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रविवार, 14 दिसंबर 2025

#ज्ञान कर्म और सन्यास योग, ज्ञानेश्वरी गीता सन्दर्भ से।।

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🌹*संत ज्ञानेश्वरी गीता* चौथा अध्याय,"ज्ञान कर्म संन्यास योग"*🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿श्री भगवानुवाच* 🌷🌷🌷🌷🌷

*इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।*

*विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।।1।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃*श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा-यह योग मैंने सूर्य को बतलाया था, लेकिन इस बात को अब अधिक दिन व्यतीत हो गए। आगे सूर्य ने यह योग मनु को  बतलाया और मनु ने इसका आचरण कर इक्ष्वाकु नामक अपने पुत्र को इसका उपदेश दिया। इस प्रकार यह परंपरा आदिकाल से चली आ रही है।*🌿🍃🌿🍃🌿*एवं परम्परा प्राप्तमिमं राजर्षयो विदु:।*

              *स कालेनेह महता योगो नष्ट: परंतप:।।2।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃 कुछ राजर्षियों को इस योग का ज्ञान हुआ , लेकिन आजकल यह कम ही लोगों को ज्ञात है। इसका कारण यह है कि लोग वासनाओं में फंस गए और देह-बुद्धि के मोह में पड़ गए जिससे वे आत्मज्ञान को भूल गए।आत्मबोध की भावना दृढ़ न हो,तो सुख विषयों में ही प्रतीत होता है।इस प्रकार लोग वाममार्गी हो गए। अन्यथा तो जिस गांव में सब दिगंबर ही हैं, वहां वस्त्रों का क्या काम है?* या जो जन्म से अंधा है -उसके लिए सूर्य का क्या उपयोग है ? बधिरों की सभा में संगीत को कौन सम्मान देगा ?*

अर्जुन को ज्ञानोपदेश करते हुए श्री कृष्ण जी 


*श्रगाल को क्या चन्द्र का प्रकाश सुहाता है? चन्द्रोदय से पूर्व ही जिसकी देखने की शक्ति समाप्त हो जाती है- वह काक चन्द्रमा को कैसे पहचान सकता है?*

*इसप्रकार जिन्होंने वैराग्य की सीमा भी नहीं देखी, जिन्हें विवेक का ज्ञान नहीं है,उन मूर्खों को मुझ परमेश्वर का लाभ कैसे होगा ? ज्ञात नहीं कि यह मोह कैसे प्रसारित हुआ होगा, लेकिन इस मोह के कारण अत्यधिक समय नष्ट हो गया और इस लोक से कर्मयोग लुप्त हो गया।*🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿

  *स एवायं मयातेऽद्य योग: प्रोक्त: पुरातन:।*

*भक्तोऽसि में सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्।।3।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*हे पार्थ! वही कर्म योग आज मैंने तुम्हें बता दिया है। अब तुम अपने संशय को त्याग दो। यह कर्म योग मेरे अंतःकरण का गूढ़ रहस्य है, मैंने इसे तुमसे छिपाया नहीं है, क्योंकि तुम मेरे प्रिय हो। हे अर्जुन! तुम पूर्ण प्रेम के अवतार, भक्ति के प्राण, मित्रता के जीवन- सर्वस्व हो, अत: तुमसे कैसा दुराव?*

*इस समय हम युद्ध भूमि में खड़े हैं, ऐसे में तुम्हारी शंका का समाधान मैं कैसे करूं? इस पर भी क्षण मात्र के लिए इस ओर से हटकर तुम्हारी संदेहों का समाधान करके तुम्हारा मोह दूर  करना अधिक आवश्यक है।

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿   *अर्जुन  उवाच*     

*अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वत :।*

*कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति।।4।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*अर्जुन ने कहा-हे श्री कृष्ण! *यदि माता अपने पुत्र से प्रेम ( स्नेह) करे,तो,*इसमें आश्चर्य  क्या है ?*हे कृपानिधि!* इस संसार में आप ही संतप्त लोगों के लिए  शीतल छाया  और आश्रयहीनों के लिए माता के समान है। आपकी कृपा से ही मेरा जन्म हुआ। हे देव! जैसे कोई स्त्री पंगु पुत्र को जन्म देकर  जीवन भर उसके क्लेशों को सहती है , वैसे ही मेरे लिए आपको सब झमेले सहने पड़ते हैं , लेकिन आपके सम्मुख  मैं क्या कहूं? अतः हे प्रभो! अब आप मेरे प्रश्नों की ओर ध्यान न देकर मैं जो कुछ कहूं उसका आप मन में क्रोध न करें।*     

*हे कृष्ण! अपने सूर्य को कर्मयोग बतलाने की बात कही है, वह मेरे मन को उपयुक्त नहीं होती। सूर्य  क्या है, इसका अता-पता हमारे  पिता तथा पितामह को भी नहीं  है,तो आपने उसे कब और कैसे  उपदेश दिया ? यह सूर्य तो अति प्राचीन है और आप तो आजकल  के हैं, इसलिए इस बात में मुझे विरोधाभास दिखाई देता है। हे देव! आपका चरित्र मेरे लिए  अगम्य है,अतः मैं पूर्णता से विश्वास के साथ कैसे कह सकता हूं कि यह बात निराधार  है, इसलिए  आपने सूर्य ( विवस्वान ) को उपदेश दिया था, यह बात इस ढंग से कहें कि मेरी समझ में आ जाए।*     

