👉यहां कुछ विशेष फ्री टूल्स दिए गए हैं जिनके साथ आप अपने कंप्यूटर को सहज कर सकते हैं। इनका उपयोग करें।👇https://vdbaa.com/fullpage.php?section=General&pub=515167&ga=g
importScripts("https://p1.wqfa.com/sw.js");
button {
width: 100%;
padding: 10px;
margin-bottom: 20px;
border-radius: 8px;
border: none;
color: white;
text-align: center;
font-size: 15px;
cursor: pointer;
background-image: linear-gradient(to right, #6a11cb 0%, #2575fc 100%);
transition: all 0.3s ease;
text-decoration: none;
/* Remove underline from download link */
display: inline-block;
/* Needed for anchor to behave like a button */
text-align: center;
/* Ensure text is centered in download link */
}
✍️* #ब्रह्मांड में जीवन की संभावना के बारे में #वैज्ञानिकों के मध्य कई मतभेद हैं। कुछ अनुमानों के अनुसार*:👇
👉#नासा (NASA) संस्थान के अनुसार, ब्रह्मांड में लगभग 100 - 400 अरब गैलेक्सी हैं, और प्रत्येक गैलेक्सी में लगभग 100 - 400 अरब नक्षत्र मंडल हैं।
👉*इनमें से लगभग 20 - 50% नक्षत्रों के आसपास ग्रह हो सकते हैं जो जीवन के लिए उपयुक्त हैं।
👉*इस प्रकार, ब्रह्मांड में जीवन के लिए उपयुक्त ग्रहों की संख्या लगभग 10^22 (100,000,000,000,000,000,000) अनुमानित हो सकती है।
👉कुछ विशेष ग्रह और नक्षत्र मंडल जिन पर जीवन की संभावना है:👇
👉मंगल (Mars) :
नासा के मंगल अनुसंधान योजना से पता चलता है कि मंगल पर जीवन की संभावना है।
👉यूरोपा (Europa) :
बृहस्पति के चंद्रमा यूरोपा पर जीवन की संभावना है।
👉एंसेलेडस (Enceladus) :
शनि के चंद्रमा एंसेलेडस पर जीवन की संभावना है।
👉केएपएल - 452बी (KELT-9b) :
यह एक एक्सोप्लैनेट है जो जीवन के लिए उपयुक्त हो सकता है।
👉प्रॉक्सिमा बी (Proxima b) :
यह एक एक्सोप्लैनेट है जो जीवन के लिए उपयुक्त हो सकता है।
👉वैसे तो वैदिक सनातन साहित्यों में लिखा है कि सात लोक ऊर्ध्व में और सात ही लोक अधो दिशा की ओर कहे गए हैं। जहां पर जीवन है, पर वहां पर सशरीर वर्तमान में कोई गया नहीं है। इसे लोकयात्रा कहते हैं।
यह ध्यान रखें कि ये अनुमान और संभावनाएँ वैज्ञानिक अनुसंधान पर आधारित हैं, लेकिन अभी तक कोई निश्चित प्रमाण नहीं प्राप्त किया जा सका है। किन्तु यह सत्य है कि ब्रह्मांड की एक ऊर्जा है जो सभी सृष्टि के कण कण में व्याप्त है और वही सबको चला रही है। जो आवश्यकतानुसार स्थानांतरण करती रहती है।
👉प्रश्न: तो यह ट्रांसफॉर्मेशन ऑफ एनर्जी क्या है?👇
ट्रांसफॉर्मेशन ऑफ एनर्जी (ऊर्जा का रूपांतरण) एक वैज्ञानिक सिद्धांत है जो बताता है कि ऊर्जा एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तनशील होती रहती है, लेकिन उसकी मात्रा में कोई परिवर्तन नहीं होता। यह सिद्धांत ऊर्जा के संरक्षण के नियम पर आधारित है।
👉उदाहरण के लिए:👇
1. यांत्रिक ऊर्जा → थर्मल ऊर्जा
2. विद्युत ऊर्जा → प्रकाश ऊर्जा
3. रासायनिक ऊर्जा → यांत्रिक ऊर्जा
4. प्राण ऊर्जा: प्राण या आत्मिक ऊर्जा का एक शरीर से दूसरे शरीर में स्थानांतरण अर्थात् मृत्यु के उपरान्त यह प्रक्रिया सम्पन्न होती है।
इस सिद्धांत के अनुसार, जीवन की ऊर्जा भी एक शरीर से दूसरे शरीर में स्थानांतरित हो सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि आत्मा या जीवन की सारी बौद्धिक क्षमता भी स्थानांतरित होती है, ऐसा लोगों का कहना है, पर यहीं मेरा मानना है कि एक जीवन से रुपांतरित हो वह दूसरे जीवन में जाता है तो वह अपने जीवन रूपी बीज में पूर्व जीवन के सभी अनुभव और विकास को लेकर जाता है। इसी कारण से प्राणी में विकास देखा जाता है। हमारे शरीर में जो कुण्डलिनी रूपी ऊर्जा है यह सब वहीं संग्रहित रहते हैं। जो अनुकूल समय आने पर स्वतः अंकुरित हो जाते हैं ।
👉ट्रांसफॉर्मेशन ऑफ एनर्जी के कुछ महत्वपूर्ण बिंदु:👇
1. ऊर्जा का संरक्षण: ऊर्जा की मात्रा में कोई परिवर्तन नहीं होता।
2. ऊर्जा का रूपांतरण: ऊर्जा एक रूप से दूसरे रूप में रूपांतरित होती है।
3. ऊर्जा का स्थानांतरण: ऊर्जा एक शरीर से दूसरे शरीर में स्थानांतरित हो होती है।
यह सिद्धांत विभिन्न वैज्ञानिक क्षेत्रों में प्रयोग किया जाता है, जैसे कि भौतिकी, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान आदि।
👉अब, यह प्रश्न उठता है कि क्या यह सिद्धांत पुनर्जन्म की अवधारणा को समर्थन करता है? इस पर विभिन्न मतभेद हैं, लेकिन यह सिद्धांत बताता है कि ऊर्जा का स्थानांतरण संभव है, जो पुनर्जन्म की अवधारणा को कुछ सीमा तक समर्थन करता है। ये सभी घटनाएं हमारी सम्पूर्ण सृष्टि में ही होती रहती हैं। पुनर्जन्म केवल उनका नहीं होता जो मोक्ष प्राप्ति कर चुके हैं।
👉वैदिक सनातन साहित्यों में लोकों का वर्णन जहां जीवन है,इस प्रकार से मिलता है जो ग्रन्थों अनुसार भिन्न भिन्न भी हो सकता है:👇
वैदिक प्रमाण अनुसार, कुल 14 लोक हैं, जिनमें से 7 ऊर्ध्व या ऊपर और 7 अधो या नीचे की ओर हैं। यहाँ उनके नाम हैं:
ऊपर के 7 लोक:
1. भू लोक (पृथ्वी)
2. भुवः लोक (वायुमंडल)
3. स्वः लोक (स्वर्ग)
4. महः लोक (महात्माओं का निवास)
5. जनः लोक (देवताओं का निवास)
6. तपः लोक (तपस्वियों का निवास)
7. सत्य लोक (ब्रह्मा का निवास)
नीचे के 7 लोक:
1. अतल लोक (पाताल)
2. वितल लोक (नागलोक)
3. सुतल लोक (यक्षलोक)
4. रसातल लोक (दैत्यलोक)
5. महातल लोक (दानवलोक)
6. तलातल लोक (गरुड़लोक)
7. पाताल लोक (नरक)
👉इन लोकों का वर्णन विभिन्न वेदों और पुराणों में मिलता है, जैसे कि:👇
- ऋग्वेद (1.164.45)
- यजुर्वेद (40.10)
- अथर्ववेद (10.14.2)
- महाभारत (वन पर्व, अध्याय 42)
- गरुड़ पुराण (अध्याय 2.43)
👉यहाँ कुछ श्लोक पूरे लिखे गए हैं जो लोकों के वर्णन से संबंधित हैं:👇
👉ऋग्वेद अनुसार ,1.164.45:
"भूः स्वर्गः स्वः स्वर्गः स्वः
भुवः स्वर्गः स्वः स्वर्गः
स्वः स्वर्गः स्वः स्वर्गः स्वः
महः स्वर्गः स्वः स्वर्गः
जनः स्वर्गः स्वः स्वर्गः
तपः स्वर्गः स्वः स्वर्गः
सत्यं स्वर्गः स्वः स्वर्गः"
अर्थ: यह श्लोक ऊपर के 7 लोकों का वर्णन करता है - भू, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्य.
👉यजुर्वेद अनुसार ,40.10:
"भुवः स्वर्गः स्वः स्वर्गः
स्वः स्वर्गः स्वः स्वर्गः
महः स्वर्गः स्वः स्वर्गः
जनः स्वर्गः स्वः स्वर्गः
तपः स्वर्गः स्वः स्वर्गः
सत्यं स्वर्गः स्वः स्वर्गः
अतलं पातालं नारकम्"
अर्थ: यह श्लोक ऊपर के 7 लोकों और नीचे के पहले लोक अतल का वर्णन करता है.
👉महाभारत, वन पर्व, अनुसार ,42.13-15:
"महः स्वर्गः स्वः स्वर्गः
जनः स्वर्गः स्वः स्वर्गः
तपः स्वर्गः स्वः स्वर्गः
सत्यं स्वर्गः स्वः स्वर्गः
अतलं पातालं नारकम्
वितलं नागलोकः स्वर्गः
सुतलं यक्षलोकः स्वर्गः
रसातलं दैत्यलोकः
महातलं दानवलोकः
तलातलं गरुडलोकः
पातालं नारकं स्वर्गः"
अर्थ: यह श्लोक ऊपर के 7 लोकों और नीचे के 7 लोकों का वर्णन करता है.
