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रविवार, 18 मई 2025

उच्च रक्तचाप या हाई ब्लड प्रेशर को कम करने के साथ-साथ जानिए चुकंदर के अन्य स्वास्थ्य लाभ।


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 👉चुकंदर के विभिन्न भाषाओं में नाम और वैज्ञानिक नाम निम्नलिखित हैं:👇

3 संख्या से 35 संख्या तक वे फ्री टूल्स कोड है जिनका उपयोग आप अपनी वेबसाइट को आकर्षक बनाने के लिए कर सकते हैं।


चुकंदर पत्ते सहित, बिक्री हेतु 


👉*वैज्ञानिक नाम:*👇

- *बीटा वल्गारिस* (Beta vulgaris)

👉*अन्य भाषाओं में नाम:*👇

- *हिंदी:* चुकंदर

- *अंग्रेजी:* बीटरूट (Beetroot)

- *संस्कृत:* रक्तकंद, चुक्रिका

- *बंगाली:* चुकंदर

- *मराठी:* चुकंदर

- *तमिल:* वेंगीकन

- *तेलुगु:* गन्नमूली

- *कन्नड़:* चुकंदर

- *मलयालम:* ചുവന്ന മുള്ള് (चुवन्ना मुल्लू)

*अन्य नाम:*

- *गार्डन बीटरूट*

- *रेड बीटरूट*

- *बीट*


खेत में उगाया गया चुकंदर की फोटो।

जो विभिन्न भाषाओं में चुकंदर के नामों को दर्शाती है।

- *मधुर विपाक:* चुकंदर का विपाक मधुर होता है, जो शरीर को पोषण प्रदान करता है और वात दोष को शांत करता है।

👉- *चुकंदर के गुण:* 👇

चुकंदर के गुणों में सम्मिलित हैं - 

रक्तपित्तनाशक (रक्त संबंधी समस्याओं को दूर करने वाला), 

हृदय के लिए लाभदायक, और 

पाचन तंत्र को सशक्त बनाने वाला।


👉*शारीरिक दोषों पर प्रभाव:*👇


- *वात दोष:* चुकंदर वात दोष को शांत करता है।


- *पित्त दोष:* चुकंदर पित्त दोष को शांत करता है।


- *कफ दोष:* चुकंदर कफ दोष को बढ़ा सकता है, इसलिए कफ प्रकृति वाले व्यक्तियों को इसका सेवन सावधानी से करना चाहिए।


खाने व रस उपयोग हेतु चुकंदर 


👉*चुकंदर के प्राकृतिक भोजन में उपयोग:*👇


- *रक्त संबंधी समस्याएं:* चुकंदर रक्त संबंधी समस्याओं जैसे कि एनीमिया या रक्ताल्पता आदि में लाभदायक होता है।


- *पाचन समस्याएं:* चुकंदर पाचन तंत्र को स्वस्थ बनाने में सहायता करता है और विबंध जैसी समस्याओं को दूर करता है।


यह विश्लेषण प्राकृतिक दृष्टिकोण से चुकंदर के गुणों और उपयोगों को दर्शाता है।

उच्च रक्तचाप या हाई ब्लड प्रेशर को कम करने के साथ-साथ जानिए चुकंदर के अन्य स्वास्थ्य लाभ।


👉चुकंदर के अन्य लाभ: 👇

पोषक तत्वों से भरपूर चुकंदर स्वस्थ मस्तिष्क, संतुलित पाचन तंत्र और कान्तिवान त्वचा के लिए अधिक लाभकारी होता है। 


चुकंदर के स्वास्थ्य अन्य लाभ: अपने सुंदर लाल रंग, चुकंदर या चुकंदर के लिए लोकप्रिय अपने अनोखे स्वाद के कारण सलाद का जीवन है। चुकंदर खाने में स्वादिष्ट होने के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी होता है। 


चुकंदर का सेवन करने से शरीर में हीमोग्लोबिन स्तर ठीक बना रहता है और त्वचा कान्तिवान और सुन्दर बनी रहती है। चुकंदर कैलोरी में कम और विटामिन और खनिज लवण या मिनरल जैसे पोषक तत्वों से भरपूर होता है। चुकंदर प्रोटीन, हेल्दी फैट, फोलेट, मैग्नीशियम, आयरन, कॉपर, फाइबर और विटामिन सी का अच्छा स्रोत है। चुकंदर को नियमित भोजन में सम्मिलित करने से मस्तिष्क की कार्यक्षमता में सुधार होता है और मेटाबॉलिज्म बूस्ट होता है।


1* उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करने में सहायक होता है :


उच्च रक्तचाप से हृदय से जुडे रोगों की संभावना भी बढ़ जाती है। ऐसे में पोषक तत्वों से भरपूर चुकंदर हाई ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने में अधिक लाभकारी सिद्ध होता है। चुकंदर फोलेट का एक अच्छा स्रोत है, जो रक्तचाप को नियंत्रित करने में सक्षम है।


2*पाचन अंग के स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है चुकंदर:


चुकंदर में भरपूर मात्रा में फाइबर पाया जाता है, जिसके सेवन से पाचन तंत्र सही रहता है और विबंध जैसी कई गंभीर समस्याएं दूर हो जाती हैं। अच्छे पाचन के साथ-साथ चुकंदर के नियमित सेवन से मधुमेह और हृदय संबंधी पुराने रोगों की गंभीरता भी कम होती है।


3*शारीरिक गतिविधियों के लिए शक्तिवर्धक और सहनशक्ति बढ़ाने में सहायक:


भोज्य विज्ञान के अनुसार चुकंदर का सेवन स्टेमिना बढ़ाने में सक्षम होता है। नियमित चुकंदर खाने से शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ती है, जिससे व्यक्ति के एथलेटिक प्रदर्शन में सुधार होता है। सर्वोत्तम परिणामों के लिए, आप किसी भी शारीरिक गतिविधि को करने से लगभग 2 घंटे पहले चुकंदर के रस का सेवन कर सकते हैं।


4*मस्तिष्क स्वास्थ्य के लिए लाभकारी :


मस्तिष्क को शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग माना जाता है, इसलिए मस्तिष्क के स्वास्थ्य का ध्यान रखना बहुत आवश्यक है। चुकंदर नाइट्रेट्स से भरपूर होता है, जो मस्तिष्क के कार्य में सुधार के साथ-साथ रक्त प्रवाह को बढ़ावा देता है। चुकंदर के नियमित सेवन से मस्तिष्क की स्मरण शक्ति में भी सुधार होता है।

चुकंदर एक पौष्टिक सब्जी है जो विभिन्न पोषक तत्वों से भरपूर होती है। यहाँ चुकंदर का वैज्ञानिक विश्लेषण दिया जा रहा है:


5*पोषक तत्व:*


- * लाभकारी रेशा या फाइबर:*

 चुकंदर में फाइबर की अच्छी मात्रा होती है, जो पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने में सहायता करता है।

- *विटामिन सी:* 

चुकंदर विटामिन सी का एक अच्छा स्रोत है, जो प्रतिरक्षा प्रणाली को सशक्त बनाने में सक्षम करता है।

- *फोलेट:* 

चुकंदर फोलेट का एक अच्छा स्रोत है, जो गर्भवती महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण है।

- *मैग्नीशियम:* 

चुकंदर में मैग्नीशियम होता है, जो मांसपेशियों और तंत्रिका तंत्र के लिए महत्वपूर्ण है।

- *आयरन:* 

चुकंदर में आयरन होता है, जो रक्त में हीमोग्लोबिन के निर्माण में सहायता करता है।


6*स्वास्थ्य लाभ:*


- *हृदय स्वास्थ्य:*

 चुकंदर में नाइट्रेट होता है, जो रक्तचाप को कम करने में सहायता करता है और हृदय स्वास्थ्य को अच्छा बनाता है।

- *पाचन स्वास्थ्य:* 

चुकंदर में फाइबर होता है, जो पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने में सहायता करता है और विबंध या कब्ज जैसी समस्याओं को दूर करता है।

- *कैंसर रोकथाम:* 

चुकंदर में एंटीऑक्सीडेंट होते हैं, जो कैंसर कोशिकाओं के विकास को रोकने में सहायता करते हैं।


7*वैज्ञानिक अध्ययन:*


- *रक्तचाप नियंत्रण:* 

कई अध्ययनों में पाया गया है कि चुकंदर का सेवन रक्तचाप को कम करने में सहायता करता है।

- *एथलेटिक प्रदर्शन:* 

चुकंदर के सेवन से एथलेटिक प्रदर्शन में सुधार होता है, क्योंकि इसमें नाइट्रेट होता है जो मांसपेशियों में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाता है।


यह विश्लेषण दर्शाता है कि चुकंदर एक पौष्टिक सब्जी है जो विभिन्न स्वास्थ्य लाभ प्रदान करती है।


चुकंदर का सेवन अधिकांश लोगों के लिए सुरक्षित है, लेकिन कुछ अवस्थाओं में इसका सेवन नहीं करना चाहिए या सावधानी से करना चाहिए: जैसे*निम्नलिखित अवस्थाओं में सावधानी से प्रयोग करें:*


1. *कफ प्रकृति:* 

कफ प्रकृति वाले व्यक्तियों को चुकंदर का सेवन सावधानी से करना चाहिए, क्योंकि यह कफ दोष को बढ़ा सकता है।

2. *मधुमेह:* 

मधुमेह वाले व्यक्तियों को चुकंदर का सेवन सीमित मात्रा में करना चाहिए, क्योंकि इसमें शर्करा की मात्रा अधिक होती है।

3. * वात रक्त या गठिया :*

गठिया वाले व्यक्तियों को चुकंदर का सेवन सावधानी से करना चाहिए, क्योंकि इसमें ऑक्सलेट की मात्रा होती है जो गठिया के लक्षणों को बढ़ा सकती है।

4. * वृक्क या किडनी  की समस्याएं:*

 वृक्क की समस्याओं वाले व्यक्तियों को चुकंदर का सेवन सावधानी से करना चाहिए, क्योंकि इसमें ऑक्सलेट की मात्रा होती है जो वृक्क की समस्याओं को बढ़ा सकती है।

5. *अनुर्जता या एलर्जी:* 

कुछ लोगों को चुकंदर से एलर्जी हो सकती है, इसलिए यदि आपको एलर्जी के लक्षण दिखाई दें तो इसका सेवन बंद कर देना चाहिए।


7. *गर्भावस्था और स्तनपान:*


1. *गर्भावस्था:* गर्भावस्था के समय चुकंदर का सेवन सीमित मात्रा में करना चाहिए, क्योंकि इसमें फोलेट की मात्रा होती है जो गर्भावस्था के लिए लाभदायक है, लेकिन अधिक मात्रा में इसका सेवन नहीं करना चाहिए।

2. *स्तनपान:* स्तनपान के समय चुकंदर का सेवन सीमित मात्रा में करना चाहिए, क्योंकि इसमें कुछ तत्व हो सकते हैं जो स्तनपान के मध्य समस्याएं उत्पन्न कर सकते हैं।


👉*अन्य सावधानियां:*👇


1. *चुकंदर का अधिक सेवन:* 

चुकंदर का अधिक सेवन नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे पाचन समस्याएं और अन्य समस्याएं हो सकती हैं।

2. *चुकंदर के साथ अन्य खाद्य पदार्थ:*

 चुकंदर के साथ अन्य खाद्य पदार्थों का सेवन सावधानी से करना चाहिए, क्योंकि कुछ खाद्य पदार्थों के साथ इसका सेवन समस्याएं उत्पन्न कर सकता है।

चुकंदर का सेवन अधिकांश खाद्य पदार्थों के साथ सुरक्षित है, लेकिन कुछ खाद्य पदार्थों के साथ इसका सेवन हानिकारक हो सकता है:


👉*निम्नलिखित खाद्य पदार्थों के साथ सावधानी रखें :*👇


1. * दुग्ध उत्पाद या डेयरी उत्पाद:* चुकंदर के साथ दूध या अन्य डेयरी उत्पादों का सेवन नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे पाचन समस्याएं हो सकती हैं।

बेमेल भोजन 

बेमेल भोजन 

2. *मूली:* चुकंदर के साथ मूली का सेवन नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे गैस और पाचन समस्याएं हो सकती हैं।

मूली और चुकंदर 

मूली और चुकंदर 


3. *फल:* चुकंदर के साथ कुछ फलों जैसे कि नींबू, संतरा, या अन्य खट्टे फलों का सेवन नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे पाचन समस्याएं हो सकती हैं।

चुकंदर और खट्टे फल 


4. *मसालेदार भोजन:* 

चुकंदर के साथ अधिक मसालेदार भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे पाचन समस्याएं हो सकती हैं।


👉*अन्य सावधानियां:*👇


1. *अधिक मात्रा में सेवन:*

चुकंदर का अधिक मात्रा में सेवन नहीं करना चाहिए, खासकर जब इसे अन्य खाद्य पदार्थों के साथ लिया जाए।

2. *व्यक्तिगत प्रतिक्रिया:*

 यदि आपको चुकंदर या अन्य खाद्य पदार्थों से एलर्जी या पाचन समस्याएं होती हैं, तो इसका सेवन सावधानी से करना चाहिए।


👉*सामान्य नियम:*👇


1. *संतुलित भोजन:* चुकंदर का सेवन संतुलित भोजन के साथ करना चाहिए।

2. *व्यक्तिगत आवश्यकताएं:* अपनी व्यक्तिगत आवश्यकताओं और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार चुकंदर का सेवन करना चाहिए।


यह तथ्य चुकंदर के सेवन के सम्बन्ध में सावधानियां  अपनाने के लिए है, और यदि आपको कोई समस्या है तो प्राकृतिक चिकित्सा विशेषज्ञ या आयुर्वेदिक विशेषज्ञ से परामर्श करना चाहिए।

👉चुकंदर को डेयरी उत्पाद के साथ नहीं लेने का परामर्श दिया जाता  है क्योंकि इससे पाचन समस्याएं हो सकती हैं।🙏  


👉चुकंदर को अन्य खाद्य पदार्थों के साथ मिलाकर लेने से कई लाभ हो सकते हैं, जैसे कि:👇


- *सलाद:* चुकंदर को सलाद में मिलाकर लेने से फाइबर, विटामिन और मिनरल्स की मात्रा बढ़ जाती है।

- *फल:* चुकंदर को अन्य फलों जैसे कि सेब, गाजर आदि के साथ मिलाकर जूस बनाकर लेने से कई पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ जाती है।

- *नट्स और बीज:* चुकंदर को नट्स और बीजों के साथ मिलाकर सलाद या स्नैक के रूप में लेने से प्रोटीन और फाइबर की मात्रा बढ़ जाती है।

