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यम और नियम योग के दो मूलभूत सिद्धांत हैं जो योगी के जीवन को निर्देशित करने में सहायता करते हैं।
यम:
यम का अर्थ है " ईश्वरीय वाह्य नियमों का पालन" या " वाह्य विश्व का अनुशासन"। यम के पांच सिद्धांत हैं जो योगी और समाज के प्रत्येक व्यक्ति के व्यवहार को निर्देशित करने में सहायता करते हैं:
1. अहिंसा: मनसा वाचा कर्मणा किसी भी जीव को हानि न पहुंचाना और धर्म की रक्षा हेतु सदा तत्पर रहना।
2. सत्य: मनसा वाचा कर्मणा सत्यता और निष्ठा का पालन करना।
3. अस्तेय: मनसा वाचा कर्मणा चोरी न करना और दूसरों की संपत्ति का सम्मान करना।
4. ब्रह्मचर्य: सर्व इन्द्रिय संयम और आत्म-नियंत्रण और ब्रह्म का अनुसंधान करना और पालन करना।
5. अपरिग्रह: मनसा वाचा कर्मणा दूसरों की संपत्ति को न लेना और अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखना।
नियम:
नियम का अर्थ है "नियम" या "आचार"। आंतरिक विश्व का अनुशासन बनाए रखना या आंतरिक नियन्त्रण।नियम के पांच सिद्धांत हैं जो योगी के आचार और व्यवहार को निर्देशित करने में सहायता करते हैं:
1. शौच: आंतरिक और बाह्य शारीरिक और मानसिक स्वच्छता का पालन करना। यह अति विस्तृत शब्द है जिसमें सभी प्रकार के चिकित्सा से जुड़े विषय समाहित है। क्योंकि यदि स्वच्छता बनी रहेगी तो कोई भी रोग नहीं आयेगा।
2. संतोष: संतुष्टि और प्रसन्नता का पालन करना अर्थात् जितना मिल गया है उसे संतोषजनक समझना। कविवर रहीम दास जी कहते हैं कि,
"गोधन गजधन बाजधन और रतनधन खानि।
जब आवै संतोषधन सब धन धूरि समान।।
3. तपस: अपने शास्त्रों का विधिवत वैज्ञानिक अध्ययन करते हुए, निरन्तर अपनी आत्मोन्नति करते हुए आत्म-नियंत्रण और संयम का पालन करना। साथ साथ समाज के ज्ञान और आध्यात्मिक विज्ञान के विकास में योगदान करना।
4. स्वाध्याय: स्वयं को जानना या आत्म-ज्ञान और अध्ययन का पालन करना।
5. ईश्वर प्रणिधान: ईश्वर या उच्च शक्ति के प्रति समर्पण और श्रद्धा का पालन करना। जो भी आपने अनुसंधान किया है उसे ईश्वर स्वरूप समाज को निष्कपट भेंट करते जाना।
इन सिद्धांतों का पालन करके, योगी अपने जीवन को अधिक संतुलित, शांतिपूर्ण और अर्थपूर्ण बना सकता है।
यम और नियम के सिद्धांतों को महर्षि पतंजलि ने अपने योगसूत्र में वर्णित किया है। यहाँ कुछ श्लोक दिए गए हैं:
यम:
अहिंसा सत्यमस्तेय ब्रह्मचर्यापरिग्रहाः यमाः (योगसूत्र २.३०)
शाब्दिक अर्थ: अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, और अपरिग्रह ये पांच यम हैं।
नियम:
शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः (योगसूत्र २.३२)
शाब्दिक अर्थ: शौच, संतोष, तपस, स्वाध्याय, और ईश्वरप्रणिधान ये पांच नियम हैं।
इन श्लोकों में यम और नियम के सिद्धांतों को संक्षेप में वर्णित किया गया है। योगसूत्र में महर्षि पतंजलि ने इन सिद्धांतों को विस्तार से समझाया है।
