🔯दत्तात्रेय जी ने कहा - राजन्! मेरे गुरु के नामादि इस प्रकार हैं _
१. धरती मेरा पहला गुरु है। मैं प्रभात में उसे वंदन करता हूँ। हाथ क्रियात्मक शक्ति के प्रतीक हैं। निश्चय करना चाहिये कि परमात्मा को भी भाये, वैसे ही काम करूँगा। माता की भाँति मेरी रक्षा करना। धरती बहुत कुछ सहकर भी सबको सुख ही देती है। मैंने धरती से सबके प्रति सद्भाव और सहनशक्ति सीखी है।
२. वायु से मैंने संतोष और नि:संगता सीखी है।
३. आकाश ने मुझे सिखाया है कि आत्मा आकाश की भाँति अनादि और अविनाशी है। ईश्वर उसी की भाँति सर्वव्यापी हैं।
४. जल से मैंने शीतलता और मधुरता का उपदेश पाया है। जल की भाँति साधक को शुद्ध रहना चाहिए। मधुरभाषी और शीतल स्वभाव युक्त होना चाहिए।
५. अग्नि से मैंने पवित्रता सीखी है। हृदय में यदि विवेक रूपी अग्नि होगी तो पाप नहीं आएगा। विवेक ही अग्नि है। किसी भी व्यक्ति के दुर्व्यवहार को मन में न रखना। दूसरों के पापों के बारे में सोचना भी पाप है। दूसरों के पापों की बात मन में से निकाल देना चाहिए। विवेक की अग्नि से उन्हें जला दें।
६. चंद्रमा ने मुझे क्षमता सिखाई है। वृद्धि और ह्रास तो शरीर के होते हैं, आत्मा के नहीं। संपत्ति में अपना भान न भुलाना और विपत्ति में दुखी मत होना।🌷🌹🌹🌹🌹🌹
✡️🔯७.सूर्य की भाँति परोपकारी होना है किंतु अभिमानी नहीं। एक ही सूर्य के प्रतिबिंब कई जल-पात्रों में कई दिखाई देते हैं। आत्मा भी एक है किंतु विविध देहादि उपाधियों के कारण अनेक स्वरूपों वाला दीखता है। वास्तव में आत्मा उपाधि रहित है।
८. कबूतर के प्रसंग से मैंने सीखा है कि किसी भी वस्तु या व्यक्ति के प्रति अतिशय आसक्ति नहीं होनी चाहिए। वह पत्नी और पुत्र की आसक्ति के कारण मर गया। किसी की भी मृत्यु पर विलाप न करें। रोने वाला स्वयं भी एक दिन जाने वाला ही है। तो दूसरों के लिए क्यों रोते हैं? अपने लिए ही रोओ।
९. अजगर की भाँति प्रारब्ध कर्मानुसार जो कुछ मिले, उससे संतुष्ट रहो।
१०. समुद्र, वर्षा ऋतु में बहुत-सा जल मिलाने पर भी छलकता नहीं है और ग्रीष्म ऋतु में जल न मिलने पर सूखा नहीं हो जाता। सुख-दुख में हमें भी समुद्र की भाँति ही रहना चाहिए।
११. पतंगा भी गुरु है। वह अग्नि से मोहित होकर उसके पास जाता है और जलकर भस्म हो जाता है। मनुष्य भी माया से मोहित होकर उसमें फँसकर अपना सर्वनाश मोल लेता है।
पतंगे की भाँति सौंदर्य के पीछे विक्षिप्त होने से अपना अहित ही होता है। जगत् के विषय बाहर से सुंदर हैं, भीतर से नहीं, सुंदरता तो कल्पना मात्र है। एकमात्र श्री कृष्ण ही सुंदर हैं। उन्हीं से प्रेम करो।
