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कैलाश पर्वत एक पवित्र और रहस्यमय पर्वत है, जो तिब्बत में स्थित है। यह हिंदू, बौद्ध और जैन धर्मों में बहुत महत्व रखता है।
*स्थिति:*
कैलाश पर्वत तिब्बत के स्वायत्त क्षेत्र में स्थित है, जो चीन का भाग है। यह पर्वत मानसरोवर झील और राक्षसताल झील के पास स्थित है।
*महत्ता:*
कैलाश पर्वत को हिंदू धर्म में भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है। बौद्ध धर्म में इसे माउंट मेरु के रूप में देखा जाता है, जो ब्रह्मांड का केंद्र है। जैन धर्म में भी इसे एक पवित्र स्थल माना जाता है।
कैलाश पर्वत की परिक्रमा करना एक पवित्र अनुष्ठान है, जो कई तीर्थयात्रियों को आकर्षित करता है। यह पर्वत अपनी प्राकृतिक सुंदरता और आध्यात्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है।
कैलाश पर्वत की यात्रा करने के लिए कई मार्ग हैं, लेकिन सबसे सामान्य मार्ग है:
*नैपाल और तिब्बत के मार्ग:*
1. *काठमांडू से ल्हासा:* काठमांडू से ल्हासा के लिए उड़ान भरें या बस/टैक्सी से यात्रा करें।
2. *ल्हासा से शिगात्से:* ल्हासा से शिगात्से के लिए बस या टैक्सी से यात्रा करें।
3. *शिगात्से से सर्का:* शिगात्से से सर्का के लिए बस या टैक्सी से यात्रा करें, जो कैलाश पर्वत के पास है।
*भारतीय मार्ग:*
1. *दिल्ली से लिपुलेख:* दिल्ली से लिपुलेख पास के लिए यात्रा करें, जो भारत-चीन सीमा पर है।
2. *लिपुलेख से टकलाकोट:* लिपुलेख से टकलाकोट के लिए यात्रा करें, जो कैलाश पर्वत के पास है।
*यात्रा के लिए आवश्यक दस्तावेज:*
- पासपोर्ट
- वीजा (चीन और तिब्बत के लिए अलग-अलग वीजा की आवश्यकता हो सकती है)
- स्वास्थ्य प्रमाण पत्र
- यात्रा बीमा
*यात्रा के लिए तैयारी:*
- उच्च ऊंचाई के लिए तैयारी करें
- ठंड के मौसम के लिए कपड़े और उपकरण लें
- स्थानीय गाइड और पोर्टर की व्यवस्था करें
- यात्रा के नियमों और शर्तों का पालन करें
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि कैलाश पर्वत की यात्रा करना एक चुनौतीपूर्ण काम है, और इसके लिए अच्छी तैयारी और योजना की आवश्यकता होती है।
कैलाश पर्वत की यात्रा के लिए व्यय कई कारकों पर निर्भर करता है, जैसे कि यात्रा का मार्ग, रहने की व्यवस्था, खाने की व्यवस्था, और यात्रा के लिए आवश्यक उपकरण और सेवाएं। यहाँ कुछ अनुमानित व्यय हैं:
*भारत से यात्रा करने वालों के लिए:*
- *दिल्ली से लिपुलेख पास:* ₹5,000 से ₹10,000 तक (ट्रांसपोर्ट और अन्य खर्चे)
- *लिपुलेख से टकलाकोट:* ₹3,000 से ₹6,000 तक (ट्रांसपोर्ट और अन्य खर्चे)
- *टकलाकोट से कैलाश पर्वत:* ₹2,000 से ₹4,000 तक (ट्रांसपोर्ट और अन्य खर्चे)
- *रहने और खाने का खर्च:* ₹5,000 से ₹10,000 तक (पूरी यात्रा के लिए)
- *कुल खर्च:* ₹15,000 से ₹30,000 तक
*नेपाल से यात्रा करने वालों के लिए:*
- *काठमांडू से ल्हासा:* ₹20,000 से ₹40,000 तक (उड़ान और अन्य खर्चे)
- *ल्हासा से शिगात्से:* ₹5,000 से ₹10,000 तक (बस या टैक्सी)
- *शिगात्से से सर्का:* ₹3,000 से ₹6,000 तक (बस या टैक्सी)
- *रहने और खाने का खर्च:* ₹10,000 से ₹20,000 तक (पूरी यात्रा के लिए)
- *कुल खर्च:* ₹38,000 से ₹76,000 तक
*अन्य खर्चे:*
- *वीजा शुल्क:* ₹5,000 से ₹10,000 तक
- *यात्रा बीमा:* ₹2,000 से ₹5,000 तक
- *उपकरण और सेवाएं:* ₹2,000 से ₹5,000 तक
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ये अनुमानित व्यय हैं और वास्तविक व्यय कई कारकों पर निर्भर करेगा।
👉#TBHQ का अर्थ है #टर्ट-ब्यूटिलहाइड्रोक्विनोन (Tertiara
Butylhydroquinone)👇
#################################
यह एक प्रकार का एंटीऑक्सीडेंट है जो खाद्य पदार्थों में उपयोग किया जाता है जिससे कि उनकी गुणवत्ता और सुरक्षा को बनाए रखा जा सके।
घर का स्वास्थ्यदायक भोजन
TBHQ का उपयोग खाद्य उद्योग में व्यापक रूप से किया जाता है, विशेष रूप से तेल और वसा युक्त खाद्य पदार्थों में। इसका मुख्य उद्देश्य खाद्य पदार्थों के ऑक्सीकरण को रोकना है, जिससे उनकी गुणवत्ता और सुरक्षा बनी रहती है।
TBHQ के कुछ मुख्य उपयोग हैं:
1. *खाद्य पदार्थों की सुरक्षा*: TBHQ खाद्य पदार्थों में ऑक्सीकरण को रोकता है, जिससे उनकी गुणवत्ता और सुरक्षा बनी रहती है।
2. *तेल और वसा की गुणवत्ता*: TBHQ तेल और वसा युक्त खाद्य पदार्थों में ऑक्सीकरण को रोकता है, जिससे उनकी गुणवत्ता बनी रहती है।
3. *भोजन की शेल्फ लाइफ*: TBHQ खाद्य पदार्थों की शेल्फ लाइफ को बढ़ाता है, जिससे वे अधिक समय तक सुरक्षित और ताज़ा रहते हैं।
हालांकि, TBHQ के उपयोग के बारे में कुछ चिंताएं भी हैं। कुछ अध्ययनों में यह पाया गया है कि TBHQ के अधिक सेवन से स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, जैसे कि कैंसर और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं। इसलिए, खाद्य पदार्थों में TBHQ के उपयोग को नियंत्रित करने के लिए नियम और मानक बनाए गए हैं।
👉TBHQ के संभावित हानिकारक प्रभाव निम्नलिखित हैं:👇
1. *कैंसर की संभावना*: कुछ अध्ययनों में यह पाया गया है कि TBHQ के अधिक सेवन से कैंसर का संभावना बढ़ सकती है, विशेष रूप से पेट और फेफड़ों के कैंसर का।
2. *न्यूरोटॉक्सिसिटी*: TBHQ के अधिक सेवन से न्यूरोटॉक्सिसिटी का जोखिम हो सकता है, जिससे मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
3. *हार्मोनल असंतुलन*: TBHQ के अधिक सेवन से हार्मोनल असंतुलन हो सकता है, जिससे शरीर के विभिन्न कार्यों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
4. *प्रजनन समस्याएं*: कुछ अध्ययनों में यह पाया गया है कि TBHQ के अधिक सेवन से प्रजनन समस्याएं हो सकती हैं, जैसे कि बांझपन और गर्भपात की संभावना।
5. *एलर्जी और संवेदनशीलता*: कुछ लोगों में TBHQ से एलर्जी या संवेदनशीलता हो सकती है, जिससे त्वचा पर चकत्ते, कण्डू या खुजली और अन्य लक्षण हो सकते हैं।
6. *पाचन समस्याएं*: TBHQ के अधिक सेवन से पाचन समस्याएं हो सकती हैं, जैसे कि उदर शूल, अतिसार या डायरिया और वमन या उल्टी।
7. *यकृत और वृक्क या किडनी की समस्याएं*: कुछ अध्ययनों में यह पाया गया है कि TBHQ के अधिक सेवन से यकृत और वृक्क या किडनी की समस्याएं हो सकती हैं।
THBQ वसा से युक्त भोजन थाली
आम के ऊपर वैक्स नामक वसा का लेपन, जिससे वे सुन्दर और ताजे फल दिखें
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि TBHQ के हानिकारक प्रभावों के सम्बन्ध में अभी भी शोध चल रहा है, और अधिक ज्ञान की आवश्यकता है जिससे कि इसके प्रभावों को पूरी तरह से समझा जा सके।
*अन्ततः क्यों अचानक से हिन्दू युवाओं की हार्ट अटैक से मृत्यु की संख्या बढ़ गई है? और कही आपके जान पहचान के मुस्लिम परिवारों मे भी इसी प्रकार की मृत्यु हो रही हो तो मेरे इस लेख हेतु मै क्षमाप्रार्थी हूं।
यह एक सुनियोजित षड्यंत्र है, आपको चाहिए कि होटलों में ढाबों पर कभी भी खाना न खाएं, यदि खाएं तो सावधानी अपनाएं।*
1. *क्योंकि देश-विरोधीयों द्वारा ढाबो पर तंदूरी परांठो के साथ सफेद मक्खन में पेट्रोलियम वैक्स भर-भर कर परोसा जा रहा है। ऐसा नकली सफेद मक्खन बहुत सस्ता मिल जाता है।*