अहिंसा का सूत्र:
अहिंसा परमो धर्मः (महाभारत, अनुशासन पर्व ११७.३७)
अर्थ: अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है, लेकिन यदि समाज पर कोई विपदा आए तो उससे सुरक्षित करने में पीछे नहीं हटना ही अहिंसा परमो धर्म है, ना कि कायरों के समान मुख छिपाकर बैठे रहना।
या
अहिंसा सर्वभूतानां सुखहेतुरिति मे मति (योगसूत्र २.३०)
अर्थ: सभी जीवों के प्रति अहिंसा करना सुख का कारण है, एवम् रक्षा भी करना।
इन सूत्रों में अहिंसा के महत्व को दर्शाया गया है. यह सूत्र हमें यह स्मरण कराते हैं कि सभी जीवों के प्रति दया और करुणा का भाव रखना चाहिए।
अहिंसा के पांच सिद्धांत हैं:
१. मनसा - विचारों में अहिंसा
२. वाचा - शब्दों में अहिंसा
३. कर्मणा - कर्मों में अहिंसा
इन सिद्धांतों का पालन करके, हम अपने जीवन में अहिंसा को वास्तविक रूप में लागू कर सकते हैं।
सत्य का अर्थ है सच्चाई और निष्ठा। यह यम का दूसरा सिद्धांत है, जो हमें सत्यता और निष्ठा के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है।
सत्य के सूत्र:
सत्यम् ब्रूयात् प्रियम् ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम् (मनुस्मृति ४.१३६)
अर्थ: सत्य बोलना चाहिए, प्रिय बोलना चाहिए, लेकिन सत्य को छुपाकर अप्रिय बात नहीं बोलनी चाहिए।
सत्य के पांच सिद्धांत हैं:
१. वाणी में सत्य - बोलने में सत्यता ।
२. मन में सत्य - विचारों में सत्यता ।
३. कर्म में सत्य - कर्मों में सत्यता।
४. व्यवहार में सत्य - व्यवहार में सत्यता।
५. जीवन में सत्य - जीवन के हर संस्कार और विभाग में सत्यता।
इन सिद्धांतों का पालन करके, हम अपने जीवन में सत्य को वास्तविक रूप में व्यवहार कर सकते हैं और सत्यता और निष्ठा के मार्ग पर चल सकते हैं।
अस्तेय का अर्थ है चोरी न करना और दूसरों की संपत्ति का सम्मान करना। यह यम का तीसरा सिद्धांत है, जो हमें दूसरों की संपत्ति का सम्मान करने और चोरी न करने के लिए प्रेरित करता है। यहां तक कि किसी के ज्ञान और विचार को अपना कह कर ना छाप देना।
अस्तेय के सूत्र:
अस्तेय प्रतिग्रहस्तैरन्निधेयं (योगसूत्र २.३०)
अर्थ: दूसरों की संपत्ति को अपने पास न रखना चाहिए, और न ही उसे चोरी या बलात अधिकार करना चाहिए।
अस्तेय के पांच सिद्धांत हैं:
१. दूसरों की संपत्ति का सम्मान करना।
२. चोरी न करना।
३. दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना।
४. अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखना।
५. दूसरों की संपत्ति को संरक्षित करना।
इन सिद्धांतों का पालन करके, हम अपने जीवन में अस्तेय को वास्तविक रूप में व्यवहारिक कर सकते हैं और दूसरों की संपत्ति का सम्मान करने के साथ-साथ अपनी आवश्यकताओं को भी सीमित रख सकते हैं।
