डायरेक्टलिंक_3 प्रत्यक्ष यूआरएल https://www.cpmrevenuegate.com/s9z8i5rpd?key=0fff061e5a7ce1a91ea39fb61ca61812 डायरेक्टलिंक_1 प्रत्यक्ष यूआरएल https://www.cpmrevenuegate.com/vy0q8dnhx?key=096a4d6815ce7ed05c0ac0addf282624 डायरेक्टलिंक_2 प्रत्यक्ष यूआरएल https://www.cpmrevenuegate.com/h00w82fj?key=

शनिवार, 21 सितंबर 2024

प्रतिष्ठा

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✍️🪷भवतः प्रतिष्ठायाः अतीव सम्यक् पालनं कुरुत यतः तस्याः आयुः भवतः अपेक्षया दीर्घः अस्ति ।🪷


🪷अपनी प्रतिष्ठा का बहुत अच्छे से ध्यान रखे क्यूकी इसकी आयु आपकी आयु से अधिक होती है।।🪷

🪷बहुत ही सुंदर और प्रेरक वचन!🙏


🪷यह उक्ति हमें अपनी प्रतिष्ठा और सम्मान के प्रति जागरूक करती है। यह हमें बताती है कि हमारी प्रतिष्ठा की आयु हमारी व्यक्तिगत आयु से अधिक होती है, इसलिए हमें इसका ध्यान रखना चाहिए।


🪷इसका अर्थ यह है कि हमारे द्वारा किए गए कार्यों और निर्णयों का प्रभाव हमारे जीवनकाल से अधिक समय तक रहता है। इसलिए, हमें अपने कार्यों में नैतिकता, सच्चाई, और सम्मान का ध्यान रखना चाहिए।


🪷यह उक्ति हमें निम्नलिखित बातों की याद दिलाती है:


👉1. अपनी प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए सच्चाई और नैतिकता का पालन करें।

👉2. अपने कार्यों में सम्मान और गरिमा का ध्यान रखें।

👉3. अपने निर्णयों का प्रभाव आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ेगा, इसलिए सोच-समझकर निर्णय लें।

👉4. अपनी प्रतिष्ठा को बढ़ाने के लिए हमेशा अच्छे कार्य करें और समाज में सकारात्मक योगदान दें।


👉यह उक्ति हमें अपने जीवन को सकारात्मक दिशा में ले जाने के लिए प्रेरित करती है।🪷🪷🪷✍️🪷🪷🪷

दो व्यक्तित्व



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यह एक यूट्यूब वीडियो का एम्बेड कोड है, जो एक वेबसाइट या ब्लॉग पर वीडियो को दिखाने के लिए उपयोग किया जाता है।


वीडियो की जानकारी:


- वीडियो प्लेटफ़ॉर्म: यूट्यूब

- वीडियो आईडी: Wr4wCddPJE8

- वीडियो का आकार: 320x266 पिक्सल

- वीडियो की सेटिंग्स: फुलस्क्रीन देखने की अनुमति है


यह कोड वीडियो को वेबसाइट या ब्लॉग पर दिखाने के लिए उपयोग किया जा सकता है।


 🪷रामायण में दो ऐसे भी व्यक्तित्व थे... एक विभीषण और एक कैकई ...; विभीषण रावण के राज्य में रहता था ... फिर भी नहीं बिगड़ा ...; कैकई राम के राज्य में रहती थी ... फिर भी नहीं सुधरी .. ; सुधारना और बिगड़ना केवल मनुष्य की सोच और स्वभाव पर निर्भर करता है ...!🪷    

*आप अपना भविष्य नहीं परिवर्तित कर सकते *परन्तु  आप अपना स्वभाव अवश्य परिवर्तित कर सकते हैं।*और निश्चित रूप से आपका स्वभाव आपका भविष्य भी परिवर्तित कर देगी। *संघर्ष प्रकृति का आमंत्रण है,*जो स्वीकार करता है ,वही आगे बढ़ता है ....!!!*

🪷मन में शांति चाहिए तो ... ध्यान केवल उन पर रखो जिसको प्राप्त कर लिया है ... उन पर नहीं जिनको खो दिया है ... !!🪷                                 🪷 शुभ हो।🪷

शुक्रवार, 20 सितंबर 2024

🐦‍⬛🐦‍⬛श्राद्ध पक्ष और पीपल बरगद वृक्ष का सम्बंध

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 🐦‍⬛🐦‍⬛🍁 श्राद्धपक्ष (Shraddh Paksh)में कौओं को भोजन कराने का रहस्य 🍁*


सनातन धर्म जो कि पूर्णतः वैज्ञानिक है ये पूरा विश्व मान चुका है हमारे ऋषि मुनियों ने बहुत शोध किये हैं,,, और अब विश्व उन पर शोध कर रहा है,,,ऋषि मुनियों ने बहुत सी बातें धर्म से इसलिए जोड़ दी जिससे अनन्त काल तक बिना तर्क के वे चलती रहे।


     जैसे कि श्राद्ध में कौओं को भोजन कराना इसके पीछे भी वैज्ञानिक रहस्य है पीपल और बरगद ये 2 वृक्ष ऐसे है प्रकृति में जिनके बीज नही मिलते न इनकी कोई कलम रोप सकता है। कितना भी प्रयास रोपने की  कर लो पर, वह नही लगेगी।



कारण प्रकृति ने यह दोनों उपयोगी वृक्षों को लगाने के लिए विशेष ही व्यवस्था कर रखी है।

यह दोनों वृक्षों के फल कौवे खाते हैं और उनके पेट में ही बीज का संस्कार होता है और तब जाकर बीज उगने योग्य होते हैं। उसके पश्चात कौवे जहां-जहां  अपना मल त्याग (बीट) करते हैं, वहां वहां पर यह दोनों वृक्ष उगते हैं इसलिए कई बार आपने देखा होगा घरों की दीवारों पर भी पीपल उग जाता है,,उसका कारण वही है कि कौए ने उस दीवार पर मल त्याग की होगी जिससे वँहा पौधा निकल आया।


पीपल जगत का एकमात्र ऐसा वृक्ष है जो round-the-clock ऑक्सीजन O2  छोड़ता है और बरगद के औषधि गुण अपरम्पार है।


देखो यदि यह दोनों वृक्षों को उगाना है तो बिना कौवे की सहायता से संभव नहीं है इसलिए कौवे को बचाना पड़ेगा।


 यह होगा कैसे?


