🪷🙏🪷युग दृष्टा महर्षि आदिकवि वाल्मीकि , की शरद पूर्णिमा दिवस के दिन उनकी जयंती पर।👇
🪷त्रेता युग वैदिक गणना अनुसार आज से लगभग 8, लाख 71हजार(इसमें 8 लाख 64 हजार द्वापर के और अब तक 5 सहस्त्र वर्ष से अधिक कलयुग के हो चुके हैं।) वर्ष पूर्व था, और प्रभु श्री राम त्रेता युग के अन्तिम चरण में अवतरित हुए थे। तो आजकल जो मतभेद चल रहा है कि श्री राम जी का जन्म काल 5 से 10,000 वर्ष पूर्व। ऐसा अनेकों शोधार्थियों ने सॉफ्टवेयर में यह राम जी के जन्म🪷 1* का श्लोक डाला तो उपरोक्त वर्ष का आया। जबकि यह प्रमाणित है कि महाभारत काल ही 5 सहस्त्र वर्ष पूर्व था।🪷
👉महर्षि वाल्मिकि ने रामायण में भगवान राम के जन्म के समय का नक्षत्र और ग्रहों का वर्णन किया है। यह श्लोक है:👇
चित्र 2
चित्र 3
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🪷 1* "चैत्रे मासे शुक्लपक्षे नवम्यां श्रवण नक्षत्रे|
जातः श्रीरामो विश्वभावनः पुनर्वसु योगे ||
भौमाश्विन्योर्मध्य गच्छत् कुलदीपः कृतान्तकः|
स्वोच्चस्थिते बृहस्पतौ च तदा निर्मित विश्वकृतः ||"🪷
(रामायण, बालकाण्ड, १८.८-९)
👉इस श्लोक के अनुसार:👇
- चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को।
- श्रवण नक्षत्र में।
- पुनर्वसु योग में।
- बुध और शुक्र के मध्य में।
- कुलदीपक और कृतांतक के रूप में।
- बृहस्पति के उच्च स्थान में प्रभु श्री राम का जन्म हुआ था।
🪷वहीं महर्षि वाल्मिक का जन्म प्रमाण सहित इस प्रकार है,🪷
👉महर्षि वाल्मिकि के जन्म का प्रमाण विभिन्न सनातन वैदिक ग्रंथों में मिलता है, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं:👇
👉रामायण के आदि काण्ड में वाल्मिकि के जन्म का वर्णन है:👇
🪷"वाल्मिकिर्नाम भागवान् ऋषिः"🪷
(आदि काण्ड, १.२)
👉भागवत पुराण में भी वाल्मिकि के जन्म का उल्लेख है:👇
🪷"वाल्मिकिः कुशजातः प्रोक्तः"🪷
(भागवत पुराण, ९.१३.१४)
👉महाभारत के वन पर्व में वाल्मिकि के जन्म का वर्णन है:👇
🪷"वाल्मिकिर्भगवान् ऋषिः कुशजातः"🪷
(महाभारत, वन पर्व, १४८.१४)
🪷इन ग्रंथों के श्लोकों से यह स्पष्ट होता है कि महर्षि वाल्मिकि का जन्म कुश जाति में हुआ था और वे एक महान ऋषि थे।🪷
लेकिन, वाल्मिकि के जन्म का समय और तिथि के सम्बंध में विभिन्न मतभेद हैं, लेकिन यह स्वीकार किया जाता है कि वे त्रेता युग में हुए थे।
👉हिंदू पौराणिक कथाओं और वैदिक गणना के अनुसार, चार युग हैं:👇
🪷1. सत्य युग (17,28,000 वर्ष)
🪷2. त्रेता युग (12,96,000 वर्ष)
🪷3. द्वापर युग (8,64,000 वर्ष)
🪷4. कलि युग (4,32,000 वर्ष)
🪷इन युगों की गणना वैदिक ज्योतिष और पौराणिक कथाओं के आधार पर की जाती है।🪷