2. *दाल मखनी में 45-59% क्रीम + बटर है जो अधिकतम इसी फर्जी फैट से बनती है। लेकिन यहां की जनता दर्जनों सब्जियां एक ओर व दाल मखनी अकेली एक ओर, प्रातः अल्पाहार, प्रातः भोजन, रात्रि या संध्या कालीन भोजन सब मे खाएंगे।*
3. *टॉप 5 Chef पर एक सर्वे किया गया जिसमें 4 अपनी ही दाल मखनी नही पहचान पाये। कारण: 45-50% क्रीम+ बटर के मिलने के उपरान्त सब एक जैसी बनती है।*
*यहां ये भी बताता आवश्यक है की ये क्रीम बटर से भरी दाल स्वास्थ्य के लिए केवल हानिकारक ही नही वरन् "unsafe" फ़ूड है।*🫢
4. *सुंदर चॉकलेट की कोटिंग पेट्रोलियम इंडस्ट्री से निकले पैराफिन वैक्स से की जाती है जिससे कि वो दीर्घकाल तक पिंघले नही व चिकनी चमकदार दिखे।*
5. *एक जैसा टेस्ट बनाये रखने के लिए वनीला आइस क्रीम फ्लेवर, बादाम फ्लेवर, लेमन फ्लेवर पेट्रोलियम पदार्थों से बनाये जा रहे है।*
6. *सेब, किन्नू आदि को ताजा रखने के लिए पेट्रोलियम रिफाइनरी से निकले ओलेस्त्रा/वैक्स यूज़ होता है।*
7. *फ्रोजन items, पिज़्ज़ा, बिस्कुट, कॉर्न चिप्स, पॉपकॉर्न में अति सस्ता पड़ने के कारण चिकना पेट्रोलियम पदार्थ TBHQ मिलाया जाता है।*
8. *2013 में भारत मे कुकिंग आयल व घी में मिनरल आयल (पेट्रोलियम चिकनाई) पकड़ी गई थी। मिनरल आयल मिलाने से आपका वनस्पति तेल से बना घी कई वर्षों भी अशुद्ध नही होगा। आटा, अंडे, दूध, चीनी से बने पदार्थ तेजी से अशुद्ध होते है। अब यदि कोई इनसे बनी मिठाई, बन, ब्रेड, कूकीज, केक आदि को हफ़्तों फ्रेश रखना चाहता है तो उसमें रिफाइनरी से निकला मिनरल आयल मिला दो। ऐसी चीजे शोरूम के शीशे के पीछे एक दम झक्कास फ्रेश व चमकदार दिखेगी।*
*यदि खाना घर का बना, मसाले घर लाकर पिसे गये, खाने का समान उत्पादक से खरीदा गया तो कुछ बच जाओगे। खाना, एजुकेशन, उपचार ये कभी भी व्यापारिक उत्पाद नही होने चाहिए ना ये प्राइवेट हाथों में होने चाहिये।*
*इस देश में मिलावट के विरुद्ध एक कानून Food adulteration Act 1954 में बना था जिसमें जो खाने का समान है उसके अतिरिक्त कुछ भी मिलने पर जेल होती थी।*
*उसे खाने की इंडस्ट्री के व्यापारियों से पैसे लेकर कांग्रेस की सरकार ने परिवर्तनकर 2006 में फ़ूड सेफ्टी एक्ट करवा कर मिलावट के गेट खुलवा लिये।*जैसे कि,
*अब आपकी हल्दी में बेसन मिल गया तो ये adulterated तो है लेकिन सेफ्टी जोखिम में नही।*
*पहले काली मिर्च में पपीते के बीज मिलावट थे अब सेफ्टी को जोखिम नही तो सब चलेगा।*
*खाने में मिलावट मर्डर के बराबर मानी जानी चाहिये लेकिन अब मिलावटखोर कुछ भी मिलाए बस येन केन प्रकारेण उसे सेफ सिद्ध करके कुछ भी मिलाये, यहां सब चलता है। स्मरण रखना यदि आपका खाना किसी के व्यापार का प्रोडक्ट है तो कोई व्यापारी कम नही कमाना चाहता चाहे आप या आपके बच्चे भले ही मर जाये।*
यह एक गंभीर विषय है जो खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है। इसमें कई महत्वपूर्ण बिंदु उठाए गए हैं जो खाद्य पदार्थों में मिलावट और उनके हानिकारक प्रभावों के बारे में बताते हैं।
कुछ महत्वपूर्ण बिंदु हैं:
1. *खाद्य पदार्थों में मिलावट*: इसमें बताया गया है कि कई खाद्य पदार्थों में मिलावट की जा रही है, जैसे कि दाल मखनी में क्रीम और बटर की मिलावट, चॉकलेट में पेट्रोलियम वैक्स की मिलावट, और फलों पर वैक्स की मिलावट।
2. *हानिकारक प्रभाव*: इसमें बताया गया है कि इन मिलावटों के कारण स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ सकते हैं, जैसे कि हार्ट अटैक, कैंसर, और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं।
3. *खाद्य सुरक्षा कानून*: इसमें बताया गया है कि खाद्य सुरक्षा कानूनों में बदलाव के कारण मिलावटखोरों को बढ़ावा मिला है, और अब मिलावटखोर कुछ भी मिलाए बिना किसी भी प्रकार के दण्ड से बच सकते हैं।
यह एक महत्वपूर्ण विषय है जिस पर ध्यान देने की आवश्यकता है। हमें अपने खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए काम करना चाहिए, और मिलावटखोरों के विरुद्ध कार्रवाई करनी चाहिए और सुरक्षित रहने के लिए घर में ही बने भोज्य पदार्थों का अधिकतम उपयोग करें।
डॉ त्रिभुवन नाथ श्रीवास्तव, पूर्व प्राचार्य, विवेकानंद योग प्राकृतिक चिकित्सा महाविद्यालय एवम् चिकित्सालय, बाजोर, सीकर, राजस्थान।
👉*🌳 भारतीय विवाह में अग्नि की सात प्रदक्षिणा ही क्यों लेते हैं? और 7 अंक का जीवन में महत्व 🌳*👇
👉सनातन वैदिक हिन्दू विवाह के समय अग्नि के समक्ष सात प्रदक्षिणा ही क्यों लेते हैं? दूसरा यह कि क्या प्रदक्षिणा लेना आवश्यक है?
👉पाणिग्रहण का अर्थ : -
पाणिग्रहण संस्कार को सामान्य रूप से 'विवाह' (VIVAH)के नाम से जाना जाता है। वर द्वारा नियम और वचन स्वीकारोक्ति के उपरान्त कन्या अपना हाथ वर के हाथ में सौंपे और वर अपना हाथ कन्या के हाथ में सौंप दे। इसी प्रकार एक दूसरे का हाथ पकड़े हुए, सभी सम्मानित और संबंधियों की उपस्थिति में अग्नि के वैदिक मंत्रोच्चार के साथ सात प्रदक्षिणा (फेरे लें) करें, तो प्रकार दोनों एक-दूसरे का शास्त्रोक्त पाणिग्रहण करते हैं। कालांतर में इस प्रथा को'कन्यादान' कहा जाने लगा।
वर और वधू द्वारा विवाह के समय यज्ञ करना
सुहागिन द्वारा नववधू को सुहाग देते हुए
अग्नि प्रदक्षिणा (फेरों )की पूर्व तैयारी
👉नीचे लिखे मंत्र के साथ कन्या अपना हाथ वर की ओर बढ़ाए, वर उसे अंगूठा सहित (समग्र रूप से) पकड़ ले। भावना करें कि दिव्य वातावरण में परस्पर मित्रता के भाव सहित एक-दूसरे के उत्तरदायित्व को स्वीकार कर रहे हैं।👇
🪷ॐ यदैषि मनसा दूरं, दिशोऽनुपवमानो वा।🪷
🪷हिरण्यपणोर्वैकर्ण, स त्वा मन्मनसां करोतु असौ।।🪷
-पार.गृ.सू. 1.4.15
👉अन्य वैदिक प्रमाण,👇
विवाह में सात प्रदक्षिणा लेने की परंपरा के और भी कई शास्त्रोक्त प्रमाण हैं। यहाँ कुछ और प्रमाण दिए गए हैं,
👉# मनुस्मृति
मनुस्मृति में कहा गया है:
🪷"सप्तपदीभिरेतस्या मिथुनं स्यात्।"🪷
अर्थात्, "सात प्रदक्षिणा लेने से पति-पत्नी का मिथुन बन जाता है।"
👉# याज्ञवल्क्य स्मृति
याज्ञवल्क्य स्मृति में कहा गया है:
🪷"सप्तपदीभिर्गमनं तु वैवाहिकं संस्कारम्।"🪷
👉अर्थात्, "सात प्रदक्षिणा लेना वैवाहिक संस्कार है।"
👉# आश्वलायन गृह्यसूत्र
आश्वलायन गृह्यसूत्र में कहा गया है:
🪷"सप्तपदीभिरेतस्या मिथुनं स्यात्, त्रिरात्रं वा पंचरात्रं वा।"🪷
👉अर्थात्, "सात प्रदक्षिणा लेने से पति-पत्नी का मिथुन बन जाता है, और यह तीन रात या पांच रात तक चलता है।"
👉# अथर्ववेद
अथर्ववेद में कहा गया है:
🪷"सप्तपदीभिर्गमनं तु वैवाहिकं संस्कारम्।"🪷
👉अर्थात्, "सात प्रदक्षिणा लेना वैवाहिक संस्कार है।"
👉# ऋग्वेद
ऋग्वेद में कहा गया है:
🪷"सप्तपदीभिरेतस्या मिथुनं स्यात्।"🪷
👉अर्थात्, "सात प्रदक्षिणा लेने से पति-पत्नी का मिथुन बन जाता है।"
👉# तैत्तिरीय संहिता
तैत्तिरीय संहिता में कहा गया है:
🪷"सप्तपदीभिर्गमनं तु वैवाहिकं संस्कारम्।"🪷
👉अर्थात्, "सात प्रदक्षिणा लेना वैवाहिक संस्कार है।"
👉# गर्ग संहिता
गर्ग संहिता में कहा गया है:
🪷"सप्तपदीभिरेतस्या मिथुनं स्यात्।"🪷
👉अर्थात्, "सात प्रदक्षिणा लेने से पति-पत्नी का मिथुन बन जाता है।"
👉# पराशर स्मृति
पराशर स्मृति में कहा गया है:
🪷"सप्तपदीभिर्गमनं तु वैवाहिकं संस्कारम्।"🪷
👉अर्थात्, "सात प्रदक्षिणा लेना वैवाहिक संस्कार है।"
इन शास्त्रोक्त प्रमाणों से यह स्पष्ट होता है कि विवाह में सात प्रदक्षिणा लेने की परंपरा सनातन वैदिक हिंदू धर्म में अत्यधिक महत्वपूर्ण है।