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿   *श्री भगवानुवाच*     

*बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।*

*तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप।।5।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃*तब श्रीकृष्ण जी ने कहा- हे पार्थ! तुम अपने मन में यह समझते हो कि जब विवस्वान सूर्य था तब मैं नहीं था, इससे सिद्ध होता है कि तुम इन सब बातों के सम्बन्ध में कुछ नहीं जानते। हे अर्जुन! तुम्हें यह नहीं ज्ञात कि तुम्हारे और मेरे अब तक अनेक जन्म हो चुके हैं। तुम्हें तुम्हारे जन्मों का स्मरण नहीं है, लेकिन मैनें जिस-जिस समय जो अवतार लिए हैं,उन सबका मुझे स्मरण है।

*अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।*

*प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया।।6।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃*इसीलिए मुझे पिछली सभी बातों का स्मरण है। अजन्मा होते हुए भी मैं माया के कारण अवतार लेता हूं। मेरा अमूर्तत्व नष्ट नहीं होता, लेकिन अवतार लेने और उसके समाप्त होने का जो आभास होता है वह माया के संयोग से केवल मुझ में ही दिखाई देता है। मेरी स्वतंत्रता तो तृण मात्र भी भान नहीं होती, लेकिन मैं कर्म के अधीन हूं, ऐसा जो लोगों को लगता है वह भ्रांति के कारण है,वास्तव में ऐसी कोई बात नहीं है। *जहां भ्रांति दूर हो जाती है वहां मैं निर्गुण निराकार हूं। एक वस्तु दो दिखने का कारण दर्पण है। दर्पण में प्रतिबिंब का विचार करने पर दूसरी वस्तु वास्तविक ठहरती है।* हेअर्जुन!* 

*मैं तो निराकार ही हूं, लेकिन भक्तों का अनुग्रह पूर्ण करने के लिए माया को स्वीकार कर अभिनेता के समान वाह्य रूप से साकार होता हूं।*

*यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।*

*अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।7।।*

🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃*धर्म के रूप में जो कुछ है, उसकी मैं ही प्रत्येक युग में रक्षा करता हूं।* यह क्रम मूल रूप से चला आ रहा है, इसलिए जब-जब यह देखने में आता है कि अधर्म ने धर्म को परास्त कर लिया है,* तब -तब मैं अपनी अजन्मा वाली भूमिका दूर रखता हूं तथा निराकार रूप को भी भुला देता हूं।*🌿🍃🌿🍃🌿

*परित्राणाय साधुनां विनाशाय  च दुष्कृताम्।*

*धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।8।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*उस समय भक्तों का पक्ष लेकर मैं शरीर धारण कर अवतार लेता हूं और अज्ञान रूपी अंधकार को निगल लेता हूं। मैं धर्म की सीमा को तोड़ देता हूं। अधर्मियों का नाम मिटा देता हूं और जो साधु हैं,उनके हाथों से सुख की पताका लहरवाता हूं। दैत्यों के,अधर्मियों के कुलों का नाश करता हूं तथा साधुओं को उचित सम्मान दिलवाता हूं।*

*धर्म और नीति को एक करके उनका संबंध स्थापित करता हूं।  अविचारों की कालिमा को समाप्त करके ज्ञान का दीपक प्रज्वलित करता हूं, जिससे योगियो के लिए वह समय दिपावली जैसा हो जाता है। उसे समय सारा संसार आत्मसुख से ओतप्रोत हो जाता है और धर्म के अतिरिक्त कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं होता। भक्तजन भक्ति से पूर्ण हो जाते हैं।*

*हे अर्जुन! जब मैं साकार रूप से अवतार धारण करता हूं तब पापों के पर्वत जैसे समूह नष्ट हो जाते हैं और पुण्यों का उदय हो जाता है। ऐसे ही कार्यों के लिए मैं युग -युग में अवतार धारण करता हूं। जिसे इस गुप्त रहस्य का पता चल जाए उसे ही इस दृश्यमान  संसार में ज्ञानवान समझना चाहिए। अविचार का अंधकार हटाकर विचार रूपी दीपक को प्रज्वलित करता हूं।🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃

🌿जन्म कर्म चा मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वत:।*

   *त्यक्त्वा दहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।।9।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*मैं अजन्मा होने पर भी जन्म लेता हूं और अकर्मण्य होने पर भी कर्म करता हूं। जो मनुष्य निर्विकार रूप से मेरे अलिप्तता के भाव को जानता है उसे परम मुक्त समझना चाहिए। ऐसा मनुष्य संसार में रहकर कर्मों के प्रति आसक्त नहीं होता और देह धारण करके भी देह के भाव से नहीं बंधता। समय आने पर जब वह देह त्यागकर पंचतत्वों में लीन होता है तब मेरे ही स्वरूप को प्राप्त करता है।*🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃

🌿*वीतराग भयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिता:।*

     *बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागता:।।10।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*सामान्य रूप से जो स्वयं के और दूसरों के गतागत का कोलाहल नहीं करते, कामना रहित होते हैं, क्रोध नहीं करते, मेरे स्वरूप से ओतप्रोत होते हैं, मेरी ही सेवा के लिए जीवन धारण किए रहते हैं, निर्विकार रूप से आत्मबोध के सुख से सुखी रहते हैं, योगी हैं या जो आत्मज्ञान को स्वयं में समाए रहते हैं-वे सहजता से मेरे स्वरूप जैसे हो जाते हैं। उनमें और मुझमें कोई भेद नहीं होता।अब देखो- पीतल का कलुष ( मालिन्य) जड़ से नष्ट हो जाए तब तो सोना पाने की कामना अर्थहीन ही हो जाती है। इसी प्रकार जो लोग यम- नियमों द्वारा तपाए जाने पर तप रुप ज्ञान से कुशल हो जाते हैं,वे मेरे स्वरुप को पा जाएं, तो इसमें किसी को सन्देह क्यों होनी चाहिए?*🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿

🍃🌿*ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।*

         *मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश:।।11।।*

         *काक्षन्त: कर्मणां सिद्धिं यजन्त इस देवता:।*

         *क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा।।12।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*सामान्य रूप से जो मेरे प्रति जैसा व्यवहार करते हैं मैं भी उनके प्रति वैसा ही व्यवहार करता हूं। हे पार्थ! तुम यह ध्यान में रखो कि मनुष्य मात्र में स्वाभाविक रूप से मेरे प्रति ही भक्ति रहती है, लेकिन अज्ञानता से उनका पतन होता है, क्योंकि भेद- बुद्धि उत्पन्न हो जाती है।*

*इस भेदबुद्धि वाली वृत्ति के कारण अभिन्न वस्तुओं में भी वे भेद करते हैं। यहां तक कि नाम रहित आत्मतत्व का भी नाम रख देते हैं और देवी -देवता के रूप में उस तत्व की साधना करते हैं जो आत्मतत्व सभी स्थान- समयों में एक जैसा रहता है, उसमें भी मन के खोट के कारण उन्हें उच्च -नीच की कल्पना करनी पड़ती है।*

*वे अपनी कामनापूर्ति के कारण मनचाहे देवी -देवताओं की आराधना करते हैं, जिससे उन्हें मनचाही वस्तुएं प्राप्त होते हैं।वस्तुत: कर्म के सिवाय यहां न कोई दाता है और न ग्रहणकर्ता। यहां केवल कर्म ही फलप्रदाता है।*

*जैसे भूमि में जो बोया जाता है वही उगता है। दर्पण में जो देखता है उसे उसी का प्रतिबिंब दिखाई देता है। पहाड़ के नीचे खड़े होकर जो बोला जाता है वही प्रतिध्वनित होता है।उसी प्रकार से हे कौन्तेय! कि देवी-देवताओं का मूलाधार मैं ही हूं, इस पर भी उपासकों के मनोनुकूल आराधना के फल का प्रदाता मैं ही हूं।*

🌿*चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्म विभागश:।*

    *तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।।13।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*मनुष्य में जो चार वर्ण दिखाई देते हैं वह भी गुण- कर्मों के आधार पर मैंने ही उत्पन्न किए हैं,ऐसा समझो। उन चारों वर्णों के कर्मों की अपनी-अपनी प्रकृति तथा गुणों के अनुसार व्यवस्था सहज ही हो गई।  गुण-कर्म के अनुसार ही वर्ण भेद की व्यवस्था हुई है। अन्यथा तो हे पार्थ! मनुष्य एक ही वर्ण के हैं। इस वर्णभेद की व्यवस्था का कर्ता मैं ही हूं।*

🍃*एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभि:।*

    *कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वै: पूर्वतरं कृतम्।।15।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*हे अर्जुन! अब तक जो मुमुक्षुजन हो गए हैं, उन्होंने इसी प्रकार मुझे जानकर सारे कर्म किए हैं। जिस प्रकार भुना हुआ बीज खेत में डालने पर नहीं उगता, इसी प्रकार से उनके निष्काम कर्म ही उन्हें मोक्ष प्राप्ति के लिए लाभप्रद सिद्ध हुए। विषयों के संबंध में यह ध्यान देने योग्य है कि कर्म अकर्मक का विचार विद्वानों को भी मंत्र रुचि अनुसार व मनमाने ढंग से डरने की जरूरत नहीं होती।*

🌿🍃*किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिता:।*

         *तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभाता:।।16।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*जिसे कर्म कहते हैं वह क्या है और अकर्मक के  क्या लक्षण हैं, इसका विचार करते समय बुद्धिमान भी भ्रम में पड़ जाते हैं। जिस प्रकार खोटा सिक्का पूर्णतः वास्तविक जैसा दिखता है, इसलिए देखने वाले को भ्रमित कर देता है। इस प्रकार कर्मा कर्म का विचार करते समय बड़े-बड़े ज्ञानियों की चेतना उड़ जाती है। कारण कि, ज्ञानीजन यदि चाहें, तो एक नई सृष्टि रच सकते हैं, लेकिन निष्कामता की असत्य कल्पना के चक्कर में अंततः उनके कर्म भी सकाम ही सिद्ध हुए हैं यानी भ्रमवश वे कर्मबंधनों में अटक जाते हैं।*

*इस विषय में विचार करते समय बड़े-बड़े ज्ञानी भी भ्रमित हो,गए तब मूर्खों की तो बात ही क्या है?अतः मैं इस संबंध में स्पष्टतया से हे पार्थ! तुम्हें बताता हूं- तुम ध्यान से सुनो।*

🌿🍃*कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मण:।*

         *अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गति:।।17।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*जिससे संसार की उत्पत्ति सरलता से होती है उसे 'कर्म' समझना चाहिए।*

*प्रथम सहज कर्म को स्पष्ट रूप से समझना चाहिए। उपरान्त यह समझना चाहिए कि शास्त्रों में वह कौन-कौन से कर्म 'विहित' या निमित्त कर्म हैं जो वर्णाश्रम के लिए उचित हैं और उनका उपयोग क्या है? इसके पश्चात् जिन कर्मों का निषेध किया गया है उन कर्मों को ठीक से समझना चाहिए। इसका परिणाम होगा कि हम भ्रमित नहीं होंगे। वस्तुत: सारा संसार कर्माधीन है और इसकी व्यापकता अधिक ही गहरी हैं, लेकिन अर्जुन अब इनको छोड़ो,तुम कृत्यकृत्य के लक्षण सुनो।