🌷🌹🌹🌹🌹🌹 ✡️🔯१२. भ्रमर की भाँति सार ग्रहण करो किंतु आसक्त न बनो। भ्रमर ने कमल में आसक्त होकर अपने प्राणों से हाथ धो लिए। वह लकड़ी तो छेद सकता है किंतु कमल की कोमल पंखुड़ी को नहीं, क्योंकि उसे कमल के प्रति आसक्ति है।
यह संसार भी कमल जैसा है जो अपनी विषय गंध में जीव भ्रमर को फँसा देता है। भ्रमर कमल के पंखुड़ियों के खुलने की सोचता है किंतु हाथी ने उसके सारे सपने उजाड़ दिए। मनुष्य भी सांसारिक विषयों में फँसकर अपने को लुटा देता है। इसलिए विषय-सुख में मत फँसो।
हाथी-रूपी काल कुचलकर नष्ट कर दे, उससे पहले ही सर्वस्व का मोह छोड़कर प्रभु से मन को जोड़ लेने वाला जीव काल को हरा सकता है।
जिस प्रकार भ्रमर में लकड़ी को कुरेदने की शक्ति है, इसी प्रकार मनुष्य भी बड़ा शक्तिशाली है। मनुष्य यदि चाहे तो नारायण बन सकता है किंतु उसे पहले आसक्ति का त्याग करना होगा।
१३. मधुकृत के दो अर्थ हैं भ्रमर और मधुमक्षिका। भ्रमर से जो सीखा,वह मैंने ऊपर बता दिया। मधुमक्षिका से मैंने सीखा कि किसी भी वस्तु का अतिशय संग्रह न किया जाय। मधुमक्षिका मधु का संग्रह करती है, तभी तो लोग उसे मारकर मधु छीन लेते हैं।
१४. हाथी भी मेरा गुरु है। स्पर्श सुख की लालसा के कारण हाथी जान गँवाता है। लोग एक बड़ा-सा गड्ढा खोदकर ऊपर घास-पात रखकर नकली हथिनी रख देते हैं। हाथी उसे असली हथिनी मानकर स्पर्श सुख की इच्छा से वहाँ जाता है और तुरंत उसे गड्ढे में फँस जाता है।
साधक पुरुष को चाहिए कि वह नारी का संग न करे। स्त्री साधिका को चाहिए कि वह पुरुष का संग न करे। मूर्ति तक स्पर्श न किया जाय।
*पदापि युवतीं भिक्षुर्न स्पृशेद् दारवीमपि।*भाग.११/८/१३🌷🌹
✡️🔯१५. मधुमक्षी द्वारा एकत्रित मधु शिकारी छीन ले जाता है। योगी भी बिना उद्यम किये ही भोग पा सकता है। धन का संग्रह करने के बदले दान करना चाहिए।
१६. जिस प्रकार स्पर्श सुख की लालसा से हाथी का नाश होता है उसी प्रकार संगीत-श्रवण की लालसा से हिरण का नाश होता है। इसलिए योगी को गीत, नृत्य, संगीत आदि विषयों का त्याग करना चाहिए।
१७. रससुख की, जिह्वा स्वाद की लालसा मछली को मारती है। काँटे से लगाया गया मांस या आटा मछली खाने जाती है और मर जाती है। मनुष्य को भी यह जिह्वा बड़ी व्यथित करती है। सभी इंद्रियों को जीत कर भी यदि जिह्वा को नहीं जीता तो नाश ही होगा। जो रसना को जीतता है, वह सर्वस्व को जीत लेता है।
*न जयेद् रसनं यावज्जितं सर्वं जिते रसे।*
भाग.११/८/२१
दत्तात्रेय जी ने इस प्रकार शब्द, स्पर्श, रस, रूप और गंध, इन पाँचों विषयों की चर्चा की। एक ही विषय का सेवन करने पर भी हाथी, भ्रमर आदि का नाश होता है तो सभी विषयों का सेवन करने वाले मनुष्य की तो कैसी दुर्गति होती होगी?