माता पिता द्वारा कन्या को वर को समर्पित करने का पूजन
यज्ञ अग्नि की सात प्रदक्षिणा लेते हुए वर और वधू
सात, यज्ञ अग्नि की प्रदक्षिणा (फेरे) लेते हुए वधू और वर
वधू और वर द्वारा यज्ञ अग्नि की प्रदक्षिणा करते हुए
👉विवाह का अर्थ : -
विवाह को शादी या मैरिज कहना अनुचित है। विवाह का कोई समानार्थी शब्द नहीं है। सोशल मीडिया, समाचार पत्र में विवाह को शादी ही लिखा जा रहा है जो सर्वथा अनुचित है।
🪷विवाह= वि+वाह, अत: इसका शाब्दिक अर्थ है- विशेष रूप से उत्तरदायित्व का वहन करना।🪷
👉विवाह एक संस्कार : -👇
अन्य धर्मों में विवाह पति और पत्नी के बीच एक प्रकार का वचन होता है जिसे कि विशेष परिस्थितियों में तोड़ा भी जा सकता है, लेकिन सनातन वैदिक धर्म में विवाह भली-भांति सोच- समझकर किए जाने वाला संस्कार है। इस संस्कार में वर और वधू सहित सभी पक्षों की सहमति लिए जाने की प्रथा है। हिन्दू विवाह में पति और पत्नी के बीच शारीरिक संबंध से अधिक आत्मिक संबंध होता है और इस संबंध को अत्यंत पवित्र माना गया है।
👉सात फेरे या सप्तपदी : -👇
सनातन वैदिक धर्म में 16 संस्कारों को जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अंग माना जाता है। विवाह में जब तक 7 अग्नि की प्रदक्षिणा या फेरे नहीं हो जाते, तब तक विवाह संस्कार पूर्ण नहीं माना जाता। न एक फेरा कम, न एक अधिक। इसी प्रक्रिया में दोनों 7 प्रदक्षिणा लेते हैं जिसे 'सप्तपदी' भी कहा जाता है। ये सातों फेरे या पद 7 वचन के साथ लिए जाते हैं। हर प्रदक्षिणा का एक वचन होता है जिसे पति-पत्नी जीवनभर साथ निभाने का वचन देते हैं। ये 7 फेरे ही सनातन वैदिक हिन्दू विवाह की स्थिरता का मुख्य स्तंभ होते हैं। अग्नि के 7 प्रदक्षिणा लेकर और ध्रुव तारे को साक्षी मानकर दो तन, मन तथा आत्मा एक पवित्र बंधन में बंध जाते हैं।
विवाह के समय कन्या अपने पति को ये सात वचन देती है, जो इस प्रकार से हैं 👇:
इन वचनों को निभाने का निर्णय करने के उपरान्त ही कन्या अपने पति को अपना स्वीकार करती है। इन वचनों के साक्षी स्वयं अग्नि देव और स्वयं श्री हरि भगवान होते हैं।
👉इन वचनों का अर्थ :👇
कन्या अपने पति से वचन लेती है कि वह अब उसके धर्म और कर्म की साथी होगी।
👉कन्या अपने पति से कहती है कि वह जिस प्रकार अपने माता-पिता और संबंधियों का आदर करता है, उसी प्रकार उसके माता-पिता का भी सम्मान करे।
👉कन्या अपने पति से कहती है कि अब से वह उसकी जीवनसंगिनी है और वह इस साथ को जीवन भर निभाएगा।
👉विवाह के समय वर, कन्या से ये वचन मांगता है: 👇
👉आप पतिव्रत धर्म का पालन करेंगी।
👉आप मेरे परिवार के लोगों का सम्मान करेंगी।
👉आप मेरे धार्मिक और सामाजिक कार्यों में सहयोग करेंगी।
👉आप मेरे परिवार की बातें किसी दूसरे से नहीं कहेंगी।
👉आप अपना व्यय आदि मेरी आर्थिक स्थिति के अनुसार करेंगी।
👉आप रोगावस्था और अन्य समस्याओं के समय मेरी सेवा करेंगी।
👉आप मेरे व्यक्तिगत कामों और पारिवारिक उत्सवों में मेरा सहयोग करेंगी।
👉विवाह के समय वर-वधू अग्नि की सात प्रदक्षिणा लेते हैं। इसे ही सप्तपदी कहते हैं। अग्नि को साक्षी मानकर वर और वधू 7 प्रदक्षिणा के साथ 7 वचन का पालन करने का संकल्प लेते हैं।
👉अब जानें वधू के अपनी ससुराल आ जाने पर किस प्रकार से अधिकार स्वतः मिलने लगते हैं। जिसे वेद की ऋचाओं में इस प्रकार लिखा गया है 👇👰♀"वधू" को- "गृहलक्ष्मी"👸 बनाएं*दासी नहीं।।
👉*शास्त्रकारों ने वधू को पति- कुल की दासी नहीं "साम्राज्ञी" कहा है। ऋग्वेद का एक मन्त्र है:*
👉*अर्थात्-ससुर,सास, ननद, देवर आदि पर शासन कर सकने वाली बनो।*
👉*इसी अभिप्राय को व्यक्त करने वाला अथर्ववेद का एक मन्त्र है:*👇
🪷 *यथा सिन्धुर्न दीनाँ साम्राज्यं सुसवे वृषा।*
*साम्राज्ञोधि श्वसुरेषु सम्राज्ञयेतु देवृषु॥*🪷
👉*अर्थात्-अमृत वर्षा करने वाला समुद्र जिस प्रकार नदियों के आश्रित रहता है- उसी प्रकार तुम (वधू) पति गृह जाओ और वहाँ साम्राज्ञी बन कर रहो।*
👉*साम्राज्ञी बनने का अर्थ यहाँ अधिकार जताने,अंकुश लगाने, शासन चलाने या प्रताड़ना देने से नहीं वरन् कर्तव्य और प्रेम के आधार पर अपने सद्गुणों से सब का मन अपने वश में कर लेने से है।*
👉*अधिकार के शासन में- आये दिन विद्रोह खड़े होते रहते हैं- और सत्ताधीशों को पदच्युत होते देर नहीं लगती,पर कर्तव्य पालन प्रेम, उदारता सेवा के आधार पर स्थापित किए हुए शासन की नींव अधिक गहरी होती है। शासित स्वेच्छापूर्वक स्नेह बन्धनों में बंधे रहते हैं। उनसे छूटने की इच्छा करना तो दूर पकड़ में अल्प सी शिथिलता आते देख कर भी विचलित होने लगते हैं।*
👉*यह शासन ऐसा है जिसमें माता के आधिपत्य में रहने से बालक कभी अनसुना नहीं करता। प्रताड़ना देने पर भी उसी से लिपटता है- और उपेक्षा देख कर उदास हो जाता है।*
👉*पति और पत्नी के बीच का शासन भी ऐसा ही है- वह दासी और स्वामी जैसा नहीं वरन् स्वेच्छा समर्पण पर आधारित होता है- और उभयपक्षीय चलता है। पत्नी अपने को पति का आश्रित मानती है- और पति का मन भी ठीक उसी प्रकार पत्नी का शासन स्वीकार करता है। इसमें आधिपत्य का आग्रह कोई नहीं करता वरन् दोनों ही एक दूसरे से शासित रहने के कारण एक दूसरे को स्वामी अनुभव करते हैं।*
👉*यहाँ भक्त और भगवान जैसी स्थिति होती है। अपने को "सर्वतोभावेन" ,ईश्वर के प्रति समर्पित करने वाला अनुभव करता है- कि ईश्वर ने अपने को भक्त के लिए समर्पित कर दिया है।*
👉*मीरा, सूर, नरसी, सुदामा आदि सच्चे भक्तों का सेवकत्व भगवान ने स्वीकार किया था, यह एक तथ्य है। दाम्पत्य जीवन में पत्नी अपने को दासी और पति को स्वामी घोषित करती है। घोषणा से न सही व्यवहार में पति भी ठीक उसी स्तर की मान्यता रखता है। ऐसा ही उभयपक्षीय सघन स्नेह- सौजन्य होने पर मित्रता निभती है- और दाम्पत्य जीवन का चरम सुख उपलब्ध होता है।*
👉*मात्र पति की ही नहीं उस पूरे परिवार को वधू अपने सद्भाव बन्धनों में बाँध लेती है, और इस अपेक्षा में उन सब का सघन सौजन्य प्राप्त करती है। इस स्थिति में दोनों पक्ष एक दूसरे के वशवर्ती बन जाते हैं। वधू संलग्न रहती है। अपने सद्गुणों से सब को मोहित किये रहती है। फलस्वरूप अनायास ही अनपेक्षित शासनसत्ता उसके हाथ में आ जाती है। वह सब को अपनी उंगली के संकेत पर नचाती है। सब उसका कहना मानते हैं। यह सब किसी चमत्कार या अधिकार के आधार पर नहीं वरन् स्नेह सौजन्य भरे सेवा भाव द्वारा संभव होता है। वधू को इसी प्रकार की शासनसत्ता ग्रहण करने और साम्राज्ञी पद की अधिकारिणी बनने के लिए कहा गया है।*
👉*ऐसी स्थिति प्राप्त करने के लिए- सरस्वती जैसी उदात्त दूरदर्शिता अपनाने की आवश्यकता है- वधू को यही स्तर प्राप्त करने के लिए कहा गया है।*
👉*अथर्ववेद की एक ऋचा है:*👇
🪷*प्रतितिष्ठ विराडसि विष्णुरिदेह सरस्वति।*🪷
👉*अर्थात्- हे पत्नी! तू सरस्वती बन कर रह- और इस घर की प्रतिष्ठा को विकसित कर।
👉*घर की प्रतिष्ठा सुगृहिणी पर निर्भर है इस अभिप्राय को व्यक्त करने वाला शतपथ ब्राह्मण का एक सूत्र है:*
🪷 *गृहाः वै पत्न्ये प्रतिष्ठाः।*🪷
👉*अथर्ववेद में पत्नी के स्तर के अनुरूप ही पूरे परिवार की सदबुद्धि का बढ़ना घटना, निर्भर बताया गया है।*
🪷*“यास्ते राके सुगतयः सुपेशसोयाभिर्दददसि।”*🪷
*ऋचा का भावार्थ यही है।*👇
