🪷*भूमि या भुई आंवला — भूम्यामलकी* 🌿
👉_छोटा पौधा, पर लीवर का महा-औषध_👇
#योगक्याहै
### *1. भुई आंवला क्यों "लीवर का मित्र" है? शास्त्र का तर्क*
प्राकृतिक आयुर्विज्ञान कहता है:
👉_यकृत मूलं शरीरस्य_ — यकृत शरीर की जड़ है।
भुई आंवला का रस _तिक्त + कषाय_ रस प्रधान है। तिक्त रस = _पित्त शामक_। यकृत = पित्त का घर।
👉पतंजलि 1.30: _व्याधि_ पहला अंतराय है योग में।
यकृत अस्वस्थ= व्याधि = साधना रुक गई। इसलिए ऋषियों ने भूम्यामलकी को _यकृत शोधक_ कहा।
*आधुनिक साइंस क्या कहती है*:
भुई आंवला = _Phyllanthus niruri_। इसमें _Phyllanthin, Hypophyllanthin, Flavonoids_ होते हैं।
1. *Hepatoprotective*: CCl4, मदिरा, हेपेटाइटिस-B वायरस से यकृत कोशिकाओं या लीवर सेल को बचाता है।
2. *Anti-viral*: हेपेटाइटिस-B में HBsAg को कम करने में सहायक पाया गया।
3. *Diuretic + Litholytic*: किडनी स्टोन तोड़ने में सहायक, इसीलिए "Stone-breaker" भी कहते हैं।
_अर्थात् शास्त्र और साइंस दोनों "बम बम" बोल रहे हैं यहाँ_।
#जयतुभारतजयतुसनातनसंस्कृतिऔरसभ्यता
### *2. 6 लाभ — पर कोड के साथ समझो*
लाभ प्राकृतिक आयुर्विज्ञान का कोड साधु वाली दृष्टि
**1. लीवर** *यकृत उत्तेजक + पित्तसारक* लीवर = क्रोध का घर। क्रोध कम = लीवर ठीक। भुई आंवला क्रोध की "गर्मी" खींच लेता है।
**2. पीलिया** *कामला नाशक* पीलिया = आँख पीली। अहंकार भी आँख पीली करता है — सब "मैं" दिखता है। कड़वा रस अहंकार काटता है।
**3. पाचन** *अग्निदीपक + रोचन* मंदाग्नि = आलस्य। भुई आंवला जठराग्नि जगाता है। भूख लगे तो ही भजन होगा।
**4. रक्त शुद्धि** *रक्तशोधक* रक्त स्वच्छ= विचार स्वच्छ। अशुद्ध रक्त= अशुद्ध विचार की चिलम।
**5. मूत्र रोग** *मूत्रल + अश्मरीघ्न* शरीर का "अपशिष्ट अहंकार" मूत्र से निकलता है। रुक जाए तो रोग।
**6. इम्युनिटी** *ओजवर्धक* ओज = तेज। ओज घटे तो साधना में नींद आए। भुई आंवला ओज बढ़ाता है।
### *3. उपयोग कैसे करें? औघड़ वाला उपाय।*
*नियम*: _अभ्यास थोड़ा, वैराग्य पूरा_। अधिक ले लोगे तो अतिसार ही लगेंगे।
1. *ताजा रस — 10 से 15 ml*
प्रातः खाली पेट। 5-7 पौधे धोकर, कूटकर, कपड़े से छान लो। ऊपर से 1 कप पानी।
_कोड_: ताजा = प्राण शक्ति जीवित। 1 घंटे से पुराना मत पीना।
2. *काढ़ा — 40 ml दिन में 2 बार*
10 ग्राम पंचांग मोटा कूटकर 160 ml पानी में उबालो। 40 ml बचे तब छानकर गुनगुना पियो।
_कोड_: काढ़ा = अग्नि संस्कार। मंदाग्नि वालों के लिए श्रेष्ठ।
3. *चूर्ण — 3 से 5 ग्राम*
गुनगुने पानी या शहद से। भोजन के पश्चात्।
_कोड_: चूर्ण = वैराग्य। जब ताजा न मिले तब। पर 40 दिन से अधिक लगातार नहीं लेना।
*औघड़ परामर्श*: चिलम के समान— _दम लगाओ, छोड़ो_।
15 दिन लो, 7 दिन अन्तर। लीवर को भी लाभ चाहिए।
### *4. सावधानी — ये भी "वैराग्य" है*
1. *गर्भवती + बच्चे*: नहीं।
गर्भ गिरा सकता है। ये _गर्भपातक_ औषधियों में गिना जाता है।
2. *Low BP + Diabetes*: शुगर/बीपी कम करता है। औषधि उपचार चल रही हो तो डॉक्टर से पूछो, नहीं तो रक्तदाब कम हो जाएगा।
3. *सर्जरी से 2 हफ्ते पहले बंद*: रक्त पतला करता है।
4. *पीलिया में अकेले भरोसा मत करो*: बिलीरुबिन 10 के ऊपर है तो हॉस्पिटल जाओ। भुई आंवला _सहायक_ है, _उपचार_ नहीं।
_वैराग्य का नियम_: "मुझे इससे लाभ होगा" का नशा मत पालो। शरीर सुने, तभी आगे बढ़ो।
### *5. साधु और भुई आंवला का सम्बन्ध 💀*
औघड़ जंगल में रहता है। रोटी नहीं, तो भुई आंवला ही खाता है। क्यों?