मादा कौआ भाद्रपद मास  में अंडा देती है और नवजात बच्चा जन्म लेता है। 


तो इस नयी पीढ़ी के लिए उपयोगी पक्षी को पौष्टिक और भरपूर भोजन मिलना आवश्यक है इसलिए ऋषि मुनियों ने कौवों के नवजात बच्चों के लिए हर छत पर श्राद्ध के रूप मे पौष्टिक भोजन 

की व्यवस्था कर दी।


जिससे कि कौवों की नई पीढ़ी का पालन पोषण हो सके।


इसलिए श्राद्ध करना प्रकृति के रक्षण के लिए नितांत आवश्यक है।


घ्यान रखना जब भी बरगद और पीपल के पेड़ को देखो तो अपने पूर्वज तो स्मरण में आएंगे ही क्योंकि उन्होंने श्राद्ध दिया था इसीलिए यह दोनों उपयोगी पेड़ आज हम देख पा रहे हैं।


हमारे सनातन धर्म की प्रत्येक रीति पूर्णतः वैज्ञानिक है,,इसलिए किसी भी तर्क वाद-विवाद में न पड़के अपनी रीतियों को निभाते रहिए,,इसी में प्रकृति और लोक कल्याण है !

श्राद्ध पक्ष और बरगद-पीपल वृक्ष का गहरा संबंध है:



श्राद्ध पक्ष:



श्राद्ध पक्ष, जिसे पितृ पक्ष भी कहा जाता है, हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण अवधि है। यह अवधि भाद्रपद मास की पूर्णिमा से अश्विन मास की अमावस्या तक चलती है, जो लगभग 16 दिनों की अवधि होती है।



इस अवधि में, लोग अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और तर्पण के लिए पूजा-अर्चना करते हैं। श्राद्ध पक्ष में लोग अपने पूर्वजों को याद करते हैं और उनकी आत्मा को शांति प्रदान करने के लिए तर्पण, पिंड दान, और अन्य अनुष्ठान करते हैं।



बरगद-पीपल वृक्ष का संबंध:



बरगद और पीपल वृक्ष का श्राद्ध पक्ष से गहरा संबंध है। इन वृक्षों को पितृ देवताओं का निवास स्थान माना जाता है। हिंदू धर्म में मान्यता है कि बरगद और पीपल वृक्ष के नीचे पितृ देवता निवास करते हैं।



श्राद्ध पक्ष में, लोग बरगद और पीपल वृक्ष के नीचे पूजा-अर्चना करते हैं और अपने पूर्वजों को तर्पण करते हैं। यह मान्यता है कि बरगद और पीपल वृक्ष के नीचे पूजा करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है।



इसके अलावा, बरगद और पीपल वृक्ष के पत्तों का उपयोग श्राद्ध पक्ष में पूजा-अर्चना के लिए किया जाता है। इन पत्तों को पूजा में उपयोग करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।

बरगद और पीपल दोनों ही पवित्र और उपयोगी वृक्ष हैं, जिनका धार्मिक और औषधीय महत्व है:



*बरगद वृक्ष (Ficus benghalensis)*



उपयोगिता:



1. छाया प्रदान करता है

2. वायु शुद्धीकरण में मदद करता है

3. जल संचयन में सहायक होता है

4. औषधीय गुणों से भरपूर है (कैंसर, मधुमेह, और हृदय रोग में लाभकारी)



धार्मिक महत्व:



1. हिंदू धर्म में बरगद को भगवान विष्णु का निवास स्थान माना जाता है

2. बौद्ध धर्म में बरगद को भगवान बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति का स्थान माना जाता है

3. जैन धर्म में बरगद को भगवान महावीर के निर्वाण स्थान के रूप में पूजा जाता है



*पीपल वृक्ष (Ficus religiosa)*



उपयोगिता:



1. ऑक्सीजन का उत्पादन करता है

2. वायु प्रदूषण को कम करता है

3. जल संचयन में सहायक होता है

4. औषधीय गुणों से भरपूर है (हृदय रोग, मधुमेह, और पाचन संबंधी समस्याओं में लाभकारी)



धार्मिक महत्व:



1. हिंदू धर्म में पीपल को भगवान विष्णु का निवास स्थान माना जाता है

2. बौद्ध धर्म में पीपल को भगवान बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति का स्थान माना जाता है

3. जैन धर्म में पीपल को भगवान महावीर के निर्वाण स्थान के रूप में पूजा जाता है

4. पीपल को सत्य और ज्ञान का प्रतीक माना जाता है



दोनों वृक्षों का महत्व:



1. पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका

2. औषधीय गुणों से भरपूर

3. धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

4. समाज में एकता और सद्भावना का प्रतीक

निष्कर्ष 

 उपरोक्त तथ्य वास्तव में बहुत ही महत्वपूर्ण और रोचक है। श्राद्ध पक्ष में कौओं को भोजन कराने के पीछे का वैज्ञानिक रहस्य हमें हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों की दूरदर्शिता और प्रकृति के प्रति उनकी समझ को दर्शाता है।


पीपल और बरगद वृक्षों के बीजों को कौवे खाते हैं और उनके पेट में ही बीजों का संस्कार होता है, जिससे वे उगने योग्य होते हैं। इसके उपरान्त कौवे जहां-जहां अपना मल त्याग (बीट) करते हैं, वहां-वहां पर ये वृक्ष उगते हैं।