🌿🍃*कर्मण्यकर्म य: पश्येदकर्मणि च कर्म य:।*

         *स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्त:कृत्स्नकर्मकृत्।।18।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*जो मनुष्य कर्माचरण करता हुआ भी इस बात को ध्यान में रखता है की मैं निष्कर्मा हूं। जो कर्म-संग होने पर भी फल की कामना नहीं करता और जो केवल कर्तव्यबद्ध के अतिरिक्त अन्य किसी कारण से कर्म नहीं करता उसके सम्बन्ध में समझना चाहिए कि उसमें निष्कर्मता का भाव पूर्णतया समाया हुआ है, आता जो मनुष्य अपने कार्यों को यथारीति करता रहे उसे ही उक्त लक्षणों वाला ज्ञानी मानना चाहिए।*

*जिस प्रकार पानी के पास खड़ा मनुष्य पानी में अपनी प्रतिच्छाया देखता है और यह समझता है कि मैं पानी की प्रतिच्छाया  नहीं, वरन्  उससे भिन्न हूं या जैसे नौका में विहार करता मनुष्य नदी तट के पेड़ों को साथ-साथ दौड़ते हुए देखता है, लेकिन ठीक से विचार करने पर कहता है कि ये पेड़ साथ-साथ नहीं चल रहे। जो यह समझता है कि मेरा कर्माचरण आत्मा की दृष्टि से अनुचित है और जो मूल स्वरूप को पहचान लेता है वही सत्य में निष्कर्मा है।*

*जैसे सूर्य उदय -अस्त के समय निर्विघ्न रूप से भ्रमण करता रहता है, वैसे ही मनुष्य सब कर्म करता हुआ भी निष्कर्मता को बनाए रखता है। देखने में तो वह मनुष्य लगता है, लेकिन जैसे सूर्य की प्रतिच्छाया पानी में पड़ने पर भी वास्तविक सूर्य पानी में नहीं भीगता वैसे ही निष्कर्मा मनुष्य को भी मनुष्यत्व कभी छू नहीं सकता।*

*ऐसा मनुष्य संसार को देखता है, सब कुछ करता हुआ भोगों को भी भोगता है, लेकिन वह इन सबसे निर्लिप्त रहता है। वह एक स्थान पर रहता हुआ भी सारे संसार में भ्रमण करता है, अपितु कहना यही चाहिए कि वह स्वयं ही विश्वरुप हो जाता है।*

🌿🍃*यस्य सर्वे समारम्भा:कामसंल्प वर्जिता:।*

         *ज्ञानाग्निदग्ध कर्माणं तमाहु: पण्डितं बुधा:।।19।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*जिस पुरुष को कर्मों के आचरण के सम्बन्ध में चिंता नहीं होती तथा संकल्प- विकल्प भी उसके मन में नहीं होते कि मैं यह कार्य करूंगा या हाथ में लिया हुआ काम पूरा करूंगा, क्योंकि उसने ज्ञान रूपी अग्नि में अपने सारे कर्म भस्म कर डाले हैं। ऐसा वह मनुष्य, तो मनुष्य के रूप में साक्षात परब्रह्म ही है ,ऐसा समझो।*

🌿🍃*त्यक्त्वा कर्मफलासंगं नित्यतृप्तो निराश्रय:।*

         *कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति स:।।20।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*जो अपने शरीर के प्रति उदासीन और कर्म से प्राप्त होने वाले फल के प्रति विरक्त होता है और जो सदैव आनंद स्वरूप में निमग्न रहता है, वह पुरुष- हे पार्थ! आत्मबोध के पकवान का भोजन करते नहीं अघाता।*

🌿🌿*निराशीर्यत चित्तात्मा व्यक्त सर्वपरिग्रह:।*

         *शारीरं केशवलं कर्मं कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।21।।*

         *यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सर:।*

         *सम: सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते।।22।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*जो आशा को छोड़ देता है और उसे अहंकार के साथ न्योछावर करके फेंक देता है और ब्रह्म सुख का आस्वादन करता है। जिस समय जो भी मिले उसमें सुख मान लेता है। जिसे अपने व पराए में कोई भेद दिखाई नहीं देता।संसार में देखने पर आत्मस्वरूप के अतिरिक्त जिसे और कुछ दिखाई नहीं देता, उसे किस कर्म से और कैसी बाधा हो सकती है? जिसे ईर्ष्या नहीं होती वह सभी प्रकार से मुक्त है। सारे कर्म करते रहने पर भी वह (अकर्मा) है।*

🌿🍃*गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थित चेतस:।*

         *यज्ञायाचरत: कर्म समग्रं प्रविलीयते।।23।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*वह देहधारी होता है, किंतु विचारों में चैतन्य के समान दिखाई देता है और ब्रह्म की कसौटी पर खरा उतरता है। यद्यपि वह मुक्त है इस पर भी कभी-कभी विधिपूर्वक यज्ञादि कर्मों का आचरण भी करता है, लेकिन वे संपूर्ण कर्म आत्मस्वरूप में लीन हो जाते हैं। जैसे असमय के बादल आकाश में चारों ओर छा जाने पर भी वर्षा नहीं करते और आकाश में ही लीन हो जाते हैं। वैसे ही पुरुष के यज्ञ यज्ञादि कर्म उसके ऐक्यरूप में एक हो जाते हैं।*

🌿🍃*ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्राह्मणा हुतम्।*

         *ब्रह्यौव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना।।24।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*वह जो भी यज्ञ करता है, उसमें होम द्रव्य तथा मंत्र आत्मस्वरूप अथवा ब्रह्मस्वरूप ही है, ऐसा समझता है, इसलिए हे अर्जुन! ब्रह्म ही कर्म है, ऐसी सद्बुद्धि जिसके अंतःकरण में है वह कर्म कर्ता भी है और तब भी वह नए नैष्यकर्म्य  ही है। जो लोग अभिषेक रूप बाल्यावस्था पार करके विरक्ति( विराग) से विवाह कर लेते हैं तब अग्निहोत्र प्रारंभ कर देते हैं।*