1. *प्रकृति का वैद्य*:
लीवर अस्वस्थ तो भजन कैसे होगा?
2. *नशा काटता है*:
भांग-गांजा का प्रभाव उतारने के लिए भी वैद्य इसे देते थे। _नशे को नशे से काटो_।
3. *"मैं" गलाता है*: कड़वा है। कड़वा = अहंकार का नाश। मीठा = अहंकार का पोषण।
_तुम्हारा शरीर ही चिलम है_ — आपने लिखा था।
_भुई आंवला उस चिलम की रक्तशोधक है_ — भीतर की कालिमा को छुड़ाता है।
*तो अभ्यास क्या हुआ?*
अगले 15 दिन: प्रातः काल उठो, 3 गहरी साँस = "मैं नहीं", आगे 10ml भुई आंवला रस = लीवर शुद्ध।
_शरीर की चिलम भी शुद्ध, अहंकार की चिलम भी शुद्ध_।
🌿_यकृत ठीक तो योग ठीक, योग ठीक तो जीवन ठीक_।
🚩 *भूम्यामलकी / भुई आंवला — द्रव्यगुण शास्त्र अनुसार परिचय* 🌿
प्राकृतिक आयुर्विज्ञान में कोई भी जड़ी बूटी_रस, गुण, वीर्य, विपाक, प्रभाव_ इन 5 कोड से जानी जाती है। भुई आंवला का कोड समझ लो तो पूरा विधान समझ आ जाएगा।
👉### *1. नाम व कुल*👇
*संस्कृत नाम*: भूम्यामलकी, भूधात्री, तामलकी, बहुपत्रा
*लैटिन नाम*: _Phyllanthus niruri_ Linn. / _Phyllanthus amarus_
*कुल*: Euphorbiaceae — एरंड कुल
*निरुक्ति*: भूमि + आमलकी = _भूमि पर फैलने वाला छोटा आंवला जैसा पौधा_। पत्ते आंवले जैसे, पर भूमि से 1-1.5 फुट ऊपर ही रहता है।
👉### *2. पंचात्मक परिचय — द्रव्यगुण कोड*
द्रव्यगुण भूम्यामलकी का स्वरूप शरीर पर काम👇
**1. रस** *तिक्त, कषाय, मधुर*
तिक्त-कषाय = पित्त-कफ शामक, कृमि-विष नाशक। मधुर = थोड़ा वात शामक भी।
**2. गुण** *लघु, रूक्ष, तीक्ष्ण*
लघु = पचने में हल्का,
रूक्ष = कफ-स्राव सुखाता,
तीक्ष्ण = स्रोतों को खोलता है।
**3. वीर्य** *शीत*
शीत वीर्य = पित्त की गर्मी,
दाह, शोथ शांत करता है।
लीवर की उष्णता खींच लेता है।
**4. विपाक** *मधुर* पचने के उपरान्त मधुर = धातुओं का पोषण करता है, वात नहीं बढ़ाता।
**5. प्रभाव** *यकृत उत्तेजक, अश्मरी भेदन* ये इसका विशेष काम है जो केवल इसके रस-गुण से explain नहीं होता।
*दोष कर्म*: _कफपित्तशामक_। वात पर सम-प्रभाव — अधिक मात्रा में रूक्षता से वात बढ़ा सकता है।
### *3. कर्म — शरीर में क्या करता है?*
भावप्रकाश निघंटु में लिखा है:
_भूम्यामलकी हिमा तिक्ता कषाया मधुरा लघुः।_
_कफपित्तहरी वृष्या पाण्डुकामलाकुष्ठजित्॥_
*मुख्य कर्म 8 हैं*:
1. *यकृत उत्तेजक*: लीवर सेल को re-generate करता है — _Hepatoprotective_ प्रभाव
