कुछ आसनों के चित्र
महर्षि पतंजलि ने योग सूत्र पर कुल सवा लाख सूत्र कहे थे। जिनका कथन काल आज से 4000 वर्ष पूर्व, काशी स्थान पर माना जाता है। वर्तमान समय में कुल 195 सूत्र ही उपलब्ध हैं। जिन्हें 4 पादों में उपलब्ध कराया गया है, जिनके नाम क्रमशः, समाधि, साधन, कैवल्य और विभूति पाद है।
पतंजलि के साधन पाद में 55 सूत्र हैं, जिनमें योग के साधनों का वर्णन किया गया है। यह पाद प्रारंभिक साधकों के लिए योग के विभिन्न पहलुओं को समझने और आत्मसात करने के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करता है।
*साधन पाद के मुख्य बिंदु:*
1. *क्रिया योग*: पतंजलि ने क्रिया योग को तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान के रूप में परिभाषित किया है। यह योग का एक व्यावहारिक रूप है जो साधकों को अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने में मदद करता है।
2. *अविद्या*: पतंजलि ने अविद्या को अनित्य, अशुचि, दुःख और अनात्म में नित्य, शुचि, सुख और आत्म की भावना को बताया है। अविद्या के कारण ही हमारा चित्त विक्षिप्त होता है और हम दुःखों का अनुभव करते हैं।
3. *क्लेश*: पतंजलि ने पांच प्रकार के क्लेशों का वर्णन किया है - अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश। ये क्लेश हमारे चित्त को विक्षिप्त करते हैं और हमें दुःखों की ओर ले जाते हैं।
4. *कर्म और कर्मफल*: पतंजलि ने कर्म और कर्मफल के सिद्धांत को समझाया है। उन्होंने बताया है कि हमारे कर्मों के फलस्वरूप हमें सुख या दुःख की प्राप्ति होती है।
5. *विवेक*: पतंजलि ने विवेक को ज्ञान का एक महत्वपूर्ण साधन बताया है। विवेक के द्वारा हम सत्य और असत्य के बीच का अंतर समझ सकते हैं और अपने जीवन को सकारात्मक दिशा में ले जा सकते हैं।
*साधन पाद के सूत्रों की विस्तृत व्याख्या:*
प्रथम 8 सूत्रों की संक्षिप्त व्याख्या इस प्रकार है, शेष 15वें सूत्र ए5 वें सूत्र तक की व्याख्या नीचे दी जाएगी।
1. *तपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः* (सूत्र 1) - क्रिया योग का वर्णन करते हुए पतंजलि कहते हैं कि तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान क्रिया योग के तीन मुख्य अंग हैं।
2. *समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च* (सूत्र 2) - पतंजलि कहते हैं कि क्रिया योग का उद्देश्य समाधि की अवस्था को प्राप्त करना और क्लेशों को कम करना है।
3. *अविद्याऽऽस्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः* (सूत्र 3) - पतंजलि ने पांच प्रकार के क्लेशों का वर्णन किया है - अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश।
4. *विपर्ययदर्शनमविद्या* (सूत्र 5) - पतंजलि कहते हैं कि अविद्या का अर्थ है विपरीत ज्ञान या मिथ्या ज्ञान।
5. *दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता* (सूत्र 6) - पतंजलि कहते हैं कि अस्मिता का अर्थ है द्रष्टा और दृश्य की एकता।
6. *सुखानुशयी रागः* (सूत्र 7) - पतंजलि कहते हैं कि राग का अर्थ है सुख की इच्छा।
7. *दुःखानुशयी द्वेषः* (सूत्र 8) - पतंजलि कहते हैं कि द्वेष का अर्थ है दुःख का भय।
8. *स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः* (सूत्र 9) - पतंजलि कहते हैं कि अभिनिवेश का अर्थ है मृत्यु का भय।
ये कुछ मुख्य बिंदु हैं जो पतंजलि के साधन पाद में वर्णित हैं। इस पाद में पतंजलि ने योग के विभिन्न पहलुओं को विस्तार से समझाया है और साधकों को अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए मार्गदर्शन प्रदान किया है।
*सूत्र 15:*
"परिणामत्रयसंयमादतीतानागतज्ञानम्"
अर्थ: परिणाम त्रय (जन्म, स्थिति और परिवर्तन) पर संयम करने से भूत और भविष्य का ज्ञान प्राप्त होता है।
व्याख्या: इस सूत्र में पतंजलि कहते हैं कि जो साधक परिणाम त्रय पर संयम करता है, वह भूत और भविष्य के बारे में जान सकता है। परिणाम त्रय का अर्थ है किसी वस्तु या व्यक्ति के जन्म, स्थिति और परिवर्तन की प्रक्रिया। जब साधक इस प्रक्रिया पर ध्यान केंद्रित करता है, तो वह समय और स्थान की सीमाओं से परे जा सकता है और भूत और भविष्य के बारे में जान सकता है।
*सूत्र 16:*
"शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात्संकरः तत्र प्रतिप्रसवसंयमात्सर्वभूतानां ज्ञानम्"
अर्थ: शब्द, अर्थ और प्रत्यय (ज्ञान) के परस्पर अध्यास से संकर होता है। इस संकर पर प्रतिप्रसव संयम करने से सभी प्राणियों की भाषा का ज्ञान प्राप्त होता है।