🌿🍃*दैवमेवापरे यज्ञं योगिन:पर्युपासते।*

         *ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोप जुह्वति।।25।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*हे अर्जुन! जो दिन-रात  गुरु      वाक्यरूपी अग्नि में मन के साथ अज्ञान की आहुति देते रहते हैं, उन्हीं को यह योगयज्ञ करना चाहिए तथा जिसे आत्मसुख की अभिलाषा हो उसी को यह यज्ञ करना चाहिए। इसी को 'दैव यज्ञ' कहते हैं।अब मैं तुम्हें यज्ञ के कुछ अन्य प्रकार बताता हूं,ध्यान से सुनो ।जो ब्रह्माग्नि से अग्निहोत्र करते हैं वे उस यज्ञ से ही यज्ञ-विधि करते हैं।

🌿*श्रोत्रिदीनिन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति।*

     *शब्दादीन्विविषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति।।26।।*

     *सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे।

     *आत्मसंयम योगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते।।27।।*

     *द्रव्य यज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे।*

     *स्वाध्याय ज्ञानयज्ञाश्च यतय: संशित व्रता:।।28।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃*हे अर्जुन! ध्यान, धारणा, समाधिरुप मंथन, कोई अग्निहोत्री कितने ही मूलबंधादि द्वारा इंद्रियरुप पवित्र द्रव्य से यज्ञ करते हैं।दूसरे कितने ही वैराग्य रुप सूर्योदय के साथ संचयरुप यज्ञवेदी बनाकर उसमें इंद्रियरुप अग्नि प्रकट करते हैं। जब वैराग्य की ज्वाला प्रज्वलित हो जाती है तब उसमें विकार का ईंधन भस्म होने लगता है और अंत:करण पंचकुंडों को छोड़कर आशारुपी धुआं बाहर निकलता है, जिससे वे कुछ पवित्र हो जाते हैं। तब ऐसे लोग 'अहं ब्रह्मास्मि' का उच्चारण करते हुए हृदय-कुंड में इंद्रियरुप अग्नि के मुख में विषयों की आहुति देते हैं।*

*हे अर्जुन! कुछ लोग संयम का अग्निहोत्र करके भी सर्वशुद्ध हुए हैं। कुछ लोग हृदय रूपी अरणी को घिस कर अग्नि उत्पन्न करने के लिए विवेक को मथानी बनाते हैं। उस मथानी को वे शांतिपूर्वक दृढ़ता से पकड़कर ऊपर से सात्विक धैर्य के साथ दृढ़ता से पकड़कर गुरुमंत्र रुपी डोर से गम्भीर मंथन करते हैं।*

*इस प्रकार निरंतर करते रहने से उसका फल शीघ्र प्राप्त हो जाता है, लेकिन ज्ञानाग्नि के प्रज्वलित होने से पूर्व थोड़ा धूम उठता है जो ऋद्धि-सिद्धियों का मोह कहलाता है। वह धुम शीघ्र निकल जाता है,तब पहले ज्ञानरुपी अग्नि की अतिसूक्ष्म चिनगारी उत्पन्न होती है।यम-दम से सुखाने के कारण जो मन पहले ही हल्का हो चुका होता है,वही मन चिनगारी के लिए ईंधन का काम करता है।*

*जब तीव्र ज्वाला उत्पन्न होती है तब विविध वासनाएं ईंधन के रूप में ममतारूपी घी के संग भस्म हो जाती हैं। तब दीक्षित मनुष्य 'सोऽहम्' मंत्र का  उच्चारण करता हुआ प्रज्वलित ज्ञानाग्नि में इंद्रियों के कर्मों की आहुति देता है। आगे गुणकर्म रुपी स्रुवा दर्भपात्र से उस अग्नि में पूर्णाहुति दी जाती है,तब अंत में ब्रह्मा की एकरुपता में अवभृथ स्नान( यज्ञ से पूर्व स्नान) होता है।*

*वे यज्ञकर्ता संयमाग्नि में इंद्रियादि होम द्रव्य से होम करके संयमरुप यज्ञ का शेष हविर्भाग जो आत्मज्ञान का आनंद है -पुरोडाश के रुप में ग्रहण करते हैं।अनेक लोग ऐसा यज्ञ करके त्रिभुवन से मुक्त हो चुके हैं।अब तक मैनें जो यज्ञ विधान बताएं हैं वे दिखने में भिन्न-भिन्न लगते हैं, लेकिन सबका लक्ष्य एक ही है और वह लक्ष्य ब्रह्म से समरसता प्राप्त करना है।*

*उनमें से किसी को द्रव्य यज्ञ कहा जाता है, कुछ यज्ञ तपरुप क्षमता से उत्पन्न होते हैं,कितने ही योग यज्ञ कहे गए हैं। कितने ही यज्ञों में शब्द से शब्दों की आहुति दी जाती है, अर्थात् वेदोच्चारण करते हैं उसे 'वाक् यज्ञ' कहते हैं। जिसे ज्ञान से जाना जाता है उसे 'ज्ञानयज्ञ' कहा जाता है, लेकिन हे अर्जुन! ये सारे यज्ञ बड़े विकट हैं, क्योंकि इनका अनुष्ठान कठिन है। जो जितेंद्रिय हैं वे अपनी क्षमता से इन यज्ञों का साधन करते हैं, अतः वे आत्मा के रुप में जीव बुद्धि का हवन करते हैं।*

🌿🍃*अपाने  जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे।*

         *प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायाम परायणा:।।29।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*कोई अभ्यास करके अपान वायुरूपी अग्नि में प्राणवायु रुपी द्रव्य का हवन करते हैं, कोई अपान -वायु की प्राण-वायु में आहुति देते हैं और कोई दोनों का निरोध करते हैं। उन्हें 'प्राणायामी' कहा जाता है।*