पीपल वृक्ष ऑक्सीजन का एकमात्र स्रोत है जो दिन-रात ऑक्सीजन छोड़ता है, और बरगद वृक्ष के औषधीय गुण भी अद्वितीय हैं। इसलिए, कौवों को बचाना और उनकी नई पीढ़ी को पौष्टिक भोजन प्रदान करना आवश्यक है।


श्राद्ध पक्ष में कौवों को भोजन कराने की परंपरा न केवल प्रकृति के रक्षण के लिए बल्कि हमारे पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता का प्रतीक भी है।


इस महत्व पूर्ण तथ्य से हमें यह समझने में सहायता मिलती है कि हमारा सनातन धर्म पूर्णतः वैज्ञानिक है और इसकी प्रत्येक रीति-रिवाज में प्रकृति और लोक कल्याण का भाव निहित है।

डॉ त्रिभुवन नाथ श्रीवास्तव, पूर्व प्राचार्य, विवेकानंद योग प्राकृतिक चिकित्सा महाविद्यालय एवं चिकित्सालय, बाजोर, सीकर, राजस्थान 

गुरुवार, 19 सितंबर 2024

Water and my Great Earth

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 👉Underground water sources on and in the Earth!👇


✍️ Approximately 22% of the Earth's freshwater is stored underground, making it a vital component of the planet's hydrologic cycle. Here are some key facts about underground water sources:

👉*Types of Underground Water Sources:*👇


1. Aquifers: Porous rock or sediment layers that store and transmit significant amounts of water.

2. Groundwater: Water stored beneath Earth's surface in soil, sediment, and rock formations.

3. Artesian aquifers: Confined aquifers under pressure, causing water to flow naturally to the surface.

👉*Distribution and Extent:*👇

1. The largest underground aquifers are found in:

    - The Ogallala Aquifer (USA)

    - The Nubian Sandstone Aquifer System (Africa)

    - The Guarani Aquifer (South America)

    - The Great Artesian Basin (Australia)

2. Underground water is recharged primarily through precipitation, infiltration, and surface water bodies.

👉*Importance:*

1. Supports agriculture, industry, and urban centers

2. Provides drinking water for millions of people

3. Maintains ecosystems and groundwater-dependent environments

4. Helps regulate Earth's climate

👉*Challenges:*

1. Over-extraction and depletion

2. Contamination from human activities (agriculture, mining, waste disposal)

3. Climate change impacts recharge rates and quality.

Approximately 1.386 billion cubic kilometers (km³) of water exists on Earth, which is about 0.02% of the planet's total mass.

You're interested in knowing about underground water sources on Earth!

👉Approximately 22% of the Earth's freshwater is stored underground in aquifers, which are layers of permeable rock that allow water to flow through them. Here are some key facts about underground water sources:


👉*Types of Underground Water Sources:*👇


1. Aquifers: layers of permeable rock, sand, or gravel that store and transmit water.

2. Confined aquifers: sandwiched between two impermeable layers, pressure forces water into wells.

3. Unconfined aquifers: water table aquifers, where water level rises and falls with precipitation.

4. Artesian aquifers: confined aquifers under pressure, causing water to flow naturally.


👉*Distribution of Underground Water:*👇


1. 59% of groundwater is found in Asia.

2. 19% in North America.

3. 13% in Europe.

4. 6% in Africa.

5. 3% in South America.


👉*Largest Underground Water Reservoirs:*👇


1. Nubian Sandstone Aquifer System (Africa): spans 8 countries.

2. Ogallala Aquifer (USA): covers 1.3 million sq km.

3. Guarani Aquifer (South America): spans 4 countries.

4. Great Artesian Basin (Australia): covers 22% of the continent.


👉*Importance of Underground Water:*👇


1. Drinking water: 30% of global freshwater supply.

2. Irrigation: supports agriculture.

3. Industrial uses: mining, manufacturing.

4. Ecosystem maintenance.


👉*Challenges:*👇


1. Over-extraction.

2. Contamination.

3. Climate change impacts.

👉Here's an overview of underground water sources on Earth:

👉*Volume of Underground Water:*👇

Approximately 22.9 million cubic kilometers (km³) or 1.7% of Earth's total water.

👉*Distribution:*👇

1. Shallow groundwater (0-400 meters depth): 15.3 million km³

2. Deep groundwater (400-1,000 meters depth): 4.2 million km³

3. Very deep groundwater (1,000-3,000 meters depth): 2.4 million km³

4. Fossil groundwater (ancient, isolated aquifers): 1 million km³

👉*Major Underground Aquifers:*👇

1. Ogallala Aquifer (USA): 1.3 million km³

2. Nubian Sandstone Aquifer System (Africa): 150,000 km³

3. Guarani Aquifer (South America): 40,000 km³

4. Great Artesian Basin (Australia): 22,000 km³

5. Arabian Aquifer System (Middle East): 15,000 km³

👉*Recharge Rates:*👇

1. Precipitation: 40-50%

2. Surface water bodies: 20-30%

3. Infiltration: 10-20%

4. Other sources: 10-20%

👉*Importance:*👇

1. Supports agriculture, industry, and urban centers

2. Provides drinking water for millions

3. Maintains ecosystems and groundwater-dependent environments

4. Helps regulate Earth's climate

👉*Challenges:*👇


1. Over-extraction and depletion

2. Contamination from human activities

3. Climate change impacts recharge rates and quality

4. Management and conservation efforts

👉Breakdown of Earth's water distribution:👇

*Oceans, Seas, and Bays*: 96.5% (1.329 billion km³)

*Ice Caps, Glaciers, and Snow*: 1.4% (19,000 km³)

*Groundwater*: 1.7% (22,900 km³)

*Freshwater Lakes, Rivers, and Wetlands*: 0.3% (3,900 km³)

*Atmosphere*: 0.04% (5,600 km³)

*Other sources* (swamps, soil moisture, etc.): 0.01% (140 km³)

✍️Note: These values are approximate and based on various scientific sources.