चुकंदर नट्स और बीज के साथ 

अन्य सलाद के साथ 


चुकंदर की मात्रा अन्य खाद्य पदार्थों के साथ मिलाकर लेने से कई लाभ हो सकते हैं, लेकिन यह व्यक्तिगत आवश्यकताओं और स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करता है। एक सामान्य नियम के अनुसार, चुकंदर की मात्रा 1-2 कप प्रति दिन हो सकती है, जिसे अन्य खाद्य पदार्थों के साथ मिलाकर लिया जा सकता है।


👉चुकंदर और डेयरी उत्पादों का एक साथ सेवन करने से निम्नलिखित पाचन समस्याएं हो सकती हैं:👇


1. *उदरवायु या गैस और ब्लोटिंग:* चुकंदर में फाइबर और शुगर होते हैं जो डेयरी उत्पादों के साथ मिलकर वायु या गैस और ब्लोटिंग का कारण बन सकते हैं।

2. * उदर शूल :* चुकंदर और डेयरी उत्पादों का एक साथ सेवन करने से उदर शूल हो सकता है, विशेषकर यदि आपको लैक्टोज इंटॉलरेंस या अन्य पाचन समस्याएं हैं।

3. *डायरिया या विबंध:* चुकंदर और डेयरी उत्पादों का एक साथ सेवन करने से डायरिया या कांस्टिपेशन हो सकता है, क्योंकि दोनों में अलग-अलग प्रकार के फाइबर और शुगर होते हैं।

4. *एसिडिटी और अपच:* चुकंदर और डेयरी उत्पादों का एक साथ सेवन करने से एसिडिटी और अपच हो सकता है, विशेषतः यदि आपको पहले से ही पाचन समस्याएं हैं।


यदि आपको इनमें से कोई भी समस्या होती है, तो चुकंदर और डेयरी उत्पादों का एक साथ सेवन करने से बचना चाहिए और अपने भोजन में सुधार करना चाहिए।

👉चुकंदर के कई स्वास्थ्य लाभ हैं, जो विभिन्न रिसर्च अध्ययनों द्वारा प्रमाणित किए गए हैं। यहाँ कुछ उदाहरण हैं:👇


1. *रक्तचाप नियंत्रण:* एक अध्ययन में पाया गया कि चुकंदर का जूस पीने से रक्तचाप में कमी आती है, क्योंकि इसमें नाइट्रेट होता है जो रक्त वाहिकाओं को विस्फारित करता या फैलाता है। (स्रोत: "Nitrate-rich beetroot juice reduces blood pressure in patients with hypertension" - Journal of Human Hypertension, 2013)


2. *एथलीटिक प्रदर्शन:* एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि चुकंदर का जूस पीने से एथलीटिक प्रदर्शन में सुधार होता है, क्योंकि इसमें नाइट्रेट होता है जो मांसपेशियों को अधिक ऑक्सीजन प्रदान करता है। (स्रोत: "Beetroot juice supplementation increases concentric and eccentric muscle power output" - Journal of Strength and Conditioning Research, 2011)


3. *कैंसर रोकथाम:* कुछ अध्ययनों में पाया गया है कि चुकंदर में एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं जो कैंसर की रोकथाम में सहायता कर सकते हैं। (स्रोत: "Beetroot juice inhibits cancer cell growth and induces apoptosis" - Journal of Nutrition and Cancer, 2015)


4. *पाचन स्वास्थ्य:* चुकंदर में फाइबर होता है जो पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने में सहायता करता है और विबंध या कब्ज जैसी समस्याओं को रोकता है। (स्रोत: "Dietary fiber intake and risk of constipation" - Journal of Clinical Gastroenterology, 2012)


5. *एंटीऑक्सीडेंट गुण:* चुकंदर में एंटीऑक्सीडेंट होते हैं जो शरीर को ऑक्सीडेटिव तनाव से बचाते हैं और रोगों की रोकथाम में सहायता करते हैं। (स्रोत: "Antioxidant activity of beetroot juice" - Journal of Food Science, 2017)


ये अध्ययन चुकंदर के विभिन्न स्वास्थ्य लाभों को प्रमाणित करते हैं और इसके सेवन को स्वस्थ भोजन का भाग बनाने का परामर्श देते हैं।

[ मैं आपको यहां कुछ अध्ययन और शोध पत्रों के लिंक प्रदान कर रहा हूं जो चुकंदर के स्वास्थ्य लाभों पर चर्चा करते हैं।]


👉आप निम्नलिखित डेटाबेस पर जाकर चुकंदर से संबंधित अध्ययनों को खोज सकते हैं:👇


1. *PubMed*: एक व्यापक डेटाबेस जिसमें बायोमेडिकल साहित्य के लाखों लेख हैं।

2. *Google Scholar*: एक खोज इंजन जो शैक्षिक साहित्य को अनुक्रमित करता है।

3. *ScienceDirect*: एक डेटाबेस जिसमें वैज्ञानिक और तकनीकी पत्रिकाओं के लेख हैं।


इन डेटाबेस पर जाकर आप चुकंदर से संबंधित अध्ययनों को खोज सकते हैं और उनके परिणामों को पढ़ सकते हैं।


👉कुछ विशिष्ट अध्ययन जिन पर आप विचार कर सकते हैं:👇


1. *"Nitrate-rich beetroot juice reduces blood pressure in patients with hypertension"* (Journal of Human Hypertension, 2013)

2. *"Beetroot juice supplementation increases concentric and eccentric muscle power output"* (Journal of Strength and Conditioning Research, 2011)

3. *"Beetroot juice inhibits cancer cell growth and induces apoptosis"* (Journal of Nutrition and Cancer, 2015)


इन अध्ययनों को पढ़कर आप चुकंदर के स्वास्थ्य लाभों के सम्बन्ध में अधिक ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।

                       🌅🪷✈️🌷🛕🪷🌅

गुरुवार, 8 मई 2025

पुनर्जन्म क्या होता है,*🪷🙏🇮🇳

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 *🙏🇮🇳🛕जय श्री राम🙏*पुनर्जन्म क्या होता है,*🪷🙏🇮🇳

पुनर्जन्म की अवधारणा सनातन वैदिक धर्म और अन्य भारतीय धर्मों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। पुनर्जन्म का अर्थ है आत्मा का एक शरीर से दूसरे शरीर में पुनर्जन्म लेना, जो उसके कर्मों के अनुसार निर्धारित होता है।


पुनर्जन्म के सम्बन्ध में कुछ प्रमुख ग्रंथों और श्लोकों के संदर्भ निम्नलिखित हैं:


भगवद गीता

भगवद गीता में पुनर्जन्म की अवधारणा पर विस्तार से चर्चा की गई है। एक प्रसिद्ध श्लोक है:


"जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।

तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि।।"

 (भगवद गीता २.२७)


अर्थ: "जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है और मरने वाले का जन्म निश्चित है। इसलिए, तुम्हें इस अपरिहार्य विषय में शोक नहीं करना चाहिए।"


उपनिषद

उपनिषदों में भी पुनर्जन्म की अवधारणा पर चर्चा की गई है। एक प्रसिद्ध उपनिषद है:


"योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः।

स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम्।।"

 (कठोपनिषद ५.७)


अर्थ: "कुछ जीव शरीर धारण करने के लिए योनि में जाते हैं और अन्य स्थावर रूप में अपने कर्मों और ज्ञान के अनुसार प्राप्त करते हैं।"


वेदांत सूत्र

वेदांत सूत्र में भी पुनर्जन्म की अवधारणा पर चर्चा की गई है:


"आत्मावअरेद्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः।" (वृहदारण्यक उपनिषद ४.५.६)


अर्थ: "आत्मा को देखना, सुनना, मनन करना और ध्यान करना चाहिए।"


इन ग्रंथों और श्लोकों से यह स्पष्ट होता है कि पुनर्जन्म की अवधारणा सनातन वैदिक धर्म में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है, और इसके अनुसार आत्मा का पुनर्जन्म उसके कर्मों के अनुसार निर्धारित होता है।


पुनर्जन्म की अवधारणा को और अधिक विस्तार से समझने के लिए, यह जानना आवश्यक होगा कि विभिन्न ग्रंथों और परंपराओं में इसके समाधान में क्या कहा गया है।

*🍁 पुनर्जन्म से सम्बंधित चालीस प्रश्नों के उत्तर..🍁*



(1) प्रश्न :- पुनर्जन्म किसको कहते हैं ?


उत्तर :- जब जीवात्मा एक शरीर का त्याग करके किसी दूसरे शरीर में जाती है तो इस बार बार जन्म लेने की क्रिया को पुनर्जन्म कहते हैं ।

पुनर्जन्म की धारणा पर चित्र 


(2) प्रश्न :- पुनर्जन्म क्यों होता है ?


उत्तर :- जब एक जन्म के अच्छे बुरे कर्मों के फल अधूरे रह जाते हैं तो उनको भोगने के लिए दूसरे जन्म आवश्यक हैं ।


(3) प्रश्न :- अच्छे बुरे कर्मों का फल एक ही जन्म में क्यों नहीं मिल जाता ? एक में ही सब निपट जाये तो कितना अच्छा हो ?


उत्तर :- नहीं जब एक जन्म में कर्मों का फल शेष रह जाए तो उसे भोगने के लिए दूसरे जन्म अपेक्षित होते हैं ।



(4) प्रश्न :- पुनर्जन्म को कैसे समझा जा सकता है ?


उत्तर :- पुनर्जन्म को समझने के लिए जीवन और मृत्यु को समझना आवश्यक है । और जीवन मृत्यु को समझने के लिए शरीर को समझना आवश्यक है ।


(5) प्रश्न :- शरीर के बारे में समझाएँ ?


उत्तर :- हमारे शरीर को निर्माण प्रकृति से हुआ है ।

जिसमें मूल प्रकृति (सत्व, रजस और तमस) से प्रथम बुद्धि तत्व का निर्माण हुआ है।

बुद्धि से अहंकार (बुद्धि का आभामण्डल) अहंकार से पांच ज्ञानेन्द्रियाँ (चक्षु, जिह्वा, नासिका, त्वचा, श्रोत्र), मन ।

पांच कर्मेन्द्रियाँ (हस्त, पाद, उपस्थ, पायु, वाक्) 


शरीर की रचना को दो भागों में बाँटा जाता है (सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर) 



(6) प्रश्न :- सूक्ष्म शरीर किसको बोलते हैं ?


उत्तर :- सूक्ष्म शरीर में बुद्धि, अहंकार, मन, ज्ञानेन्द्रियाँ ये सूक्ष्म शरीर आत्मा को सृष्टि के आरम्भ में जो मिलता है वही एक ही सूक्ष्म शरीर सृष्टि के अंत तक उस आत्मा के साथ पूरे एक सृष्टि काल ( ४३२००००००० वर्ष ) तक चलता है।  यदि बीच में ही किसी जन्म में कहीं आत्मा का मोक्ष हो जाए तो ये सूक्ष्म शरीर भी प्रकृति में वहीं लीन हो जायेगा।


(7) प्रश्न :- स्थूल शरीर किसको कहते हैं ?


उत्तर :- पंच कर्मेन्द्रियाँ (हस्त, पाद, उपस्थ, पायु, वाक्) ये समस्त पंचभौतिक बाहरी शरीर ।



(8) प्रश्न :- जन्म क्या होता है ?


उत्तर :- जीवात्मा का अपने करणो (सूक्ष्म शरीर) के साथ किसी पंचभौतिक शरीर में आ जाना ही जन्म कहलाता है ।




(9) प्रश्न :- मृत्यु क्या होती है ?


उत्तर :- जब जीवात्मा का अपने पंचभौतिक स्थूल शरीर से वियोग हो जाता है, तो उसे ही मृत्यु कहा जाता है । परन्तु मृत्यु केवल सथूल शरीर की होती है, सूक्ष्म शरीर की नहीं। सूक्ष्म शरीर भी छूट गया तो वह मोक्ष कहलाएगा मृत्यु नहीं। मृत्यु केवल शरीर बदलने की प्रक्रिया है, जैसे मनुष्य कपड़े बदलता है। वैसे ही आत्मा शरीर भी बदलता है।




(10) प्रश्न :- मृत्यु होती ही क्यों है ?


उत्तर :- जैसे किसी एक वस्तु का निरन्तर प्रयोग करते रहने से उस वस्तु का सामर्थ्य घट जाता है, और उस वस्तु को बदलना आवश्यक हो जाता है, ठीक वैसे ही एक शरीर का सामर्थ्य भी घट जाता है और इन्द्रियाँ निर्बल हो जाती हैं। जिस कारण उस शरीर के परिवर्तन की प्रक्रिया का नाम ही मृत्यु है।


(11) प्रश्न :- मृत्यु न होती तो क्या होता ?


उत्तर :- तो बहुत अव्यवस्था होती। पृथ्वी की जनसंख्या बहुत बढ़ जाती। और यहाँ पैर धरने का भी स्थान न होता।


(12) प्रश्न :- क्या मृत्यु होना अनुचित परिस्थित है ?


उत्तर :- नहीं, मृत्यु होना कोई अनुचित बात नहीं ये तो एक प्रक्रिया है शरीर परिवर्तन की ।


(13) प्रश्न :- यदि मृत्यु होना अनुचित परिस्थित नहीं है तो लोग इससे इतना भयग्रस्त क्यों रहते हैं ?


उत्तर :- क्योंकि उनको मृत्यु के वैज्ञानिक स्वरूप की जानकारी नहीं है। वे अज्ञानी हैं। वे समझते हैं कि मृत्यु के समय अत्यधिक कष्ट होता है। उन्होंने वेद, उपनिषद, या दर्शन को कभी पढ़ा नहीं वे ही अंधकार में पड़ते हैं और मृत्यु से पहले कई बार मरते हैं।


(14) प्रश्न :- तो मृत्यु के समय कैसा लगता है ? थोड़ा सा तो बतायें ?


उत्तर :- जब आप शैय्या में लेटे लेटे नींद में जाने लगते हैं तो आपको कैसा लगता है ?? ठीक वैसा ही मृत्यु की अवस्था में जाने में लगता है उसके बाद कुछ अनुभव नहीं होता। जब आपकी मृत्यु किसी दुर्सेघटना से होती है तो उस समय आमको मूर्छा आने लगती है, आप ज्ञान शून्य होने लगते हैं जिससे की आपको कोई पीड़ा न हो। तो यही ईश्वर की सबसे बड़ी कृपा है कि मृत्यु के समय मनुष्य ज्ञान शून्य होने लगता है और सुषुुप्तावस्था में जाने लगता है।


(15) प्रश्न :- मृत्यु के भय को दूर करने के लिए क्या करें ?