🌿🍃*अपरे नियताहारा: प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।*

         *सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपित कल्मषा:।।30।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*कुछ लोग वज्रासन द्वारा मूलबंध लगाकर आहारों का नियमन करके धैर्य पूर्वक प्राणों से प्राणों का लय करते हैं। ऐसा करके वह मन के कलुष को दूर करने वाले यज्ञकर्ता मोक्षकामी होते हैं। जो लोग अज्ञान को भस्म कर आत्मरूप ही बचाए रहते हैं उनमें अग्नि और यज्ञकर्ता का भेद नहीं रहता। ऐसी स्थिति में यज्ञकर्ता का हेतु पूरा हो जाता है, यज्ञ -क्रिया समाप्त हो जाती है और कर्मों के सारे द्वंद समाप्त हो जाते हैं तब विचार और हेतु के प्रवेश की अल्पमात्र भी संभावना नहीं रहती है और द्वैतभाव का दोष भी स्पर्श नहीं कर सकता।

🍃🌿*यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।*

         *नायं लोकोऽस्त्य यज्ञस्य कुतोऽन्य: कुरुसत्तम।।31।।*

🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃*ऐसा जो अनादि सिद्ध तथा शुद्ध यज्ञ के परिणाम स्वरुप शेष बचने वाला ज्ञानस्वरुप ब्रह्म है,उसका ब्रह्मनिष्ठजन 'अहं ब्रह्मास्मि' के मंत्र से सेवन करते हैं। इस प्रकार यज्ञ से बचा हुआ ज्ञानरुप अमृत पीकर जो तृप्त हो जाते हैं,वही सहज ब्रह्मतत्त्व को प्राप्त करते हैं। जो योगयज्ञ भी नहीं करते उनका -हे अर्जुन! इस लोक में कल्याण नहीं होता। उनके परलोक के विषय में क्या पूछते हो ? उनके सम्बन्ध में बात करना ही निरर्थक है।*

🍃🌿*एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे।*

         *कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेव ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे।।32।।*

🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃*इस प्रकार मैंने तुम्हें मन के जो अनेक प्रकार बतलाए हैं,उनके सम्बन्ध में वेदों में विस्तार से बतलाया गया है, लेकिन हमें इससे क्या लेना- देना? उसका सार यही है कि सारे यज्ञ कर्म से उत्पन्न हुए हैं। इतना जान लेने पर कर्म की बाधा नहीं होती।*🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃

🌿🍃श्रेयान्द्र व्यमयाद्य ज्ञाज्ज्ञानयज्ञ: परंतप:।*

         *सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते।।33।।*

         *तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।*

         *उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिन:।।34।।*

         *यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यासि पाण्डव।*

         *येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि।।35।।*

         *अपि चेदसि पापेभ्य: सर्वेभ्य: पापकृत्तम:।*

         *सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यति।।36।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿 *हे अर्जुन! जिसका मूल वेद है और जो बाहरी क्रिया प्रधान स्थूल यज्ञ है उनका अपूर्व फल स्वर्ग का सुख है। *उन यज्ञों में केवल जड़ -पदार्थों की आहुति दी जाती है, अतः जैसे सूर्य के तेज के सामने तारों का तेज मन्द पड़ जाता है वैसे ही ज्ञान यज्ञ के सामने जड़- यज्ञ तेजहीन हो जाते हैं।*

*परमात्म स्वरुप का सुख पाने के लिए योगी ज्ञान रूपी अंजन प्रकाशरूपी नेत्रों में डालना कभी नहीं भूलते।*

*जो वर्तमान कर्म का समाप्ति स्थल है,कर्मातीत ज्ञान की खान है, आत्म सुख के लिए जो व्याकुल है, उसके साधनों की जो तृप्ति है, इसके आगे प्रवृत्ति पंगु हो जाती है, तर्क दृष्टिहीन हो जाता है, इंद्रियां विषयों का संग करना भूल जाती हैं, जिसके मन का मनपना समाप्त हो जाता है, शब्द का शब्दत्व स्थगित हो जाता है, ज्ञेय का पता लग जाता है, जो ज्ञान-वैराग्य की इच्छा पूर्ण कर देता है, विवेक का समाधान करता है और बिना प्रयास के आत्मतत्व से भेंट करा देता है।*

*यदि तुम उत्तम ज्ञान पाने के इच्छुक हो, तो संतों की सेवा ही ज्ञान रूप मंदिर की चौखट है।अतः हे पार्थ! तुम सेवा करके ज्ञान को प्राप्त करो। इसके लिए शरीर, मन, वाणी से संतों के चरणों की शरण करनी चाहिए और अभिमान त्याग कर उनकी तुम्हें अपार सेवा करनी चाहिए।*

*ऐसा करने पर जिस ज्ञान को पाने की हमारी इच्छा है उसके विषय में पूछने पर संतजन उस वांछित ज्ञान का हमें उपदेश देंगे और वह ज्ञान ऐसा है जिसका उपदेश मन में समा जाए,तो मन संकल्परहित हो जाता है।*

*संतो के उपदेश रूपी प्रकाश से निर्भय हुआ चित्त( मन) ब्रह्म जैसा ही संशयहीन हो जाता है। उस समय तुम अपने सहित यह सारा संसार निरंतर मेरे स्व- स्वरूप में देख सकोगे। हे अर्जुन! जब गुरुदेव की कृपा होगी तब इस ज्ञान रूपी प्रकाश का प्रातः काल होगा और अंधकार मिट जाएगा।*