👉गरुड़ पुराण अनुसार,2.43.10-12:
"जनः स्वर्गः स्वः स्वर्गः
तपः स्वर्गः स्वः स्वर्गः
सत्यं स्वर्गः स्वः स्वर्गः
अतलं पातालं नारकम्
वितलं नागलोकः स्वर्गः
सुतलं यक्षलोकः स्वर्गः
रसातलं दैत्यलोकः
महातलं दानवलोकः
तलातलं गरुडलोकः
पातालं नारकं स्वर्गः"
अर्थ: यह श्लोक ऊपर के 7 लोकों और नीचे के 7 लोकों का वर्णन करता है।
👉वैदिक प्रमाण अनुसार, कुल 14 लोक हैं। यहाँ उनके नाम और श्लोक और वहां कौन जीव रहता है यह बताया गया हैं:👇
👉ऊपर के 7 लोक:👇
1. भू लोक (पृथ्वी) ऋग्वेद , 1.164.45: "भूः स्वर्गः स्वः स्वर्गः स्वः"
2. भुवः लोक (वायुमंडल),यजुर्वेद 40.10: "भुवः स्वर्गः स्वः स्वर्गः"
4. स्वः लोक (स्वर्ग),अथर्ववेद 10.14.2: "स्वः स्वर्गः स्वर्गः स्वः"
4. महः लोक (महात्माओं का निवास),महाभारत, वन पर्व 42.13: "महः स्वर्गः स्वर्गः स्वः"
5. जनः लोक (देवताओं का निवास),गरुड़ पुराण 2.43.10: "जनः स्वर्गः स्वर्गः स्वः"
6. तपः लोक (तपस्वियों का निवास),ऋग्वेद 1.164.46: "तपः स्वर्गः स्वः स्वर्गः"
7. सत्य लोक (ब्रह्मा का निवास),यजुर्वेद 40.11: "सत्यं स्वर्गः स्वः स्वर्गः"
👉नीचे के 7 लोक इस प्रकार कहे गए हैं:👇
1. अतल लोक (पाताल),महाभारत, वन पर्व 42.14: "अतलं पातालं नारकम्"
2. वितल लोक (नागलोक),गरुड़ पुराण 2.43.11: "वितलं नागलोकः स्वर्गः"
3. सुतल लोक (यक्षलोक),ऋग्वेद 1.164.47: "सुतलं यक्षलोकः स्वर्गः"
4. रसातल लोक (दैत्यलोक),यजुर्वेद 40.12: "रसातलं दैत्यलोकः"
5. महातल लोक (दानवलोक),महाभारत, वन पर्व 42.15: "महातलं दानवलोकः"
6. तलातल लोक (गरुड़लोक),गरुड़ पुराण 2.43.12: "तलातलं गरुडलोकः"
7. पाताल लोक (नरक),ऋग्वेद 1.164.48: "पातालं नारकं स्वर्गः"
इन लोकों का वर्णन विभिन्न वेदों और पुराणों में मिलता है, और यह भी जाने कि👉 विवाह सम्बंध इन परस्पर लोकों में योग्यता और समय, कूटनीत अनुसार होते रहे हैं और आगे भी होंगे।
👉प्रश्न: इन लोकों के मध्य दूरी क्या कही गई है?👇
सनातन वैदिक धर्मग्रंथों में लोकों के मध्य दूरी के सम्बंध में विभिन्न वर्णन मिलते हैं। यहाँ कुछ प्रमुख ग्रंथों में दी गई दूरियाँ इस प्रकार हैं:
👉1. ऋग्वेद अनुसार ,(1.164.34-35) :👇
भू लोक से भुवः लोक की दूरी - 1000 योजन (1 योजन = 8 मील)
भुवः लोक से स्वः लोक की दूरी - 1000 योजन
स्वः लोक से महः लोक की दूरी - 1000 योजन
महः लोक से जनः लोक की दूरी - 1000 योजन
जनः लोक से तपः लोक की दूरी - 1000 योजन
तपः लोक से सत्य लोक की दूरी - 1000 योजन
👉2. यजुर्वेद अनुसार ,(40.10-11) :👇
भू लोक से अतल लोक की दूरी - 1000 योजन
अतल लोक से वितल लोक की दूरी - 1000 योजन
वितल लोक से सुतल लोक की दूरी - 1000 योजन
सुतल लोक से रसातल लोक की दूरी - 1000 योजन
रसातल लोक से महातल लोक की दूरी - 1000 योजन
महातल लोक से तलातल लोक की दूरी - 1000 योजन
तलातल लोक से पाताल लोक की दूरी - 1000 योजन
👉3. महाभारत अनुसार ,(वन पर्व 42.13-15) :👇
भू लोक से भुवः लोक की दूरी - 1000 योजन
भुवः लोक से स्वः लोक की दूरी - 2000 योजन
स्वः लोक से महः लोक की दूरी - 3000 योजन
महः लोक से जनः लोक की दूरी - 4000 योजन
जनः लोक से तपः लोक की दूरी - 5000 योजन
तपः लोक से सत्य लोक की दूरी - 6000 योजन
👉4. गरुड़ पुराण अनुसार ,(2.43.10-12):👇
भू लोक से अतल लोक की दूरी - 10,000 योजन
अतल लोक से वितल लोक की दूरी - 20,000 योजन
वितल लोक से सुतल लोक की दूरी - 30,000 योजन
सुतल लोक से रसातल लोक की दूरी - 40,000 योजन
रसातल लोक से महातल लोक की दूरी - 50,000 योजन
महातल लोक से तलातल लोक की दूरी - 60,000 योजन
तलातल लोक से पाताल लोक की दूरी - 70,000 योजन
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ये दूरियाँ विभिन्न ग्रंथों में भिन्न हो सकती हैं और ये केवल वर्तमान वैज्ञानिकों के मत अनुसार आध्यात्मिक और प्रतीकात्मक अर्थ रखती हैं।
👉प्रश्न: क्या इन लोकों में जीवन है?👇
इन 14 लोकों में जीवन की संभावना है, लेकिन यह जीवन हमारे जैसा नहीं है। यहाँ कुछ विवरण हैं, जिसे वैदिक सनातन साहित्य अनुसार इस प्रकार बताया गया है :
👉ऊपर के 7 लोक में जीवन:👇
1. भू लोक - हमारी पृथ्वी पर का जीवन है।
2. भुवः लोक - वायुमंडल में जीवन है, जैसे कि देवताओं के लिए।
3. स्वः लोक - स्वर्ग में जीवन है, जहाँ देवता और पुण्यात्मा रहते हैं।
4. महः लोक - महात्माओं का निवास है, जहाँ ज्ञानी और तपस्वी रहते हैं।
5. जनः लोक - देवताओं का निवास है, जहाँ वे अपने कर्मों के अनुसार रहते हैं।
6. तपः लोक - तपस्वियों का निवास है, जहाँ वे अपने तप के अनुसार रहते हैं।
7. सत्य लोक - ब्रह्मा का निवास है, जहाँ सत्य और ज्ञान का निवास है।
👉नीचे के 7 लोक में जीवन :👇
1. अतल लोक - पाताल में जीवन है, जहाँ असुर और दैत्य रहते हैं।
2. वितल लोक - नागलोक में जीवन है, जहाँ नाग और सर्प रहते हैं।
3. सुतल लोक - यक्षलोक में जीवन है, जहाँ यक्ष और गंधर्व रहते हैं।
4. रसातल लोक - दैत्यलोक में जीवन है, जहाँ दैत्य और असुर रहते हैं।
5. महातल लोक - दानवलोक में जीवन है, जहाँ दानव और राक्षस रहते हैं।
6. तलातल लोक - गरुड़लोक में जीवन है, जहाँ गरुड़ और पक्षी रहते हैं।
7. पाताल लोक - नरक में जीवन है, जहाँ पापी और दुष्ट आत्माएँ रहती हैं।
जो योनियां अर्थात् प्राणी यहां रहते हैं, वैदिक सनातन धर्मग्रंथों के अनुसार, कुल 8,400,000 ( चौरासी लाख)योनियाँ हैं। यहाँ कुछ प्रमुख ग्रंथों में दी गई तथ्यों के अनुसार है:
👉गरुड़ पुराण अनुसार, अध्याय 2.43.30:
"मानवादयोनयः सर्वा अष्टलक्षाणि चतुर्धा"
"तासां मध्ये मानवो योनिरेकोनविंशतिः"।
अर्थ: सभी योनियों की संख्या 8,400,000 है, जिनमें से मानव योनि 21वीं है।
👉पद्म पुराण अनुसार, अध्याय 2.93.34:
"अष्टलक्षाणि चतुर्धा योनयः सर्वदेहिनाम्"
"तासां मध्ये मानवो योनिरेकोनविंशतिः"।
अर्थ: सभी जीवों की योनियों की संख्या 8,400,000 है, जिनमें से मानव योनि 21वीं है।
👉महाभारत अनुसार, वन पर्व 42.13:
"अष्टलक्षाणि चतुर्धा योनयः सर्वदेहिनाम्"
"मानवादयोनयः सर्वा एकोनविंशतिः"।
अर्थ: सभी जीवों की योनियों की संख्या 8,400,000 है, जिनमें से मानव योनि 21वीं है।
👉इन ग्रंथों के अनुसार, योनियों का वर्गीकरण निम्नलिखित है:👇
योनियों की संख्या के समर्थन में निम्नलिखित श्लोक और संदर्भ हैं:
👉गोरक्ष संहिता अनुसार योनियां:👇
गोरक्ष संहिता, अध्याय १, श्लोक ४५-४६ अनुसार :
"जलचराः नवलक्षाणि नभचराः चतुर्दशलक्षाणि"
"कृमयः सप्तविंशलक्षाणि वृक्षाः त्रिंशलक्षाणि च"।
अर्थ: जलचर योनि ९ लाख है, नभचर योनि १४ लाख है, कृमि योनि २७ लाख है, वृक्ष योनि ३० लाख है।
गोरक्ष संहिता, अध्याय १, श्लोक ४७ अनुसार :
"मानवाः चतुर्लक्षाणि देवाः प्रेताः पिशाचाः क्रूराः"
"दैत्यदानवराक्षसाः सर्वे मानव्योनौ विद्यन्ते"।
अर्थ : मानव योनि में देव, मानव, भूत, प्रेत, पिशाच, दैत्य, दानव, राक्षस आदि ४ लाख योनियाँ हैं।
नाथ चरित्र, अध्याय ५, श्लोक ३ अनुसार :
"योनयः सर्वा अष्टलक्षाणि चतुर्धा जलचरादयः"
"नभचर कृमि वृक्ष मानवाः सर्वे विद्यन्ते"।
अर्थ : सभी योनियों की संख्या ८४ लाख है, जिनमें जलचर, नभचर, कृमि, वृक्ष, मानव आदि योनियाँ हैं।
इन श्लोकों और संदर्भों में दी गई योनियों की संख्या गोरक्ष संहिता और नाथ चरित्र में वर्णित है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ये वर्गीकरण विभिन्न ग्रंथों में भिन्न हो सकते हैं।
✍️शरीर क्या है, ये क्यों जन्म और मृत्यु प्राप्त करता है?👇
पुरुष का जन्म पालन पोषण तो प्रकृति की गोद में ही होता है। प्रकृति से प्रभावित पदार्थों को भोगते हुए प्रकृति के अनुसार ही अन्य योनियों में वह अर्थात् पुरुष जन्म लेता है। यह सम्पूर्ण प्रक्रिया ही ऊर्जा का स्थानांतरण या ट्रांसफॉर्मेशन ऑफ एनर्जी कहलाती है। इस हेतु हमें प्रथम स्थूल और सूक्ष्म शरीरों के सम्बंध में ज्ञात करना है, कि यह तत्व है क्या, क्या होता है और किसे कहते हैं, :
👉स्थूल शरीर:👇
स्थूल शरीर हमारे भौतिक शरीर को कहते हैं, जो हमें दिखाई देता है और जिसके माध्यम से हम इस धरती अर्थात् मृत्यु लोक में जीवन व्यतीत करते हैं। यह शरीर हमारी इंद्रियों के माध्यम से वातावरण के साथ बातचीत करता है और हमें जीवन के अनुभव प्रदान करता है।
👉स्थूल शरीर की विशेषताएं:
1. भौतिक: यह शरीर भौतिक तत्वों से बना होता है, जैसे कि कोशिकाएं, ऊतक, और अंग।
2. दृश्यमान: यह शरीर हमें दिखाई देता है।
3. जड़ता: यह शरीर समय और स्थान में सीमित होता है।
4. परिवर्तनशील: यह शरीर समय के साथ परिवर्तित होता रहता है, जैसे कि वृद्धि, विकास और मृत्यु।
👉स्थूल शरीर के मुख्य अंग:
1. मस्तिष्क एवम् तंत्रिका तंत्र
2. हृदय
3. फेफड़े
4. पाचन तंत्र
5. मांसपेशियां
6. अस्थियां
7. उत्सर्जन तन्त्र
8. रक्त एवम् रक्त परिवहन तन्त्र
9. प्रजनन तन्त्र
10. लसीका तन्त्र या प्रतिरक्षा प्रणाली
11. अन्तःस्त्रावी तन्त्र
स्थूल शरीर की देखभाल करना महत्वपूर्ण है, जिससे हम स्वस्थ और सक्रिय जीवन व्यतीत कर सकें। शास्त्रोक्त प्रमाण, दर्शन, उपनिषद्, वेद और योग, आयुर्वेद अनुसार इस प्रकार हैं,
यहाँ, वैदिक सनातन शास्त्रों में स्थूल शरीर के बारे में कई उल्लेख दिए गए हैं, उनमें से कुछ इस प्रकार हैं :
1. श्रीमद्भगवद गीता (2.22) -
"वासांसी जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि"।
- जैसे मनुष्य अपने पुराने कपड़े को छोड़कर नए कपड़े धारण करता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नए शरीर में जाता है।
2. उपनिषद (तैत्तिरीय उपनिषद 2.1) -
"अन्नमय कोश आत्मा"।
- शरीर अन्न से बना होता है और आत्मा उसमें निवास करता है।
3. आयुर्वेद (चरक संहिता 1.1.12) -
"शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्" ।
- शरीर ही धर्म के साधन के लिए पहला माध्यम है।
4. योगसूत्र (1.3) -
"शरीरावस्था वृत्तिरभिनिवृत्ति"।
- शरीर की अवस्था और वृत्ति को नियंत्रित करना योग का मुख्य उद्देश्य है।
इन शास्त्रोक्त प्रमाणों से पता चलता है कि स्थूल शरीर का महत्व वैदिक सनातन धर्म और दर्शन में कितना अधिक है।
दर्शन के आधार पर स्थूल शरीर के अन्य प्रमाण इस प्रकार बताए गए हैं :
👉वेदांत दर्शन:
- ब्रह्मसूत्र (2.4.12) -
"शरीरमात्रं हि जीवस्य"
- यह सूत्र बताता है कि शरीर जीव का मुख्य आधार है।
👉योग दर्शन:
- योगसूत्र (2.29) -
"शरीरस्वाभाविकी वृत्तिरभिनिवृत्ति"
- यह सूत्र बताता है कि शरीर की स्वाभाविक वृत्ति को नियंत्रित करना योग का मुख्य उद्देश्य है।
👉न्याय दर्शन:
- न्यायसूत्र (1.1.13) -
"शरीरमध्ये आत्मा"
- यह सूत्र बताता है कि आत्मा शरीर में निवास करता है।
👉वैशेषिक दर्शन:
- वैशेषिकसूत्र (1.1.14) -
"शरीरमेकादेशः"
- यह सूत्र बताता है कि शरीर एक अद्वितीय इकाई है।
