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रविवार, 14 दिसंबर 2025

#ज्ञान कर्म और सन्यास योग, ज्ञानेश्वरी गीता सन्दर्भ से।।

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🌹*संत ज्ञानेश्वरी गीता* चौथा अध्याय,"ज्ञान कर्म संन्यास योग"*🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿श्री भगवानुवाच* 🌷🌷🌷🌷🌷

*इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।*

*विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।।1।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃*श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा-यह योग मैंने सूर्य को बतलाया था, लेकिन इस बात को अब अधिक दिन व्यतीत हो गए। आगे सूर्य ने यह योग मनु को  बतलाया और मनु ने इसका आचरण कर इक्ष्वाकु नामक अपने पुत्र को इसका उपदेश दिया। इस प्रकार यह परंपरा आदिकाल से चली आ रही है।*🌿🍃🌿🍃🌿*एवं परम्परा प्राप्तमिमं राजर्षयो विदु:।*

              *स कालेनेह महता योगो नष्ट: परंतप:।।2।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃 कुछ राजर्षियों को इस योग का ज्ञान हुआ , लेकिन आजकल यह कम ही लोगों को ज्ञात है। इसका कारण यह है कि लोग वासनाओं में फंस गए और देह-बुद्धि के मोह में पड़ गए जिससे वे आत्मज्ञान को भूल गए।आत्मबोध की भावना दृढ़ न हो,तो सुख विषयों में ही प्रतीत होता है।इस प्रकार लोग वाममार्गी हो गए। अन्यथा तो जिस गांव में सब दिगंबर ही हैं, वहां वस्त्रों का क्या काम है?* या जो जन्म से अंधा है -उसके लिए सूर्य का क्या उपयोग है ? बधिरों की सभा में संगीत को कौन सम्मान देगा ?*

अर्जुन को ज्ञानोपदेश करते हुए श्री कृष्ण जी 


*श्रगाल को क्या चन्द्र का प्रकाश सुहाता है? चन्द्रोदय से पूर्व ही जिसकी देखने की शक्ति समाप्त हो जाती है- वह काक चन्द्रमा को कैसे पहचान सकता है?*

*इसप्रकार जिन्होंने वैराग्य की सीमा भी नहीं देखी, जिन्हें विवेक का ज्ञान नहीं है,उन मूर्खों को मुझ परमेश्वर का लाभ कैसे होगा ? ज्ञात नहीं कि यह मोह कैसे प्रसारित हुआ होगा, लेकिन इस मोह के कारण अत्यधिक समय नष्ट हो गया और इस लोक से कर्मयोग लुप्त हो गया।*🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿

  *स एवायं मयातेऽद्य योग: प्रोक्त: पुरातन:।*

*भक्तोऽसि में सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्।।3।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*हे पार्थ! वही कर्म योग आज मैंने तुम्हें बता दिया है। अब तुम अपने संशय को त्याग दो। यह कर्म योग मेरे अंतःकरण का गूढ़ रहस्य है, मैंने इसे तुमसे छिपाया नहीं है, क्योंकि तुम मेरे प्रिय हो। हे अर्जुन! तुम पूर्ण प्रेम के अवतार, भक्ति के प्राण, मित्रता के जीवन- सर्वस्व हो, अत: तुमसे कैसा दुराव?*

*इस समय हम युद्ध भूमि में खड़े हैं, ऐसे में तुम्हारी शंका का समाधान मैं कैसे करूं? इस पर भी क्षण मात्र के लिए इस ओर से हटकर तुम्हारी संदेहों का समाधान करके तुम्हारा मोह दूर  करना अधिक आवश्यक है।

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿   *अर्जुन  उवाच*     

*अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वत :।*

*कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति।।4।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*अर्जुन ने कहा-हे श्री कृष्ण! *यदि माता अपने पुत्र से प्रेम ( स्नेह) करे,तो,*इसमें आश्चर्य  क्या है ?*हे कृपानिधि!* इस संसार में आप ही संतप्त लोगों के लिए  शीतल छाया  और आश्रयहीनों के लिए माता के समान है। आपकी कृपा से ही मेरा जन्म हुआ। हे देव! जैसे कोई स्त्री पंगु पुत्र को जन्म देकर  जीवन भर उसके क्लेशों को सहती है , वैसे ही मेरे लिए आपको सब झमेले सहने पड़ते हैं , लेकिन आपके सम्मुख  मैं क्या कहूं? अतः हे प्रभो! अब आप मेरे प्रश्नों की ओर ध्यान न देकर मैं जो कुछ कहूं उसका आप मन में क्रोध न करें।*     

*हे कृष्ण! अपने सूर्य को कर्मयोग बतलाने की बात कही है, वह मेरे मन को उपयुक्त नहीं होती। सूर्य  क्या है, इसका अता-पता हमारे  पिता तथा पितामह को भी नहीं  है,तो आपने उसे कब और कैसे  उपदेश दिया ? यह सूर्य तो अति प्राचीन है और आप तो आजकल  के हैं, इसलिए इस बात में मुझे विरोधाभास दिखाई देता है। हे देव! आपका चरित्र मेरे लिए  अगम्य है,अतः मैं पूर्णता से विश्वास के साथ कैसे कह सकता हूं कि यह बात निराधार  है, इसलिए  आपने सूर्य ( विवस्वान ) को उपदेश दिया था, यह बात इस ढंग से कहें कि मेरी समझ में आ जाए।*     

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿   *श्री भगवानुवाच*     

*बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।*

*तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप।।5।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃*तब श्रीकृष्ण जी ने कहा- हे पार्थ! तुम अपने मन में यह समझते हो कि जब विवस्वान सूर्य था तब मैं नहीं था, इससे सिद्ध होता है कि तुम इन सब बातों के सम्बन्ध में कुछ नहीं जानते। हे अर्जुन! तुम्हें यह नहीं ज्ञात कि तुम्हारे और मेरे अब तक अनेक जन्म हो चुके हैं। तुम्हें तुम्हारे जन्मों का स्मरण नहीं है, लेकिन मैनें जिस-जिस समय जो अवतार लिए हैं,उन सबका मुझे स्मरण है।

*अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।*

*प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया।।6।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃*इसीलिए मुझे पिछली सभी बातों का स्मरण है। अजन्मा होते हुए भी मैं माया के कारण अवतार लेता हूं। मेरा अमूर्तत्व नष्ट नहीं होता, लेकिन अवतार लेने और उसके समाप्त होने का जो आभास होता है वह माया के संयोग से केवल मुझ में ही दिखाई देता है। मेरी स्वतंत्रता तो तृण मात्र भी भान नहीं होती, लेकिन मैं कर्म के अधीन हूं, ऐसा जो लोगों को लगता है वह भ्रांति के कारण है,वास्तव में ऐसी कोई बात नहीं है। *जहां भ्रांति दूर हो जाती है वहां मैं निर्गुण निराकार हूं। एक वस्तु दो दिखने का कारण दर्पण है। दर्पण में प्रतिबिंब का विचार करने पर दूसरी वस्तु वास्तविक ठहरती है।* हेअर्जुन!* 

*मैं तो निराकार ही हूं, लेकिन भक्तों का अनुग्रह पूर्ण करने के लिए माया को स्वीकार कर अभिनेता के समान वाह्य रूप से साकार होता हूं।*

*यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।*

*अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।7।।*

🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃*धर्म के रूप में जो कुछ है, उसकी मैं ही प्रत्येक युग में रक्षा करता हूं।* यह क्रम मूल रूप से चला आ रहा है, इसलिए जब-जब यह देखने में आता है कि अधर्म ने धर्म को परास्त कर लिया है,* तब -तब मैं अपनी अजन्मा वाली भूमिका दूर रखता हूं तथा निराकार रूप को भी भुला देता हूं।*🌿🍃🌿🍃🌿

*परित्राणाय साधुनां विनाशाय  च दुष्कृताम्।*

*धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।8।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*उस समय भक्तों का पक्ष लेकर मैं शरीर धारण कर अवतार लेता हूं और अज्ञान रूपी अंधकार को निगल लेता हूं। मैं धर्म की सीमा को तोड़ देता हूं। अधर्मियों का नाम मिटा देता हूं और जो साधु हैं,उनके हाथों से सुख की पताका लहरवाता हूं। दैत्यों के,अधर्मियों के कुलों का नाश करता हूं तथा साधुओं को उचित सम्मान दिलवाता हूं।*

*धर्म और नीति को एक करके उनका संबंध स्थापित करता हूं।  अविचारों की कालिमा को समाप्त करके ज्ञान का दीपक प्रज्वलित करता हूं, जिससे योगियो के लिए वह समय दिपावली जैसा हो जाता है। उसे समय सारा संसार आत्मसुख से ओतप्रोत हो जाता है और धर्म के अतिरिक्त कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं होता। भक्तजन भक्ति से पूर्ण हो जाते हैं।*

*हे अर्जुन! जब मैं साकार रूप से अवतार धारण करता हूं तब पापों के पर्वत जैसे समूह नष्ट हो जाते हैं और पुण्यों का उदय हो जाता है। ऐसे ही कार्यों के लिए मैं युग -युग में अवतार धारण करता हूं। जिसे इस गुप्त रहस्य का पता चल जाए उसे ही इस दृश्यमान  संसार में ज्ञानवान समझना चाहिए। अविचार का अंधकार हटाकर विचार रूपी दीपक को प्रज्वलित करता हूं।🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃

🌿जन्म कर्म चा मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वत:।*

   *त्यक्त्वा दहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।।9।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*मैं अजन्मा होने पर भी जन्म लेता हूं और अकर्मण्य होने पर भी कर्म करता हूं। जो मनुष्य निर्विकार रूप से मेरे अलिप्तता के भाव को जानता है उसे परम मुक्त समझना चाहिए। ऐसा मनुष्य संसार में रहकर कर्मों के प्रति आसक्त नहीं होता और देह धारण करके भी देह के भाव से नहीं बंधता। समय आने पर जब वह देह त्यागकर पंचतत्वों में लीन होता है तब मेरे ही स्वरूप को प्राप्त करता है।*🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃

🌿*वीतराग भयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिता:।*

     *बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागता:।।10।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*सामान्य रूप से जो स्वयं के और दूसरों के गतागत का कोलाहल नहीं करते, कामना रहित होते हैं, क्रोध नहीं करते, मेरे स्वरूप से ओतप्रोत होते हैं, मेरी ही सेवा के लिए जीवन धारण किए रहते हैं, निर्विकार रूप से आत्मबोध के सुख से सुखी रहते हैं, योगी हैं या जो आत्मज्ञान को स्वयं में समाए रहते हैं-वे सहजता से मेरे स्वरूप जैसे हो जाते हैं। उनमें और मुझमें कोई भेद नहीं होता।अब देखो- पीतल का कलुष ( मालिन्य) जड़ से नष्ट हो जाए तब तो सोना पाने की कामना अर्थहीन ही हो जाती है। इसी प्रकार जो लोग यम- नियमों द्वारा तपाए जाने पर तप रुप ज्ञान से कुशल हो जाते हैं,वे मेरे स्वरुप को पा जाएं, तो इसमें किसी को सन्देह क्यों होनी चाहिए?*🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿

🍃🌿*ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।*

         *मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश:।।11।।*

         *काक्षन्त: कर्मणां सिद्धिं यजन्त इस देवता:।*

         *क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा।।12।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*सामान्य रूप से जो मेरे प्रति जैसा व्यवहार करते हैं मैं भी उनके प्रति वैसा ही व्यवहार करता हूं। हे पार्थ! तुम यह ध्यान में रखो कि मनुष्य मात्र में स्वाभाविक रूप से मेरे प्रति ही भक्ति रहती है, लेकिन अज्ञानता से उनका पतन होता है, क्योंकि भेद- बुद्धि उत्पन्न हो जाती है।*

*इस भेदबुद्धि वाली वृत्ति के कारण अभिन्न वस्तुओं में भी वे भेद करते हैं। यहां तक कि नाम रहित आत्मतत्व का भी नाम रख देते हैं और देवी -देवता के रूप में उस तत्व की साधना करते हैं जो आत्मतत्व सभी स्थान- समयों में एक जैसा रहता है, उसमें भी मन के खोट के कारण उन्हें उच्च -नीच की कल्पना करनी पड़ती है।*

*वे अपनी कामनापूर्ति के कारण मनचाहे देवी -देवताओं की आराधना करते हैं, जिससे उन्हें मनचाही वस्तुएं प्राप्त होते हैं।वस्तुत: कर्म के सिवाय यहां न कोई दाता है और न ग्रहणकर्ता। यहां केवल कर्म ही फलप्रदाता है।*

*जैसे भूमि में जो बोया जाता है वही उगता है। दर्पण में जो देखता है उसे उसी का प्रतिबिंब दिखाई देता है। पहाड़ के नीचे खड़े होकर जो बोला जाता है वही प्रतिध्वनित होता है।उसी प्रकार से हे कौन्तेय! कि देवी-देवताओं का मूलाधार मैं ही हूं, इस पर भी उपासकों के मनोनुकूल आराधना के फल का प्रदाता मैं ही हूं।*