👉Now, let's dive deeper:👇

*Freshwater availability*: Only about 2.5% of Earth's water is freshwater, and most of it (68.7%) is trapped in ice caps, glaciers, and permanent snow.

*Drinkable water*: A mere 0.77% of Earth's water is readily available for human consumption.

👉*Volume of Underground Water:*👇

Approximately 22.9 million cubic kilometers (km³) or 1.7% of Earth's total water.

👉*Distribution:*👇

1. Shallow groundwater (0-400 meters depth): 15.3 million km³

2. Deep groundwater (400-1,000 meters depth): 4.2 million km³

3. Very deep groundwater (1,000-3,000 meters depth): 2.4 million km³

4. Fossil groundwater (ancient, isolated aquifers): 1 million km³

👉*Major Underground Aquifers:*👇

1. Ogallala Aquifer (USA): 1.3 million km³

2. Nubian Sandstone Aquifer System (Africa): 150,000 km³

3. Guarani Aquifer (South America): 40,000 km³

4. Great Artesian Basin (Australia): 22,000 km³

5. Arabian Aquifer System (Middle East): 15,000 km³

👉*Recharge Rates:*👇

1. Precipitation: 40-50%

2. Surface water bodies: 20-30%

3. Infiltration: 10-20%

4. Other sources: 10-20%

👉*Importance:*👇

1. Supports agriculture, industry, and urban centers

2. Provides drinking water for millions

3. Maintains ecosystems and groundwater-dependent environments

4. Helps regulate Earth's climate

👉*Challenges:*👇

1. Over-extraction and depletion

2. Contamination from human activities

3. Climate change impacts recharge rates and quality

4. Management and conservation efforts.

👉The water cycle and hydrology are crucial for understanding Earth's water system.👇

👉*Water Cycle:*👇

The continuous process by which water is:

1. Evaporated from oceans, lakes, rivers, and soil

2. Condensed into clouds

3. Precipitated as rain, snow, sleet, or hail

4. Runoff or infiltrated into soil

5. Transpired by plants

6. Returned to oceans, lakes, and rivers

👉*Hydrologic Cycle:*👇

The movement of water through:

1. Atmosphere (evaporation, condensation)

2. Surface water (rivers, lakes, oceans)

3. Groundwater (aquifers, infiltration)

4. Soil water (infiltration, percolation)

👉*Key Components:*👇

1. Precipitation (rain, snow, etc.)

2. Runoff (surface flow)

3. Infiltration (soil absorption)

4. Percolation (downward water movement)

5. Transpiration (plant water loss)

6. Evapotranspiration (combined evaporation and transpiration)

👉*Hydrologic Processes:*👇

1. Streamflow (river flow)

2. Groundwater flow

3. Lake and reservoir storage

4. Wetland and floodplain interactions

5. Coastal and oceanic processes

👉*Importance:*👇

1. Supports life on Earth

2. Regulates climate and weather patterns

3. Maintains water quality

4. Influences agriculture, industry, and urban planning

👉*Challenges:*👇

1. Climate change impacts precipitation patterns

2. Water scarcity and drought

3. Water pollution and contamination

4. Human activities alter hydrologic cycles

👉*Water Cycle Diagram:*👇


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                      | Evaporation |

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                      | Condensation |

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                      | Precipitation |

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                      | Runoff |

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                      | Groundwater |

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                      | Transpiration |

                      | Evapotranspiration|

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Thanks for reading and watching,required kind yours support.Data resources from internet and mata plateform.🙏🙏



बुधवार, 18 सितंबर 2024

पैरों हाथों में काला धागा ना पहनें।

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Thinking...
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 ✍️🙏👉सनातन संस्कृति की हिंदू लङकियाँ सतर्क भी रहें और सावधान भी...आजकल लड़कियों में ही नहीं बल्कि 40, 50 साल की प्रौढ़ महिलायें भी ये नौटंकी कर रही हैं...

सम्हल जाओ अन्यथा नई कठिनाई के लिए तैयार रहिएगा...


बहुतों को संभवतः ये पता न हो कि दरगाहो में एक बेड़ी बाँधने और काटने की प्रथा होती है, दरगाह में जाकर अपनी मांग माँगने वाली लड़की के पैर मे काले रंग के धागे से बेड़ी बाँध दी जाती है।

ये बेड़ी कथित मनौती के पूरा होने पर दरगाह मे जाकर खा


दिम से कटवाई जाती है, तब जाकर वो लड़की बेड़ी कटवा कर मुक्त होती है। ये मजारों के खादिमों का नया टंटा या पाखण्ड है, जिसमे अधिकतर हिन्दू लड़कियां दरगाहों पर बेड़ी बँधवा रही हैं, इसका  प्रारम्भ"कलियर_शरीफ नामक मजार" से हुई थी।


यह भोली भाली हिन्दू लड़कियों को अपने माया जाल में उलझाने का टोटका है जो बहुत सीमा तक सफल हो रहा है।

आजकल हर छोटी बडी दरगाह मे यही बाँधने काटने का धंधा चल रहा है।पैर के पास जहां पायल या धागा पहनते है उस स्थान को मंगल ग्रह का निवास माना जाता है और सबसे बड़ी बात यह है कि मंगल ग्रह को काली चीज कभी नहीं भाती, केवल लाल रंग या चांदी की पायल ही प्रभावित करता है।

इसलिए काला धागा पैरों में नही पहनना चाहिए, इससे अशुभ हो सकता है।

मैंने कई लडकियों और स्त्रियों के पैर में ऐसा धागा देखा है पर तब मुझे पता नही था कि ये धागा किसलिए है...???मैंने सोचा कि पहनावा होगा।

यदि आप ऐसा धागा पहने किसी लडकी को देखें तो उसे समझाएं, अन्यथा वो भी अगली "श्रद्धा" बनने के मार्ग पर है और आगे सूटकेस में पैक होगी।

परंतु इसके उपरान्त भी कुछ लोग पैरों में काला धागा बांधने के पीछे अपने अज्ञानता पूर्ण तर्क देते है।

