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रविवार, 22 सितंबर 2024

अहिंसा परमोधर्म:, हिंसा तथैव च।।

 आपका प्रश्न महाभारत और भगवद गीता से संबंधित है जो हिंदू धर्म के प्रमुख ग्रंथ हैं।


अहिंसा परमो धर्मः हिंसा तथैव च

इस श्लोक का अर्थ है -

अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है, और हिंसा भी आवश्यक है (जब यह धर्म की रक्षा के लिए हो)।


यह श्लोक भगवद गीता के अध्याय 10, श्लोक 36 में उल्लेखित है:


यद्यद्ध्यायम् परित्यज्य यत्सात्वतम् सेवते।

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।।

(गीता, अध्याय 3, श्लोक 35)


हिंसा के संदर्भ में, भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि जब कोई व्यक्ति अपने धर्म की रक्षा के लिए और अधर्म के विनाश के लिए लड़ता है, तो वह हिंसा नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा कर रहा है।


इस श्लोक का सारांश यह है कि अहिंसा एक महत्वपूर्ण मूल्य है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में धर्म की रक्षा और अधर्म के विरुद्ध लड़ने के लिए हिंसा आवश्यक हो सकती है।


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