अपरिग्रह का अर्थ है दूसरों की संपत्ति को न लेना और अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखना। यह यम का पांचवां सिद्धांत है, जो हमें दूसरों की संपत्ति का सम्मान करने और अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखने के लिए प्रेरित करता है।
अपरिग्रह के सूत्र:
अपरिग्रहस्थैर्येण तद्-वृत्तयः (योगसूत्र २.३०)
अर्थ: दूसरों की संपत्ति को न लेने से और अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखने से हमारी वृत्तियाँ स्थिर होती हैं।
अपरिग्रह के पांच सिद्धांत हैं:
१. दूसरों की संपत्ति को न लेना।
२. अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखना।
३. संचय न करना।
४. दान करना।
५. सादगी से जीवन जीना।
इन सिद्धांतों का पालन करके, हम अपने जीवन में अपरिग्रह को वास्तविक रूप में व्यवहार में ला सकते हैं और दूसरों की संपत्ति का सम्मान करने के साथ-साथ अपनी आवश्यकताओं को भी सीमित रख सकते हैं।
ब्रह्मचर्य का अर्थ है संयम और आत्म-नियंत्रण। यह यम का चौथा सिद्धांत है, जो हमें अपने विचारों, शब्दों और कर्मों में संयम और आत्म-नियंत्रण रखने के लिए प्रेरित करता है। साथ ही ब्रह्म क्या है उसे ज्ञात कर शेष समाज को प्रकाशित करना। ब्रह्म भाव में जीवन यापन करना।
ब्रह्मचर्य के सूत्र:
ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठायाम् वीर्यलाभः (योगसूत्र २.३०)
अर्थ: ब्रह्मचर्य से वीर्य(यहां वीर्य का अर्थ है ब्रह्म बल, ब्रह्म शक्ति, ओजस्विता, तेजस्विता) की प्रतिष्ठा होती है, और इससे आत्म-शक्ति में वृद्धि होती है।
ब्रह्मचर्य के पांच सिद्धांत हैं:
१. संयम और आत्म-नियंत्रण रखना।
२. इंद्रियों के विषयों को नियन्त्रण में रखना।
३. विचारों को शुद्ध और पवित्र रखना।
४. शब्दों को संयमित रखना।
५. जीवन के प्रत्येक कर्मों में संयम रखना।
इन सिद्धांतों का पालन करके, हम अपने जीवन में ब्रह्मचर्य को वास्तविक रूप में व्यवहार में ला सकते हैं और अपने विचारों, शब्दों और कर्मों में संयम और आत्म-नियंत्रण रख सकते हैं।
नियम जो अष्टांग योग का दूसरा अंग या पाद है,के पांच सिद्धांत हैं जो हमें अपने जीवन में संयम और अनुशासन रखने के लिए प्रेरित करते हैं। यहाँ नियमों के सूत्र सहित वर्णन है:
१. शौच - आंतरिक और बाह्य स्वच्छता और शुद्धता।
शौचं स्वास्थ्यमायुर्मेधा (योगसूत्र २.३२)
अर्थ: स्वच्छता से स्वास्थ्य, आयु और मेधा में वृद्धि होती है।
२. संतोष - संतुष्टि और प्रसन्नता।
संतोष आनंदमयः (योगसूत्र २.३२)
अर्थ: संतुष्टि से आनंद और हार्दिक प्रसन्नता मिलती है।
३. तपस - आत्म-नियंत्रण और संयम।
तपस्वी सिद्धयः (योगसूत्र २.३२)
अर्थ: तपस से सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, अर्थात् समाज को ज्ञान के आलोक से भर देना।
४. स्वाध्याय - आत्म-ज्ञान और अध्ययन।
स्वाध्यायात्मविद्या (योगसूत्र २.३२)