आंख कान खुला रखें सनातनी माता पिता, मेरा काम यहां तक का था, आगे आप जाने और आपकी लाडली या तो आपकी पढ़ी लिखी आधुनिक परिधान में खोई हुई पत्नी....✍️🙏✍️

मंगलवार, 17 सितंबर 2024

यम और नियम क्या है, योग में उपयोगिता

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 यम और नियम योग के दो मूलभूत सिद्धांत हैं जो योगी के जीवन को निर्देशित करने में सहायता करते हैं।


यम:


यम का अर्थ है " ईश्वरीय वाह्य नियमों का पालन" या " वाह्य विश्व का अनुशासन"। यम के पांच सिद्धांत हैं जो योगी और समाज के प्रत्येक व्यक्ति के व्यवहार को निर्देशित करने में सहायता करते हैं:


1. अहिंसा: मनसा वाचा कर्मणा किसी भी जीव को हानि न पहुंचाना और धर्म की रक्षा हेतु सदा तत्पर रहना।

2. सत्य: मनसा वाचा कर्मणा सत्यता और निष्ठा का पालन करना।

3. अस्तेय: मनसा वाचा कर्मणा चोरी न करना और दूसरों की संपत्ति का सम्मान करना।

4. ब्रह्मचर्य: सर्व इन्द्रिय संयम और आत्म-नियंत्रण और ब्रह्म का अनुसंधान करना और पालन करना।

5. अपरिग्रह: मनसा वाचा कर्मणा दूसरों की संपत्ति को न लेना और अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखना।


नियम:


नियम का अर्थ है "नियम" या "आचार"। आंतरिक विश्व का अनुशासन बनाए रखना या आंतरिक नियन्त्रण।नियम के पांच सिद्धांत हैं जो योगी के आचार और व्यवहार को निर्देशित करने में सहायता करते हैं:


1. शौच: आंतरिक और बाह्य शारीरिक और मानसिक स्वच्छता का पालन करना। यह अति विस्तृत शब्द है जिसमें सभी प्रकार के चिकित्सा से जुड़े विषय समाहित है। क्योंकि यदि स्वच्छता बनी रहेगी तो कोई भी रोग नहीं आयेगा।

2. संतोष: संतुष्टि और प्रसन्नता का पालन करना अर्थात् जितना मिल गया है उसे संतोषजनक समझना। कविवर रहीम दास जी कहते हैं कि,

"गोधन गजधन बाजधन और रतनधन खानि।

जब आवै संतोषधन सब धन धूरि समान।।

3. तपस:  अपने शास्त्रों का विधिवत वैज्ञानिक अध्ययन करते हुए, निरन्तर अपनी आत्मोन्नति करते हुए आत्म-नियंत्रण और संयम का पालन करना। साथ साथ समाज के ज्ञान और आध्यात्मिक विज्ञान के विकास में योगदान करना।

4. स्वाध्याय:  स्वयं को जानना या आत्म-ज्ञान और अध्ययन का पालन करना।

5. ईश्वर प्रणिधान: ईश्वर या उच्च शक्ति के प्रति समर्पण और श्रद्धा का पालन करना। जो भी आपने अनुसंधान किया है उसे ईश्वर स्वरूप समाज को निष्कपट भेंट करते जाना।


इन सिद्धांतों का पालन करके, योगी अपने जीवन को अधिक संतुलित, शांतिपूर्ण और अर्थपूर्ण बना सकता है।

यम और नियम के सिद्धांतों को महर्षि पतंजलि ने अपने योगसूत्र में वर्णित किया है। यहाँ कुछ श्लोक दिए गए हैं:


यम:


अहिंसा सत्यमस्तेय ब्रह्मचर्यापरिग्रहाः यमाः (योगसूत्र २.३०)

शाब्दिक अर्थ: अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, और अपरिग्रह ये पांच यम हैं।


नियम:


शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः (योगसूत्र २.३२)

शाब्दिक अर्थ: शौच, संतोष, तपस, स्वाध्याय, और ईश्वरप्रणिधान ये पांच नियम हैं।


इन श्लोकों में यम और नियम के सिद्धांतों को संक्षेप में वर्णित किया गया है। योगसूत्र में महर्षि पतंजलि ने इन सिद्धांतों को विस्तार से समझाया है।

अहिंसा का सूत्र:



अहिंसा परमो धर्मः (महाभारत, अनुशासन पर्व ११७.३७)



अर्थ: अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है, लेकिन यदि समाज पर कोई विपदा आए तो उससे सुरक्षित करने में पीछे नहीं हटना ही अहिंसा परमो धर्म है, ना कि कायरों के समान मुख छिपाकर बैठे रहना।



या 



अहिंसा सर्वभूतानां सुखहेतुरिति मे मति (योगसूत्र २.३०)



अर्थ: सभी जीवों के प्रति अहिंसा करना सुख का कारण है, एवम् रक्षा भी करना।



इन सूत्रों में अहिंसा के महत्व को दर्शाया गया है. यह सूत्र हमें यह स्मरण कराते हैं कि सभी जीवों के प्रति दया और करुणा का भाव रखना चाहिए।



अहिंसा के पांच सिद्धांत हैं:



१. मनसा - विचारों में अहिंसा

२. वाचा - शब्दों में अहिंसा

३. कर्मणा - कर्मों में अहिंसा



इन सिद्धांतों का पालन करके, हम अपने जीवन में अहिंसा को वास्तविक रूप में लागू कर सकते हैं।

सत्य का अर्थ है सच्चाई और निष्ठा। यह यम का दूसरा सिद्धांत है, जो हमें सत्यता और निष्ठा के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है।


सत्य के सूत्र:



सत्यम् ब्रूयात् प्रियम् ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम् (मनुस्मृति ४.१३६)



अर्थ: सत्य बोलना चाहिए, प्रिय बोलना चाहिए, लेकिन सत्य को छुपाकर अप्रिय बात नहीं बोलनी चाहिए।



सत्य के पांच सिद्धांत हैं:



१. वाणी में सत्य - बोलने में सत्यता ।

२. मन में सत्य - विचारों में सत्यता ।

३. कर्म में सत्य - कर्मों में सत्यता। 

४. व्यवहार में सत्य - व्यवहार में सत्यता। 

५. जीवन में सत्य - जीवन के हर संस्कार और विभाग में सत्यता। 



इन सिद्धांतों का पालन करके, हम अपने जीवन में सत्य को वास्तविक रूप में  व्यवहार कर सकते हैं और सत्यता और निष्ठा के मार्ग पर चल सकते हैं।

अस्तेय का अर्थ है चोरी न करना और दूसरों की संपत्ति का सम्मान करना। यह यम का तीसरा सिद्धांत है, जो हमें दूसरों की संपत्ति का सम्मान करने और चोरी न करने के लिए प्रेरित करता है। यहां तक कि किसी के ज्ञान और विचार को अपना कह कर ना छाप देना।


अस्तेय के सूत्र:



अस्तेय प्रतिग्रहस्तैरन्निधेयं (योगसूत्र २.३०)



अर्थ: दूसरों की संपत्ति को अपने पास न रखना चाहिए, और न ही उसे चोरी  या बलात अधिकार करना चाहिए।



अस्तेय के पांच सिद्धांत हैं:



१. दूसरों की संपत्ति का सम्मान करना।

२. चोरी न करना।

३. दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना।

४. अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखना।

५. दूसरों की संपत्ति को संरक्षित करना।



इन सिद्धांतों का पालन करके, हम अपने जीवन में अस्तेय को वास्तविक रूप में व्यवहारिक कर सकते हैं और दूसरों की संपत्ति का सम्मान करने के साथ-साथ अपनी आवश्यकताओं को भी सीमित रख सकते हैं।

अपरिग्रह का अर्थ है दूसरों की संपत्ति को न लेना और अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखना। यह यम का पांचवां सिद्धांत है, जो हमें दूसरों की संपत्ति का सम्मान करने और अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखने के लिए प्रेरित करता है।


अपरिग्रह के सूत्र:



अपरिग्रहस्थैर्येण तद्-वृत्तयः (योगसूत्र २.३०)



अर्थ: दूसरों की संपत्ति को न लेने से और अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखने से हमारी वृत्तियाँ स्थिर होती हैं।



अपरिग्रह के पांच सिद्धांत हैं:



१. दूसरों की संपत्ति को न लेना।

२. अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखना।

३. संचय न करना।

४. दान करना।

५. सादगी से जीवन जीना।



इन सिद्धांतों का पालन करके, हम अपने जीवन में अपरिग्रह को वास्तविक रूप में व्यवहार में ला सकते हैं और दूसरों की संपत्ति का सम्मान करने के साथ-साथ अपनी आवश्यकताओं को भी सीमित रख सकते हैं।

ब्रह्मचर्य का अर्थ है संयम और आत्म-नियंत्रण। यह यम का चौथा सिद्धांत है, जो हमें अपने विचारों, शब्दों और कर्मों में संयम और आत्म-नियंत्रण रखने के लिए प्रेरित करता है। साथ ही ब्रह्म क्या है उसे ज्ञात कर शेष समाज को प्रकाशित करना। ब्रह्म भाव में जीवन यापन करना।


ब्रह्मचर्य के सूत्र:



ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठायाम् वीर्यलाभः (योगसूत्र २.३०)



अर्थ: ब्रह्मचर्य से वीर्य(यहां वीर्य का अर्थ है ब्रह्म बल, ब्रह्म शक्ति, ओजस्विता, तेजस्विता) की प्रतिष्ठा होती है, और इससे आत्म-शक्ति में वृद्धि होती है।



ब्रह्मचर्य के पांच सिद्धांत हैं:



१. संयम और आत्म-नियंत्रण रखना।

२. इंद्रियों के विषयों को नियन्त्रण में रखना।

३. विचारों को शुद्ध और पवित्र रखना।

४. शब्दों को संयमित रखना।

५. जीवन के प्रत्येक कर्मों में संयम रखना।



इन सिद्धांतों का पालन करके, हम अपने जीवन में ब्रह्मचर्य को वास्तविक रूप में व्यवहार में ला सकते हैं और अपने विचारों, शब्दों और कर्मों में संयम और आत्म-नियंत्रण रख सकते हैं।

नियम  जो अष्टांग योग का दूसरा अंग या पाद है,के पांच सिद्धांत हैं जो हमें अपने जीवन में संयम और अनुशासन रखने के लिए प्रेरित करते हैं। यहाँ नियमों के सूत्र सहित वर्णन है:



१. शौच - आंतरिक और बाह्य स्वच्छता और शुद्धता।



शौचं स्वास्थ्यमायुर्मेधा (योगसूत्र २.३२)



अर्थ: स्वच्छता से स्वास्थ्य, आयु और मेधा में वृद्धि होती है।



२. संतोष - संतुष्टि और प्रसन्नता।



संतोष आनंदमयः (योगसूत्र २.३२)



अर्थ: संतुष्टि से आनंद और हार्दिक प्रसन्नता मिलती है।



३. तपस - आत्म-नियंत्रण और संयम।



तपस्वी सिद्धयः (योगसूत्र २.३२)



अर्थ: तपस से सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, अर्थात् समाज को ज्ञान के आलोक से भर देना।



४. स्वाध्याय - आत्म-ज्ञान और अध्ययन।



स्वाध्यायात्मविद्या (योगसूत्र २.३२)



अर्थ: स्वाध्याय से आत्म-ज्ञान और विद्या प्राप्त होती है।



५. ईश्वर प्रणिधान - ईश्वर या उच्च शक्ति के प्रति समर्पण।



ईश्वरप्रणिधानाद्वा (योगसूत्र २.३२)



अर्थ: ईश्वर प्रणिधान से उच्च शक्ति की प्राप्ति होती है और इस शक्ति को विश्व में रहने वाले प्रत्येक प्राणी को उन्नत करते जाना।



इन नियमों का पालन करके, हम अपने जीवन में संयम और अनुशासन रख सकते हैं और आत्म-ज्ञान और सिद्धियों को प्राप्त कर सकते हैं।

शौच का अर्थ है स्वच्छता और शुद्धता। यह नियम का पहला सिद्धांत है, जो हमें अपने शरीर, मन और वातावरण को स्वच्छ और शुद्ध रखने के लिए प्रेरित करता है।


शौच के प्रकार:


1. बाह्य शौच: शरीर की बाहरी स्वच्छता, जैसे कि स्नान करना, मार्जन करना, प्रत्येक अंग की शुद्धि रखना आदि। जिससे रोगकारक तत्वों से हम बचे रहें। साथ साथ समाज के प्रत्येक लोगों को भी प्रेरित करें। जिसे योग के  षट्कर्मों के माध्यम से शुद्ध और पवित्र रखना।

2. आभ्यंतर शौच: शरीर की आंतरिक स्वच्छता को षट्कर्मों के माध्यम से शुद्ध, पवित्र और स्वस्थ रखें, जैसे कि शरीर के सभी तंत्र(पाचन, श्वसन, उत्सर्जन, तंत्रिका, ग्रन्थि, रक्त परिवहन, अस्थि, प्रजनन आदि आदि) को स्वच्छ अर्थात् स्वस्थ रखना, आदि।

3. मानसिक शौच: मन की स्वच्छता, जैसे कि नकारात्मक विचारों को दूर करना, आदि।

4. वातावरणीय शौच: अपने आसपास के वातावरण को स्वच्छ रखना, जैसे कि अपने घर को  स्वच्छ रखते हैं वैसे ही हमें अपने आस पास के पर्यावरण को भी स्वच्छ रखना, आदि।


शौच के लाभ:


1. स्वास्थ्य में सुधार।

2. मन की शांति और स्थिरता।

3. आत्म-विश्वास में वृद्धि।

4. सकारात्मक ऊर्जा का संचार।


शौच के सूत्र:


शौचं स्वास्थ्यमायुर्मेधा (योगसूत्र २.३२)


अर्थ: स्वच्छता से स्वास्थ्य, आयु और मेधा में वृद्धि होती है।

संतोष का अर्थ है संतुष्टि और प्रसन्नता। यह नियम का दूसरा सिद्धांत है, जो हमें अपने जीवन में संतुष्टि और प्रसन्नता की भावना को विकसित करने के लिए प्रेरित करता है।


संतोष के प्रकार:


1. आत्म-संतोष: अपने आप में संतुष्ट होना।

2. जीवन-संतोष: जीवन के हर विभाग में संतुष्ट होना।

3. विचार-संतोष: अपने विचारों में संतुष्ट होना।

4. भावना-संतोष: अपनी भावनाओं में संतुष्ट होना।


संतोष के लाभ:


1. मन की शांति और स्थिरता।

2. आत्म-विश्वास में वृद्धि।

3. प्रसन्नता और संतुष्टि की भावना।

4. जीवन में संतुलन।


संतोष के सूत्र:



संतोष आनंदमयः (योगसूत्र २.३२)



अर्थ: संतुष्टि से आनंद और प्रसन्नता मिलती है।



संतोष के उपाय:



१. अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखना।

२. जीवन के हर विभाग में संतुष्ट होना।

३. नकारात्मक विचारों को दूर करना।

४. आत्म-विश्वास को बढ़ाना।

५. जीवन में संतुलन रखना।

6. तपस का अर्थ है आत्म-नियंत्रण और संयम। यह नियम का तीसरा सिद्धांत है, जो हमें अपने विचारों, शब्दों और कर्मों में संयम और आत्म-नियंत्रण रखने के लिए प्रेरित करता है।


तपस के प्रकार:


1. शरीरिक तपस: शरीर को संयमित रखना।

2. मानसिक तपस: मन को संयमित रखना।

3. वाचिक तपस: शब्दों को संयमित रखना।

4. कर्मिक तपस: कर्मों को संयमित रखना।


तपस के लाभ:


1. आत्म-नियंत्रण में वृद्धि।

2. संयम और अनुशासन।

3. मन की शांति और स्थिरता।

4. आत्म-विश्वास में वृद्धि।


तपस के सूत्र:



तपस्वी सिद्धयः (योगसूत्र २.३२)



अर्थ: तपस से सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।



तपस के उपाय:



१. अपने विचारों, शब्दों और कर्मों में संयम रखना।

२. नकारात्मक विचारों को दूर करना।

३. आत्म-विश्वास को बढ़ाना।

४. जीवन में संतुलन रखना।

५. ध्यान और योग का अभ्यास करना।

स्वाध्याय का अर्थ है आत्म-ज्ञान और अध्ययन। यह नियम का चौथा सिद्धांत है, जो हमें अपने जीवन में आत्म-ज्ञान और ज्ञान की प्राप्ति के लिए प्रेरित करता है।


स्वाध्याय के प्रकार:


1. आत्म-ज्ञान: अपने आप को जानना।

2. ज्ञान-विज्ञान: विभिन्न विषयों का अध्ययन करना।

3. धार्मिक अध्ययन: धार्मिक ग्रंथों और शास्त्रों का अध्ययन करना।

4. स्व-विकास: अपने आप को विकसित करने के लिए अध्ययन करना।


स्वाध्याय के लाभ:


1. आत्म-ज्ञान में वृद्धि।

2. ज्ञान और विज्ञान की प्राप्ति।

3. मन की शांति और स्थिरता।

4. आत्म-विश्वास में वृद्धि।


स्वाध्याय के सूत्र:



स्वाध्यायात्मविद्या (योगसूत्र २.३२)



अर्थ: स्वाध्याय से आत्म-विद्या प्राप्त होती है।



स्वाध्याय के उपाय:



१. सद्ज्ञान वर्धक ग्रन्थ पढ़ना।

२. धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करना।

३. विभिन्न विषयों का अध्ययन करना।

४. ध्यान और योग का अभ्यास करना।

५. अपने आप को विकसित करने के लिए अध्ययन करना।

6. ईश्वर प्राणिधान का अर्थ है ईश्वर या उच्च शक्ति के प्रति समर्पण। यह नियम का पांचवां और अंतिम सिद्धांत है, जो हमें ईश्वर या उच्च शक्ति के प्रति समर्पण और श्रद्धा रखने के लिए प्रेरित करता है।


ईश्वर प्राणिधान के प्रकार:


1. ईश्वर के प्रति समर्पण।

2. उच्च शक्ति के प्रति समर्पण।

3. धार्मिक समर्पण।

4. आध्यात्मिक समर्पण।


ईश्वर प्राणिधान के लाभ:


1. मन की शांति और स्थिरता।

2. आत्म-विश्वास में वृद्धि।

3. जीवन में संतुलन।

4. उच्च शक्ति के साथ जुड़ाव।


ईश्वर प्राणिधान के सूत्र:



ईश्वरप्रणिधानाद्वा (योगसूत्र २.३२)



अर्थ: ईश्वर प्राणिधान से उच्च शक्ति की प्राप्ति होती है।



ईश्वर प्राणिधान के उपाय:



१. ईश्वर या उच्च शक्ति के प्रति समर्पण करना।

२. धार्मिक अनुष्ठानों का पालन करना।

३. ध्यान और योग का अभ्यास करना।

४. आध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन करना।

५. जीवन में संतुलन रखना।

डॉ त्रिभुवन नाथ श्रीवास्तव, पूर्व प्राचार्य, विवेकानंद योग प्राकृतिक चिकित्सा महाविद्यालय एवं चिकित्सालय, बाजोर, सीकर, राजस्थान।

रविवार, 15 सितंबर 2024

केवल वृक्क या किडनी को अच्छा करने के लिए योग एवं अन्य उपाय

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 केवल वृक्क या किडनी को अच्छा करने के लिए योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा और आयुर्वेद में कई उपाय हैं उनमें से कुछ यहां देखें:

1. *योग षटकर्म*:

   वारिसार धौति क्रिया, लघु शंखप्रक्षालन, सहज अग्निसार प्रकार 1, एवं 2, सहज कपालभाति 

2. *योगासन*:

 *वज्रासन*:  वृक्क या किडनी को सशक्त बनाता है और पाचन तंत्र को उन्नत करता है।

 *भुजंगासन*: वृक्क या किडनी को  सक्रिय करता है और रक्त प्रवाह में वृद्धि करता है।

*पवनमुक्तासन*: वृक्क या किडनी को स्वच्छ करता है और विषाक्त पदार्थों को मूत्र मार्ग से बाहर निकालता है।

*सर्वांगासन* इस आसन को करने से शरीर में गुरुत्व प्रभाव के कारण वृक्क क्रिया में शीघ्र सुधार हो उन्नत करता है साथ ही मुद्राओं का भी अभ्यास करें। यदि सर्वांगासन सम्भव न हो तो आयंगर की तकनीकों का प्रयास करें।

*शवासन*: वृक्क या किडनी को विश्रांति देता है और तनाव तथा दबाव को कम करता है।

3.*आयुर्वेद*:

*गोखरू*: वृक्क या किडनी को सशक्त बनाता है और अश्मरी या किडनी स्टोन बनने की प्रक्रिया को रोकता है।

 *पुनर्नवा*: वृक्क या किडनी को स्वच्छ करता है और विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालता है।

 *वरुण*: वृक्क या किडनी को सक्रिय करता है और रक्त प्रवाह तथा नेफ्रोंस को पोषण बढ़ाता है।

*कालमेघ*: वृक्क या किडनी को स्वच्छ करता है और शरीर में उत्पन पदार्थों को बाहर निकालता है।

4.*प्राकृतिक चिकित्सा*

   *वस्ति कर्म से मलाशय को स्वच्छ   रखें। इससे अपान वायु दूषित नहीं हो पायेगी और वृक्क पर पड़ने वाला अनावश्यक दबाव नहीं होगा।

* ठंडा या गर्म ठंडा कटि स्नान ऋतु अनुसार 10 से 20 मिनिट्स का करें, ध्यान रखें पैर गीले न हों। 

* मेहन स्नान 7 से 10 मिनिट्स का करें जो जीवनी शक्ति को बढ़ाता है। 

* *गैस्ट्रो हेपेटिक पैक दिन में दो बार लगाएं।

* गर्म अर्ध इमर्शन बाथ 35 से 40डिग्री सेल्सियस का प्रतिदिन करें। यह वृक्क को आजीवन स्वच्छ रखेगा।

5.*भोजन आहार*:

 *पानी पीना*: वृक्क या किडनी को स्वच्छ रखने के लिए कम से कम ढाई से तीन लिटर तक पर्याप्त पानी पीना चाहिए।

*नींबू पानी और शहद*: वृक्क या किडनी को सक्रिय करता है और विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालता है।

 *पालक और मूली का साग*: वृक्क या किडनी को सुदृढ़ बनाता है और पाचन तंत्र को सुधार कर मलोत्सर्जन ठीक रखता है।

*गाय का दही और फल*: वृक्क या किडनी को सक्रिय बनाए रखता है और विषाक्त पदार्थों को बाहर निकाल कर अम्ल और क्षार में संतुलन बनाए रखता है।

ध्यान रखें कि ये उपाय केवल सुझाव हैं और वृक्क या किडनी की समस्याओं के लिए चिकित्सक का परामर्श लेना आवश्यक है।

डॉ त्रिभुवन नाथ श्रीवास्तव, पूर्व प्राचार्य, विवेकानंद योग प्राकृतिक चिकित्सा महाविद्यालय एवं चिकित्सालय, बाजोर, सीकर, राजस्थान

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