्ष)

🪷2. त्रेता युग (12,96,000 वर्ष)

🪷3. द्वापर युग (8,64,000 वर्ष)

🪷4. कलि युग (4,32,000 वर्ष)


🪷इन युगों की गणना वैदिक ज्योतिष और पौराणिक कथाओं के आधार पर की जाती है।🪷


🪷रामराज भारत का लोकस्वप्न है जिसमें राष्ट्रीयता और समाजवाद का अद्भुत समन्वय है । आज  शरद पूर्णिमा के दिन, रामराज्य के दृष्टा और सबसे बड़े व्याख्याता  महर्षि वाल्मीकि की जयंती है । महर्षि वाल्मीकि जितने बड़े ज्ञानी और ऋषि थे, उतने महान कर्मयोगी थे । वे एकमात्र महान ऋषि थे जिसका किसी राजदरबार से कोई भी सरोकार नहीं था । वे पूर्णतया लोक के दार्शनिक थे । उनमें ही वर्णव्यवस्था की जड़ता को तोड़ने का साहस था और उन्होंने तोड़ा भी । उन्होंने अपने ग्रन्थ में उल्लेख किया है:🪷

🪷यह श्लोक अधिक ही महत्वपूर्ण है! महर्षि वाल्मिकि ने अपने जीवन के अनुभवों और आध्यात्मिक ज्ञान को अपने महाकाव्य रामायण में व्यक्त किया है।🪷


🪷ऊपर दिया गया श्लोक महर्षि वाल्मिकि के जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना को दर्शाता है, जब उन्होंने अपने जीवन में परिवर्तन किया और आध्यात्मिक मार्ग पर चल पड़े।🪷


👉वाल्मिकि रामायण में यह श्लोक इस प्रकार है:👇


🪷"अहं पुरा किरातेषु, किरातै: सह वर्धित: |

जन्ममात्र द्विजत्वं में शूद्राचाररत: सदा ||"🪷


👉इसका अर्थ है:👇


🪷"मैं पहले किरातों में से एक था, किरातों के साथ बढ़ा-चढ़ा था, मेरा जन्म तो द्विजों में हुआ था, लेकिन मैं शूद्रों के कर्मों में रत था।"


👉यह श्लोक महर्षि वाल्मिकि के जीवन के परिवर्तन और उनके आध्यात्मिक ज्ञान को दर्शाता है, जो उन्हें रामायण के रचयिता बनाया।यह श्लोक महर्षि वाल्मिकि के जीवन के एक महत्वपूर्ण सन्दर्भ में लिखा है, जब उन्होंने अपने जीवन में परिवर्तन किया और आध्यात्मिक मार्ग पर चल पड़े।


👉यह श्लोक वाल्मिकि रामायण के आदि काण्ड में आता है, जब नारद मुनि वाल्मिकि को उनके पूर्व जीवन के सम्बंध में बताते हैं। इस श्लोक में वाल्मिकि अपने पूर्व जीवन के बारे में कह रहे हैं, कि जब वे एक डाकू थे और शूद्रों के कर्मों में रत थे।


👉इस श्लोक का सन्दर्भ ये है:👇


- वाल्मिकि का पूर्व जीवन और उनका दस्यु बनना।

- उनका परिवर्तन और आध्यात्मिक मार्ग पर चलना।

- नारद मुनि की शिक्षा और मार्गदर्शन।

- वाल्मिकि का आत्म-साक्षात्कार और आध्यात्मिक ज्ञान।


👉यह श्लोक वाल्मिकि रामायण के आदि काण्ड के ४.३-४.५ श्लोकों में आता है। इसी समय देवर्षि नारद जी ने उन्हें "राम" नाम का मंत्र दिया था, जिसे महाकवि तुलसी दास जी ने इस प्रकार लिखा,

👉तुलसी दास जी का यह दोहा है:👇


🪷"उल्टा नाम जपति जग जाना, वाल्मीकि भए ब्रम्ह समाना।"🪷


🪷शाब्दिक अर्थ:👇


अर्थात् "राम" शब्द का उच्चारण वाल्मिक भूल गए और "मरा मरा"