उत्तर :- जब आप वैदिक आर्ष ग्रन्थ (उपनिषद, दर्शन आदि) का गम्भीरता से अध्ययन करके जीवन, मृत्यु, शरीर आदि के विज्ञान को जानेंगे तो आपके अन्दर का, मृत्यु के प्रति भय मिटता चला जायेगा और दूसरा ये की योग मार्ग पर चलें तो स्वंय ही आपका अज्ञान का नाश होता जायेगा और मृत्यु भय दूर हो जायेगा। आप निडर हो जायेंगे । जैसे हमारे बलिदानियों की गाथायें आपने सुनी होंगी जो राष्ट्र की रक्षा के लिये बलिदान हो गये। तो आपको क्या लगता है कि क्या वो ऐसे ही एक दिन में बलिदान देने को तैय्यार हो गये थे ? नहीं उन्होने भी योगदर्शन, गीता, साँख्य, उपनिषद, वेद आदि पढ़कर ही निर्भयता को प्राप्त किया था। योग मार्ग को जीया था, अज्ञानता का नाश किया था। 


महाभारत के युद्ध में भी जब अर्जुन भीष्म, द्रोणादिकों की मृत्यु के भय से युद्ध की इच्छाओं को त्याग बैठा था तो योगेश्वर कृष्ण ने भी तो अर्जुन को इसी सांख्य, योग, निष्काम कर्मों के सिद्धान्त के माध्यम से जीवन मृत्यु का ही तो रहस्य समझाया था और यह बताया कि शरीर तो मरणधर्मा है ही तो उसी शरीर विज्ञान को जानकर ही अर्जुन भयमुक्त हुआ। तो इसी कारण तो वेदादि ग्रन्थों का स्वाध्याय करने वाले मनुष्य ही राष्ट्र के लिए अपना शीश कटा सकता है, वह मृत्यु से भयभीत नहीं होता , प्रसन्नता पूर्वक मृत्यु को आलिंगन करता है।


(16) प्रश्न :- किन किन कारणों से पुनर्जन्म होता है ?


उत्तर :- आत्मा का स्वभाव है कर्म करना, किसी भी क्षण आत्मा कर्म किए बिना रह ही नहीं सकता। वे कर्म उचित करे या अनुचित, ये उसपर निर्भर है, पर कर्म करेगा अवश्य। तो ये कर्मों के कारण ही आत्मा का पुनर्जन्म होता है। पुनर्जन्म के लिए आत्मा सर्वथा ईश्वराधीन है।


(17) प्रश्न :- पुनर्जन्म कब कब नहीं होता ?


उत्तर :- जब आत्मा का मोक्ष हो जाता है तब पुनर्जन्म नहीं होता है।


(18) प्रश्न :- मोक्ष होने पर पुनर्जन्म क्यों नहीं होता ?


उत्तर :- क्योंकि मोक्ष होने पर स्थूल शरीर तो पंचतत्वों में लीन हो ही जाता है, पर सूक्ष्म शरीर जो आत्मा के सबसे निकट होता है, वह भी अपने मूल कारण प्रकृति में लीन हो जाता है।


(19) प्रश्न :- मोक्ष के बाद क्या कभी भी आत्मा का पुनर्जन्म नहीं होता ?


उत्तर :- मोक्ष की अवधि तक आत्मा का पुनर्जन्म नहीं होता। उसके उपरान्त होता है।


(20) प्रश्न :- लेकिन मोक्ष तो सदा के लिए होता है, तो  मोक्ष की एक निश्चित अवधि कैसे हो सकती है ?


उत्तर :- सीमित कर्मों का कभी असीमित फल नहीं होता। यौगिक दिव्य कर्मों का फल हमें ईश्वरीय आनन्द के रूप में मिलता है, और जब ये मोक्ष की अवधि समाप्त होती है तो पुनः से ये आत्मा शरीर धारण करती है।


(21) प्रश्न :- मोक्ष की अवधि कब तक होती है ?


उत्तर :- मोक्ष का समय ३१ नील १० खरब ४० अरब वर्ष है, जब तक आत्मा मुक्त अवस्था में रहती है।

मोक्ष की अवधारणा सनातन वैदिक धर्म और अन्य भारतीय धर्मों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। मोक्ष का अर्थ है आत्मा की मुक्त अवस्था, जहां वह जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जात


मोक्ष के सम्बन्ध में कुछ प्रमुख ग्रंथों और श्लोकों के संदर्भ निम्नलिखित हैं:


भगवद गीता

भगवद गीता में मोक्ष की प्राप्ति के सम्बन्ध में विस्तार से बताया गया है। एक प्रसिद्ध श्लोक है:


"यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।

तं तमेवैति कौन्तेय तदा तद्भावभावितः।।"

 (भगवद गीता ८.६)


अर्थ: "हे कुन्तीपुत्र! शरीर त्यागते समय मनुष्य जिस भाव को स्मरण करता है, उसी को प्राप्त होता है।"


उपनिषद

उपनिषदों में भी मोक्ष की अवधारणा पर विस्तार से चर्चा की गई है। एक प्रसिद्ध उपनिषद श्लोक है:


"तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय।"

 (श्वेताश्वतर उपनिषद ३.८)


अर्थ: "उस परमात्मा को जानकर ही मनुष्य मृत्यु को पार कर सकता है, और कोई दूसरा मार्ग नहीं है।"


वेदांत सूत्र

वेदांत सूत्र में भी मोक्ष की प्राप्ति के सम्बन्ध में बताया गया है:


"अथातो ब्रह्म जिज्ञासा।" (वेदांत सूत्र १.१.१)


अर्थ: "अब ब्रह्म की जिज्ञासा करनी चाहिए।"


इन ग्रंथों और श्लोकों से यह स्पष्ट होता है कि मोक्ष की अवधारणा सनातन वैदिक धर्म में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है, और इसकी प्राप्ति के लिए विभिन्न मार्गों का वर्णन किया गया है।


मोक्ष की अवधि के सम्बन्ध में विशिष्ट तथ्य के लिए, यह जानना आवश्यक होगा कि यह प्रमाण किस विशिष्ट ग्रंथ या परंपरा से आ रही है।

(22) प्रश्न :- मोक्ष की अवस्था में स्थूल शरीर या सूक्ष्म शरीर आत्मा के साथ रहता है या नहीं ?


उत्तर :- नहीं मोक्ष की अवस्था में आत्मा पूरे ब्रह्माण्ड का चक्कर लगाता रहता है और ईश्वर के आनन्द में रहता है, बिलकुल ठीक वैसे ही जैसे कि मछली पूरे समुद्र में रहती है। पर जीव को किसी भी शरीर की आवश्यक्ता ही नहीं होती।


(23) प्रश्न :- मोक्ष के उपरान्त आत्मा को शरीर कैसे प्राप्त होता है ?


उत्तर :- सबसे पहला तो आत्मा को कल्प के आरम्भ (सृष्टि आरम्भ) में सूक्ष्म शरीर मिलता है फिर ईश्वरीय मार्ग और औषधियों की सहायता से प्रथम रूप में अमैथुनी जीव शरीर मिलता है, वो शरीर सर्वश्रेष्ठ मनुष्य या विद्वान का होता है जो कि मोक्ष रूपी पुण्य को भोगने के बाद आत्मा को मिला है। जैसे इस वाली सृष्टि के आरम्भ में चारों ऋषि विद्वान (वायु, आदित्य, अग्नि, अंगिरा) को मिला जिनको वेद के ज्ञान से ईश्वर ने अलंकारित किया। क्योंकि ये ही वो पुण्य आत्मायें थीं जो मोक्ष की अवधि पूरी करके आई थीं।


(24) प्रश्न :- मोक्ष की अवधि पूरी करके आत्मा को मनुष्य शरीर ही मिलता है या अन्य किसी पशु का ?


उत्तर :- शत प्रतिशत मनुष्य शरीर ही मिलता है।


(25) प्रश्न :- क्यों केवल मनुष्य का ही शरीर क्यों मिलता है ? पशु का क्यों नहीं ?


उत्तर :- क्योंकि मोक्ष को भोगने के उपरान्त पुण्य कर्मों को तो भोग लिया और इस मोक्ष की अवधि में पाप कोई किया ही नहीं तो  पशु बनना सम्भव ही नहीं, तो रहा केवल मनुष्य जन्म जो कि कर्म शून्य आत्मा को मिल जाता है ।


(26) प्रश्न :- मोक्ष होने से पुनर्जन्म क्यों समाप्त हो जाता है ?


उत्तर :- क्योंकि योगाभ्यास आदि साधनों से जितने भी पूर्व कर्म होते हैं (अच्छे या बुरे) वे सब कट जाते हैं। तो ये कर्म ही तो पुनर्जन्म का कारण हैं, कर्म ही न रहे तो पुनर्जन्म क्यों होगा ??


(27) प्रश्न :- पुनर्जन्म से छूटने का उपाय क्या है ?


उत्तर :- पुनर्जन्म से छूटने का उपाय है योग मार्ग से मुक्ति या मोक्ष का प्राप्त करना ।


(28) प्रश्न :- पुनर्जन्म में शरीर किस आधार पर मिलता है ?


उत्तर :- जिस प्रकार के कर्म आपने एक जन्म में किए हैं उन कर्मों के आधार पर ही आपको पुनर्जन्म में शरीर मिलेगा।


(29) प्रश्न :- कर्म कितने प्रकार के होते हैं ?


उत्तर :- मुख्य रूप से कर्मों को तीन भागों में बाँटा गया है :- सात्विक कर्म , राजसिक कर्म , तामसिक कर्म।


(१) सात्विक कर्म :- सत्यभाषण, विद्याध्ययन, परोपकार, दान, दया, सेवा आदि।

सात्विक जीवन यात्रा 


(२) राजसिक कर्म :- मिथ्याभाषण, क्रीडा, स्वाद लोलुपता, स्त्रीआकर्षण, चलचित्र आदि ।

राजसिक जीवन यात्रा 


(३) तामसिक कर्म :- चोरी, पशुवत जीवन, जुआ, ठग्गी, लूटमार, अधिकार हनन, व्यभिचार , आदि।

                         एक तामसिक जीवन यात्रा 


और जो कर्म इन तीनों से बाहर हैं वे दिव्य कर्म कहलाते हैं, जो कि ऋषियों और योगियों द्वारा किए जाते हैं। इसी कारण उनको हम तीनों गुणों से परे मानते हैं। जो कि ईश्वर के निकट होते हैं और दिव्य कर्म ही करते हैं।


(30) प्रश्न :- किस प्रकार के कर्म करने से मनुष्य की योनि प्राप्त होती है ?


उत्तर :- सात्विक और राजसिक कर्मों के मिलेजुले प्रभाव से मानव देह मिलती है, यदि सात्विक कर्म अधिक कम है और राजसिक अधिक तो मानव शरीर तो प्राप्त होगा परन्तु किसी नीच कुल में, यदि सात्विक गुणों का अनुपात बढ़ता जाएगा तो मानव कुल उच्च ही होता जायेगा। जिसने अत्यधिक सात्विक कर्म किए होंगे वो विद्वान मनुष्य के घर ही जन्म लेगा।


(31) प्रश्न :- किस प्रकार के कर्म करने से आत्मा जीव जन्तुओं के शरीर को प्राप्त होता है ?


उत्तर :- तामसिक और राजसिक कर्मों के फलरूप पशु शरीर आत्मा को मिलता है। जितना तामसिक कर्म अधिक किए होंगे उतनी ही नीच योनि उस आत्मा को प्राप्त होती चली जाती है। जैसे लड़ाई स्वभाव वाले, माँस खाने वाले को कुत्ता, गीदड़, सिंह, सियार आदि का शरीर मिल सकता है और घोर तामसिक कर्म किए हुए को साँप, नेवला, बिच्छू, कीड़ा, काकरोच, छिपकली आदि। तो ऐसे ही कर्मों से नीच शरीर मिलते हैं और ये पशुओं के शरीर आत्मा की भोग योनियाँ हैं।


(32) प्रश्न :- तो क्या हमें यह पता लग सकता है कि हम पिछले जन्म में क्या थे ? या आगे क्या होंगे ?


उत्तर :- नहीं कभी नहीं, सामान्य मनुष्य को यह पता नहीं लग सकता। क्योंकि यह केवल ईश्वर का ही अधिकार है कि हमें हमारे कर्मों के आधार पर शरीर दे। वही सब जानता है।


(33) प्रश्न :- तो फिर यह किसको पता चल सकता है ?


उत्तर :- केवल एक सिद्ध योगी ही यह जान सकता है, योगाभ्यास से उसकी बुद्धि। अत्यन्त तीव्र हो चुकी होती है कि वह ब्रह्माण्ड एवं प्रकृति के महत्वपूर्ण रहस्य़ अपनी योगज शक्ति से जान सकता है। उस योगी को बाह्य इन्द्रियों से ज्ञान प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं रहती है

वह अन्तः मन और बुद्धि से सब ज्ञात कर लेता है। उसके सामने भूत और भविष्य दोनों सामने आ खड़े होते हैं।


(34) प्रश्न :- यह बतायें की योगी यह सब कैसे ज्ञात कर लेता है ?


उत्तर :- अभी यह लेख पुनर्जन्म पर है, यहीं से प्रश्न उत्तर का ये क्रम चला देंगे तो लेख का बहुत ही विस्तार हो जायेगा।  


(35) प्रश्न :- क्या पुनर्जन्म के कोई प्रमाण हैं ?


उत्तर :- हाँ हैं, जब किसी छोटे बच्चे को देखो तो वह अपनी माता के स्तन से सीधा ही दूध पीने लगता है जो कि उसको बिना सिखाए आ जाता है क्योंकि ये उसका अनुभव पिछले जन्म में दूध पीने का रहा है, अन्यथा बिना किसी कारण के ऐसा हो नहीं सकता। दूसरा यह कि कभी आप उसको कमरे में अकेला लेटा दो तो वो कभी कभी हँसता भी है , ये सब पुराने शरीर की बातों को स्मरण करके वो हँसता है पर जैसे जैसे वो बड़ा होने लगता है तो धीरे धीरे सब विस्मृत कर जाता है...!


(36) प्रश्न :- क्या इस पुनर्जन्म को सिद्ध करने के लिए कोई उदाहरण हैं...?