🌿*चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्म विभागश:।*

    *तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।।13।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*मनुष्य में जो चार वर्ण दिखाई देते हैं वह भी गुण- कर्मों के आधार पर मैंने ही उत्पन्न किए हैं,ऐसा समझो। उन चारों वर्णों के कर्मों की अपनी-अपनी प्रकृति तथा गुणों के अनुसार व्यवस्था सहज ही हो गई।  गुण-कर्म के अनुसार ही वर्ण भेद की व्यवस्था हुई है। अन्यथा तो हे पार्थ! मनुष्य एक ही वर्ण के हैं। इस वर्णभेद की व्यवस्था का कर्ता मैं ही हूं।*

🍃*एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभि:।*

    *कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वै: पूर्वतरं कृतम्।।15।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*हे अर्जुन! अब तक जो मुमुक्षुजन हो गए हैं, उन्होंने इसी प्रकार मुझे जानकर सारे कर्म किए हैं। जिस प्रकार भुना हुआ बीज खेत में डालने पर नहीं उगता, इसी प्रकार से उनके निष्काम कर्म ही उन्हें मोक्ष प्राप्ति के लिए लाभप्रद सिद्ध हुए। विषयों के संबंध में यह ध्यान देने योग्य है कि कर्म अकर्मक का विचार विद्वानों को भी मंत्र रुचि अनुसार व मनमाने ढंग से डरने की जरूरत नहीं होती।*

🌿🍃*किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिता:।*

         *तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभाता:।।16।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*जिसे कर्म कहते हैं वह क्या है और अकर्मक के  क्या लक्षण हैं, इसका विचार करते समय बुद्धिमान भी भ्रम में पड़ जाते हैं। जिस प्रकार खोटा सिक्का पूर्णतः वास्तविक जैसा दिखता है, इसलिए देखने वाले को भ्रमित कर देता है। इस प्रकार कर्मा कर्म का विचार करते समय बड़े-बड़े ज्ञानियों की चेतना उड़ जाती है। कारण कि, ज्ञानीजन यदि चाहें, तो एक नई सृष्टि रच सकते हैं, लेकिन निष्कामता की असत्य कल्पना के चक्कर में अंततः उनके कर्म भी सकाम ही सिद्ध हुए हैं यानी भ्रमवश वे कर्मबंधनों में अटक जाते हैं।*

*इस विषय में विचार करते समय बड़े-बड़े ज्ञानी भी भ्रमित हो,गए तब मूर्खों की तो बात ही क्या है?अतः मैं इस संबंध में स्पष्टतया से हे पार्थ! तुम्हें बताता हूं- तुम ध्यान से सुनो।*

🌿🍃*कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मण:।*

         *अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गति:।।17।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*जिससे संसार की उत्पत्ति सरलता से होती है उसे 'कर्म' समझना चाहिए।*

*प्रथम सहज कर्म को स्पष्ट रूप से समझना चाहिए। उपरान्त यह समझना चाहिए कि शास्त्रों में वह कौन-कौन से कर्म 'विहित' या निमित्त कर्म हैं जो वर्णाश्रम के लिए उचित हैं और उनका उपयोग क्या है? इसके पश्चात् जिन कर्मों का निषेध किया गया है उन कर्मों को ठीक से समझना चाहिए। इसका परिणाम होगा कि हम भ्रमित नहीं होंगे। वस्तुत: सारा संसार कर्माधीन है और इसकी व्यापकता अधिक ही गहरी हैं, लेकिन अर्जुन अब इनको छोड़ो,तुम कृत्यकृत्य के लक्षण सुनो।

🌿🍃*कर्मण्यकर्म य: पश्येदकर्मणि च कर्म य:।*

         *स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्त:कृत्स्नकर्मकृत्।।18।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*जो मनुष्य कर्माचरण करता हुआ भी इस बात को ध्यान में रखता है की मैं निष्कर्मा हूं। जो कर्म-संग होने पर भी फल की कामना नहीं करता और जो केवल कर्तव्यबद्ध के अतिरिक्त अन्य किसी कारण से कर्म नहीं करता उसके सम्बन्ध में समझना चाहिए कि उसमें निष्कर्मता का भाव पूर्णतया समाया हुआ है, आता जो मनुष्य अपने कार्यों को यथारीति करता रहे उसे ही उक्त लक्षणों वाला ज्ञानी मानना चाहिए।*

*जिस प्रकार पानी के पास खड़ा मनुष्य पानी में अपनी प्रतिच्छाया देखता है और यह समझता है कि मैं पानी की प्रतिच्छाया  नहीं, वरन्  उससे भिन्न हूं या जैसे नौका में विहार करता मनुष्य नदी तट के पेड़ों को साथ-साथ दौड़ते हुए देखता है, लेकिन ठीक से विचार करने पर कहता है कि ये पेड़ साथ-साथ नहीं चल रहे। जो यह समझता है कि मेरा कर्माचरण आत्मा की दृष्टि से अनुचित है और जो मूल स्वरूप को पहचान लेता है वही सत्य में निष्कर्मा है।*

*जैसे सूर्य उदय -अस्त के समय निर्विघ्न रूप से भ्रमण करता रहता है, वैसे ही मनुष्य सब कर्म करता हुआ भी निष्कर्मता को बनाए रखता है। देखने में तो वह मनुष्य लगता है, लेकिन जैसे सूर्य की प्रतिच्छाया पानी में पड़ने पर भी वास्तविक सूर्य पानी में नहीं भीगता वैसे ही निष्कर्मा मनुष्य को भी मनुष्यत्व कभी छू नहीं सकता।*

*ऐसा मनुष्य संसार को देखता है, सब कुछ करता हुआ भोगों को भी भोगता है, लेकिन वह इन सबसे निर्लिप्त रहता है। वह एक स्थान पर रहता हुआ भी सारे संसार में भ्रमण करता है, अपितु कहना यही चाहिए कि वह स्वयं ही विश्वरुप हो जाता है।*

🌿🍃*यस्य सर्वे समारम्भा:कामसंल्प वर्जिता:।*

         *ज्ञानाग्निदग्ध कर्माणं तमाहु: पण्डितं बुधा:।।19।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*जिस पुरुष को कर्मों के आचरण के सम्बन्ध में चिंता नहीं होती तथा संकल्प- विकल्प भी उसके मन में नहीं होते कि मैं यह कार्य करूंगा या हाथ में लिया हुआ काम पूरा करूंगा, क्योंकि उसने ज्ञान रूपी अग्नि में अपने सारे कर्म भस्म कर डाले हैं। ऐसा वह मनुष्य, तो मनुष्य के रूप में साक्षात परब्रह्म ही है ,ऐसा समझो।*

🌿🍃*त्यक्त्वा कर्मफलासंगं नित्यतृप्तो निराश्रय:।*

         *कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति स:।।20।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*जो अपने शरीर के प्रति उदासीन और कर्म से प्राप्त होने वाले फल के प्रति विरक्त होता है और जो सदैव आनंद स्वरूप में निमग्न रहता है, वह पुरुष- हे पार्थ! आत्मबोध के पकवान का भोजन करते नहीं अघाता।*

🌿🌿*निराशीर्यत चित्तात्मा व्यक्त सर्वपरिग्रह:।*

         *शारीरं केशवलं कर्मं कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।21।।*

         *यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सर:।*

         *सम: सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते।।22।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*जो आशा को छोड़ देता है और उसे अहंकार के साथ न्योछावर करके फेंक देता है और ब्रह्म सुख का आस्वादन करता है। जिस समय जो भी मिले उसमें सुख मान लेता है। जिसे अपने व पराए में कोई भेद दिखाई नहीं देता।संसार में देखने पर आत्मस्वरूप के अतिरिक्त जिसे और कुछ दिखाई नहीं देता, उसे किस कर्म से और कैसी बाधा हो सकती है? जिसे ईर्ष्या नहीं होती वह सभी प्रकार से मुक्त है। सारे कर्म करते रहने पर भी वह (अकर्मा) है।*

🌿🍃*गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थित चेतस:।*

         *यज्ञायाचरत: कर्म समग्रं प्रविलीयते।।23।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*वह देहधारी होता है, किंतु विचारों में चैतन्य के समान दिखाई देता है और ब्रह्म की कसौटी पर खरा उतरता है। यद्यपि वह मुक्त है इस पर भी कभी-कभी विधिपूर्वक यज्ञादि कर्मों का आचरण भी करता है, लेकिन वे संपूर्ण कर्म आत्मस्वरूप में लीन हो जाते हैं। जैसे असमय के बादल आकाश में चारों ओर छा जाने पर भी वर्षा नहीं करते और आकाश में ही लीन हो जाते हैं। वैसे ही पुरुष के यज्ञ यज्ञादि कर्म उसके ऐक्यरूप में एक हो जाते हैं।*

🌿🍃*ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्राह्मणा हुतम्।*

         *ब्रह्यौव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना।।24।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*वह जो भी यज्ञ करता है, उसमें होम द्रव्य तथा मंत्र आत्मस्वरूप अथवा ब्रह्मस्वरूप ही है, ऐसा समझता है, इसलिए हे अर्जुन! ब्रह्म ही कर्म है, ऐसी सद्बुद्धि जिसके अंतःकरण में है वह कर्म कर्ता भी है और तब भी वह नए नैष्यकर्म्य  ही है। जो लोग अभिषेक रूप बाल्यावस्था पार करके विरक्ति( विराग) से विवाह कर लेते हैं तब अग्निहोत्र प्रारंभ कर देते हैं।*

🌿🍃*दैवमेवापरे यज्ञं योगिन:पर्युपासते।*

         *ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोप जुह्वति।।25।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*हे अर्जुन! जो दिन-रात  गुरु      वाक्यरूपी अग्नि में मन के साथ अज्ञान की आहुति देते रहते हैं, उन्हीं को यह योगयज्ञ करना चाहिए तथा जिसे आत्मसुख की अभिलाषा हो उसी को यह यज्ञ करना चाहिए। इसी को 'दैव यज्ञ' कहते हैं।अब मैं तुम्हें यज्ञ के कुछ अन्य प्रकार बताता हूं,ध्यान से सुनो ।जो ब्रह्माग्नि से अग्निहोत्र करते हैं वे उस यज्ञ से ही यज्ञ-विधि करते हैं।

🌿*श्रोत्रिदीनिन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति।*

     *शब्दादीन्विविषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति।।26।।*

     *सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे।

     *आत्मसंयम योगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते।।27।।*

     *द्रव्य यज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे।*

     *स्वाध्याय ज्ञानयज्ञाश्च यतय: संशित व्रता:।।28।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃*हे अर्जुन! ध्यान, धारणा, समाधिरुप मंथन, कोई अग्निहोत्री कितने ही मूलबंधादि द्वारा इंद्रियरुप पवित्र द्रव्य से यज्ञ करते हैं।दूसरे कितने ही वैराग्य रुप सूर्योदय के साथ संचयरुप यज्ञवेदी बनाकर उसमें इंद्रियरुप अग्नि प्रकट करते हैं। जब वैराग्य की ज्वाला प्रज्वलित हो जाती है तब उसमें विकार का ईंधन भस्म होने लगता है और अंत:करण पंचकुंडों को छोड़कर आशारुपी धुआं बाहर निकलता है, जिससे वे कुछ पवित्र हो जाते हैं। तब ऐसे लोग 'अहं ब्रह्मास्मि' का उच्चारण करते हुए हृदय-कुंड में इंद्रियरुप अग्नि के मुख में विषयों की आहुति देते हैं।*

*हे अर्जुन! कुछ लोग संयम का अग्निहोत्र करके भी सर्वशुद्ध हुए हैं। कुछ लोग हृदय रूपी अरणी को घिस कर अग्नि उत्पन्न करने के लिए विवेक को मथानी बनाते हैं। उस मथानी को वे शांतिपूर्वक दृढ़ता से पकड़कर ऊपर से सात्विक धैर्य के साथ दृढ़ता से पकड़कर गुरुमंत्र रुपी डोर से गम्भीर मंथन करते हैं।*

*इस प्रकार निरंतर करते रहने से उसका फल शीघ्र प्राप्त हो जाता है, लेकिन ज्ञानाग्नि के प्रज्वलित होने से पूर्व थोड़ा धूम उठता है जो ऋद्धि-सिद्धियों का मोह कहलाता है। वह धुम शीघ्र निकल जाता है,तब पहले ज्ञानरुपी अग्नि की अतिसूक्ष्म चिनगारी उत्पन्न होती है।यम-दम से सुखाने के कारण जो मन पहले ही हल्का हो चुका होता है,वही मन चिनगारी के लिए ईंधन का काम करता है।*

*जब तीव्र ज्वाला उत्पन्न होती है तब विविध वासनाएं ईंधन के रूप में ममतारूपी घी के संग भस्म हो जाती हैं। तब दीक्षित मनुष्य 'सोऽहम्' मंत्र का  उच्चारण करता हुआ प्रज्वलित ज्ञानाग्नि में इंद्रियों के कर्मों की आहुति देता है। आगे गुणकर्म रुपी स्रुवा दर्भपात्र से उस अग्नि में पूर्णाहुति दी जाती है,तब अंत में ब्रह्मा की एकरुपता में अवभृथ स्नान( यज्ञ से पूर्व स्नान) होता है।*

