महर्षि पतंजलि ने योग सूत्र पर कुल सवा लाख सूत्र कहे थे। जिनका कथन काल आज से 4000 वर्ष पूर्व, काशी स्थान पर माना जाता है। वर्तमान समय में कुल 195 सूत्र ही उपलब्ध हैं। जिन्हें 4 पादों में उपलब्ध कराया गया है, जिनके नाम क्रमशः, समाधि, साधन, कैवल्य और विभूति पाद है।
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गुरुवार, 11 दिसंबर 2025
महर्षि पतंजलि जी और साधन पाद सूत्रों की संक्षिप्त व्याख्या।
महर्षि पतंजलि ने योग सूत्र पर कुल सवा लाख सूत्र कहे थे। जिनका कथन काल आज से 4000 वर्ष पूर्व, काशी स्थान पर माना जाता है। वर्तमान समय में कुल 195 सूत्र ही उपलब्ध हैं। जिन्हें 4 पादों में उपलब्ध कराया गया है, जिनके नाम क्रमशः, समाधि, साधन, कैवल्य और विभूति पाद है।
गुरुवार, 6 नवंबर 2025
मूली और उसका प्रयोग और लाभ
👉👁️👉#मूली और उसका प्रयोग और लाभ 👁️👀👇
कवि घाघ और महर्षि वागभट्ट लोकोक्ति रूप में कहते हैं कि,
🪷प्रातः मूली अमृत समाना, दोपहर मूली मूली।
🪷सायं मूली विष समाना, वैद्य होय सो जानी।।
#डॉत्रिभुवननाथ डॉ त्रिभुवन नाथ श्रीवास्तव, पूर्व प्राचार्य
1. प्रतिदिन प्रातः काल खाने में मूली का सेवन करने से डायबिटीज से शीघ्र मुक्ति मिल सकती है।
2. मूली खाने से प्रतिष्याय रोग में लाभ होता है।इसीलिए मूली को पत्तों सहित कच्चे के रूप में अवश्य खाना चाहिए।
3. प्रतिदिन मूली के ऊपर काला नमक डालकर खाने से भूख न लगने की समस्या समाप्त हो जाती हैं।
4. मूली खाने से हमें विटामिन ए मिलता है।जिससे हमारे दांतो को सुन्दरता और सुदृढ़ता मिलती है।
5. मूली खाने से बाल झड़ने की समस्या समाप्त हो जाती है।
6. सभी प्रकार के अर्श रोग में कच्ची मूली या मूली के पत्तो की सब्जी बनाकर खाना लाभदायक होता है।
7. यदि मूत्र निर्माण का बनना रूक हो जाये तो मूली का रस पीने से मूत्र निर्माण पुनः होने लगता है।
8. प्रतिदिन 1 कच्ची मूली प्रातः काल उठते ही खाने से पीलिया रोग में लाभ मिलता है।
9. यदि आपको भी अम्लीय उदगार (एसिडिक belching)आती हैं, तो मूली के 1 कप रस में अदरक का रस मिलाकर पीने से लाभ मिलता है।
10. नियमित रूप से मूली खाने से मुँह,आंत और किडनी की कैंसर का समस्या नहीं होती है।
11. थकान मिटाने और नींद लाने में भी मूली सहायक है।
12. मोटापा दूर करने के लिए मूली के रस में नींबू और नमक मिलाकर सेवन करें।
13. पायरिया से व्यथित लोग मूली के रस से दिन में 2-3 बार कुल्ले करें और इसका रस पिएं।
14. प्रातः और सायं काल मूली का रस पीने से जीर्ण विबंध (chronic costipation) में भी लाभ होता है।
15. मूली के रस में समान मात्रा में अनार का रस मिलाकर पीने से हीमोग्लोबिन बढ़ता है।
16. मूली को धीरे-धीरे चबाकर खाने से दांत कांतिमान हो जाते हैं, और शरीर से दाग-धब्बे भी दूर हटते हैं।
17. मूली खाने से हमारी आंखों की ज्योति भी बढ़ती है।
18. नियमित रूप से मूली खाने से ब्लड प्रैशर नियंत्रण में रहता है।
19. मूली खाने का सबसे बडा लाभ पेट में गैस तो कदापि ही नही रहती है।
20. हाथ-पैरों के नख का रंग श्वेत हो जाए तो मूली के पत्तों का रस पीना लाभदायक होता है।
21. प्रातः काल मूली के कोमल पत्तों पर सेंधा नमक लगाकर खाने से मुंह की दुर्गंध दूर होती है।
22. मूली के पत्तों में सोडियम होता है, जो हमारे शरीर में नमक की कमी को पूरा करता है।
23. नियमित रूप से मूली खाने से पेट के कीडे नष्ट हो जाते हैं।
24. प्राकृतिक आहार खाएं रोग भगाए।
मंगलवार, 14 अक्टूबर 2025
:#सांख्य योग:
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🎊 *संत ज्ञानेश्वरी गीता*🎊
अध्याय-2 *:#सांख्य योग, श्रीमद् भागवत गीता से।।
सांख्य योग:*
🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿
*संजय उवाच*
*तं तथा कृपयाविष्टं अश्रुपूर्णा कुलेक्षणणम्।*
*विषीदन्तमिदं वाक्यं उवाच मधुसूदन:।।1।।*
🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿
*तदोपरांत संजय ने राजा धृतराष्ट्र से कहा -महाराज ! सुने ।अर्जुन वहां से शोकाकुल होकर रोने लगा ।वहां कुल के सभी लोगों को देखकर उसके मन में महान मोह उत्पन्न हो गया और उसका मन उसी प्रकार द्रवित हो गया, जिस प्रकार जल में नमक घुल जाता है या हवा चलने से बादल छिन्न-भिन्न हो जाते हैं।*
*वह धैर्यवान था फिर भी उसका हृदय द्रवित हो गया।दयाभाव से ओतप्रोत अर्जुन कीचड़ में उलझे राजहंस की भांति म्लान दीखने लगा।*
*उसे इस तरह मोहग्रस्त देखकर भगवान कृष्ण उससे इसप्रकार कहने लगे।*
🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿
*श्री भगवानुवाच*
*कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।*
*अनार्यजुष्टं अस्वर्ग्यं अकीर्तिकरं अर्जुन।।2।।*
🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿
*श्री भगवान बोले हे- अर्जुन! थोड़ा सोचो की इस समरांगण में क्या तुम्हारा ऐसा करना और कहना शोभनीय है ?पहले इस बात का विचार करो कि तुम कौन हो और यह क्या कर रहे हो? तुम्हें आज हुआ क्या है? तुम्हें किस बात की कमी रह गई है? क्या तुम्हारा आरंभ किया हुआ कोई कार्य नष्ट हो गया है? तुम शोक किस लिए कर रहे हो? तुम तो कभी भी ऐसी- वैसी बातों की ओर ध्यान ही नहीं देते और न कभी धैर्य खोते हो ।तुम्हारा तो केवल नाम सुनकर ही अपयश कोसों दूर भाग जाता है। तुम शौर्य के भंडार हो, क्षत्रियों के शिरमौर हो।*
*तुम्हारे पराक्रम का डंका सारे त्रिभुवन में बज रहा है। तुमने युद्ध में साक्षात शंकर पर विजय प्राप्त की है और साढ़े तीन करोड़ निवात कवचों जैसे दैत्यों को जड़ से उखाड़ फेंका और चित्ररथ गंधर्वों का सामना कर उन्हें तुम्हारा यश गान गाने के लिए प्रवृत्त किया।*