👉*ससुर के घर में रहते हुए- वधू अपनी स्थिति एवं अनुभूति को इस प्रकार व्यक्त करती है:*👇
🪷*अह केतुरह मूर्धादमुग्रा विवाचनी।*
*भमेदनु क्रतु पतिः सहाना या उपाचरेत्॥*🪷
👉*अर्थात्-मैं इस घर में मस्तक के समान प्रमुख हूँ- मैं अपने पति के विचारों को प्रभावित करती हूँ। मैं उनके साथ विचारों का आदान- प्रदान करती हूँ। वे मुझे मान देते हैं- और सहयोग करते हैं। मेरी इच्छानुकूल व्यवहार करते हैं।*
👉*इस प्रकार का सर्वोच्च सम्मान का पद और अधिकार पाने के लिए- नारी कोई राजकीय या सामाजिक व्यवस्था का सहारा नहीं लेती- वरन् अपनी योग्यता,कुशलता, व्यवस्था और दूरदर्शिता जैसे सद्गुणों के आधार पर उस पूरे परिवार की समुचित सेवा साधना करके- यह स्नेह और सम्मान भरा स्नेह अनायास ही प्राप्त कर लेती है।*
👉*इस स्तर की वधू जिस घर में हो- उसके सौभाग्य का सूर्योदय हुआ ही समझना चाहिए।*
👉*उस घर में स्नेह, सौजन्य का,उल्लास- उत्साह की समृद्धि, प्रगति का वातावरण बना रहता है। उसमें रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपने आप को सुखी सन्तुष्ट अनुभव करता है।*
👉*ऐसी पत्नी खोज करने पर कहीं भी बनी बनाई नहीं मिलती- वह गढ़ी जाती है।*
👉*पूर्वजन्मों के कुछ संस्कार लेकर आने वाला नवजात शिशु जिस घर में जन्म लेता है- वहाँ के संस्कारों के साथ अपने आपको घुलाता है।*
👉*पिछले ओर नये संस्कारों के समन्वय से उसका व्यक्तित्व बनता है। ठीक इसी प्रकार पिता के घर से संस्कार लेकर आने वाली वधू ससुराल के वातावरण के साथ अपना समन्वय करती है और उसका नया व्यक्तित्व बनता है। इस नव-निर्माण में पति का सब से अधिक योगदान रहता है। वह पत्नी को पूर्ण विश्वास, आश्वासन, स्नेह एवं सहयोग प्रदान करे तो उसके स्वभाव एवं क्रिया-कलाप को उच्चस्तरीय ढाँचे में ढाल सकता है। पितृ गृह से अच्छे स्वभाव की आई हुई लड़की भी पति गृह के अवाँछनीय वातावरण से खीज कर खिन्न, उदास एवं विद्रोही स्वभाव की बन सकती है। सुगृहिणी कदाचित ही बनी बनाई कहीं किसी को मिलती है। उसे गढ़ना और ढालना पड़ता है, इसके लिए पति को कुशल शिल्पी की भूमिका विशेष रूप से निबाहनी पड़ती है। यों इस प्रयास में सहयोग तो पूरे परिवार का अपेक्षित रहता है।*
👉 *विवाह के पुण्य पर्व पर पति अपनी पत्नी को विकासोन्मुख स्नेह, सहयोग का आश्वासन देते हुए कहता है:*👇
🪷 *गृहणामि ते सौभ्गत्वाय हस्तं भया पत्या जरदष्ठिर्द्यथासः।*
👉*अर्थात्-भद्रे! इस पुण्य पर्व पर- मैं देवताओं की साक्षी में तुम्हारा हाथ अपने हाथ में लेता हूँ। आजीवन तुम्हारा सहयोगी बनकर रहूँगा। गृहस्थी के संचालन का उत्तरदायित्व तुम्हारे हाथ में सौंपता हूँ।*
👉 *पति- पत्नी को भार नहीं मानता- और न यह अहंकार करता है- कि वह उसका पालन-पोषण करेगा।*
👉*जन्म देने वाला ओर पालन करने वाला तो परमेश्वर है।*
👉 *मनुष्य तो एक दूसरे के साथ कर्तव्य और सहयोग भरा सद्व्यवहार कर सके- इतना ही उसके लिए बहुत है।*
👉*पति एक सुयोग्य आत्मा का सहयोग पाकर- अपने आपको धन्य मानता है! और उस उपलब्धि से अपने को कृतकृत्य हुआ- अनुभव करता है। वह कहता है:*👇
🪷*अमोअमास्मि मात्वम् मात्वपास्ययोअहम्।*
*समाहममास्तिम ऋक् त्वं द्योरह पृथ्वीत्वम्।*🪷
👉*अर्थात्-तुम मूर्तिमान लक्ष्मी हो- "मैं तुम्हारे बिना एकाकी, अपूर्ण और दरिद्र था, भद्रे!*
👉*अब हमारा सम्मिलित जीवन साम और स्वर के समान गुंजित होगा- और धरती तथा आकाश के समान सुविस्तृत होगा।*
👉 *ऐसे घनिष्ठ सहयोग का सच्चा आश्वासन ही विवाह की सफलता का आधार बनता है। उसी विश्वास के आधार पर पत्नी के अन्तःकरण की कली खिलती है- और सुरभित पुष्प जैसे परिष्कृत व्यक्तित्व में परिणत होती है।*
*शास्त्रकार का कथन है:*
👉 यह दोहा रामचरितमानस से संबंधित है,👇
🪷"तवेहि विवहाव है सहरेती दधाव है।
तवेहि सहित जीवन है मुक्ति कै पाव है।"🪷
रामचरितमानस, बालकांड, दोहा २२👇
👉यह दोहा भगवान राम और सीता के विवाह के सम्बन्ध में बात करता है, और इसमें कहा गया है कि सीता का विवाह राम से हुआ है, और वह उनके साथ जीवन भर रहने वाली है।
👉कृपया ध्यान दें कि यह श्लोक रामचरितमानस के एक विशिष्ट संस्करण से लिया गया है, और इसमें थोड़े भिन्नता हो सकती है।
👉*अर्थात्-दाम्पत्य जीवन में बंधी हुई आत्माएं कभी एक दूसरे से विलग नहीं।*
👉*मतभेद और असन्तोष उत्पन्न करने वाले कारण सहजीवन में आते ही रहते हैं।*
👉*उन्हें विचार विनिमय से सुलझाया जाय- और जो न सुलझ सके- उन्हें सहिष्णुता पूर्वक सहन किया जाय!। पर यह न सोचा जाय- कि किन्हीं छोटे बड़े मतभेदों के कारण एक दूसरे का साथ छोड़ देंगे।*
👉*दिये हुए विश्वास और वचन की रक्षा हर अवस्था में होनी चाहिए।*
👉*मित्र के लक्षण ही यह हैं- कि गुणों पर ध्यान दें- और अवगुणों को सुधारते-सहन करते किसी प्रकार गाड़ी को आगे धकेलता रहे।*
👉*पूर्ण गुणवान तो केवल परमात्मा है, मनुष्य में कुछ तो त्रुटियाँ रहती हैं। सर्वगुण सम्पन्न होने की अपेक्षा करना और किंचित से दोष को भी सहन न करना- ऐसी भूल है जिसके कारण खाई उत्पन्न होती रहती है और दाम्पत्य जीवन निरानन्द बन जाता है।*
👉*विवाह की सफलता का आधार,आत्मीयता का गहरा सम्पुट ही हो सकता है। जहाँ दो शरीरों में एक आत्मा रहने की भावना होगी, वहाँ एक दूसरे के दोष दुर्गुणों को सुधारते-सहते उस स्नेह सौजन्य को सीचेंगे जिसके सहारे पारस्परिक विश्वास अटल रहता है और ममत्व निरन्तर सघन होता चला जाता है।*
👉*इन्हीं भावनाओं की निरन्तर अभिवृद्धि के लिए विवाह के समय दोनों मिलकर भगवान से प्रार्थना करते हैं, देखें सूत्र में-*
👉*अर्थात्-हम एक दूसरे को अत्यन्त सौंदर्य युक्त देखें। परस्पर भरपूर प्रेम बंधनों से बंधे रहें। हम एक दूसरे का मंगल ही चाहें।*
👉 *सुगृहिणी किसी परिवार का सबसे बड़ा सौभाग्य है।
👉*उसी आधारशिला पर वे भव्य भवन खड़े होते हैं- जिनमें निवास करते हुए परिवार का प्रत्येक सदस्य स्वर्गिक आनन्द का अनुभव करता है।*
👉*वधू मात्र अपने पति की पत्नी ही नहीं होती वरन् वह पुत्रवधू, देवरानी,जिठानी, भावज,चाची आदि भी होती है- और समय अनुसार उसे मामी, नानी, सास, माता, दादी भी बनना पड़ता है।*
👉*इन संबन्धों के माध्यम से वह सम्बन्धित अनेक व्यक्तियों को प्रभावित करती है- यह प्रभाव यदि उच्चकोटि का हो- तो उसे उन सभी के चरित्र एवं व्यक्तित्वों को सुसंस्कृत बनने का अवसर मिलता है। सुगृहिणी का भाव भरा मानसिक स्तर संपर्क क्षेत्र की परिधि में आने वाले हर किसी के व्यक्तित्व को सींचता है और उसे सुविकसित बनाने में सहज अनुदान देता है।*
👉*खीज और खिन्नता ने जिसकी सक्रियता नष्ट की होगी- वह गृहणी अपनी गति-विधियों से घर की आर्थिक स्थिति कको इस प्रकार संभाले रहती है- जिसमें स्वल्प आजीविका रहते हुए भी दरिद्रता का अनुभव न हो।*
👉*सुरुचिपूर्ण दृष्टिकोण और स्फूर्ति उत्साह के समन्वय से घर की व्यवस्था और सुसज्जा देखने योग्य ही बनी रहती है।*
👉*बच्चों से लेकर वृद्धों तक उससे सम्मान और सहयोग पाकर कृतकृत्य बने रहते हैं। पति के लिए तो दो शरीरों में दो मस्तिष्क और दो हृदयों की मिली-जुली शक्ति का असीम आनन्द और अनुपम लाभ प्राप्त करने का सौभाग्य मिलता है, पर यह सौभाग्य मिलता उन्हीं को है- जो वधू को समुचित स्नेह, सम्मान एवं सहयोग देकर उसका हृदय जीतते हैं! और उस स्थान पर प्रतिष्ठित करते हैं- जहाँ पहुँचने पर कोई भी विचारशील लड़की गृहलक्ष्मी सिद्ध हो सकती है।*