🪷रामराज भारत का लोकस्वप्न है जिसमें राष्ट्रीयता और समाजवाद का अद्भुत समन्वय है । आज शरद पूर्णिमा के दिन, रामराज्य के दृष्टा और सबसे बड़े व्याख्याता महर्षि वाल्मीकि की जयंती है । महर्षि वाल्मीकि जितने बड़े ज्ञानी और ऋषि थे, उतने महान कर्मयोगी थे । वे एकमात्र महान ऋषि थे जिसका किसी राजदरबार से कोई भी सरोकार नहीं था । वे पूर्णतया लोक के दार्शनिक थे । उनमें ही वर्णव्यवस्था की जड़ता को तोड़ने का साहस था और उन्होंने तोड़ा भी । उन्होंने अपने ग्रन्थ में उल्लेख किया है:🪷
🪷यह श्लोक अधिक ही महत्वपूर्ण है! महर्षि वाल्मिकि ने अपने जीवन के अनुभवों और आध्यात्मिक ज्ञान को अपने महाकाव्य रामायण में व्यक्त किया है।🪷
🪷ऊपर दिया गया श्लोक महर्षि वाल्मिकि के जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना को दर्शाता है, जब उन्होंने अपने जीवन में परिवर्तन किया और आध्यात्मिक मार्ग पर चल पड़े।🪷
👉वाल्मिकि रामायण में यह श्लोक इस प्रकार है:👇
🪷"अहं पुरा किरातेषु, किरातै: सह वर्धित: |
जन्ममात्र द्विजत्वं में शूद्राचाररत: सदा ||"🪷
👉इसका अर्थ है:👇
🪷"मैं पहले किरातों में से एक था, किरातों के साथ बढ़ा-चढ़ा था, मेरा जन्म तो द्विजों में हुआ था, लेकिन मैं शूद्रों के कर्मों में रत था।"
👉यह श्लोक महर्षि वाल्मिकि के जीवन के परिवर्तन और उनके आध्यात्मिक ज्ञान को दर्शाता है, जो उन्हें रामायण के रचयिता बनाया।यह श्लोक महर्षि वाल्मिकि के जीवन के एक महत्वपूर्ण सन्दर्भ में लिखा है, जब उन्होंने अपने जीवन में परिवर्तन किया और आध्यात्मिक मार्ग पर चल पड़े।
👉यह श्लोक वाल्मिकि रामायण के आदि काण्ड में आता है, जब नारद मुनि वाल्मिकि को उनके पूर्व जीवन के सम्बंध में बताते हैं। इस श्लोक में वाल्मिकि अपने पूर्व जीवन के बारे में कह रहे हैं, कि जब वे एक डाकू थे और शूद्रों के कर्मों में रत थे।
👉इस श्लोक का सन्दर्भ ये है:👇
- वाल्मिकि का पूर्व जीवन और उनका दस्यु बनना।
- उनका परिवर्तन और आध्यात्मिक मार्ग पर चलना।
- नारद मुनि की शिक्षा और मार्गदर्शन।
- वाल्मिकि का आत्म-साक्षात्कार और आध्यात्मिक ज्ञान।
👉यह श्लोक वाल्मिकि रामायण के आदि काण्ड के ४.३-४.५ श्लोकों में आता है। इसी समय देवर्षि नारद जी ने उन्हें "राम" नाम का मंत्र दिया था, जिसे महाकवि तुलसी दास जी ने इस प्रकार लिखा,
👉तुलसी दास जी का यह दोहा है:👇
🪷"उल्टा नाम जपति जग जाना, वाल्मीकि भए ब्रम्ह समाना।"🪷
🪷शाब्दिक अर्थ:👇
अर्थात् "राम" शब्द का उच्चारण वाल्मिक भूल गए और "मरा मरा"
जपने लगे जो अनवरत कहने पर स्वतः ही"राम राम" हो जाता है। इसी का जप करने से संसार में विख्यात हुए और वे ब्रम्ह का साक्षात्कार कर लिए।
🪷वास्तविक अर्थ:👇
🪷"जो व्यक्ति अपने जीवन को परिवर्तित कर प्रभु के नाम का जाप करता है, वह समाज में प्रसिद्ध हो जाता है और प्रभु के समान आदर प्राप्त करता है।"🪷
🪷इस दोहे में, तुलसी दास जी वाल्मिकि के जीवन के परिवर्तन का उदाहरण देकर यह सिखाते हैं कि जीवन में कभी भी परिवर्तन संभव है और प्रभु के नाम का जाप करके हम अपने जीवन को पूर्ण उन्नत बना सकते हैं।🪷
🪷यह दोहा हमें यह भी सिखाता है कि:👇
1. जीवन में परिवर्तन संभव है।
2. प्रभु के नाम का जाप करने से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन होता है।
3. समाज में प्रसिद्धि और आदर प्राप्त करने के लिए प्रभु के नाम का जाप करना आवश्यक है।
🪷वे जन्मना वर्ण निर्धारण और विशेषाधिकार के विरोधी थे । उनके आश्रम में समरसता स्थापित थीं । महाराज दशरथ के पौत्र भी उसी कुशा पर बैठ कर पढ़ते थे जिसपर साधारण किरात, निषाद, रजक आदि के बच्चे ज्ञानार्जन करते थे । महर्षि वाल्मीकि ने रामायण लिखकर भारतीय संस्कृति को सशक्त स्वर दिया । उनकी महत्ता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि राम के पुत्रों का जन्म वाल्मीकि के आश्रम में हुआ । मुझे इस वर्ष महर्षि वाल्मीकि रामायण को आद्योपांत पढ़ने का सौभाग्य मिला । रामायण में वर्णित रूपक, चित्रित दृश्य और काव्य सौंदर्य अनुपम है। महर्षि वाल्मीकि की तुलना किसी से नहीं की जा सकती, वे अनन्यवय , अतुलनीय और अकल्पनीय हैं । महर्षि वाल्मीकि से कर्म के आधार पर श्रेष्ठता और महानता अर्जित करने की प्रेरणा मिलती है । महर्षि वाल्मीकि के साहित्य में नायक राम हैं , किंतु राम से चूक होने पर आदिकवि ने प्रभु राम की भी आलोचना उसी निर्भयता व निर्ममता से की है जिस निर्वैरता के साथ अच्छा काम करने पर दशानन की प्रशंसा की है ।
🪷मेरा आग्रह है कि राम का नाम लेने वालों को एक बार महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण अवश्य पढ़नी चाहिए । रामायण के अध्ययन-मनन के उपरान्त मेरी क्या सभी की आस्था समरसता की ओर बढ़ जाती है। महर्षि वाल्मीकि द्वारा प्रतिपादित रामराज्य के समय की यूशासन प्रणाली में समरसता वाद और सामाजिक न्याय के दृष्टांतों का वर्णन रामराज्य, राष्ट्रीयता और समाजवाद भरा पड़ा है
👉निष्कर्ष:👇
🪷उपरोक्त 1* श्लोक के अनुसार, प्रभु श्री राम जी का जन्म चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को श्रवण नक्षत्र में दिन के मध्य काल अर्थात्था ठीक 12 बजे हुआ था।
🪷सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार, यह तिथि और नक्षत्र प्रति वर्ष आते हैं। लेकिन प्रभु श्री राम जी के जन्म का समय त्रेता युग में था, जो लगभग 8 लाख 71 हजार वर्ष पूर्व का समय है।
🪷इसलिए, इस श्लोक के अनुसार, भगवान राम के जन्म को लगभग 8 लाख वर्ष हो चुके हैं और यही समय महर्षि वाल्मिक का भी रहा होगा, न कि ईसा शताब्दी से 500 वर्ष पूर्व।🙏🙏🛕🙏🙏







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