*हे अर्जुन तुम भले ही पाप के सागर हो, भ्रांति के सागर और विकारों( दोषों) के पर्वत ही क्यों न हो,तब भी इस ज्ञानशक्ति के आगे ये सब बातें तुच्छ हैं। इस ज्ञान में इतनी उत्तम निर्दोष क्षमता है।जिस ज्ञानरुपी पलाश के सामने उस अमूर्त रामतत्व की विश्व के आभास रुप की छाया भी शेष नहीं रहती ,उस ज्ञान को तुम्हारे मन की कलुषता को भगाने में भला कितना श्रम करना पड़ेगा? इस सम्बन्ध में किसी प्रकार की शंका करना ही मूर्खता के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। संसार में इस ज्ञान जैसी व्यापक,सक्षम अन्य कोई वस्तु नहीं है।*🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿

🍃🌿यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मत्कुरुतेऽर्जुन।*

        *ज्ञानाग्नि: सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।।37।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*प्रलयकाल में त्रिलोकी में आग लगने पर आकाश में फैले हुए धूएं को बवंडर क्षणमात्र में दूर कर देता है। उसे बादल को हटाने में क्या देर लगती है अथवा पवन से प्रज्वलित जो अग्नि पानी को भी जला देती है,ऐसी प्रलयकाल की अग्नि क्या घास और लकड़ियों को भी नहीं भस्म कर पाएगी ?*

🍃🌿*न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।*

         *तत्वस्वयं योगसंसिद्ध: कालेनात्मनि विन्दति।।38।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*यदि ठीक ढंग से सोचा -समझा जाए,तो ऐसा कहना सर्वथा असंगत है कि परम ज्ञान से मन की मलिनता दूर हो सकती है। तो ज्ञान से बढ़कर इस संसार में कोई भी वस्तु पवित्र नहीं है। जैसे संसार में चैतन्य के अतिरिक्त अन्य कोई वस्तु नहीं है जिसे चैतन्य की उपमा दी जा सके। इसी प्रकार ज्ञान भी ऐसा उत्तम है कि इसकी समकक्ष की वस्तु अन्य कोई भी नहीं है।*

*यदि सूर्यबिंब की कसौटी पर उसका प्रतिबिंब सटीक उत्तर दे सके या आकाश को गठरी में बांधा जा सके, अथवा पृथ्वी जितना भार हाथ पर उठाया जा सके। तभी तो पार्थ! संसार से इस ज्ञान की उपमा मिल सकती है अन्यथा नहीं, अतः सब दृष्टियों से विचार किया जाए तो यही निष्कर्ष निकलता है कि ज्ञान की पावनता ज्ञान में ही है और अन्यत्र कहीं नहीं मिल सकती।*

*जैसे यह बतलाना हो कि अमृत का स्वाद कैसा होता है, तो यही कहा जाएगा कि अमृत का स्वाद अमृत जैसा ही होता है। इस विषय में अधिक समय नष्ट करना व्यर्थ है। श्रीकृष्ण के ऐसा कहने पर अर्जुन ने कहा- देव! आपका कहना उचित है। तो अर्जुन ने मन में सोचा कि अब श्री कृष्ण से यह भी पूछना चाहिए कि इस ज्ञान को पहचाना कैसे जाए और इसके लक्षण क्या हैं?  लेकिन श्रीकृष्ण ने उसके मन के विचार को भांपते हुए कहा-भैया अर्जुन! ज्ञान के संबंध में मैं तुम्हें बताता हूं, ध्यान से सुनो!*🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿

🍃🌿*श्रद्धावांल्लभते  ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।*

         *ज्ञानं लब्ध्वा परां शांतिमचिरेणाधिगच्छति।।39।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*जिस मनुष्य ने आत्म सुख का एक बार स्वाद चख लिया,तो इस संसार के सारे विषय उसे तुच्छ लगते हैं। जो इंद्रियों का पोषण नहीं करता,माया में नहीं रमता, श्रद्धा -बुद्धि के संगति से सुखी हो जाता है,अखंड-निर्दोष शांति से युक्त ज्ञान उसे खोजता हुआ स्वयं उसके पास आता है। जहां ज्ञान मन में  भली-भांति समाहित हो जाता है और शांति उत्पन्न होती है, वहां आत्मबोध का प्रचंड विस्तार स्वयं होने लगता है।*

*इतना होने पर वह मनुष्य जिस ओर देखता है,उसी ओर उसे शांति दिखाई देती है तथा अपने-पराए की भावना समाप्त हो जाती है। इस प्रकार ज्ञान-बीज का विस्तार निरंतर होता रहता है। अब इसका बखान मैं कहां तक करूं। इतना ही पर्याप्त है।*

🌿🍃*अज्ञश्चाश्रद्धानश्च संशयात्मा विनश्यति।*

         *नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मन:।।40।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*हे पार्थ! जिस मनुष्य के मन में ज्ञान -प्राप्ति की इच्छा न हो उसका तो जीने की अपेक्षा मर जाना अच्छा है। जैसे उजाड़ घर और निष्प्राण शरीर होता है, वैसे ही ज्ञानहीन का जीवन भ्रमित होता है या यदि किसी मनुष्य की ऐसी अवस्था हो उसे ज्ञान तो प्राप्त नहीं हुआ, इस पर भी जिसके मन में ज्ञान के प्रति सम्मान या दंभ हो, तो ऐसा समझना चाहिए कि उसका ज्ञान पा लेना संभव है। ज्ञानहीन का कोई मूल्य नहीं है।*

*यदि किसी को यह ज्ञान न भी हो और उसके मन में ज्ञान के प्रति सम्मान भी न हो तो उसके सम्बन्ध में समझना चाहिए कि वह संशय की अग्नि में भस्म हो गया। यदि किसी के मन में ज्ञान के प्रति अरुचि हो और अमृत भी उसे अच्छा न लगे तब समझें कि उसकी मृत्यु सिर पर मंडरा  रही है।*