उत्तर :- हाँ, जैसे अनेकों समाचार पत्रों में, या टीवी में भी आप सुनते हैं कि एक छोटा सा बालक अपने पिछले जन्म की घटनाओं को स्मरण में रखे हुए है, और सभी बातें बताता है जहाँ जिस गाँव में उसका जन्म हुआ, जहाँ उसका घर था, जहाँ पर वो मरा था। इस जन्म में वह अपने उस गाँव में कभी गया तक नहीं था लेकिन इस भी अपने उस गाँव की सभी बातें स्मरण रखे हुए है, किसी ने उसको कुछ बताया नहीं, सिखाया नहीं, दूर दूर तक उसका उस गाँव से इस जन्म में कोई नाता नहीं है। तो भी उसकी गुप्त बुद्धि जो कि सूक्ष्म शरीर का भाग है वह घटनाएँ संजोए हुए है जाग्रत हो गई और बालक बीते जन्म की बातें बताने लग पड़ा...!


(37) प्रश्न :- लेकिन ये सब मनघड़ंत बातें हैं, हम विज्ञान के युग में इसको नहीं मान सकते क्योंकि वैज्ञानिक रूप से ये बातें निरर्थक सिद्ध होती हैं, क्या कोई तार्किक और वैज्ञानिक आधार है इन बातों को सिद्ध करने का ?


उत्तर :- आपको किसने कहा कि हम विज्ञान के विरुद्ध इस पुनर्जन्म के सिद्धान्त का दावा करेंगे। ये वैज्ञानिक रूप से सत्य है और आपको ये हम अभी सिद्ध करके दिखाते हैं..!


(38) प्रश्न :- तो सिद्ध कीजीए ?


उत्तर :- जैसा कि आपको पहले बताया गया है कि मृत्यु केवल स्थूल शरीर की होती है, पर सूक्ष्म शरीर आत्मा के साथ वैसे ही आगे चलता है, तो हर जन्म के कर्मों के संस्कार उस बुद्धि में समाहित होते रहते हैं और कभी किसी जन्म में वो कर्म अपनी वैसी ही परिस्थिती पाने के उपरान्त जाग्रत हो जाते हैं। 


इस उदहारण से समझें :- एक बार एक छोटा सा ६ वर्ष का बालक था, यह घटना हरियाणा के सिरसा के एक गाँव की है । जिसमें उसके माता पिता उसे एक स्कूल में घुमाने लेकर गये जिसमें उसका प्रवेश करवाना था और वो बच्चा केवल हरियाणवी या हिन्दी भाषा ही जानता था कोई तीसरी भाषा वो समझ तक नहीं सकता था। 


लेकिन हुआ कुछ यूँ था कि उसे स्कूल की Chemistry Lab में ले जाया गया और वहाँ जाते ही उस बच्चे का मूँह लाल हो गया !! चेहरे के मुद्राएं और भाव परिवर्तित गये !!


उसने एकश्वास में बिना रुके फ्रेंच French भाषा बोलनी प्रारम्भ कर दी !! उसके माता पिता भयग्रस्त गये और घबडा गये, तुरंत ही बच्चे को अस्पताल ले जाया गया। जहाँ पर उसकी बातें सुनकर डाकटर ने एक दुभाषिये का प्रबन्ध किया। 


जो कि French और हिन्दी जानता था, तो उस दुभाषिए ने सारा वृतान्त उस बालक से पूछा तो उस बालक ने बताया कि " मेरा नाम Simon Glaskey है और मैं French Chemist हूँ । मेरी मृत्यु मेरी प्रयोगशाला में एक दुर्घटना के कारण (Lab) में हुई थी। "


तो यहाँ देखने की बात यह है कि इस जन्म में उसे पुरानी घटना के अनुकूल मिलती जुलती परिस्थिति से अपना वह सब स्मरण हो आया जो कि उसकी गुप्त बुद्धि में दबा हुआ था। यानि कि वही पुराने जन्म में उसके साथ जो प्रयोगशाला में हुआ, वैसी ही प्रयोगशाला उस दूसरे जन्म में देखने पर उसे सब स्मरण हो आया। तो ऐसे ही बहुत से उदहारणों से आप पुनर्जन्म को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध कर सकते हो...!


(39) प्रश्न :- तो ये घटनाएँ भारत में ही क्यों होती हैं ? पूरा विश्व इसको मान्यता क्यों नहीं देता ?


उत्तर :- ये घटनायें पूरे विश्व भर में होती रहती हैं और विश्व इसको मान्यता इसलिए नहीं देता क्योंकि उनको वेदानुसार यौगिक दृष्टि से शरीर का कुछ भी ज्ञान नहीं है। वे केवल माँस और हड्डियों के समूह को ही शरीर समझते हैं और उनके लिए आत्मा नाम की कोई वस्तु नहीं है। तो ऐसे में उनको न जीवन का ज्ञान है, न मृत्यु का ज्ञान है, न आत्मा का ज्ञान है, न कर्मों का ज्ञान है, न ईश्वरीय व्यवस्था का ज्ञान है और यदि कोई पुनर्जन्म की कोई घटना उनके सामने आती भी है तो वो इसे मानसिक रोग जानकर उसको Multiple Personality Syndrome का नाम देकर अपना पीछा छुड़ा लेते हैं और उसके कथनानुसार जाँच नहीं करवाते हैं...!


(40) प्रश्न :- क्या पुनर्जन्म केवल पृथ्वी पर ही होता है या किसी और ग्रह पर भी ?


उत्तर :- ये पुनर्जन्म पूरे ब्रह्माण्ड में यत्र तत्र होता है, कितने असंख्य सौरमण्डल हैं, कितनी ही पृथ्वियां हैं। तो एक पृथ्वी के जीव मरकर ब्रह्माण्ड में किसी दूसरी पृथ्वी के उपर किसी न किसी शरीर में भी जन्म ले सकते हैं। ये ईश्वरीय व्यवस्था के अधीन है...


 परन्तु यह बड़ा ही आश्चर्यजनक लगता है कि मान लो कोई हाथी मरकर मच्छर बनता है तो इतने बड़े हाथी की आत्मा मच्छर के शरीर में कैसे घुसेगी..?


यही तो भ्रम है आपका कि आत्मा जो है वो पूरे शरीर में नहीं फैली होती। वो तो हृदय के पास छोटे अणुरूप में होती है । सब जीवों की आत्मा एक सी है। चाहे वो व्हेल मछली हो, चाहे वो एक चींटी ह

शुक्रवार, 25 अप्रैल 2025

# कैलाश पर्वत की यात्रा मार्ग और उसकी महत्ता और अपने# वेब पेज को स्टाइलिश बनाने के फ्री कोड टूल्स

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 कैलाश पर्वत एक पवित्र और रहस्यमय पर्वत है, जो तिब्बत में स्थित है। यह हिंदू, बौद्ध और जैन धर्मों में बहुत महत्व रखता है।




*स्थिति:*

कैलाश पर्वत तिब्बत के स्वायत्त क्षेत्र में स्थित है, जो चीन का भाग है। यह पर्वत मानसरोवर झील और राक्षसताल झील के पास स्थित है।


*महत्ता:*

कैलाश पर्वत को हिंदू धर्म में भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है। बौद्ध धर्म में इसे माउंट मेरु के रूप में देखा जाता है, जो ब्रह्मांड का केंद्र है। जैन धर्म में भी इसे एक पवित्र स्थल माना जाता है।


कैलाश पर्वत की परिक्रमा करना एक पवित्र अनुष्ठान है, जो कई तीर्थयात्रियों को आकर्षित करता है। यह पर्वत अपनी प्राकृतिक सुंदरता और आध्यात्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है।

कैलाश पर्वत की यात्रा करने के लिए कई मार्ग हैं, लेकिन सबसे सामान्य मार्ग है:


*नैपाल और तिब्बत के मार्ग:*


1. *काठमांडू से ल्हासा:* काठमांडू से ल्हासा के लिए उड़ान भरें या बस/टैक्सी से यात्रा करें।

2. *ल्हासा से शिगात्से:* ल्हासा से शिगात्से के लिए बस या टैक्सी से यात्रा करें।

3. *शिगात्से से सर्का:* शिगात्से से सर्का के लिए बस या टैक्सी से यात्रा करें, जो कैलाश पर्वत के पास है।




*भारतीय मार्ग:*


1. *दिल्ली से लिपुलेख:* दिल्ली से लिपुलेख पास के लिए यात्रा करें, जो भारत-चीन सीमा पर है।

2. *लिपुलेख से टकलाकोट:* लिपुलेख से टकलाकोट के लिए यात्रा करें, जो कैलाश पर्वत के पास है।





*यात्रा के लिए आवश्यक दस्तावेज:*


- पासपोर्ट

- वीजा (चीन और तिब्बत के लिए अलग-अलग वीजा की आवश्यकता हो सकती है)

- स्वास्थ्य प्रमाण पत्र

- यात्रा बीमा


*यात्रा के लिए तैयारी:*


- उच्च ऊंचाई के लिए तैयारी करें

- ठंड के मौसम के लिए कपड़े और उपकरण लें

- स्थानीय गाइड और पोर्टर की व्यवस्था करें

- यात्रा के नियमों और शर्तों का पालन करें


यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि कैलाश पर्वत की यात्रा करना एक चुनौतीपूर्ण काम है, और इसके लिए अच्छी तैयारी और योजना की आवश्यकता होती है।

कैलाश पर्वत की यात्रा के लिए व्यय कई कारकों पर निर्भर करता है, जैसे कि यात्रा का मार्ग, रहने की व्यवस्था, खाने की व्यवस्था, और यात्रा के लिए आवश्यक उपकरण और सेवाएं। यहाँ कुछ अनुमानित व्यय हैं:


*भारत से यात्रा करने वालों के लिए:*


- *दिल्ली से लिपुलेख पास:* ₹5,000 से ₹10,000 तक (ट्रांसपोर्ट और अन्य खर्चे)

- *लिपुलेख से टकलाकोट:* ₹3,000 से ₹6,000 तक (ट्रांसपोर्ट और अन्य खर्चे)

- *टकलाकोट से कैलाश पर्वत:* ₹2,000 से ₹4,000 तक (ट्रांसपोर्ट और अन्य खर्चे)

- *रहने और खाने का खर्च:* ₹5,000 से ₹10,000 तक (पूरी यात्रा के लिए)

- *कुल खर्च:* ₹15,000 से ₹30,000 तक


*नेपाल से यात्रा करने वालों के लिए:*


- *काठमांडू से ल्हासा:* ₹20,000 से ₹40,000 तक (उड़ान और अन्य खर्चे)

- *ल्हासा से शिगात्से:* ₹5,000 से ₹10,000 तक (बस या टैक्सी)

- *शिगात्से से सर्का:* ₹3,000 से ₹6,000 तक (बस या टैक्सी)

- *रहने और खाने का खर्च:* ₹10,000 से ₹20,000 तक (पूरी यात्रा के लिए)

- *कुल खर्च:* ₹38,000 से ₹76,000 तक


*अन्य खर्चे:*


- *वीजा शुल्क:* ₹5,000 से ₹10,000 तक

- *यात्रा बीमा:* ₹2,000 से ₹5,000 तक

- *उपकरण और सेवाएं:* ₹2,000 से ₹5,000 तक


यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ये अनुमानित व्यय हैं और वास्तविक व्यय कई कारकों पर निर्भर करेगा।


गुरुवार, 10 अप्रैल 2025

#TBHQ का अर्थ है #टर्ट-ब्यूटिलहाइड्रोक्विनोन (Tertiara Butylhydroquinone)👇 के हानिकर प्रभाव

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टर्ट-ब्यूटिलहाइड्रोक्विनोन
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 👉#TBHQ का अर्थ है #टर्ट-ब्यूटिलहाइड्रोक्विनोन (Tertiara

 Butylhydroquinone)👇

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 यह एक प्रकार का एंटीऑक्सीडेंट है जो खाद्य पदार्थों में उपयोग किया जाता है जिससे कि उनकी गुणवत्ता और सुरक्षा को बनाए रखा जा सके।

घर का स्वास्थ्यदायक भोजन 


TBHQ का उपयोग खाद्य उद्योग में व्यापक रूप से किया जाता है, विशेष रूप से तेल और वसा युक्त खाद्य पदार्थों में। इसका मुख्य उद्देश्य खाद्य पदार्थों के ऑक्सीकरण को रोकना है, जिससे उनकी गुणवत्ता और सुरक्षा बनी रहती है।


TBHQ के कुछ मुख्य उपयोग हैं:


1. *खाद्य पदार्थों की सुरक्षा*: TBHQ खाद्य पदार्थों में ऑक्सीकरण को रोकता है, जिससे उनकी गुणवत्ता और सुरक्षा बनी रहती है।

2. *तेल और वसा की गुणवत्ता*: TBHQ तेल और वसा युक्त खाद्य पदार्थों में ऑक्सीकरण को रोकता है, जिससे उनकी गुणवत्ता बनी रहती है।

3. *भोजन की शेल्फ लाइफ*: TBHQ खाद्य पदार्थों की शेल्फ लाइफ को बढ़ाता है, जिससे वे अधिक समय तक सुरक्षित और ताज़ा रहते हैं।


हालांकि, TBHQ के उपयोग के बारे में कुछ चिंताएं भी हैं। कुछ अध्ययनों में यह पाया गया है कि TBHQ के अधिक सेवन से स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, जैसे कि कैंसर और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं। इसलिए, खाद्य पदार्थों में TBHQ के उपयोग को नियंत्रित करने के लिए नियम और मानक बनाए गए हैं।

👉TBHQ के संभावित हानिकारक प्रभाव निम्नलिखित हैं:👇


1. *कैंसर की संभावना*: कुछ अध्ययनों में यह पाया गया है कि TBHQ के अधिक सेवन से कैंसर का संभावना बढ़ सकती है, विशेष रूप से पेट और फेफड़ों के कैंसर का।

2. *न्यूरोटॉक्सिसिटी*: TBHQ के अधिक सेवन से न्यूरोटॉक्सिसिटी का जोखिम हो सकता है, जिससे मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

3. *हार्मोनल असंतुलन*: TBHQ के अधिक सेवन से हार्मोनल असंतुलन हो सकता है, जिससे शरीर के विभिन्न कार्यों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

4. *प्रजनन समस्याएं*: कुछ अध्ययनों में यह पाया गया है कि TBHQ के अधिक सेवन से प्रजनन समस्याएं हो सकती हैं, जैसे कि बांझपन और गर्भपात की संभावना।

5. *एलर्जी और संवेदनशीलता*: कुछ लोगों में TBHQ से एलर्जी या संवेदनशीलता हो सकती है, जिससे त्वचा पर चकत्ते, कण्डू या खुजली और अन्य लक्षण हो सकते हैं।