अर्थ: स्वाध्याय से आत्म-ज्ञान और विद्या प्राप्त होती है।
५. ईश्वर प्रणिधान - ईश्वर या उच्च शक्ति के प्रति समर्पण।
ईश्वरप्रणिधानाद्वा (योगसूत्र २.३२)
अर्थ: ईश्वर प्रणिधान से उच्च शक्ति की प्राप्ति होती है और इस शक्ति को विश्व में रहने वाले प्रत्येक प्राणी को उन्नत करते जाना।
इन नियमों का पालन करके, हम अपने जीवन में संयम और अनुशासन रख सकते हैं और आत्म-ज्ञान और सिद्धियों को प्राप्त कर सकते हैं।
शौच का अर्थ है स्वच्छता और शुद्धता। यह नियम का पहला सिद्धांत है, जो हमें अपने शरीर, मन और वातावरण को स्वच्छ और शुद्ध रखने के लिए प्रेरित करता है।
शौच के प्रकार:
1. बाह्य शौच: शरीर की बाहरी स्वच्छता, जैसे कि स्नान करना, मार्जन करना, प्रत्येक अंग की शुद्धि रखना आदि। जिससे रोगकारक तत्वों से हम बचे रहें। साथ साथ समाज के प्रत्येक लोगों को भी प्रेरित करें। जिसे योग के षट्कर्मों के माध्यम से शुद्ध और पवित्र रखना।
2. आभ्यंतर शौच: शरीर की आंतरिक स्वच्छता को षट्कर्मों के माध्यम से शुद्ध, पवित्र और स्वस्थ रखें, जैसे कि शरीर के सभी तंत्र(पाचन, श्वसन, उत्सर्जन, तंत्रिका, ग्रन्थि, रक्त परिवहन, अस्थि, प्रजनन आदि आदि) को स्वच्छ अर्थात् स्वस्थ रखना, आदि।
3. मानसिक शौच: मन की स्वच्छता, जैसे कि नकारात्मक विचारों को दूर करना, आदि।
4. वातावरणीय शौच: अपने आसपास के वातावरण को स्वच्छ रखना, जैसे कि अपने घर को स्वच्छ रखते हैं वैसे ही हमें अपने आस पास के पर्यावरण को भी स्वच्छ रखना, आदि।
शौच के लाभ:
1. स्वास्थ्य में सुधार।
2. मन की शांति और स्थिरता।
3. आत्म-विश्वास में वृद्धि।
4. सकारात्मक ऊर्जा का संचार।
शौच के सूत्र:
शौचं स्वास्थ्यमायुर्मेधा (योगसूत्र २.३२)
अर्थ: स्वच्छता से स्वास्थ्य, आयु और मेधा में वृद्धि होती है।
संतोष का अर्थ है संतुष्टि और प्रसन्नता। यह नियम का दूसरा सिद्धांत है, जो हमें अपने जीवन में संतुष्टि और प्रसन्नता की भावना को विकसित करने के लिए प्रेरित करता है।
संतोष के प्रकार:
1. आत्म-संतोष: अपने आप में संतुष्ट होना।
2. जीवन-संतोष: जीवन के हर विभाग में संतुष्ट होना।
3. विचार-संतोष: अपने विचारों में संतुष्ट होना।
4. भावना-संतोष: अपनी भावनाओं में संतुष्ट होना।
संतोष के लाभ:
1. मन की शांति और स्थिरता।
2. आत्म-विश्वास में वृद्धि।
3. प्रसन्नता और संतुष्टि की भावना।
4. जीवन में संतुलन।
संतोष के सूत्र:
संतोष आनंदमयः (योगसूत्र २.३२)
अर्थ: संतुष्टि से आनंद और प्रसन्नता मिलती है।
संतोष के उपाय:
१. अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखना।
२. जीवन के हर विभाग में संतुष्ट होना।
३. नकारात्मक विचारों को दूर करना।
४. आत्म-विश्वास को बढ़ाना।
५. जीवन में संतुलन रखना।
6. तपस का अर्थ है आत्म-नियंत्रण और संयम। यह नियम का तीसरा सिद्धांत है, जो हमें अपने विचारों, शब्दों और कर्मों में संयम और आत्म-नियंत्रण रखने के लिए प्रेरित करता है।