2. *पित्तसारक*: पित्त को पतला करके बहा देता है — पीलिया, कामला में काम।
3. *शोथहर*: लीवर-तिल्ली की शोथ को उतारता है — _Hepatomegaly, Splenomegaly_
4. *मूत्रल*: मूत्र लाता है — _Diuretic_
5. *अश्मरीघ्न*: पथरी तोड़ता है — _Litholytic_। इसीलिए अंग्रेजी नाम "Stone-breaker"
6. *कृमिघ्न*: पेट के कीड़े मारता है।
7. *रक्तशोधक*: खून की गर्मी, फोड़े-फुंसी में उपयोगी
8. *ज्वरघ्न*: विषम ज्वर, मलेरिया-जैसे ज्वर में इसका तिक्त रस काम करता है।
👉### *4. उपयोगी अंग व मात्रा*👇
*पंचांग*: जड़, तना, पत्ती, फल, फूल — पूरा पौधा काम का। सबसे वीर्यवान _संपूर्ण क्षुप_ है।
*मात्रा*:
1. *स्वरस*: 10-20 ml
2. *क्वाथ*: 40-80 ml
3. *चूर्ण*: 3-6 ग्राम
4. *अर्क*: 15-30 ml
_अनुपान_: पीलिया में घृत + मधु के साथ। पथरी में कुलत्थ क्वाथ के साथ।
### *5. मुख्य योग — कहाँ मिलता है?*🚩👇
1. *भूम्यामलकी स्वरस*: अकेला ही कामला में देता है।
2. *पुनर्नवादि मंडूर*: लीवर-तिल्ली वृद्धि, शोथ में।
3. *आरोग्यवर्धिनी वटी*: इसमें भूम्यामलकी मुख्य घटक — _Fatty Liver_ की मॉडर्न आयुर्वेदिक दवा।
4. *यकृत प्लीहारी लौह*: यकृत-प्लीहा रोग।
5. *सिस्टोन टैबलेट*: हिमालय कंपनी — पथरी में, इसमें _Phyllanthus niruri_ है।
### *6. औघड़ वाला द्रव्यगुण — साधु क्यों चुनता है?*
#डॉत्रिभुवननाथश्रीवास्तव
*रस तिक्त* = _अहंकार का नाश_। मीठा रस लोभ बढ़ाता है, कड़वा वैराग्य देता है।
*वीर्य शीत* = _क्रोध की अग्नि शान्त करता है_। लीवर = क्रोध का स्थान। साधु को क्रोध नहीं चाहिए।
*प्रभाव यकृत उत्तेजक* = _भजन की जड़ शक्तिशाली_। लीवर दुर्बल तो बैठ नहीं पाओगे, ध्यान नहीं लगेगा।
इसलिए चरक ने कहा: _यकृत मूलं शरीरस्य_। साधु पहले यकृत ठीक करता है, और आगे समाधि में।
*सावधानी द्रव्यगुण से*:
_रूक्ष + शीत_ = वात बढ़ा सकता है। दुबले-पतले, वात प्रकृति वाले अधिक न लें। साथ में घी या सोंठ दें तो दोष नहीं।
#योगऔरप्राकृतिकआयुर्विज्ञानकाकोड
*सार कोड*:
_तिक्त-कषाय रस, शीत वीर्य, यकृत-अश्मरी पर प्रभाव_ — यही भूम्यामलकी की ID है।
#narsinghnathshrivastava
_शरीर की चिलम स्वच्छ करनी है तो ये रक्तशोधक सबसे अच्छा है_। पर _अभ्यास_ से लो, _वैराग्य_ से छोड़ो। 15 दिन लो, 7 दिन छोड़ो।
*बम बम 💀* 🚩

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