6. *पाचन समस्याएं*: TBHQ के अधिक सेवन से पाचन समस्याएं हो सकती हैं, जैसे कि उदर शूल, अतिसार या डायरिया और वमन या उल्टी।

7. *यकृत और वृक्क या किडनी की समस्याएं*: कुछ अध्ययनों में यह पाया गया है कि TBHQ के अधिक सेवन से यकृत और वृक्क या किडनी की समस्याएं हो सकती हैं।

THBQ वसा से युक्त भोजन थाली 

आम के ऊपर वैक्स नामक वसा का लेपन, जिससे वे सुन्दर और ताजे फल दिखें 








यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि TBHQ के हानिकारक प्रभावों के सम्बन्ध में अभी भी शोध चल रहा है, और अधिक ज्ञान की आवश्यकता है जिससे कि इसके प्रभावों को पूरी तरह से समझा जा सके।

*अन्ततः क्यों अचानक से हिन्दू युवाओं की हार्ट अटैक से मृत्यु की संख्या बढ़ गई है?  और कही आपके जान पहचान के मुस्लिम परिवारों मे भी इसी प्रकार की मृत्यु हो रही हो तो मेरे इस लेख हेतु मै क्षमाप्रार्थी हूं।


 यह एक सुनियोजित षड्यंत्र है, आपको चाहिए कि होटलों में ढाबों पर कभी भी खाना न खाएं, यदि खाएं तो सावधानी अपनाएं।*


1. *क्योंकि देश-विरोधीयों द्वारा ढाबो पर तंदूरी परांठो के साथ सफेद मक्खन में पेट्रोलियम वैक्स भर-भर कर परोसा जा रहा है। ऐसा नकली सफेद मक्खन बहुत सस्ता मिल जाता है।*


2. *दाल मखनी में 45-59% क्रीम + बटर है जो अधिकतम इसी फर्जी फैट से बनती है। लेकिन यहां की जनता दर्जनों सब्जियां एक ओर व दाल मखनी अकेली एक ओर, प्रातः अल्पाहार, प्रातः भोजन, रात्रि या संध्या कालीन भोजन सब मे खाएंगे।*


3. *टॉप 5 Chef पर एक सर्वे किया गया जिसमें 4 अपनी ही दाल मखनी नही पहचान पाये। कारण: 45-50% क्रीम+ बटर के मिलने के उपरान्त सब एक जैसी बनती है।*

*यहां ये भी बताता आवश्यक है की ये क्रीम बटर से भरी दाल स्वास्थ्य के लिए केवल हानिकारक ही नही वरन् "unsafe" फ़ूड है।*🫢


4. *सुंदर चॉकलेट की कोटिंग पेट्रोलियम इंडस्ट्री से निकले पैराफिन वैक्स से की जाती है जिससे कि वो दीर्घकाल तक पिंघले नही व चिकनी चमकदार दिखे।*


5. *एक जैसा टेस्ट बनाये रखने के लिए वनीला आइस क्रीम फ्लेवर, बादाम फ्लेवर, लेमन फ्लेवर पेट्रोलियम पदार्थों से बनाये जा रहे है।*


6. *सेब, किन्नू आदि को ताजा रखने के लिए पेट्रोलियम रिफाइनरी से निकले ओलेस्त्रा/वैक्स यूज़ होता है।* 

7. *फ्रोजन items, पिज़्ज़ा, बिस्कुट, कॉर्न चिप्स, पॉपकॉर्न में अति सस्ता पड़ने के कारण चिकना पेट्रोलियम पदार्थ TBHQ मिलाया जाता है।*


8. *2013 में भारत मे कुकिंग आयल व घी में मिनरल आयल (पेट्रोलियम चिकनाई) पकड़ी गई थी। मिनरल आयल मिलाने से आपका वनस्पति तेल से बना घी कई वर्षों भी अशुद्ध नही होगा। आटा, अंडे, दूध, चीनी से बने पदार्थ तेजी से अशुद्ध होते है। अब यदि कोई इनसे बनी मिठाई, बन, ब्रेड, कूकीज, केक आदि को हफ़्तों फ्रेश रखना चाहता है तो उसमें रिफाइनरी से निकला मिनरल आयल मिला दो। ऐसी चीजे शोरूम के शीशे के पीछे एक दम झक्कास फ्रेश व चमकदार दिखेगी।*


*यदि खाना घर का बना, मसाले घर लाकर पिसे गये, खाने का समान उत्पादक से खरीदा गया तो कुछ बच जाओगे। खाना, एजुकेशन, उपचार ये कभी भी व्यापारिक उत्पाद नही होने चाहिए ना ये प्राइवेट हाथों में होने चाहिये।*


*इस देश में मिलावट के विरुद्ध एक कानून Food adulteration Act 1954 में बना था जिसमें जो खाने का समान है उसके अतिरिक्त कुछ भी मिलने पर जेल होती थी।*

*उसे खाने की इंडस्ट्री के व्यापारियों से पैसे लेकर कांग्रेस की सरकार ने परिवर्तनकर 2006 में  फ़ूड सेफ्टी एक्ट करवा कर मिलावट के गेट खुलवा लिये।*जैसे कि,


*अब आपकी हल्दी में बेसन मिल गया तो ये adulterated तो है लेकिन सेफ्टी जोखिम में नही।*


*पहले काली मिर्च में पपीते के बीज मिलावट थे अब सेफ्टी को जोखिम नही तो सब चलेगा।*


*खाने में मिलावट मर्डर के बराबर मानी जानी चाहिये लेकिन अब मिलावटखोर कुछ भी मिलाए बस येन केन प्रकारेण उसे सेफ सिद्ध करके कुछ भी मिलाये, यहां सब चलता है। स्मरण रखना यदि आपका खाना किसी के व्यापार का प्रोडक्ट है तो कोई व्यापारी कम नही कमाना चाहता चाहे आप या आपके बच्चे भले ही मर जाये।*

यह एक गंभीर विषय है जो खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है। इसमें कई महत्वपूर्ण बिंदु उठाए गए हैं जो खाद्य पदार्थों में मिलावट और उनके हानिकारक प्रभावों के बारे में बताते हैं।


कुछ महत्वपूर्ण बिंदु हैं:


1. *खाद्य पदार्थों में मिलावट*: इसमें बताया गया है कि कई खाद्य पदार्थों में मिलावट की जा रही है, जैसे कि दाल मखनी में क्रीम और बटर की मिलावट, चॉकलेट में पेट्रोलियम वैक्स की मिलावट, और फलों पर वैक्स की मिलावट।

2. *हानिकारक प्रभाव*: इसमें बताया गया है कि इन मिलावटों के कारण स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ सकते हैं, जैसे कि हार्ट अटैक, कैंसर, और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं।

3. *खाद्य सुरक्षा कानून*: इसमें बताया गया है कि खाद्य सुरक्षा कानूनों में बदलाव के कारण मिलावटखोरों को बढ़ावा मिला है, और अब मिलावटखोर कुछ भी मिलाए बिना किसी भी प्रकार के दण्ड से बच सकते हैं।


यह एक महत्वपूर्ण विषय है जिस पर ध्यान देने की आवश्यकता है। हमें अपने खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए काम करना चाहिए, और मिलावटखोरों के विरुद्ध कार्रवाई करनी चाहिए और सुरक्षित रहने के लिए घर में ही बने भोज्य पदार्थों का अधिकतम उपयोग करें।

डॉ त्रिभुवन नाथ श्रीवास्तव, पूर्व प्राचार्य, विवेकानंद योग प्राकृतिक चिकित्सा महाविद्यालय एवम् चिकित्सालय, बाजोर, सीकर, राजस्थान।



TBHQ का प्रयोग हुआ है।

                   TBHQ से युक्त रेस्टोरेंट का भोजन 






मंगलवार, 25 मार्च 2025

# भारतीय विवाह में सात#अग्नि की प्रदक्षिणा ही क्यों लेते हैं? और 7 अंक का जीवन में महत्व 🌳*

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विवाह समय स्थापित शुभ कलश 




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                        *🙏राम राम सा🙏*


👉*🌳 भारतीय विवाह में अग्नि की सात प्रदक्षिणा ही क्यों लेते हैं? और 7 अंक का जीवन में महत्व 🌳*👇


👉सनातन वैदिक हिन्दू विवाह के समय अग्नि के समक्ष सात प्रदक्षिणा ही क्यों लेते हैं? दूसरा यह कि क्या प्रदक्षिणा लेना आवश्यक है? 


👉पाणिग्रहण का अर्थ : - 

पाणिग्रहण संस्कार को सामान्य रूप से 'विवाह' (VIVAH)के नाम से जाना जाता है। वर द्वारा नियम और वचन स्वीकारोक्ति के उपरान्त कन्या अपना हाथ वर के हाथ में सौंपे और वर अपना हाथ कन्या के हाथ में सौंप दे। इसी प्रकार एक दूसरे का हाथ पकड़े हुए, सभी सम्मानित और संबंधियों की उपस्थिति में अग्नि के वैदिक मंत्रोच्चार के साथ सात प्रदक्षिणा (फेरे लें) करें, तो प्रकार दोनों एक-दूसरे का   शास्त्रोक्त पाणिग्रहण करते हैं। कालांतर में इस प्रथा को'कन्यादान' कहा जाने लगा।

 

वर और वधू द्वारा विवाह के समय यज्ञ करना 

सुहागिन द्वारा नववधू को सुहाग देते हुए 

अग्नि प्रदक्षिणा (फेरों )की पूर्व तैयारी 

👉नीचे लिखे मंत्र के साथ कन्या अपना हाथ वर की ओर बढ़ाए, वर उसे अंगूठा सहित (समग्र रूप से) पकड़ ले। भावना करें कि दिव्य वातावरण में परस्पर मित्रता के भाव सहित एक-दूसरे के उत्तरदायित्व को स्वीकार कर रहे हैं।👇

 

🪷ॐ यदैषि मनसा दूरं, दिशोऽनुपवमानो वा।🪷

🪷हिरण्यपणोर्वैकर्ण, स त्वा मन्मनसां करोतु असौ।।🪷 

-पार.गृ.सू. 1.4.15

👉अन्य वैदिक प्रमाण,👇

विवाह में सात प्रदक्षिणा लेने की परंपरा के और भी कई शास्त्रोक्त प्रमाण हैं। यहाँ कुछ और प्रमाण दिए गए हैं,


👉# मनुस्मृति

मनुस्मृति में कहा गया है:


🪷"सप्तपदीभिरेतस्या मिथुनं स्यात्।"🪷


अर्थात्, "सात प्रदक्षिणा लेने से पति-पत्नी का मिथुन बन जाता है।"


👉# याज्ञवल्क्य स्मृति

याज्ञवल्क्य स्मृति में कहा गया है:


🪷"सप्तपदीभिर्गमनं तु वैवाहिकं संस्कारम्।"🪷


👉अर्थात्, "सात प्रदक्षिणा लेना वैवाहिक संस्कार है।"


👉# आश्वलायन गृह्यसूत्र

आश्वलायन गृह्यसूत्र में कहा गया है:


🪷"सप्तपदीभिरेतस्या मिथुनं स्यात्, त्रिरात्रं वा पंचरात्रं वा।"🪷


👉अर्थात्, "सात प्रदक्षिणा लेने से पति-पत्नी का मिथुन बन जाता है, और यह तीन रात या पांच रात तक चलता है।"


👉# अथर्ववेद

अथर्ववेद में कहा गया है:


🪷"सप्तपदीभिर्गमनं तु वैवाहिकं संस्कारम्।"🪷


👉अर्थात्, "सात प्रदक्षिणा लेना वैवाहिक संस्कार है।"


👉# ऋग्वेद

ऋग्वेद में कहा गया है:


🪷"सप्तपदीभिरेतस्या मिथुनं स्यात्।"🪷


👉अर्थात्, "सात प्रदक्षिणा लेने से पति-पत्नी का मिथुन बन जाता है।"


👉# तैत्तिरीय संहिता

तैत्तिरीय संहिता में कहा गया है:


🪷"सप्तपदीभिर्गमनं तु वैवाहिकं संस्कारम्।"🪷


👉अर्थात्, "सात प्रदक्षिणा लेना वैवाहिक संस्कार है।"


👉# गर्ग संहिता

गर्ग संहिता में कहा गया है:


🪷"सप्तपदीभिरेतस्या मिथुनं स्यात्।"🪷


👉अर्थात्, "सात प्रदक्षिणा लेने से पति-पत्नी का मिथुन बन जाता है।"


👉# पराशर स्मृति

पराशर स्मृति में कहा गया है:


🪷"सप्तपदीभिर्गमनं तु वैवाहिकं संस्कारम्।"🪷


👉अर्थात्, "सात प्रदक्षिणा लेना वैवाहिक संस्कार है।"


इन शास्त्रोक्त प्रमाणों से यह स्पष्ट होता है कि विवाह में सात प्रदक्षिणा लेने की परंपरा सनातन वैदिक हिंदू धर्म में अत्यधिक महत्वपूर्ण है।

 

माता पिता द्वारा कन्या को वर को समर्पित करने का पूजन 



यज्ञ अग्नि की सात प्रदक्षिणा लेते हुए वर और वधू 


सात, यज्ञ अग्नि की प्रदक्षिणा (फेरे) लेते हुए वधू और वर 

वधू और वर द्वारा यज्ञ अग्नि की प्रदक्षिणा करते हुए 

👉विवाह का अर्थ : - 

विवाह को शादी या मैरिज कहना अनुचित है। विवाह का कोई समानार्थी शब्द नहीं है। सोशल मीडिया, समाचार पत्र में विवाह को शादी ही लिखा जा रहा है जो सर्वथा अनुचित है। 

🪷विवाह= वि+वाह, अत: इसका शाब्दिक अर्थ है- विशेष रूप से  उत्तरदायित्व का वहन करना।🪷


👉विवाह एक संस्कार : -👇

 अन्य धर्मों में विवाह पति और पत्नी के बीच एक प्रकार का वचन होता है जिसे कि विशेष परिस्थितियों में तोड़ा भी जा सकता है, लेकिन सनातन वैदिक धर्म में विवाह  भली-भांति सोच- समझकर किए जाने वाला संस्कार है। इस संस्कार में वर और वधू सहित सभी पक्षों की सहमति लिए जाने की प्रथा है। हिन्दू विवाह में पति और पत्नी के बीच शारीरिक संबंध से अधिक आत्मिक संबंध होता है और इस संबंध को अत्यंत पवित्र माना गया है।

 