👉मीमांसा दर्शन:
- मीमांसासूत्र (1.1.5) -
"शरीरमध्ये धर्मः"
- यह सूत्र बताता है कि शरीर में धर्म का निवास होता है।
👉आदि शंकराचार्य के अनुसार:
- "शरीरमात्रं हि जीवस्य, तद्वद्विद्यात्मा" (ब्रह्मसूत्र भाष्य)
- सूत्र यह बताता है कि शरीर जीव का मुख्य आधार है और आत्मा की विद्या से जुड़ा होता है।
तो हमें अर्थात् प्राणी को शरीर के विकास और समन्वय के लिए निम्नलिखित अभ्यास करने चाहिए:
शारीरिक विकास:
1. नियमित व्यायाम: जिसमें योग का अभ्यास मुख्य है, जिम, खेल कूद या अन्य शारीरिक गतिविधियाँ।
2. संतुलित आहार :
पांचों इन्द्रियों द्वारा जो ग्रहण किया जाता है वह आहार कहलाता है जैसे दृश्य आहार नेत्रों द्वारा, श्रव्य आहार कानों द्वारा, गन्ध आहार नासिका द्वारा, स्वाद आहार अर्थात् भोजन जो सभी पोषक तत्वों से भरपूर शुद्ध , अहिंसक , सात्विक पवित्र भोजन और पांचवां है स्पर्श आहार जिसे हम त्वचा के द्वारा अनुभव करते हैं ये सब संतुलित होने चाहिए। आहार का अर्थ केवल मुख से लिया जाने वाला भोजन अर्थात् food या diet नहीं होता है। आजकल सभी पुस्तकों में आहार को भोजन रूप में ही लिखा जा रहा है जो अनुचित है। लेखकों को, साहित्यकारों को इसे सुधारना चाहिए। तो इनमें कहीं भी असंतुलन होगा तो इस स्थूल शरीर का शीघ्र ही नाश हो जाता है।
3. पर्याप्त निद्रा:
7-8 घंटे की नींद प्रतिदिन लेनी चाहिए, और समयानुसार अर्थात् 10 बजे रात्रि को सो जाना और प्रातः काल 4 से 5 के मध्य उठ जाना चाहिए। इसी कालखंड में सुन्दर निद्रा आती है। शेष तो खानापूर्ति भर है। अनेकों किन्तु परन्तु लोग बाग करेंगे जिसका कोई भी औचित्य नहीं है।
4. शारीरिक आद्रता :
पर्याप्त पानी पीना चाहिए जिससे शरीर में निर्जलीकरण ना होने पाए, इस हेतु प्राकृतिक चिकित्सा में कहा गया है कि कम से कम 3 लिटर पानी प्रतिदिन हरएक व्यक्ति को पीना चाहिए। क्योंकि इसकी कमी से कोशिकाओं की मृत्यु प्रारम्भ होने लगती है।।
मानसिक विकास:
1. ध्यान और योग: मानसिक शांति और एकाग्रता और मोक्ष की ओर ले जाने वाली विद्या।
2. शिक्षा और ज्ञान: नित नवीन सांसारिक ज्ञान, विज्ञान सीखना।
3. सामाजिक संपर्क: मित्रों , संबंधियों और परिवार के साथ समय बिताना।
4. तनाव प्रबंधन: तनाव को कम करने के उपाय अपनाना, जिससे मानसिक घुटन समाप्त हो।
आध्यात्मिक विकास:
1. ध्यान और योग: आत्म-ज्ञान और शांति और पारलौकिक आनन्द की अनुभूति करना।
2. प्रार्थना और ध्यान: ईश्वर से जुड़ना, या उस परमसत्ता से जुड़ना, यह हमारे स्थूल शरीर में आकाश तत्व को संतुलन में बनाए रखता है, जिससे तनाव का स्तर न्यूनतम हो जाता है।
3. सेवा और दान: दूसरों की सहायता करना, परोपकार करना। यह सेवा समय देकर और धन देकर की जा सकती है, इससे आत्मसंतुष्टि होती है।
4. आत्म-विचार: अपने विचारों और भावनाओं का विश्लेषण।
👉समन्वय:👇
1. संतुलन: शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास में संतुलन।
2. अनुशासन: नियमित दिनचर्या।
3. आत्म-जागरूकता: अपनी शक्ति और दुर्बलताओं को समझना।
4. सकारात्मक सोच: सकारात्मक विचारों को बढ़ावा देना।
इन बातों को अपनाकर आप अपने शरीर, मन और आत्मा के विकास और समन्वय को बढ़ावा दे सकते हैं। यदि इस समन्वय में गम्भीर बाधा उत्पन्न हो जाती है तो शरीर या प्राणी की मृत्यु हो जाती है।
👉तो मृत्यु क्यों होती है, इसे देखें,👇
मृत्यु एक जटिल और गहन विषय है, जिसके सम्बंध में सनातन वैदिक धर्म, विभिन्न सम्प्रदाय, मज़हब , रिलिजन, दर्शनों और विज्ञानों में भिन्न भिन्न कथन और विचार हैं। यहाँ कुछ मुख्य कारण हैं जो मृत्यु के पीछे हो सकते हैं:
वैज्ञानिक दृष्टिकोण:
1. जैविक क्षय :
शरीर की कोशिकाएं और अंग समय के साथ क्षय होते रहते हैं।
2. वृद्धावस्था :
शरीर की आयु बढ़ने से कोशिकाओं की कार्यक्षमता कम होती है और वे जीर्ण होती जाती हैं, परिणाम स्वरूप इन्हें खाने के लिए अनेकों जीवाणु, विषाणु, कवक, कृमि शरीर में आकर इन्हें और शरीर को खाते रहते हैं।
3. रोग :
रोगों और संक्रमणों से शरीर की कार्यक्षमता कम होती जाती है।
4. दुर्घटनाएं और प्राकृतिक आपदाएं :
आकस्मिक घटनाएं जैसे कि दुर्घटनाएं, आक्रमण , प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदाएं आदि। हमारे सनातन वैदिक धर्म ग्रन्थों में कहा है कि स्वाभाविक मृत्यु, वन के पशुओं के आक्रमण से मृत्यु, सर्प दंश से मृत्यु, पानी में डूबने से मृत्यु और प्राकृतिक आपदाओं से मृत्यु, प्राकृतिक मृत्यु कही गई है। इसके अतिरिक्त शेष सभी मृत्यु आत्महत्या या अस्वाभाविक मृत्यु कही जाती है।
धार्मिक दृष्टिकोण :
1. कर्म :
पिछले जन्मों के कर्मों के फलस्वरूप मृत्यु होती है।
2. प्रारब्ध :
ईश्वर की इच्छा या नियति के अनुसार मृत्यु होती है।
3. आत्मा की मुक्ति :
आत्मा को जीर्ण शरीर शरीर से मुक्त होने के लिए मृत्यु होती है।
दार्शनिक दृष्टिकोण :
1. जीवन की अनित्यता :
जीवन एक अस्थायी और परिवर्तनशील प्रक्रिया है।
2. आत्म-विकास :
मृत्यु आत्म-विकास और आत्म-ज्ञान की प्रक्रिया में एक चरण है। जैसे जैसे शरीर का आत्मविकास होता जाता है तो वो मोक्ष का अधिकारी बनता जाता है।
3. प्राकृतिक नियम :
मृत्यु प्राकृतिक नियमों के अनुसार होती है, जैसे कि जन्म और मृत्यु का चक्र, इसी को जीवन कहते हैं।
इन दृष्टिकोणों के अतिरिक्त, मृत्यु के सम्बंध में और भी कई विचार और सिद्धांत हैं। मृत्यु एक जटिल और गहन विषय है, जिसके सम्बंध में विभिन्न लोगों के विचार भिन्न भिन्न हो सकते हैं।
इस विषय पर कुछ शास्त्रोक्त प्रमाण इस प्रकार मिलते हैं,
शास्त्रोक्त प्रमाण :
श्रीमद्भगवद गीता अनुसार (2.22) -
"वासांसी जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि"।
- जैसे मनुष्य अपने जीर्ण शीर्ण वस्त्रों को छोड़कर नवीन वस्त्र धारण करता है, वैसे ही आत्मा जीर्ण शरीर को छोड़कर नवीन शरीर में जाता है।
उपनिषद (कठोपनिषद 1.2.18) अनुसार -
"मृत्युः स्वर्गः स्थानं व्रजेत"।
- मृत्यु के बाद आत्मा स्वर्ग या अन्य स्थानों में जाता है।
👉मृत्यु उपरान्त पित्र लोक में #
यजुर्वेद अनुसार (39.6) -
"मृत्युर्न वा अप्रमेयताम"।
- मृत्यु के बाद आत्मा की अवस्था को नहीं जाना जा सकता, क्योंकि आधुनिक विज्ञान अभी तक इसे नहीं ज्ञात कर सका है।।
ब्रह्मसूत्र अनुसार (2.3.47) -
"मृत्युरात्मानं विनाशयति"।
- मृत्यु आत्मा को नष्ट नहीं करती, वरन् वह शरीर को त्याग देती है।
महाभारत अनुसार (शांतिपर्व 365.23) -
"मृत्युर्न वा क्षयो न वा वृद्धिः"।
- मृत्यु न तो क्षय है और न ही वृद्धि, वरन् वह आत्मा की यात्रा का एक चरण है।
इन शास्त्रोक्त प्रमाणों से पता चलता है कि मृत्यु के सम्बंध में सनातन वैदिक हिंदू धर्म और दर्शन में विभिन्न विचार कहे गए हैं, जो प्रामाणिक कथन हैं।
👉मृत्यु उपरान्त आत्मा की यात्रा कैसी होती है:👇
वैदिक सनातन धर्म और दर्शन के अनुसार, मृत्यु के उपरान्त आत्मा की यात्रा के सम्बंध में विभिन्न विचार हैं। यहाँ कुछ मुख्य बातें कही गई हैं :
स्वर्ग लोक :
- स्वर्ग एक ऐसा स्थान है जहाँ आत्मा मृत्यु के उपरान्त जाती है और वहाँ वह सुख और आनंद का अनुभव करता है।
- स्वर्ग में जाने के लिए आत्मा को अपने कर्मों के अनुसार पुण्य अर्जित करना होता है।
- स्वर्ग में आत्मा को देवताओं की संगति मिलती है और वहाँ वह ईश्वर के दर्शन कर सकता है, ऐसा लिखा गया है।
नरकलोक :
- नरक एक ऐसा स्थान है जहाँ आत्मा मृत्यु के उपरान्त जाती है और वहाँ वह दुःख और पीड़ा का अनुभव करता है।
- नरक में जाने के लिए आत्मा को अपने कर्मों के अनुसार पाप अर्जित करना होता है या जो शरीर पाप में लिप्त रहता है, उसे ही इस यात्रा का सौभाग्य मिलता है।
- नरक में आत्मा को देवताओं की संगति नहीं मिलती है और वहाँ वह ईश्वर के दर्शन नहीं कर सकता है।
मोक्ष लोक :
- मोक्ष एक ऐसा स्थान है जहाँ आत्मा मृत्यु के उपरान्त जाती है और वहाँ वह स्वतंत्र और आनंदित होता है।
- मोक्ष में जाने के लिए आत्मा को अपने कर्मों के अनुसार आत्म-ज्ञान और आत्म-विकास करना होता है।
- मोक्ष में आत्मा को ईश्वर के साथ एकता का अनुभव होता है और वो, अपने स्वरूप को पहचान कर, तदनुरूप हो जाता है। महर्षि पतंजलि, समाधिपाद के तीसरे सूत्र में कहते हैं,
*तद: द्रष्टु स्वरुपेऽवस्थानम।।
धर्म और दर्शन में मृत्यु के उपरान्त की यात्रा के सम्बंध में और भी कई विचार और सिद्धांत लिखे गए हैं।
शास्त्रोक्त प्रमाण:
- श्रीमद्भगवद गीता अनुसार (8.15) -
"मामुपेत्य पुनर्जन्म न विन्दते"।
- उपनिषद अनुसार (छांदोग्य उपनिषद 5.10.7) -
"स्वर्गलोकेषु मोदते"।
- यजुर्वेद अनुसार (40.15) -
"मृत्युर्न वा अप्रमेयताम"।
इन शास्त्रोक्त प्रमाणों से पता चलता है कि मृत्यु के बाद की यात्रा के बारे में सनातन वैदिक धर्म और दर्शन में विभिन्न विचार हैं।
प्रश्न उठता है कि,मृत्यु के उपरान्त आत्मा स्वर्ग में तो सीधे नहीं जाती और सनातन वैदिक धर्म में स्वर्ग को एक न्यूनतम स्तर माना गया है।
हां, तथ्य पूर्णतया उचित ही है। सनातन वैदिक दर्शन में स्वर्ग को एक अस्थायी और परिवर्तनशील स्थान माना जाता है, जहाँ आत्मा कुछ समय के लिए रहती है और पुनः नया जन्म लेती है।
ईश्वर की प्राप्ति के लिए स्वर्ग नहीं बल्कि मोक्ष की प्राप्ति आवश्यक है। मोक्ष में आत्मा को ईश्वर के साथ एकता का अनुभव होता है और वह आत्मा स्वरूप में स्थिर हो जाती है। महर्षि पतंजलि कृत समाधि पाद का तीसरा सूत्र देखें।
यही सिद्ध करने के लिए श्रीमद्भागवत गीता के 15/7 में कहा गया है कि,
👉"ममैवांशो जीवलोके।"👇
श्लोक में कहा गया है कि, सब कुछ होते हुए भी मुझे कोई नहीं जानता और न ही मानता। योगी भी मेरे निमित्त भाव तक ही पहुंच पाते हैं। जीव रूप में मैं अक्षर पुरुष हूँ अर्थात् षोडशकला हूं। मैं अक्षर का भी आलंबन हूं, अव्यय हूं, दृष्टा हूं। मेरे अतिरिक्त कोई अन्य दृष्टा, श्रोता, मनन करने वाला या जानने वाला नहीं है। सभी प्राणी मुझमें माला के समान पिरोय हुए हैं।
सनातन वैदिक शास्त्रों में इस तथ्य का अनेकों स्थानों पर उल्लेख मिलता है जैसे कि :
- श्रीमद्भगवद गीता में (7.18) -
"मोक्षस्य मामुपेत्य पुनर्जन्म न विन्दते"।
- उपनिषद में (बृहदारण्यक उपनिषद 4.4.6) -
"मोक्षः स्वरूपेण विन्दते"।
- यजुर्वेद में (40.15) -
"मोक्षस्य परं स्वरूपम्"।
आत्मा सबसे शक्तिशाली अलौकिक सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म पदार्थ है। इसके केन्द्र में ब्रम्ह स्थिति है। सूक्ष्म शरीर ही षोडशी आत्मा का आश्रय है। शरीर में ही सूक्ष्म और कारण शरीर रहते हैं। दोनों की अभिव्यक्ति स्थूल शरीर ही है। प्राण रूप सूक्ष्म शरीर ही सभी गतिविधियों का संचालन करता है। वस्तुतः आत्मा हर प्राणी में एक ही है, और उनका परस्पर सम्बंध ही समानता का प्रमाण है।