व्याख्या: इस सूत्र में पतंजलि कहते हैं कि शब्द, अर्थ और प्रत्यय के बीच एक जटिल संबंध होता है। जब साधक इस संबंध पर संयम करता है, तो वह सभी प्राणियों की भाषा को समझने की क्षमता प्राप्त कर सकता है।
*सूत्र 17:*
"प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम्"
अर्थ: प्रत्यय (ज्ञान) पर संयम करने से दूसरे के चित्त का ज्ञान प्राप्त होता है।
व्याख्या: इस सूत्र में पतंजलि कहते हैं कि जो साधक अपने प्रत्यय पर संयम करता है, वह दूसरे के चित्त को समझने की क्षमता प्राप्त कर सकता है।
*सूत्र 18:*
"स चाप्रतिषिद्धं सर्वत्र"
अर्थ: और वह ज्ञान (प्रत्यय) अप्रतिषिद्ध होता है और सर्वत्र लागू होता है।
व्याख्या: इस सूत्र में पतंजलि कहते हैं कि जो साधक प्रत्यय पर संयम करता है, उसका ज्ञान अप्रतिषिद्ध होता है और वह सर्वत्र लागू होता है।
*सूत्र 19:*
"काय रूप संयमात्तद्ग्राह्यशक्ति स्तम्भे चक्षुः प्रकाशकयोः संप्रयोगे अणिमादि प्रादुर्भावः काये च तत्संयमात्तद्ग्राह्य शक्ति स्तम्भः"
अर्थ: शरीर के रूप पर संयम करने से शरीर की ग्राह्य शक्ति का स्तम्भ होता है और चक्षु और प्रकाश के संप्रयोग से अणिमा आदि सिद्धियों का प्रादुर्भाव होता है।
व्याख्या: इस सूत्र में पतंजलि कहते हैं कि जो साधक शरीर के रूप पर संयम करता है, वह शरीर की ग्राह्य शक्ति को नियंत्रित कर सकता है और अणिमा आदि सिद्धियों को प्राप्त कर सकता है।
*सूत्र 20:*
"ग्रहण स्वरूपास्मितान्वयार्थवत्त्वसंयमात् इन्द्रिय जयः"
अर्थ: ग्रहण, स्वरूप, अस्मिता और अन्वय अर्थवत्त्व पर संयम करने से इन्द्रियों पर विजय प्राप्त होती है।
व्याख्या: इस सूत्र में पतंजलि कहते हैं कि जो साधक ग्रहण, स्वरूप, अस्मिता और अन्वय अर्थवत्त्व पर संयम करता है, वह इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर सकता है।
इन सूत्रों में पतंजलि ने विभिन्न प्रकार के संयमों का वर्णन किया है जो साधकों को विभिन्न सिद्धियों और ज्ञान को प्राप्त करने में मदद कर सकते हैं।
*सूत्र 21:*
"सत्त्वपुरुषयोरत्मभावे योगः"
अर्थ: सत्त्व और पुरुष के आत्मभाव में योग होता है।
व्याख्या: इस सूत्र में पतंजलि कहते हैं कि जब सत्त्व (चित्त की शुद्धता) और पुरुष (आत्मा) एक दूसरे के साथ जुड़ते हैं, तो योग की अवस्था प्राप्त होती है। यह योग की मूल अवस्था है जिसमें चित्त और आत्मा एक दूसरे के साथ समन्वय में होते हैं।
*सूत्र 22:*
"तदर्थ एव दृश्यस्य आत्मा"
अर्थ: दृश्य (जगत) का आत्मा (उद्देश्य) केवल उस (पुरुष) के लिए है।
व्याख्या: इस सूत्र में पतंजलि कहते हैं कि दृश्य जगत का उद्देश्य केवल पुरुष (आत्मा) के लिए है। दृश्य जगत का अस्तित्व पुरुष के लिए है, और इसका उद्देश्य पुरुष को अपनी वास्तविकता का ज्ञान कराना है।
*सूत्र 23:*
"वशीतापि तदा न तस्य वशी करणसंपत्तेः"
अर्थ: (कुछ लोगों के मत से) वशी (ईश्वर) भी तभी तक (दृश्य के अधीन है), जब तक उसकी वशी करण संपत्ति नहीं होती।
व्याख्या: इस सूत्र में पतंजलि कहते हैं कि कुछ लोगों के मत से ईश्वर भी दृश्य के अधीन है, जब तक वह अपनी वशी करण शक्ति का उपयोग नहीं करता। ईश्वर की वशी करण शक्ति उसे दृश्य से मुक्त करती है और उसे अपने वास्तविक रूप में स्थापित करती है।
*सूत्र 24:*
"ततः प्रभुरवैषम्यनैर्घृण्ययोः"
अर्थ: वह (ईश्वर) प्रभु है, जिसमें वैषम्य और नैर्घृण्य नहीं है।
व्याख्या: इस सूत्र में पतंजलि कहते हैं कि ईश्वर प्रभु है, जिसका अर्थ है कि वह सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ है। ईश्वर में वैषम्य (असमानता) और नैर्घृण्य (क्रूरता) नहीं है, और वह सभी प्राणियों के साथ समान और न्यायपूर्ण व्यवहार करता है।
*सूत्र 25:*
"तत्र बीजरूपः क्लेशशक्तिः परप्रज्ञा त्वनिर्वाच्यत्वात्"
अर्थ: उसमें (ईश्वर में) बीज रूप से क्लेश शक्ति होती है, लेकिन उसकी प्रज्ञा अनिर्वचनीय है।
व्याख्या: इस सूत्र में पतंजलि कहते हैं कि ईश्वर में बीज रूप से क्लेश शक्ति होती है, लेकिन उसकी प्रज्ञा अनिर्वचनीय है। ईश्वर की प्रज्ञा मानव बुद्धि से परे है, और वह अपनी प्रज्ञा से सभी प्राणियों का मार्गदर्शन करता है।
इन सूत्रों में पतंजलि ने ईश्वर और उसके गुणों का वर्णन किया है, और बताया है कि ईश्वर कैसे दृश्य जगत से संबंधित है और कैसे वह प्राणियों का मार्गदर्शन करता है।





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