
सनातन की सीख....
दुष्ट को कभी छोड़ो मत, चाहे अपना गेंद फेक कर ही विवाद मोल क्यों न लेना पड़े।क्या गेंद यूँ ही यमुना में चली गयी थी या श्री श्रीकृष्ण ने सोच समझकर गेंद यमुना में फेंकी थी..?
श्रीकृष्ण ने गेंद सोच समझकर यमुना में फेंकी थी।
यमुना तो अपने तट पर बसे लोगों की अपना जल पिला रही थी, कालिया ने आकर मथुरा के पास यमुना में अधिकार कर लिया था और यमुना का जल लेने आने वालों का अवसर देखकर आखेट करने लगा।
कालिया के भय से गाँव वाले पलायन करने लगे और यमुना के उस तट पर नही जाते थे।गाँव वाले अधिक दूर का चक्कर लगाकर दूर से यमुना का जल लाते थे।
भगवान श्रीकृष्ण ने यमुना में गेंद सोच समझकर इसलिए फेंकी थी, कि वो आने वाले युग को संदेश देना चाहते थे कि दुष्ट के भय से पलायन करना कोई उपाय नहीं है बल्कि दुष्ट के घर में घुसकर उसका मर्दन करना चाहिए।
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| ।।शत्रु का नाश करने के लिए श्री कृष्ण बनो।। |
भगवान श्रीकृष्ण संसार को बताना चाहते थे कि दुष्ट के आक्रमण की प्रतीक्षा मत करो बल्कि स्वयं कोई बहाना बनाकर उसके दांत तोड़ दो, शत्रु के शक्तिशाली होने की प्रतीक्षा मत करो।
बल्कि स्वयं ही उसके घर में गेंद फेंको और गेंद को लेने के बहाने उसके घर के भीतर घुसो, वो दुष्ट तुम पर आक्रमण अवश्य करेगा और जब वो तुम पर आक्रमण करे तो उस दुष्ट का वहीं मर्दन कर दो,और हाँ, यह भी स्मरण रखो कि- जब कालिया का मर्दन करने उसके घर में घुसो तो उसे चुपचाप समाप्त मत कर दो प्रमाण के लिए बलराम, मनसुखा, आदि को गांव वालों को बुलाने भेज दो।
जिससे कि वो भी आकर देख लें कि जिस कालिया के डर से वो लोग पलायन कर रहे थे, वो कालिया कितना दुर्बल है इधर श्रीकृष्ण यमुना में कूदे और उधर बलराम भागे गाँव की ओर।
बलराम चिल्लाए, मइया, बाबा, काका, मामा, दादा, दौड़ो, कान्हा यमुना में कूद गया है।क्या आपको लगता है कि शेषावतार बलराम भय से चिल्ला रहे थे?बलराम भय से नहीं चिल्ला रहे थे बल्कि चाह रहे थे कि आज सारा गांव कालिया का मर्दन होते देख ले।
सभी देख लें कि किसी दुष्ट से डरने की नहीं बल्कि दुष्ट को नाथकर उसके सर पर चढ़ कर उसी को नाचने पर विवश कर दे। इधर हाहाकार करते गांव वाले यमुना के तट पर पहुंचे और उधर श्रीकृष्ण ने कालिया को धर दबोचा।
जब श्रीकृष्ण ने कालिया की ग्रीवा मरोड़ दी तो वह गिड़गिड़ाया- हमने तुम्हारा तो कुछ नहीं बिगाड़ा, तो तुम मुझे क्यों मार रहे हो।श्रीकृष्ण बोले- मैं अपने ऊपर अत्याचार होने की प्रतीक्षा नहीं करता, मैं तो एक-एक दुष्ट को ढूंढ कर, उसे दण्ड देने आया हूँ।
कालिया गिड़गिड़ाने लगा, साथ में उसकी पत्नियों ने भी श्रीकृष्ण के पैर पकड़ लिए और अपनी छाती पीटने लगीं, आज भी ऐसा ही होता है।आपने देखा ही होगा कि दुष्टों के परिवार छाती पीटने में अधिक ही पारंगत होते हैं।
जब सामने वाला शक्तिशाली हो तो वह रोने पीटने लगते हैं कालिया भी सौगंध खाने लगा, इस बार मुझे छोड़ दो, तो मैं यहां से चला जाऊंगा। श्रीकृष्ण ने कहा- मैं तेरे प्राण तो छोड़ दूंगा, लेकिन तेरे भय को तो समाप्त करना आवश्यक है।
एक बार तेरे भय का मर्दन हो जाय, उसके बाद यदि तू पुनः आ भी जायगा, तो तुझसे कोई डरेगा नहीं, तब कोई और भी तुझे पीट देगा।अब तू जल के ऊपर चल, आज तेरे शीश पर ही होगा नृत्य, हमें विश्व को दिखाना है कि दुष्टों के नकेल कसकर उनके सर पर कैसे चढ़ा जाता है।
आगे संसार ने देखा, कि कालिया के शीश पर नाचते कृष्ण को श्रीकृष्ण ने यही सिखाया है कि दुष्ट को कभी छोड़ो मत, चाहे अपना गेंद उसके घर में फेक कर ही विवाद मोल क्यों न लेना पड़े.?
आज भी जो अधर्मी अवसर देख-देख कर आक्रमण करते हैं, उनको समूल नष्ट करना होगा तभी विश्व में शान्ति की स्थापना हो सकेगी।चाहे इसके लिए स्वयं ही गेंद पानी में क्यों न फेंकनी पड़े.?
जय श्री कृष्ण, जय श्री राधे...!!

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