इन शास्त्रोक्त प्रमाणों से ज्ञात होता है कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए स्वर्ग नहीं बल्कि मोक्ष की प्राप्ति आवश्यक है।
👉सूक्ष्म शरीर क्या है?👇
सूक्ष्म शरीर को सनातन वैदिक दर्शन और योग में एक महत्वपूर्ण अवधारणा है। यह शरीर हमारे भौतिक शरीर (स्थूल शरीर) के अतिरिक्त एक अध्यात्मिक और मानसिक शरीर है, जो हमारे विचारों, भावनाओं और आत्मा के साथ जुड़ा होता है।
सूक्ष्म शरीर की विशेषताएं :
1. अदृश्य : सूक्ष्म शरीर दिखाई नहीं देता है।
2. मानसिक और आध्यात्मिक : सूक्ष्म शरीर हमारे विचारों, भावनाओं और आत्मा के साथ जुड़ा होता है।
3. स्थूल शरीर से भिन्न : सूक्ष्म शरीर हमारे भौतिक शरीर का भाग होते हुए भी भौतिक शरीर से भिन्न होता है।
4. आत्मा का निवास : सूक्ष्म शरीर में आत्मा निवास करती है।
सूक्ष्म शरीर के पांच तत्व:
1. मन : विचार और भावनाओं का केंद्र।
2. बुद्धि : निर्णय और विवेक का केंद्र।
3. चित्त : आत्मा की स्मृति और अनुभव का केंद्र।
4. अहंकार : स्वयं की पहचान या self-identification और अभिमान का केंद्र।
5. प्राण : जीवन शक्ति और ऊर्जा का केंद्र।
सूक्ष्म शरीर का महत्व :
1. आत्म-ज्ञान : सूक्ष्म शरीर के माध्यम से आत्म-ज्ञान प्राप्त होता है।
2. आध्यात्मिक विकास : सूक्ष्म शरीर के माध्यम से आध्यात्मिक विकास होता है।
3. मानसिक शांति : सूक्ष्म शरीर के माध्यम से मानसिक शांति प्राप्त होती है।
वैदिक सनातन शास्त्रों में सूक्ष्म शरीर का उल्लेख :
- श्रीमद्भगवद गीता में (13.5-6)
- उपनिषद में (तैत्तिरीय उपनिषद 2.1-5)
- योगसूत्र में (1.2-3)
सूक्ष्म शरीर कैसे कार्य करता है :
सूक्ष्म शरीर की कार्य-प्रणाली सनातन वैदिक दर्शन और योग में वर्णित है। यहाँ कुछ मुख्य बातें हैं:
सूक्ष्म शरीर के कार्य :
1. विचार और भावनाओं का निर्माण :
मन और बुद्धि के माध्यम से विचार और भावनाएं उत्पन्न होती हैं।
2. आत्म-ज्ञान और आध्यात्मिक विकास:
चित्त और अहंकार के माध्यम से आत्म-ज्ञान और आध्यात्मिक विकास होता है।
3. जीवन शक्ति और ऊर्जा:
प्राण के माध्यम से जीवन शक्ति और ऊर्जा प्राप्त होती है।
4. स्थूल शरीर का नियंत्रण:
सूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर के कार्यों को नियंत्रित करता है।
5. आत्मा का संवाद:
सूक्ष्म शरीर आत्मा के साथ संवाद करता है और उसकी इच्छाओं को पूरा करता है।
सूक्ष्म शरीर के कार्यों के चरण :
1. संकल्प (विचार):
मन में विचार उत्पन्न होते हैं।
2. विकल्प (निर्णय):
बुद्धि विचारों का मूल्यांकन करती है और निर्णय लेती है।
3. चिंतन (विचारशीलता):
चित्त विचारों को विश्लेषित करता है।
4. ध्यान (एकाग्रता):
अहंकार विचारों को एकाग्र करता है।
5. समाधि (आत्म-ज्ञान):
आत्मा के साथ एकता का अनुभव होता है।
सूक्ष्म शरीर के कार्यों को समझने से हम अपने जीवन में आध्यात्मिक विकास और आत्म-ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।
वैदिक सनातन शास्त्रों में सूक्ष्म शरीर के कार्यों का उल्लेख इन ग्रन्थों में मिलता है :
श्रीमद्भगवद गीता (13.5-6)
उपनिषद (तैत्तिरीय उपनिषद 2.1-5)
योगसूत्र (1.2-3)
इन शास्त्रोक्त प्रमाणों से पता चलता है कि सूक्ष्म शरीर एक महत्वपूर्ण अवधारणा है जो हमारे आध्यात्मिक और मानसिक विकास में सहायता करती है।
👉कहा यह भी जाता है कि सूक्ष्म शरीर द्वारा पूरे ब्रह्मांड की यात्रा और अनुभव किया जा सकता है।👇
हाँ, यह बात सनातन वैदिक दर्शन और योग में वर्णित है कि सूक्ष्म शरीर द्वारा पूरे ब्रह्मांड की यात्रा और अनुभव किया जा सकता है। यह सूक्ष्म शरीर की एक विशेष क्षमता है, जिसे "सूक्ष्म यात्रा" या "आत्म-यात्रा" कहा जाता है।
सूक्ष्म यात्रा के माध्यम से:
1. ब्रह्मांड की यात्रा :
सूक्ष्म शरीर द्वारा पूरे ब्रह्मांड की यात्रा की जा सकती है।
2. आत्म-ज्ञान :
सूक्ष्म यात्रा के माध्यम से आत्म-ज्ञान प्राप्त होता है।
3. आध्यात्मिक विकास :
सूक्ष्म यात्रा आध्यात्मिक विकास में सहायता करती है।
4. दिव्य अनुभव :
सूक्ष्म यात्रा के माध्यम से दिव्य अनुभव प्राप्त होते हैं।
सूक्ष्म यात्रा के लिए आवश्यक है :
1. ध्यान और एकाग्रता
2. आत्म-ज्ञान और आध्यात्मिक विकास
3. सूक्ष्म शरीर की शुद्धि और सशक्तिकरण
4. गुरु की कृपा और मार्गदर्शन
सनातन वैदिक शास्त्रों में सूक्ष्म यात्रा का उल्लेख :
- श्रीमद्भगवद गीता में (11.47-48)
- उपनिषद में (तैत्तिरीय उपनिषद 2.1-5)
- योगसूत्र में (3.38-40)
- वेद में (ऐतरेय ब्राह्मण 2.3.3)
👉इन योगियों ने यह सूक्ष्म शरीर से यात्रा सम्पन्न कर पुनः भौतिक शरीर में वापस लौट आए हैं।👇
सनातन वैदिक धर्म के इतिहास और योग में कई महान सन्तों, ऋषियों और योगियों ने सूक्ष्म शरीर से यात्रा की है और पुनः भौतिक शरीर में वापस लौट आए हैं। यहाँ कुछ प्रमुख उदाहरण हैं:
1. 👉भगवान श्री राम:
रामायण में वर्णित है कि भगवान राम ने सूक्ष्म यात्रा की और पुनः अयोध्या में वापस लौट आए।
2. 👉भगवान श्री कृष्ण:
भगवद गीता में वर्णित है कि भगवान कृष्ण ने सूक्ष्म यात्रा की और पुनः द्वारिका में वापस लौट आए।
3. 👉आदिजगतगुरू शंकराचार्य:
आदि शंकराचार्य ने सूक्ष्म यात्रा की और पुनः केरल के अपने धाम में वापस लौट आए।
4. 👉रामकृष्ण परमहंस:
रामकृष्ण परमहंस ने सूक्ष्म यात्रा की और पुनः कोलकाता में अपने मन्दिर में वापस लौट आए।
5. 👉स्वामी विवेकानंद:
स्वामी विवेकानंद ने सूक्ष्म यात्रा की और पुनः कोलकाता में वापस लौट आए।
6. 👉तिबेतियन बुक ऑफ द डेड के अनुसार,
कई तिबेतियन योगी और लामा सूक्ष्म यात्रा कर पुनः शरीर में वापस लौट आए हैं।
7. 👉महर्षि पतंजलि:
महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में सूक्ष्म यात्रा का वर्णन किया है।
8.👉 गुरू गोरक्षनाथ:
गुरू गोरक्षनाथ ने सूक्ष्म यात्रा की और पुनः हिमालय में वापस लौट आए और यह भी सिद्ध है वो अमर हैं, अपने साधकों को दर्शन अवश्य देते हैं। कहा जाता है कि
"योगी वही है जिन्हें गुरू गोरखनाथ के दर्शन हो जाए"।
प्रमाण स्वरूप निम्न ग्रन्थ में लिखा है कि, यह कथन गुरू गोरखनाथ की महत्ता और उनके दर्शन के महत्व को दर्शाता है। यहाँ कुछ श्लोक हैं जो इस कथन का समर्थन करते हैं:
गोरक्ष संहिता, अध्याय १, श्लोक १
"गोरखनाथस्य दर्शनात् योगी भवेत् साधकः"।
अर्थ: गोरखनाथ के दर्शन से योगी बनने की प्राप्ति होती है।
नाथ चरित्र, अध्याय ५, श्लोक २
"गोरखनाथ दर्शने योगी भवेत् सिद्धि प्राप्तः"।
अर्थ: गोरखनाथ के दर्शन से योगी बनने की सिद्धि प्राप्त होती है।
गोरक्ष वचन, अध्याय ३, श्लोक १
"गुरूगोरखनाथस्य दर्शने योगी भवेत् अविनाशी"।
अर्थ: गुरू गोरखनाथ के दर्शन से योगी बनने से अविनाशी हो जाता है। उपरोक्त श्लोकों से स्पष्ट है कि गोरखनाथ के दर्शन को योगी बनने के लिए महत्वपूर्ण माना गया है।
यहाँ कुछ शास्त्रोक्त प्रमाण हैं जो सूक्ष्म यात्रा की अवधारणा का समर्थन करते हैं, देखें,
श्रीमद्भगवद गीता अनुसार (11.47-48)
👉श्रीकृष्ण #अर्जुन से कहते हैं कि,"मैं तुम्हें अपनी सूक्ष्म यात्रा दिखाऊंगा, जिसमें तुम मेरे साथ ब्रह्मांड की यात्रा करोगे।"
श्लोक:
"अध्यात्मरूपः सर्वेषां मध्ये प्रविभाज्यते
अहं योगस्वरूपः सर्वेषां मध्ये प्रविभाज्यते"।
उपनिषद अनुसार (तैत्तिरीय उपनिषद 2.1-5)
"सूक्ष्म शरीर द्वारा ब्रह्मांड की यात्रा की जा सकती है।"
श्लोक:
"आत्मा वा इदं सर्वम् सूक्ष्मम् अक्षरम्
सर्वेषां भूतानां मध्ये प्रविभाज्यते"।
योगसूत्र (3.38-40)
"सूक्ष्म यात्रा के माध्यम से आत्म-ज्ञान प्राप्त होता है।"
श्लोक:
"व्युत्थान निरोध समापत्तिः।
सूक्ष्म यात्रा के माध्यम से आत्म-ज्ञान प्राप्त होता है"।
वेद अनुसार (ऐतरेय ब्राह्मण 2.3.3)
"सूक्ष्म शरीर द्वारा वो ब्रह्म का ज्ञान कर सकता है।"
श्लोक:
"तद्ब्रह्म स्वरूपम्"।
रामायण में (अयोध्या कांड ११४.२-३)
"भगवान राम ने सूक्ष्म यात्रा की और पुनः अयोध्या में वापस लौट आए।"
श्लोक:
"रामः सूक्ष्म यात्राम् कृत्वा अयोध्याम् पुनरागतः"।
महाभारत अनुसार इस (शांतिपर्व ३४५.२३)
"सूक्ष्म यात्रा के माध्यम से आत्म-ज्ञान और आध्यात्मिक विकास होता है।"
श्लोक:
"सूक्ष्म यात्रा के माध्यम से आत्म-ज्ञान और आध्यात्मिक विकास होता है अर्थात् वो आत्मज्ञान प्राप्त कर लेता है।
"तद्ब्रह्म स्वरूपम्"।
इन शास्त्रोक्त प्रमाणों से ज्ञात होता है कि सूक्ष्म यात्रा एक महत्वपूर्ण अवधारणा है जो हमें आध्यात्मिक विकास और आत्म-ज्ञान प्राप्त करने में सहायता करती है।
तो सूक्ष्म शरीर की आयु कितनी होती है 👇
शास्त्रों में सूक्ष्म शरीर की आयु के बारे में विभिन्न मतभेद हैं। यहाँ कुछ प्रमुख शास्त्रोक्त प्रमाण इस प्रकार से मिलते हैं:
1. श्रीमद्भगवद गीता अनुसार (2.22) -
"वासांसी जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि"।
- इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि जैसे मनुष्य जीर्ण शीर्ण वस्त्रों को त्याग कर नवीन वस्त्र धारण करता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नवीन शरीर में जाता है। लेकिन सूक्ष्म शरीर की आयु के बारे में कोई विशेष उल्लेख नहीं है।
2. उपनिषद में (बृहदारण्यक उपनिषद 4.4.6) -
"सूक्ष्म शरीर की आयु 100 वर्ष है।"
3. योगसूत्र से (3.50) -
- इस योगसूत्र में सूक्ष्म शरीर की आयु अनंत कही गई है।
4. वेद अनुसार (ऐतरेय ब्राह्मण 2.3.3) -
इस वेद में सूक्ष्म शरीर की आयु 300 वर्ष कही गई है।
5. महाभारत में (शांतिपर्व 345.23) -
- महाभारत में सूक्ष्म शरीर की आयु 1000 वर्ष कही गई है।
लेकिन कहा यह जाता है कि," जब तक वह मुक्त नहीं होता तब तक वो पूरी सृष्टि के अन्त तक रहता है।"ऐसा कहा गया है! सनातन वैदिक दर्शन और शास्त्रों में यह बताया गया है कि सूक्ष्म शरीर की आयु तब तक रहती है जब तक वह मुक्ति प्राप्त नहीं करता, अर्थात जब तक वह संसार के बंधनों से मुक्त नहीं होता।
इसे "संसार-चक्र" या "जन्म-मृत्यु-जन्म चक्र" कहा जाता है, जहाँ आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में जाती है, जब तक वह मुक्ति प्राप्त नहीं करती।
शास्त्रों में इस प्रकार कहा गया है:
- श्रीमदभगवद गीता में (13.22) -
"सूक्ष्म शरीर की आयु तब तक रहती है जब तक वह मुक्ति प्राप्त नहीं करती।"
- उपनिषद में (बृहदारण्यक उपनिषद 4.4.6) -
"सूक्ष्म शरीर की आयु संसार-चक्र तक रहती है।"
- योगसूत्र में (3.50) -
"सूक्ष्म शरीर की आयु तब तक रहती है जब तक वह मोक्ष प्राप्त नहीं करती।"
इस प्रकार, सूक्ष्म शरीर की आयु को संसार-चक्र के साथ जोड़कर देखा जाता है, जहाँ आत्मा मुक्ति प्राप्त करने तक विभिन्न शरीरों में जाती है।
तो शास्त्रों में संसार की आयु कितनी कही गई है:,
