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*🙏🇮🇳🛕जय श्री राम🙏*पुनर्जन्म क्या होता है,*🪷🙏🇮🇳
पुनर्जन्म की अवधारणा सनातन वैदिक धर्म और अन्य भारतीय धर्मों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। पुनर्जन्म का अर्थ है आत्मा का एक शरीर से दूसरे शरीर में पुनर्जन्म लेना, जो उसके कर्मों के अनुसार निर्धारित होता है।
पुनर्जन्म के सम्बन्ध में कुछ प्रमुख ग्रंथों और श्लोकों के संदर्भ निम्नलिखित हैं:
भगवद गीता
भगवद गीता में पुनर्जन्म की अवधारणा पर विस्तार से चर्चा की गई है। एक प्रसिद्ध श्लोक है:
"जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि।।"
(भगवद गीता २.२७)
अर्थ: "जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है और मरने वाले का जन्म निश्चित है। इसलिए, तुम्हें इस अपरिहार्य विषय में शोक नहीं करना चाहिए।"
उपनिषद
उपनिषदों में भी पुनर्जन्म की अवधारणा पर चर्चा की गई है। एक प्रसिद्ध उपनिषद है:
"योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः।
स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम्।।"
(कठोपनिषद ५.७)
अर्थ: "कुछ जीव शरीर धारण करने के लिए योनि में जाते हैं और अन्य स्थावर रूप में अपने कर्मों और ज्ञान के अनुसार प्राप्त करते हैं।"
वेदांत सूत्र
वेदांत सूत्र में भी पुनर्जन्म की अवधारणा पर चर्चा की गई है:
"आत्मावअरेद्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः।" (वृहदारण्यक उपनिषद ४.५.६)
अर्थ: "आत्मा को देखना, सुनना, मनन करना और ध्यान करना चाहिए।"
इन ग्रंथों और श्लोकों से यह स्पष्ट होता है कि पुनर्जन्म की अवधारणा सनातन वैदिक धर्म में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है, और इसके अनुसार आत्मा का पुनर्जन्म उसके कर्मों के अनुसार निर्धारित होता है।
पुनर्जन्म की अवधारणा को और अधिक विस्तार से समझने के लिए, यह जानना आवश्यक होगा कि विभिन्न ग्रंथों और परंपराओं में इसके समाधान में क्या कहा गया है।
*🍁 पुनर्जन्म से सम्बंधित चालीस प्रश्नों के उत्तर..🍁*
(1) प्रश्न :- पुनर्जन्म किसको कहते हैं ?
उत्तर :- जब जीवात्मा एक शरीर का त्याग करके किसी दूसरे शरीर में जाती है तो इस बार बार जन्म लेने की क्रिया को पुनर्जन्म कहते हैं ।
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| पुनर्जन्म की धारणा पर चित्र |
(2) प्रश्न :- पुनर्जन्म क्यों होता है ?
उत्तर :- जब एक जन्म के अच्छे बुरे कर्मों के फल अधूरे रह जाते हैं तो उनको भोगने के लिए दूसरे जन्म आवश्यक हैं ।
(3) प्रश्न :- अच्छे बुरे कर्मों का फल एक ही जन्म में क्यों नहीं मिल जाता ? एक में ही सब निपट जाये तो कितना अच्छा हो ?
उत्तर :- नहीं जब एक जन्म में कर्मों का फल शेष रह जाए तो उसे भोगने के लिए दूसरे जन्म अपेक्षित होते हैं ।
(4) प्रश्न :- पुनर्जन्म को कैसे समझा जा सकता है ?
उत्तर :- पुनर्जन्म को समझने के लिए जीवन और मृत्यु को समझना आवश्यक है । और जीवन मृत्यु को समझने के लिए शरीर को समझना आवश्यक है ।
(5) प्रश्न :- शरीर के बारे में समझाएँ ?
उत्तर :- हमारे शरीर को निर्माण प्रकृति से हुआ है ।
जिसमें मूल प्रकृति (सत्व, रजस और तमस) से प्रथम बुद्धि तत्व का निर्माण हुआ है।
बुद्धि से अहंकार (बुद्धि का आभामण्डल) अहंकार से पांच ज्ञानेन्द्रियाँ (चक्षु, जिह्वा, नासिका, त्वचा, श्रोत्र), मन ।
पांच कर्मेन्द्रियाँ (हस्त, पाद, उपस्थ, पायु, वाक्)
शरीर की रचना को दो भागों में बाँटा जाता है (सूक्ष्म शरीर और स्थूल शरीर)
(6) प्रश्न :- सूक्ष्म शरीर किसको बोलते हैं ?
उत्तर :- सूक्ष्म शरीर में बुद्धि, अहंकार, मन, ज्ञानेन्द्रियाँ ये सूक्ष्म शरीर आत्मा को सृष्टि के आरम्भ में जो मिलता है वही एक ही सूक्ष्म शरीर सृष्टि के अंत तक उस आत्मा के साथ पूरे एक सृष्टि काल ( ४३२००००००० वर्ष ) तक चलता है। यदि बीच में ही किसी जन्म में कहीं आत्मा का मोक्ष हो जाए तो ये सूक्ष्म शरीर भी प्रकृति में वहीं लीन हो जायेगा।
(7) प्रश्न :- स्थूल शरीर किसको कहते हैं ?
उत्तर :- पंच कर्मेन्द्रियाँ (हस्त, पाद, उपस्थ, पायु, वाक्) ये समस्त पंचभौतिक बाहरी शरीर ।
(8) प्रश्न :- जन्म क्या होता है ?
उत्तर :- जीवात्मा का अपने करणो (सूक्ष्म शरीर) के साथ किसी पंचभौतिक शरीर में आ जाना ही जन्म कहलाता है ।
(9) प्रश्न :- मृत्यु क्या होती है ?
उत्तर :- जब जीवात्मा का अपने पंचभौतिक स्थूल शरीर से वियोग हो जाता है, तो उसे ही मृत्यु कहा जाता है । परन्तु मृत्यु केवल सथूल शरीर की होती है, सूक्ष्म शरीर की नहीं। सूक्ष्म शरीर भी छूट गया तो वह मोक्ष कहलाएगा मृत्यु नहीं। मृत्यु केवल शरीर बदलने की प्रक्रिया है, जैसे मनुष्य कपड़े बदलता है। वैसे ही आत्मा शरीर भी बदलता है।
(10) प्रश्न :- मृत्यु होती ही क्यों है ?
उत्तर :- जैसे किसी एक वस्तु का निरन्तर प्रयोग करते रहने से उस वस्तु का सामर्थ्य घट जाता है, और उस वस्तु को बदलना आवश्यक हो जाता है, ठीक वैसे ही एक शरीर का सामर्थ्य भी घट जाता है और इन्द्रियाँ निर्बल हो जाती हैं। जिस कारण उस शरीर के परिवर्तन की प्रक्रिया का नाम ही मृत्यु है।
(11) प्रश्न :- मृत्यु न होती तो क्या होता ?
उत्तर :- तो बहुत अव्यवस्था होती। पृथ्वी की जनसंख्या बहुत बढ़ जाती। और यहाँ पैर धरने का भी स्थान न होता।
(12) प्रश्न :- क्या मृत्यु होना अनुचित परिस्थित है ?
उत्तर :- नहीं, मृत्यु होना कोई अनुचित बात नहीं ये तो एक प्रक्रिया है शरीर परिवर्तन की ।
(13) प्रश्न :- यदि मृत्यु होना अनुचित परिस्थित नहीं है तो लोग इससे इतना भयग्रस्त क्यों रहते हैं ?
उत्तर :- क्योंकि उनको मृत्यु के वैज्ञानिक स्वरूप की जानकारी नहीं है। वे अज्ञानी हैं। वे समझते हैं कि मृत्यु के समय अत्यधिक कष्ट होता है। उन्होंने वेद, उपनिषद, या दर्शन को कभी पढ़ा नहीं वे ही अंधकार में पड़ते हैं और मृत्यु से पहले कई बार मरते हैं।
(14) प्रश्न :- तो मृत्यु के समय कैसा लगता है ? थोड़ा सा तो बतायें ?
उत्तर :- जब आप शैय्या में लेटे लेटे नींद में जाने लगते हैं तो आपको कैसा लगता है ?? ठीक वैसा ही मृत्यु की अवस्था में जाने में लगता है उसके बाद कुछ अनुभव नहीं होता। जब आपकी मृत्यु किसी दुर्सेघटना से होती है तो उस समय आमको मूर्छा आने लगती है, आप ज्ञान शून्य होने लगते हैं जिससे की आपको कोई पीड़ा न हो। तो यही ईश्वर की सबसे बड़ी कृपा है कि मृत्यु के समय मनुष्य ज्ञान शून्य होने लगता है और सुषुुप्तावस्था में जाने लगता है।
(15) प्रश्न :- मृत्यु के भय को दूर करने के लिए क्या करें ?
उत्तर :- जब आप वैदिक आर्ष ग्रन्थ (उपनिषद, दर्शन आदि) का गम्भीरता से अध्ययन करके जीवन, मृत्यु, शरीर आदि के विज्ञान को जानेंगे तो आपके अन्दर का, मृत्यु के प्रति भय मिटता चला जायेगा और दूसरा ये की योग मार्ग पर चलें तो स्वंय ही आपका अज्ञान का नाश होता जायेगा और मृत्यु भय दूर हो जायेगा। आप निडर हो जायेंगे । जैसे हमारे बलिदानियों की गाथायें आपने सुनी होंगी जो राष्ट्र की रक्षा के लिये बलिदान हो गये। तो आपको क्या लगता है कि क्या वो ऐसे ही एक दिन में बलिदान देने को तैय्यार हो गये थे ? नहीं उन्होने भी योगदर्शन, गीता, साँख्य, उपनिषद, वेद आदि पढ़कर ही निर्भयता को प्राप्त किया था। योग मार्ग को जीया था, अज्ञानता का नाश किया था।
महाभारत के युद्ध में भी जब अर्जुन भीष्म, द्रोणादिकों की मृत्यु के भय से युद्ध की इच्छाओं को त्याग बैठा था तो योगेश्वर कृष्ण ने भी तो अर्जुन को इसी सांख्य, योग, निष्काम कर्मों के सिद्धान्त के माध्यम से जीवन मृत्यु का ही तो रहस्य समझाया था और यह बताया कि शरीर तो मरणधर्मा है ही तो उसी शरीर विज्ञान को जानकर ही अर्जुन भयमुक्त हुआ। तो इसी कारण तो वेदादि ग्रन्थों का स्वाध्याय करने वाले मनुष्य ही राष्ट्र के लिए अपना शीश कटा सकता है, वह मृत्यु से भयभीत नहीं होता , प्रसन्नता पूर्वक मृत्यु को आलिंगन करता है।
(16) प्रश्न :- किन किन कारणों से पुनर्जन्म होता है ?
उत्तर :- आत्मा का स्वभाव है कर्म करना, किसी भी क्षण आत्मा कर्म किए बिना रह ही नहीं सकता। वे कर्म उचित करे या अनुचित, ये उसपर निर्भर है, पर कर्म करेगा अवश्य। तो ये कर्मों के कारण ही आत्मा का पुनर्जन्म होता है। पुनर्जन्म के लिए आत्मा सर्वथा ईश्वराधीन है।
(17) प्रश्न :- पुनर्जन्म कब कब नहीं होता ?
उत्तर :- जब आत्मा का मोक्ष हो जाता है तब पुनर्जन्म नहीं होता है।
(18) प्रश्न :- मोक्ष होने पर पुनर्जन्म क्यों नहीं होता ?
उत्तर :- क्योंकि मोक्ष होने पर स्थूल शरीर तो पंचतत्वों में लीन हो ही जाता है, पर सूक्ष्म शरीर जो आत्मा के सबसे निकट होता है, वह भी अपने मूल कारण प्रकृति में लीन हो जाता है।
(19) प्रश्न :- मोक्ष के बाद क्या कभी भी आत्मा का पुनर्जन्म नहीं होता ?
उत्तर :- मोक्ष की अवधि तक आत्मा का पुनर्जन्म नहीं होता। उसके उपरान्त होता है।
(20) प्रश्न :- लेकिन मोक्ष तो सदा के लिए होता है, तो मोक्ष की एक निश्चित अवधि कैसे हो सकती है ?
उत्तर :- सीमित कर्मों का कभी असीमित फल नहीं होता। यौगिक दिव्य कर्मों का फल हमें ईश्वरीय आनन्द के रूप में मिलता है, और जब ये मोक्ष की अवधि समाप्त होती है तो पुनः से ये आत्मा शरीर धारण करती है।
(21) प्रश्न :- मोक्ष की अवधि कब तक होती है ?