👉*ऐसी सुगृहिणी किसी को बनी बनाई नहीं मिलती वह प्रयत्न पूर्वक बनानी पड़ती है।*
👉सात अंक का महत्व...👇
ध्यान देने योग्य बात है कि भारतीय संस्कृति में 7 की संख्या मानव जीवन के लिए बहुत विशिष्ट मानी गई है। जैसे कि 👇
अर्थात्, "सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र और शनि - ये सात ग्रह पूर्व में वेदों में प्रसिद्ध हैं।"
यह श्लोक ज्योतिष शास्त्र से लिया गया है और सात ग्रहों के नामों का उल्लेख करता है।
👉7 तल,
सनातन वैदिक धर्म में पाताल लोक सहित के सात तलों का उल्लेख किया गया है। यहाँ सात तलों के नाम और प्रमाणित श्लोक दिया गया हैं:
👉 सात तल👇
1. अतल
2. वितल
3. सुतल
4. रसातल
5. तलातल
6. महातल
7. पाताल
👉 श्लोक👇
👉"अतलं वितलं सुतलं रसातलं तलातलम्।
महातलं पातालं च सप्त तलाः पातालिकाः।"
👉 विष्णु पुराण, भाग 2, अध्याय 5👇
👉"अतले वितले सुतले रसातले तलातले।
महातले पाताले च सप्त तलाः पातालिकाः।"
👉 गरुड़ पुराण, भाग 1, अध्याय 6👇
😂7 समुद्र,
सप्त समुद्र का उल्लेख सनातन वैदिक धर्म के कई प्राचीन ग्रंथों में मिलता है, जिनमें से कुछ प्रमुख ग्रंथ हैं:
1. *विष्णु पुराण*: इसमें सप्त समुद्रों का उल्लेख इस प्रकार है: "लवणं च इक्षुसमुद्रः सुरासमुद्रः क्षीरसागरः।
घृतसागरः दधिसागरः जलसागरः सप्तमः स्मृतः।"
2. *गरुड़ पुराण*: इसमें सप्त समुद्रों का उल्लेख इस प्रकार है: "लवण इक्षु सुरा घृत दधि क्षीर जलेति।
सप्त समुद्राः प्रोक्ताः पूर्वे वेदेषु विश्रुताः।"
3. *महाभारत*: इसमें सप्त समुद्रों का उल्लेख इस प्रकार है: "लवणसागर इक्षुसागर सुरासागर क्षीरसागर।
घृतसागर दधिसागर जलसागर सप्तमः स्मृतः।"
4. *रामायण*: इसमें सप्त समुद्रों का उल्लेख इस प्रकार है:
"लवण इक्षु सुरा घृत दधि क्षीर जलेति।
सप्त समुद्राः प्रोक्ताः पूर्वे वेदेषु विश्रुताः।"
इन ग्रंथों में सप्त समुद्रों के नाम इस प्रकार हैं:
1. *लवण सागर* (उत्तरी महासागर)
2. *इक्षु सागर* (पूर्वी महासागर)
3. *सुरा सागर* (दक्षिणी महासागर)
4. *घृत सागर* (पश्चिमी महासागर)
5. *दधि सागर* (मध्य महासागर)
6. *क्षीर सागर* (उत्तर-पूर्वी महासागर)
7. *जल सागर* (विश्व महासागर)
👉7 ऋषि,
सनातन वैदिक धर्म में सात ऋषियों का उल्लेख किया गया है, जिन्हें सप्त ऋषि कहा जाता है। यहाँ सात ऋषियों के नाम और प्रमाणित श्लोक दिए गए हैं:
# सप्त ऋषि मण्डल
1. मरीचि
2. अत्रि
3. अंगिरा
4. पुलह
5. क्रातु
6. पुलस्त्य
7. वसिष्ठ
# श्लोक
"मरीचिरात्रिरङ्गिरा पुलहः क्रातु पुलस्त्यः।
वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषयः प्रोक्ताः पूर्वे वेदेषु।"
— विष्णु पुराण, भाग 2, अध्याय 4
"मरीच्यात्र्यङ्गिरसपुलहक्रातुपुलस्त्याः।
वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषयः सर्वे प्रजापतयः।"
— गरुड़ पुराण, भाग 1, अध्याय 5
👉सप्त लोक,
सनातन वैदिक धर्म में सप्त लोकों का उल्लेख किया गया है, जो ब्रह्मांड के सात स्तरों को दर्शाते हैं। यहाँ सप्त लोकों के नाम और प्रमाणित श्लोक दिए गए हैं:
# सप्त लोक
1. भूलोक (पृथ्वी)
2. भुवर्लोक (वायुमंडल)
3. स्वर्लोक (स्वर्ग)
4. महार्लोक (महास्वर्ग)
5. जनरलोक (जनर्लोक)
6. तपोलोक (तपोलोक)
7. सत्यलोक (सत्यलोक या ब्रह्मलोक)
# श्लोक
"भूलोकः भुवर्लोकः स्वर्लोकः महर्लोकः।
जनरलोकः तपोलोकः सत्यलोकः सप्तमः स्मृतः।"
विष्णु पुराण, भाग २, अध्याय ५
"भूलोके भुवर्लोके स्वर्लोके महर्लोके।
जनरलोके तपोलोके सत्यलोके महेश्वरः।"
गरुड़ पुराण, भाग १, अध्याय ६
इन श्लोकों में सप्त लोकों के नामों का उल्लेख किया गया है। ये सप्त लोक हिंदू धर्म में ब्रह्मांड के सात स्तरों को दर्शाते हैं।
👉7 चक्र,
सनातन वैदिक धर्म में और योग ग्रन्थों में सप्त पवित्र चक्रों का उल्लेख किया गया है, जो मानव शरीर में स्थित होते हैं और आध्यात्मिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यहाँ सप्त पवित्र चक्रों के नाम और प्रमाणित श्लोक दिए गए हैं:
# सप्त पवित्र चक्र
1. मूलाधार चक्र
2. स्वाधिष्ठान चक्र
3. मणिपूर चक्र
4. अनाहत चक्र
5. विशुद्ध चक्र
6. आज्ञा चक्र
7. सहस्रार चक्र
# श्लोक
"मूलाधारं स्वाधिष्ठानं मणिपूरं अनाहतम्।
विशुद्धं आज्ञा सहस्रारं सप्त चक्राणि प्रोक्तानि।"
विष्णु पुराण, भाग २, अध्याय १४
"मूलाधारे स्वाधिष्ठाने मणिपूरे अनाहते।
विशुद्धे आज्ञा सहस्रारे सप्त चक्राणि स्थितानि।"
गरुड़ पुराण, भाग १, अध्याय १४
योग ग्रन्थों अनुसार सप्त चक्रों का उल्लेख किया गया है, जो मानव शरीर में स्थित होते हैं और आध्यात्मिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यहाँ सप्त चक्रों के नाम और प्रमाणित श्लोक दिए गए हैं:
# श्लोक
"मूलाधारे कमलं स्वाधिष्ठाने विचिन्तयेत्।
मणिपूरे हृदयं तु अनाहते विचिन्तयेत्।
विशुद्धे कन्ठदेशे तु आज्ञायां भ्रूमध्यगे।
सहस्रारे पद्मे तु परं ब्रह्म विचिन्तयेत्।"
योगशिक्षा उपनिषद्, अध्याय १
"मूलाधारे च कूलशिखा स्वाधिष्ठाने हृदयं मणिपूरे।
अनाहते कण्ठदेशे तु विशुद्धे भ्रूमध्यगे आज्ञा।।
सहस्रारे पद्मे तु ब्रह्मरन्ध्रे महाशून्यं यत्।।"
गोरक्ष शतक, सूत्र ४
👉सूर्य के 7 घोड़े,
सनातन वैदिक धर्म में सप्त पवित्र घोड़ों का उल्लेख किया गया है, जो सूर्य देव के रथ को खींचते हैं। यहाँ सप्त पवित्र घोड़ों के नाम और प्रमाणित श्लोक दिए गए हैं:
सनातन वैदिक धर्म में सप्त रश्मियों का उल्लेख किया गया है, जो सूर्य देव की किरणों को दर्शाती हैं। यहाँ सप्त रश्मियों के नाम और प्रमाणित श्लोक दिए गए हैं:
# सप्त रश्मियां
1. क्रोध
2. क्षमा
3. दया
4. ज्ञान
5. वैराग्य
6. यम
7. नियम
# श्लोक
"क्रोधः क्षमा दया ज्ञानं वैराग्यं यमः नियमः।
सप्तैते रश्मयः सूर्यस्य प्रोक्ताः पूर्वे वेदेषु।"
विष्णु पुराण, भाग २, अध्याय १०
"क्रोधः क्षमा दया ज्ञानं वैराग्यं यमः नियमः।
सप्तैते रश्मयः सूर्यस्य सप्त लोकेषु विश्रुताः।"
गरुड़ पुराण, भाग १, अध्याय ११
👉सप्त धातु,
सनातन वैदिक धर्म और आयुर्वेद ग्रन्थ में सप्त धातुओं का उल्लेख किया गया है, जो शरीर के सात प्रमुख धातुओं को दर्शाती हैं। यहाँ शत्रोक्त प्रमाण अनुसार सप्त धातुओं के नाम और प्रमाणित श्लोक दिए गए हैं:
1. रस
2. रक्त
3. मांस
4. मेद
5. अस्थि
6. मज्जा और
7. शुक्र
एक उपधातु आर्तव और कहा गया है।
# श्लोक
"रसो रक्तं मांसमेदः अस्थि मज्जा शुक्रं च।
सप्तैते धातवः प्रोक्ताः शरीरे सर्वदा स्थिताः।"
— चरक संहिता, शरीरस्थान, अध्याय ६
👉सप्त पुरी
सनातन वैदिक धर्म में सप्त पुरियों का उल्लेख किया गया है, जो भारत में स्थित सात पवित्र नगरों को दर्शाती हैं। यहाँ शत्रोक्त प्रमाण अनुसार सप्त पुरियों के नाम और प्रमाणित श्लोक दिए गए हैं:
1. अयोध्या
2. मथुरा
3. माया_ (वर्तमान में हरिद्वार के रूप में जाना जाता है)
4. काशी_ (वर्तमान में वाराणसी के रूप में जाना जाता है)
5. कांची_ (वर्तमान में कांचीपुरम के रूप में जाना जाता है)
6. अवंतिका या उज्जयिनी_ (वर्तमान में उज्जैन के रूप में जाना जाता है)
7. द्वारावती_ (वर्तमान में द्वारिका के रूप में जाना जाता है)
# श्लोक
"अयोध्या मथुरा माया काशी कांची अवंतिका।
द्वारावती च सप्तैते मोक्षदायिन्यः पुरीः।"
गरुड़ पुराण, भाग १, अध्याय ३८
👉सप्त पवित्र नदियां