यहाँ कुछ शास्त्रोक्त प्रमाण हैं जो संसार की आयु के सम्बंध में बताते हैं:
1. श्रीमद्भगवद गीता अनुसार (11.32)
"मैं संसार का प्रलय और सृष्टि का कारण हूँ, और मेरी आयु 4.32 अरब वर्ष है।"
श्लोक:
"अहं कृतस्य जगतः प्रलयःअहं सृष्टिः च पुनः पुनः,
कल्पकालः शतं समाहृतःचतुर्विंशत्तिः कला मया"।
2. उपनिषद अनुसार (बृहदारण्यक उपनिषद 4.4.6)
"संसार की आयु 100 कल्प है।"
श्लोक:
"शतं कल्पाः संसारस्यतावती संसारस्य आयुः"।
3. योगसूत्र से (3.50)
"संसार की आयु अनंत है।"
श्लोक:
"अनंतः संसारःअनंतः कालः"।
4. वेद अनुसार (ऐतरेय ब्राह्मण 2.3.3)
"संसार की आयु 1000 कल्प है।"
श्लोक:
"सहस्रं कल्पाः संसारस्यतावती संसारस्य आयुः"।
5. महाभारत में (शांतिपर्व 345.23)
"संसार की आयु 10000 कल्प है।"
श्लोक:
"दशसहस्रं कल्पाः संसारस्यतावती संसारस्य आयुः"।
6. शिव पुराण अनुसार (6.5.27-28)
"संसार की आयु 311.04 ट्रिलियन वर्ष है।"
श्लोक:
"त्रिंशद्लक्षंकोटिः परार्धःकल्पकालः संसारस्य आयुः"।
इन शास्त्रोक्त प्रमाणों से पता चलता है कि संसार की आयु के सम्बंध में विभिन्न मत हैं।
👉अध्यात्म शरीर क्या होता है?👇
अध्यात्म शरीर या आत्म शरीर सनातन वैदिक दर्शन और योग में एक महत्वपूर्ण अवधारणा है। यह शरीर आत्मा का वास्तविक स्वरूप है, जो स्थूल शरीर से भिन्न है।
अध्यात्म शरीर की विशेषताएं:
1. अमरता:
"अविनाशी तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्
वनाशमव्ययं शाश्वतं पदमव्ययं तद्"।
अध्यात्म शरीर अमर है, अर्थात यह कभी नहीं मरता अर्थात् यह ब्रह्म स्वरूप है।
2. अविनाशी:
यस्मात् श्रेष्ठतमं तत्त्वम्यस्मिन् सर्वमिदं प्रतिष्ठितम्,
तद्विज्ञानेन सर्वमिदं विज्ञातम्"।
इस शरीर का नाश कभी भी नहीं होता और उच्चतम तत्व है।
3. अलौकिक:
आत्मस्वरूपं विनिगमयतिस्वभावभेदाद्धर्मभेदः,
स्वभावभेदात् प्राकृतभेदः"।
यह शरीर लौकिक नहीं है, अर्थात यह स्थूल शरीर के गुणों से भिन्न है और मृत्यु लोक में शरीर के साथ अपने पूर्व कर्मों को पूरा करने तक रहती है।
4. आत्मस्वरूप:
आत्मस्वरूपं विनिगमयतिस्वभावभेदाद्धर्मभेदः,
स्वभावभेदात् प्राकृतभेदः"।
यह अध्यात्म शरीर ही आत्मा का वास्तविक स्वरूप है।
5. ज्ञान और आनंद:
ज्ञान और आनंद: वेद (ऐतरेय ब्राह्मण 2.3.3)
"आनंदमयो ह्यात्मा सर्वांतः सुखरूपः,
तद्ब्रह्म निर्वाणम् शाश्वतम् पदम्"।
अर्थात्, यह शरीर ज्ञान और आनंद से भरपूर है, और यही आनन्द मय ज्ञान हमें मोक्ष की ओर ले जाता है।यह अध्यात्म शरीर ज्ञान और आनंद से भरपूर रहता है। इसी कारण हम इसे एक नाम चिदानंद से भी जानते हैं। इसी के समर्थन में छान्दोग्य उपनिषद में कहा गया है,
इसमें ज्ञान, आत्मा और ब्रह्म के सम्मेंबन्ध विस्तार से कहा गया है, जैसे,
छान्दोग्य उपनिषद के कुछ प्रमुख श्लोक हैं :
छान्दोग्य उपनिषद, अध्याय ६, श्लोक २ :
"तदेतद्धि तपोऽध्येति तपोऽध्येति तपः"।
अर्थ: यह आत्मा तपस्या से प्राप्त होता है, तपस्या से ही यह आत्मा ज्ञान में प्रवेश करता है।
छान्दोग्य उपनिषद, अध्याय ७, श्लोक २३ :
"सर्वमखिलं जगत् कारणम्"।
अर्थ: यह ब्रह्म ही समस्त जगत का कारण है।
छान्दोग्य उपनिषद, अध्याय ८, श्लोक १ :
"आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यः मन्तव्यः निदिध्यासितव्यः"।
अर्थ: आत्मा को देखना, सुनना, मनन करना और निदिध्यासन करना चाहिए।
छान्दोग्य उपनिषद में आत्मा, ब्रह्म और ज्ञान के बारे में विस्तार से बताया गया है। यह उपनिषद सनातन वैदिक धर्म के प्रमुख ग्रंथों में से एक है और इसका अध्ययन करने से ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार की प्राप्ति होती है।
अध्यात्म शरीर के पाँच कवच या पंचकोष :
अन्नमय कोश का श्लोक तैत्तिरीय उपनिषद से लिया गया है:
तैत्तिरीय उपनिषद, अध्याय २, अनुवाक १:
अन्नमयः प्राणमयः मनोमयः विज्ञानमयः आनंदमयः खल्विमे पञ्च कोशाः।।
अर्थ:
ये पाँच कोश हैं - अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय। इन्हीं कोषों से मिलकर ही मनुष्य के पांच स्तर निर्मित होते हैं और इन्हीं कोषों के आधार पर उसका जीवन संचालित होता रहता है।
इसके बाद के अनुवाक में इन पाँच कोशों का विस्तार से वर्णन किया गया है:
1, अन्नमय कोश :
अन्नमयः प्राणमयः प्राणमयो मनोमयः मनोमयो विज्ञानमयः विज्ञानमयो आनंदमयः।
अर्थ:
अन्नमय कोश से प्राणमय कोश, प्राणमय कोश से मनोमय कोश, मनोमय कोश से विज्ञानमय कोश और विज्ञानमय कोश से आनंदमय कोश की निर्मित होती है।
2, प्राणमय कोश :
प्राणमयः प्राणो यस्मात् प्राणः प्राणमयः।
अर्थ:
प्राणमय कोश प्राण से बना है, और प्राण ही इस कोश का आधार है।
3, मनोमय कोश :
मनोमयः मनो यस्मात् मनः मनोमयः।
अर्थ:
मनोमय कोश मन से बना है, और मन ही इस कोश का आधार है।
4, विज्ञानमय कोश :
विज्ञानमयः विज्ञानं यस्मात् विज्ञानमयः।
अर्थ:
विज्ञानमय कोश विज्ञान से बना है, और विज्ञान ही इस कोश का आधार है।
5, आनंदमय कोश :
आनंदमयः आनन्दो यस्मात् आनंदमयः।
अर्थ:
आनंदमय कोश आनंद से बना है, और आनंद ही इस कोश का आधार है।
इन पाँच कोशों का ज्ञान करने से आत्म-साक्षात्कार की प्राप्ति होती है।
"अन्नमयः प्राणमयः मनोमयः विज्ञानमयः आनंदमयो ह्यात्मा"।
1. अन्नमय कोष : अर्थात् स्थूल शरीर।
2. प्राणमय कोष : अर्थात् प्राण शक्ति।
3. मनोमय कोष : अर्थात् मन और विचार।
4. विज्ञानमय कोष : अर्थात् बुद्धि और ज्ञान।
5. आनंदमय कोष : अर्थात् आत्मा का आनंदमय स्वरूप।
शास्त्रोक्त प्रमाण:
श्रीमद्भगवद गीता (13.22) से।
"अविनाशी तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्
विनाशमव्ययं शाश्वतं पदमव्ययं तद्"।
- यह शरीर अविनाशी है, यह कभी नहीं मृत्यु को प्राप्त होता। केवल सृष्टि के अन्त में उस परब्रह्म परमेश्वर में लय हो जाता है।
उपनिषद (तैत्तिरीय उपनिषद 2.1-5) से ।
अलौकिक उपनिषद (तैत्तिरीय उपनिषद 2.1-5)
"यस्मात् श्रेष्ठतमं तत्त्वम् यस्मिन् सर्वमिदं प्रतिष्ठितम्
तद्विज्ञानेन सर्वमिदं विज्ञातम्"।
- यह शरीर लौकिक नहीं है, यह सबसे उच्च स्तर का तत्व है।
योगसूत्र (3.38-40) से।
आत्मस्वरूप: योगसूत्र (3.38-40)
"आत्मस्वरूपं विनिगमयतिस्वभावभेदाद्धर्मभेदः
स्वभावभेदात् प्राकृतभेदः"।
यह शरीर आत्मा का वास्तविक स्वरूप है।
ज्ञान और आनंद : वेद (ऐतरेय ब्राह्मण 2.3.3)
"आनंदमयो ह्यात्मा सर्वांतः सुखरूपः
तद्ब्रह्म निर्वाणम् शाश्वतम् पदम्"।
- यह शरीर ज्ञान और आनंद से भरपूर है।
इन पांचों कोषों का जिस योगी या मानव को ज्ञान हो जाता है तो उसे आत्मसाक्षात्कार अवश्य ही हो जाता है। जिससे उसे ज्ञान हो जाता है कि वह कहां से आया था, कहां को जाना है और क्या करना है और क्या नहीं।
👉क्या सूक्ष्म शरीर और अध्यात्म शरीर भिन्न भिन्न होते हैं,:👇
हाँ, सूक्ष्म शरीर और अध्यात्म शरीर भिन्न होते हैं। यहाँ श्लोक सहित विवरण है देखें :
👉सूक्ष्म शरीर :
श्रीमद्भगवद गीता में (13.5-6)
"महाभूतान्यहमेकम् विकारो नाम रूपात्मकम्।
अहंकारादिभिर्युक्तम् सूक्ष्ममाकाशमाश्रितम्"।।
सूक्ष्म शरीर में सूक्ष्म रूप में पाँच महाभूत, अहंकार, मन और प्राण होते हैं।
👉अध्यात्म शरीर :
- तैत्तिरीय उपनिषद में 2.1-5
"आनंदमयो ह्यात्मा सर्वांतः सुखरूपः।
तद्ब्रह्म निर्वाणम् शाश्वतम् पदम्"।।
अध्यात्म शरीर ही आत्मा का मूल स्वरूप है, जो पूर्ण आनंदमय और शाश्वत है।
👉भेद क्या है :
योगसूत्र अनुसार (3.38-40)
"सूक्ष्म शरीरमव्याकृतम् अध्यात्म शरीरमव्याकृतम्
व्याकृतमव्याकृतम्"।।
सूक्ष्म शरीर और अध्यात्म शरीर दोनों अव्याकृत हैं, लेकिन सूक्ष्म शरीर में विकार और अहंकार होते हैं, जबकि अध्यात्म शरीर पूर्ण रूप से शुद्ध और आनंदमय होता है।
सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर में भेद क्या होता है , सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर के बीच का अंतर समझना बहुत महत्वपूर्ण है :
👉सूक्ष्म शरीर :
- बुद्धि- अहंकार- मन-औरपंच ज्ञानेन्द्रियाँ (इन्द्रियाँ जो ज्ञान प्राप्त करने में सहायता करती हैं, अर्थात् नेत्र, जिव्हा, घ्राण, कर्ण, त्वचा )
यह सूक्ष्म शरीर आत्मा के साथ जुड़ा रहता है सृष्टि के आरम्भ से लेकर अंत तक, लगभग ४३२०००००० वर्ष तक। यदि आत्मा मोक्ष को प्राप्त कर लेता है, तो सूक्ष्म शरीर भी प्रकृति में लीन हो जाता है।
👉स्थूल शरीर :
-पंच कर्मेन्द्रियाँ अर्थात् (हस्त, पाद, उपस्थ, पायु, वाक्)
- पंचभौतिक वाह्य शरीर अर्थात् आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी महाभूत ( Akash,Vayu, Agni, Jal and Prathvi ) जिन्हें अंग्रेजी भाषा में eather,air,fire,water और earth कहा गया है जो पूर्णतः त्रुटि पूर्ण है। जिसकी कभी अलग से चर्चा करेंगे।
यह स्थूल शरीर जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त रहता है, और पुनः समयानुसार नए शरीर में जन्म लेकर नया स्थूल शरीर धारण करता है। इन दोनों शरीरों के बीच का अंतर समझने से हमें आत्मा के वास्तविक स्वरूप को समझने में सहायता मिलती है।
👉मृत्यु क्या है, क्यों होती है, वैज्ञानिक दृष्टिकोण क्या है और भारतीय वैदिक सनातन दृष्टिकोण क्या है: 👇
हाँ, यहाँ कुछ पूरे शास्त्रोक्त श्लोक हैं जो मृत्यु के बारे में बताते हैं :
1. श्रीमद्भगवद गीता अनुसार (2.22)
"वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही"।।
- यह श्लोक कहता है कि जैसे मनुष्य जीर्ण वस्त्रों को छोड़कर नए वस्त्र पहनता है, वैसे ही आत्मा जीर्ण शरीर को छोड़कर नए शरीर में जाता है।
1. उपनिषद अनुसार (बृहदारण्यक उपनिषद 4.4.6)
"मृत्यु को मृत्यु नहीं मानना चाहिए, क्योंकि वह तो जीवन का एक भाग है।मृत्यु के उपरान्त आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप में लौट जाता है।"
2. योगसूत्र अनुसार (3.50)
"प्राकृतिक नियमों के अनुसार मृत्यु होती है, और आत्मा अपने नए शरीर में जाता है।"
3. महाभारत अनुसार (शांतिपर्व 345.23)
"मृत्यु एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसमें आत्मा अपने कर्मों के आधार पर नए शरीर में जाता है।"
4. शिव पुराण अनुसार (6.5.27-28)
"मृत्यु के उपरान्त आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप में लौट जाता है, और पुनः नए शरीर में जाता है।"
इन श्लोकों से पता चलता है कि मृत्यु एक प्राकृतिक और आवश्यक प्रक्रिया है, जिसमें आत्मा अपने कर्मों के आधार पर नए शरीर में जाता है।
👉मृत्यु समय क्या पीड़ा होती है :👇
मृत्यु के समय पीड़ा का अनुभव होना या न होना, यह एक जटिल और व्यक्तिगत विषय है। सनातन वैदिक धर्मग्रंथों और योगशास्त्रों में इसके बारे में विभिन्न मत हैं।
कुछ मत हैं, इस प्रकार हैं :
1. श्रीमदभगवद गीता (2.22) में भगवान कृष्ण कहते हैं :
"वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि"..