*वे यज्ञकर्ता संयमाग्नि में इंद्रियादि होम द्रव्य से होम करके संयमरुप यज्ञ का शेष हविर्भाग जो आत्मज्ञान का आनंद है -पुरोडाश के रुप में ग्रहण करते हैं।अनेक लोग ऐसा यज्ञ करके त्रिभुवन से मुक्त हो चुके हैं।अब तक मैनें जो यज्ञ विधान बताएं हैं वे दिखने में भिन्न-भिन्न लगते हैं, लेकिन सबका लक्ष्य एक ही है और वह लक्ष्य ब्रह्म से समरसता प्राप्त करना है।*

*उनमें से किसी को द्रव्य यज्ञ कहा जाता है, कुछ यज्ञ तपरुप क्षमता से उत्पन्न होते हैं,कितने ही योग यज्ञ कहे गए हैं। कितने ही यज्ञों में शब्द से शब्दों की आहुति दी जाती है, अर्थात् वेदोच्चारण करते हैं उसे 'वाक् यज्ञ' कहते हैं। जिसे ज्ञान से जाना जाता है उसे 'ज्ञानयज्ञ' कहा जाता है, लेकिन हे अर्जुन! ये सारे यज्ञ बड़े विकट हैं, क्योंकि इनका अनुष्ठान कठिन है। जो जितेंद्रिय हैं वे अपनी क्षमता से इन यज्ञों का साधन करते हैं, अतः वे आत्मा के रुप में जीव बुद्धि का हवन करते हैं।*

🌿🍃*अपाने  जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे।*

         *प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायाम परायणा:।।29।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*कोई अभ्यास करके अपान वायुरूपी अग्नि में प्राणवायु रुपी द्रव्य का हवन करते हैं, कोई अपान -वायु की प्राण-वायु में आहुति देते हैं और कोई दोनों का निरोध करते हैं। उन्हें 'प्राणायामी' कहा जाता है।*

🌿🍃*अपरे नियताहारा: प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।*

         *सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपित कल्मषा:।।30।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*कुछ लोग वज्रासन द्वारा मूलबंध लगाकर आहारों का नियमन करके धैर्य पूर्वक प्राणों से प्राणों का लय करते हैं। ऐसा करके वह मन के कलुष को दूर करने वाले यज्ञकर्ता मोक्षकामी होते हैं। जो लोग अज्ञान को भस्म कर आत्मरूप ही बचाए रहते हैं उनमें अग्नि और यज्ञकर्ता का भेद नहीं रहता। ऐसी स्थिति में यज्ञकर्ता का हेतु पूरा हो जाता है, यज्ञ -क्रिया समाप्त हो जाती है और कर्मों के सारे द्वंद समाप्त हो जाते हैं तब विचार और हेतु के प्रवेश की अल्पमात्र भी संभावना नहीं रहती है और द्वैतभाव का दोष भी स्पर्श नहीं कर सकता।

🍃🌿*यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।*

         *नायं लोकोऽस्त्य यज्ञस्य कुतोऽन्य: कुरुसत्तम।।31।।*

🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃*ऐसा जो अनादि सिद्ध तथा शुद्ध यज्ञ के परिणाम स्वरुप शेष बचने वाला ज्ञानस्वरुप ब्रह्म है,उसका ब्रह्मनिष्ठजन 'अहं ब्रह्मास्मि' के मंत्र से सेवन करते हैं। इस प्रकार यज्ञ से बचा हुआ ज्ञानरुप अमृत पीकर जो तृप्त हो जाते हैं,वही सहज ब्रह्मतत्त्व को प्राप्त करते हैं। जो योगयज्ञ भी नहीं करते उनका -हे अर्जुन! इस लोक में कल्याण नहीं होता। उनके परलोक के विषय में क्या पूछते हो ? उनके सम्बन्ध में बात करना ही निरर्थक है।*

🍃🌿*एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे।*

         *कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेव ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे।।32।।*

🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃*इस प्रकार मैंने तुम्हें मन के जो अनेक प्रकार बतलाए हैं,उनके सम्बन्ध में वेदों में विस्तार से बतलाया गया है, लेकिन हमें इससे क्या लेना- देना? उसका सार यही है कि सारे यज्ञ कर्म से उत्पन्न हुए हैं। इतना जान लेने पर कर्म की बाधा नहीं होती।*🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃

🌿🍃श्रेयान्द्र व्यमयाद्य ज्ञाज्ज्ञानयज्ञ: परंतप:।*

         *सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते।।33।।*

         *तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।*

         *उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिन:।।34।।*

         *यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यासि पाण्डव।*

         *येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि।।35।।*

         *अपि चेदसि पापेभ्य: सर्वेभ्य: पापकृत्तम:।*

         *सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यति।।36।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿 *हे अर्जुन! जिसका मूल वेद है और जो बाहरी क्रिया प्रधान स्थूल यज्ञ है उनका अपूर्व फल स्वर्ग का सुख है। *उन यज्ञों में केवल जड़ -पदार्थों की आहुति दी जाती है, अतः जैसे सूर्य के तेज के सामने तारों का तेज मन्द पड़ जाता है वैसे ही ज्ञान यज्ञ के सामने जड़- यज्ञ तेजहीन हो जाते हैं।*

*परमात्म स्वरुप का सुख पाने के लिए योगी ज्ञान रूपी अंजन प्रकाशरूपी नेत्रों में डालना कभी नहीं भूलते।*

*जो वर्तमान कर्म का समाप्ति स्थल है,कर्मातीत ज्ञान की खान है, आत्म सुख के लिए जो व्याकुल है, उसके साधनों की जो तृप्ति है, इसके आगे प्रवृत्ति पंगु हो जाती है, तर्क दृष्टिहीन हो जाता है, इंद्रियां विषयों का संग करना भूल जाती हैं, जिसके मन का मनपना समाप्त हो जाता है, शब्द का शब्दत्व स्थगित हो जाता है, ज्ञेय का पता लग जाता है, जो ज्ञान-वैराग्य की इच्छा पूर्ण कर देता है, विवेक का समाधान करता है और बिना प्रयास के आत्मतत्व से भेंट करा देता है।*

*यदि तुम उत्तम ज्ञान पाने के इच्छुक हो, तो संतों की सेवा ही ज्ञान रूप मंदिर की चौखट है।अतः हे पार्थ! तुम सेवा करके ज्ञान को प्राप्त करो। इसके लिए शरीर, मन, वाणी से संतों के चरणों की शरण करनी चाहिए और अभिमान त्याग कर उनकी तुम्हें अपार सेवा करनी चाहिए।*

*ऐसा करने पर जिस ज्ञान को पाने की हमारी इच्छा है उसके विषय में पूछने पर संतजन उस वांछित ज्ञान का हमें उपदेश देंगे और वह ज्ञान ऐसा है जिसका उपदेश मन में समा जाए,तो मन संकल्परहित हो जाता है।*

*संतो के उपदेश रूपी प्रकाश से निर्भय हुआ चित्त( मन) ब्रह्म जैसा ही संशयहीन हो जाता है। उस समय तुम अपने सहित यह सारा संसार निरंतर मेरे स्व- स्वरूप में देख सकोगे। हे अर्जुन! जब गुरुदेव की कृपा होगी तब इस ज्ञान रूपी प्रकाश का प्रातः काल होगा और अंधकार मिट जाएगा।*

*हे अर्जुन तुम भले ही पाप के सागर हो, भ्रांति के सागर और विकारों( दोषों) के पर्वत ही क्यों न हो,तब भी इस ज्ञानशक्ति के आगे ये सब बातें तुच्छ हैं। इस ज्ञान में इतनी उत्तम निर्दोष क्षमता है।जिस ज्ञानरुपी पलाश के सामने उस अमूर्त रामतत्व की विश्व के आभास रुप की छाया भी शेष नहीं रहती ,उस ज्ञान को तुम्हारे मन की कलुषता को भगाने में भला कितना श्रम करना पड़ेगा? इस सम्बन्ध में किसी प्रकार की शंका करना ही मूर्खता के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। संसार में इस ज्ञान जैसी व्यापक,सक्षम अन्य कोई वस्तु नहीं है।*🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿

🍃🌿यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मत्कुरुतेऽर्जुन।*

        *ज्ञानाग्नि: सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।।37।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*प्रलयकाल में त्रिलोकी में आग लगने पर आकाश में फैले हुए धूएं को बवंडर क्षणमात्र में दूर कर देता है। उसे बादल को हटाने में क्या देर लगती है अथवा पवन से प्रज्वलित जो अग्नि पानी को भी जला देती है,ऐसी प्रलयकाल की अग्नि क्या घास और लकड़ियों को भी नहीं भस्म कर पाएगी ?*

🍃🌿*न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।*

         *तत्वस्वयं योगसंसिद्ध: कालेनात्मनि विन्दति।।38।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*यदि ठीक ढंग से सोचा -समझा जाए,तो ऐसा कहना सर्वथा असंगत है कि परम ज्ञान से मन की मलिनता दूर हो सकती है। तो ज्ञान से बढ़कर इस संसार में कोई भी वस्तु पवित्र नहीं है। जैसे संसार में चैतन्य के अतिरिक्त अन्य कोई वस्तु नहीं है जिसे चैतन्य की उपमा दी जा सके। इसी प्रकार ज्ञान भी ऐसा उत्तम है कि इसकी समकक्ष की वस्तु अन्य कोई भी नहीं है।*

*यदि सूर्यबिंब की कसौटी पर उसका प्रतिबिंब सटीक उत्तर दे सके या आकाश को गठरी में बांधा जा सके, अथवा पृथ्वी जितना भार हाथ पर उठाया जा सके। तभी तो पार्थ! संसार से इस ज्ञान की उपमा मिल सकती है अन्यथा नहीं, अतः सब दृष्टियों से विचार किया जाए तो यही निष्कर्ष निकलता है कि ज्ञान की पावनता ज्ञान में ही है और अन्यत्र कहीं नहीं मिल सकती।*

*जैसे यह बतलाना हो कि अमृत का स्वाद कैसा होता है, तो यही कहा जाएगा कि अमृत का स्वाद अमृत जैसा ही होता है। इस विषय में अधिक समय नष्ट करना व्यर्थ है। श्रीकृष्ण के ऐसा कहने पर अर्जुन ने कहा- देव! आपका कहना उचित है। तो अर्जुन ने मन में सोचा कि अब श्री कृष्ण से यह भी पूछना चाहिए कि इस ज्ञान को पहचाना कैसे जाए और इसके लक्षण क्या हैं?  लेकिन श्रीकृष्ण ने उसके मन के विचार को भांपते हुए कहा-भैया अर्जुन! ज्ञान के संबंध में मैं तुम्हें बताता हूं, ध्यान से सुनो!*🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿

🍃🌿*श्रद्धावांल्लभते  ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।*

         *ज्ञानं लब्ध्वा परां शांतिमचिरेणाधिगच्छति।।39।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*जिस मनुष्य ने आत्म सुख का एक बार स्वाद चख लिया,तो इस संसार के सारे विषय उसे तुच्छ लगते हैं। जो इंद्रियों का पोषण नहीं करता,माया में नहीं रमता, श्रद्धा -बुद्धि के संगति से सुखी हो जाता है,अखंड-निर्दोष शांति से युक्त ज्ञान उसे खोजता हुआ स्वयं उसके पास आता है। जहां ज्ञान मन में  भली-भांति समाहित हो जाता है और शांति उत्पन्न होती है, वहां आत्मबोध का प्रचंड विस्तार स्वयं होने लगता है।*

*इतना होने पर वह मनुष्य जिस ओर देखता है,उसी ओर उसे शांति दिखाई देती है तथा अपने-पराए की भावना समाप्त हो जाती है। इस प्रकार ज्ञान-बीज का विस्तार निरंतर होता रहता है। अब इसका बखान मैं कहां तक करूं। इतना ही पर्याप्त है।*

🌿🍃*अज्ञश्चाश्रद्धानश्च संशयात्मा विनश्यति।*

         *नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मन:।।40।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*हे पार्थ! जिस मनुष्य के मन में ज्ञान -प्राप्ति की इच्छा न हो उसका तो जीने की अपेक्षा मर जाना अच्छा है। जैसे उजाड़ घर और निष्प्राण शरीर होता है, वैसे ही ज्ञानहीन का जीवन भ्रमित होता है या यदि किसी मनुष्य की ऐसी अवस्था हो उसे ज्ञान तो प्राप्त नहीं हुआ, इस पर भी जिसके मन में ज्ञान के प्रति सम्मान या दंभ हो, तो ऐसा समझना चाहिए कि उसका ज्ञान पा लेना संभव है। ज्ञानहीन का कोई मूल्य नहीं है।*

*यदि किसी को यह ज्ञान न भी हो और उसके मन में ज्ञान के प्रति सम्मान भी न हो तो उसके सम्बन्ध में समझना चाहिए कि वह संशय की अग्नि में भस्म हो गया। यदि किसी के मन में ज्ञान के प्रति अरुचि हो और अमृत भी उसे अच्छा न लगे तब समझें कि उसकी मृत्यु सिर पर मंडरा  रही है।*

*इसी प्रकार जो मनुष्य सुखों से घिरा हो, ज्ञान में उसकी रुचि नहीं है, तो समझे कि वह संशय से आकंठ घिरा है, जो संशय में होता है, उसका नाश होता है। वह सभी लोकों के सुख से वंचित रहता है। जिसे भीषण ज्वर चढ़ता है, शीत उष्ण का भी जिसे पता  न चलता हो, जो आग और शीतलता को समान समझता हो, ऐसे संसार में पड़े मनुष्य को अच्छे बुरे, असंबद्ध- योग्य, भद्र- अभद्र का अंतर ज्ञात नहीं होता।*

*जैसे जन्म से नेत्रहीन को रात -दिन का ज्ञान नहीं होता वैसे ही संशयग्रस्त को किसी भी बात का पता नहीं चलता,  अतः संसार में इस जैसा कोई घोरपातक नहीं है। प्राणियों के नाश का यह जाल है, अतः तुम संशय करना छोड़ दो जो अज्ञान से उत्पन्न होता है।*

*सबसे पहले तुम्हें संशय को जीतना चाहिए। जब आज्ञा का घोर अंधेरा फैलता है तब संशय का प्रभाव अधिक बढ़ जाता है और श्रद्धा का मार्ग समाप्त हो जाता है। आगे यह इतना बढ़ता है कि मन में समा भी नहीं पाता और बुद्धि को ग्रस लेता है तब उस मनुष्य के लिए त्रिभुवन संशयमय हो जाता है।🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿

🍃🌿- *योगसंन्यस्त कर्माणं ज्ञानसंछिन्न संशयम्।*

           *आत्मववन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय।।41।।*

           *तस्माद ज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानसिनात्मन:।*

           *छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत।।42।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*चूंकि  संशय की व्यापकता अत्यधिक है, जो मात्र एक उपाय से शांत किया जा सकता है। ज्ञान की लपलपाती खड्ग यदि हमारे हाथ में हो, तो उसे तीखी धार की तलवार से उसकी जड़ को नष्ट किया जा सकता और मन में उसका अल्पमात्र भी अंश नहीं रह जाता। अतः हे धनंजय! तुम शीघ्र उठो और मन में वास करने वाले इस संशय को नष्ट कर डालो।*

*इस प्रकार श्रेष्ठ और ज्ञानदीप श्री कृष्ण ने यह सारी बातें, अर्जुन से कहीं। इन बातों को आप ध्यान में रखें। श्री कृष्ण ने जो बातें पहले कहीं थी और अब जो कहीं  उनका विचार करके अर्जुन अब जो प्रश्न करेंगे उसका प्रसंग भक्ति का कोष और रसोत्पत्ति की प्रौढ़ता से परिपूर्ण है। अब आगे उसी का वर्णन किया जाएगा।*

*जिस शांतरस के माधुर्य पर शेष आठों (वीर,वीभत्स, श्रृंगार,करुण आदि) रस न्योछावर करके फेंक देने योग्य हैं और जो शांतरस में सज्जनों की बुद्धि को आश्रय प्राप्त होता है, वह शांत रस इस कथा में चरम को प्राप्त होगा। यह कथा आप समुद्र से भी अधिक गंभीरता और अर्थपूर्ण भाषा में श्रवण करें।*

*जैसे सूर्य का प्रतिबिंब दिखाई देता है, लेकिन प्रकाश इतना अधिक होता है कि त्रिभुवन में भी नहीं समा पाता।वैसे ही आपको इस कथा के शब्दों की व्यापकता की अनुभूति होगी, या जैसे कल्पवृक्ष  मांगने वाले की इच्छा के अनुसार फल देता है, वैसे ही इस वाणी की व्यापकता भी श्रोताओं की इच्छा अनुसार कम या  अधिक होगी, अतः आप सब लोग सावधानी से सुनें। अब अधिक कहने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि आप लोग सर्वज्ञाता हैं, अतः अधिक क्या कहा जाए।*

*मेरी केवल यही प्रार्थना है कि आप लोग ध्यान से सुनें। जैसे स्त्री में सौंदर्य, गुण,कुलीनता के साथ-साथ पवित्रता भी होती है, वैसे ही इन पंक्तियों में साहित्य का लालित्य,गुण और शांत रस दोनों ही स्पष्ट दिखते हैं। एक तो चीनी सबको अच्छी लगती ही है, इस पर भी यदि औषधि के रुप में दी जाए, तो फिर वह आनंद से क्यों न खाई जाए?*

*मलय वायु मंद-सुवासित होती है,उस पर भी यदि अमृत का माधुर्य प्राप्त हो जाए तो वह स्वस्पर्श से सभी अंगों का ताप हर लेती है, मधुर रुचि से जिह्वा और आनंद से नचाती हैं और कानों को तृप्त करके 'धन्य-धन्य' का भाव व्यक्त करवाती है।*

*इस प्रकार यह कथा सुनने से कानों की तृप्ति हो जाती है और बिना किसी अपकार के संसार के सारे दुख जड़ से दूर हो जाते हैं। यदि मंत्र से शत्रु मर जाता हो, तो नीम का कड़वा रस पीने का क्या प्रयोजन है? इसी प्रकार इंद्रियों को कष्ट दिए बिना केवल कथा सुनने से ही मोक्ष स्वत: प्राप्त होता है, अतः श्री निवृत्ति नाथ का शिष्य ज्ञान देव कहता है कि आप लोग शांत भाव से गीता का अर्थ भलीभांति श्रवण करें।* ‌

                 🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿

      ।।ज्ञानकर्मसंन्यासयोगो नाम चतुर्थोऽध्याय:  समाप्त।।

                 🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿

🪷🚩🪷डॉ त्रिभुवन नाथ श्रीवास्तव, पूर्व प्राचार्य 🪷🚩🪷

गुरुवार, 11 दिसंबर 2025

महर्षि पतंजलि जी और साधन पाद सूत्रों की संक्षिप्त व्याख्या।

योग दिवस पर व्याख्यान 

महर्षि पतंजलि की मूर्ति 



महर्षि पतंजलि जी की मूर्ति 


                          महर्षि वी के एस आयंगर जी 


कुछ आसनों के चित्र 

महर्षि पतंजलि ने योग सूत्र पर कुल सवा लाख सूत्र कहे थे। जिनका कथन काल आज से 4000 वर्ष पूर्व, काशी स्थान पर माना जाता है। वर्तमान समय में कुल 195 सूत्र ही उपलब्ध हैं। जिन्हें 4 पादों में उपलब्ध कराया गया है, जिनके नाम क्रमशः, समाधि, साधन, कैवल्य और विभूति पाद है। 
पतंजलि के साधन पाद में 55 सूत्र हैं, जिनमें योग के साधनों का वर्णन किया गया है। यह पाद प्रारंभिक साधकों के लिए योग के विभिन्न पहलुओं को समझने और आत्मसात करने के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करता है।

*साधन पाद के मुख्य बिंदु:*

1. *क्रिया योग*: पतंजलि ने क्रिया योग को तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान के रूप में परिभाषित किया है। यह योग का एक व्यावहारिक रूप है जो साधकों को अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने में मदद करता है।

2. *अविद्या*: पतंजलि ने अविद्या को अनित्य, अशुचि, दुःख और अनात्म में नित्य, शुचि, सुख और आत्म की भावना को बताया है। अविद्या के कारण ही हमारा चित्त विक्षिप्त होता है और हम दुःखों का अनुभव करते हैं।

3. *क्लेश*: पतंजलि ने पांच प्रकार के क्लेशों का वर्णन किया है - अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश। ये क्लेश हमारे चित्त को विक्षिप्त करते हैं और हमें दुःखों की ओर ले जाते हैं।

4. *कर्म और कर्मफल*: पतंजलि ने कर्म और कर्मफल के सिद्धांत को समझाया है। उन्होंने बताया है कि हमारे कर्मों के फलस्वरूप हमें सुख या दुःख की प्राप्ति होती है।

5. *विवेक*: पतंजलि ने विवेक को ज्ञान का एक महत्वपूर्ण साधन बताया है। विवेक के द्वारा हम सत्य और असत्य के बीच का अंतर समझ सकते हैं और अपने जीवन को सकारात्मक दिशा में ले जा सकते हैं।

*साधन पाद के सूत्रों की विस्तृत व्याख्या:*
प्रथम 8 सूत्रों की संक्षिप्त व्याख्या इस प्रकार है, शेष 15वें सूत्र ए5 वें सूत्र तक की व्याख्या नीचे दी जाएगी।

1. *तपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः* (सूत्र 1) - क्रिया योग का वर्णन करते हुए पतंजलि कहते हैं कि तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान क्रिया योग के तीन मुख्य अंग हैं।

2. *समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च* (सूत्र 2) - पतंजलि कहते हैं कि क्रिया योग का उद्देश्य समाधि की अवस्था को प्राप्त करना और क्लेशों को कम करना है।

3. *अविद्याऽऽस्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः* (सूत्र 3) - पतंजलि ने पांच प्रकार के क्लेशों का वर्णन किया है - अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश।

4. *विपर्ययदर्शनमविद्या* (सूत्र 5) - पतंजलि कहते हैं कि अविद्या का अर्थ है विपरीत ज्ञान या मिथ्या ज्ञान।

5. *दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता* (सूत्र 6) - पतंजलि कहते हैं कि अस्मिता का अर्थ है द्रष्टा और दृश्य की एकता।

6. *सुखानुशयी रागः* (सूत्र 7) - पतंजलि कहते हैं कि राग का अर्थ है सुख की इच्छा।

7. *दुःखानुशयी द्वेषः* (सूत्र 8) - पतंजलि कहते हैं कि द्वेष का अर्थ है दुःख का भय।

8. *स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः* (सूत्र 9) - पतंजलि कहते हैं कि अभिनिवेश का अर्थ है मृत्यु का भय।

ये कुछ मुख्य बिंदु हैं जो पतंजलि के साधन पाद में वर्णित हैं। इस पाद में पतंजलि ने योग के विभिन्न पहलुओं को विस्तार से समझाया है और साधकों को अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए मार्गदर्शन प्रदान किया है।

*सूत्र 15:*
"परिणामत्रयसंयमादतीतानागतज्ञानम्"

अर्थ: परिणाम त्रय (जन्म, स्थिति और परिवर्तन) पर संयम करने से भूत और भविष्य का ज्ञान प्राप्त होता है।

व्याख्या: इस सूत्र में पतंजलि कहते हैं कि जो साधक परिणाम त्रय पर संयम करता है, वह भूत और भविष्य के बारे में जान सकता है। परिणाम त्रय का अर्थ है किसी वस्तु या व्यक्ति के जन्म, स्थिति और परिवर्तन की प्रक्रिया। जब साधक इस प्रक्रिया पर ध्यान केंद्रित करता है, तो वह समय और स्थान की सीमाओं से परे जा सकता है और भूत और भविष्य के बारे में जान सकता है।

*सूत्र 16:*
"शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात्संकरः तत्र प्रतिप्रसवसंयमात्सर्वभूतानां ज्ञानम्"

अर्थ: शब्द, अर्थ और प्रत्यय (ज्ञान) के परस्पर अध्यास से संकर होता है। इस संकर पर प्रतिप्रसव संयम करने से सभी प्राणियों की भाषा का ज्ञान प्राप्त होता है।

व्याख्या: इस सूत्र में पतंजलि कहते हैं कि शब्द, अर्थ और प्रत्यय के बीच एक जटिल संबंध होता है। जब साधक इस संबंध पर संयम करता है, तो वह सभी प्राणियों की भाषा को समझने की क्षमता प्राप्त कर सकता है।

*सूत्र 17:*
"प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम्"

अर्थ: प्रत्यय (ज्ञान) पर संयम करने से दूसरे के चित्त का ज्ञान प्राप्त होता है।

व्याख्या: इस सूत्र में पतंजलि कहते हैं कि जो साधक अपने प्रत्यय पर संयम करता है, वह दूसरे के चित्त को समझने की क्षमता प्राप्त कर सकता है।

*सूत्र 18:*
"स चाप्रतिषिद्धं सर्वत्र"

अर्थ: और वह ज्ञान (प्रत्यय) अप्रतिषिद्ध होता है और सर्वत्र लागू होता है।

व्याख्या: इस सूत्र में पतंजलि कहते हैं कि जो साधक प्रत्यय पर संयम करता है, उसका ज्ञान अप्रतिषिद्ध होता है और वह सर्वत्र लागू होता है।

*सूत्र 19:*
"काय रूप संयमात्तद्ग्राह्यशक्ति स्तम्भे चक्षुः प्रकाशकयोः संप्रयोगे अणिमादि प्रादुर्भावः काये च तत्संयमात्तद्ग्राह्य शक्ति स्तम्भः"

अर्थ: शरीर के रूप पर संयम करने से शरीर की ग्राह्य शक्ति का स्तम्भ होता है और चक्षु और प्रकाश के संप्रयोग से अणिमा आदि सिद्धियों का प्रादुर्भाव होता है।

व्याख्या: इस सूत्र में पतंजलि कहते हैं कि जो साधक शरीर के रूप पर संयम करता है, वह शरीर की ग्राह्य शक्ति को नियंत्रित कर सकता है और अणिमा आदि सिद्धियों को प्राप्त कर सकता है।