तपस के प्रकार:
1. शरीरिक तपस: शरीर को संयमित रखना।
2. मानसिक तपस: मन को संयमित रखना।
3. वाचिक तपस: शब्दों को संयमित रखना।
4. कर्मिक तपस: कर्मों को संयमित रखना।
तपस के लाभ:
1. आत्म-नियंत्रण में वृद्धि।
2. संयम और अनुशासन।
3. मन की शांति और स्थिरता।
4. आत्म-विश्वास में वृद्धि।
तपस के सूत्र:
तपस्वी सिद्धयः (योगसूत्र २.३२)
अर्थ: तपस से सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।
तपस के उपाय:
१. अपने विचारों, शब्दों और कर्मों में संयम रखना।
२. नकारात्मक विचारों को दूर करना।
३. आत्म-विश्वास को बढ़ाना।
४. जीवन में संतुलन रखना।
५. ध्यान और योग का अभ्यास करना।
स्वाध्याय का अर्थ है आत्म-ज्ञान और अध्ययन। यह नियम का चौथा सिद्धांत है, जो हमें अपने जीवन में आत्म-ज्ञान और ज्ञान की प्राप्ति के लिए प्रेरित करता है।
स्वाध्याय के प्रकार:
1. आत्म-ज्ञान: अपने आप को जानना।
2. ज्ञान-विज्ञान: विभिन्न विषयों का अध्ययन करना।
3. धार्मिक अध्ययन: धार्मिक ग्रंथों और शास्त्रों का अध्ययन करना।
4. स्व-विकास: अपने आप को विकसित करने के लिए अध्ययन करना।
स्वाध्याय के लाभ:
1. आत्म-ज्ञान में वृद्धि।
2. ज्ञान और विज्ञान की प्राप्ति।
3. मन की शांति और स्थिरता।
4. आत्म-विश्वास में वृद्धि।
स्वाध्याय के सूत्र:
स्वाध्यायात्मविद्या (योगसूत्र २.३२)
अर्थ: स्वाध्याय से आत्म-विद्या प्राप्त होती है।
स्वाध्याय के उपाय:
१. सद्ज्ञान वर्धक ग्रन्थ पढ़ना।
२. धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करना।
३. विभिन्न विषयों का अध्ययन करना।
४. ध्यान और योग का अभ्यास करना।
५. अपने आप को विकसित करने के लिए अध्ययन करना।
6. ईश्वर प्राणिधान का अर्थ है ईश्वर या उच्च शक्ति के प्रति समर्पण। यह नियम का पांचवां और अंतिम सिद्धांत है, जो हमें ईश्वर या उच्च शक्ति के प्रति समर्पण और श्रद्धा रखने के लिए प्रेरित करता है।
ईश्वर प्राणिधान के प्रकार:
1. ईश्वर के प्रति समर्पण।
2. उच्च शक्ति के प्रति समर्पण।
3. धार्मिक समर्पण।
4. आध्यात्मिक समर्पण।
ईश्वर प्राणिधान के लाभ:
1. मन की शांति और स्थिरता।
2. आत्म-विश्वास में वृद्धि।
3. जीवन में संतुलन।
4. उच्च शक्ति के साथ जुड़ाव।
ईश्वर प्राणिधान के सूत्र:
ईश्वरप्रणिधानाद्वा (योगसूत्र २.३२)
अर्थ: ईश्वर प्राणिधान से उच्च शक्ति की प्राप्ति होती है।
ईश्वर प्राणिधान के उपाय:
१. ईश्वर या उच्च शक्ति के प्रति समर्पण करना।
२. धार्मिक अनुष्ठानों का पालन करना।
३. ध्यान और योग का अभ्यास करना।
४. आध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन करना।
५. जीवन में संतुलन रखना।
डॉ त्रिभुवन नाथ श्रीवास्तव, पूर्व प्राचार्य, विवेकानंद योग प्राकृतिक चिकित्सा महाविद्यालय एवं चिकित्सालय, बाजोर, सीकर, राजस्थान।