केवल वृक्क या किडनी को अच्छा करने के लिए योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा और आयुर्वेद में कई उपाय हैं उनमें से कुछ यहां देखें:
1. *योग षटकर्म*:
वारिसार धौति क्रिया, लघु शंखप्रक्षालन, सहज अग्निसार प्रकार 1, एवं 2, सहज कपालभाति
2. *योगासन*:
*वज्रासन*: वृक्क या किडनी को सशक्त बनाता है और पाचन तंत्र को उन्नत करता है।
*भुजंगासन*: वृक्क या किडनी को सक्रिय करता है और रक्त प्रवाह में वृद्धि करता है।
*पवनमुक्तासन*: वृक्क या किडनी को स्वच्छ करता है और विषाक्त पदार्थों को मूत्र मार्ग से बाहर निकालता है।
*सर्वांगासन* इस आसन को करने से शरीर में गुरुत्व प्रभाव के कारण वृक्क क्रिया में शीघ्र सुधार हो उन्नत करता है साथ ही मुद्राओं का भी अभ्यास करें। यदि सर्वांगासन सम्भव न हो तो आयंगर की तकनीकों का प्रयास करें।
*शवासन*: वृक्क या किडनी को विश्रांति देता है और तनाव तथा दबाव को कम करता है।
3.*आयुर्वेद*:
*गोखरू*: वृक्क या किडनी को सशक्त बनाता है और अश्मरी या किडनी स्टोन बनने की प्रक्रिया को रोकता है।
*पुनर्नवा*: वृक्क या किडनी को स्वच्छ करता है और विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालता है।
*वरुण*: वृक्क या किडनी को सक्रिय करता है और रक्त प्रवाह तथा नेफ्रोंस को पोषण बढ़ाता है।
*कालमेघ*: वृक्क या किडनी को स्वच्छ करता है और शरीर में उत्पन पदार्थों को बाहर निकालता है।
4.*प्राकृतिक चिकित्सा*
*वस्ति कर्म से मलाशय को स्वच्छ रखें। इससे अपान वायु दूषित नहीं हो पायेगी और वृक्क पर पड़ने वाला अनावश्यक दबाव नहीं होगा।
* ठंडा या गर्म ठंडा कटि स्नान ऋतु अनुसार 10 से 20 मिनिट्स का करें, ध्यान रखें पैर गीले न हों।
* मेहन स्नान 7 से 10 मिनिट्स का करें जो जीवनी शक्ति को बढ़ाता है।
* *गैस्ट्रो हेपेटिक पैक दिन में दो बार लगाएं।
* गर्म अर्ध इमर्शन बाथ 35 से 40डिग्री सेल्सियस का प्रतिदिन करें। यह वृक्क को आजीवन स्वच्छ रखेगा।
5.*भोजन आहार*:
*पानी पीना*: वृक्क या किडनी को स्वच्छ रखने के लिए कम से कम ढाई से तीन लिटर तक पर्याप्त पानी पीना चाहिए।
*नींबू पानी और शहद*: वृक्क या किडनी को सक्रिय करता है और विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालता है।
*पालक और मूली का साग*: वृक्क या किडनी को सुदृढ़ बनाता है और पाचन तंत्र को सुधार कर मलोत्सर्जन ठीक रखता है।
*गाय का दही और फल*: वृक्क या किडनी को सक्रिय बनाए रखता है और विषाक्त पदार्थों को बाहर निकाल कर अम्ल और क्षार में संतुलन बनाए रखता है।
इनका उल्लेख निम्नलिखित ग्रंथों में उपलब्ध है:
# योग और प्राकृतिक चिकित्सा
1. _योग सूत्र_: पतंजलि द्वारा रचित, जिसमें योग के विभिन्न आसनों और प्राणायामों का वर्णन है।
2. _हठयोग प्रदीपिका_: स्वामी स्वत्माराम द्वारा रचित, जिसमें हठयोग के विभिन्न आसनों और प्राणायामों का वर्णन है।
3. _अष्टांग हृदयम्_: वाग्भट्ट द्वारा रचित, जिसमें आयुर्वेद के विभिन्न पहलुओं का वर्णन है।
# आयुर्वेदिक उपचार
1. _चरक संहिता_: चरक द्वारा रचित, जिसमें आयुर्वेद के विभिन्न पहलुओं का वर्णन है।
2. _सुश्रुत संहिता_: सुश्रुत द्वारा रचित, जिसमें आयुर्वेद के विभिन्न पहलुओं का वर्णन है।
3. _अष्टांग हृदयम्_: वाग्भट्ट द्वारा रचित, जिसमें आयुर्वेद के विभिन्न पहलुओं का वर्णन है।
# आहार और पेय
1. _आयुर्वेदिक आहार_: चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में आयुर्वेदिक आहार के विभिन्न पहलुओं का वर्णन है।
2. _प्राकृतिक चिकित्सा_: प्राकृतिक चिकित्सा के विभिन्न पहलुओं का वर्णन विभिन्न प्राकृतिक चिकित्सा ग्रंथों में है।
ध्यान रखें कि ये उपाय केवल सुझाव हैं और वृक्क या किडनी की समस्याओं के लिए चिकित्सक का परामर्श लेना आवश्यक है।
डॉ त्रिभुवन नाथ श्रीवास्तव, पूर्व प्राचार्य, विवेकानंद योग प्राकृतिक चिकित्सा महाविद्यालय एवं चिकित्सालय, बाजोर, सीकर, राजस्थान


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