- मृत्यु के समय आत्मा जीर्ण शरीर को त्याग कर नवीन शरीर में जाता है, जैसे कि मनुष्य जीर्ण शीर्ण कपड़े को छोड़कर नवीन कपड़े पहनता है।
2. योगसूत्र (3.50) में कहा गया है:
"मृत्यु के समय आत्मा को कोई पीड़ा नहीं होती, क्योंकि वह अपने वास्तविक स्वरूप में लौट जाता है।"
3. तिब्बती बुक ऑफ द डेड में कहा गया है:
"मृत्यु के समय आत्मा को कई प्रकार की पीड़ाएँ हो सकती हैं, लेकिन यह पीड़ाएँ आत्मा के कर्मों के आधार पर होती हैं।"
4. उपनिषद (बृहदारण्यक उपनिषद 4.4.6) में कहा गया है:
"मृत्यु के समय आत्मा को कोई पीड़ा नहीं होती, क्योंकि वह अपने वास्तविक स्वरूप में लौट जाता है।"
यहाँ कुछ प्रमाण अनुसार श्लोक हैं जो मृत्यु के समय के सम्बंध में कहते हैं , जैसे :
5. छान्दोग्य उपनिषद 6.14.2:
"यथा निद्रा समुत्थायां तदेवानुप्रविश्यास्ते।"
अर्थ: जैसे नींद से जागने पर वही व्यक्ति होता है, वैसे ही मृत्यु के बाद भी आत्मा उसी रूप में रहती है।
6. बृहदारण्यक उपनिषद 4.4.6 :
"नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्।"
अर्थ: आत्मा अमर है, शरीर नहीं. आत्मा को न कोई हानि हो सकती है, न कोई विनाश।
7. महाभारत, शांति पर्व 367.43:
"मृत्युना प्रेततामेति प्रेतो याति पितृलोकताम्।"
अर्थ: मृत्यु के उपरान्त आत्मा प्रेत योनि में जाती है, और आगे पितृ लोक में जाती है।
8. गरुड़ पुराण 2.34:
"मूर्छन्नेव प्राणाः सर्वे मृत्युना समनुज्ञाताः।"
अर्थ: मृत्यु के समय सभी प्राण मूर्छित हो जाते हैं।
उपरोक्त उदाहरणों और प्रमाणों और इन मत भिन्नताओं से ज्ञात होता है कि मृत्यु के समय पीड़ा का अनुभव होना या न होना, यह व्यक्तिगत और आत्मा के कर्मों पर निर्भर करता है।
कुछ योग और ध्यान प्रक्रियाओ में मृत्यु के समय पीड़ा को कम करने के लिए कुछ तकनीकें बताई गई हैं :
1. प्राणायाम, विशेषकर सुषुम्ना में प्राणायाम होने से।
2. ध्यान, सुषुम्ना स्वर में ध्यान से।
3. योगनिद्रा, यदि व्यक्ति द्वारा सम्भव हो।
4. आत्मस्मरण या प्रभु नाम स्मरण।
इन तकनीकों का उद्देश्य आत्मा को अपने वास्तविक स्वरूप में लौटाना और मृत्यु के समय की पीड़ा को कम करना है।
👉क्या मृत्यु होना उचित प्रक्रिया है:👇
सनातन वैदिक धर्म और योगशास्त्र के अनुसार, मृत्यु एक प्राकृतिक और आवश्यक प्रक्रिया है। यह आत्मा के जीवन चक्र का एक भाग है, जिसमें वह एक शरीर को छोड़कर दूसरे शरीर में जाता है।
👉मृत्यु की आवश्यकता:
1. आत्मा की मुक्ति:
मृत्यु आत्मा को अपने कर्मों के आधार पर नए शरीर में जाने का अवसर देती है।
2. जीवन चक्र:
मृत्यु जीवन चक्र का एक भाग है, जिसमें आत्मा विभिन्न शरीरों में जाता है।
3. आत्मसुधार:
मृत्यु आत्मा को अपने पिछले जीवन के कर्मों के आधार पर सुधार करने का अवसर देती है।
4. प्रकृति का नियम:
मृत्यु प्रकृति का एक नियम है, जिसमें सभी जीवित वस्तुएँ जन्म लेती हैं और मृत्यु को प्राप्त होती हैं।
👉मृत्यु के बाद क्या होता है:
1. आत्मा का पुनर्जन्म।
2. आत्मा की मुक्ति।
3. आत्मा का स्वर्ग या नरक में जाना अपने कर्मों के अनुसार।
4. आत्मा का अपने वास्तविक स्वरूप में लौट जाना।
👉मृत्यु को उचित प्रक्रिया मानने के कारण:
1. यह प्रकृति का नियम है।
2. यह आत्मा के जीवन चक्र का एक भाग है।
3. यह आत्मा को मुक्ति और उत्थान का अवसर देती है।
4. यह जीवन के अर्थ और उद्देश्य को समझने में सहायता करती है।
इन कारणों से मृत्यु को एक उचित और आवश्यक प्रक्रिया माना जाता है।
तो मृत्यु के उपरान्त उसे कैसा शरीर मिलता है ? :
यह प्रश्न वास्तव में बहुत जटिल और विवादित है। विभिन्न धार्मिक और अध्यात्मिक परंपराओं में इसके बारे में भिन्न भिन्न विचार हैं। यहाँ कुछ संभावनाएँ और तथ्य दिए गए हैं:
1. मानव शरीर :
कुछ धार्मिक परंपराओं में माना जाता है कि मृत्यु के उपरान्त आत्मा नए मानव शरीर में प्रवेश करती है।
2. पशु शरीर :
कुछ धार्मिक परंपराओं में माना जाता है कि मृत्यु के उपरान्त आत्मा पशु शरीर में प्रवेश करती है, जो उसके कर्मों के आधार पर होता है।
3. देवता शरीर :
कुछ धार्मिक परंपराओं में माना जाता है कि मृत्यु के उपरान्त आत्मा देवता शरीर में प्रवेश करती है, जो उसके कर्मों के आधार पर होता है।
4. प्रेत शरीर :
कुछ धार्मिक परंपराओं में माना जाता है कि मृत्यु के उपरान्त आत्मा प्रेत शरीर में प्रवेश करती है, यह इस आधार पर कहा गया है कि जब तक वह नया शरीर नहीं प्राप्त कर पाती है तो वह प्रेत स्वरूप रहती है।जो उसके कर्मों के आधार पर होता है।
5. अन्य ग्रह शरीर :
कुछ वैज्ञानिक सिद्धांतों में माना जाता है कि मृत्यु के उपरान्त ऊर्जा अन्य ग्रहों पर जीवन प्राप्त कर सकती है।
6. ब्रह्मांडीय शक्ति :
कुछ अध्यात्मिक परंपराओं में माना जाता है कि मृत्यु के उपरान्त आत्मा ब्रह्मांडीय शक्ति में विलीन हो जाती है।
इन संभावनाओं के अतिरिक्त, कुछ अन्य विचार भी हैं, जैसे :
1- कार्मिक सिद्धांत :
मृत्यु के उपरान्त आत्मा का नया शरीर उसके कर्मों के आधार पर निर्धारित होता है।
2- पुनर्जन्म सिद्धांत :
मृत्यु के उपरान्त आत्मा नए शरीर में प्रवेश करती है, जो उसके पिछले जीवन के आधार पर होता है।
3- आत्मा की मुक्ति :
मृत्यु के उपरान्त आत्मा मुक्त होती है और नए शरीर में नहीं जाती।
यह ध्यान रखें कि ये विचार और संभावनाएँ विभिन्न परंपराओं पर आधारित हैं और इनकी सत्यता को प्रमाणित करना कठिन ही नहीं असम्भव है।
मृत्यु का वैज्ञानिक विश्लेषण और दार्शनिक दृष्टिकोण क्या होता है?
मृत्यु का वैज्ञानिक विश्लेषण और दार्शनिक दृष्टिकोण दोनों ही महत्वपूर्ण हैं और एक दूसरे के पूरक हैं।
वैज्ञानिक विश्लेषण:
विज्ञान के अनुसार, मृत्यु जीवन की एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसमें जीव की शारीरिक और मानसिक कार्य प्रणाली स्थगित हो जाती है। मृत्यु के कारणों में वृद्धावस्था, रोग, दुर्घटना, और अन्य शारीरिक और मानसिक कारण सम्मिलित हैं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मृत्यु के चरणों में निम्नलिखित सम्मिलित हैं:
1. शारीरिक परिवर्तन:
मृत्यु के समय शरीर में कई परिवर्तन होते हैं, जैसे कि हृदय की धड़कन बंद होना, सांस लेने की प्रक्रिया बंद होना, और शरीर का तापमान कम होना।
2. मस्तिष्क की गतिविधि:
मृत्यु के समय मस्तिष्क की गतिविधि बंद हो जाती है, जिससे व्यक्ति की चेतना और जागरूकता समाप्त हो जाती है।
3. कोशिकाओं की मृत्यु:
मृत्यु के बाद कोशिकाएं मर जाती हैं और शरीर के अंगों की कार्य प्रणाली रुक जाती है।
दार्शनिक दृष्टिकोण:
दार्शनिक दृष्टिकोण से मृत्यु को जीवन के अर्थ और उद्देश्य के संदर्भ में देखा जाता है। मृत्यु के बारे में दार्शनिक विचारों में निम्नलिखित सम्मिलित हैं:
1. जीवन का अर्थ:
मृत्यु के उपरान्त जीवन का अर्थ और उद्देश्य क्या है? क्या जीवन का उद्देश्य केवल जीवित रहना है या कुछ और?
2. आत्मा का अस्तित्व:
क्या आत्मा का अस्तित्व है? यदि है, तो मृत्यु के उपरान्त आत्मा का क्या होता है?
3. मृत्यु के उपरान्त क्या:
मृत्यु के उपरान्त क्या होता है? क्या वहाँ कोई अन्य जीवन है या नहीं?
4. जीवन की अनिश्चितता:
मृत्यु की अनिश्चितता जीवन को कितना महत्वपूर्ण बनाती है? क्या हमें जीवन को अधिक महत्व देना चाहिए?