👉सात फेरे या सप्तपदी :  -👇

 सनातन वैदिक धर्म में 16 संस्कारों को जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अंग माना जाता है। विवाह में जब तक 7 अग्नि की प्रदक्षिणा या फेरे नहीं हो जाते, तब तक विवाह संस्कार पूर्ण नहीं माना जाता। न एक फेरा कम, न एक अधिक। इसी प्रक्रिया में दोनों 7 प्रदक्षिणा लेते हैं जिसे 'सप्तपदी' भी कहा जाता है। ये सातों फेरे या पद 7 वचन के साथ लिए जाते हैं। हर प्रदक्षिणा का एक वचन होता है जिसे पति-पत्नी जीवनभर साथ निभाने का वचन देते हैं। ये 7 फेरे ही सनातन वैदिक हिन्दू विवाह की स्थिरता का मुख्य स्तंभ होते हैं। अग्नि के 7 प्रदक्षिणा लेकर और ध्रुव तारे को साक्षी मानकर दो तन, मन तथा आत्मा एक पवित्र बंधन में बंध जाते हैं। 

विवाह के समय कन्या अपने पति को ये सात वचन देती है, जो इस प्रकार से हैं 👇: 

👉तीर्थव्रतोद्यापन यज्ञकर्म मया सहैव प्रियवयं कुर्या।

👉वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति वाक्यं प्रथमं कुमारी।

👉हव्यप्रदानैरमरान् पितृश्चं।

👉कुटुम्बरक्षाभरंणं यदि त्वं।

👉आयं व्ययं धान्यधनादिकानां।

👉देवालयारामतडागकूपं।

👉देशान्तरे वा स्वपुरान्तरे वा।

👉न सेवनीया परिकी यजाया।

इन वचनों को निभाने का निर्णय करने के उपरान्त ही कन्या अपने पति को अपना स्वीकार करती है। इन वचनों के साक्षी स्वयं अग्नि देव और स्वयं श्री हरि भगवान होते हैं।

👉इन वचनों का अर्थ :👇 

कन्या अपने पति से वचन लेती है कि वह अब उसके धर्म और कर्म की साथी होगी।

👉कन्या अपने पति से कहती है कि वह जिस प्रकार अपने माता-पिता और संबंधियों का आदर करता है, उसी प्रकार उसके माता-पिता का भी सम्मान करे।

👉कन्या अपने पति से कहती है कि अब से वह उसकी जीवनसंगिनी है और वह इस साथ को जीवन भर निभाएगा।

 👉विवाह के समय वर, कन्या से ये वचन मांगता है: 👇

👉आप पतिव्रत धर्म का पालन करेंगी।

👉आप मेरे परिवार के लोगों का सम्मान करेंगी।

👉आप मेरे धार्मिक और सामाजिक कार्यों में सहयोग करेंगी।

👉आप मेरे परिवार की बातें किसी दूसरे से नहीं कहेंगी।

👉आप अपना व्यय आदि मेरी आर्थिक स्थिति के अनुसार करेंगी।

👉आप रोगावस्था और अन्य समस्याओं के समय मेरी सेवा करेंगी।

👉आप मेरे व्यक्तिगत कामों और पारिवारिक उत्सवों में मेरा सहयोग करेंगी।

👉विवाह के समय वर-वधू अग्नि की सात प्रदक्षिणा लेते हैं। इसे ही सप्तपदी कहते हैं। अग्नि को साक्षी मानकर वर और वधू 7 प्रदक्षिणा के साथ 7 वचन का पालन करने का संकल्प लेते हैं।

👉अब जानें वधू के अपनी ससुराल आ जाने पर किस प्रकार से अधिकार स्वतः मिलने लगते हैं। जिसे वेद की ऋचाओं में इस प्रकार लिखा गया है 👇👰‍♀"वधू" को- "गृहलक्ष्मी"👸 बनाएं*दासी नहीं।।

👉*शास्त्रकारों ने वधू को पति- कुल की दासी नहीं "साम्राज्ञी" कहा है। ऋग्वेद का एक मन्त्र है:*

          🪷*साम्राज्ञी श्वशुरम् भव, साम्राज्ञी श्वश्रूवाँ भव।* 

          *ननान्दरि सम्राज्ञी भव, सम्राज्ञी अधि देवसु।*🪷


👉*अर्थात्-ससुर,सास, ननद, देवर आदि पर शासन कर सकने वाली बनो।*

👉*इसी अभिप्राय को व्यक्त करने वाला अथर्ववेद का एक मन्त्र है:*👇


          🪷 *यथा सिन्धुर्न दीनाँ साम्राज्यं सुसवे वृषा।* 

           *साम्राज्ञोधि श्वसुरेषु सम्राज्ञयेतु देवृषु॥*🪷


 👉*अर्थात्-अमृत वर्षा करने वाला समुद्र जिस प्रकार नदियों के आश्रित रहता है- उसी प्रकार तुम (वधू) पति गृह जाओ और वहाँ साम्राज्ञी बन कर रहो।*

👉*साम्राज्ञी बनने का अर्थ यहाँ अधिकार जताने,अंकुश लगाने, शासन चलाने या प्रताड़ना देने से नहीं वरन् कर्तव्य और प्रेम के आधार पर अपने सद्गुणों से सब का मन अपने वश में कर लेने से है।* 

👉*अधिकार के शासन में- आये दिन विद्रोह खड़े होते रहते हैं- और सत्ताधीशों को पदच्युत होते देर नहीं लगती,पर कर्तव्य पालन प्रेम, उदारता सेवा के आधार पर स्थापित किए हुए शासन की नींव अधिक गहरी होती है। शासित स्वेच्छापूर्वक स्नेह बन्धनों में बंधे रहते हैं। उनसे छूटने की इच्छा करना तो दूर पकड़ में अल्प सी शिथिलता आते देख कर भी विचलित होने लगते हैं।*

 👉*यह शासन ऐसा है जिसमें माता के आधिपत्य में रहने से बालक कभी  अनसुना नहीं करता। प्रताड़ना देने पर भी उसी से लिपटता है- और उपेक्षा देख कर उदास हो जाता है।*

👉*पति और पत्नी के बीच का शासन भी ऐसा ही है- वह दासी और स्वामी जैसा नहीं वरन् स्वेच्छा समर्पण पर आधारित होता है- और उभयपक्षीय चलता है। पत्नी अपने को पति का आश्रित मानती है- और पति का मन भी ठीक उसी प्रकार पत्नी का शासन स्वीकार करता है। इसमें आधिपत्य का आग्रह कोई नहीं करता वरन् दोनों ही एक दूसरे से शासित रहने के कारण एक दूसरे को स्वामी अनुभव करते हैं।*

👉*यहाँ भक्त और भगवान जैसी स्थिति होती है। अपने को "सर्वतोभावेन" ,ईश्वर के प्रति समर्पित करने वाला अनुभव करता है- कि ईश्वर ने अपने को भक्त के लिए समर्पित कर दिया है।*

👉*मीरा, सूर, नरसी, सुदामा आदि सच्चे भक्तों का सेवकत्व भगवान ने स्वीकार किया था, यह एक तथ्य है। दाम्पत्य जीवन में पत्नी अपने को दासी और पति को स्वामी घोषित करती है। घोषणा से न सही व्यवहार में पति भी ठीक उसी स्तर की मान्यता रखता है। ऐसा ही उभयपक्षीय सघन स्नेह- सौजन्य होने पर मित्रता निभती है- और दाम्पत्य जीवन का चरम सुख उपलब्ध होता है।*


👉*मात्र पति की ही नहीं उस पूरे परिवार को वधू अपने सद्भाव बन्धनों में बाँध लेती है, और इस अपेक्षा में उन सब का सघन सौजन्य प्राप्त करती है। इस स्थिति में दोनों पक्ष एक दूसरे के वशवर्ती बन जाते हैं। वधू संलग्न रहती है। अपने सद्गुणों से सब को मोहित किये रहती है। फलस्वरूप अनायास ही अनपेक्षित शासनसत्ता उसके हाथ में आ जाती है। वह सब को अपनी उंगली के संकेत पर नचाती है। सब उसका कहना मानते हैं। यह सब किसी चमत्कार या अधिकार के आधार पर नहीं वरन् स्नेह सौजन्य भरे सेवा भाव द्वारा संभव होता है। वधू को इसी प्रकार की शासनसत्ता ग्रहण करने और साम्राज्ञी पद की अधिकारिणी बनने के लिए कहा गया है।*

👉*ऐसी स्थिति प्राप्त करने के लिए- सरस्वती जैसी उदात्त दूरदर्शिता अपनाने की आवश्यकता है- वधू को यही स्तर प्राप्त करने के लिए कहा गया है।*    

👉*अथर्ववेद की एक ऋचा है:*👇

     🪷*प्रतितिष्ठ विराडसि विष्णुरिदेह सरस्वति।*🪷

👉*अर्थात्- हे पत्नी! तू सरस्वती बन कर रह- और इस घर की प्रतिष्ठा को विकसित कर।

 👉*घर की प्रतिष्ठा सुगृहिणी पर निर्भर है इस अभिप्राय को व्यक्त करने वाला शतपथ ब्राह्मण का एक सूत्र है:*

             🪷 *गृहाः वै पत्न्ये प्रतिष्ठाः।*🪷

👉*अथर्ववेद में पत्नी के स्तर के अनुरूप ही पूरे परिवार की सदबुद्धि का बढ़ना घटना, निर्भर बताया गया है।*

🪷*“यास्ते राके सुगतयः सुपेशसोयाभिर्दददसि।”*🪷

*ऋचा का भावार्थ यही है।*👇

👉*ससुर के घर में रहते हुए- वधू अपनी स्थिति एवं अनुभूति को इस प्रकार व्यक्त करती है:*👇

      🪷*अह केतुरह मूर्धादमुग्रा विवाचनी।* 

      *भमेदनु क्रतु पतिः सहाना या उपाचरेत्॥*🪷


👉*अर्थात्-मैं इस घर में मस्तक के समान प्रमुख हूँ- मैं अपने पति के विचारों को प्रभावित करती हूँ। मैं उनके साथ विचारों का आदान- प्रदान करती हूँ। वे मुझे मान देते हैं- और सहयोग करते हैं। मेरी इच्छानुकूल व्यवहार करते हैं।*

 👉*इस प्रकार का सर्वोच्च सम्मान का पद और अधिकार पाने के लिए- नारी कोई राजकीय या सामाजिक व्यवस्था का सहारा नहीं लेती- वरन् अपनी योग्यता,कुशलता, व्यवस्था और दूरदर्शिता जैसे सद्गुणों के आधार पर उस पूरे परिवार की समुचित सेवा साधना करके- यह स्नेह और सम्मान भरा स्नेह अनायास ही प्राप्त कर लेती है।*

👉*इस स्तर की वधू जिस घर में हो- उसके सौभाग्य का सूर्योदय हुआ ही समझना चाहिए।*

 👉*उस घर में स्नेह, सौजन्य का,उल्लास- उत्साह की समृद्धि, प्रगति का वातावरण बना रहता है। उसमें रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपने आप को सुखी सन्तुष्ट अनुभव करता है।*

 👉*ऐसी पत्नी खोज करने पर कहीं भी बनी बनाई नहीं मिलती- वह गढ़ी जाती है।*

👉*पूर्वजन्मों के कुछ संस्कार लेकर आने वाला नवजात शिशु जिस घर में जन्म लेता है- वहाँ के संस्कारों के साथ अपने आपको घुलाता है।*    

👉*पिछले ओर नये संस्कारों के समन्वय से उसका व्यक्तित्व बनता है। ठीक इसी प्रकार पिता के घर से संस्कार लेकर आने वाली वधू ससुराल के वातावरण के साथ अपना समन्वय करती है और उसका नया व्यक्तित्व बनता है। इस नव-निर्माण में पति का सब से अधिक योगदान रहता है। वह पत्नी को पूर्ण विश्वास, आश्वासन, स्नेह एवं सहयोग प्रदान करे तो उसके स्वभाव एवं क्रिया-कलाप को उच्चस्तरीय ढाँचे में ढाल  सकता है। पितृ गृह से अच्छे स्वभाव की आई हुई लड़की भी पति गृह के अवाँछनीय वातावरण से खीज कर खिन्न, उदास एवं विद्रोही स्वभाव की बन सकती है। सुगृहिणी कदाचित ही बनी बनाई कहीं किसी को मिलती है। उसे गढ़ना और ढालना पड़ता है, इसके लिए पति को कुशल शिल्पी की भूमिका विशेष रूप से निबाहनी पड़ती है। यों इस प्रयास में सहयोग तो पूरे परिवार का अपेक्षित रहता है।*

👉 *विवाह के पुण्य पर्व पर पति अपनी पत्नी को विकासोन्मुख स्नेह, सहयोग का आश्वासन देते हुए कहता है:*👇

   🪷 *गृहणामि ते सौभ्गत्वाय हस्तं भया पत्या जरदष्ठिर्द्यथासः।* 

    *भगोर्यमा सविता पुरन्धिमह्य त्वा दुर्गाह पन्था देवाः।*🪷

👉*अर्थात्-भद्रे! इस पुण्य पर्व पर- मैं देवताओं की साक्षी में तुम्हारा हाथ अपने हाथ में लेता हूँ। आजीवन तुम्हारा सहयोगी बनकर रहूँगा। गृहस्थी के संचालन का उत्तरदायित्व तुम्हारे हाथ में सौंपता हूँ।*

👉 *पति- पत्नी को भार नहीं मानता- और न यह अहंकार करता है- कि वह उसका पालन-पोषण करेगा।*

 👉*जन्म देने वाला ओर पालन करने वाला तो परमेश्वर है।*

👉 *मनुष्य तो एक दूसरे के साथ कर्तव्य और सहयोग भरा सद्व्यवहार कर सके-  इतना ही उसके लिए बहुत है।*

 👉*पति एक सुयोग्य आत्मा का सहयोग पाकर- अपने आपको धन्य मानता है! और उस उपलब्धि से अपने को कृतकृत्य हुआ- अनुभव करता है। वह कहता है:*👇

🪷*अमोअमास्मि मात्वम् मात्वपास्ययोअहम्।* 

*समाहममास्तिम ऋक् त्वं द्योरह पृथ्वीत्वम्।*🪷

 👉*अर्थात्-तुम मूर्तिमान लक्ष्मी हो- "मैं तुम्हारे बिना एकाकी, अपूर्ण और दरिद्र था, भद्रे!*

 👉*अब हमारा सम्मिलित जीवन साम और स्वर के समान गुंजित होगा- और धरती तथा आकाश  के समान सुविस्तृत होगा।*

👉 *ऐसे घनिष्ठ सहयोग का सच्चा आश्वासन ही विवाह की सफलता का आधार बनता है। उसी विश्वास के आधार पर पत्नी के अन्तःकरण की कली खिलती है- और सुरभित पुष्प जैसे परिष्कृत व्यक्तित्व में परिणत होती है।*

*शास्त्रकार का कथन है:*

👉 यह दोहा रामचरितमानस से संबंधित है,👇


🪷"तवेहि विवहाव है सहरेती दधाव है।

तवेहि सहित जीवन है मुक्ति कै पाव है।"🪷

रामचरितमानस, बालकांड, दोहा २२👇


👉यह दोहा भगवान राम और सीता के विवाह के सम्बन्ध में बात करता है, और इसमें कहा गया है कि सीता का विवाह राम से हुआ है, और वह उनके साथ जीवन भर रहने वाली है।

👉कृपया ध्यान दें कि यह श्लोक रामचरितमानस के एक विशिष्ट संस्करण से लिया गया है, और इसमें थोड़े भिन्नता हो सकती है।

👉*अर्थात्-दाम्पत्य जीवन में बंधी हुई आत्माएं कभी एक दूसरे से विलग नहीं।*

👉*मतभेद और असन्तोष उत्पन्न करने वाले कारण सहजीवन में आते ही रहते हैं।*

👉*उन्हें विचार विनिमय से सुलझाया जाय- और जो न सुलझ सके- उन्हें सहिष्णुता पूर्वक सहन किया जाय!। पर यह न सोचा जाय- कि किन्हीं छोटे बड़े मतभेदों के कारण एक दूसरे का साथ छोड़ देंगे।*

 👉*दिये हुए विश्वास और वचन की रक्षा हर अवस्था में होनी चाहिए।*

 👉*मित्र के लक्षण ही यह हैं- कि गुणों पर ध्यान दें- और अवगुणों को सुधारते-सहन करते किसी प्रकार गाड़ी को आगे धकेलता रहे।*

👉*पूर्ण गुणवान तो केवल परमात्मा है, मनुष्य में कुछ तो त्रुटियाँ रहती हैं। सर्वगुण सम्पन्न होने की अपेक्षा करना और किंचित से दोष को भी सहन न करना- ऐसी भूल है जिसके कारण खाई उत्पन्न होती रहती है और दाम्पत्य जीवन निरानन्द बन जाता है।*

 👉*विवाह की सफलता का आधार,आत्मीयता का गहरा सम्पुट ही हो सकता है। जहाँ दो शरीरों में एक आत्मा रहने की भावना होगी, वहाँ एक दूसरे के दोष दुर्गुणों को सुधारते-सहते उस स्नेह सौजन्य को सीचेंगे जिसके सहारे पारस्परिक विश्वास अटल रहता है और ममत्व निरन्तर सघन होता चला जाता है।*

 👉*इन्हीं भावनाओं की निरन्तर अभिवृद्धि के लिए विवाह के समय दोनों मिलकर भगवान से प्रार्थना करते हैं, देखें सूत्र में-*

     🪷 *ते सन्तु जरदष्टयः सम्प्रियी रोगिष्ण सुमनस्य मानी।*🪷

👉*अर्थात्-हम एक दूसरे को अत्यन्त सौंदर्य युक्त देखें। परस्पर भरपूर प्रेम बंधनों से बंधे रहें। हम एक दूसरे का मंगल ही चाहें।*

👉 *सुगृहिणी किसी परिवार का सबसे बड़ा सौभाग्य है।

 👉*उसी आधारशिला पर वे भव्य भवन खड़े होते हैं- जिनमें निवास करते हुए परिवार का प्रत्येक सदस्य स्वर्गिक आनन्द का अनुभव करता है।*

👉*वधू मात्र अपने पति की पत्नी ही नहीं होती वरन् वह पुत्रवधू, देवरानी,जिठानी, भावज,चाची आदि भी होती है- और समय अनुसार उसे मामी, नानी, सास, माता, दादी भी बनना पड़ता है।*

👉*इन संबन्धों के माध्यम से वह सम्बन्धित अनेक व्यक्तियों को प्रभावित करती है- यह प्रभाव यदि उच्चकोटि का हो- तो उसे उन सभी के चरित्र एवं व्यक्तित्वों को सुसंस्कृत बनने का अवसर मिलता है। सुगृहिणी का भाव भरा मानसिक स्तर संपर्क क्षेत्र की परिधि में आने वाले हर किसी के व्यक्तित्व को सींचता है और उसे सुविकसित बनाने में सहज अनुदान देता है।*

👉*खीज और खिन्नता ने जिसकी सक्रियता नष्ट की होगी- वह गृहणी अपनी गति-विधियों से घर की आर्थिक स्थिति कको इस प्रकार संभाले रहती है- जिसमें स्वल्प आजीविका रहते हुए भी दरिद्रता का अनुभव न हो।*

👉*सुरुचिपूर्ण दृष्टिकोण और स्फूर्ति उत्साह के समन्वय से घर की व्यवस्था और सुसज्जा देखने योग्य ही बनी रहती है।*

   👉*बच्चों से लेकर वृद्धों तक उससे सम्मान और सहयोग पाकर कृतकृत्य बने रहते हैं। पति के लिए तो दो शरीरों में दो मस्तिष्क और दो हृदयों की मिली-जुली शक्ति का असीम आनन्द और अनुपम लाभ प्राप्त करने का सौभाग्य मिलता है, पर यह सौभाग्य मिलता उन्हीं को है- जो वधू को समुचित स्नेह, सम्मान एवं सहयोग देकर उसका हृदय जीतते हैं! और उस स्थान पर प्रतिष्ठित करते हैं- जहाँ पहुँचने पर कोई भी विचारशील लड़की गृहलक्ष्मी सिद्ध हो सकती है।*

 👉*ऐसी सुगृहिणी किसी को बनी बनाई नहीं मिलती वह प्रयत्न पूर्वक बनानी पड़ती है।*


👉सात अंक का महत्व...👇

 

ध्यान देने योग्य बात है कि भारतीय संस्कृति में 7 की संख्या मानव जीवन के लिए बहुत विशिष्ट मानी गई है। जैसे कि 👇

👉संगीत के 7 सुर,   स रे ग म प ध नि 

👉इंद्रधनुष के 7 रंग, लाल, नारंगी, पीला, हरा, नीला, आकाशी, बैंगनी.

👉7 ग्रह, 👇

सात ग्रहों के नामों का उल्लेख करने वाले श्लोक निम्नलिखित हैं:


"सूर्यः चंद्रः मंगलः बुधः बृहस्पतिः शुक्रः शनिः।

एते सप्त ग्रहाः प्रोक्ताः पूर्वे वेदेषु विश्रुताः।"


अर्थात्, "सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि - ये सात ग्रह पूर्व में वेदों में प्रसिद्ध हैं।"


यह श्लोक ज्योतिष शास्त्र से लिया गया है और सात ग्रहों के नामों का उल्लेख करता है।

👉7 तल, 

सनातन वैदिक धर्म में पाताल लोक सहित के सात तलों का उल्लेख किया गया है। यहाँ सात तलों के नाम और प्रमाणित श्लोक दिया गया हैं:


👉 सात तल👇

1. अतल

2. वितल

3. सुतल

4. रसातल

5. तलातल

6. महातल

7. पाताल


👉 श्लोक👇

👉"अतलं वितलं सुतलं रसातलं तलातलम्।

महातलं पातालं च सप्त तलाः पातालिकाः।"

👉 विष्णु पुराण, भाग 2, अध्याय 5👇


👉"अतले वितले सुतले रसातले तलातले।

महातले पाताले च सप्त तलाः पातालिकाः।"


👉 गरुड़ पुराण, भाग 1, अध्याय 6👇


😂7 समुद्र, 

सप्त समुद्र का उल्लेख  सनातन वैदिक धर्म के कई प्राचीन ग्रंथों में मिलता है, जिनमें से कुछ प्रमुख ग्रंथ हैं:


1. *विष्णु पुराण*: इसमें सप्त समुद्रों का उल्लेख इस प्रकार है: "लवणं च इक्षुसमुद्रः सुरासमुद्रः क्षीरसागरः। 

घृतसागरः दधिसागरः जलसागरः सप्तमः स्मृतः।"

2. *गरुड़ पुराण*: इसमें सप्त समुद्रों का उल्लेख इस प्रकार है: "लवण इक्षु सुरा घृत दधि क्षीर जलेति। 

सप्त समुद्राः प्रोक्ताः पूर्वे वेदेषु विश्रुताः।"

3. *महाभारत*: इसमें सप्त समुद्रों का उल्लेख इस प्रकार है: "लवणसागर इक्षुसागर सुरासागर क्षीरसागर। 

घृतसागर दधिसागर जलसागर सप्तमः स्मृतः।"

4. *रामायण*: इसमें सप्त समुद्रों का उल्लेख इस प्रकार है:

 "लवण इक्षु सुरा घृत दधि क्षीर जलेति। 

सप्त समुद्राः प्रोक्ताः पूर्वे वेदेषु विश्रुताः।"


इन ग्रंथों में सप्त समुद्रों के नाम इस प्रकार हैं:


1. *लवण सागर* (उत्तरी महासागर)

2. *इक्षु सागर* (पूर्वी महासागर)

3. *सुरा सागर* (दक्षिणी महासागर)

4. *घृत सागर* (पश्चिमी महासागर)

5. *दधि सागर* (मध्य महासागर)

6. *क्षीर सागर* (उत्तर-पूर्वी महासागर)

7. *जल सागर* (विश्व महासागर)


👉7 ऋषि, 

सनातन वैदिक धर्म में सात ऋषियों का उल्लेख किया गया है, जिन्हें सप्त ऋषि कहा जाता है। यहाँ सात ऋषियों के नाम और प्रमाणित श्लोक दिए गए हैं:


# सप्त ऋषि मण्डल 

1. मरीचि

2. अत्रि

3. अंगिरा

4. पुलह

5. क्रातु

6. पुलस्त्य

7. वसिष्ठ


# श्लोक

"मरीचिरात्रिरङ्गिरा पुलहः क्रातु पुलस्त्यः।

वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषयः प्रोक्ताः पूर्वे वेदेषु।"


— विष्णु पुराण, भाग 2, अध्याय 4


"मरीच्यात्र्यङ्गिरसपुलहक्रातुपुलस्त्याः।

वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषयः सर्वे प्रजापतयः।"


— गरुड़ पुराण, भाग 1, अध्याय 5


👉सप्त लोक, 

सनातन वैदिक धर्म में सप्त लोकों का उल्लेख किया गया है, जो ब्रह्मांड के सात स्तरों को दर्शाते हैं। यहाँ सप्त लोकों के नाम और प्रमाणित श्लोक दिए गए हैं:


# सप्त लोक

1. भूलोक (पृथ्वी)

2. भुवर्लोक (वायुमंडल)

3. स्वर्लोक (स्वर्ग)

4. महार्लोक  (महास्वर्ग)

5. जनरलोक  (जनर्लोक)

6. तपोलोक (तपोलोक)

7. सत्यलोक  (सत्यलोक या ब्रह्मलोक)


# श्लोक

"भूलोकः भुवर्लोकः स्वर्लोकः महर्लोकः।

जनरलोकः तपोलोकः सत्यलोकः सप्तमः स्मृतः।"


विष्णु पुराण, भाग २, अध्याय ५


"भूलोके भुवर्लोके स्वर्लोके महर्लोके।

जनरलोके तपोलोके सत्यलोके महेश्वरः।"


 गरुड़ पुराण, भाग १, अध्याय ६


इन श्लोकों में सप्त लोकों के नामों का उल्लेख किया गया है। ये सप्त लोक हिंदू धर्म में ब्रह्मांड के सात स्तरों को दर्शाते हैं।

👉7 चक्र,

सनातन वैदिक धर्म में और योग ग्रन्थों में सप्त पवित्र चक्रों का उल्लेख किया गया है, जो मानव शरीर में स्थित होते हैं और आध्यात्मिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यहाँ सप्त पवित्र चक्रों के नाम और प्रमाणित श्लोक दिए गए हैं:


# सप्त पवित्र चक्र

1. मूलाधार चक्र

2. स्वाधिष्ठान चक्र

3. मणिपूर चक्र

4. अनाहत चक्र

5. विशुद्ध चक्र

6. आज्ञा चक्र

7. सहस्रार चक्र


# श्लोक

"मूलाधारं स्वाधिष्ठानं मणिपूरं अनाहतम्।

विशुद्धं आज्ञा सहस्रारं सप्त चक्राणि प्रोक्तानि।"


 विष्णु पुराण, भाग २, अध्याय १४


"मूलाधारे स्वाधिष्ठाने मणिपूरे अनाहते।

विशुद्धे आज्ञा सहस्रारे सप्त चक्राणि स्थितानि।"


गरुड़ पुराण, भाग १, अध्याय १४


योग ग्रन्थों अनुसार सप्त चक्रों का उल्लेख किया गया है, जो मानव शरीर में स्थित होते हैं और आध्यात्मिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यहाँ सप्त चक्रों के नाम और प्रमाणित श्लोक दिए गए हैं:


# श्लोक

"मूलाधारे कमलं स्वाधिष्ठाने विचिन्तयेत्।

मणिपूरे हृदयं तु अनाहते विचिन्तयेत्।

विशुद्धे कन्ठदेशे तु आज्ञायां भ्रूमध्यगे।

सहस्रारे पद्मे तु परं ब्रह्म विचिन्तयेत्।"


 योगशिक्षा उपनिषद्, अध्याय १


"मूलाधारे च कूलशिखा स्वाधिष्ठाने हृदयं मणिपूरे।

अनाहते कण्ठदेशे तु विशुद्धे भ्रूमध्यगे आज्ञा।।

सहस्रारे पद्मे तु ब्रह्मरन्ध्रे महाशून्यं यत्।।"


गोरक्ष शतक, सूत्र ४


 👉सूर्य के 7 घोड़े,

सनातन वैदिक धर्म में सप्त पवित्र घोड़ों का उल्लेख किया गया है, जो सूर्य देव के रथ को खींचते हैं। यहाँ सप्त पवित्र घोड़ों के नाम और प्रमाणित श्लोक दिए गए हैं:


# सप्त पवित्र घोड़े

1. हरि

2. हरीत

3. वाजि

4. वाम

5. आदिवाक

6. प्रसव

7. शुभ्र


# श्लोक

"हरिर्हरीतः वाजिश्च वामश्चादिवाक् प्रसवः।

शुभ्रः सप्तमः सूर्यस्य सप्ताश्वः प्रोक्ताः पूर्वे।"


विष्णु पुराण, भाग २, अध्याय १०


"हरिर्हरीतवाजीवामादिवाक्प्रसवशुभ्राः।

सप्ताश्वः सूर्यदेवस्य सप्त लोकेषु विश्रुताः।"