मृत्यु के पश्चात सुनाया जाने वाला गरुण पुराण मनुष्य को मृत्यु के पूर्व सुनना चाहिए-
*कुरंगमातंगपतंगमृमाना हता पंचभिरेवपि।*
*एक: प्रमादी स कथं न हन्यते य: सेवते पंचभिरेवपञ्च।।*
पतंगा, हाथी, हिरण, भ्रमर और मछली, मात्र एक विषय की आसक्ति के कारण मर जाते हैं तो पाँच विषयों का उपभोग करने वाला प्रमादी मनुष्य क्यों न मरे?🌷🌹🌹🌹🌹🌹
✡️🔯१८.राजन्! मैंने एक वेश्या को भी गुरु माना है।
पिंगला नाम की एक वेश्या धनवान ग्राहक की प्रतीक्षा में सारी रात जागा करती थी। एक बार उसने सोचा कि कामी पुरुष के लिए जागने की अपेक्षा प्रभु के लिए जागकर उनको ही क्यों न पा लूँ और उसने विषयों का त्याग किया। उसने कामी पुरुष की प्रतीक्षा में जागते रहना छोड़ दिया और निश्चय किया कि अब मैं केवल प्रभु को ही प्रसन्न करने का प्रयत्न करूँगी।
कालसर्प के ग्रास जीवात्मा की रक्षा प्रभु के अतिरिक्त और कौन कर सकता है?
*ग्रस्तं कालाहिनाऽऽत्मानं कोऽन्यस्त्रातुमधीश्वर:।*
भाग.११/८/४१
इस जगत् में आशा परम दु:ख है और निराशा परम् सुख। इसलिए सुख की आशा न करो।
*आशा हि परमं दु:खं नैराश्यं परमं सुखं।*
भाग.११/८/४४
आशा की शृंखला मनुष्य को किस सीमा तक जकड़े रखती है, उसका वर्णन स्वामी शंकराचार्य के शब्दों में-
*अंगं गलितं पलितं मुंडम् दशनविहीनं जातं तुण्डम्।*
*बृध्दो याति गृहित्वा दण्डं तदपि न मुंचत्याशापिंडम्।।*
शरीर गला जा रहा है, कैसे श्वेत हो गये हैं, दाँत जा चुके हैं, दुर्बलता के कारण लकड़ी के सहारे चलना पड़ता है, इस पर भी वृद्ध आशा का पिंड छोड़ता ही नहीं है। एक वृद्ध की भाँति आचरण करने के स्थान पर भगवान का भजन करो।
*भज गोविंदं भज गोविंदं, गोविंदं भज मूढमते।।*
काम की भोगैषणा सबसे बड़ा दु:ख है।🌷🌹🌹🌹🌹🌹
✡️🔯१९. कुररी पक्षी की भाँति संग्रह करने के स्थान त्याग करते रहो।
२०. बालक से भोलापन, निर्दोषिता ग्रहण करो।
एक निर्धन कुमारी की विवाह के लिए कुछ अतिथि आये। घर में चावल तैयार न थे तो वह मूसल लेकर बैठ गई, किंतु उसने सभी चूड़ियाँ उतार दी, क्योंकि वह चूड़ियाँ रहने देती तो मूसल के शब्द करते समय खनक होती रहती और अतिथि जान जाते कि इस घर में तो चावल तक नहीं है।
इसी प्रकार बस्ती में रहने से कलह-क्लेश होने की संभावना है इसलिए साधु को एकांतवास करना चाहिए।
२१.बाण बनाने वाला लुहार भी मेरा गुरु है। वह अपने काम में इस प्रकार मग्न रहता था कि मार्ग पर से धूमधाम से जाने वाली राजा की सवारी की ओर भी उसका ध्यान नहीं जाता था।
लौकिक का कार्य में तन्मयता के बिना सिद्धि प्राप्त नहीं होती है, तो पारलौकिक कार्य में, ईश्वर की आराधना में तो तन्मयता के बिना सिद्धि मिल ही कैसे पायेगी?ध्याता, ध्यान और ध्येय जब एक स्वरूप हो जाते हैं, तभी जीव कृतार्थ हो सकता है।
🌷💐जय जयश्री राधे🌹🌹🌹🌹🌹
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