*हे अर्जुन !तुम्हारे श्रेष्ठ कार्यों के विस्तार से यह त्रैलोक्य भी छोटा दिखाई देता है ।तुम्हारा पराक्रम इतना उच्च कोटि का और निर्दोष है। वही पराक्रमी, आज तुम समरांगण में अपनी वीरवृत्ति छोड़कर सिर झुकाकर बालकों की भांति रो रहे हो?हे अर्जुन! क्या कभी अंधेरा सूर्य को निगल सकता है?या कभी अमृत को मृत्यु आई है? क्या हवा बादलों से भयभीत है?क्या लकड़ी कभी अग्नि को निगल सकती है?क्या नमक ,पानी को कभी गला सकता है?क्या सांप को कभी मेंढक निगल सकता है?*
*अच्छा,यह बताओ कि क्या गीदड़ ने सिंह के साथ लड़ाई की है?ऐसी विलक्षण बातें क्या कभी संभव हुई है? लेकिन तुमने आज उन सबको सच करके दिखा दिया है, इसलिए हे अर्जुन!तुम इस मोह को अपने पास मत आने दो!मन को संभालकर उसे धीरज देकर सावधान हो जाओ।*
*तुम यह पागलपन छोड़ो। उठो और हाथ में धनुष बाण ले लो ।इस रणभूमि में तुम्हारी यह करुणा निरुपयोगी है ।अर्जुन! तुम तो सब कुछ जानते हो? तो इस समय क्यों नहीं विचार करते !जब युद्ध के लिए सभी तत्पर हो चुके हैं तब क्या युद्ध के समय दया उचित है ?तुम्हारा आज का यह व्यवहार तुम्हारी आज तक अर्जित की हुई कीर्ति को नष्ट करने वाला है तथा परमार्थ को भी बिगाड़ने वाला है।*
🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿
*क्लैब्यं मा स्म गम: पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।*
*क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्वोत्तिष्ठ परंतप।।3।।*
🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿
*श्री कृष्ण फिर बोले -इसलिए हे अर्जुन! तुम शोक मत करो और धैर्य धारण करो। अपने सगे- संबंधियों के सम्बन्ध में दुखी मत होओ। तुम्हारे लिए यह उचित नहीं है। तुमने आज तक जो यश प्राप्त किया है उसका इससे नाश हो जाएगा, इसलिए भाई कम से कम अब तो तुम अपने हित का विचार करो ।युद्ध के समय दीन वृत्ति से काम नहीं चलेगा। ये कौरव क्या आज ही तुम्हारे सम्बन्धी बने हैं? क्या यह बात तुम्हें इससे पहले ज्ञात नहीं थी? या तुम इन स्वगोत्रियों को पहचानते नहीं थे ? तो अब व्यर्थ ही क्यों दुखी हो रहे हो? क्या आज के युद्ध का प्रसंग तुम्हारे जीवन में नया है?*
*अरे, तुम लोगों का पारस्परिक क्लेश नित्य का है । तो आज ही यह क्या हो गया ?यह मोह तुम्हें ना जाने कैसे उत्पन्न हो गया? हे अर्जुन! नि: संदेह तुमने यह अनुचित कार्य किया है । यदि तुम इस मोह में उलझ गए तो आज तक प्राप्त की हुई कीर्ति से तो तो तुम हाथ धो ही बैठोगे, साथ ही परमार्थ से भी तुम वंचित हो जाओगे। तुम्हारे मन की यह दुर्बलता इस समय तुम्हारे लिए कल्याणकारी सिद्ध नहीं होगी। इससे तुम्हें कोई संबंध नहीं रखना चाहिए ।यह दुर्बलता क्षत्रियों के लिए संग्राम में अध:पतन ही है ।इस प्रकार दयालु भगवान अर्जुन को ठीक से समझने लगे, पूरा प्रयत्न कर रहे थे लेकिन इस पर अर्जुन ने क्या कहा ध्यान से सुनिए-*
🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿
*कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन।*
*इषुभि: प्रतियोत्स्यामि पूर्जावरिसूदन।।4।।*
🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃
*अर्जुन ने कहा- हे देव!इतनी सब बातें यहां कहने की कोई आवश्यकता ही नहीं है।मैं क्या कहना चाहता हूं, अल्प उसे सुनिए।इस युद्ध के सम्बन्ध में पहले आप ही विचार कीजिए।यह युद्ध ही नहीं,बल्कि विशुद्ध रूप में बड़ा पाप है।इसमें प्रवृत्त होने पर मुझे बड़ा पाप लगेगा। देखिए,मैं जानता हूं कि माता-पिता की सेवा करना तथा उन्हें सभी प्रकार से संतुष्ट रखना ही हमारा धर्म है।ऐसा होते हुए,उलटे उनको अपने हाथों से बंध कैसे कर सकता हूं?*
*देवता तथा साधु संतों को मुझे प्रणाम करना चाहिए,हो सके तो उनकी पूजा करनी चाहिए, लेकिन यह सब छोड़कर अपने ही मुंह से उनकी निंदा कैसे की जाए?उसी प्रकार हमारे ये गोत्रज एवं कुलगुरु हमारे लिए सदैव पूजनीय रहे हैं।उनमें से भीष्म तथा द्रोणाचार्य से मुझे अधिक लाभ हुआ है। भगवन्! जिनके लिए मैं स्वप्न में भी शत्रुता का भाव नहीं ला सकता, उनका यहां प्रत्यक्ष बध कैसे किया जाए?*
*अब अधोजीवित रहने में नाम की भी शोभा नहीं है। आज तक जिनसे यह विद्या प्राप्त की है, उसका उपयोग उन गुरुओं पर पर ही करना क्या हमारा कर्तव्य है? मैं अर्जुन- द्रोणाचार्य का शिष्य हूं। उन्होंने ही मुझे धनुर्विद्या सिखाई है। इस उपकार के प्रति आभार प्रकट करने के बजाय क्या मैं उनकी हत्या करूं? जिनकी कृपा प्रसाद का वर मुझे प्राप्त करना चाहिए उनसे ही मैं कृतघ्नता करूं, क्या मैं भस्मासुर हूं?*
🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿 🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿।।
*गुरून हत्वा हि महानुभावांछ्रयो भोक्तुं भैक्ष्यमपहीप लोके।*
*हत्वार्थ कामांस्तु गुरूनिहैव भुंजीय भोगान् रुधिरप्रतिग्धान्।।5।।*
🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿
*अर्जुन ने आगे कहा -भगवन !सुना है कि समुद्र बहुत गंभीर है लेकिन इसके विपरीत कि उसकी गंभीरता भी नाम मात्र की है, लेकिन आचार्य द्रोण की ऐस विलक्षण है कि उससे कभी क्षोभ होता ही नहीं।*
*प्रेम -भाव का विचार करते समय माता का नाम मुख्य रूप से सामने आना उचित है, लेकिन द्रोणाचार्य तो प्रत्यक्ष प्रेम ही हैं। करुणा का उद्भव इन्हीं से हुआ है ।यह सभी गुणों के भंडार हैं ।उन्हें विद्या का आसीम सागर ही कहना उचित है।* अर्जुन ने कहा- इन आचार्य का बहुत अधिक महत्व है और इनकी हम लोगों पर विशेष कृपा भी है। अब आप ही बताएं की क्या हम लोग उनकी हत्या करने का विचार भी कभी मन में ला सकते हैं ।यदि मेरे प्राण चले जाएं तब भी मुझे यह विचार कभी अच्छा नहीं लग सकता कि पहले तो युद्ध में मैं ऐसे लोगों की हत्या करूं और राज्य के सुखों को भोगूं।*