*इसी प्रकार जो मनुष्य सुखों से घिरा हो, ज्ञान में उसकी रुचि नहीं है, तो समझे कि वह संशय से आकंठ घिरा है, जो संशय में होता है, उसका नाश होता है। वह सभी लोकों के सुख से वंचित रहता है। जिसे भीषण ज्वर चढ़ता है, शीत उष्ण का भी जिसे पता  न चलता हो, जो आग और शीतलता को समान समझता हो, ऐसे संसार में पड़े मनुष्य को अच्छे बुरे, असंबद्ध- योग्य, भद्र- अभद्र का अंतर ज्ञात नहीं होता।*

*जैसे जन्म से नेत्रहीन को रात -दिन का ज्ञान नहीं होता वैसे ही संशयग्रस्त को किसी भी बात का पता नहीं चलता,  अतः संसार में इस जैसा कोई घोरपातक नहीं है। प्राणियों के नाश का यह जाल है, अतः तुम संशय करना छोड़ दो जो अज्ञान से उत्पन्न होता है।*

*सबसे पहले तुम्हें संशय को जीतना चाहिए। जब आज्ञा का घोर अंधेरा फैलता है तब संशय का प्रभाव अधिक बढ़ जाता है और श्रद्धा का मार्ग समाप्त हो जाता है। आगे यह इतना बढ़ता है कि मन में समा भी नहीं पाता और बुद्धि को ग्रस लेता है तब उस मनुष्य के लिए त्रिभुवन संशयमय हो जाता है।🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿

🍃🌿- *योगसंन्यस्त कर्माणं ज्ञानसंछिन्न संशयम्।*

           *आत्मववन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय।।41।।*

           *तस्माद ज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानसिनात्मन:।*

           *छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत।।42।।*

🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿*चूंकि  संशय की व्यापकता अत्यधिक है, जो मात्र एक उपाय से शांत किया जा सकता है। ज्ञान की लपलपाती खड्ग यदि हमारे हाथ में हो, तो उसे तीखी धार की तलवार से उसकी जड़ को नष्ट किया जा सकता और मन में उसका अल्पमात्र भी अंश नहीं रह जाता। अतः हे धनंजय! तुम शीघ्र उठो और मन में वास करने वाले इस संशय को नष्ट कर डालो।*

*इस प्रकार श्रेष्ठ और ज्ञानदीप श्री कृष्ण ने यह सारी बातें, अर्जुन से कहीं। इन बातों को आप ध्यान में रखें। श्री कृष्ण ने जो बातें पहले कहीं थी और अब जो कहीं  उनका विचार करके अर्जुन अब जो प्रश्न करेंगे उसका प्रसंग भक्ति का कोष और रसोत्पत्ति की प्रौढ़ता से परिपूर्ण है। अब आगे उसी का वर्णन किया जाएगा।*

*जिस शांतरस के माधुर्य पर शेष आठों (वीर,वीभत्स, श्रृंगार,करुण आदि) रस न्योछावर करके फेंक देने योग्य हैं और जो शांतरस में सज्जनों की बुद्धि को आश्रय प्राप्त होता है, वह शांत रस इस कथा में चरम को प्राप्त होगा। यह कथा आप समुद्र से भी अधिक गंभीरता और अर्थपूर्ण भाषा में श्रवण करें।*

*जैसे सूर्य का प्रतिबिंब दिखाई देता है, लेकिन प्रकाश इतना अधिक होता है कि त्रिभुवन में भी नहीं समा पाता।वैसे ही आपको इस कथा के शब्दों की व्यापकता की अनुभूति होगी, या जैसे कल्पवृक्ष  मांगने वाले की इच्छा के अनुसार फल देता है, वैसे ही इस वाणी की व्यापकता भी श्रोताओं की इच्छा अनुसार कम या  अधिक होगी, अतः आप सब लोग सावधानी से सुनें। अब अधिक कहने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि आप लोग सर्वज्ञाता हैं, अतः अधिक क्या कहा जाए।*

*मेरी केवल यही प्रार्थना है कि आप लोग ध्यान से सुनें। जैसे स्त्री में सौंदर्य, गुण,कुलीनता के साथ-साथ पवित्रता भी होती है, वैसे ही इन पंक्तियों में साहित्य का लालित्य,गुण और शांत रस दोनों ही स्पष्ट दिखते हैं। एक तो चीनी सबको अच्छी लगती ही है, इस पर भी यदि औषधि के रुप में दी जाए, तो फिर वह आनंद से क्यों न खाई जाए?*

*मलय वायु मंद-सुवासित होती है,उस पर भी यदि अमृत का माधुर्य प्राप्त हो जाए तो वह स्वस्पर्श से सभी अंगों का ताप हर लेती है, मधुर रुचि से जिह्वा और आनंद से नचाती हैं और कानों को तृप्त करके 'धन्य-धन्य' का भाव व्यक्त करवाती है।*

*इस प्रकार यह कथा सुनने से कानों की तृप्ति हो जाती है और बिना किसी अपकार के संसार के सारे दुख जड़ से दूर हो जाते हैं। यदि मंत्र से शत्रु मर जाता हो, तो नीम का कड़वा रस पीने का क्या प्रयोजन है? इसी प्रकार इंद्रियों को कष्ट दिए बिना केवल कथा सुनने से ही मोक्ष स्वत: प्राप्त होता है, अतः श्री निवृत्ति नाथ का शिष्य ज्ञान देव कहता है कि आप लोग शांत भाव से गीता का अर्थ भलीभांति श्रवण करें।* ‌

                 🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿

      ।।ज्ञानकर्मसंन्यासयोगो नाम चतुर्थोऽध्याय:  समाप्त।।

                 🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿🍃🌿

🪷🚩🪷डॉ त्रिभुवन नाथ श्रीवास्तव, पूर्व प्राचार्य 🪷🚩🪷

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