उत्तर :- मोक्ष का समय ३१ नील १० खरब ४० अरब वर्ष है, जब तक आत्मा मुक्त अवस्था में रहती है।
मोक्ष की अवधारणा सनातन वैदिक धर्म और अन्य भारतीय धर्मों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। मोक्ष का अर्थ है आत्मा की मुक्त अवस्था, जहां वह जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जात
मोक्ष के सम्बन्ध में कुछ प्रमुख ग्रंथों और श्लोकों के संदर्भ निम्नलिखित हैं:
भगवद गीता
भगवद गीता में मोक्ष की प्राप्ति के सम्बन्ध में विस्तार से बताया गया है। एक प्रसिद्ध श्लोक है:
"यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।
तं तमेवैति कौन्तेय तदा तद्भावभावितः।।"
(भगवद गीता ८.६)
अर्थ: "हे कुन्तीपुत्र! शरीर त्यागते समय मनुष्य जिस भाव को स्मरण करता है, उसी को प्राप्त होता है।"
उपनिषद
उपनिषदों में भी मोक्ष की अवधारणा पर विस्तार से चर्चा की गई है। एक प्रसिद्ध उपनिषद श्लोक है:
"तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय।"
(श्वेताश्वतर उपनिषद ३.८)
अर्थ: "उस परमात्मा को जानकर ही मनुष्य मृत्यु को पार कर सकता है, और कोई दूसरा मार्ग नहीं है।"
वेदांत सूत्र
वेदांत सूत्र में भी मोक्ष की प्राप्ति के सम्बन्ध में बताया गया है:
"अथातो ब्रह्म जिज्ञासा।" (वेदांत सूत्र १.१.१)
अर्थ: "अब ब्रह्म की जिज्ञासा करनी चाहिए।"
इन ग्रंथों और श्लोकों से यह स्पष्ट होता है कि मोक्ष की अवधारणा सनातन वैदिक धर्म में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है, और इसकी प्राप्ति के लिए विभिन्न मार्गों का वर्णन किया गया है।
मोक्ष की अवधि के सम्बन्ध में विशिष्ट तथ्य के लिए, यह जानना आवश्यक होगा कि यह प्रमाण किस विशिष्ट ग्रंथ या परंपरा से आ रही है।
(22) प्रश्न :- मोक्ष की अवस्था में स्थूल शरीर या सूक्ष्म शरीर आत्मा के साथ रहता है या नहीं ?
उत्तर :- नहीं मोक्ष की अवस्था में आत्मा पूरे ब्रह्माण्ड का चक्कर लगाता रहता है और ईश्वर के आनन्द में रहता है, बिलकुल ठीक वैसे ही जैसे कि मछली पूरे समुद्र में रहती है। पर जीव को किसी भी शरीर की आवश्यक्ता ही नहीं होती।
(23) प्रश्न :- मोक्ष के उपरान्त आत्मा को शरीर कैसे प्राप्त होता है ?
उत्तर :- सबसे पहला तो आत्मा को कल्प के आरम्भ (सृष्टि आरम्भ) में सूक्ष्म शरीर मिलता है फिर ईश्वरीय मार्ग और औषधियों की सहायता से प्रथम रूप में अमैथुनी जीव शरीर मिलता है, वो शरीर सर्वश्रेष्ठ मनुष्य या विद्वान का होता है जो कि मोक्ष रूपी पुण्य को भोगने के बाद आत्मा को मिला है। जैसे इस वाली सृष्टि के आरम्भ में चारों ऋषि विद्वान (वायु, आदित्य, अग्नि, अंगिरा) को मिला जिनको वेद के ज्ञान से ईश्वर ने अलंकारित किया। क्योंकि ये ही वो पुण्य आत्मायें थीं जो मोक्ष की अवधि पूरी करके आई थीं।
(24) प्रश्न :- मोक्ष की अवधि पूरी करके आत्मा को मनुष्य शरीर ही मिलता है या अन्य किसी पशु का ?
उत्तर :- शत प्रतिशत मनुष्य शरीर ही मिलता है।
(25) प्रश्न :- क्यों केवल मनुष्य का ही शरीर क्यों मिलता है ? पशु का क्यों नहीं ?
उत्तर :- क्योंकि मोक्ष को भोगने के उपरान्त पुण्य कर्मों को तो भोग लिया और इस मोक्ष की अवधि में पाप कोई किया ही नहीं तो पशु बनना सम्भव ही नहीं, तो रहा केवल मनुष्य जन्म जो कि कर्म शून्य आत्मा को मिल जाता है ।
(26) प्रश्न :- मोक्ष होने से पुनर्जन्म क्यों समाप्त हो जाता है ?
उत्तर :- क्योंकि योगाभ्यास आदि साधनों से जितने भी पूर्व कर्म होते हैं (अच्छे या बुरे) वे सब कट जाते हैं। तो ये कर्म ही तो पुनर्जन्म का कारण हैं, कर्म ही न रहे तो पुनर्जन्म क्यों होगा ??
(27) प्रश्न :- पुनर्जन्म से छूटने का उपाय क्या है ?
उत्तर :- पुनर्जन्म से छूटने का उपाय है योग मार्ग से मुक्ति या मोक्ष का प्राप्त करना ।
(28) प्रश्न :- पुनर्जन्म में शरीर किस आधार पर मिलता है ?
उत्तर :- जिस प्रकार के कर्म आपने एक जन्म में किए हैं उन कर्मों के आधार पर ही आपको पुनर्जन्म में शरीर मिलेगा।
(29) प्रश्न :- कर्म कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर :- मुख्य रूप से कर्मों को तीन भागों में बाँटा गया है :- सात्विक कर्म , राजसिक कर्म , तामसिक कर्म।
(१) सात्विक कर्म :- सत्यभाषण, विद्याध्ययन, परोपकार, दान, दया, सेवा आदि।
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| सात्विक जीवन यात्रा |
(२) राजसिक कर्म :- मिथ्याभाषण, क्रीडा, स्वाद लोलुपता, स्त्रीआकर्षण, चलचित्र आदि ।
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| राजसिक जीवन यात्रा |
(३) तामसिक कर्म :- चोरी, पशुवत जीवन, जुआ, ठग्गी, लूटमार, अधिकार हनन, व्यभिचार , आदि।
एक तामसिक जीवन यात्राऔर जो कर्म इन तीनों से बाहर हैं वे दिव्य कर्म कहलाते हैं, जो कि ऋषियों और योगियों द्वारा किए जाते हैं। इसी कारण उनको हम तीनों गुणों से परे मानते हैं। जो कि ईश्वर के निकट होते हैं और दिव्य कर्म ही करते हैं।
(30) प्रश्न :- किस प्रकार के कर्म करने से मनुष्य की योनि प्राप्त होती है ?
उत्तर :- सात्विक और राजसिक कर्मों के मिलेजुले प्रभाव से मानव देह मिलती है, यदि सात्विक कर्म अधिक कम है और राजसिक अधिक तो मानव शरीर तो प्राप्त होगा परन्तु किसी नीच कुल में, यदि सात्विक गुणों का अनुपात बढ़ता जाएगा तो मानव कुल उच्च ही होता जायेगा। जिसने अत्यधिक सात्विक कर्म किए होंगे वो विद्वान मनुष्य के घर ही जन्म लेगा।
(31) प्रश्न :- किस प्रकार के कर्म करने से आत्मा जीव जन्तुओं के शरीर को प्राप्त होता है ?
उत्तर :- तामसिक और राजसिक कर्मों के फलरूप पशु शरीर आत्मा को मिलता है। जितना तामसिक कर्म अधिक किए होंगे उतनी ही नीच योनि उस आत्मा को प्राप्त होती चली जाती है। जैसे लड़ाई स्वभाव वाले, माँस खाने वाले को कुत्ता, गीदड़, सिंह, सियार आदि का शरीर मिल सकता है और घोर तामसिक कर्म किए हुए को साँप, नेवला, बिच्छू, कीड़ा, काकरोच, छिपकली आदि। तो ऐसे ही कर्मों से नीच शरीर मिलते हैं और ये पशुओं के शरीर आत्मा की भोग योनियाँ हैं।
(32) प्रश्न :- तो क्या हमें यह पता लग सकता है कि हम पिछले जन्म में क्या थे ? या आगे क्या होंगे ?
उत्तर :- नहीं कभी नहीं, सामान्य मनुष्य को यह पता नहीं लग सकता। क्योंकि यह केवल ईश्वर का ही अधिकार है कि हमें हमारे कर्मों के आधार पर शरीर दे। वही सब जानता है।
(33) प्रश्न :- तो फिर यह किसको पता चल सकता है ?
उत्तर :- केवल एक सिद्ध योगी ही यह जान सकता है, योगाभ्यास से उसकी बुद्धि। अत्यन्त तीव्र हो चुकी होती है कि वह ब्रह्माण्ड एवं प्रकृति के महत्वपूर्ण रहस्य़ अपनी योगज शक्ति से जान सकता है। उस योगी को बाह्य इन्द्रियों से ज्ञान प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं रहती है
वह अन्तः मन और बुद्धि से सब ज्ञात कर लेता है। उसके सामने भूत और भविष्य दोनों सामने आ खड़े होते हैं।
(34) प्रश्न :- यह बतायें की योगी यह सब कैसे ज्ञात कर लेता है ?
उत्तर :- अभी यह लेख पुनर्जन्म पर है, यहीं से प्रश्न उत्तर का ये क्रम चला देंगे तो लेख का बहुत ही विस्तार हो जायेगा।
(35) प्रश्न :- क्या पुनर्जन्म के कोई प्रमाण हैं ?
उत्तर :- हाँ हैं, जब किसी छोटे बच्चे को देखो तो वह अपनी माता के स्तन से सीधा ही दूध पीने लगता है जो कि उसको बिना सिखाए आ जाता है क्योंकि ये उसका अनुभव पिछले जन्म में दूध पीने का रहा है, अन्यथा बिना किसी कारण के ऐसा हो नहीं सकता। दूसरा यह कि कभी आप उसको कमरे में अकेला लेटा दो तो वो कभी कभी हँसता भी है , ये सब पुराने शरीर की बातों को स्मरण करके वो हँसता है पर जैसे जैसे वो बड़ा होने लगता है तो धीरे धीरे सब विस्मृत कर जाता है...!
(36) प्रश्न :- क्या इस पुनर्जन्म को सिद्ध करने के लिए कोई उदाहरण हैं...?
उत्तर :- हाँ, जैसे अनेकों समाचार पत्रों में, या टीवी में भी आप सुनते हैं कि एक छोटा सा बालक अपने पिछले जन्म की घटनाओं को स्मरण में रखे हुए है, और सभी बातें बताता है जहाँ जिस गाँव में उसका जन्म हुआ, जहाँ उसका घर था, जहाँ पर वो मरा था। इस जन्म में वह अपने उस गाँव में कभी गया तक नहीं था लेकिन इस भी अपने उस गाँव की सभी बातें स्मरण रखे हुए है, किसी ने उसको कुछ बताया नहीं, सिखाया नहीं, दूर दूर तक उसका उस गाँव से इस जन्म में कोई नाता नहीं है। तो भी उसकी गुप्त बुद्धि जो कि सूक्ष्म शरीर का भाग है वह घटनाएँ संजोए हुए है जाग्रत हो गई और बालक बीते जन्म की बातें बताने लग पड़ा...!
(37) प्रश्न :- लेकिन ये सब मनघड़ंत बातें हैं, हम विज्ञान के युग में इसको नहीं मान सकते क्योंकि वैज्ञानिक रूप से ये बातें निरर्थक सिद्ध होती हैं, क्या कोई तार्किक और वैज्ञानिक आधार है इन बातों को सिद्ध करने का ?
उत्तर :- आपको किसने कहा कि हम विज्ञान के विरुद्ध इस पुनर्जन्म के सिद्धान्त का दावा करेंगे। ये वैज्ञानिक रूप से सत्य है और आपको ये हम अभी सिद्ध करके दिखाते हैं..!
(38) प्रश्न :- तो सिद्ध कीजीए ?
उत्तर :- जैसा कि आपको पहले बताया गया है कि मृत्यु केवल स्थूल शरीर की होती है, पर सूक्ष्म शरीर आत्मा के साथ वैसे ही आगे चलता है, तो हर जन्म के कर्मों के संस्कार उस बुद्धि में समाहित होते रहते हैं और कभी किसी जन्म में वो कर्म अपनी वैसी ही परिस्थिती पाने के उपरान्त जाग्रत हो जाते हैं।
इस उदहारण से समझें :- एक बार एक छोटा सा ६ वर्ष का बालक था, यह घटना हरियाणा के सिरसा के एक गाँव की है । जिसमें उसके माता पिता उसे एक स्कूल में घुमाने लेकर गये जिसमें उसका प्रवेश करवाना था और वो बच्चा केवल हरियाणवी या हिन्दी भाषा ही जानता था कोई तीसरी भाषा वो समझ तक नहीं सकता था।
लेकिन हुआ कुछ यूँ था कि उसे स्कूल की Chemistry Lab में ले जाया गया और वहाँ जाते ही उस बच्चे का मूँह लाल हो गया !! चेहरे के मुद्राएं और भाव परिवर्तित गये !!