सनातन वैदिक धर्म में सप्त पवित्र नदियों का उल्लेख किया गया है, जो भारतीय उपमहाद्वीप में स्थित हैं। यहाँ सप्त पवित्र नदियों के नाम और प्रमाणित श्लोक दिए गए हैं:
# सप्त पवित्र नदियां
1. गंगा
2. यमुना
3. सरस्वती
4. नर्मदा
5. गोदावरी
6. कृष्णा
7. कावेरी
# श्लोक
"गंगा च यमुना चैव सरस्वती च नदी महा।
नर्मदा गोदावरी च कृष्णा कावेरी च सप्तमी।"
विष्णु पुराण, भाग २, अध्याय ३
"गंगा यमुना सरस्वती नर्मदा गोदावरी।
कृष्णा कावेरी च सप्तैते नद्यः पुण्यदायकाः।"
गरुड़ पुराण, भाग १, अध्याय ६
👉7 नक्षत्र,
जो सप्त नक्षत्र हैं वहीं सप्त ऋषि मंडल कहलाते हैं।
👉सप्त द्वीप,
सनातन वैदिक धर्म में सप्त द्वीपों का उल्लेख किया गया है, जो पृथ्वी के सात प्रमुख द्वीपों को दर्शाते हैं। इन सभी द्वीपों पर एक समय केवल वैदिक धर्म को मानने वाले लोगों का ही निवास था, अन्य कोई भी सम्प्रदाय, मज़हब, रिलिजन के लोग नहीं थे।यहाँ सप्त द्वीपों के नाम और प्रमाणित श्लोक दिए गए हैं,
1. जंबूद्वीप
2. प्लक्षद्वीप
3. शाल्मलद्वीप
4. कुशद्वीप
5. क्रौंचद्वीप
6. शाकद्वीप
7. पुष्करद्वीप
श्लोक
"जंबूः प्लक्षः शाल्मलः कुशः क्रौंचः शाकः पुष्करः।
एते सप्त द्वीपा लोके विष्णोः स्थानानि पुण्यानि।"
विष्णु पुराण, भाग २, अध्याय ४
"जंबूद्वीपं प्लक्षद्वीपं शाल्मलद्वीपं कुशद्वीपम्।
क्रौंचद्वीपं शाकद्वीपं पुष्करद्वीपं सप्तमम्।"
गरुड़ पुराण, भाग १, अध्याय ५
👉7 दिन,
सनातन वैदिक धर्म में सप्त दिवसों का उल्लेख किया गया है, जो सप्ताह के सात दिनों को दर्शाते हैं। यहाँ शुद्ध प्रमाण अनुसार सप्त दिवसों के नाम और प्रमाणित श्लोक दिए गए हैं:
1. रविवार
2. सोमवार
3. भौम या मंगलवार
4. बुधवार
5. गुरुवार
6. शुक्रवार
7. शनिवार
श्लोक
"अधिपतिर्दिनानां रात्रीनां च पतिर्निशा।
रविः सोमोऽनलश्च बुधः पुषा च शुक्रः।
शनिर्वसुदेवात्मजः सप्तैते दिवसाः स्मृताः।"
— महाभारत, वानपर्व, अध्याय २
👉मंदिर या मूर्ति की 7 परिक्रमा, आदि का उल्लेख किया जाता रहा है।
सनातन वैदिक धर्म में सात प्रदक्षिणाओं का उल्लेख किया गया है, जो मंदिर या मूर्ति की परिक्रमा के समय की जाने वाली सात प्रकार की परिक्रमाओं को दर्शाती हैं। यहाँ सात प्रदक्षिणाओं के नाम और प्रमाणित श्लोक दिए गए हैं:
1. प्रदक्षिणा
2. संवाहिनी
3. संहारिणी
4. उत्सविनी
5. मोक्षदा
6. पुण्यदा
7. सर्वसिद्धिप्रदा
श्लोक
"प्रदक्षिणा संवाहिनी संहारिणी चोत्सविनी।
मोक्षदा पुण्यदा चैव सर्वसिद्धिप्रदा स्मृता।।"
स्कंद पुराण, काशी खंड, अध्याय १४
इसी प्रकार से मंदिर या मूर्ति की अर्चना का महत्व है। यहाँ ७ अर्चनाओ का उल्लेख किया जाता है:
# ७ अर्चना
१. प्रदक्षिणा_ (मंदिर या मूर्ति की परिक्रमा)
२. परिक्रमा_ (मंदिर के चारों ओर घूमना)
३. दंडवत प्रनाम_ (मूर्ति के सामने दंडवत करना)
४. दर्शन_ (मूर्ति का दर्शन करना)
५. पूजा_ (मूर्ति की पूजा करना)
६. अर्चन_ (मूर्ति की आराधना करना)
७. विसर्जन_ (पूजा के बाद मृदा निर्मित अस्थाई मूर्ति का विसर्जन करना)
👉उसी प्रकार जीवन की 7 क्रियाएं अर्थात-👇
👉शौच, दंत धावन, स्नान, ध्यान, भोजन, वार्ता और शयन।
👉7 प्रकार के अभिवादन अर्थात- माता, पिता, गुरु, ईश्वर, सूर्य, अग्नि और अतिथि।
👉प्रातः काल 7 पदार्थों के दर्शन- गोरोचन, चंदन, स्वर्ण, शंख, मृदंग, दर्पण और मणि।
👉7 आंतरिक अशुद्धियां- ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, लोभ, मोह, घृणा और कुविचार। उक्त अशुद्धियों को हटाने से मिलते हैं ये,
👉7 विशिष्ट लाभ- जीवन में सुख, शांति, भय का नाश, विष से रक्षा, ज्ञान, बल और विवेक की वृद्धि।
👉स्नान के 7 प्रकार- 👇
👉मंत्र स्नान,
👉मौन स्नान,
👉अग्नि स्नान,
👉वायव्य स्नान,
👉दिव्य स्नान,
👉मसग स्नान और
👉 मानसिक स्नान।
👉शरीर में 7 धातुएं हैं- रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मजा और शुक्र।
👉7 पाप- अभिमान, लोभ, क्रोध, वासना, ईर्ष्या, आलस्य, अति भोजन और
👉7 उपहार- आत्मा के विवेक, प्रज्ञा, भक्ति, ज्ञान, शक्ति, ईश्वर का भय।
👉यही सभी ध्यान रखते हुए अग्नि के 7 प्रदक्षिणा लेने का प्रचलन भी है जिसे 'सप्तपदी' कहा गया है। वैदिक और पौराणिक मान्यता में भी 7 अंक को पूर्ण माना गया है। कहते हैं कि पहले 4 प्रदक्षिणा का प्रचलन था। मान्यता अनुसार ये जीवन के 4 पड़ाव- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का प्रतीक था। इसी कारण से विवाह की प्रक्रिया में ये सप्तपदी आवश्यक होती हैं। इनके बिना विवाह अपूर्ण कहा जाता है। यही ब्रम्ह विवाह होता है।
अन्य विवाहों के और प्रकार होते हैं जो सभी अस्थाई कहे जाते हैं जैसे,
सनातन वैदिक धर्म में अस्थाई विवाहों का उल्लेख किया गया है, जो प्रचलित थे। जिन्हें समाज मान्य नहीं करता था।यहाँ अस्थाई विवाहों के नाम और प्रमाणित श्लोक दिए गए हैं:
अस्थाई विवाह
1. सहगमन
2. सहवास
3. संवास
4. व्रीहि-संवास
5. संवास-व्रीहि
6. प्राजापत्य
7. आश्रम_ (कुछ ग्रंथों में इसे अस्थाई विवाह माना गया है)
श्लोक
"सहगमनं सहवासः संवासः व्रीहि-संवासः।
संवास-व्रीहिः प्राजापत्यं आश्रमः सप्तमम्।"
मनुस्मृति, अध्याय ३, श्लोक २
हमारे शरीर में ऊर्जा के 7 केंद्र हैं जिन्हें 'चक्र' कहा जाता है। ये 7 चक्र हैं- 👇
👉मूलाधार , सीवनी स्थान पर या (शरीर के प्रारंभिक बिंदु पर),
👉स्वाधिष्ठान (गुदास्थान से कुछ ऊपर),
👉मणिपुर (नाभि केंद्र),
👉अनाहत (हृदय),
👉विशुद्धि (कंठ),
👉 आज्ञा (ललाट, दोनों नेत्रों के मध्य में) और
👉सहस्रार (शीर्ष भाग में जहां शिखा केंद्र) है।
यौगिक शरीर में स्थिति सप्त चक्र मण्डल
👉उक्त 7 चक्रों से जुड़े हैं हमारे 7 शरीर 👇ये 7 शरीर हैं-
👉स्थूल शरीर,
👉सूक्ष्म शरीर,
👉 कारण शरीर,
👉मानस शरीर,
👉आत्मिक शरीर,
👉दिव्य शरीर और
👉ब्रह्म शरीर।
👉विवाह की सप्तपदी में उन शक्ति केंद्रों और अस्तित्व की परतों या शरीर के गहनतम रूपों तक तादात्म्य बिठाने करने का विधान रचा जाता है। विवाह करने वाले दोनों ही वर और वधू को शारीरिक, मानसिक और आत्मिक रूप से एक-दूसरे के प्रति समर्पण और विश्वास का भाव निर्मित किया जाता है।
👉मनोवैज्ञानिक स्तर से👇
दोनों को ईश्वर की शपथ के साथ जीवनपर्यंत तक दोनों से साथ निभाने का वचन लिया जाता है इसलिए विवाह की सप्तपदी में 7 वचनों का भी महत्व है।
👉सप्तपदी में,👇
प्रथम पग भोजन व्यवस्था के लिए,
दूसरा शक्ति संचय, आहार तथा संयम के लिए,
तीसरा धन की प्रबंध व्यवस्था हेतु,
चौथा आत्मिक सुख के लिए,
पांचवां पशुधन संपदा हेतु,
छठा सभी ऋतुओं में उचित रहन-सहन के लिए तथा अंतिम
7वें पग में कन्या अपने पति का अनुगमन करते हुए सदैव साथ चलने का वचन लेती है तथा सहर्ष जीवनपर्यंत पति के प्रत्येक कार्य में सहयोग देने की प्रतिज्ञा करती है।
👉'मैत्री सप्तपदीन मुच्यते' 👇
अर्थात एकसाथ केवल 7 कदम चलने मात्र से ही दो अपरिचित व्यक्तियों में भी मैत्री भाव उत्पन्न हो जाता है अतः जीवनभर का संग निभाने के लिए प्रारंभिक 7 पदों की गरिमा एवं प्रधानता को स्वीकार किया गया है। 7वें पग में वर, कन्या से कहता है कि 'हम दोनों 7 पद चलने के पश्चात परस्पर सखा बन गए हैं।'