*यदि मैं समझू कि सुख -भोगों का महत्व इन आचार्य से बढ़कर है तो विचार इतना भीषण है कि मुझे तो ये सुख भोग दूर ही रहें तो अच्छा है ।इससे अच्छा तो भीख मांग कर निर्वाह कर लेना उचित है, वरन् देश छोड़कर गुफाओं में रहना अच्छा है ।लेकिन इन पर शस्त्र उठाना अनुचित है।*
*हे प्रभु! जिन पहाड़ों पर हाल ही में पानी चढ़ा है उन वनों से उनके हृदयों पर प्रहार करना तब उनके रक्त से सैन भोग प्राप्त करना ऐसे भोग को लेकर कोई क्या करें ऐसा भोग क्या आनंददायी है?इसीलिए यह विचार मुझे नहीं पता भाता।*
*अर्जुन ने तब ये बातें कहकर श्री कृष्ण से पूछा - ये सब बातें आप समझ गए न?*
*उसे अपने मन में इस बात का विश्वास नहीं होता था कि श्रीकृष्ण ने मेरी ये सब बातें ध्यान से सुनी हैं।यह बात ध्यान में आते ही अर्जुन मन में घबराया और पूछा-भगवन्! आप मेरी बातों पर अल्पत:भी ध्यान नहीं देते,इसका क्या कारण है?*
मंगलवार, 23 सितंबर 2025
🪔 #जीवन मंत्र*🪔
🪔 *_जीवन मंत्र..._*🪔
*देवी दुर्गा के नौ रूप और भारतीय नारी की जीवन यात्रा...*
हमारे शास्त्रों और पूजा-पद्धतियों में *अद्भुत वैज्ञानिकता और गहरी जीवन-दृष्टि* छिपी हुई है, जिसका हमें अक्सर आभास भी नहीं होता। देवी दुर्गा के नौ स्वरूप, जिन्हें हम नवरात्रि में पूजते हैं, वस्तुतः *भारतीय नारी के जीवन के नौ चरणों* की यात्रा का प्रतीक हैं। यह यात्रा बाल्यकाल से वृद्धावस्था तक क्रमबद्ध रूप में चलती है। आइए देखें कि किस प्रकार—
1. *शैलपुत्री — पुत्री का रूप*
नारी जीवन का प्रथम चरण है। यह वह अवस्था है जब वह परिवार को हर्ष और आनंद देने वाली, घर की प्यारी सी पुत्री होती है।
2. *ब्रह्मचारिणी — शिक्षा और साधना का रूप*
दूसरे चरण में वह मर्यादा में रहकर, संयमपूर्वक विद्या-अध्ययन में रत एक संस्कारित बालिका के रूप में दिखाई देती है।
3. *चंद्रघंटा — युवती का रूप*
यह वह समय है जब नारी विद्या अर्जित कर चुकी होती है। आत्मविश्वास और स्वाभिमान से भरी हुई एक महत्वाकांक्षी युवती के रूप में वह जीवन के नए स्वप्नों और आकांक्षाओं को संजोती है।
4. *कूष्मांडा — गृहिणी का रूप*
विवाह के उपरान्त नारी अपने स्नेह और ऊष्मा से पति के घर को आलोकित करती है। तेजस्विनी गृहलक्ष्मी बनकर वह पूरे परिवार को प्रेम और ऊर्जा से भर देती है।
5. *स्कंदमाता — मातृत्व का रूप*
यह जीवन का वह चरण है जब वह संतान को जन्म देती है और उसे पालन-पोषण कर संवारती है। उसका अस्तित्व अब केवल स्वयं तक सीमित न रहकर मातृत्व में विलीन हो जाता है।
6. *कात्यायिनी — परिवार की आधारशिला*
षष्ठम रूप में वह परिवार के सुख और अनुशासन की सूत्रधार बनती है। ममतामयी माँ के साथ-साथ वह परिवार को एक सूत्र में बाँधने वाली, बुद्धिमती और संतुलित नारी का स्वरूप ग्रहण करती है।
7. *कालरात्रि (महाकाली) — संकटमोचन रूप*
यह नारी जीवन का वह चरण है जो साधारणतः सुप्त रहता है, किंतु आवश्यकता पड़ने पर प्रकट होता है। जब परिवार या समाज पर संकट आता है तो वही नारी शस्त्र उठाकर दुष्टों का संहार करने में सक्षम होती है। यह उसका रौद्र रूप है।
8. *महागौरी — परिपक्व प्रौढ़ा स्त्री का रूप*
यह नारी का शांत, धवल, करुणामयी और आध्यात्मिक रूप से परिपक्व स्वरूप है। इस अवस्था में वह अपने परिश्रम, अनुभव और स्नेह से परिवार को निरंतर नई समृद्धि की ओर अग्रसर करती है।
9. *सिद्धिदात्री — ममतामयी वृद्ध नारी का रूप*
जीवन का अंतिम चरण वह है जब नारी अपने अनुभव और ज्ञान से परिवार को लाभान्वित करती है। दादी-नानी के रूप में वह अपने आशीर्वाद और मार्गदर्शन से परिवार को भांति-भांति की सिद्धियों का वरदान प्रदान करती है इसलिए इसे सिद्धिदात्री कहते हैं।
*नारी और शक्ति का संबंध* 🚩
यहाँ एक और महत्वपूर्ण तथ्य उल्लेखनीय है *भारतीय नारी अबला नहीं है*। देवी के नौ में से *आठ रूपों के हाथों में शस्त्र* हैं। 🔱यह इस बात का प्रतीक है कि नारी सदैव आत्मरक्षा और दुष्टों के संहार हेतु तत्पर रहती है। केवल ब्रह्मचारिणी के हाथ में कोई अस्त्र नहीं है, क्योंकि उस समय वह शिक्षा और साधना में लीन है।
*निष्कर्ष:* नवरात्रि केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं, वरन् भारतीय जीवन-दर्शन का गहन उदाहरण है। देवी दुर्गा के नौ स्वरूप हमें बताते हैं कि नारी जीवन का प्रत्येक चरण त्याग, ममता, संघर्ष और जिजीविषा से पूर्ण है।
*संदेश*- प्राचीन भारत में नारी को देवी के रूप में प्रतिष्ठित किया गया था। नवरात्रि हमें यह संदेश देती है कि नारी तभी अपनी महत्ता प्राप्त कर सकती है, जब वह अपने मूल संस्कारों और जीवन-मूल्यों से जुड़ी रहे। दुर्गा पूजा में पुरुषों के लिए भी यह सन्देश निहित है कि बालिका से लेकर वृद्ध महिला तक *नारी के प्रत्येक स्वरुप का सम्मान* कर के ही पुरुष, उसका परिवार और सम्पूर्ण समाज शक्ति व समृद्धि प्राप्त कर सकते हैं।🛕
🪔 *_Mantra de vida..._*🪔 _Las nueve formas de la Diosa Durga y el viaje de la mujer india..._ 🌺 En nuestros shastras y prácticas de adoración hay _una asombrosa cientificidad y una profunda visión de la vida_ escondidas, de las cuales a menudo no somos conscientes. Las nueve formas de la Diosa Durga, a quienes adoramos en Navratri, son en realidad _símbolos de las nueve etapas de la vida de la mujer india_. Este viaje se desarrolla en orden desde la infancia hasta la vejez. Veamos cómo—
1. _Shailputri — La forma de hija_ La primera etapa de la vida de una mujer. Es esa fase en la que ella es la hija querida de la familia, que trae alegría y felicidad.
2. _Brahmacharini — La forma de educación y sadhana_ En la segunda etapa, aparece como una niña culta, que estudia con moderación y disciplina.