गरुड़ पुराण, भाग १, अध्याय ११


 👉सप्त रश्मि,


 सनातन वैदिक धर्म में सप्त रश्मियों का उल्लेख किया गया है, जो सूर्य देव की किरणों को दर्शाती हैं। यहाँ सप्त रश्मियों के नाम और प्रमाणित श्लोक दिए गए हैं:


# सप्त रश्मियां

1. क्रोध

2. क्षमा

3. दया

4. ज्ञान

5. वैराग्य

6. यम

7. नियम


# श्लोक

"क्रोधः क्षमा दया ज्ञानं वैराग्यं यमः नियमः।

सप्तैते रश्मयः सूर्यस्य प्रोक्ताः पूर्वे वेदेषु।"


 विष्णु पुराण, भाग २, अध्याय १०


"क्रोधः क्षमा दया ज्ञानं वैराग्यं यमः नियमः।

सप्तैते रश्मयः सूर्यस्य सप्त लोकेषु विश्रुताः।"


 गरुड़ पुराण, भाग १, अध्याय ११


👉सप्त धातु, 


सनातन वैदिक धर्म  और आयुर्वेद ग्रन्थ में सप्त धातुओं का उल्लेख किया गया है, जो शरीर के सात प्रमुख धातुओं को दर्शाती हैं। यहाँ शत्रोक्त प्रमाण अनुसार सप्त धातुओं के नाम और प्रमाणित श्लोक दिए गए हैं:


1. रस

2. रक्त

3. मांस

4. मेद

5. अस्थि

6. मज्जा और 

7. शुक्र

एक उपधातु आर्तव और कहा गया है।


# श्लोक

"रसो रक्तं मांसमेदः अस्थि मज्जा शुक्रं च।

सप्तैते धातवः प्रोक्ताः शरीरे सर्वदा स्थिताः।"


— चरक संहिता, शरीरस्थान, अध्याय ६


👉सप्त पुरी

सनातन वैदिक धर्म में सप्त पुरियों का उल्लेख किया गया है, जो भारत में स्थित सात पवित्र नगरों को दर्शाती हैं। यहाँ शत्रोक्त प्रमाण अनुसार सप्त पुरियों के नाम और प्रमाणित श्लोक दिए गए हैं:


1. अयोध्या

2. मथुरा

3. माया_ (वर्तमान में हरिद्वार के रूप में जाना जाता है)

4. काशी_ (वर्तमान में वाराणसी के रूप में जाना जाता है)

5. कांची_ (वर्तमान में कांचीपुरम के रूप में जाना जाता है)

6.  अवंतिका या उज्जयिनी_ (वर्तमान में उज्जैन के रूप में जाना जाता है)

7. द्वारावती_ (वर्तमान में द्वारिका के रूप में जाना जाता है)


# श्लोक

"अयोध्या मथुरा माया काशी कांची  अवंतिका।

द्वारावती च सप्तैते मोक्षदायिन्यः पुरीः।"


गरुड़ पुराण, भाग १, अध्याय ३८



👉सप्त पवित्र नदियां 

सनातन वैदिक धर्म में सप्त पवित्र नदियों का उल्लेख किया गया है, जो भारतीय उपमहाद्वीप में स्थित हैं। यहाँ सप्त पवित्र नदियों के नाम और प्रमाणित श्लोक दिए गए हैं:


# सप्त पवित्र नदियां

1. गंगा

2. यमुना

3. सरस्वती

4. नर्मदा

5. गोदावरी

6. कृष्णा

7. कावेरी


# श्लोक

"गंगा च यमुना चैव सरस्वती च नदी महा।

नर्मदा गोदावरी च कृष्णा कावेरी च सप्तमी।"


 विष्णु पुराण, भाग २, अध्याय ३


"गंगा यमुना सरस्वती नर्मदा गोदावरी।

कृष्णा कावेरी च सप्तैते नद्यः पुण्यदायकाः।"


गरुड़ पुराण, भाग १, अध्याय ६


👉7  नक्षत्र,

जो सप्त नक्षत्र हैं वहीं सप्त ऋषि मंडल कहलाते हैं।

 👉सप्त द्वीप,


सनातन वैदिक धर्म में सप्त द्वीपों का उल्लेख किया गया है, जो पृथ्वी के सात प्रमुख द्वीपों को दर्शाते हैं। इन सभी द्वीपों पर एक समय केवल वैदिक धर्म को मानने वाले लोगों का ही निवास था, अन्य कोई भी सम्प्रदाय, मज़हब, रिलिजन के लोग नहीं थे।यहाँ सप्त द्वीपों के नाम और प्रमाणित श्लोक दिए गए हैं,

1. जंबूद्वीप

2. प्लक्षद्वीप

3. शाल्मलद्वीप

4. कुशद्वीप

5. क्रौंचद्वीप

6. शाकद्वीप

7. पुष्करद्वीप


श्लोक

"जंबूः प्लक्षः शाल्मलः कुशः क्रौंचः शाकः पुष्करः।

एते सप्त द्वीपा लोके विष्णोः स्थानानि पुण्यानि।"


विष्णु पुराण, भाग २, अध्याय ४


"जंबूद्वीपं प्लक्षद्वीपं शाल्मलद्वीपं कुशद्वीपम्।

क्रौंचद्वीपं शाकद्वीपं पुष्करद्वीपं सप्तमम्।"


 गरुड़ पुराण, भाग १, अध्याय ५


👉7 दिन, 

सनातन वैदिक धर्म में सप्त दिवसों का उल्लेख किया गया है, जो सप्ताह के सात दिनों को दर्शाते हैं। यहाँ शुद्ध प्रमाण अनुसार सप्त दिवसों के नाम और प्रमाणित श्लोक दिए गए हैं:


1. रविवार

2. सोमवार

3.  भौम या मंगलवार

4. बुधवार

5. गुरुवार

6. शुक्रवार

7. शनिवार


 श्लोक

"अधिपतिर्दिनानां रात्रीनां च पतिर्निशा।

रविः सोमोऽनलश्च बुधः पुषा च शुक्रः।

शनिर्वसुदेवात्मजः सप्तैते दिवसाः स्मृताः।"


— महाभारत, वानपर्व, अध्याय २


👉मंदिर या मूर्ति की 7 परिक्रमा, आदि का उल्लेख किया जाता रहा है।


 सनातन वैदिक धर्म में सात प्रदक्षिणाओं का उल्लेख किया गया है, जो मंदिर या मूर्ति की परिक्रमा के समय की जाने वाली सात प्रकार की परिक्रमाओं को दर्शाती हैं। यहाँ सात प्रदक्षिणाओं के नाम और प्रमाणित श्लोक दिए गए हैं:


1. प्रदक्षिणा

2. संवाहिनी

3. संहारिणी

4. उत्सविनी

5. मोक्षदा

6. पुण्यदा

7. सर्वसिद्धिप्रदा


श्लोक

"प्रदक्षिणा संवाहिनी संहारिणी चोत्सविनी।

मोक्षदा पुण्यदा चैव सर्वसिद्धिप्रदा स्मृता।।"


स्कंद पुराण, काशी खंड, अध्याय १४


इसी प्रकार से मंदिर या मूर्ति की अर्चना का महत्व है। यहाँ ७ अर्चनाओ का उल्लेख किया जाता है:


# ७ अर्चना 

१. प्रदक्षिणा_ (मंदिर या मूर्ति की परिक्रमा)

२. परिक्रमा_ (मंदिर के चारों ओर घूमना)

३. दंडवत प्रनाम_ (मूर्ति के सामने दंडवत करना)

४. दर्शन_ (मूर्ति का दर्शन करना)

५. पूजा_ (मूर्ति की पूजा करना)

६. अर्चन_ (मूर्ति की आराधना करना)

७. विसर्जन_ (पूजा के बाद  मृदा निर्मित अस्थाई मूर्ति का विसर्जन करना)


👉उसी प्रकार जीवन की 7 क्रियाएं अर्थात-👇 

👉शौच, दंत धावन, स्नान, ध्यान, भोजन, वार्ता और शयन। 

👉7 प्रकार के अभिवादन अर्थात- माता, पिता, गुरु, ईश्वर, सूर्य, अग्नि और अतिथि। 

👉प्रातः काल 7 पदार्थों के दर्शन- गोरोचन, चंदन, स्वर्ण, शंख, मृदंग, दर्पण और मणि। 

👉7 आंतरिक अशुद्धियां- ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, लोभ, मोह, घृणा और कुविचार। उक्त अशुद्धियों को हटाने से मिलते हैं ये, 

👉7 विशिष्ट लाभ- जीवन में सुख, शांति, भय का नाश, विष से रक्षा, ज्ञान, बल और विवेक की वृद्धि। 


👉स्नान के 7 प्रकार- 👇

👉मंत्र स्नान, 

👉मौन स्नान, 

👉अग्नि स्नान, 

👉वायव्य स्नान, 

👉दिव्य स्नान, 

👉मसग स्नान और

👉 मानसिक स्नान। 

👉शरीर में 7 धातुएं हैं- रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मजा और शुक्र। 

👉7 गुण- विश्वास, आशा, दान, निग्रह, धैर्य, न्याय, त्याग। 

👉7 पाप- अभिमान, लोभ, क्रोध, वासना, ईर्ष्या, आलस्य, अति भोजन और 

👉7 उपहार- आत्मा के विवेक, प्रज्ञा, भक्ति, ज्ञान, शक्ति, ईश्वर का भय।

 

👉यही सभी ध्यान रखते हुए अग्नि के 7 प्रदक्षिणा लेने का प्रचलन भी है जिसे 'सप्तपदी' कहा गया है। वैदिक और पौराणिक मान्यता में भी 7 अंक को पूर्ण माना गया है। कहते हैं कि पहले 4 प्रदक्षिणा का प्रचलन था। मान्यता अनुसार ये जीवन के 4 पड़ाव- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतीक था। इसी कारण से विवाह की प्रक्रिया में ये सप्तपदी आवश्यक होती हैं। इनके बिना विवाह अपूर्ण कहा जाता है। यही ब्रम्ह विवाह होता है।

अन्य विवाहों के और प्रकार होते हैं जो सभी अस्थाई कहे जाते हैं जैसे,

 

सनातन वैदिक धर्म में अस्थाई विवाहों का उल्लेख किया गया है, जो  प्रचलित थे। जिन्हें समाज मान्य नहीं करता था।यहाँ अस्थाई विवाहों के नाम और प्रमाणित श्लोक दिए गए हैं:


अस्थाई विवाह

1. सहगमन

2. सहवास

3. संवास

4. व्रीहि-संवास

5. संवास-व्रीहि

6. प्राजापत्य

7. आश्रम_ (कुछ ग्रंथों में इसे अस्थाई विवाह माना गया है)


श्लोक

"सहगमनं सहवासः संवासः व्रीहि-संवासः।

संवास-व्रीहिः प्राजापत्यं आश्रमः सप्तमम्।"


 मनुस्मृति, अध्याय ३, श्लोक २


हमारे शरीर में ऊर्जा के 7 केंद्र हैं जिन्हें 'चक्र' कहा जाता है। ये 7 चक्र हैं- 👇

👉मूलाधार , सीवनी स्थान पर या (शरीर के प्रारंभिक बिंदु पर),

 👉स्वाधिष्ठान (गुदास्थान से कुछ ऊपर),

 👉मणिपुर (नाभि केंद्र), 

👉अनाहत (हृदय), 

👉विशुद्धि (कंठ),

👉 आज्ञा (ललाट, दोनों नेत्रों के मध्य में) और

 👉सहस्रार (शीर्ष भाग में जहां शिखा केंद्र) है।

 

यौगिक शरीर में स्थिति सप्त चक्र मण्डल 

👉उक्त 7 चक्रों से जुड़े हैं हमारे 7 शरीर 👇ये 7 शरीर हैं-

 👉स्थूल शरीर, 

👉सूक्ष्म शरीर,

👉 कारण शरीर, 

👉मानस शरीर, 

👉आत्मिक शरीर, 

👉दिव्य शरीर और

 👉ब्रह्म शरीर।

 

👉विवाह की सप्तपदी में उन शक्ति केंद्रों और अस्तित्व की परतों या शरीर के गहनतम रूपों तक तादात्म्य बिठाने करने का विधान रचा जाता है। विवाह करने वाले दोनों ही वर और वधू को शारीरिक, मानसिक और आत्मिक रूप से एक-दूसरे के प्रति समर्पण और विश्वास का भाव निर्मित किया जाता है।

 

👉मनोवैज्ञानिक स्तर से👇

दोनों को ईश्वर की शपथ के साथ जीवनपर्यंत तक दोनों से साथ निभाने का वचन लिया जाता है इसलिए विवाह की सप्तपदी में 7 वचनों का भी महत्व है।

 

👉सप्तपदी में,👇

 प्रथम पग भोजन व्यवस्था के लिए, 

दूसरा शक्ति संचय, आहार तथा संयम के लिए, 

तीसरा धन की प्रबंध व्यवस्था हेतु, 

चौथा आत्मिक सुख के लिए, 

पांचवां पशुधन संपदा हेतु, 

छठा सभी ऋतुओं में उचित रहन-सहन के लिए तथा अंतिम 

7वें पग में कन्या अपने पति का अनुगमन करते हुए सदैव साथ चलने का वचन लेती है तथा सहर्ष जीवनपर्यंत पति के प्रत्येक कार्य में सहयोग देने की प्रतिज्ञा करती है। 

 

             👉'मैत्री सप्तपदीन मुच्यते' 👇

अर्थात एकसाथ केवल 7 कदम चलने मात्र से ही दो अपरिचित व्यक्तियों में भी मैत्री भाव उत्पन्न हो जाता है अतः जीवनभर का संग निभाने के लिए प्रारंभिक 7 पदों की गरिमा एवं प्रधानता को स्वीकार किया गया है। 7वें पग में वर, कन्या से कहता है कि 'हम दोनों 7 पद चलने के पश्चात परस्पर सखा बन गए हैं।'

 

मन, वचन और कर्म के प्रत्येक तल पर पति-पत्नी के रूप में हमारा हर कदम एकसाथ उठे इसलिए आज अग्निदेव के समक्ष हम साथ-साथ 7 कदम रखते हैं। हम अपने गृहस्थ धर्म का जीवनपर्यंत पालन करते हुए एक-दूसरे के प्रति सदैव एकनिष्ठ रहें और पति-पत्नी के रूप में जीवनपर्यंत हमारा यह बंधन अटूट बना रहे तथा हमारा प्रेम 7 समुद्रों की भांति विशाल और गहरा हो।

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