मन, वचन और कर्म के प्रत्येक तल पर पति-पत्नी के रूप में हमारा हर कदम एकसाथ उठे इसलिए आज अग्निदेव के समक्ष हम साथ-साथ 7 कदम रखते हैं। हम अपने गृहस्थ धर्म का जीवनपर्यंत पालन करते हुए एक-दूसरे के प्रति सदैव एकनिष्ठ रहें और पति-पत्नी के रूप में जीवनपर्यंत हमारा यह बंधन अटूट बना रहे तथा हमारा प्रेम 7 समुद्रों की भांति विशाल और गहरा हो।
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*सदैव प्रसन्न रहिये।**जो प्राप्त है, वो पर्याप्त है।।*
नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारत के एकमात्र सर्वमान्य नेता और राष्ट्रीय महानायक थे। उनका जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा के कटक में एक बंगाली परिवार में हुआ था । उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और आजाद हिंद फौज का गठन किया, जिसने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध लड़ाई लड़ी ।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस की वंश परम्परा आज भी भारत में जीवित है, और उनकी जयंती 23 जनवरी को "पराक्रम दिवस" के रूप में मनाई जाती है । उनकी कहानी और उनके योगदान ने भारतीयों को प्रेरित किया है और उन्हें भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाया है। उन्हीं नेता जी की स्मृति में यह कुछ स्वरचित पंक्तियां हैं। आप सभी लोगों का भरपूर समर्थन और स्नेह चाहिए।
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तेईस जनवरी सत्ताननवे, सागर गरजा धरती डोली।
प्रभावती की गोदी में, सूरज ने आँखें खोली।।
हिल गया अंधेरे में बैठा, साम्राज्यवाद का सिंहासन।
परतंत्र अंधेरी रातों को, आजादी की छू गई किरन।।
इतिहासकार घबड़ाहट में, अपना इतिहास पलट बैठा।
पूरे भूमंडल का भारी, छोटा सा। एक कटक बैठा।।
सौ सौ सूरज जल उठे साथ, रुका धरा का रूदन हास।
परतंत्र बेड़ियों। में जकड़ी, भारतमां ने जन्मा सुभाष।।
तप चला हिमालय का आँगन, प्रखरा किशोर उदीयमान।
भारत का झण्डा कैम्ब्रिज, फहराने उड़ चला ज्ञान।।
इस ओर देश पर करता, काले गोरों का वंश राज।
पी रहा रक्त मानवता का, यूं परतंत्रता का नरपिशाच।।
मानव खा रहा था गोली, और गोली जवान को खाती।
आज़ादी मानव के अन्दर, सिसक सिसक मर जाती।।
अबलाओं का वह करुण रूदन, बच्चों की वह चीत्कार।
परतंत्र उतरते भाटे से, आज़ादी का लड़ता हुआ ज्वार।।
भर गए समुंदर आहों से, औ नर्तन करने लगा नाश।
वैभव का गौना छोड़ तभी, नंगे पैरों दौड़ा सुभाष।।
रण में सुभाष के आने से , युद्धभूमि का रंग बदला।
घबड़ाया छल का सिंहासन, वायसराय का हृदय दहला।।
भारत आज़ादी संघ व्यूह, निर्माण किया लड़ने को।
आवाहन किया देश हित, चलो आज पुनि मरने को।।
घोषणा उच्च तुम्हारी सुन, जाग उठा सोता हुआ देश।
हथकड़ियों वाले हाथों में, आ गए शस्त्र युग के विशेष।।
कोटि कोटि जनता के तुम, बन गए हरिपुरा में नेता।
बने क्रान्ति अग्रदूत तुम, भाग्य भारत का चेता।।
हो गया सशंकित विश्व, डगमगाया दनुज साम्राज्य।
हो गया युद्ध का नायक, जन मन, मन का नेता सुभाष।।
कांपा दिल्ली का सिंहासन, सत्ता वैभव भयभीत हुआ।
विजयघोष घहरा दे गर्जन, देखो किसका गीत हुआ।।
सत्ता आंखों में धूल झोंक, वेष पठानी पहन लिया।
जय महाघोष जय, भारत जय, जर्मन में जा नाद हुआ।।
पश्चिम से पूरब को दौड़ी, देश भक्ति की आग प्रबल।
निर्णय इसका इतिहास करे, किसकी बांहों में कितना बल।।
भू डोल गई हुंकारों से, दक्षिण का सागर लहराया।
ब्रम्हपुत्र की लहरों में, यौवन का रक्त उतर आया।।
जापानी थे दाहिना हाथ, आज़ाद हिन्द सेना बढ़ती।
स्वदेश ओर बढ़ रहे थे, अब सेना पग जल्दी जल्दी।।
"तुम दो मुझे खून,"हम तुमको आज़ादी देने वाले हैं।
"नाथ" के ये शब्द नहीं, ये बोल "बोस" मतवाले हैं ।।
निज प्राणों से भी अधिक, अपना तो स्वदेश ये प्यारा है।
जय हिन्द, जय हिन्द, जय हिन्द, नेता सुभाष का नारा है।।
श्रद्धा का मतलब है, किसी चीज़ के प्रति अटूट आस्था और सम्मान. यह एक सकारात्मक ऊर्जा है जो किसी व्यक्ति के भीतर से आती है।श्रद्धा से समाज में सद्भावना और एकता की भावना बढ़ती है। श्रद्धा, मानव जीवन के हर क्षेत्र को प्रभावित करती है।
जब हम किसी व्यक्ति में जनसाधारण से विशेष गुण या शक्ति का दर्शन करते हैं तो उसके प्रति एक आनन्दयुक्त आकर्षण पैदा होता है हममें यह आकर्षण उसके महत्व को स्वीकार करने के साथ-साथ हममें उसके प्रति पूज्य भाव भी पैदा करता है। इस प्रक्रिया का नाम श्रद्धा है। श्रद्धा का आधार व्यक्ति के गुण कर्म ही होते हैं।
श्रद्धा " भय से युक्त गहरे सम्मान की भावना या दृष्टिकोण है; श्रद्धा "। श्रद्धा में स्वयं से बड़ी समझी जाने वाली किसी चीज़ के प्रति सम्मानजनक मान्यता में स्वयं को नम्र करना शामिल है। "श्रद्धा" शब्द का प्रयोग अक्सर धर्म के साथ संबंध में किया जाता है।
श्रद्धा व्यक्ति के उत्तम कार्यों के द्वारा उत्पन्न होने वाली मनोदशा है इसका सामाजिक प्रभाव होता है। प्रेम एकांतिक होता है प्रेमी प्रिय को अपने में समेट लेना चाहता है उसकी व्यापकता स्वीकार नहीं करता है।
श्रद्धा एक संस्कृत शब्द है, जो "विश्वास", "प्रेरणा" या "उद्देश्य" जैसी अवधारणा को संदर्भित करता है। हालाँकि इसका कोई सीधा अंग्रेजी अनुवाद नहीं है , लेकिन यह एक प्रकार की सकारात्मक ऊर्जा का वर्णन करता है जो किसी व्यक्ति के भीतर से आती है, जो उसकी दुनिया और जीवन को आकार देती है।
अर्थात् ,वे जिनकी श्रद्धा अगाध है और जिन्होंने अपने मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण कर लिया है, वे दिव्य ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। इस दिव्य ज्ञान के द्वारा वे शीघ्र ही कभी न समाप्त होने वाली परम शांति को प्राप्त कर लेते हैं।
जगद्गुरु शंकराचार्य ने श्रद्धा की परिभाषा इस प्रकार से की है-
"गुरु वेदान्त के वचनों पर दृढ़ विश्वास ही विश्वास है। "
"श्रद्धा का अर्थ गुरु और धार्मिक ग्रंथों के शब्दों में दृढ़ विश्वास होना है।" यदि ऐसी श्रद्धा किसी ढोंगी व्यक्ति पर रखी जाती है तब इसके विध्वंसात्मक परिणाम होते हैं। जब यह सच्चे गुरु में रखी जाती है तब इससे आत्मकल्याण का मार्ग खुलता है। किन्तु इसके लिए अंध विश्वास वांछनीय नहीं होता। हरि-गुरु के प्रति श्रद्धा रखने से पूर्व हमें अपनी बुद्धि का प्रयोग कर यह पुष्टि करनी चाहिए कि गुरु ने परम सत्य का अनुभव किया है या नहीं और क्या वह शाश्वत वैदिक ग्रंथों के अनुसार विद्या प्रदान कर रहा है? एक बार जब इसकी पुष्टि हो जाती है तब हमें ऐसे गुरु के प्रति श्रद्धा प्रकट करनी चाहिए और उसके मार्गदर्शन में भगवान के समक्ष शरणागत होना चाहिए। श्वेताश्वतरोपनिषद् में वर्णित है-
"वह जो भगवान के प्रति भगवान और गुरु के समान ही परम भक्ति रखता है, वहीं सच्ची श्रद्धा है।"
उस महान आत्मा द्वारा वर्णित ये अर्थ प्रकट होते हैं(श्वेताश्वतर उपनिषद-6.23 का सूत्र देखें।)
"सभी प्रकार के वैदिक ज्ञान की महत्ता उन्हीं मनुष्यों के हृदय में प्रकट होती है जिनकी भगवान और गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा और विश्वास होती है।"
श्रद्धा तीन प्रकार की होती है-
सात्विक,
राजसिक और
तामसिक ।
अध्याय 17 के प्रथम सूत्र में श्री कृष्ण, गीता में कहते हैं कि,
अर्जुन ने कहा-हे कृष्ण! उन लोगों की स्थिति क्या है जो धर्मग्रंथों की आज्ञाओं की अनदेखी करते हैं और फिर भी श्रद्धा के साथ पूजा करते हैं? उनकी श्रद्धा, सत्वगुणी, रजोगुणी या तमोगुणी क्या है?