3. _Chandraghanta — La forma de joven_ Es ese tiempo cuando la mujer ha adquirido educación. Llena de confianza y orgullo, como una joven ambiciosa, ella acaricia nuevos sueños y aspiraciones de la vida.
4. _Kushmanda — La forma de ama de casa_ Después del matrimonio, la mujer ilumina la casa del esposo con su amor y calidez. Como una radiante Gृहलक्ष्मी, ella llena a toda la familia de amor y energía.
5. _Skandamata — La forma de maternidad_ Esta es esa etapa de la vida cuando ella da a luz a un hijo y lo cría. Su existencia ahora ya no se limita solo a ella, se funde en la maternidad.
6. _Katyayani — La base de la familia_ En la sexta forma, ella se convierte en la sostenedora de la felicidad y la disciplina de la familia. Junto con ser una madre cariñosa, ella asume la forma de una mujer inteligente y equilibrada que une a la familia con un hilo.
7. _Kaalratri (Mahakali) — La forma de destructora de crisis_ Esta es esa etapa de la vida de la mujer que normalmente permanece latente, pero se manifiesta cuando es necesario. Cuando la familia o la sociedad enfrenta una crisis, esa mujer es capaz de tomar armas y destruir a los malvados. Esta es su forma feroz.
8. _Mahagauri — La forma de mujer madura_ Esta es la forma tranquila, blanca, misericordiosa y espiritualmente madura de la mujer. En esta etapa, con su trabajo duro, experiencia y amor, ella continuamente lleva a la familia hacia una nueva prosperidad.
9. _Siddhidatri — La forma de mujer anciana cariñosa_ La etapa final de la vida es cuando la mujer beneficia a la familia con su experiencia y conocimiento. En la forma de abuela, con sus bendiciones y guía, ella otorga diversos tipos de siddhis a la familia, por eso se le llama Siddhidatri.
_La relación entre mujer y poder_ 🚩 Aquí hay otro hecho importante digno de mención _la mujer india no es abala_. De las nueve formas de la Diosa, _ocho tienen armas en sus manos_. 🔱 Esto simboliza que la mujer siempre está preparada para la autodefensa y la destrucción de los malvados. Solo Brahmacharini no tiene armas, porque en ese momento ella está absorta en la educación y la sadhana.
_Conclusión:_ Navratri no es solo un ritual religioso, sino un profundo ejemplo de la filosofía de vida india. Las nueve formas de la Diosa Durga nos dicen que cada etapa de la vida de una mujer está llena de sacrificio, cariño, lucha y voluntad de vivir.
_Mensaje:_ En la antigua India, la mujer fue venerada como una diosa. Navratri nos da el mensaje de que la mujer puede alcanzar su grandeza solo cuando permanece conectada con sus valores culturales y principios de vida básicos. En la adoración a Durga también hay un mensaje para los hombres: solo _respetando cada forma de la mujer_, desde la niña hasta la anciana, el hombre, su familia y toda la sociedad pueden obtener poder y prosperidad. 🛕
शनिवार, 23 अगस्त 2025
* #प्राकृतिक चिकित्सा और आयुर्वेद में त्रिदोषों का महत्व*
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* प्राकृतिक चिकित्सा और आयुर्वेद में त्रिदोषों का महत्व*
*परिचय- आयुर्वेद के अनुसार किसी भी प्रकार के रोग होने के 3 कारण होते हैं-*
*1. वात:- शरीर में वायु बनना।*
*2. पित्त:- शरीर के ताप का बढ़ना।*
*3. कफ:- शरीर में कफ दोष बन श्लेष्मा वृद्धि होना।*
*नोट:- किसी भी रोग के होने का कारण एक भी हो सकता है और दो भी हो सकता है या दोनों का मिश्रण भी हो सकता है या तीनों दोषों के कारण भी रोग हो सकता है।*जिन्हें प्रकृति की वृद्धि अनुसार दोष कहा गया है। इस दोषज प्रकृति दोष कम या अधिक तीनों का ही मिश्रण होता है। जो दोष अधिक मात्रा में होता है उसे उसी नाम से जाना जाता है।
*1. प्राकृतिक चिकित्सा सिद्धान्त अनुसार वात होने का कारण*
अनुचित असंतुलित भोजन, बेसन, मैदा, मैदा जैसा आटा तथा अधिक दालों का सेवन करने से शरीर में वात दोष प्रकुपित हो रोग उत्पन्न हो जाता है।दूषित भोजन, अधिक मांस का सेवन तथा बर्फ का सेवन करने के कारण वात दोष उत्पन्न हो जाता है।
आलस्य पूर्वक जीवन, सूर्यस्नान, तथा व्यायाम की कमी के कारण पाचन क्रिया दुर्बल हो जाती है जिसके कारण वात दोष उत्पन्न हो जाता है।
इन सभी कारणों से उदर में विबंध हो (दूषित वायु) बनने लगती है और यही वायु शरीर में जहां भी रुकती है, फंसती है या टकराती है, वहां शूल उत्पन्न होता है। यही शूल वात दोष कहलाता है।
*2. पित्त होने का कारण*
पित्त दोष होने का कारण मूल रुप से अनुचित भोजन शैली है जैसे- चीनी, नमक तथा मिर्चमसाले का अधिक सेवन करना।
मद कारक चीजों तथा दवाईयों का अधिक सेवन करने के कारण पित्त दोष उत्पन्न होता है।
दूषित भोजन तथा अधिक पके हुए भोजन का सेवन ही अधिक मात्रा में करने से पित्त दोष उत्पन्न होता है।
भोजन में कम से कम 75 से 80 प्रतिशत क्षारीय पदार्थ (फल, सब्जियां, अंकुरित इत्यादि अपक्वाहार) तथा 20 से 25 प्रतिशत अम्लीय पक्वाहार पदार्थ होने चाहिए। जब इसके विपरीत स्थिति होती है तो शरीर में अम्लता बढ़ जाती हैं और पित्त दोष उत्पन्न हो जाता है। इस तथ्य पर प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति में सौ प्रतिशत बल दिया जाता है।
*3. कफ दोष होने का कारण*
तेल, मक्खन तथा घी आदि वसा युक्त चीजों को पचाने के लिए अधिक कार्य करने तथा व्यायाम की आवश्यकता होती है और जब इसका अभाव होता है तो पाचनक्रिया कम हो जाती है और पाचनक्रिया की क्षमता से अधिक मात्रा में वसा युक्त खाद्य वाली वस्तुएं सेवन करते है तो कफ दोष उत्पन्न हो जाता है।
रात के समय में छाछ, दही और गरिष्ठ भोजन का सेवन करने से कफ दोष उत्पन्न हो जाता है।
*वात, पित्त और कफ के कारण होने वाले रोग निम्नलिखित हैं-*
*वात के कारण होने वाले रोग*
अफारा, टांगों में दर्द, पेट में वायु बनना, जोड़ों में दर्द, लकवा, साइटिका, शरीर के अंगों का सुन्न हो जाना, शिथिल होना, कांपना, फड़कना, टेढ़ा हो जाना, दर्द, नाड़ियों में खिंचाव, कम सुनना, वात ज्वर तथा शरीर के किसी भी भाग में अचानक दर्द हो जाना आदि।
*पित्त के कारण होने वाले रोग*
उदर, वक्ष, शरीर आदि में दाह होना, अम्लीय उदगार आना, पित्ती उछलना (आर्टिकरिया एलर्जी), रक्ताल्पता , चर्म रोग (कण्डू , स्फोटक तथा पीडिका आदि), कुष्ठरोग, यकृत के रोग, प्लीहा ग्रन्थि की वृद्धि हो जाना, शरीर में दुर्बलता आना, वृक्क तथा हृदय के रोग आदि।
*कफदोष के कारण होने वाले रोग*
कई बार कास व नासिका मार्ग से श्लेष्मा निकलना, शीत लगना, श्वसन संस्थान सम्बंधी रोग (कास, श्वास आदि रोग), शरीर का फूलना, शरीर में मेद बढ़ना, प्रतिष्याय होना तथा फेफड़ों की टी.बी. आदि।
*वात से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार*
*भोजन चिकित्सा*
वात से पीड़ित रोगी को अपने भोजन में छिलका युक्त भोजन (बिना पकाया हुआ भोजन) फल, सलाद तथा पत्तेदार सब्जियों का अधिक प्रयोग करना चाहिए।
मुनक्का अंजीर, बेर, अदरक, तुलसी, गाजर, सोयाबीन, सौंफ तथा छोटी इलायची का भोजन में अधिक उपयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग शीघ्र ही ठीक हो जाता है।
रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन प्रातः के समय में लहसुन की 2-4 कलियां बिना दांतों से काटे खानी चाहिए तथा अपने भोजन में मक्खन का उपयोग करना चाहिए इसके फलस्वरूप वात रोग शीघ्र ही ठीक हो जाता है।
*उपवास*
वात रोग से पीड़ित रोगी को सबसे पहले कुछ दिनों तक सब्जियों या फलों का रस पीकर उपवास रखना चाहिए तथा इसके उपरान्त अन्य चिकित्सा करनी चाहिए।
*पित्त से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार*
*भोजन चिकित्सा*
पित्त रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन सब्जियों तथा फलों का रस पीना चाहिए।
पित्त रोग से पीड़ित रोगी को भूख न लग रही हो तो केवल फलों का रस तथा सब्जियों का रस पीना चाहिए और सलाद का अपने भोजन में उपयोग करना चाहिए। जिसके फलस्वरूप उसका रोग शीघ्र ही ठीक हो जाता है।
रोगी व्यक्ति को पूर्णतः स्वस्थ होने तक बिना पका हुआ भोजन करना चाहिए।
पित्त रोग से पीड़ित रोगी को अम्लीय, मसालेदार, नमकीन चीजें तथा मिठाईयां नहीं खानी चाहिए क्योंकि इन चीजों के सेवन से पित्त रोग और बिगड़ जाता है।
पित्त के रोगी के लिए गाजर का रस पीना लाभकारी होता है, इसलिए रोगी को प्रतिदिन प्रातः काल और सायंकाल के समय में कम से कम 1 गिलास गाजर का रस पीना चाहिए।
अनार, मुनक्का, अंजीर, जामुन, सिंघाड़ा, सौंफ तथा दूब का रस पीना पित्त रोगी के लिए बहुत ही लाभकारी होता है।
पित्त रोग से पीड़ित रोगी को सुबह के समय में लहसुन की 2-4 कलियां बिना दांतों से काटे खाने से बहुत लाभ मिलता है।
सोयाबीन तथा गाजर का सेवन प्रतिदिन करने से वात रोग शीघ्र ही ठीक होने लगता है।
*कफ से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार*
भोजन चिकित्सा*
कफ के रोग से पीड़ित रोगी को प्राकृतिक चिकित्सा काल के समय सबसे पहले अधिक वसा वाले पदार्थ, दूषित भोजन, तली-भुनी खाद्य पदार्थ आदि का सेवन नहीं करना चाहि क्योंकि इन चीजों का उपयोग कफ रोग में अधिक ही हानिकारक रहता है।
कफ से पीड़ित रोगी को दूध तथा दही वाले पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इन चीजों के सेवन से रोगी की स्थिति और भी गंभीर हो जाती है।
कफ रोग से पीड़ित रोगी को दूध नही पीना चाहिए और यदि उसका मन दूध पीने को करता है तो दूध में अदरख या सोंठ चूर्ण डालकर सेवन करना चाहिए।
कफ रोग से पीड़ित रोगी को ताजे आंवले का रस प्रतिदिन प्रातः के समय में पीना चाहिए जिसके फलस्वरूप उसका रोग शीघ्र ठीक हो जाता है। यदि आंवले का रस न मिल रहा हो तो सूखे आंवले को चूसना चाहिए।
मुनक्का, कच्ची पालक, अंजीर तथा अमरूद का सेवन कफ रोग में अधिक लाभदायक होता है।
अदरक, तुलसी, अंजीर तथा सोयाबीन का कफ रोग में प्रयोग करने से रोगी को अच्छा लाभ मिलता है।
लहसुन तथा शहद का प्रयोग भी कफ रोग में लाभदायक होता है और इससे रोगी का कफ रोग शीघ्र ही ठीक हो जाता है।
सोमवार, 4 अगस्त 2025
अपामार्ग या लटजीरा या चिरचिटा या #chafftree,::::::::::::
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#अपामार्ग या लटजीरा या चिरचिटा या #chafftree,::::::::::::
यह पौधा पेट की लटकती त्वचा, वसा, सड़े हुए दाँत, गठिया, अस्थमा, अर्श रोग, मेदोवृद्धि, केश पालित्य, वृक्क या किडनी रोग आदि 20 रोगों के लिए किसी वरदान से कम नही,,,
आज हम जानते हैं इसके सम्बन्ध में नीचे दिए गए विवरण से,,,,,
अपामार्ग का वानस्पतिक परिचय:
- वानस्पतिक नाम: अचिरांथेस एस्पेरा (Achyranthes aspera)।
- परिवार: ऐमारेन्थेसी (Amaranthaceae)।
- सामान्य नाम: अपामार्ग, चिरचिटा, लटजीरा, प्रिकली चैफ फ्लावर।
- पौधे का प्रकार: वार्षिक जड़ी-बूटी।
- ऊंचाई: 2 मीटर तक।
- तने: कोणीय, सरल, धारीदार, बैंगनी रंग के।
- पत्तियां: अंडाकार, बारीक रूप से जुड़ी हुई, दोनों ओर से।
- फूल: हरे-श्वेत रंग के।
- बीज: लाल-भूरे रंग के, उप-बेलनाकार, आधार पर गोल।
- उपयोग: औषधीय, विशेष रूप से प्राकृतिक चिकित्सा, आयुर्वेद, यूनानी और होम्योपैथी में।
- अन्य महत्वपूर्ण तथ्य:
- अपामार्ग में श्लेष्मा वृद्धि या कफ को कम करने, शोथ रोधी, मधुमेहरोधी, और गर्भपातरोधी गुण होते हैं।
- इसका उपयोग क्षार बनाने के लिए भी किया जाता है।
- यह पौधा भारत में व्यापक रूप से पाया जाता है और इसका उपयोग विभिन्न प्रकार के रोगों के उपचार के लिए किया जाता है।
- इसके बीजों को कपड़ों में चिपकने और निकालने में कठिनाई होने के कारण इसे विशेष माना जाता है। वानस्पतिक गुण के अनुसार।
आज हम आपको ऐसे पौधे के सम्बन्ध में बताएँगे जिसका तना, पत्ती, बीज, फूल, और जड़ पौधे का हर भाग औषधि है, इस पौधे को अपामार्ग या चिरचिटा (Chaff Tree), लटजीरा कहते है। अपामार्ग या चिरचिटा (Chaff Tree) का पौधा भारत के सभी सूखे क्षेत्रों में उत्पन्न होता है यह गांवों में अधिक मिलता है खेतों के आसपास घास के साथ प्रायः पाया जाता है इसे साधारण बोलचाल की भाषा में आंधीझाड़ा या चिरचिटा (Chaff Tree) भी कहते हैं-अपामार्ग की ऊंचाई लगभग 60 से 120 सेमी होती है, प्रायः लाल और श्वेत दो प्रकार के अपामार्ग देखने को मिलते हैं-श्वेत अपामार्ग के डंठल व पत्ते हरे रंग के, भूरे और श्वेत रंग के धब्बे युक्त होते हैं इसके अतिरिक्त फल चपटे होते हैं जबकि लाल अपामार्ग (RedChaff Tree) का डंठल लाल रंग का और पत्तों पर लाल-लाल रंग के धब्बे होते हैं।
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| अपामार्ग का पौधा |
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| अपामार्ग का पौधा |
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| अपामार्ग का पौधा |
इस पर बीज नुकीले कांटे के समान लगते है इसके फल चपटे और कुछ गोल चावल के समान होते हैं दोनों प्रकार के अपामार्ग के गुणों में समानता होती है। श्वेत अपामार्ग(White chaff tree) श्रेष्ठ माना जाता है इनके पत्ते गोलाई लिए हुए 1 से 5 इंच लंबे होते हैं चौड़ाई आधे इंच से ढाई इंच तक होती है- पुष्प मंजरी की लंबाई लगभग एक फुट होती है, जिस पर फूल लगते हैं, फल शीतकाल में लगते हैं और गर्मी में पककर सूख जाते हैं इनमें से चावल के दानों के समान बीज निकलते हैं इसका पौधा वर्षा ऋतु में उत्पन्न होकर गर्मी में सूख जाता है।
अपामार्ग तीखा, कडुवा तथा प्रकृति में उष्ण होता है। यह पाचनशक्तिवर्द्धक, विरेचक (पतले मल लाने वाला), रुचिकारक, शूल-निवारक, विष, कृमि व अश्मरी नाशक, रक्तशोधक (रक्त को शुद्ध करने वाला), ज्वरनाशक, श्वास रोग नाशक, क्षुधा को नियंत्रित करने वाला होता है तथा सुखपूर्वक प्रसव हेतु एवं गर्भधारण में उपयोगी है।
अपामार्ग या चिरचिटा (Chaff Tree) के 20 अद्भुत लाभ :
1. Rhematoid arthritis या गठिया रोग :
अपामार्ग (चिचड़ा) के पत्ते को पीसकर, गर्म करके सन्धि शूल स्थान या गठिया में बांधने से शूल व शोथ दूर होती है।
2. पित्त की अश्मरी या गालब्लैडर स्टोन:
पित्त की पथरी में चिरचिटा की जड़ आधा से 10 ग्राम कालीमिर्च के साथ या जड़ का काढ़ा कालीमिर्च के साथ 15 ग्राम से 50 ग्राम की मात्रा में प्रातः-सायं- खाने से पूरा लाभ होता है। काढ़ा यदि गर्म-गर्म ही पिएं तो लाभ होगा।
3. यकृत का बढ़ना या हेपेटाइटिस :
अपामार्ग का क्षार मठ्ठे के साथ एक चुटकी की मात्रा से बच्चे को देने से बच्चे की यकृत रोग मिट जाते हैं।
4. पक्षाघात या पैरालिसिस (लकवा) :
एक ग्राम कालीमिर्च के साथ चिरचिटा की जड़ को दूध में पीसकर नाक में टपकाने से पक्षाघात ठीक हो जाता है।
5. उदर वृद्धि होना या उदर त्वचा लटकना :
चिरचिटा (अपामार्ग) की जड़ 5 ग्राम से लेकर 10 ग्राम या जड़ का काढ़ा 15 ग्राम से 50 ग्राम की मात्रा में प्रातः-सायं कालीमिर्च के साथ खाना खाने से पहले पीने से आमाशय का ढीलापन में कमी आकर पेट का आकार कम हो जाता है।
6. अर्श रोग या हीमोरॉइड्स या पाइल्स :
अपामार्ग की 6 पत्तियां, कालीमिर्च 5 नग को जल के साथ पीस छानकर प्रातः-सायं सेवन करने से अर्श रोग में लाभ हो जाता है और उसमें बहने वाला रक्त रुक जाता है।
रक्त अर्श पर अपामार्ग की 10 से 20 ग्राम जड़ को चावल के पानी के साथ पीस-छानकर 2 चम्मच मधु मिलाकर पिलाना गुणकारी हैं।
7. मेदोवृद्धि या ओबेसिटी:
अधिक भोजन करने के कारण जिनका शारीरिक भार बढ़ रहा हो, उन्हें भूख कम करने के लिए अपामार्ग के बीजों को चावलों के समान भात या खीर बनाकर नियमित सेवन करना चाहिए। इसके प्रयोग से शरीर की वसा धीरे-धीरे कम होने लगेगी।
8. शारीरिक दुर्बलता :
अपामार्ग के बीजों को भूनकर इसमें बराबर की मात्रा में मिश्री मिलाकर पीस लें। 1 कप गौ दुग्ध के साथ 2 चम्मच की मात्रा में प्रातः-सायं नियमित सेवन करने से शरीर में पुष्टता आती है।
9. सिर शूल:
अपामार्ग की जड़ को पानी में घिसकर बनाए गए लेप को मस्तक पर लगाने से सिर शूल दूर होता है।
10. संतान प्राप्ति हेतु:
अपामार्ग की जड़ के चूर्ण को एक चम्मच की मात्रा में दूध के साथ मासिक-स्राव के उपरान्त नियमित रूप से 21 दिन तक सेवन करने से गर्मधारण होता है। दूसरे प्रयोग के रूप में ताजे पत्तों के 2 चम्मच रस को 1 कप दूध के साथ मासिक-स्राव के उपरान्त नियमित सेवन से भी गर्भ स्थिति की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।
11. विषम ज्वर या मलेरिया :
अपामार्ग के पत्ते और कालीमिर्च बराबर मात्रा में लेकर पीस लें, उपरान्त इसमें थोड़ा-सा गुड़ मिलाकर मटर के दानों के बराबर की गोलियां बना लें। जब मलेरिया फैल रहा हो, उन दिनों एक-एक गोली प्रातः-सायं भोजन के उपरान्त नियमित रूप से सेवन करने से इस ज्वर का शरीर पर आक्रमण नहीं होगा। इन गोलियों का दो-चार दिन सेवन पर्याप्त होता है, साथ साथ जबतक ज्वर रहे गर्म पानी ही पीना है।