जपने लगे जो अनवरत कहने पर स्वतः ही"राम राम" हो जाता है। इसी का जप करने से संसार में विख्यात हुए और वे ब्रम्ह का साक्षात्कार कर लिए।

🪷वास्तविक अर्थ:👇


🪷"जो व्यक्ति अपने जीवन को परिवर्तित कर प्रभु के नाम का जाप करता है, वह समाज में प्रसिद्ध हो जाता है और प्रभु के समान आदर प्राप्त करता है।"🪷


🪷इस दोहे में, तुलसी दास जी वाल्मिकि के जीवन के परिवर्तन का उदाहरण देकर यह सिखाते हैं कि जीवन में कभी भी परिवर्तन संभव है और प्रभु के नाम का जाप करके हम अपने जीवन को पूर्ण उन्नत बना सकते हैं।🪷


🪷यह दोहा हमें यह भी सिखाता है कि:👇


1. जीवन में परिवर्तन संभव है।

2. प्रभु के नाम का जाप करने से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन होता है।

3. समाज में प्रसिद्धि और आदर प्राप्त करने के लिए प्रभु के नाम का जाप करना आवश्यक है।


🪷वे जन्मना वर्ण निर्धारण और विशेषाधिकार के विरोधी थे । उनके आश्रम में  समरसता स्थापित थीं । महाराज दशरथ के पौत्र भी उसी कुशा पर बैठ कर पढ़ते थे जिसपर साधारण किरात, निषाद, रजक आदि के बच्चे ज्ञानार्जन करते थे । महर्षि  वाल्मीकि ने रामायण लिखकर भारतीय संस्कृति को सशक्त स्वर दिया । उनकी महत्ता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि राम के पुत्रों का जन्म वाल्मीकि के आश्रम में हुआ । मुझे इस वर्ष महर्षि वाल्मीकि रामायण को आद्योपांत पढ़ने का सौभाग्य मिला । रामायण में वर्णित रूपक, चित्रित दृश्य और काव्य सौंदर्य अनुपम है। महर्षि वाल्मीकि की तुलना किसी से नहीं की जा सकती, वे अनन्यवय , अतुलनीय और अकल्पनीय हैं । महर्षि वाल्मीकि से कर्म के आधार पर श्रेष्ठता और महानता अर्जित करने की प्रेरणा मिलती है । महर्षि वाल्मीकि के साहित्य में नायक राम हैं , किंतु राम से चूक होने पर आदिकवि ने प्रभु राम की भी आलोचना उसी निर्भयता व निर्ममता से की है जिस निर्वैरता के साथ अच्छा काम करने पर दशानन की प्रशंसा की है । 

🪷मेरा आग्रह है कि राम का नाम लेने वालों को एक बार महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण अवश्य पढ़नी चाहिए । रामायण के अध्ययन-मनन के उपरान्त मेरी  क्या सभी की आस्था समरसता की ओर बढ़ जाती है। महर्षि वाल्मीकि द्वारा प्रतिपादित  रामराज्य के समय की यूशासन प्रणाली में समरसता वाद और सामाजिक न्याय के दृष्टांतों का वर्णन रामराज्य, राष्ट्रीयता और समाजवाद भरा पड़ा है

👉निष्कर्ष:👇

🪷उपरोक्त 1* श्लोक के अनुसार, प्रभु श्री राम जी का जन्म चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को श्रवण नक्षत्र में  दिन के मध्य काल अर्थात्था ठीक 12 बजे हुआ था।


🪷सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार, यह तिथि और नक्षत्र प्रति वर्ष आते हैं। लेकिन प्रभु श्री राम जी के जन्म का समय त्रेता युग में था, जो लगभग 8 लाख 71 हजार वर्ष पूर्व का समय है।


🪷इसलिए, इस श्लोक के अनुसार, भगवान राम के जन्म को लगभग 8 लाख वर्ष हो चुके हैं और यही समय महर्षि वाल्मिक का भी रहा होगा, न कि ईसा शताब्दी से 500 वर्ष पूर्व।🙏🙏🛕🙏🙏


