🚩जय श्री राधे🙏🏽🕉️🚩
*पतंजलि योग सूत्र - समाधि पाद*
*सूत्र 7 और 8: प्रमाण और विपर्यय वृत्ति*
कोई
ये दोनों सूत्र चित्त की 5 वृत्तियों में से प्रथम 2 वृत्तियों की व्याख्या करते हैं। पतंजलि ने सूत्र 1.6 में बताया था कि चित्त की वृत्तियाँ 5 प्रकार की हैं - प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, स्मृति।
अब उनका विस्तार।
*सूत्र 1.7: प्रमाण वृत्ति*
*संस्कृत सूत्र:*
🚩प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि👇
*शब्दार्थ:*
*प्रत्यक्ष* = इन्द्रियों द्वारा सीधा ज्ञान
*अनुमान* = तर्क द्वारा निकाला गया ज्ञान
*आगमाः* = शास्त्र, गुरु, आप्त पुरुष का वचन
*प्रमाणानि* = ये तीनों सही ज्ञान के साधन हैं।
*विस्तृत व्याख्या:*
प्रमाण का अर्थ है "सही ज्ञान"। चित्त की जो वृत्ति वस्तु को जैसा है वैसा ही ग्रहण करे, वो प्रमाण वृत्ति है।
इसके 3 प्रकार हैं:
1. *प्रत्यक्ष प्रमाण*:
नेत्र, कर्ण, नासिका, जिह्वा, त्वचा - इन 5 इन्द्रियों से जो सीधा ज्ञान होता है।
*उदाहरण*: आप सामने गुलाब देख रहे हैं - ये लाल है, सुगंध है। ये प्रत्यक्ष है।
*सीमा*: इन्द्रियाँ भ्रम भी दे सकती हैं। जैसे रेगिस्तान में मृग-मरीचिका दिखती है पर वहां जल नहीं होता।
2. *अनुमान प्रमाण*:
किसी चिन्ह को देखकर अज्ञात वस्तु का ज्ञान।
*उदाहरण*: धुआँ देखकर आग का अनुमान लगाना। बादल देखकर वर्षा का अनुमान।
*सूत्र*: जहाँ धुआँ है वहाँ आग है - ये व्याप्ति है।
3. *आगम प्रमाण*:
किसी आप्त पुरुष, गुरु, वेद, शास्त्र का वचन।
आप्त = जिसने स्वयं अनुभव किया हो और जिसमें छल-कपट न हो।
*उदाहरण*: स्वर्ग है, आत्मा अमर है - ये हम प्रत्यक्ष नहीं देख सकते, पर वेद कहते हैं, गुरु कहते हैं।
*वचन*: वक्ता आप्त होना चाहिए। मिथ्या गुरु का वचन आगम नहीं है।
*योग में महत्व*:
साधक को तीनों प्रमाणों का उपयोग करना चाहिए। 1,गुरु वचन = आगम,शास्त्र अध्ययन = आगम,
2,तर्क = अनुमान,
3,ध्यान का अनुभव = प्रत्यक्ष।
लेकिन अंतिम सत्य स्वानुभूति अर्थात् प्रत्यक्ष है।
*सूत्र 1.8: विपर्यय वृत्ति*
*संस्कृत सूत्र:*
🚩विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम्👇
*शब्दार्थ:*
*विपर्यय:* = विपरीत ज्ञान, भ्रम
*मिथ्या-ज्ञानम्* = अनुचित ज्ञान
*अतद्-रूप-प्रतिष्ठम्* = जो वस्तु वैसी नहीं है, उस रूप में स्थित होना।
*विस्तृत व्याख्या:*
विपर्यय अर्थात् असत्य ज्ञान। वस्तु कुछ और है, चित्त कुछ और समझ ले - ये विपर्यय है। ये अविद्या का मूल है।
*5 प्रकार के क्लेश का कारण विपर्यय ही है:*
1. *अविद्या*: अनित्य को नित्य, दुःख को सुख, अपवित्र को पवित्र, अनात्मा को आत्मा मानना।
2. *अस्मिता*: द्रष्टा अर्थात् आत्मा और दृश्य अर्थात् बुद्धि को एक मान लेना।
*उदाहरण:*
1. *रज्जु में सर्प*: अंधेरे में रस्सी पड़ी है, पर सर्प समझकर भयभीत हो जाते हैं।
जहां रस्सी = सत्य, और सर्प = विपर्यय।
2. *सीप में चाँदी*: समुद्र तट पर सीप चमकती है, चाँदी समझकर उठा लेते हैं।
3. *देह को आत्मा मानना*: ये सबसे बड़ा विपर्यय है। शरीर की मृत्यु होती है, पर हम "मैं मर जाऊँगा" मान लेते हैं। जबकि गीता सूत्र 2.20 कहता है -
आत्मा न तो जन्मता है और न ही मरता है।
*प्रमाण और विपर्यय में अंतर:*
प्रमाण विपर्यय
वस्तु जैसी है वैसी दिखती है। वस्तु कुछ और है, दिखती कुछ और है। ज्ञान सत्य है, ज्ञान मिथ्या है।
सत्य ज्ञान बाधित नहीं होता, पर सत्य, ज्ञान से बाधित हो जाता है।
रस्सी का सही ज्ञान होते ही सर्प का भ्रम समाप्त। वैसे ही आत्म-ज्ञान होते ही देह-भाव का विपर्यय समाप्त।
*योग साधना में उपयोग:*
पतंजलि कहते हैं 'चित्तवृत्ति का संतुलित निरोध' योग है। पहले पहचानो कि कौन सी वृत्ति प्रमाण है, कौन सी विपर्यय। विपर्यय को प्रमाण से काटो। देह-भाव विपर्यय है, "मैं आत्मा हूँ" ये आगम प्रमाण है, ध्यान से प्रत्यक्ष अनुभव करो।
🕉️दोनों सूत्रों का सार तत्व;
*शीर्षक*: "आप जो देख रहे हो वो सच है या भ्रम?"
*निष्कर्ष*: "पतंजलि कहते हैं मन में 2 प्रकार के विचार चलते हैं - प्रमाण यानी सही ज्ञान और विपर्यय अर्थात् भ्रम। रस्सी को सर्प समझना विपर्यय है। देह को 'मैं' समझना सबसे बड़ा विपर्यय है। जब ध्यान से ज्ञान में उतर जाओगे कि मैं शरीर नहीं आत्मा हूँ, तब सारे दुःख स्वतः समाप्त। क्योंकि आत्मा को न वृद्धावस्था है न मृत्यु। जय श्री राधे।" #शेयरकरें और #फॉलोकरें।।
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जय श्री राधा सर्वेश्वर🌷💐🙏🏽




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