उसने एकश्वास में बिना रुके फ्रेंच French भाषा बोलनी प्रारम्भ कर दी !! उसके माता पिता भयग्रस्त गये और घबडा गये, तुरंत ही बच्चे को अस्पताल ले जाया गया। जहाँ पर उसकी बातें सुनकर डाकटर ने एक दुभाषिये का प्रबन्ध किया।
जो कि French और हिन्दी जानता था, तो उस दुभाषिए ने सारा वृतान्त उस बालक से पूछा तो उस बालक ने बताया कि " मेरा नाम Simon Glaskey है और मैं French Chemist हूँ । मेरी मृत्यु मेरी प्रयोगशाला में एक दुर्घटना के कारण (Lab) में हुई थी। "
तो यहाँ देखने की बात यह है कि इस जन्म में उसे पुरानी घटना के अनुकूल मिलती जुलती परिस्थिति से अपना वह सब स्मरण हो आया जो कि उसकी गुप्त बुद्धि में दबा हुआ था। यानि कि वही पुराने जन्म में उसके साथ जो प्रयोगशाला में हुआ, वैसी ही प्रयोगशाला उस दूसरे जन्म में देखने पर उसे सब स्मरण हो आया। तो ऐसे ही बहुत से उदहारणों से आप पुनर्जन्म को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध कर सकते हो...!
(39) प्रश्न :- तो ये घटनाएँ भारत में ही क्यों होती हैं ? पूरा विश्व इसको मान्यता क्यों नहीं देता ?
उत्तर :- ये घटनायें पूरे विश्व भर में होती रहती हैं और विश्व इसको मान्यता इसलिए नहीं देता क्योंकि उनको वेदानुसार यौगिक दृष्टि से शरीर का कुछ भी ज्ञान नहीं है। वे केवल माँस और हड्डियों के समूह को ही शरीर समझते हैं और उनके लिए आत्मा नाम की कोई वस्तु नहीं है। तो ऐसे में उनको न जीवन का ज्ञान है, न मृत्यु का ज्ञान है, न आत्मा का ज्ञान है, न कर्मों का ज्ञान है, न ईश्वरीय व्यवस्था का ज्ञान है और यदि कोई पुनर्जन्म की कोई घटना उनके सामने आती भी है तो वो इसे मानसिक रोग जानकर उसको Multiple Personality Syndrome का नाम देकर अपना पीछा छुड़ा लेते हैं और उसके कथनानुसार जाँच नहीं करवाते हैं...!
(40) प्रश्न :- क्या पुनर्जन्म केवल पृथ्वी पर ही होता है या किसी और ग्रह पर भी ?
उत्तर :- ये पुनर्जन्म पूरे ब्रह्माण्ड में यत्र तत्र होता है, कितने असंख्य सौरमण्डल हैं, कितनी ही पृथ्वियां हैं। तो एक पृथ्वी के जीव मरकर ब्रह्माण्ड में किसी दूसरी पृथ्वी के उपर किसी न किसी शरीर में भी जन्म ले सकते हैं। ये ईश्वरीय व्यवस्था के अधीन है...
परन्तु यह बड़ा ही आश्चर्यजनक लगता है कि मान लो कोई हाथी मरकर मच्छर बनता है तो इतने बड़े हाथी की आत्मा मच्छर के शरीर में कैसे घुसेगी..?
यही तो भ्रम है आपका कि आत्मा जो है वो पूरे शरीर में नहीं फैली होती। वो तो हृदय के पास छोटे अणुरूप में होती है । सब जीवों की आत्मा एक सी है। चाहे वो व्हेल मछली हो, चाहे वो एक चींटी ह














