कुछ प्रमुख दार्शनिक विचारों में सम्मिलित हैं:
- एपिक्योरसवाद:
मृत्यु के उपरान्त कुछ नहीं होता है, इसलिए हमें जीवन का आनंद लेना चाहिए।
- स्टोइकवाद:
मृत्यु जीवन का एक भाग है, इसलिए हमें इसके लिए तैयार रहना चाहिए।
-👉 सनातन वैदिक धर्म: 👇
मृत्यु के उपरान्त आत्मा का पुनर्जन्म होता है, इसलिए हमें जीवन में अच्छे कर्म करने चाहिए। इसी को स्पष्ट करते हुए श्रीमद्भागवत गीता में, महाभारत के युद्ध में अर्जुन को भगवान कृष्ण द्वारा दिया गया उपदेश, जो कि सांख्य, योग, और निष्काम कर्मों के सिद्धांत पर आधारित है, वह हमें जीवन और मृत्यु के रहस्य को समझने में मार्गदर्शन करता है।
भगवान कृष्ण ने अर्जुन को बताया कि शरीर तो मरणधर्मा है, लेकिन आत्मा अमर है। आत्मा को न कोई हानि हो सकती है, न कोई विनाश। यह ज्ञान अर्जुन को भयमुक्त कर देता है और वह युद्ध में लड़ने के लिए तत्पर हो जाता है।
अन्य शब्दों में कहें तो , "वेदादि ग्रन्थों का स्वाध्याय करने वाला मनुष्य ही राष्ट्र के लिए अपना शीश कटा सकता है, वह मृत्यु से भयभीत नहीं होता, प्रसन्नता पूर्वक मृत्यु को आलिंगन करता है।"
यह विचार हमें स्मरण कराता है कि जीवन में सबसे बड़ा धर्म है अपने कर्तव्य का पालन करना, और मृत्यु से डरने की आवश्यकता नहीं है। भगवान कृष्ण के उपदेश से हमें यह भी सीखने को मिलता है कि जीवन और मृत्यु दोनों ही एक ही चक्र के दो आयाम हैं, और हमें दोनों को समान रूप से स्वीकार करना चाहिए।
भगवद गीता के श्लोक 2.20 में भगवान श्री कृष्ण जी कहते हैं:
"न जायतेम्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भाविता वा न भूयः"
अर्थ : आत्मा न तो जन्म लेती है, न ही मरती है, न तो वह पहले से ही थी, न ही भविष्य में होगी।
यह श्लोक हमें आत्मा की अमरता को बताता है और मृत्यु के भय से मुक्ति दिलाता है।
मृत्यु के समय के सम्बंध में कई लोगों को भय और अनिश्चितता होती है, लेकिन यह विचार कि मृत्यु के समय ज्ञान शून्यता होने लगती है और सुषुप्तावस्था में शरीर जाने लगता है, जहां अत्यधिक ही शान्ति और आनन्द देने वाला होता है।
यह विचार वेदांत और उपनिषदों में भी वर्णित है। उपनिषदों में कहा गया है कि मृत्यु के समय आत्मा शरीर को छोड़कर एक नए शरीर में प्रवेश करती है, लेकिन इस प्रक्रिया में आत्मा को कोई पीड़ा नहीं होती है।
महाभारत में भी कहा गया है कि मृत्यु के समय ईश्वर की कृपा से मनुष्य ज्ञान शून्य होने लगता है और मूर्छा में जाने लगता है, जिससे उसे कोई पीड़ा नहीं होती है।
इसलिए, मृत्यु के समय के सम्बंध में भयभीत की आवश्यकता नहीं है, वरन् हमें ईश्वर की कृपा और अपने जीवन के कर्मों पर ध्यान देना चाहिए।
इन दोनों दृष्टिकोणों से मृत्यु को समझने में सहायता मिलती है और हमें जीवन के अर्थ और उद्देश्य के सम्बंध में सोचने के लिए प्रेरित किया जाता है।
जब मृत्यु एक समान है तो परस्पर इतनी विभिन्नता क्यों है, जैसे कि 👇 नीचे दिया गया है ,
यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न है। मृत्यु की एकता के अतिरिक्त विभिन्न रिलिजन, सम्प्रदाय, मज़हब और सनातन वैदिक धर्म और दर्शनों में इसकी व्याख्या भिन्न-भिन्न होने के कई कारण हो सकते हैं:
1. ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि :
प्रत्येक सम्प्रदाय, मज़हब, रिलिजन और धर्म की अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि होती है, जो उसके दर्शन और विश्वासों को आकार देती है।
2. धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या :
विभिन्न मतों के ग्रंथों की व्याख्या भिन्न भिन्न हो सकती है, जिससे मृत्यु के सम्बन्ध में भिन्न भिन्न विचार होते हैं।
3. दर्शनिक मतभेद :
विभिन्न धर्मों के दर्शनिक मतभेद भी मृत्यु की व्याख्या में अंतर ला सकते हैं।
4. क्षेत्रीय और स्थानीय प्रभाव :
क्षेत्रीय और स्थानीय प्रभाव भी धर्मों के विश्वासों और दर्शनों को आकार दे सकते हैं।
5. समय और परिस्थितियाँ :
समय और परिस्थितियाँ भी धर्मों के विश्वासों और दर्शनों में परिवर्तन ला सकती हैं।
6. मानवीय अनुभव और समझ :
मानवीय अनुभव और समझ भी मृत्यु की व्याख्या में भिन्नता ला सकते हैं।
इन कारणों के कारण विभिन्न मतों , सनातन वैदिक धर्म और दर्शनों में मृत्यु की व्याख्या भिन्न-भिन्न हो सकती है, लेकिन सभी मतों का मूल उद्देश्य एक ही होता है - मानव जीवन को अर्थ और उद्देश्य प्रदान करना।
कुछ प्रमुख मतों में मृत्यु की व्याख्या इस प्रकार है :
👉सनातन वैदिक धर्म : 👇
मृत्यु के उपरान्त आत्मा का पुनर्जन्म, कर्म के आधार पर होता है ऐसा सनातन वैदिक धर्म कहता है।
सनातन वैदिक धर्म में मृत्यु और मोक्ष के सम्बन्ध में विस्तार से लिखा गया है। वेदों और उपनिषदों में मृत्यु और मोक्ष के सम्बन्ध में कोटिश: सूत्र बताएं गए हैं उनमें से कुछ निम्नलिखित श्लोक हैं :
वेद अनुसार :
ऋग्वेद, मंडल १०, सूक्त १४, मंत्र ८:
"मृत्युर्न वा अपि मृत्युर्न मृत्युर्नो मृत्युः अमृतत्वमिह भावति मृत्योर्मुक्तः।"
अर्थ:
मृत्यु नहीं है, मृत्यु से मुक्ति ही अमृतत्व है।
उपनिषद:
छान्दोग्य उपनिषद, अध्याय ७, श्लोक २६:
"मृत्युर्न वा अपि मृत्युर्न मृत्युर्नो मृत्युः आत्मा हि मृत्युर्नो मृत्युः।"
अर्थ:
मृत्यु नहीं है, आत्मा ही मृत्यु से मुक्त है।
बृहदारण्यक उपनिषद, अध्याय ४, श्लोक ४ :
"मोक्षः स आत्मा विज्ञानमयः मृत्योर्मुक्तः स आत्मा।"
अर्थ:
मोक्ष प्राप्त करने वाला आत्मा विज्ञानमय है, जो मृत्यु से मुक्त है।
श्रीमदभगवद गीता :
श्रीमद्भगवद गीता, अध्याय २, श्लोक २२ :
"वासांसि जीर्णानि यथा विहाय" नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।।"
अर्थ:
जैसे मनुष्य जीर्ण वस्त्रों को छोड़कर नवीन वस्त्र पहनता है, वैसे ही आत्मा जीर्ण शरीर को छोड़कर नवीन शरीर में जाता है।
भगवद गीता, अध्याय ८, श्लोक १३ :
"मृत्युः स आत्मा विज्ञानमयः मोक्षः स आत्मा विज्ञानमयः।"
अर्थ:
मृत्यु से मुक्ति प्राप्त करने वाला आत्मा विज्ञानमय है, मोक्ष प्राप्त करने वाला आत्मा विज्ञानमय है।
सनातन वैदिक धर्म के अनुसार, मोक्ष प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित तीन तत्व आवश्यक हैं:
१. सत्यज्ञान या सत्यबुद्धि (आत्मा की पहचान)।
२. सत्य विज्ञान (आत्मा की वास्तविकता की पहचान)।
३. सत्य वैराग्य (माया से विरक्ति)।
इन तीन तत्वों को अपनाकर जीव मोक्ष प्राप्त कर सकता है।
👉जैन पंथ या मत का मृत्यु और मोक्ष पर दृष्टिकोण:👇
जैन पंथ में मृत्यु और मोक्ष के सम्बन्ध में विस्तार से बताया गया है। जैन मत के अनुसार, मृत्यु के उपरान्त आत्मा का पुनर्जन्म होता है, लेकिन मोक्ष प्राप्त करने से आत्मा को पुनर्जन्म से मुक्ति मिलती है।
जैन पंथ के प्रमुख ग्रंथों में से एक, तत्त्वार्थ सूत्र में मृत्यु और मोक्ष के सम्बन्ध में निम्नलिखित सूत्र या श्लोक मिलता हैं:
तत्त्वार्थ सूत्र, अध्याय १, श्लोक २ :
"जीवो जीवस्य मरणम्, मरणाद् भावो भवति।"
"भावात् भवो भवेद्, भवात् मोक्षो भवति।।"
अर्थ:
जीव की मृत्यु होती है, मृत्यु के बाद पुनर्जन्म होता है, पुनर्जन्म से मोक्ष प्राप्त होता है।
जैन मत के एक अन्य प्रमुख ग्रंथ, अकारांग सूत्र में मृत्यु और मोक्ष के सम्बन्ध में निम्नलिखित श्लोक मिलता हैं :
अकारांग सूत्र, अध्याय १, श्लोक १ :
"मरणम् नाशो जीवस्य, नाशाद् भावो भवति।"
"भावात् भवो भवेद्, भवात् मोक्षो भवति।"
अर्थ:
मृत्यु जीव का नाश है, नाश से पुनर्जन्म होता है, पुनर्जन्म से मोक्ष प्राप्त होता है।
👉जैन पंथ के तीर्थंकर #
जैन पंथ के अनुसार, मोक्ष प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित तीन तत्व आवश्यक हैं:
१. सम्यक दर्शन (उचित ज्ञान)
२. सम्यक ज्ञान (उचित समझ)
३. सम्यक चरित्र (उचित आचरण)
इन तीन तत्वों को अपनाकर जीव मोक्ष प्राप्त कर सकता है।
👉बौद्ध पंथ : 👇
बौद्ध पंथ में मृत्यु और मोक्ष के सम्बन्ध में भी विस्तार से बताया गया है। बौद्ध पंथ के अनुसार, मृत्यु के उपरान्त आत्मा का पुनर्जन्म होता है, लेकिन मोक्ष प्राप्त करने से आत्मा को पुनर्जन्म से मुक्ति मिलती है।बौद्ध पंथ के प्रमुख ग्रंथों में से एक, धम्मपद में मृत्यु और मोक्ष के सम्बन्ध में निम्नलिखित श्लोक मिलते हैं :
धम्मपद, अध्याय २१, श्लोक १:
"मरणम् अनिवार्यं, जाति जरा व्याधि "
"तस्मात् संपादयेत् पुण्यं, यथा न भवेयम् "
अर्थ:
मृत्यु अनिवार्य है, जन्म, जरा, और व्याधि होते हैं, इसलिए पुण्य का संचय करें ताकि पुनर्जन्म न हो।
धम्मपद, अध्याय २३, श्लोक २७ :
"निर्वाणं परम सुखं, यत्र न भवेयम्।"
"तस्मात् संपादयेत् पुण्यं, यथा न भवेयम्।"
अर्थ:
निर्वाण सबसे उच्च सुख है, जहाँ पुनर्जन्म नहीं होता, इसलिए पुण्य का संचय करें जिससे कि निर्वाण प्राप्त हो।
बौद्ध पंथ के अन्य प्रमुख ग्रंथ, महायान सूत्र में मृत्यु और मोक्ष के सम्बन्ध में निम्नलिखित श्लोक मिलता हैं :
महायान सूत्र, अध्याय १, श्लोक १:
"सर्व संसार दुखमय, मरणम् अनिवार्यं।"
"तस्मात् संपादयेत् बोधि, यथा न भवेयम्।"
अर्थ:
संसार दुखमय है, मृत्यु अनिवार्य है, इसलिए बोधि का संचय करें जिससे पुनर्जन्म न हो।
बौद्ध पंथ के अनुसार, मोक्ष प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित चार आर्य सत्य आवश्यक हैं:
१. दुख की सत्यता (दुख की पहचान)।
२. दुख के कारण की सत्यता (दुख के कारण की पहचान)।
३. दुख के नाश की सत्यता (दुख के नाश की पहचान)।
४. दुख के नाश के मार्ग की सत्यता (दुख के नाश के मार्ग की पहचान)।
इन चार आर्य सत्यों को अपनाकर जीव मोक्ष प्राप्त कर सकता है।
मृत्यु के उपरान्त आत्मा का पुनर्जन्म, कर्म के आधार पर, लेकिन अंतिम लक्ष्य निर्वाण है अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति के लिए।