बुधवार, 16 अक्टूबर 2024

#शरद पूर्णिमा, एक अमृत उत्सव

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✍️ 🛕# शरद पूर्णिमा # को आश्विन मास की पूर्णिमा के रूप में जाना जाता है, जो हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि को पड़ती हैजो इस वर्ष अंग्रेजी दिनांक के अनुसार बुधवार 16 अक्टूबर 2024 को पड़ रही है। इस दिन को अमृत उत्सव शरद पूर्णिमा, कोजागर पूर्णिमा या महारास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। इसी दिन प्रभु श्री कृष्ण ने राधा जी और बृज की सभी आबाल वृद्ध गोपियों, देवी देवताओं के साथ मिलकर चन्द्रमा के प्रकाश में महानृत्य किया था। इसी परम्परा को मनाते हुए हम आज तक चले आ रहे हैं। इसी दिन माता लक्ष्मी जी का भी प्रकटीकरण समुद्र मंथन से हुआ था जिससे अमृत की बूंद सम्पूर्ण जगत पर चन्द्र देव के माध्यम से होती है।👇


👉कुछ शास्त्रोक प्रमाणों और पौराणिक कथाओं के आधार पर, शरद पूर्णिमा के दिन खीर बनाकर खाना एक महत्वपूर्ण परंपरा है।शरद पूर्णिमा के दिन खीर बनाकर खाने के पीछे कई शास्त्रोक प्रमाण इस प्रकार से हैं:👇


1. *शास्त्रोक प्रमाण:*👇


 🪷महाभारत में शरद पूर्णिमा के दिन खीर बनाकर खाने का उल्लेख है।


1. *पौराणिक कथा:* 👇


🪷एक पौराणिक कथा के अनुसार, शरद पूर्णिमा के दिन भगवान कृष्ण ने गोपियों के साथ महारास लीला की थी। इस दिन खीर बनाकर खाने से भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त होती है।


2. *आयुर्वेदिक महत्व:* 👇


🪷शरद पूर्णिमा के दिन खीर बनाकर खाने से स्वास्थ्य लाभ भी होता है। खीर में दूध, चावल और गुड़ के मिश्रण से शरीर को पोषण मिलता है।


👉कुछ प्रमुख सूत्र हैं:👇


1. *महाभारत:* 👇

🪷"आश्विने पूर्णिमायां खीरं भक्षयेत्।"🪷


2. *पद्म पुराण:*👇

 🪷"कोजागरे पूर्णिमायां खीरं भक्षयेत्।"🪷


1. *ब्रह्म पुराण:*👇

 🪷"शरद पूर्णिमायां खीरं भक्षयेत्।"🪷


👉शरद पूर्णिमा का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व:👇


👉शरद पूर्णिमा हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो आश्विन मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस दिन का धार्मिक महत्व इस प्रकार है:👇


1. 🪷मां लक्ष्मी की पूजा🪷: 

शरद पूर्णिमा को मां लक्ष्मी की पूजा के लिए विशेष दिन माना जाता है। इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा करने से धन और समृद्धि की प्राप्ति होती है।


2. 🪷चंद्रमा की पूजा: 🪷

शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा अपनी पूर्ण कला में होता है, इसलिए इस दिन चंद्रमा की पूजा का विशेष महत्व है।


3.🪷 खीर का महत्व:🪷

 शरद पूर्णिमा के दिन खीर बनाकर चंद्रमा को अर्पित करने की परंपरा है। खीर को मां लक्ष्मी का प्रिय भोजन माना जाता है।


4.🪷 भगवान कृष्ण की पूजा🪷: 

शरद पूर्णिमा के दिन भगवान कृष्ण की पूजा भी की जाती है, क्योंकि इस दिन उन्होंने गोपियों के साथ रासलीला की थी।


5. 🪷आध्यात्मिक महत्व🪷: 

शरद पूर्णिमा का आध्यात्मिक महत्व भी है। इस दिन को आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक विकास के लिए विशेष दिन माना जाता है।

👉सांस्कृतिक महत्व:👇

🪷शरद पूर्णिमा का सांस्कृतिक महत्व बहुत अधिक है, यह पर्व भारतीय संस्कृति में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यहाँ कुछ सांस्कृतिक महत्व दिए गए हैं:


1. सामाजिक एकता: 👇

🪷शरद पूर्णिमा लोगों को एकत्रित करने और सामाजिक संबंधों को पुनः पुनः जाग्रत और ऊर्जावान बनाने में सहायता करता है।


2. धार्मिक विश्वास: 👇

🪷यह पर्व हिंदू धर्म में मां 🪷लक्ष्मी 🪷और भगवान कृष्ण की पूजा के लिए विशेष दिन माना जाता है।


3. सांस्कृतिक अनुष्ठान: 👇

🪷शरद पूर्णिमा की खीर बनाने और चंद्रमा को अर्पित करने की परंपरा एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक अनुष्ठान है।


4. पारिवारिक महत्व: 👇

🪷यह पर्व परिवार के साथ मिलकर मनाने का  स्वर्णिम अवसर प्रदान करता है।


5. सामाजिक समर्थन: 👇

🪷शरद पूर्णिमा निर्धनों और असहाय लोगों की सहायता करने के लिए भी एक अवसर प्रदान करता है।


5. सांस्कृतिक पहचान: 👇

🪷यह पर्व भारतीय संस्कृति की पहचान और अति प्राचीन परम्परा को बनाए रखने में सहायक  है।


6. ऋतु अनुसार महत्व: 👇

🪷शरद पूर्णिमा शरद ऋतु के प्रारम्भ का प्रतीक है, जो प्रकृति की सुंदरता और नवीकरण का समय है।


इन सांस्कृतिक महत्वों के साथ, शरद पूर्णिमा एक महत्वपूर्ण पर्व है जो लोगों को एकत्रित करता है, सामाजिक संबंधों को सशक्त बनाता है, और भारतीय संस्कृति की परम्परा को बनाए रखता है।


👉शरद पूर्णिमा के दिन बनने वाली खीर का औषधीय उपयोग:👇


🪷शरद पूर्णिमा के दिन खीर बनाकर खाने के कई औषधीय उपयोग और लाभ हैं इस प्रकार हैं:


1. पाचन शक्ति में सुधार:👇 

🪷खीर में चावल और दूध के मिश्रण से पाचन शक्ति सशक्त होती है।


2. शरीर को पोषण: 👇

🪷खीर में दूध, चावल और गुड़ के मिश्रण से शरीर को आवश्यक पोषक तत्व मिलते हैं।


3. रक्त शुद्धि: 👇

🪷खीर में दूध और गुड़ के मिश्रण से रक्त शुद्धि होती है।


4. हृदय स्वास्थ्य: 👇

🪷खीर में दूध और चावल के मिश्रण से हृदय के स्वास्थ्य में सुधार होता है।


5. शारीरिक और मानसिक तनाव कम करना: 👇

🪷खीर में दूध और चावल के मिश्रण से तनाव कम होता है।


6. नींद में सुधार: 👇

🪷खीर में दूध और चावल के मिश्रण से नींद में सुधार होता है।


7. मधुमेह नियंत्रण:👇

 🪷खीर में गुड़ के मिश्रण से मधुमेह नियंत्रण में सहायता मिलती है जिसमें कुछ आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों के प्रयोग करने का भी विधान है।


8. प्रतिरक्षा प्रणाली की सुदृढ़ता करना:👇

 🪷खीर में दूध और चावल के मिश्रण से प्रतिरक्षा प्रणाली बलवान होती है।


9. त्वचा स्वास्थ्य:👇 

🪷खीर में दूध और गुड़ के मिश्रण से त्वचा कान्तिमय और उसके स्वास्थ्य में सुधार होता है।


10. मानसिक स्वास्थ्य:👇 

🪷खीर में दूध और चावल के मिश्रण से मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।


👉इन औषधीय उपयोगों और लाभों के अलावा, शरद पूर्णिमा के दिन खीर बनाकर खाने से धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी है।


🪷त्रिदोष के आधार पर शरद पूर्णिमा के दिन खीर बनाकर खाने के लाभ इस प्रकार बताए गए हैं:👇


🪷वात दोष:🪷


1. वात दोष को शांत करने में सहायता मिलती है।

2. शरीर की थकान और दुर्बलता समाप्त होती है।

3. नींद में अच्छा सुधार होता है।


🪷पित्त दोष:🪷


1. पित्त दोष को शांत करने में  सहायता मिलती है।

2. शरीर की गर्मी और दाह कम होती है।

3. पाचन शक्ति में सुधार होता है।


🪷कफ दोष:🪷


1. कफ दोष को शांत करने में सहायता मिलती है।

2. शरीर की कठिनता और शोथ में कमी होती है।

3. प्रतिरक्षा प्रणाली सशक्त होती है।


🪷त्रिदोष संतुलन:🪷


1. शरद पूर्णिमा के दिन खीर बनाकर खाने से त्रिदोष में संतुलन स्थापित होता है।

2. शरीर की स्वास्थ्य और  कार्य करने की ऊर्जा में सुधार होता है।

3. मानसिक शांति और स्थिरता मिलती है।

अस्थमा रोग में शरद पूर्णिमा के दिन खीर में निम्नलिखित औषधियों को डालकर खिलाने से  विशेष लाभ होता है: जैसे,


1. 🪷तुलसी: 🪷

तुलसी के पत्तों को खीर में डालने से अस्थमा के लक्षणों में कमी आती है।


2.🪷 मधु या शहद: 🪷

मधु या शहद को खीर में मिलाने से अस्थमा की समस्या में अद्भुत लाभ मिलता है।


3.🪷 पिप्पली:🪷 

पिप्पली को खीर में डालने से अस्थमा के रोगियों को लाभ होता है और कफ अर्थात् श्लेष्मा का कोप शान्त होता है।


4. 🪷एलुआ: 🪷

एलुआ को खीर में मिलाने से अस्थमा की समस्या में सुधार होता है।


5. 🪷मुलेठी:🪷 

मुलेठी को खीर में डालने से अस्थमा के लक्षणों में कमी आती है।


6. 🪷हरिद्रा: 🪷

हरिद्रा को खीर में डालने से अस्थमा के लक्षणों में कमी आती है।


7. 🪷काली मिर्च:🪷

 काली मिर्च को खीर में मिलाने से अस्थमा की समस्या में लाभ मिलता है क्योंकि काली मिर्च ज्वर नाशक होती है।


8. 🪷आदुकरा: 🪷

आदुकरा को खीर में डालने से अस्थमा के रोगियों को लाभ होता है।


9. 🪷त्रिकटु: 🪷

त्रिकटु को खीर में मिलाने से अस्थमा की समस्या में सुधार होता है, त्रिकटु में सोंठ, पिपली और कालीमिर्च आते हैं।


10. 🪷वसा: 🪷

वसा को खीर में डालने से अस्थमा के लक्षणों में कमी आती है यह कास नाशक है।


11. 🪷शृंगी: 🪷

शृंगी को खीर में मिलाने से अस्थमा की समस्या में पर्याप्त लाभ मिलता है।


12. 🪷भूम्यामला: 🪷

भूम्यामला या भूमिआंवला को खीर में डालने से अस्थमा के रोगियों को लाभ होता है यह वृक्क और यकृत की शुद्धि करती है।


👉इन औषधियों को खीर में डालने से अस्थमा रोगियों को निम्नलिखित लाभ होते हैं:👇


- श्वसन प्रणाली में सुधार

- अस्थमा के लक्षणों में कमी

- प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत

- तनाव कमी

- स्वास्थ्य में सुधार


👉यह ध्यान रखें कि अस्थमा रोगियों को अपने  वैद्य या डॉक्टर से परामर्श लेने के उपरान्त ही इन औषधियों का उपयोग करना चाहिए।

👉सावधानी:👇

शरद पूर्णिमा के दिन बनाई गई खीर को अगले दिन प्रातः गर्म नहीं किया जाता है, बल्कि उसे पूर्वरूप में ही खाया जाता है। यह परंपरा इस दिन की धार्मिक और सांस्कृतिक महत्ता को दर्शाती है।

इस दिन खीर को रात में बनाकर रख दिया जाता है और अगले दिन प्रातः उसे ठंडा होने पर परोसा जाता है। यह विधि खीर के पोषक तत्वों को बनाए रखने में सहायक  है और इसका स्वाद भी बढ़ाती है।

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