12. पालित्य रोग या गंजापन :
सरसों के तेल में अपामार्ग के पत्तों को जलाकर एकरस कर लें और लेप बना लें। इसे गंजे स्थानों पर नियमित रूप से लेप करते रहने से पुन: बाल उगने की संभावना होती है।
13. दंतशूल और दंत गुहा या खाँच ( डेंटल कैविटी) :
इसके 2-3 पत्तों के रस में रूई को भिगोकर गोल बनाकर दांतों में लगाने से दांतों के शूल में लाभ पहुंचता है तथा पुरानी से पुरानी दंत गुहा या खाँच को भरने में सहायता करता है।
14. कण्डू या स्केबीज :
अपामार्ग के पंचांग (जड़, तना, पत्ती, फूल और फल) को पानी में उबालकर काढ़ा बनाएं और इससे स्नान करें। नियमित रूप से स्नान करते रहने से कुछ ही दिनों त्वचा से कण्डू दूर जाएगी।
15. अर्ध कपारी या अर्ध सिर शूल में :
इसके बीजों के चूर्ण को सूंघने मात्र से ही अर्ध कपारी, मस्तक की जड़ता में लाभ मिलता है। इस चूर्ण को सुंघाने से मस्तक के अंदर एकत्रित हुआ श्लेष्मा तनु या पतला होकर नाक के द्वारा निकल जाता है और वहां पर उत्पन्न हुए कृमि भी निकल जाते हैं।
16. जीर्ण कास या ब्रोंकाइटिस :
जीर्ण कास विकारों और वायु प्रणाली दोषों में अपामार्ग (चिरचिटा) की क्षार, पिप्पली, अतीस, कुपील, देशी गाय का घृत और मधु के साथ प्रातः-सायं सेवन करने से वायु प्रणाली शोथ (ब्रोंकाइटिस) में पूर्ण लाभ मिलता है।
17. कास :
कास बार-बार पीड़ित करती हो, कफ निकलने में कष्ट हो, कफ गाढ़ा व लेसदार हो गया हो, इस अवस्था में या न्यूमोनिया की अवस्था में आधा ग्राम अपामार्ग क्षार व आधा ग्राम शर्करा दोनों को 30 मिलीलीटर गर्म पानी में मिलाकर प्रातः-सायं सेवन करने से 7 दिन में अधिकांश में लाभ होता है।
18. वृक्क का शूल:
अपामार्ग (चिरचिटा) की 5-10 ग्राम ताजी जड़ को पानी में पीसकर रस बनाकर पिलाने से बड़ा लाभ होता है। यह औषधि मूत्राशय कीपीड़ा का प्रमुख कारण अश्मरी को टुकड़े-टुकड़े करके निकाल देती है। वृक्क के पीड़ा के लिए यह प्रधान औषधि है।
19. वृक्क या किडनी के रोग :
5 ग्राम से 10 ग्राम चिरचिटा की जड़ का काढ़ा 1 से 50 ग्राम प्रातः-सायं मुलेठी, गोखरू और पाठा के साथ खाने से वृक्क की अश्मरी या किडनी स्टोन समाप्त हो जाती है या 2 ग्राम अपामार्ग (चिरचिटा) की जड़ को पानी के साथ पीस लें। इसे प्रतिदिन पानी के साथ प्रातः- सायं पीने से अश्मरी रोग ठीक होता है।
20. तमक श्वास या अस्थमा :
चिरचिटा की जड़ को किसी लकड़ी की सहायता से मिट्टी हटाकर निकाल लेना चाहिए। ध्यान रहे कि जड़ में लोहा नहीं छूना चाहिए। इसे सुखाकर पीस लेते हैं। यह चूर्ण लगभग एक ग्राम की मात्रा में लेकर मधु के साथ खाएं इससे श्वास रोग का निर्मूलन सम्भव हो जाता है।
अपामार्ग (चिरचिटा) का क्षार 0.24 ग्राम की मात्रा में पान में रखकर खाने अथवा 1 ग्राम मधु में मिलाकर चाटने से छाती पर एकत्रित श्लेष्मा या कफ को हटाकर श्वास रोग नष्ट करता है।
#डॉ त्रिभुवन नाथ श्रीवास्तव, पूर्व प्राचार्य, विवेकानंद योग प्राकृतिक चिकित्सा महाविद्यालय एवम् चिकित्सालय, बाजोर, सीकर, राजस्थान।
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शुक्रवार, 27 जून 2025
रामायण के अनुसार,नारी आभूषण क्यों पहनती हैं..? 🌹
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*🛕जय श्री राम🙏*
*_🌹रामायण के अनुसार,नारी आभूषण क्यों पहनती हैं..? 🌹_*
*_जनकसुता जग जननि जानकी।_*
*_अतिसय प्रिय करुनानिधान की॥_*
*_ताके जुग पद कमल मनावउँ।_*
*_जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ॥_*
*_भावार्थ:- राजा जनक की पुत्री,जगत की माता और करुणा निधान श्री रामचन्द्रजी की प्रियतमा श्री जानकी जी के दोनों चरण कमलों को मैं मनाता हूँ,जिनकी कृपा से निर्मल बुद्धि पाऊँ॥_*
*_भगवान राम ने धनुष तोड़ दिया था, सीताजी को अग्नि की सात प्रदक्षिणा लेने के लिए श्रृंगार किया जा रहा था- तो वह अपनी मां से प्रश्न पूछ बैठी...!_*
स्त्रियों द्वारा धारण किए जाने वाले आभूषणों के सम्बन्ध में प्रामाणिक श्लोक इस प्रकार से मिलते है:
"पादाङ्गदं जानुकाञ्चीकटिसूत्रं नूपुरार्द्धहाराङ्गुलीयक्मेखलाः।
कर्णावतंसं केयूरकं चन्द्रहारं बिभ्रती नारीव विविधानि भूपणानि।।"
इस श्लोक में स्त्रियों द्वारा पहने जाने वाले विभिन्न आभूषणों का वर्णन किया गया है, जिनमें सम्मिलित हैं:
1. पादाङ्गद (पैरों के आभूषण)
2. जानुकाञ्ची (घुटनों के आभूषण)
3. कटिसूत्र (कमर के आभूषण)
4. नूपुर (पैरों के घुंघरू)
5. अर्द्धहार (हार)
6. अङ्गुलीयक (अंगूठी)
7. मेखला (कटि भाग पर बांधने वाला)
8. कर्णावतंस (कानों के आभूषण)
9. केयूरक (बाहु बंद)
10. चन्द्रहार (हार)
विवाह समय स्त्रियों द्वारा धारण किए जाने वाले आभूषणों के सम्बन्ध में एक प्रमाणित श्लोक है:
"सिन्दूरं सौभाग्यलक्ष्मीं ददाति,
मंगलसूत्रं मङ्गलमेव ददाति।
नथनी चन्द्रं शीतलं ददाति,
केयूरं सौन्दर्यमेव ददाति।।"
यह श्लोक विभिन्न आभूषणों के महत्व को दर्शाता है, जिनमें सम्मिलित हैं:
1. सिन्दूर (विवाह का चिन्ह)
2. मंगलसूत्र (विवाह का प्रतीक)
3. नथनी (नाक की बाली)
4. केयूर (बाहु बंद)
इसके अतिरिक्त, विवाह समय स्त्रियों द्वारा धारण किए जाने वाले अन्य आभूषणों में सम्मिलित हैं:
- मेहंदी
- बिंदी
- चूड़ियाँ
- हार
- कानों के आभूषण
यह श्लोक विभिन्न ग्रंथों में पाया जा सकता है, जिनमें से एक है "भारतीय संस्कृति कोश"। विवाह समय स्त्रियों द्वारा धारण किए जाने वाले आभूषणों के सम्बन्ध में अन्य प्रमाण हैं:
1. *मनुस्मृति*: इसमें विवाह के अवसर पर स्त्रियों द्वारा धारण किए जाने वाले आभूषणों का वर्णन विस्तार से किया गया है।