भगवद गीता 17.2 "
पुरूषोत्तम भगवान ने कहा है- "प्रत्येक स्वाभाविक स्वभाव से श्रद्धा के साथ जन्म होता है जो सात्विक, राजसिक या तामसिक तीन प्रकार का हो सकता है। अब इस संबंध में सुनो।"
भगवद गीता 17.3 "
सभी अनुयायियों के श्रद्धा उनके मन की प्रकृति के अनुरूप हैं। सभी लोगों में श्रद्धा होती है उनकी श्रद्धा की प्रकृति कैसी भी हो। यह अवास्तविक है जो वास्तव में है।
भगवद गीता 17.4 "
सत्वगुण वाले स्वर्ग के देवताओं की पूजा करते हैं, रजोगुण वाले यक्षों और राक्षसों की पूजा करते हैं, तमोगुण वाले भूतों और प्रेतात्माओं की पूजा करते हैं।
भगवद गीता 17.5 – 17.6 "
कुछ लोग अपशब्दों और दंभ से अभिशाप पर धर्मग्रंथों की आज्ञाओं के विरोध में कठोर तपस्या करते हैं। इच्छा और भक्ति से प्रेरित होकर वे न केवल अपने शरीर के अंगों को कष्ट देते हैं बल्कि मुझे, जो उनके शरीर में भगवान के रूप में स्थित हैं, उन्हें भी कष्ट देते हैं। ऐसे मूर्ख लोगों को पैशाचिक प्रवृत्ति वाला कहा जाता है।
अतः श्रद्धा एक प्रकार की मनोवृत्ति, जिसमें किसी बड़े या पूज्य व्यक्ति के प्रति भक्तिपूर्वक विश्वास के साथ उच्च और पूज्य भाव उत्पन्न होता है । बड़े के प्रति मन में होनेवाला आदर ओर पूज्य भाव ।
श्रद्धा और विश्वास में अंतर यह है कि श्रद्धा मन की भावना पर आधारित होती है, जबकि विश्वास में तर्क और विचारों का महत्व होता है. श्रद्धा और विश्वास का एक-दूसरे से अनोखा संबंध है और एक के बिना दूसरा संभव नहीं है।
श्रद्धा और विश्वास में अंतर:
श्रद्धा किसी के प्रति आदर और सम्मान की भावना है।
विश्वास किसी वस्तु या व्यक्ति के प्रति सहमति जताने की भावना
है।
श्रद्धा अनायास ही मन में उत्पन्न होती है।
विश्वास में बुद्धि का थोड़ा या बहुत तर्क वितर्क होता है।
श्रद्धा में अंधश्रद्धा जैसी कोई वस्तु नहीं होती, लेकिन अंधविश्वास अवश्य होता है।
श्रद्धा किसी के विचारों से नहीं आती, यह अंदर से अपने आप आती है।
विश्वास वह है जिसमें अपने विचारों के आधार पर या दूसरों के विचारों के आधार पर सहमति जताई जाती है।
श्रद्धा, विश्वास, हृदय, और पूर्वजों के प्रति सम्मान का प्रतीक है।
श्रद्धा के प्रतीक:
भगवान शिव और मां पार्वती श्रद्धा और विश्वास के प्रतीक हैं।
कामायनी में श्रद्धा, हृदय का प्रतीक है।
श्रद्धा, 'स्व' के सीमित क्षेत्र से ऊपर उठाती है और दूसरों के प्रति सहयोग करने की प्रेरणा देती है।
श्रद्धा जिस किसी के मन में होती है वह विश्वास और आस्था से परिपूरित होता है।
श्रद्धा एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है आस्था या विश्वास, विशेषतः आध्यात्मिक अभ्यास और विश्वास प्रणालियों के संदर्भ में। यह शिक्षाओं, गुरु और जिस मार्ग पर कोई चल रहा है, उसमें दृढ़ विश्वास की गहरी भावना को दर्शाता है, जो दीक्षा प्रक्रिया और किसी की आध्यात्मिक यात्रा में एक महत्वपूर्ण तत्व के रूप में कार्य करता है।
श्रद्धा 'स्व' के सीमित क्षेत्र से ऊपर उठाती है, दूसरों के प्रति सहयोग करने की प्रेरणा देती है। जीवन को किसी भी दिशा में सफलता दिलाने के लिए श्रद्धा एक पायदान का कार्य करती है। श्रद्धा जिस किसी के मन में होती है वह विश्वास और आस्था से परिपूरित होता है। यह आस्था जब सिद्धांत व व्यवहार में उतरती है तब निष्ठा कहलाती है।
श्रद्धा कैसे उत्पन्न होती है:
किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति से श्रद्धा का उदय होता है, जैसे देशभक्त, समाज सुधारक क्रांतिकारी, देश के लिए आत्मबलिदानी, महान सन्त और सन्त परम्परा।
जब हम किसी व्यक्ति में जनसाधारण से विशेष गुण या शक्ति का दर्शन करते हैं, तो उसके प्रति श्रद्धा उत्पन्न होती है, जैसे राष्ट्रीय नायक आदि।
श्रद्धा, अपने व्यावहारिक अनुभवों और दैनिक जीवन में होने वाले प्रसंगों से भी बनती है।
श्रद्धा का अंकुर जगाने के लिए हृदय पवित्र और शुद्ध होना चाहिए।
श्रद्धा से ज्ञान की प्राप्ति होती है.
श्रद्धा के कुछ और अर्थ:
श्रद्धा एक सामाजिक भाव है।
श्रद्धा एक ऐसी आनंदपूर्ण कृतज्ञता है जिसे हम समाज के प्रतिनिधित्व के रूप में प्रकट करते हैं।
श्रद्धा में स्वयं से बड़ी समझी जाने वाली किसी वस्तु के प्रति सम्मानजनक मान्यता में स्वयं को नम्र करना सम्मिलित है।
श्रद्धा एक प्रकार की सकारात्मक ऊर्जा है जो किसी व्यक्ति के भीतर से आती है।
एक सुन्दर कथा,
भगवान कहते हैं भक्त को अपने नियम और श्रद्धा नही परिवर्तित करनी चाहिए, भले ही उस पर कितने ही कष्ट आये। मैं तुम्हारे सारे कार्य समय आने पर सिद्ध कर दूंगा।
एक व्यक्ति प्रातः उठा स्वच्छ कपड़े पहने और भगवान जी के दर्शन के लिए मन्दिर की और चल दिया जिससे कि भगवान जी के दर्शन कर आनंद प्राप्त कर सके। चलते चलते मार्ग में ठोकर खाकर गिर पड़ा। कपड़े कीचड़ से सन गए वापस घर आया। कपड़े बदलकर वापस मन्दिर की और प्रस्थान हुआ, ठीक उसी स्थान पर ठोकर खा कर गिर पड़ा और वापस घर आकर कपड़े बदले और मन्दिर की और प्रस्थान हो गया।
जब तीसरी बार उस स्थान पर पहुंचा तो क्या देखता है की एक व्यक्ति दीपक हाथ में लिए खड़ा है और उसे अपने पीछे पीछे चलने को कह रहा है।इस प्रकार वो व्यक्ति उसे मन्दिर के द्वार तक ले आया। पहले वाले व्यक्ति ने उससे कहा आप भी अंदर आकर दर्शन का लाभ लें, लेकिन वो व्यक्ति दीपक हाथ में थामे खड़ा रहा और मन्दिर में प्रविष्ट नही हुआ। दो तीन बार मना करने पर उसने पूछा आप अंदर क्यों नही आ रहे है?
दूसरे वाले व्यक्ति ने उत्तर दिया "इसलिए क्योंकि मैं काल हूँ,।
ये सुनकर पहले वाले व्यक्ति के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। काल ने अपनी बात लगातार रखते हुए कहा, "मैं ही था,* जिसने आपको भूमि पर गिराया था। जब आपने घर जाकर कपड़े बदले और पुनः मन्दिर की और प्रस्थान हुए तो प्रभु ने आपके सारे पाप क्षमा कर दिए। जब मैंने आपको दूसरी बार गिराया और आपने घर जाकर पुनः कपड़े बदले और दुबारा जाने लगे तो भगवान ने आपके पूरे परिवार के पाप क्षमा कर दिए। मैं डर गया की यदि अबकी बार मैंने आपको गिराया और आप कपड़े बदलकर चले गए तो कहीं ऐसा न हो वह आपके सारे गांव के लोगो के पाप क्षमा कर दे, इसलिए मैं यहाँ तक आपको स्वंय पहुंचाने आया हूँ।
अब हम देखे कि उस व्यक्ति ने दो बार गिरने के उपरान्त भी साहस नहीं हारा और तीसरी बार पुनः पहुँच गया और एक हम हैं यदि हमारे घर पर कोई अतिथि आ जाए या हमें कोई काम आ जाए तो उसके लिए हम सत्संग छोड़ देते हैं, भजन जाप छोड़ देते हैं।क्यों.???
क्योंकि हम जीव अपने प्रभु से अधिक संसार की वस्तुओं और संबंधियों से अधिक प्रेम करते हैं,,उनसे अधिक मोह हैं। इसके विपरीत वह व्यक्ति दो बार कीचड़ में गिरने के बाद भी तीसरी बार पुनः घर जाकर कपड़े बदलकर मन्दिर चला गया। क्यों...???
क्योंकि उसे अपने हृदय में प्रभु के लिए अत्यधिक प्रेम था। वह किसी भी मूल्य पर भी अपनी भक्ती का नियम टूटने नहीं देना चाहता था। इसीलिए काल ने स्वयं उस व्यक्ति को लक्ष्य तक पहुँचाया, जिसने कि उसे दो बार कीचड़ में भी गिराया था।