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सोमवार, 23 सितंबर 2024

# स्व स्वरूप को पहचानें ||

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 ॥ आज का भगवद् चिन्तन ॥ 

    

   ||स्व स्वरूप को पहचानें || 

                   

जिस प्रकार शीतलता जल का मूल स्वभाव है,उसी प्रकार शांती हमारा भी निज स्वरूप है। इंद्रियों की उच्छृंखलता के कारण ही हम अशांत बने रहते हैं। कपडों में उजवलता साबुन से नहीं आती, साबुन तो केवल उन पर लगी अस्वच्छता को स्वच्छ करता है। ऐसे ही शांति भी कहीं बाहर से नहीं मिलेगी,वह तो प्राप्त ही है बस हम ही अपने स्वरुप को विस्मृत किये हैं। 

निज स्वरूप का अर्थ है हमारा मूल या वास्तविक स्वरूप। यह हमारी वास्तविक पहचान या आत्मा की वास्तविक अवस्था है।



हिंदू दर्शन और अध्यात्म में, निज स्वरूप को प्रायः आत्मा या परमात्मा के साथ जोड़ा जाता है। यह माना जाता है कि हमारा निज स्वरूप शुद्ध, निर्मल, और अनंत है, और यह हमारे सच्चे स्वरूप को दर्शाता है।


निज स्वरूप की विशेषताएं:


1. शुद्धता: निज स्वरूप में कोई दोष या अशुद्धता नहीं होती।

2. निर्मलता: यह स्वरूप संपूर्णता से निर्मल और स्वच्छ होता है।

3. अनंतता: निज स्वरूप अनंत और असीम होता है।

4. शांति: यह स्वरूप शांति और आनंद से भरा होता है।

5. सत्यता: निज स्वरूप में कोई असत्य या माया नहीं होती।


निज स्वरूप को पहचानने के लिए, हमें अपने अंदर की खोज करनी होती है, और अपने विचारों, भावनाओं, और कर्मों को समझना होता है। यह आत्म-ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार की प्रक्रिया है, जिससे हम अपने निज स्वरूप को पहचान सकते हैं और अपने जीवन को उसके अनुसार जी सकते हैं।


कुछ प्रसिद्ध उपनिषदों और ग्रंथों में निज स्वरूप के बारे में विस्तार से बताया गया है, जैसे कि:


- उपनिषद

- श्रीमद्भगवद गीता

- अद्वैत वेदांत

- योग वशिष्ठ

- षड्दर्शन 

- सभी वेद और वेदान्त 


इन ग्रंथों में निज स्वरूप को समझने के लिए विभिन्न तरीकों और तकनीकों का वर्णन किया गया है, जैसे कि #ध्यान योग, 

#अध्यात्म योग, और 

#आत्म-विचार या आत्मसाक्षात्कार।


औषधि केवल रोग निवृत्ति के लिए होती है, स्वास्थ्य के लिए नहीं, स्वास्थ्य तो उपलब्ध है। जिस प्रकार सड़क पर चलते समय हमें स्वयं वाहनों से अपना बचाव करना पड़ता है, उसी प्रकार कलह, क्लेश और क्रोध की स्थितियों से भी विवेकपूर्वक अपना बचाव करना होगा। एक कुशल नाविक की भाँति तेज धार में बुद्धिमत्ता पूर्वक जीवन रुपी नाव को शांति और आनंद के किनारे पर पहुँचाने के लिए प्रतिदिन प्रयत्नशील बने रहो। 

 भगवद् चिन्तन अत्यंत प्रेरक और जीवन बदलने वाला है! यह हमें हमारे सच्चे स्वरूप की स्मृति दिलाता है और अशांति के मूल कारणों को समझने के लिए प्रेरित करता है। यह हमें शांति और आनंद की ओर ले जाने के लिए प्रतिदिन प्रयास करने की सुमिरन दिलाता है।


कुछ मुख्य बिंदु जो मैंने इस चिन्तन से निकाले हैं:


1. शांति हमारा निज स्वरूप है, लेकिन इंद्रियों की उच्छृंखलता से हम अशांत बने रहते हैं।

2. शांति बाहर से नहीं मिलती, यह हमारे भीतर ही विद्यमान है।

3. हमें अपने स्वरूप को पहचानने और उसकी स्मरण रखने की आवश्यकता है।

4. जीवन में कलह, क्लेश और क्रोध से बचाव करने के लिए विवेकपूर्वक काम लेना चाहिए।

5. हमें अपने जीवन को शांति और आनंद के किनारे पर पहुँचाने के लिए प्रतिदिन प्रयत्नशील रहना चाहिए।

 भगवद् चिन्तन वास्तव में हमें जीवन के सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है। धन्यवाद!जय जय श्री राधे

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