2. *कामसूत्र*: इसमें भी विवाह के अवसर पर स्त्रियों की श्रृंगार और आभूषणों का वर्णन मिलता है।
3. *भारतीय संस्कृति कोश*: जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, इसमें विवाह समय स्त्रियों द्वारा धारण किए जाने वाले आभूषणों के सम्बन्ध में विस्तृत वर्णन है।
4. *वेद और पुराण*: इन ग्रंथों में भी विवाह के अवसर पर स्त्रियों द्वारा धारण किए जाने वाले आभूषणों का उल्लेख है।
5. *अन्य प्राचीन ग्रंथ*: जैसे कि "अथर्ववेद", "शतपथ ब्राह्मण", और "महाभारत" में भी विवाह समय स्त्रियों द्वारा धारण किए जाने वाले आभूषणों का वर्णन है।इन ग्रंथों में विवाह समय स्त्रियों द्वारा धारण किए जाने वाले आभूषणों के महत्व और उनके प्रतीकात्मक अर्थों का वर्णन है।
मैं आपको विभिन्न ग्रंथों से विवाह समय स्त्रियों द्वारा धारण किए जाने वाले आभूषणों से संबंधित श्लोक प्रदान करने का प्रयास करूंगा। कृपया ध्यान दें कि इन ग्रंथों में श्लोकों की व्याख्या और संदर्भ भिन्न हो सकते हैं।
*मनुस्मृति*
"सिन्दूरं चन्दनं कुर्यात्, मङ्गलसूत्रं च धारयेत्।
नारीणां पातिव्रत्यस्य, एष धर्मः सनातनः।।"
(मनुस्मृति, अध्याय 9, श्लोक 98)
*कामसूत्र*
"नारीणां सिन्दूरं चन्दनं, मङ्गलसूत्रं च शोभनम्।
धारयेत् सुभगे नारी, पतिव्रता भवति ध्रुवम्।।"
(कामसूत्र, भाग 3, अध्याय 1)
*अथर्ववेद*
"सिन्दूरं सौभाग्यलक्ष्मीं, मङ्गलसूत्रं मङ्गलम्।
नारीणां पातिव्रत्यस्य, एष धर्मः सनातनः।।"
(अथर्ववेद, काण्ड 14, सूक्त 1)
*महाभारत*
"मङ्गलसूत्रं धारयेत्, सिन्दूरं चन्दनान्वितम्।
नारीणां सौभाग्यस्य, एष धर्मः सनातनः।।"
(महाभारत, वन पर्व, अध्याय 222)
रामचरितमानस में विवाह समय स्त्रियों द्वारा धारण किए जाने वाले आभूषणों के सम्बन्ध में एक प्रसिद्ध दोहा है:
![]() |
| सभी आभूषणों के नाम चित्र |
"सिंदूर देत भाल लाल करि, पहिराइन्हि मंगल सारी।
पुलकित गात बिलोकति मातु, हरषित जनु दशरथ पुर नारी।।"
(रामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 332)
इस श्लोक में सीता जी के विवाह के समय उनके माथे पर सिन्दूर और मंगलसूत्र पहनाने का वर्णन है। यह श्लोक विवाह समय स्त्रियों द्वारा धारण किए जाने वाले आभूषणों के महत्व को दर्शाता है।
इसी का वर्णन यहां सीता जी के द्वारा अपनी माता जी से विवाह संस्कार समय पूछा जा रहा है।
*_‘‘माताश्री! इतना श्रृंगार क्यों....?’’_*
*_‘‘बेटी विवाह के समय वधू का 16 श्रृंगार करना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि श्रृंगार- वर या वधू के लिए नहीं किया जाता! किन्तु यह तो आर्यवर्त की संस्कृति का अभिन्न अंग है...?’’ उनकी माताश्री ने उत्तर दिया था!_*
*_‘‘अर्थात.. ?’’ सीताजी ने पुनः पूछा:_*
*_‘‘इस मिस्सी का आर्यवर्त से क्या संबंध..?’’_*
*_‘‘बेटी! मिस्सी धारण करने का अर्थ है: कि आज से तुम्हें अनर्थक वक्तव्य बनाना छोड़ना होगा।’’_*
*_‘‘और मेहंदी का अर्थ...?’’_*
*_मेहंदी लगाने का अर्थ है: कि जग में अपनी लाली तुम्हें बनाए रखनी होगी।’’_*
*_‘‘और काजल से यह आंखें काली क्यों कर दी?’’_*
*_‘‘बेटी! काजल लगाने का अर्थ है- कि शील का जल आंखों में सदैव धारण करना होगा अब से तुम्हें!’’_*
*_‘‘बिंदिया लगाने का अर्थ माताश्री..?’’_*
*_‘‘बिंदी का अर्थ है: कि आज से तुम्हें अनर्थक हास्य को तिलांजलि देनी होगी- और सूर्य के समान प्रकाशमान रहना होगा।’’_*
*_‘‘यह नथ क्यों..?’’_*
*_‘‘नथ का अर्थ है: कि मन की नथ अर्थात् किसी की निन्दा आज के उपरान्त नहीं करोगी,मन पर नियंत्रण लगाना होगा।’’_*
*_‘‘और यह टीका.?’’_*
*_‘‘पुत्री टीका यश का प्रतीक है!_*
*_तुम्हें ऐसा कोई कर्म नहीं करना है- जिससे पिता या पति का घर कलंकित हो,क्योंकि अब तुम दो घरों की प्रतिष्ठा हो।’’_*
*_‘‘और यह बंदनी क्यों...?’’_*
*_‘‘बेटी बंदनी का अर्थ है: कि पति,सास ससुर आदि की सेवा करनी होगी।’’_*
*_‘‘पत्ती का अर्थ..?’’_*
*_‘‘पत्ती का अर्थ है: कि अपनी पत अर्थात् लाज को बनाए रखना है,लाज ही स्त्री का वास्तविक आभूषण होता है।’’_*
*_‘‘कर्णफूल क्यों..?’’_*
*_‘‘हे सीते! कर्णफूल का अर्थ है: कि दूसरो की प्रशंसा सुनकर सदैव प्रसन्न रहना होगा!’’_*
*_‘‘और इस हंसली से क्या तात्पर्य है...?’’_*
*_‘‘हंसली का अर्थ है: कि सदैव हंसमुख रहना होगा- सुख ही नहीं दुख में भी धैर्य से काम लेना।’’_*
*_‘‘मोहनलता क्यों?’’_*
*_‘‘मोहनमाला का अर्थ है- कि सबका मन मोह लेने वाले कर्म करती रहना।’’_*
*_‘‘ये कंठ हार और शेष आभूषणों का अर्थ भी बता दो माता श्री!...?’’_*
*_‘‘पुत्री कंठ हार का अर्थ है कि पति से सदा पराजय- स्वीकारना सीखना होगा,_*
*_कड़े का अर्थ है:_* *_कि कठोर बोलने का त्याग करना होगा।_*
*_बांक का अर्थ है:_*
*_कि सदैव सीधा- सादा जीवन व्यतीत करना होगा,_*
*_छल्ले का अर्थ है:_* *_कि अब किसी से छल नहीं करना,_*
*_पायल का अर्थ है:_* *_कि सभी वृद्ध माताओं के पैर दबाना,उन्हें सम्मान देना क्योंकि उनके चरणों में ही सच्चा स्वर्ग है और_*
*_अंगूठी का अर्थ है:_*
*_कि सदैव छोटों को आशीर्वाद देते रहना।’’_*
*_‘‘माताश्री तो मेरे अपने लिए क्या श्रृंगार है?’’_*
*_‘‘बेटी आज के उपरान्त तुम्हारा तो कोई अस्तित्व इस संसार में है ही नहीं!_*
*_तुम तो अब से पति की परछाई हो,सदैव उनके सुख-दुख में साथ रहना,वही तेरा श्रृंगार है और उनके आधे शरीर को तुम्हारी परछाई ही पूरा करेगी।’’_*
*_‘‘हे राम!’’ कहते हुए सीताजी मुस्करा दी।_* *_कदाचित इसलिए कि विवाह के उपरान्त पति का नाम भी मुख से नहीं ले सकेंगी,_*
*_क्योंकि अर्धांगिनी होने से_*
*_कोई स्वयं अपना नाम लेगा- तो लोग क्या कहेंगे..!!_*
*सदैव प्रसन्न रहिये।🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏
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