*सूत्र 20:*
"ग्रहण स्वरूपास्मितान्वयार्थवत्त्वसंयमात् इन्द्रिय जयः"

अर्थ: ग्रहण, स्वरूप, अस्मिता और अन्वय अर्थवत्त्व पर संयम करने से इन्द्रियों पर विजय प्राप्त होती है।

व्याख्या: इस सूत्र में पतंजलि कहते हैं कि जो साधक ग्रहण, स्वरूप, अस्मिता और अन्वय अर्थवत्त्व पर संयम करता है, वह इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर सकता है।

इन सूत्रों में पतंजलि ने विभिन्न प्रकार के संयमों का वर्णन किया है जो साधकों को विभिन्न सिद्धियों और ज्ञान को प्राप्त करने में मदद कर सकते हैं।

*सूत्र 21:*
"सत्त्वपुरुषयोरत्मभावे योगः"

अर्थ: सत्त्व और पुरुष के आत्मभाव में योग होता है।

व्याख्या: इस सूत्र में पतंजलि कहते हैं कि जब सत्त्व (चित्त की शुद्धता) और पुरुष (आत्मा) एक दूसरे के साथ जुड़ते हैं, तो योग की अवस्था प्राप्त होती है। यह योग की मूल अवस्था है जिसमें चित्त और आत्मा एक दूसरे के साथ समन्वय में होते हैं।

*सूत्र 22:*
"तदर्थ एव दृश्यस्य आत्मा"

अर्थ: दृश्य (जगत) का आत्मा (उद्देश्य) केवल उस (पुरुष) के लिए है।

व्याख्या: इस सूत्र में पतंजलि कहते हैं कि दृश्य जगत का उद्देश्य केवल पुरुष (आत्मा) के लिए है। दृश्य जगत का अस्तित्व पुरुष के लिए है, और इसका उद्देश्य पुरुष को अपनी वास्तविकता का ज्ञान कराना है।

*सूत्र 23:*
"वशीतापि तदा न तस्य वशी करणसंपत्तेः"

अर्थ: (कुछ लोगों के मत से) वशी (ईश्वर) भी तभी तक (दृश्य के अधीन है), जब तक उसकी वशी करण संपत्ति नहीं होती।

व्याख्या: इस सूत्र में पतंजलि कहते हैं कि कुछ लोगों के मत से ईश्वर भी दृश्य के अधीन है, जब तक वह अपनी वशी करण शक्ति का उपयोग नहीं करता। ईश्वर की वशी करण शक्ति उसे दृश्य से मुक्त करती है और उसे अपने वास्तविक रूप में स्थापित करती है।

*सूत्र 24:*
"ततः प्रभुरवैषम्यनैर्घृण्ययोः"

अर्थ: वह (ईश्वर) प्रभु है, जिसमें वैषम्य और नैर्घृण्य नहीं है।

व्याख्या: इस सूत्र में पतंजलि कहते हैं कि ईश्वर प्रभु है, जिसका अर्थ है कि वह सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ है। ईश्वर में वैषम्य (असमानता) और नैर्घृण्य (क्रूरता) नहीं है, और वह सभी प्राणियों के साथ समान और न्यायपूर्ण व्यवहार करता है।

*सूत्र 25:*
"तत्र बीजरूपः क्लेशशक्तिः परप्रज्ञा त्वनिर्वाच्यत्वात्"

अर्थ: उसमें (ईश्वर में) बीज रूप से क्लेश शक्ति होती है, लेकिन उसकी प्रज्ञा अनिर्वचनीय है।

व्याख्या: इस सूत्र में पतंजलि कहते हैं कि ईश्वर में बीज रूप से क्लेश शक्ति होती है, लेकिन उसकी प्रज्ञा अनिर्वचनीय है। ईश्वर की प्रज्ञा मानव बुद्धि से परे है, और वह अपनी प्रज्ञा से सभी प्राणियों का मार्गदर्शन करता है।

इन सूत्रों में पतंजलि ने ईश्वर और उसके गुणों का वर्णन किया है, और बताया है कि ईश्वर कैसे दृश्य जगत से संबंधित है और कैसे वह प्राणियों का मार्गदर्शन करता है।


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गुरुवार, 6 नवंबर 2025

मूली और उसका प्रयोग और लाभ

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 👉👁️👉#मूली और उसका प्रयोग और लाभ 👁️👀👇

कवि घाघ और महर्षि वागभट्ट लोकोक्ति रूप में कहते हैं कि,

      🪷प्रातः मूली अमृत समाना, दोपहर मूली मूली।

      🪷सायं मूली विष समाना, वैद्य होय सो जानी।।

           #डॉत्रिभुवननाथ डॉ त्रिभुवन नाथ श्रीवास्तव, पूर्व प्राचार्य 

1. प्रतिदिन प्रातः काल खाने में मूली का सेवन करने से डायबिटीज से शीघ्र मुक्ति मिल सकती है।



2. मूली खाने से प्रतिष्याय रोग में लाभ होता है।इसीलिए मूली को पत्तों सहित कच्चे के रूप में अवश्य खाना चाहिए।


3. प्रतिदिन मूली के ऊपर काला नमक डालकर खाने से भूख न लगने की समस्या समाप्त हो जाती हैं।


4. मूली खाने से हमें विटामिन ए मिलता है।जिससे हमारे दांतो को सुन्दरता और सुदृढ़ता मिलती है।


5. मूली खाने से बाल झड़ने की समस्या समाप्त हो जाती है।


6. सभी प्रकार के अर्श रोग में कच्ची मूली या मूली के पत्तो की सब्जी बनाकर खाना लाभदायक होता है।


7. यदि मूत्र निर्माण का बनना रूक हो जाये तो मूली का रस पीने से मूत्र निर्माण पुनः होने लगता है।


8. प्रतिदिन 1 कच्ची मूली प्रातः काल उठते ही खाने से पीलिया रोग में लाभ मिलता है।



9. यदि आपको भी अम्लीय उदगार (एसिडिक belching)आती हैं, तो मूली के 1 कप रस में अदरक का रस मिलाकर पीने से लाभ मिलता है।


10. नियमित रूप से मूली खाने से मुँह,आंत और किडनी की कैंसर का समस्या नहीं होती है।


11. थकान मिटाने और नींद लाने में भी मूली सहायक है।


12. मोटापा दूर करने के लिए मूली के रस में नींबू और नमक मिलाकर सेवन करें।


13. पायरिया से व्यथित लोग मूली के रस से दिन में 2-3 बार कुल्ले करें और इसका रस पिएं।


14. प्रातः और सायं काल मूली का रस पीने से जीर्ण विबंध (chronic costipation) में भी लाभ होता है।


15. मूली के रस में समान मात्रा में अनार का रस मिलाकर पीने से हीमोग्लोबिन बढ़ता है।


16. मूली को धीरे-धीरे चबाकर खाने से दांत कांतिमान हो जाते हैं, और शरीर से दाग-धब्बे भी दूर हटते हैं।


17. मूली खाने से हमारी आंखों की ज्योति भी बढ़ती है।


18. नियमित रूप से मूली खाने से ब्लड प्रैशर नियंत्रण में रहता है।


19. मूली खाने का सबसे बडा लाभ पेट में गैस तो कदापि ही नही रहती है।


20. हाथ-पैरों के नख का रंग श्वेत हो जाए तो मूली के पत्तों का रस पीना लाभदायक होता है।


21. प्रातः काल मूली के कोमल पत्तों पर सेंधा नमक लगाकर खाने से मुंह की दुर्गंध दूर होती है।


22. मूली के पत्तों में सोडियम होता है, जो हमारे शरीर में नमक की कमी को पूरा करता है।


23. नियमित रूप से मूली खाने से पेट के कीडे नष्ट हो जाते हैं।


24. प्राकृतिक आहार खाएं रोग भगाए।


मंगलवार, 14 अक्टूबर 2025

:#सांख्य योग:

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 🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿

    🎊 *संत ज्ञानेश्वरी गीता*🎊

   अध्याय-2    *:#सांख्य योग, श्रीमद् भागवत गीता से।।


सांख्य योग:*   

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿

*संजय उवाच*

*तं तथा कृपयाविष्टं अश्रुपूर्णा कुलेक्षणणम्।*

*विषीदन्तमिदं वाक्यं उवाच मधुसूदन:।।1।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿

*तदोपरांत संजय ने राजा धृतराष्ट्र से कहा -महाराज ! सुने ।अर्जुन वहां से  शोकाकुल होकर रोने लगा ।वहां कुल  के सभी लोगों को देखकर उसके मन में महान मोह उत्पन्न हो गया और उसका मन उसी प्रकार द्रवित हो गया, जिस प्रकार जल में नमक घुल जाता है या हवा चलने से बादल छिन्न-भिन्न हो जाते हैं।*

    *वह धैर्यवान था फिर भी उसका हृदय द्रवित हो गया।दयाभाव से ओतप्रोत अर्जुन कीचड़ में उलझे राजहंस की भांति म्लान दीखने लगा।*

*उसे इस तरह मोहग्रस्त देखकर भगवान कृष्ण उससे इसप्रकार कहने लगे।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿

*श्री भगवानुवाच*

*कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।*

*अनार्यजुष्टं अस्वर्ग्यं अकीर्तिकरं अर्जुन।।2।।* 

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿

   *श्री भगवान बोले हे- अर्जुन! थोड़ा सोचो की इस समरांगण में क्या तुम्हारा ऐसा करना और कहना शोभनीय  है ?पहले इस बात का विचार करो कि तुम कौन हो और यह क्या कर रहे हो? तुम्हें आज हुआ क्या है? तुम्हें किस बात की कमी रह गई है? क्या तुम्हारा आरंभ किया हुआ कोई कार्य नष्ट हो गया है? तुम शोक किस लिए कर रहे हो? तुम तो कभी भी ऐसी- वैसी बातों की ओर ध्यान ही नहीं देते और न कभी धैर्य खोते हो ।तुम्हारा तो केवल नाम सुनकर ही अपयश कोसों  दूर भाग जाता है। तुम शौर्य के भंडार हो, क्षत्रियों के शिरमौर हो।*

    *तुम्हारे पराक्रम का डंका सारे त्रिभुवन में बज रहा है। तुमने युद्ध में साक्षात शंकर पर विजय प्राप्त की है और साढ़े तीन करोड़ निवात कवचों जैसे दैत्यों को जड़ से उखाड़ फेंका और चित्ररथ गंधर्वों का सामना कर उन्हें तुम्हारा यश गान गाने के लिए प्रवृत्त किया।*

    *हे अर्जुन !तुम्हारे श्रेष्ठ कार्यों के विस्तार से  यह त्रैलोक्य भी छोटा दिखाई देता है ।तुम्हारा पराक्रम इतना उच्च कोटि का और निर्दोष है। वही पराक्रमी,  आज तुम समरांगण में अपनी वीरवृत्ति छोड़कर सिर झुकाकर बालकों की भांति रो रहे हो?हे अर्जुन! क्या कभी अंधेरा सूर्य को निगल सकता है?या कभी अमृत को मृत्यु आई है? क्या हवा बादलों से भयभीत है?क्या लकड़ी कभी अग्नि को निगल सकती है?क्या नमक ,पानी को कभी गला सकता है?क्या सांप को कभी मेंढक निगल सकता है?*

*अच्छा,यह बताओ कि क्या गीदड़ ने सिंह के साथ लड़ाई की है?ऐसी विलक्षण बातें क्या कभी संभव हुई है? लेकिन तुमने आज उन सबको सच करके दिखा दिया है, इसलिए हे अर्जुन!तुम इस मोह को अपने पास मत आने दो!मन को संभालकर उसे धीरज देकर सावधान हो जाओ।*

 *तुम यह पागलपन छोड़ो। उठो और हाथ में धनुष बाण ले लो ।इस रणभूमि में तुम्हारी यह करुणा निरुपयोगी है ।अर्जुन! तुम तो सब कुछ जानते हो? तो इस समय क्यों नहीं विचार करते !जब युद्ध के लिए सभी तत्पर हो चुके हैं तब क्या युद्ध के समय दया उचित है ?तुम्हारा आज का यह व्यवहार तुम्हारी आज तक अर्जित की हुई कीर्ति को नष्ट करने वाला है तथा परमार्थ को भी बिगाड़ने वाला है।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿

*क्लैब्यं मा स्म गम: पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।*

*क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्वोत्तिष्ठ परंतप।।3।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿

*श्री कृष्ण फिर बोले -इसलिए हे अर्जुन! तुम शोक मत करो और धैर्य धारण करो। अपने सगे- संबंधियों के सम्बन्ध में दुखी मत होओ। तुम्हारे लिए यह उचित नहीं है। तुमने आज तक जो यश प्राप्त किया है उसका इससे नाश हो जाएगा, इसलिए भाई कम से कम अब तो तुम अपने हित का विचार करो ।युद्ध के समय दीन वृत्ति से काम नहीं चलेगा। ये कौरव क्या आज ही तुम्हारे सम्बन्धी बने हैं? क्या यह बात तुम्हें इससे पहले ज्ञात नहीं थी? या तुम इन स्वगोत्रियों को  पहचानते नहीं थे ? तो अब व्यर्थ ही क्यों दुखी हो रहे हो? क्या आज के युद्ध का प्रसंग तुम्हारे जीवन में नया है?*

   *अरे, तुम लोगों का पारस्परिक क्लेश नित्य का है । तो आज ही यह क्या हो गया ?यह मोह तुम्हें ना जाने कैसे उत्पन्न हो गया? हे अर्जुन! नि: संदेह तुमने यह अनुचित कार्य किया है । यदि तुम इस मोह में उलझ गए तो आज तक प्राप्त की हुई कीर्ति से तो तो तुम हाथ धो ही बैठोगे, साथ ही परमार्थ से भी तुम वंचित हो जाओगे। तुम्हारे मन की यह दुर्बलता इस समय तुम्हारे लिए कल्याणकारी सिद्ध नहीं होगी। इससे तुम्हें कोई संबंध नहीं रखना चाहिए ।यह दुर्बलता क्षत्रियों के लिए संग्राम में अध:पतन ही है ।इस प्रकार  दयालु भगवान अर्जुन को ठीक से समझने लगे, पूरा प्रयत्न कर रहे थे लेकिन इस पर अर्जुन ने क्या कहा ध्यान से सुनिए-*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿

*कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन।*

*इषुभि: प्रतियोत्स्यामि पूर्जावरिसूदन।।4।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃

*अर्जुन ने कहा- हे देव!इतनी सब बातें यहां कहने की कोई आवश्यकता ही नहीं है।मैं क्या कहना चाहता हूं, अल्प उसे सुनिए।इस युद्ध के सम्बन्ध में पहले आप ही विचार कीजिए।यह युद्ध ही नहीं,बल्कि विशुद्ध रूप में बड़ा पाप है।इसमें प्रवृत्त होने पर मुझे बड़ा पाप लगेगा। देखिए,मैं जानता हूं कि माता-पिता की सेवा करना तथा उन्हें सभी प्रकार से संतुष्ट रखना ही हमारा धर्म है।ऐसा होते हुए,उलटे उनको अपने हाथों से बंध कैसे कर सकता हूं?*

   *देवता तथा साधु संतों को मुझे प्रणाम करना चाहिए,हो सके तो उनकी पूजा करनी चाहिए, लेकिन यह सब छोड़कर अपने ही मुंह से उनकी निंदा कैसे की जाए?उसी प्रकार हमारे ये गोत्रज एवं कुलगुरु हमारे लिए सदैव पूजनीय रहे हैं।उनमें से भीष्म तथा द्रोणाचार्य से मुझे अधिक लाभ हुआ है। भगवन्! जिनके लिए मैं स्वप्न में भी शत्रुता का भाव नहीं ला सकता, उनका यहां प्रत्यक्ष बध कैसे किया जाए?*

  *अब अधोजीवित रहने में नाम की भी शोभा नहीं है। आज तक जिनसे यह विद्या प्राप्त की है, उसका उपयोग उन गुरुओं पर  पर ही करना क्या हमारा कर्तव्य है? मैं अर्जुन- द्रोणाचार्य का शिष्य हूं। उन्होंने ही मुझे धनुर्विद्या  सिखाई है। इस उपकार के प्रति आभार प्रकट करने के बजाय क्या मैं उनकी हत्या करूं? जिनकी कृपा  प्रसाद का वर मुझे प्राप्त करना चाहिए उनसे ही मैं कृतघ्नता करूं, क्या मैं भस्मासुर हूं?*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿 🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿।।

*गुरून हत्वा हि महानुभावांछ्रयो भोक्तुं भैक्ष्यमपहीप लोके।*

*हत्वार्थ कामांस्तु गुरूनिहैव भुंजीय भोगान् रुधिरप्रतिग्धान्।।5।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿

     *अर्जुन ने आगे कहा -भगवन !सुना है कि समुद्र बहुत गंभीर है लेकिन इसके विपरीत कि उसकी गंभीरता भी नाम मात्र की है, लेकिन आचार्य द्रोण की ऐस विलक्षण है कि उससे कभी  क्षोभ होता ही नहीं।*

*प्रेम -भाव का विचार करते समय माता का नाम मुख्य रूप से सामने आना उचित है, लेकिन द्रोणाचार्य तो प्रत्यक्ष प्रेम ही हैं। करुणा का उद्भव इन्हीं से हुआ है ।यह सभी गुणों के भंडार हैं ।उन्हें विद्या का आसीम सागर ही कहना उचित है।*  अर्जुन ने कहा- इन आचार्य का बहुत अधिक महत्व है और इनकी हम लोगों पर विशेष कृपा भी है। अब आप ही बताएं की क्या हम लोग उनकी हत्या करने का विचार भी कभी मन में ला सकते हैं ।यदि मेरे प्राण चले जाएं तब भी मुझे यह विचार कभी अच्छा नहीं लग सकता कि पहले तो युद्ध में मैं ऐसे लोगों की हत्या करूं और राज्य के सुखों को भोगूं।*

   *यदि मैं समझू कि सुख -भोगों का महत्व इन आचार्य से बढ़कर है तो  विचार इतना भीषण है कि मुझे तो ये सुख भोग दूर ही रहें तो अच्छा है ।इससे अच्छा तो भीख मांग कर निर्वाह कर लेना उचित है, वरन् देश छोड़कर गुफाओं में रहना अच्छा है ।लेकिन इन पर शस्त्र उठाना अनुचित है।*

  *हे प्रभु! जिन पहाड़ों पर हाल ही में पानी चढ़ा है उन वनों से उनके हृदयों पर प्रहार करना तब उनके रक्त से सैन भोग प्राप्त करना ऐसे भोग को लेकर कोई क्या करें ऐसा भोग क्या आनंददायी है?इसीलिए यह विचार मुझे नहीं पता भाता।*

      *अर्जुन ने तब ये बातें कहकर श्री कृष्ण से पूछा - ये सब बातें आप समझ गए न?*

*उसे अपने मन में इस बात का विश्वास नहीं होता था कि श्रीकृष्ण ने मेरी ये सब बातें ध्यान से सुनी हैं।यह बात ध्यान में आते ही अर्जुन मन में घबराया और पूछा-भगवन्! आप मेरी बातों पर अल्पत:भी ध्यान नहीं देते,इसका क्या कारण है?*

मंगलवार, 23 सितंबर 2025

🪔 #जीवन मंत्र*🪔

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 🪔 *_जीवन मंत्र..._*🪔


 *देवी दुर्गा के नौ रूप और भारतीय नारी की जीवन यात्रा...*








हमारे शास्त्रों और पूजा-पद्धतियों में *अद्भुत वैज्ञानिकता और गहरी जीवन-दृष्टि* छिपी हुई है, जिसका हमें अक्सर आभास भी नहीं होता। देवी दुर्गा के नौ स्वरूप, जिन्हें हम नवरात्रि में पूजते हैं, वस्तुतः *भारतीय नारी के जीवन के नौ चरणों* की यात्रा का प्रतीक हैं। यह यात्रा बाल्यकाल से वृद्धावस्था तक क्रमबद्ध रूप में चलती है। आइए देखें कि किस प्रकार—


1. *शैलपुत्री — पुत्री का रूप*

नारी जीवन का प्रथम चरण है। यह वह अवस्था है जब वह परिवार को हर्ष और आनंद देने वाली, घर की प्यारी सी पुत्री होती है।

2. *ब्रह्मचारिणी — शिक्षा और साधना का रूप*

दूसरे चरण में वह मर्यादा में रहकर, संयमपूर्वक विद्या-अध्ययन में रत एक संस्कारित बालिका के रूप में दिखाई देती है।

3. *चंद्रघंटा — युवती का रूप*

यह वह समय है जब नारी विद्या अर्जित कर चुकी होती है। आत्मविश्वास और स्वाभिमान से भरी हुई एक महत्वाकांक्षी युवती के रूप में वह जीवन के नए स्वप्नों और आकांक्षाओं को संजोती है।

4. *कूष्मांडा — गृहिणी का रूप*

विवाह के उपरान्त नारी अपने स्नेह और ऊष्मा से पति के घर को आलोकित करती है। तेजस्विनी गृहलक्ष्मी बनकर वह पूरे परिवार को प्रेम और ऊर्जा से भर देती है।

5. *स्कंदमाता — मातृत्व का रूप*

यह जीवन का वह चरण है जब वह संतान को जन्म देती है और उसे पालन-पोषण कर संवारती है। उसका अस्तित्व अब केवल स्वयं तक सीमित न रहकर मातृत्व में विलीन हो जाता है।

6. *कात्यायिनी — परिवार की आधारशिला*

षष्ठम रूप में वह परिवार के सुख और अनुशासन की सूत्रधार बनती है। ममतामयी माँ के साथ-साथ वह परिवार को एक सूत्र में बाँधने वाली, बुद्धिमती और संतुलित नारी का स्वरूप ग्रहण करती है।

7. *कालरात्रि (महाकाली) — संकटमोचन रूप*

यह नारी जीवन का वह चरण है जो साधारणतः सुप्त रहता है, किंतु आवश्यकता पड़ने पर प्रकट होता है। जब परिवार या समाज पर संकट आता है तो वही नारी शस्त्र उठाकर दुष्टों का संहार करने में सक्षम होती है। यह उसका रौद्र रूप है।

8. *महागौरी — परिपक्व प्रौढ़ा स्त्री का रूप*

यह नारी का शांत, धवल, करुणामयी और आध्यात्मिक रूप से परिपक्व स्वरूप है। इस अवस्था में वह अपने परिश्रम, अनुभव और स्नेह से परिवार को निरंतर नई समृद्धि की ओर अग्रसर करती है। 

9. *सिद्धिदात्री — ममतामयी वृद्ध नारी का रूप*

जीवन का अंतिम चरण वह है जब नारी अपने अनुभव और ज्ञान से परिवार को लाभान्वित करती है। दादी-नानी के रूप में वह अपने आशीर्वाद और मार्गदर्शन से परिवार को भांति-भांति की सिद्धियों का वरदान प्रदान करती है इसलिए इसे सिद्धिदात्री कहते हैं।  

*नारी और शक्ति का संबंध* 🚩

यहाँ एक और महत्वपूर्ण तथ्य उल्लेखनीय है *भारतीय नारी अबला नहीं है*। देवी के नौ में से *आठ रूपों के हाथों में शस्त्र* हैं। 🔱यह इस बात का प्रतीक है कि नारी सदैव आत्मरक्षा और दुष्टों के संहार हेतु तत्पर रहती है। केवल ब्रह्मचारिणी  के हाथ में कोई अस्त्र नहीं है, क्योंकि उस समय वह शिक्षा और साधना में लीन है। 



*निष्कर्ष:*  नवरात्रि केवल  धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं, वरन् भारतीय जीवन-दर्शन का गहन उदाहरण है। देवी दुर्गा के नौ स्वरूप हमें बताते हैं कि  नारी जीवन का प्रत्येक चरण त्याग, ममता, संघर्ष और जिजीविषा से पूर्ण है।


*संदेश*- प्राचीन भारत में नारी को देवी के रूप में प्रतिष्ठित किया गया था। नवरात्रि हमें यह संदेश देती है कि नारी तभी अपनी महत्ता प्राप्त कर सकती है, जब वह अपने मूल संस्कारों और जीवन-मूल्यों से जुड़ी रहे। दुर्गा पूजा में पुरुषों के लिए भी यह सन्देश निहित है कि बालिका से लेकर वृद्ध महिला तक *नारी के प्रत्येक स्वरुप का सम्मान* कर के ही पुरुष, उसका परिवार और सम्पूर्ण समाज शक्ति व समृद्धि प्राप्त कर सकते हैं।🛕

🪔 *_Mantra de vida..._*🪔 _Las nueve formas de la Diosa Durga y el viaje de la mujer india..._ 🌺 En nuestros shastras y prácticas de adoración hay _una asombrosa cientificidad y una profunda visión de la vida_ escondidas, de las cuales a menudo no somos conscientes. Las nueve formas de la Diosa Durga, a quienes adoramos en Navratri, son en realidad _símbolos de las nueve etapas de la vida de la mujer india_. Este viaje se desarrolla en orden desde la infancia hasta la vejez. Veamos cómo—


1. _Shailputri — La forma de hija_ La primera etapa de la vida de una mujer. Es esa fase en la que ella es la hija querida de la familia, que trae alegría y felicidad.

2. _Brahmacharini — La forma de educación y sadhana_ En la segunda etapa, aparece como una niña culta, que estudia con moderación y disciplina.

3. _Chandraghanta — La forma de joven_ Es ese tiempo cuando la mujer ha adquirido educación. Llena de confianza y orgullo, como una joven ambiciosa, ella acaricia nuevos sueños y aspiraciones de la vida.

4. _Kushmanda — La forma de ama de casa_ Después del matrimonio, la mujer ilumina la casa del esposo con su amor y calidez. Como una radiante Gृहलक्ष्मी, ella llena a toda la familia de amor y energía.

5. _Skandamata — La forma de maternidad_ Esta es esa etapa de la vida cuando ella da a luz a un hijo y lo cría. Su existencia ahora ya no se limita solo a ella, se funde en la maternidad.

6. _Katyayani — La base de la familia_ En la sexta forma, ella se convierte en la sostenedora de la felicidad y la disciplina de la familia. Junto con ser una madre cariñosa, ella asume la forma de una mujer inteligente y equilibrada que une a la familia con un hilo.

7. _Kaalratri (Mahakali) — La forma de destructora de crisis_ Esta es esa etapa de la vida de la mujer que normalmente permanece latente, pero se manifiesta cuando es necesario. Cuando la familia o la sociedad enfrenta una crisis, esa mujer es capaz de tomar armas y destruir a los malvados. Esta es su forma feroz.

8. _Mahagauri — La forma de mujer madura_ Esta es la forma tranquila, blanca, misericordiosa y espiritualmente madura de la mujer. En esta etapa, con su trabajo duro, experiencia y amor, ella continuamente lleva a la familia hacia una nueva prosperidad.

9. _Siddhidatri — La forma de mujer anciana cariñosa_ La etapa final de la vida es cuando la mujer beneficia a la familia con su experiencia y conocimiento. En la forma de abuela, con sus bendiciones y guía, ella otorga diversos tipos de siddhis a la familia, por eso se le llama Siddhidatri.


_La relación entre mujer y poder_ 🚩 Aquí hay otro hecho importante digno de mención _la mujer india no es abala_. De las nueve formas de la Diosa, _ocho tienen armas en sus manos_. 🔱 Esto simboliza que la mujer siempre está preparada para la autodefensa y la destrucción de los malvados. Solo Brahmacharini no tiene armas, porque en ese momento ella está absorta en la educación y la sadhana.


_Conclusión:_ Navratri no es solo un ritual religioso, sino un profundo ejemplo de la filosofía de vida india. Las nueve formas de la Diosa Durga nos dicen que cada etapa de la vida de una mujer está llena de sacrificio, cariño, lucha y voluntad de vivir.



_Mensaje:_ En la antigua India, la mujer fue venerada como una diosa. Navratri nos da el mensaje de que la mujer puede alcanzar su grandeza solo cuando permanece conectada con sus valores culturales y principios de vida básicos. En la adoración a Durga también hay un mensaje para los hombres: solo _respetando cada forma de la mujer_, desde la niña hasta la anciana, el hombre, su familia y toda la sociedad pueden obtener poder y prosperidad. 🛕

शनिवार, 23 अगस्त 2025

* #प्राकृतिक चिकित्सा और आयुर्वेद में त्रिदोषों का महत्व*

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 * प्राकृतिक चिकित्सा और आयुर्वेद में त्रिदोषों का महत्व*


*परिचय- आयुर्वेद के अनुसार किसी भी प्रकार के रोग होने के 3 कारण होते हैं-*


*1. वात:- शरीर में वायु बनना।*


*2. पित्त:- शरीर के ताप का बढ़ना।*


*3. कफ:- शरीर में कफ दोष बन श्लेष्मा वृद्धि होना।*



*नोट:- किसी भी रोग के होने का कारण एक भी हो सकता है और दो भी हो सकता है या दोनों का मिश्रण भी हो सकता है या तीनों दोषों के कारण भी रोग हो सकता है।*जिन्हें प्रकृति की वृद्धि अनुसार दोष कहा गया है। इस दोषज प्रकृति दोष कम या अधिक तीनों का ही मिश्रण होता है। जो दोष अधिक मात्रा में होता है उसे उसी नाम से जाना जाता है।


*1. प्राकृतिक चिकित्सा सिद्धान्त अनुसार वात होने का कारण*


अनुचित असंतुलित भोजन, बेसन, मैदा, मैदा जैसा आटा तथा अधिक दालों का सेवन करने से शरीर में वात दोष प्रकुपित हो रोग उत्पन्न हो जाता है।दूषित भोजन, अधिक मांस का सेवन तथा बर्फ का सेवन करने के कारण वात दोष उत्पन्न हो जाता है।


आलस्य पूर्वक जीवन, सूर्यस्नान, तथा व्यायाम की कमी के कारण पाचन क्रिया दुर्बल हो जाती है जिसके कारण वात दोष उत्पन्न हो जाता है।

इन सभी कारणों से उदर में विबंध हो (दूषित वायु) बनने लगती है और यही वायु शरीर में जहां भी रुकती है, फंसती है या टकराती है, वहां शूल उत्पन्न होता है। यही शूल वात दोष कहलाता है।


*2. पित्त होने का कारण*


पित्त दोष होने का कारण मूल रुप से अनुचित भोजन शैली है जैसे- चीनी, नमक तथा मिर्चमसाले का अधिक सेवन करना।

मद कारक चीजों तथा दवाईयों का अधिक सेवन करने के कारण पित्त दोष उत्पन्न होता है।


दूषित भोजन तथा अधिक पके हुए भोजन का सेवन ही अधिक मात्रा में करने से पित्त दोष उत्पन्न होता है।


भोजन में कम से कम 75 से 80 प्रतिशत क्षारीय पदार्थ (फल, सब्जियां, अंकुरित इत्यादि अपक्वाहार) तथा 20 से 25 प्रतिशत अम्लीय पक्वाहार पदार्थ होने चाहिए। जब इसके विपरीत स्थिति होती है तो शरीर में अम्लता बढ़ जाती हैं और पित्त दोष उत्पन्न हो जाता है। इस तथ्य पर प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति में सौ प्रतिशत बल दिया जाता है।


*3.  कफ दोष होने का कारण*


तेल, मक्खन तथा घी आदि वसा युक्त चीजों को पचाने  के लिए अधिक कार्य करने तथा व्यायाम की आवश्यकता होती है और जब इसका अभाव होता है तो पाचनक्रिया कम हो जाती है और पाचनक्रिया की क्षमता से अधिक मात्रा में वसा युक्त खाद्य वाली वस्तुएं सेवन करते है तो कफ दोष उत्पन्न हो जाता है।


रात के समय में छाछ, दही और गरिष्ठ भोजन का सेवन करने से कफ दोष उत्पन्न हो जाता है।


*वात, पित्त और कफ के कारण होने वाले रोग निम्नलिखित हैं-*


*वात के कारण होने वाले रोग*


          अफारा, टांगों में दर्द, पेट में वायु बनना, जोड़ों में दर्द, लकवा, साइटिका, शरीर के अंगों का सुन्न हो जाना, शिथिल होना, कांपना, फड़कना, टेढ़ा हो जाना, दर्द, नाड़ियों में खिंचाव, कम सुनना, वात ज्वर तथा शरीर के किसी भी भाग में अचानक दर्द हो जाना आदि।


*पित्त के कारण होने वाले रोग*


उदर, वक्ष, शरीर आदि में दाह होना, अम्लीय उदगार आना, पित्ती उछलना (आर्टिकरिया एलर्जी), रक्ताल्पता , चर्म रोग (कण्डू , स्फोटक तथा पीडिका आदि), कुष्ठरोग, यकृत के रोग, प्लीहा ग्रन्थि की वृद्धि हो जाना, शरीर में दुर्बलता आना, वृक्क तथा हृदय के रोग आदि।


*कफदोष के कारण होने वाले रोग*


कई बार कास व नासिका मार्ग से श्लेष्मा  निकलना, शीत लगना, श्वसन संस्थान सम्बंधी रोग (कास, श्वास आदि रोग), शरीर का फूलना, शरीर में मेद बढ़ना, प्रतिष्याय होना तथा फेफड़ों की टी.बी. आदि।


*वात से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार*


*भोजन चिकित्सा*


वात से पीड़ित रोगी को अपने भोजन में छिलका युक्त भोजन (बिना पकाया हुआ भोजन) फल, सलाद तथा पत्तेदार सब्जियों का अधिक प्रयोग करना चाहिए।


मुनक्का अंजीर, बेर, अदरक, तुलसी, गाजर, सोयाबीन, सौंफ तथा छोटी इलायची का भोजन में अधिक उपयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग शीघ्र ही ठीक हो जाता है।


रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन प्रातः के समय में लहसुन की 2-4 कलियां बिना दांतों से काटे खानी चाहिए तथा अपने भोजन में मक्खन का उपयोग करना चाहिए इसके फलस्वरूप वात रोग शीघ्र ही ठीक हो जाता है।


*उपवास*


वात रोग से पीड़ित रोगी को सबसे पहले कुछ दिनों तक सब्जियों या फलों का रस पीकर उपवास रखना चाहिए तथा इसके उपरान्त अन्य चिकित्सा करनी चाहिए।


*पित्त से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार*


*भोजन चिकित्सा*


पित्त रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन सब्जियों तथा फलों का रस पीना चाहिए।


पित्त रोग से पीड़ित रोगी को भूख न लग रही हो तो केवल फलों का रस तथा सब्जियों का रस पीना चाहिए और सलाद का अपने भोजन में उपयोग करना चाहिए। जिसके फलस्वरूप उसका रोग शीघ्र ही ठीक हो जाता है।

रोगी व्यक्ति को पूर्णतः स्वस्थ होने तक बिना पका हुआ भोजन करना चाहिए।


पित्त रोग से पीड़ित रोगी को अम्लीय, मसालेदार, नमकीन चीजें तथा मिठाईयां नहीं खानी चाहिए क्योंकि इन चीजों के सेवन से पित्त रोग और बिगड़ जाता है।


पित्त के रोगी के लिए गाजर का रस पीना  लाभकारी होता है, इसलिए रोगी को प्रतिदिन प्रातः काल और सायंकाल  के समय में कम से कम 1 गिलास गाजर का रस पीना चाहिए।


अनार, मुनक्का, अंजीर, जामुन, सिंघाड़ा, सौंफ तथा दूब का रस पीना पित्त रोगी के लिए बहुत ही लाभकारी होता है।


पित्त रोग से पीड़ित रोगी को सुबह के समय में लहसुन की 2-4 कलियां बिना दांतों से काटे खाने से बहुत लाभ मिलता है।


सोयाबीन तथा गाजर का सेवन प्रतिदिन करने से वात रोग शीघ्र ही ठीक होने लगता है।


*कफ से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार*


भोजन चिकित्सा*


कफ के रोग से पीड़ित रोगी को प्राकृतिक चिकित्सा काल के समय सबसे पहले अधिक वसा वाले पदार्थ, दूषित भोजन, तली-भुनी खाद्य पदार्थ आदि का सेवन नहीं करना चाहि क्योंकि इन चीजों का उपयोग कफ रोग में अधिक ही हानिकारक रहता है।


कफ से पीड़ित रोगी को दूध तथा दही वाले पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इन चीजों के सेवन से रोगी की स्थिति और भी गंभीर हो जाती है।


कफ रोग से पीड़ित रोगी को दूध नही पीना चाहिए और यदि उसका मन दूध पीने को करता है तो दूध में अदरख या सोंठ चूर्ण डालकर सेवन करना चाहिए।


कफ रोग से पीड़ित रोगी को ताजे आंवले का रस प्रतिदिन प्रातः के समय में पीना चाहिए जिसके फलस्वरूप उसका रोग शीघ्र  ठीक हो जाता है। यदि आंवले का रस न मिल रहा हो तो सूखे आंवले को चूसना चाहिए।


मुनक्का, कच्ची पालक, अंजीर तथा अमरूद का सेवन कफ रोग में  अधिक लाभदायक होता है।


अदरक, तुलसी, अंजीर तथा सोयाबीन का कफ रोग में प्रयोग करने से रोगी को अच्छा लाभ मिलता है।


लहसुन तथा शहद का प्रयोग भी कफ रोग में लाभदायक होता है और इससे रोगी का कफ रोग शीघ्र ही ठीक हो जाता है।

सोमवार, 4 अगस्त 2025

अपामार्ग या लटजीरा या चिरचिटा या #chafftree,::::::::::::

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 #अपामार्ग या लटजीरा या चिरचिटा या #chafftree,::::::::::::

यह पौधा पेट की लटकती त्वचा, वसा, सड़े हुए दाँत, गठिया, अस्थमा, अर्श रोग, मेदोवृद्धि, केश पालित्य, वृक्क या किडनी रोग आदि 20 रोगों के लिए किसी वरदान से कम नही,,,


आज हम जानते हैं इसके सम्बन्ध में नीचे दिए गए विवरण से,,,,,

अपामार्ग का वानस्पतिक परिचय:

अपामार्ग (Achyranthes aspera) एक खरपतवार है, लगभग सभी खरपतवार का अर्थ होता है जो क्षार पदार्थ से भरपूर होते हैं। अल्पतः स्वाद में कटु होते हैं। शरीर से अम्लता में संतुलन बनाते हैं।जो भारत सहित संसार के उष्णकटिबंधीय भागों में पाया जाता है। इसे priklly chaif flower के नाम से भी जाना जाता है। यह एक वार्षिक जड़ी-बूटी है जो 2 मीटर तक ऊंची हो सकती है। इसके तने कोणीय, सरल और धारीदार होते हैं, और पत्तियां अंडाकार होती हैं। फूल हरे-श्वेत रंग के होते हैं, और बीज लाल-भूरे रंग के होते हैं। अपामार्ग का उपयोग वनौषधि के रूप में विभिन्न प्रकार के रोगों के उपचार के लिए किया जाता है, जैसे कि दंत शूल, चर्म रोग, और मुंह के छाले।
वानस्पतिक परिचय:
  • वानस्पतिक नाम: अचिरांथेस एस्पेरा (Achyranthes aspera)।
  • परिवार: ऐमारेन्थेसी (Amaranthaceae)।
  • सामान्य नाम: अपामार्ग, चिरचिटा, लटजीरा, प्रिकली चैफ फ्लावर।
  • पौधे का प्रकार: वार्षिक जड़ी-बूटी।
  • ऊंचाई: 2 मीटर तक।
  • तने: कोणीय, सरल, धारीदार, बैंगनी रंग के।
  • पत्तियां: अंडाकार, बारीक रूप से जुड़ी हुई, दोनों ओर से।
  • फूल: हरे-श्वेत रंग के।
  • बीज: लाल-भूरे रंग के, उप-बेलनाकार, आधार पर गोल।
  • उपयोग: औषधीय, विशेष रूप से प्राकृतिक चिकित्सा, आयुर्वेद, यूनानी और होम्योपैथी में। 
  • अन्य महत्वपूर्ण तथ्य:
  • अपामार्ग में श्लेष्मा वृद्धि या कफ को कम करने, शोथ रोधी, मधुमेहरोधी, और गर्भपातरोधी गुण होते हैं। 
  • इसका उपयोग क्षार  बनाने के लिए भी किया जाता है।
  • यह पौधा भारत में व्यापक रूप से पाया जाता है और इसका उपयोग विभिन्न प्रकार के रोगों के उपचार के लिए किया जाता है।
  • इसके बीजों को कपड़ों में चिपकने और निकालने में कठिनाई होने के कारण इसे विशेष माना जाता  है। वानस्पतिक गुण के अनुसार।


आज हम आपको ऐसे पौधे के सम्बन्ध में बताएँगे जिसका तना, पत्ती, बीज, फूल, और जड़ पौधे का हर भाग औषधि है, इस पौधे को अपामार्ग या चिरचिटा (Chaff Tree), लटजीरा कहते है। अपामार्ग या चिरचिटा (Chaff Tree) का पौधा भारत के सभी सूखे क्षेत्रों में उत्पन्न होता है यह गांवों में अधिक मिलता है खेतों के आसपास घास के साथ प्रायः पाया जाता है इसे साधारण बोलचाल की भाषा में आंधीझाड़ा या चिरचिटा (Chaff Tree) भी कहते हैं-अपामार्ग की ऊंचाई लगभग 60 से 120 सेमी होती है, प्रायः लाल और श्वेत दो प्रकार के अपामार्ग देखने को मिलते हैं-श्वेत अपामार्ग के डंठल व पत्ते हरे रंग के, भूरे और श्वेत रंग के धब्बे युक्त होते हैं इसके अतिरिक्त फल चपटे होते हैं जबकि लाल अपामार्ग (RedChaff Tree) का डंठल लाल रंग का और पत्तों पर लाल-लाल रंग के धब्बे होते हैं।

 

अपामार्ग का पौधा 

अपामार्ग का पौधा 

अपामार्ग का पौधा 

अपामार्ग का पौधा 

इस पर बीज नुकीले कांटे के समान लगते है इसके फल चपटे और कुछ गोल चावल के समान होते हैं दोनों प्रकार के अपामार्ग के गुणों में समानता होती है। श्वेत अपामार्ग(White chaff tree) श्रेष्ठ माना जाता है इनके पत्ते गोलाई लिए हुए 1 से 5 इंच लंबे होते हैं चौड़ाई आधे इंच से ढाई इंच तक होती है- पुष्प मंजरी की लंबाई लगभग एक फुट होती है, जिस पर फूल लगते हैं, फल शीतकाल में लगते हैं और गर्मी में पककर सूख जाते हैं इनमें से चावल के दानों के समान बीज निकलते हैं इसका पौधा वर्षा ऋतु में उत्पन्न होकर गर्मी में सूख जाता है।

 

अपामार्ग तीखा, कडुवा तथा प्रकृति में उष्ण होता है। यह पाचनशक्तिवर्द्धक, विरेचक (पतले मल लाने वाला), रुचिकारक, शूल-निवारक, विष, कृमि व अश्मरी नाशक, रक्तशोधक (रक्त को शुद्ध करने वाला), ज्वरनाशक, श्वास रोग नाशक, क्षुधा को नियंत्रित करने वाला होता है तथा सुखपूर्वक प्रसव हेतु एवं गर्भधारण में उपयोगी है।

 अपामार्ग या चिरचिटा (Chaff Tree) के 20 अद्भुत लाभ :

1. Rhematoid arthritis या गठिया रोग :

 

अपामार्ग (चिचड़ा) के पत्ते को पीसकर, गर्म करके  सन्धि शूल स्थान या गठिया में बांधने से शूल व शोथ दूर होती है।

 

2. पित्त की अश्मरी या गालब्लैडर स्टोन:

 

पित्त की पथरी में चिरचिटा की जड़ आधा से 10 ग्राम कालीमिर्च के साथ या जड़ का काढ़ा कालीमिर्च के साथ 15 ग्राम से 50 ग्राम की मात्रा में प्रातः-सायं- खाने से पूरा लाभ होता है। काढ़ा यदि गर्म-गर्म ही पिएं तो लाभ होगा।

 

3. यकृत का बढ़ना या हेपेटाइटिस :

 

अपामार्ग का क्षार मठ्ठे के साथ एक चुटकी की मात्रा से बच्चे को देने से बच्चे की यकृत रोग मिट जाते हैं।

 

4. पक्षाघात या पैरालिसिस (लकवा) :

 

एक ग्राम कालीमिर्च के साथ चिरचिटा की जड़ को दूध में पीसकर नाक में टपकाने से पक्षाघात ठीक हो जाता है।

 

5. उदर वृद्धि होना या उदर त्वचा लटकना :

 

चिरचिटा (अपामार्ग) की जड़ 5 ग्राम से लेकर 10 ग्राम या जड़ का काढ़ा 15 ग्राम से 50 ग्राम की मात्रा में प्रातः-सायं कालीमिर्च के साथ खाना खाने से पहले पीने से आमाशय का ढीलापन में कमी आकर पेट का आकार कम हो जाता है।

 

6. अर्श रोग या हीमोरॉइड्स या पाइल्स :

 

अपामार्ग की 6 पत्तियां, कालीमिर्च 5 नग को जल के साथ पीस छानकर प्रातः-सायं सेवन करने से अर्श रोग में लाभ हो जाता है और उसमें बहने वाला रक्त रुक जाता है।

रक्त अर्श पर अपामार्ग की 10 से 20 ग्राम जड़ को चावल के पानी के साथ पीस-छानकर 2 चम्मच मधु मिलाकर पिलाना गुणकारी हैं।

 

7. मेदोवृद्धि या ओबेसिटी:

 

अधिक भोजन करने के कारण जिनका शारीरिक भार बढ़ रहा हो, उन्हें भूख कम करने के लिए अपामार्ग के बीजों को चावलों के समान भात या खीर बनाकर नियमित सेवन करना चाहिए। इसके प्रयोग से शरीर की वसा धीरे-धीरे कम होने लगेगी।

 

8. शारीरिक दुर्बलता :

 

अपामार्ग के बीजों को भूनकर इसमें बराबर की मात्रा में मिश्री मिलाकर पीस लें। 1 कप गौ दुग्ध के साथ 2 चम्मच की मात्रा में प्रातः-सायं नियमित सेवन करने से शरीर में पुष्टता आती है।

 

9. सिर शूल:

 

अपामार्ग की जड़ को पानी में घिसकर बनाए गए लेप को मस्तक पर लगाने से सिर शूल दूर होता है।

 

10. संतान प्राप्ति हेतु:

 

अपामार्ग की जड़ के चूर्ण को एक चम्मच की मात्रा में दूध के साथ मासिक-स्राव के उपरान्त नियमित रूप से 21 दिन तक सेवन करने से गर्मधारण होता है। दूसरे प्रयोग के रूप में ताजे पत्तों के 2 चम्मच रस को 1 कप दूध के साथ मासिक-स्राव के उपरान्त नियमित सेवन से भी गर्भ स्थिति की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।

 

11. विषम ज्वर या मलेरिया :

 

अपामार्ग के पत्ते और कालीमिर्च बराबर मात्रा में लेकर पीस लें, उपरान्त इसमें थोड़ा-सा गुड़ मिलाकर मटर के दानों के बराबर की गोलियां बना लें। जब मलेरिया फैल रहा हो, उन दिनों एक-एक गोली प्रातः-सायं भोजन के उपरान्त नियमित रूप से सेवन करने से इस ज्वर का शरीर पर आक्रमण नहीं होगा। इन गोलियों का दो-चार दिन सेवन पर्याप्त होता है, साथ साथ जबतक ज्वर रहे गर्म पानी ही पीना है।

 

12. पालित्य रोग या गंजापन :

 

सरसों के तेल में अपामार्ग के पत्तों को जलाकर एकरस कर लें और  लेप बना लें। इसे गंजे स्थानों पर नियमित रूप से लेप करते रहने से पुन: बाल उगने की संभावना होती है।

 

13. दंतशूल और दंत गुहा या खाँच ( डेंटल कैविटी) :

 

इसके 2-3 पत्तों के रस में रूई को भिगोकर गोल बनाकर दांतों में लगाने से दांतों के शूल में लाभ पहुंचता है तथा पुरानी से पुरानी दंत गुहा या खाँच को भरने में सहायता करता है।

 

14. कण्डू या स्केबीज :

 

अपामार्ग के पंचांग (जड़, तना, पत्ती, फूल और फल) को पानी में उबालकर काढ़ा बनाएं और इससे स्नान करें। नियमित रूप से स्नान करते रहने से कुछ ही दिनों त्वचा से कण्डू दूर जाएगी।


15. अर्ध कपारी या अर्ध सिर शूल में :

 

इसके बीजों के चूर्ण को सूंघने मात्र से ही अर्ध कपारी, मस्तक की जड़ता में लाभ मिलता है। इस चूर्ण को सुंघाने से मस्तक के अंदर एकत्रित हुआ श्लेष्मा तनु या पतला होकर नाक के द्वारा निकल जाता है और वहां पर उत्पन्न हुए कृमि भी निकल जाते हैं।

 

16. जीर्ण कास या ब्रोंकाइटिस :

 

जीर्ण कास विकारों और वायु प्रणाली दोषों में अपामार्ग (चिरचिटा) की क्षार, पिप्पली, अतीस, कुपील, देशी गाय का घृत और मधु के साथ प्रातः-सायं सेवन करने से वायु प्रणाली शोथ (ब्रोंकाइटिस) में पूर्ण लाभ मिलता है।

 

17. कास :

 

कास बार-बार पीड़ित करती हो, कफ निकलने में कष्ट हो, कफ गाढ़ा व लेसदार हो गया हो, इस अवस्था में या न्यूमोनिया की अवस्था में आधा ग्राम अपामार्ग क्षार व आधा ग्राम शर्करा दोनों को 30 मिलीलीटर गर्म पानी में मिलाकर प्रातः-सायं सेवन करने से 7 दिन में अधिकांश में लाभ होता है।

 

18. वृक्क का शूल:

 

अपामार्ग (चिरचिटा) की 5-10 ग्राम ताजी जड़ को पानी में पीसकर रस बनाकर पिलाने से बड़ा लाभ होता है। यह औषधि मूत्राशय कीपीड़ा का प्रमुख कारण अश्मरी को टुकड़े-टुकड़े करके निकाल देती है। वृक्क के पीड़ा के लिए यह प्रधान औषधि है।

 

19. वृक्क या किडनी के रोग :

 

5 ग्राम से 10 ग्राम चिरचिटा की जड़ का काढ़ा 1 से 50 ग्राम प्रातः-सायं मुलेठी, गोखरू और पाठा के साथ खाने से वृक्क की अश्मरी या किडनी स्टोन समाप्त हो जाती है या 2 ग्राम अपामार्ग (चिरचिटा) की जड़ को पानी के साथ पीस लें। इसे प्रतिदिन पानी के साथ प्रातः- सायं पीने से अश्मरी रोग ठीक होता है।

 

20. तमक श्वास या अस्थमा :

 

चिरचिटा की जड़ को किसी लकड़ी की सहायता से मिट्टी हटाकर निकाल लेना चाहिए। ध्यान रहे कि जड़ में लोहा नहीं छूना चाहिए। इसे सुखाकर पीस लेते हैं। यह चूर्ण लगभग एक ग्राम की मात्रा में लेकर मधु के साथ खाएं इससे श्वास रोग का निर्मूलन सम्भव हो जाता है।

अपामार्ग (चिरचिटा) का क्षार 0.24 ग्राम की मात्रा में पान में रखकर खाने अथवा 1 ग्राम मधु में मिलाकर चाटने से छाती पर एकत्रित श्लेष्मा या कफ को हटाकर श्वास रोग नष्ट करता है।

#डॉ त्रिभुवन नाथ श्रीवास्तव, पूर्व प्राचार्य, विवेकानंद योग प्राकृतिक चिकित्सा महाविद्यालय एवम् चिकित्सालय, बाजोर, सीकर, राजस्थान।


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