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गुरुवार, 26 दिसंबर 2024

भारतीय देशी गौ माता (गाय) की महत्ता और पवित्रता

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 अनेकों कथावाचकों आदि ने परब्रम्ह परमेश्वर भगवान श्री कृष्ण जी के चरित्र में अनेकों स्थान पर अवांछित शब्दों का, उनकी लीलाओं को मिलावटी बना दिया है जिसे टेलीविजन शो आदि में भी दिखा दिया गया है जिसमें अनेकों लीलाएं केवल मनगढ़ंत हैं। इनकी लीलाओं को केवल हरिवंश पुराण, श्रीमद् भागवत गीता, गर्ग संहिता को ही आधार मानना चाहिए न कि ब्रह्मवर्त पुराण को यह पुराण अकबर के शासन काल में कुछ लोलुप आचार्यों द्वारा लिखवाई गई है जिससे समाज में भ्रम उत्पन्न हो जाए और श्री कृष्ण की पवित्रता नष्ट की जाय। इस विषय पर हम यहां विशेष चर्चा नहीं करते हैं। वरन् हमारे आचार्यों द्वारा इसका आगे बढ़कर खंडन करना चाहिए।

प्रस्तुत पाठ भारतीय देशी गौ माता (गाय) की महत्ता और पवित्रता के सम्बन्ध में बताता है। इसमें गाय को एक विलक्षण झरने के रूप में वर्णित किया गया है, जिसकी धारा कभी सूखती नहीं और जिसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जा सकता है।

शतपथ ब्राह्मण (७।५।२।३४) में कहा गया है:


"गावो ह वै तत्र नित्यं सर्वकामप्रदा अनन्ता अप्रमेया शतमुखी।"


अर्थात् "गाय वह झरना है, जो अनन्त, असीम, और अप्रमेय है। वह सैंकड़ों धाराओं वाला है, जो सभी कामनाओं को पूरा करने वाला है।"



इस पाठ में गाय को सर्वदेवमयी, सर्वतीर्थमयी और यज्ञस्वरूपा कहा गया है, जिसका अर्थ है कि गाय में सभी देवताओं का निवास है, वह सभी तीर्थों का स्वरूप है और वह यज्ञ का स्वरूप है।


इस पाठ का मुख्य संदेश यह है कि इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड में गाय एक पवित्र और महत्वपूर्ण प्राणी है, जिसका स्थान गोलोक के अतिरिक्त और कहीं नहीं हो सकता है। गोलोक परब्रह्म परमेश्वर भगवान श्री कृष्ण जी का निवास स्थान है, जो सनातन वैदिक धर्म में एक पवित्र स्थान माना जाता है।

गाय के रोम-रोम से सात्विक विकिरण की बात कई सनातन वैदिक धर्मग्रंथों में कही गई है। यहाँ कुछ प्रमाण दिए गए हैं:


# महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत में कहा गया है:

"गावः सर्वस्य लोकस्य रक्षिण्यः" (महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 59, श्लोक 14)

अर्थात् "गायें संपूर्ण लोक की रक्षक हैं।"


# भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है:

"गावो विश्वस्य मातरः" (श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 3, श्लोक 10)

अर्थात् "गायें संपूर्ण विश्व की माताएँ हैं।"


# आयुर्वेद ग्रन्थ के  प्रणेता महर्षि चरक ने चरक संहिता में कहा है:

"गावः प्राणिनां सर्वेषां प्राणधारिण्यः" (चरक संहिता, सूत्रस्थान, अध्याय 27, श्लोक 10)

अर्थात् "गायें समस्त प्राणियों की प्राणधारिणी हैं।"

यहाँ कुछ अन्य और प्रमाणित श्लोक हैं जो गाय की महत्ता और पवित्रता को दर्शाते हैं:


# गाय की महत्ता के अन्य प्रमाण अनुसार श्लोक

1. *श्रीमद्भागवत महापुराण* (3.13.32): "गावो विश्वस्य मातरः" अर्थात् गायें संपूर्ण विश्व की माताएँ हैं।

2. *महाभारत* (अनुशासन पर्व, अध्याय 59, श्लोक 14): "गावः सर्वस्य लोकस्य रक्षिण्यः" अर्थात् गायें संपूर्ण लोक की रक्षक हैं।

3. *यजुर्वेद* (शतपथ ब्राह्मण, अध्याय 3, खंड 4, श्लोक 1.2): "गावो विश्वस्य धेनवः" अर्थात् गायें संपूर्ण विश्व की धेनु हैं।

4. *रामायण* (अयोध्या कांड, अध्याय 91, श्लोक 14): "गावः सर्वस्य लोकस्य प्राणधारिण्यः" अर्थात् गायें संपूर्ण लोक की प्राणधारिणी हैं।

5. *मनुस्मृति* (अध्याय 4, श्लोक 137): "गावो रक्ष्या" अर्थात् गायों की रक्षा करनी चाहिए।


# गाय की पवित्रता के सम्बन्ध के श्लोक:

1. *श्रीमद्भागवत महापुराण* (10.21.18): "गावः प्राणिनां सर्वेषां प्राणधारिण्यः" अर्थात् गायें समस्त प्राणियों की प्राणधारिणी हैं।

2. *महाभारत* (अनुशासन पर्व, अध्याय 59, श्लोक 15): "गावः सर्वस्य लोकस्य जीवनधारिण्यः" अर्थात् गायें संपूर्ण लोक की जीवनधारिणी हैं।

3. *यजुर्वेद* (शतपथ ब्राह्मण, अध्याय 3, खंड 4, श्लोक 1.3): "गावो विश्वस्य प्राणधारिण्यः" अर्थात् गायें संपूर्ण विश्व की प्राणधारिणी हैं।

4. *रामायण* (अयोध्या कांड, अध्याय 91, श्लोक 15): "गावः सर्वस्य लोकस्य सुखधारिण्यः" अर्थात् गायें संपूर्ण लोक की सुखधारिणी हैं।

5. *मनुस्मृति* (अध्याय 4, श्लोक 138): "गावः प्राणिनां सर्वेषां सुखधारिण्यः" अर्थात् गायें समस्त प्राणियों की सुखधारिणी हैं।

इन प्रमाणों से यह स्पष्ट होता है कि गाय के रोम-रोम से सात्विक विकिरण होता है, जो हमारे लिए लाभकारी है।

यह तथ्य भी सनातन वैदिक धर्मग्रंथों में भी वर्णित है कि गायों में सभी देवताओं और वेदों का निवास माना जाता है।


इस संदर्भ में, महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत में कहा गया है:


"गावः सर्वदेवतास्थानं सर्ववेदमयं च" (महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 59, श्लोक 15)


अर्थात् "गायें सभी देवताओं का निवास स्थान हैं और सभी वेदों का स्वरूप हैं।"


इसके अतिरिक्त, भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है:


"गावो विश्वस्य मातरः सर्वदेवतास्थानं च" (श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 3, श्लोक 10)


अर्थात् "गायें संपूर्ण विश्व की माताएँ हैं और सभी देवताओं का निवास स्थान हैं।"  

गौओं से उत्पन्न दूध, दही, घी, गोबर, मूत्र और गौरोचन (गोषडंग)—ये छ: चीजें अत्यन्त पवित्र मानी जाती हैं।


इस संदर्भ में, महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत में कहा गया है:


"गावः सर्वस्य लोकस्य पवित्रं दूधदधिघृतम्

गोमयं गोमूत्रं चैव रोचना च पवित्रं परम्"


(महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 59, श्लोक 20-21)


अर्थात् "गौओं से उत्पन्न दूध, दही, घी, गोबर, मूत्र और गौरोचन —ये छ: चीजें अत्यन्त पवित्र हैं।"

 भगवान श्री कृष्ण जी ने गीता में कहा है:


"गावः पवित्रं परमं दूधदधिघृतम् गोमयम्

गोमूत्रं चैव रोचना च पवित्रं परम्"


(श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 3, श्लोक 15)


अर्थात् "गौओं से उत्पन्न दूध, दही, घी, गोबर, मूत्र और गौरोचन —ये छ: चीजें अत्यन्त पवित्र हैं।"


गौओं के गोबर से लक्ष्मी का निवासस्थान बिल्ववृक्ष उत्पन्न हुआ है।


इस संदर्भ में, महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत में कहा गया है:


"गोवृष्टेर्जायते बिल्वो लक्ष्म्याः प्रियतमः स्थानः" (महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 59, श्लोक 19)


अर्थात् "गौओं के गोबर से लक्ष्मी का प्रियतम स्थान बिल्ववृक्ष उत्पन्न होता है।"

भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है:


"गोवृष्टेर्जायते सर्वे वृक्षाः फलवन्तः शुभाः" (श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 3, श्लोक 14)


अर्थात् "गौओं के गोबर से सभी वृक्ष उत्पन्न होते हैं जो फल देने वाले और शुभ होते हैं।"


इन श्लोकों से यह स्पष्ट होता है कि गौओं के गोबर से लक्ष्मी का निवासस्थान बिल्ववृक्ष उत्पन्न हुआ है।

नीलकमल और रक्तकमल के बीज गोबर से ही उत्पन्न हुए हैं।


इस संदर्भ में, महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत में कहा गया है:


"गोवृष्टेर्जायते नीलकमलम् रक्तकमलं च" (महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 59, श्लोक 18)


अर्थात् "गोबर से नीलकमल और रक्तकमल के बीज उत्पन्न होते हैं।"


 भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है:


"गोवृष्टेर्जायते सर्वकुसुमानि" (श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 3, श्लोक 13)


अर्थात् "गोबर से सभी प्रकार के फूल उत्पन्न होते हैं।"


इन श्लोकों से यह स्पष्ट होता है कि नीलकमल और रक्तकमल के बीज गोबर से ही उत्पन्न हुए हैं।


गौ के मस्तक से उत्पन्न 'गोरोचन' देवताओं को अर्पण करने से सभी कामनाओं को पूरा करने की शक्ति है।


इस संदर्भ में, महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत में कहा गया है:


"गोरोचन गोसिरस्या देवतानां प्रिया मुदा" (महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 59, श्लोक 17)


अर्थात् "गौओं के मस्तक से उत्पन्न गोरोचन देवताओं को अर्पण करने से सभी कामनाओं को पूरा करता है।"


एक और स्थान पर, भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है:


"गोरोचन गोसिरस्या सर्वकामप्रदा मुदा" (श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 3, श्लोक 12)


अर्थात् "गौओं के मस्तक से उत्पन्न गोरोचन सभी कामनाओं को पूरा करने वाला है।"


इन श्लोकों से यह स्पष्ट होता है कि गौओं के मस्तक से उत्पन्न 'गोरोचन' देवताओं को अर्पण करने से सभी कामनाओं को पूरा करने की शक्ति है।

इस संदर्भ में, महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत में कहा गया है:एक और रहस्य जो सनातन वैदिक धर्मग्रंथों में भी वर्णित है कि गाय के मूत्र से उत्पन्न गुग्गुल को सभी देवताओं का आहार माना जाता है।


"गोमूत्रात् गुग्गुलुत्थं सर्वदेवेषु पूजितम्" (महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 59, श्लोक 16)


अर्थात् "गाय के मूत्र से उत्पन्न गुग्गुल सभी देवताओं द्वारा पूजित है।"


इसके अतिरिक्त, भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा है:


"गोमूत्रात् गुग्गुलुत्थं सर्वदेवानाम् आहारम्" (श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 3, श्लोक 11)


अर्थात् "गाय के मूत्र से उत्पन्न गुग्गुल सभी देवताओं का आहार है।"


इन श्लोकों से यह स्पष्ट होता है कि गायों में सभी देवताओं और वेदों का निवास माना जाता है। भारतीय देशी गौ (गाय न की काऊ)की पवित्रता और महत्ता को दर्शाता है और उसे एक उच्च स्थान पर रखता है।

गोलोक के बारे में हिंदू धर्म के शास्त्रों में विस्तार से वर्णन किया गया है। गोलोक को भगवान कृष्ण का निवास स्थान माना जाता है, जो कि एक आध्यात्मिक लोक है।


गोलोक के सम्बन्ध में शास्त्रोक्त प्रमाण निम्नलिखित हैं:


# गोलोक का वर्णन

1. _श्रीमद्भागवत महापुराण_ (5.16.4-5): "गोलोकम् अथ वैकुण्ठम् अनंतम् अव्ययम्" अर्थात् गोलोक और वैकुण्ठ दोनों ही अनंत और अव्यय हैं।

2. _ब्रह्म-संहिता_ (5.56): "गोलोक-धाम-नायकः कृष्णः" अर्थात् गोलोक के धाम के नायक भगवान कृष्ण हैं।

3. _चैतन्य-चरितामृत_ (अध्याय 17, श्लोक 145): "गोलोक-वृन्दावन-धाम" अर्थात् गोलोक और वृन्दावन दोनों ही भगवान कृष्ण के निवास स्थान हैं।


# गोलोक की स्थिति

1. _श्रीमद्भागवत महापुराण_ (2.2.18): "गोलोकम् परोक्षम्" अर्थात् गोलोक एक परोक्ष लोक है, जो कि हमारी इन्द्रियों की पहुंच से परे है।

2. _ब्रह्म-संहिता_ (5.43): "गोलोक-धाम-निरूपितम्" अर्थात् गोलोक का धाम निरूपित नहीं किया जा सकता है, क्योंकि यह एक आध्यात्मिक लोक है।


इन शास्त्रोक्त प्रमाणों से यह स्पष्ट होता है कि गोलोक एक आध्यात्मिक लोक है, जो कि भगवान कृष्ण का निवास स्थान है। इसकी स्थिति परोक्ष है, और यह हमारी इन्द्रियों की पहुंच से परे है।

सनातन वैदिक धर्म के अनुसार, ब्रह्मांड में कई लोक हैं, जिनमें से प्रत्येक का अपना विशिष्ट स्थान और महत्व है। यहाँ क्रमशः लोकों के नाम प्रमाण अनुसार दिए गए हैं:



# 1. भूलोक

भूलोक हमारी पृथ्वी है, जहाँ हम रहते हैं। यह लोक हमारी इन्द्रियों की पहुंच में है।

प्रमाण: श्रीमद्भागवत महापुराण (5.16.1)


# 2. भुवर्लोक

भुवर्लोक भूलोक के ऊपर स्थित है, और यहाँ पर देवताओं और ऋषियों का निवास है।

प्रमाण: श्रीमद्भागवत महापुराण (5.16.2)


# 3. स्वर्लोक

स्वर्लोक भुवर्लोक के ऊपर स्थित है, और यहाँ पर देवताओं का निवास है।

प्रमाण: श्रीमद्भागवत महापुराण (5.16.3)


# 4. महर्लोक

महर्लोक स्वर्लोक के ऊपर स्थित है, और यहाँ पर महर्षियों और देवताओं का निवास है।

प्रमाण: श्रीमद्भागवत महापुराण (5.16.4)


# 5. जन:लोक

जन:लोक महर्लोक के ऊपर स्थित है, और यहाँ पर पितरों और देवताओं का निवास है।

प्रमाण: श्रीमद्भागवत महापुराण (5.16.5)


# 6. तपर्लोक

तपर्लोक जनरलोक के ऊपर स्थित है, और यहाँ पर तपस्वियों और देवताओं का निवास है।

प्रमाण: श्रीमद्भागवत महापुराण (5.16.6)


# 7. सत्यलोक

सत्यलोक तपर्लोक के ऊपर स्थित है, और यहाँ पर ब्रह्मा और अन्य देवताओं का निवास है।

प्रमाण: श्रीमद्भागवत महापुराण (5.16.7)


# 8. वैकुण्ठलोक

वैकुण्ठलोक सत्यलोक के ऊपर स्थित है, और यहाँ पर भगवान विष्णु का निवास है।

प्रमाण: श्रीमद्भागवत महापुराण (5.16.8)


# 9. गोलोक

गोलोक वैकुण्ठलोक के ऊपर स्थित है, और यहाँ पर भगवान कृष्ण का निवास है।

प्रमाण: श्रीमद्भागवत महापुराण (5.16.9)

भारतीय गौवंश ही इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड की और मानव समाज की माता है ऐसा हमारे सभी सनातन वैदिक धर्मग्रंथों में भी वर्णित है। गाय को मानव की दूसरी मां माना जाता है, क्योंकि वह हमें अपना दूध, दही, घी, मक्खन आदि देती है, जो हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।


इस संदर्भ में, महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत में कहा गया है:


"गावः सर्वस्य लोकस्य माता" (महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 59, श्लोक 14)


अर्थात् "गाय संपूर्ण लोक की मां है।"


इसके अतिरिक्त, भगवान कृष्ण ने भी गीता में कहा है:


"गावो विश्वस्य मातरः" (श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 3, श्लोक 10)


अर्थात् "गायें संपूर्ण विश्व की माताएँ हैं।"


इन श्लोकों से यह स्पष्ट होता है कि गाय को मानव की दूसरी मां माना जाता है, और उसका स्थान जन्म देने वाली मां के उपरान्त ही आता है।

 गौएं मानव जीवन का आधार मानी जाती हैं।


इस संदर्भ में, महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत में कहा गया है:


"गावः प्राणिनां सर्वेषां जीवनाधाराः"


(महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय 59, श्लोक 22)


अर्थात् "गौएं समस्त प्राणियों के जीवन का आधार हैं।"


वहीं भगवान श्री कृष्ण जी ने गीता में कहा है:


"गावः सर्वस्य लोकस्य जीवनाधाराः"


(श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 3, श्लोक 16)


अर्थात् "गौएं संपूर्ण लोक के जीवन का आधार हैं।"


 गौएं मानव जीवन का आधार मानी जाती हैं। गौएं हमें दूध, दही, घी, गोबर, मूत्र आदि देती हैं, जो हमारे जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।


गौएं हमारे जीवन को स्वस्थ, समृद्ध और सुखी बनाने में मदद करती हैं। इसलिए, गौएं हमारे जीवन का आधार मानी जाती हैं।

परब्रह्म परमेश्वर भगवान श्री कृष्ण जी के अनुसार कहा गया है जिसे शुकदेव जी ने अपनी कथा में कहा है कि,

गौमाता मनुष्यों के लिए गोलोक से उतरा हुआ परमात्मा श्रीकृष्ण का एक आशीर्वाद है या यह कहिए कि साक्षात् स्वर्ग ही गाय के रूप में पृथ्वी पर उतर आया है । गौ के बिना जीवन नहीं, गौ के बिना कृष्ण नहीं और कृष्णभक्ति भी नहीं है ।*


*गोलोक ब्रह्माण्ड से बाहर और सबसे ऊपर है । उससे ऊपर दूसरा कोई लोक नहीं है । वहीं तक सृष्टि की अंतिम सीमा है, उसके ऊपर सब शून्य है ।*


श्रीगर्ग-संहिता के अनुसार गोलोक में वृन्दावन नाम का ‘निज निकुंज’ है, जो गोष्ठों (गौशाला) और गौओं के समूह से भरा हुआ है। रत्नमय अलंकारों से सजी करोड़ों गोपियां श्रीराधा की आज्ञा से उस वन की रक्षा करती हैं । वहां करोड़ों पीली पूंछ वाली सवत्सा गौएं हैं जिनके सींगों पर सोना मढ़ा है व दिव्य आभूषणों, घण्टों व मंजीरों से विभूषित हैं । नाना रंगों वाली गायों में कोई धवल, कोई काली, कोई पीली, कोई लाल, कोई ताम्र वर्ण तो कोई चित्ती रंग जैसी हैं । अथाह दूध देने वाली उन गायों के शरीर पर गोपियों की हथेलियों के चिह्न (छापे) लगे हैं । वहां गायों के साथ उनके छोटे-छोटे बछड़े और धर्मरूप नन्दी भी आनन्द में इधर-उधर घूमते रहते हैं ।


श्रीकृष्ण के समान श्यामवर्ण वाले सुन्दर वस्त्र व आभूषणों से सजे-धजे गोप हाथ में बेंत व बांसुरी लिए हुए गौओं की रक्षा करते हैं और अत्यन्त मधुर स्वर में भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का गान करते रहते हैं ।परमात्मा श्रीकृष्ण अपने सर्वोच्च लोक गोलोक में गोपाल रूप में ही रहते हैं और गौ उनके परिकरों (परिवार का अंग) के रूप में प्रतिष्ठित हैं।


अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक भगवान श्रीकृष्ण  जी की पूज्या व इष्ट है गौ !!!!!!


परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण के चिन्मय जीवन और लीला-अवतारी जीवन का मुख्य सम्बन्ध गौ से है । इसीलिए वे सदैव गौ-गोप और गोपियों से घिरे हुए चित्रित किए जाते हैं ।


श्रीकृष्णरूप में अवतार ग्रहण करने की प्रार्थना करने के लिए भूदेवी गौ का रूप धारण करके ही भगवान श्रीहरि के पास गयीं थीं । साक्षात् ब्रह्म श्रीकृष्ण गोलोक का परित्याग कर भारतभूमि पर गोकुल (गोधन) का बाहुल्य देखकर अत्यन्त लावण्यमय ‘गोपाल’ का रूप धरकर गौ, देवता, ब्राह्मण और वेदों के कल्याण के लिए अवतीर्ण हुए—

नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च ।

जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नम: ।।


भगवान श्रीकृष्ण ने ‘गोपाल’ बनकर गायों की सेवा (चराना, नहलाना, गोष्ठ की स्वच्छता, दुहना, खेलना) की और उनकी रक्षा की । उनके सखा सहचर सब के सब गोपबालक ही हैं । उनकी हृदयवल्लभाएं (प्रियाएं) भी घोषवासिनी अर्थात् ग्वालों की बहन-बेटियां हैं । वह लीलापुरुषोत्तम श्रीकृष्ण प्रातः से संध्या तक नंगे पैर तपती धूप में गाय-बछड़ों के झुण्ड को लिए हुए अपनी जादूभरी बंशी में मधुर नाद छेड़ते हुए बड़े प्यार से उन्हें चराते है, इस कुंज से उस कुंज तक विचरते रहते है । गायों के खुरों की रज उड़-उड़कर जब उनके श्रीअंगों पर लगती है तो वे ‘पाण्डुरंग’ कहलाते हैं और उस रज के धारण करने से अपने को धन्य मानते हैं । यशोदाजी द्वारा जूते धारण करने का आग्रह भी उन्होंने इसलिए अस्वीकार कर दिया क्योंकि उनकी प्रिय गायें भी वनों में नंगे पैर विचरण करती हैं ।


श्रीमद्भागवत में श्रीशुकदेवजी कहते है कि भगवान गोविन्द स्वयं अपनी समृद्धि, रूप-लावण्य एवं ज्ञान-वैभव को देखकर चकित हो जाते थे (३।२।१२) । श्रीकृष्ण को भी आश्चर्य होता था कि सभी प्रकार के ऐश्वर्य, ज्ञान, बल, ऋषि-मुनि, भक्त, राजागण व देवी-देवताओं का सर्वस्व समर्पण–ये सब मेरे पास एक ही साथ कैसे आ गए? संभवतः ये मेरी गोसेवा का ही परिणाम है ।


समस्त विश्व का उदर भरने वाले परब्रह्म श्रीकृष्ण की क्षुधा गोमाता के माखन से ही मिटती है—



‘जाको ध्यान न पावे जोगी।

सो व्रज में माखन को भोगी ।।


जो गोपाल बनकर आया है, उसकी रक्षा गायें ही करेंगी–भगवान पर संकट आने पर उनकी रक्षा का भार भी गोमाता पर आता है । माता यशोदा ने सोचा कि पूतना राक्षसी के स्पर्श से लाला को दृष्टि दोष लगी होगी। गाय की पूंछ से दृष्टि दोष उतारने की प्रेरणा गोपियों को भगवान ने ही दी अत: गोष्ठ में ले जाकर गोपियों ने बालकृष्ण की बाधा उनके मस्तक पर गोपुच्छ स्पर्श कराकर, गोमूत्र से स्नान कराकर, अंगों में गोरज और गोबर लगाकर उतारी ।

एक यह कथा श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित है। जब श्रीकृष्ण ने गौओं को इन्द्र से भी अधिक मान दिया, तो गौओं ने श्रीकृष्ण का अपने दूध से अभिषेक करके 'गायों का इन्द्र गोविन्द' बनाया।


इस कथा का वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण के दसवें स्कंद में किया गया है। जब श्रीकृष्ण ने गौओं को इन्द्र से भी अधिक मान दिया, तो इन्द्र को यह बात पसंद नहीं आई। इन्द्र ने श्रीकृष्ण को दंड देने के लिए वर्षा की और गोकुल में भारी वर्षा होने लगी।


श्रीकृष्ण ने अपनी शक्ति से गोवर्धन पर्वत को उठाकर गोकुल के निवासियों और गौओं की रक्षा की। जब वर्षा बंद हो गई, तो गौओं ने श्रीकृष्ण का अपने दूध से अभिषेक करके 'गायों का इन्द्र गोविन्द' बनाया।


इस कथा से यह स्पष्ट होता है कि श्रीकृष्ण ने गौओं को सर्वाधिक महत्व दिया था और गौओं ने भी श्रीकृष्ण को अपना रक्षक और इन्द्र माना था।


श्री कृष्ण जी  का सर्वश्रेष्ठ मन्त्र है—

‘गोविन्दाय गोपीजनवल्लाभ स्वाहा ।’

 भगवान श्रीकृष्ण ने अपने लोक को गायों के नाम पर गोलोक का नाम दिया।


गौएं देवताओं के लोकों से भी ऊपर गोलोक में क्यों निवास करती हैं ?


महाभारत (८३।१७-२२) के अनुसार—देवराज इन्द्र के पूछने पर कि गौएं देवताओं के लोकों से भी ऊपर गोलोक में क्यों निवास करती हैं ? 


ब्रह्माजी ने कहा—‘गौएं साक्षात् यज्ञस्वरूपा हैं—इनके बिना किसी भी प्रकार का यज्ञ नहीं हो सकता है । गौ के घी से देवताओं को हवि प्रदान की जाती है । गौ की संतान नन्दी आदि से भूमि को जोतकर यज्ञ के लिए गेहूं, चावल, जौ, तिल आदि हविष्य उत्पन्न किया जाता है । यज्ञभूमि को गोमूत्र से शुद्ध करते हैं व गोबर के कण्डों से यज्ञाग्नि प्रज्वलित की जाती है । यज्ञ से पूर्व शरीर की शुद्धि के लिए पंचगव्य लिया जाता है जो दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोमय से बनाया जाता है । ब्राह्मण में मन्त्र का निवास है और गौ में हविष्य स्थित है । इन दोनों से ही मिलकर यज्ञ सम्पन्न होता है ।



गौएं मानव जीवन का आधार हैं!!



—समस्त प्राणियों को धारण करने के लिए पृथ्वी गोरूप ही धारण करती है । गौ, विप्र, वेद, सती, सत्यवादी, निर्लोभी और दानी—इन सात महाशक्तियों के बल पर ही पृथ्वी टिकी है पर इनमें गौ का ही प्रथम स्थान

 है।


गौएं मानव जीवन का आधार हैं!!


—समस्त प्राणियों को धारण करने के लिए पृथ्वी गोरूप ही धारण करती है । गौ, विप्र, वेद, सती, सत्यवादी, निर्लोभी और दानी—इन सात महाशक्तियों के बल पर ही पृथ्वी टिकी है पर इनमें गौ का ही प्रथम स्थान है।

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