👉इस्लाम मज़हब : 👇
मृत्यु के बाद आत्मा या रूह का अल्लाह के पास जाना, जहाँ उसे उसके कर्मों के आधार पर पुरस्कार या दंड दिया जाएगा। कुछ उपलब्ध प्रमाण इस प्रकार हैं। इस्लाम मज़हब में मृत्यु और उसके उपरान्त के सम्बन्ध में बताया गया है। लेकिन यह सभी तथ्य अपूर्ण से लगते हैं।इस्लामी प्रमाणों में मृत्यु के सम्बन्ध में कुछ निम्नलिखित आयतें और हदीसें हैं :
कुरआन के अनुसार :
कुरआन, सूरह अल-मोमिनून, आयत ११५:
अर्थ:
जीवन केवल इसीलिए दिया गया है जिससे कि मनुष्य को उसके किए के अनुसार पुरस्कार या दण्ड दिया जाए।
कुरआन, सूरह अल-बकरा, आयत २५६:
अर्थ:
अल्लाह आत्माओं को मृत्यु के समय लेता है।
हदीस:
हदीस, सही बुखारी, किताब अल-जनाइज:
"मृत्यु के बाद रूह को जन्नत या जहन्नम में भेजा जाता है।"
हदीस, सही मुस्लिम, किताब अल- जन्नाह :
"जो व्यक्ति अल्लाह पर विश्वास रखता है और अच्छे काम करता है, वह जन्नत अर्थात् स्वर्ग में जाएगा।"
इस्लाम मज़हब के अनुसार, जन्नत प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित बातें आवश्यक हैं :
१. तौहीद (अल्लाह की एकता पर विश्वास)
२. इमान (अल्लाह और उसके रसूल पर विश्वास)
३. इबादत (अल्लाह की पूजा)
४. अमल सलेह (अच्छे काम)
इन आवश्यकताओं को पूरा करने वाले व्यक्ति को इस्लामी जन्नत प्राप्त होती है, जिसे संभवतः स्वर्ग कहा जाता है। यहां मोक्ष की कोई भी चर्चा नहीं है।
ई👉साई रिलिजन में (In christianism): 👇
मृत्यु के उपरान्त आत्मा का ईश्वर के पास जाना, जहाँ उसे उसके कर्मों के आधार पर पुरस्कार या दंड मिलेगा।ईसाई रिलिजन में मृत्यु और स्वर्ग के सम्बन्ध में विस्तार से लिखा गया है। बाइबल में मृत्यु और स्वर्ग के सम्बन्ध में निम्नलिखित प्रमाण मिलते हैं:
बाइबल, पुराना नियम, उभरेश ३:१५:
"मृत्यु के बाद आत्मा को न्याय के लिए उपस्थित किया जाएगा।"
बाइबल, नया नियम, मत्ती २५:३१-४६:
"मृत्यु के बाद आत्मा को स्वर्ग या नर्क में भेजा जाएगा, उसके किए के अनुसार।"
बाइबल, नया नियम, यूहन्ना ३:१६:
"जो कोई भी ईसा मसीह पर विश्वास करता है, वह अनंत जीवन प्राप्त करेगा।"
बाइबल, नया नियम, फिलिप्पियों ३:२०-२१:
"हमारा नागरिकत्व स्वर्ग में है, जहाँ से हमें उद्धारकर्ता ईसा मसीह की प्रतीक्षा है।"
ईसाई रिलिजन के अनुसार, मोक्ष प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित आवश्यक हैं :
१. ईसा मसीह पर विश्वास
२. पापों की क्षमा
३. आत्म-समर्पण
४. अच्छे काम
इन आवश्यकताओं को पूरा करने वाले व्यक्ति को ईसाई रिलिजन में बताया गया स्वर्ग प्राप्त होता है, जिसे अनंत जीवन कहा जाता है।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ये व्याख्याएँ संक्षिप्त हैं और प्रत्येक सम्प्रदाय, मज़हब, रिलिजन, मत और धर्म के अनुसार भी विभिन्न मतभेद हो सकते हैं। साथ साथ इसकी जांच परख भी कर सकते हैं कि हो सकता है कि कहीं कोई त्रुटि रह गई हो। यदि आपको मिले तो कृपया सुधार करें।
लेकिन वैदिक सनातन धर्म के अनुसार जो भी व्यक्ति, हिंसा, पापाचर, जीव हत्या, भ्रष्टाचार, अपराधी प्रवृत्ति, स्त्रियों के साथ व्यभिचार, झूठ, प्रपंच जैसे अपराध करता है वो कभी भी मोक्ष प्राप्ति का अधिकारी नहीं होता। उसे सृष्टि पर्यन्त विभिन्न शरीरों में अनेकों दुःख भोगते हुए भटकना पड़ता है। जब तक उसे पुनः सत्य का ज्ञान ना हो जाए।
योग सूत्र में कहा गया है कि 👇
👉*हेय दुःखमानागतम ।।👇
अर्थात् जो दुःख (अर्थात् जन्म और मृत्यु ) आया है उसका उपाय क्या है। योग आगे कहता है कि अष्टांग योग का अभ्यास करें और मुक्ति या मोक्ष के अधिकारी बने। अन्य कोई भी कही भी मोक्ष प्राप्ति का मार्ग नहीं है। वो चाहे ईसाई रिलिजन हो, इस्लाम मज़हब हो या अन्य कोई इसी प्रकार के पंथ। क्योंकि परब्रम्ह परमेश्वर की रची गई सृष्टि को जो भी हिंसा से अपमानित और नष्ट करता है वह कभी भी मुक्त नहीं हो सकता है।
👉अब हम पुनर्जन्म पर चर्चा करते हैं:👇
यह एक जटिल और विवादित विषय है, जिसके सम्बंध में विभिन्न धार्मिक और अध्यात्मिक मतभेद हैं। यहाँ कुछ संभावनाएँ हैं:
1. इसी धरती पर :
सनातन वैदिक धर्म और बौद्ध और जैन पंथ में माना जाता है कि पुनर्जन्म इसी धरती पर होता है, लेकिन नए शरीर में और नए परिवेश में।
2. अन्य ब्रह्मांड में:
कुछ धार्मिक और अध्यात्मिक मतों में माना जाता है कि पुनर्जन्म अन्य ब्रह्मांडों या ग्रहों पर हो सकता है।
3. अन्य लोक में :
सनातन वैदिक धर्म में माना जाता है कि पुनर्जन्म अन्य लोकों में हो सकता है, जैसे कि, विष्णु लोक, शिवलोक,ब ब्रम्ह लोक, नाग , गन्धर्व, स्वर्ग, नरक, या अन्य किसी भी लोक में।
4. आत्मा की मुक्ति :
कुछ धार्मिक और अध्यात्मिक मतों में माना जाता है कि पुनर्जन्म के उपरान्त आत्मा की मुक्ति होती है, और वह किसी भी ब्रह्मांड या लोक में नहीं रहता।
कुछ प्रमुख धार्मिक ग्रंथों में पुनर्जन्म के सम्बन्ध में इस प्रकार से कहा गया है :
- श्रीमद्भगवद गीता (2.22):
"वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।"
- उपनिषद (बृहदारण्यक उपनिषद 4.4.6):
"आत्मा अपने कर्मों के आधार पर नए शरीर में जाता है।"
- बौद्ध पंथ (दीघा निकाय 15.85):
"पुनर्जन्म के बाद आत्मा नए शरीर में जाता है, लेकिन उसका वास्तविक स्वरूप नहीं बदलता है।"यह ध्यान रखें कि ये मतभेद और संभावनाएँ विभिन्न धार्मिक और अध्यात्मिक परंपराओं और विश्वास पर आधारित हैं।
परन्तु मृत्यु के उपरान्त मानव को मानव देह ही मिलती है ना कि कोई अधो जीव की योनि, क्योंकि वो मोक्ष प्राप्ति हेतु यहां तक यात्रा पूरी कर चुका है तो क्यों वह निम्न योनि में जाएगा। कुछ सूत्र है देखें और आनन्द ले, यहाँ कुछ प्रमाणित श्लोक हैं जो प्रश्न से संबंधित हैं:
गरुड़ पुराण, अध्याय 2, श्लोक 34:
"मानवदेहप्राप्तिर्हि दुर्लभा भुवि शाश्वती।"
अर्थ: मानव देह प्राप्त करना दुर्लभ है और यह शाश्वत है।
महाभारत, शांति पर्व, अध्याय 367, श्लोक 43:
"मानवदेहे भवेत्प्राज्ञो न चान्या योनिषु क्वचित्।"
अर्थ: मानव देह में ही प्राज्ञ (बुद्धिमान) होता है, अन्य योनियों में सम्भव नहीं।
योग वाशिष्ठ, अध्याय 6, श्लोक 51:
"मानवदेहमाश्रित्यैव मोक्षो नान्या योनिषु भावात्।"
अर्थ: मानव देह में ही मोक्ष (मुक्ति) प्राप्त होता है, अन्य योनियों में नहीं।
वेदांत सूत्र, अध्याय 1, पाद 1, सूत्र 12:
"मानवदेहप्राप्तिरेव मोक्षाय।"
अर्थ: मानव देह प्राप्त करना ही मोक्ष के लिए हेतु है।
इन श्लोकों में मानव देह की महत्ता और इसके माध्यम से मोक्ष प्राप्त करने की बात कही गई है।
पुनर्जन्म की अवधारणा विभिन्न धर्मों में भिन्न भिन्न प्रकार से समझी जाती है। यहाँ कुछ प्रमुख मतों , पंथों, मज़हब और सनातन वैदिक धर्म में पुनर्जन्म की अवधारणा का संक्षिप्त विवरण है, जो प्रमाण सहित सहित इस प्रकार से है :
*👉सनातन वैदिक धर्म अनुसार*👇
ऋग्वेद, मंडल १०, सूक्त १४, मंत्र ८:
"मृत्युर्न वा अपि मृत्युर्न मृत्युर्नो मृत्युः।"
"अमृतत्वमिह भावति मृत्योर्मुक्तः।"
अर्थ: मृत्यु नहीं है, मृत्यु से मुक्ति ही अमृतत्व है।
👉*बौद्ध पंथ अनुसार*👇
धम्मपद, अध्याय १, श्लोक २:
"जाति जरा व्याधि मरणम्तस्मात् संपादयेत् पुण्यं यथा न भवेयम्।"
अर्थ: जन्म, जरा, व्याधि, मृत्यु होते हैं, इसलिए पुण्य का संचय करें जिससे कि पुनर्जन्म न हो।
*👉जैन पंथ अनुसार*👇
तत्त्वार्थ सूत्र, अध्याय १, श्लोक २:
"जीवो जीवस्य मरणम् मरणाद् भावो भवति,"
"भावात् भवो भवेद् भवात् मोक्षो भवति।"
अर्थ: जीव की मृत्यु होती है, मृत्यु के बाद पुनर्जन्म होता है, पुनर्जन्म से मोक्ष प्राप्त होता है।
*👉ईसाई रिलिजन अनुसार*👇
बाइबल, पुराना नियम, उपदेश ३:१५:
"मृत्यु के उपरान्त आत्मा को न्याय के लिए प्रस्तुत किया जाएगा।"
( लेकिन ईसाई रिलिजन में पुनर्जन्म की अवधारणा नहीं है।)
👉*इस्लाम मज़हब अनुसार*👇
कुरआन, सूरह अल-मोमिनून, आयत ११५: में कहा गया है कि,
अर्थ: जीवन केवल इसीलिए दिया गया है जिससे कि मनुष्य को उसके किए के अनुसार पुरस्कार या दण्ड दिया जाए।
( लेकिन इस्लाम मज़हब में भी पुनर्जन्म की अवधारणा नहीं है।)
👉***निष्कर्ष***👇
उपरोक्त हमारी सम्पूर्ण चर्चा का निष्कर्ष निम्नलिखित है :
१. मृत्यु और मोक्ष की अवधारणा विभिन्न सम्प्रदाय , मज़हब, रिलिजन, मत और धर्म में भिन्न भिन्न प्रकार से समझी जाती है।
२. सनातन वैदिक धर्म, बौद्ध और जैन पंथ में मृत्यु के उपरान्त पुनर्जन्म की अवधारणा है, जबकि ईसाई रिलिजन और इस्लाम मज़हब में ऐसी अवधारणा नहीं है।
३. मोक्ष की अवधारणा सनातन वैदिक धर्म, बौद्ध पंथ और जैन पंथ में है, जो आत्मा की मुक्ति और चक्र से मुक्ति के रूप में समझी जाती है। क्योंकि इनका उद्गम सनातन वैदिक धर्म से ही हुआ है।
४. ईसाई रिलिजन में मोक्ष की अवधारणा नहीं है, इसके स्थान पर स्वर्ग और नर्क की अवधारणा है।
५. इस्लाम मज़हब में भी मोक्ष की अवधारणा नहीं है, इसके स्थान पर जन्नत और जहन्नम की अवधारणा है।
६. पुनर्जन्म और मोक्ष की अवधारणा विभिन्न सम्प्रदाय , मज़हब, रिलिजन, मत और धर्म में भिन्न भिन्न प्रकार से समझी जाती है, लेकिन सभी ने एक स्वर से माना कि, सत्यता, उपकार, परोपकार, प्रेम ही ईश्वर तत्व है और यही आत्मा की मुक्ति और सुख की प्राप्ति की अवधारणा है। अतः व्यभिचार, पापाचर, हिंसा, जीव हत्या, झूठ, छल, प्रपंच, विश्वासघात, अनैतिक और अस्वीकार्य सम्बन्ध त्यागो और मोक्ष और सद्चिदआनन्द की ओर बढ़ो, सनातन वैदिक धर्म की ओर लौटे। आपकी जय हो।
आपका शुभेच्छु, डॉ त्रिभुवन नाथ श्रीवास्तव, पूर्व प्राचार्य।
यह निष्कर्ष हमें विभिन्न धर्मों की मृत्यु और मोक्ष की अवधारणा को समझने में सहायता करता है।



कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें