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रविवार, 12 अप्रैल 2026

केला और उसके लाभ

 केले के गुणकारी लाभ अधिक ही हैं! 🙏 यह एक ऐसा फल है जो हमारे शरीर को कई प्रकार से लाभ पहुंचाता है। आइए, इसके लाभों को विस्तार से जानते हैं:


1. *हृदय का स्वास्थ्य*: केले में पौटेशियम की भरपूर मात्रा होती है, जो सोडियम को बैलेंस करने में सहायता करता है और रक्तचाप या ब्लड प्रेशर को कम करता है। इससे  हृदय का स्वास्थ्य अच्छा रहता है।

2. *ऊर्जा वर्धक या एनर्जी बूस्टर*: केले में फाइबर और कार्बोहाइड्रेट्स होते हैं, जो शरीर को तुरंत एनर्जी देते हैं और लंबे समय तक एनर्जी बनाए रखते हैं।

3. *पाचन*: केले में फाइबर होता है, जो पाचन को व्यवस्थित रखने में सक्षम करता है और विबंध जैसी समस्याओं को समाप्त करता है।

4. *भार नियंत्रक या वेट कंट्रोल*: प्रतिदिन एक केला खाने से शारीरिक भार कम करने में सहायता मिल सकती है, जबकि दो केले खाने से शारीरिक भार बढ़ाने में सहायता मिलती है।

5. *किडनी का स्वास्थ्य*: केले में पौटेशियम होता है, जो एक्सेस कैल्शियम को बाहर निकालने में सक्षम करता है और किडनी में पथरी की संभावना को कम करता है।

6. *ब्लड शुगर कंट्रोल*: केले का ग्लाइसेमिक इंडेक्स लो से मीडियम होता है, जो ब्लड शुगर स्पाइक को कम करता है और ब्लड शुगर को कंट्रोल करने में सहायता करता है।


अनुसंधान के अनुसार, केले में पाए जाने वाले पोषक तत्व जैसे कि पौटेशियम, फाइबर, विटामिन बी6 और सी, आदि हमारे शरीर को कई प्रकार  और से लाभ पहुंचाते हैं।




- एक मध्यम आकार के केले में लगभग 

105 कैलोरी, 

1.3 ग्राम प्रोटीन,

0.3 ग्राम फैट, 

26.9 ग्राम कार्बोहाइड्रेट्स, 

3.1 ग्राम फाइबर, 

1.3 मिलीग्राम सोडियम, 

422 मिलीग्राम पौटेशियम, 

10% विटामिन सी, 

17% विट होते हैं।

 केले के लाभों के सम्बन्ध में अनुसंधान से जुड़े प्रमाण यहाँ हैं:


- *हृदय हेतु*: 

क्योंकि,केले में पोटैशियम की भरपूर मात्रा होती है, जो सोडियम को बैलेंस करने में सहायता करता है और ब्लड प्रेशर को कम करता है। इससे हृदय का स्वास्थ्य अच्छा रहती है। (Singh et al., 2016)।

- * ऊर्जा उत्प्रेरक या एनर्जी बूस्टर*: 

केले में फाइबर और कार्बोहाइड्रेट्स होते हैं, जो शरीर को तुरंत एनर्जी देते हैं और लंबे समय तक एनर्जी बनाए रखते हैं (Harvard Medical School, 2016)।

- *पाचन*: 

केले में फाइबर होता है, जो पाचन को संतुलित रखने में सक्षम करता है और विबंध जैसी समस्याओं को दूर करता है। (National Health Service, UK)।

- *शारीरिक भार नियंत्रण में *: 

प्रतिदिन एक केला खाने से शारीरिक भार कम करने में सहायता मिल सकती है, जबकि दो केले खाने से शारीरिक भार बढ़ाने में सहायता मिलती है। (Better Health Channel, 2016)।

- *किडनी का स्वास्थ्य*: 

केले में पोटैशियम होता है, जो एक्सेस कैल्शियम को बाहर निकालने में सहायता करता है और किडनी में पथरी की संभावना को कम करता है। (National Health Service, UK)।

- *ब्लड शुगर कंट्रोल*: 

केले का ग्लाइसेमिक इंडेक्स लो से मीडियम होता है, जो ब्लड शुगर स्पाइक को कम करता है और ब्लड शुगर को कंट्रोल करने में सहायता करता है। (Harvard Medical School, 2016)।

केले के पौधे का वैज्ञानिक विश्लेषण:


केले का पौधा (Musa acuminata) एक प्रकार का फलदार पौधा है, जो मूल रूप से दक्षिण एशिया और ऑस्ट्रेलिया के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाया जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम मूसा एक्युमिनाटा है, और यह मूसा वंश से संबंधित है।





*वर्गीकरण:*


- राजत: प्लांटे

- वर्ग: लैग्यूमिनोसा

- उपवर्ग: लैग्यूमिनोइडिया

- गण: ज़िंगिबेरालेस

- कुल: मूसा

- वंश: मूसा

- प्रजाति: एम. एक्युमिनाटा


*पौधे की विशेषताएं:*


- केले का पौधा एक बड़ा, हरा और पत्तेदार पौधा होता है, जो 2-10 मीटर तक ऊंचा हो सकता है।

- इसके पत्ते बड़े और चौड़े होते हैं, जो 1-2 मीटर तक लंबे हो सकते हैं।

- केले का फल एक प्रकार का बेरी होता है, जो 10-20 सेमी तक लंबा और 3-5 सेमी तक चौड़ा होता है।

- फल का छिलका हरा या पीला होता है, और इसके अंदर श्वेत या पीले रंग का गूदा होता है।


*पोषक तत्व:*


- केले में कई पोषक तत्व होते हैं, जिनमें पोटैशियम, फाइबर, विटामिन बी6 और सी, आदि सम्मिलित हैं।

- इसमें एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इफ्लेमेटरी गुण भी होते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होते हैं।



*उपयोग:*


- केले का फल कच्चा या पका हुआ खाया जाता है।

- इसका उपयोग विभिन्न प्रकार के व्यंजनों में किया जाता है, जैसे कि स्मूदी, केक, और पाई, सब्जियां बनाने में।

- केले का पत्ता भी उपयोग किया जा सकता है, जैसे कि प्लेट के रूप में या व्यंजनों को पकाने के लिए।

- केले के तने का बीच का भाग अनेकों प्रकार की आयुर्वेदिक औषधियों को बनाने में काम आता है।


केले की कुल प्रजातियों की संख्या के सम्बन्ध में बात करें तो, विश्व में लगभग 1,000 से अधिक प्रकार के केले पाए जाते हैं, जिन्हें 50 समूहों में विभाजित किया गया है।


भारत में, केले की लगभग 500 से अधिक प्रजाति उगाई जाती हैं, लेकिन एक ही प्रजाति को विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न नाम से भी जाना जाता है। भारत में केले की कुछ प्रमुख प्रजाति हैं, - 

रोबस्टा, 

ड्वार्फ कैवेंडिश, 

पूवन, 

नेंद्रन, 

ग्रैंड नैन, आदि।

जैसे कि कर्नाटक में रोबस्टा, ड्वार्फ कैवेंडिश, पूवन, आदि; केरल में नेंद्रन, पलायनकोडन, आदि।


केला शरीर में उपापचय की क्रिया अनुसार कई प्रकार से कार्य करता है:


1. *कार्बोहाइड्रेट्स का स्रोत*: केले में कार्बोहाइड्रेट्स होते हैं, जो शरीर को ऊर्जा प्रदान करते हैं। जब हम केला खाते हैं, तो हमारे शरीर में कार्बोहाइड्रेट्स ग्लूकोज में परिवर्तित हो जाते हैं, जिसे हमारा शरीर ऊर्जा के रूप में उपयोग करता है।

2. *पोटैशियम का स्रोत*: केले में पोटैशियम होता है, जो शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स के संतुलन को बनाए रखने में सहायता करता है। पोटैशियम मांसपेशियों के कार्य, हृदय की कार्यक्षमता, और रक्तचाप को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

3. *फाइबर का स्रोत*: केले में फाइबर होता है, जो पाचन को व्यवस्थित रखने में सक्षम बनाता है। फाइबर मल त्याग को नियमित करने में मदद करता है और विबंध को रोकता है।

4. *विटामिन बी6 का स्रोत*: केले में विटामिन बी6 होता है, जो शरीर में प्रोटीन के चयापचय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विटामिन बी6 तंत्रिका तंत्र के कार्य को भी समर्थन देता है।

5. *एंटीऑक्सीडेंट्स का स्रोत*: केले में एंटीऑक्सीडेंट्स भरपूर होते हैं, जो शरीर को ऑक्सीडेटिव तनाव से बचाते हैं। एंटीऑक्सीडेंट्स फ्री रेडिकल्स को नष्ट करने में सहायता करते हैं, जो शरीर की कोशिकाओं को हानि पहुंचा सकते हैं।


केले के सेवन से शरीर में उपापचय की क्रिया अनुसार कई लाभ होते हैं, जैसे कि:


- ऊर्जा का स्तर बढ़ता है।

- पाचन स्वस्थ रहता है।

- रक्तचाप नियंत्रित रहता है।

- हृदय की कार्यक्षमता में सुधार होता है।

- तंत्रिका तंत्र का कार्य सुचारू रखता है।

बुधवार, 4 मार्च 2026

 तुलसी एक वरदान है! 🌿 इसके कई उपयोगी लाभ हैं:




*शीत और ज्वर में*: तुलसी के पत्ते, मिश्री, और काली मिर्च का काढ़ा पीने से शीत लगना और ज्वर में लाभ मिलता है।

*अनियमित मासिक स्राव या पीरियड्स में*: तुलसी के बीज या पत्ते का सेवन करने से मासिक चक्र की अनियमितता दूर होती है।

* अतिसार में*: तुलसी के पत्ते और जीरे का पेस्ट बनाकर चाटने से अतिसार रुक जाती है।

*सांस की दुर्गंध में*: तुलसी के पत्ते चबाने से सांस की दुर्गंध दूर होती है।

*चोट लगने पर*: तुलसी के पत्ते और फिटकरी का पेस्ट लगाने से व्रण शीघ्र ठीक होता है।

*चेहरे की कांति के लिए*: तुलसी के पत्ते का प्रयोग करने से कील-मुहांसे समाप्त होते हैं और चेहरा कांतिमान होता है।

*कैंसर के उपचार में*: तुलसी के बीज कैंसर के उपचार में लाभकारी हो सकते हैं (चूंकि कि अभी तक इसकी पुष्टि नहीं हुई है)।

तुलसी का वानस्पतिक वर्गीकरण निम्नलिखित है:

*वैज्ञानिक नाम*:  Ocimum tenuiflorum

*कुल*:  लैमियासी (Lamiaceae)

*वंश*:  Ocimum

*प्रजाति*:  O. tenuiflorum

तुलसी एक द्विबीजपत्री पौधा है, जो लैमियासी कुल से संबंधित है। इसके दो मुख्य प्रकार हैं:

1. *राम तुलसी* ( Ocimum sanctum ): यह सबसे अधिक पाई जाने वाली का प्रकार है, जिसके पत्ते हरे और तने लाल होते हैं।

2. *श्याम तुलसी* ( Ocimum tenuiflorum ): इसके पत्ते और तने दोनों ही हरे या बैंगनी होते हैं।

तुलसी के पौधे में कई औषधीय गुण होते हैं, जैसे कि:

*एंटी-बैक्टीरियल*: तुलसी में एंटी-बैक्टीरियल गुण होते हैं, जो संक्रमण को रोकने में सहायता करते हैं।

*एंटी-इफ्लेमेटरी*: तुलसी में एंटी-इफ्लेमेटरी गुण होते हैं, जो शोथ और पीड़ा को कम करने में सहायता करते हैं।

*एंटी-ऑक्सीडेंट*: तुलसी में एंटी-ऑक्सीडेंट गुण होते हैं, जो शरीर को ऑक्सीडेटिव तनाव से बचाने में सक्षम करते हैं।

तुलसी का उपयोग कई प्रकार से किया जा सकता है, जैसे कि:

*चाय*: तुलसी की चाय पीने से शीत, ज्वर, और तनाव में लाभ मिलता है।

*काढ़ा*: तुलसी का काढ़ा पीने से पाचन तंत्र स्वस्होथ ता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

*सलाद*: तुलसी के पत्ते सलाद में मिलाकर खाने से स्वाद और पौष्टिकता बढ़ती है।

🌟 तुलसी के कुछ प्रकार 





वन तुलसी, जिसे Ocimum gratissimum के नाम से भी जाना जाता है, एक प्रकार की तुलसी है जो वन और खुले क्षेत्रों में पाई जाती है। इसका वैज्ञानिक वर्गीकरण निम्नलिखित है:

*वैज्ञानिक नाम*:  Ocimum gratissimum

**:  लैमियासी (Lamiaceae)

*वंश*:  Ocimum

*प्रजाति*:  O. gratissimum

वन तुलसी एक झाड़ीदार पौधा है, जो 1-2 मीटर तक ऊंचा हो सकता है। इसके पत्ते हरे, अरोमैटिक, और थोड़े खुरदरे होते हैं। इसके फूल छोटे, श्वेत या हल्के बैंगनी रंग के होते हैं।

वन तुलसी के कई औषधीय गुण हैं, जैसे कि:

*एंटी-बैक्टीरियल*: वन तुलसी में एंटी-बैक्टीरियल गुण होते हैं, जो संक्रमण को रोकने में सहायता करते हैं।

*एंटी-इफ्लेमेटरी*: वन तुलसी में एंटी-इफ्लेमेटरी गुण होते हैं, जो शोथ और पीड़ा को कम करने में सहायता करते हैं।

*एंटी-ऑक्सीडेंट*: वन तुलसी में एंटी-ऑक्सीडेंट गुण होते हैं, जो शरीर को ऑक्सीडेटिव तनाव से बचाने में सक्षम करते हैं।

वन तुलसी का उपयोग कई प्रकार से किया जा सकता है, जैसे कि:

*चाय*: वन तुलसी की चाय पीने से शीत, ज्वर, और तनाव में लाभ मिलता है।

*काढ़ा*: वन तुलसी का काढ़ा पीने से पाचन तंत्र सबल होता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

*सलाद*: वन तुलसी के पत्ते सलाद में मिलाकर खाने से स्वाद और पौष्टिकता बढ़ती है।

🌟वन तुलसी के अन्य नाम हैं:

*काजल तुलसी*

*रजनी तुलसी*

*वनस्पति तुलसी*

वन तुलसी का उपयोग आयुर्वेदिक और प्राकृतिक चिकित्सा और पारंपरिक चिकित्सा में भी किया जाता है।

ऐसे तो तुलसी के लगभग 100 प्रकार होते हैं, लेकिन मुख्य रूप से 5-13 प्रकार की तुलसी होती हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख हैं :

1,*राम तुलसी* (Ocimum sanctum): इसकी पत्तियां हरी और मीठी होती हैं।

2,*श्याम तुलसी* (Ocimum tenuiflorum): इसकी पत्तियां बैंगनी और कड़वी होती हैं।

3,*श्वेत तुलसी* (Ocimum tenuiflorum): इसकी पत्तियां श्वेत और मीठी होती हैं।

4,*वन तुलसी* (Ocimum gratissimum): यह वन तुलसी है, जो हिमालय की तलहटी में पाई जाती है।

5,*नींबू तुलसी* (Ocimum citriodorum): इसकी पत्तियां नींबू जैसी सुगन्ध वाली होती हैं।

6,*कपूर तुलसी* (Ocimum kilimandscharicum): इसकी पत्तियां कर्पूर जैसी सुगन्ध वाली होती हैं।

7,*अमेरिकन बेसिल* (Ocimum americanum)

8,*लेट्यूस लीफ बेसिल*

9,*कार्डिनल बेसिल*

10,*ग्रीक बेसिल*

11,*समर लॉन्ग बेसिल*

आगे और भी कुछ जानना चाहते हो तो प्रश्न करें और टिप्पणियां भेजें। समयानुसार उत्तर मिलेगा।


बुधवार, 4 फ़रवरी 2026

II अथ संपूर्ण रुद्राष्टाध्यायी II

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II अथ संपूर्ण रुद्राष्टाध्यायी II

अथ ध्यानम् –

ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारु चन्द्रवतंसम् ।

रत्नाकल्पोज्ज्वलाङ्गं परशु मृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम् ॥

पद्मासीनं समन्तात् स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृतिं वसानम् ।

विश्वाद्यं विश्ववन्द्यं निखिलभयहरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम् ॥



रुद्राष्टाध्यायी प्रथम अध्याय – ॥ प्रथमोऽध्यायः ॥


ॐ गणानां त्वा गणपति ᳪ हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपति ᳪ हवामहे

निधीनां त्वा निधीपति ᳪ हवामहे वसो मम ।

आहमजानिगर्भधमात्त्वमजासि गर्भधम् ॥१॥


गायत्रीत्रिष्टुब्जगत्यनुष्टुप्पङ्क्त्यासह ॥

बृहत्युष्णिहाककुप्सूचीभिः शम्यन्तु त्वा ॥२॥


द्विपदायाश्चतुष्पदास्त्रिपदायाश्चषट्पदाः ।

विच्छन्दा याश्च सच्छन्दाः सूचीभिः शम्यन्तु त्वा ॥३॥

सहस्तोमाः सहछन्दस ऽआवृतः सहप्रमाः ऽऋषयः सप्तदैव्याः ॥

पूर्वेषां पन्थामनुदृश्य धीरा ऽअन्वालेभिरे रथ्यो न रश्मीन् ॥४॥


यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति ॥

दूरङ्गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ॥५॥


येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः ॥

यदपूर्वं यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ॥६॥


यत्प्रज्ञानमुतचेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु ॥

यस्मान्न ऽऋते किञ्चन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ॥७॥


येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत्परिगृहीतममृतेन सर्वम् ॥

येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ॥८॥


यस्मिन् ऋचः सामयजू ᳪ षि यस्मिन्प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः ॥

यस्मिन् चित्त ᳪ सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ॥९॥


सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्प्यान्नेनीयतेभीशुभिर्वाजिनऽइव ॥

हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु ॥१०॥


इति रुद्राष्टाध्यायी प्रथमोऽध्यायः ॥१॥



रुद्री का दूसरा अध्याय – ॥ द्वितीयोऽध्यायः ॥


ॐ सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ।

स भूमि ᳪ सर्वत स्पृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥१॥


पुरुष ऽएवेद ᳪ सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम् ।

उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥२॥


एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः ।

पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥३॥


त्रिपादूर्ध्व ऽउदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत् पुनः ।

ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने ऽअभि ॥४॥


ततो विराडजायत विराजो ऽअधि पूरुषः ।

स जातो ऽअत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः ॥५॥


तस्माद्यज्ञात् सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम् ।

पशूँस्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये ॥६॥


तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऽऋचः सामानि जज्ञिरे ।

छन्दा ᳪ सि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ॥७॥


तस्मादश्वा ऽअजायन्त ये के चोभयादतः ।

गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता ऽअजावयः ॥८॥


तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः ।

तेन देवा ऽअयजन्त साध्या ऽऋषयश्च ये ॥९॥


यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन् ।

मुखं किमस्यासीत्किम्बाहू किमूरू पादा ऽउच्येते ॥१०॥


ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः ।

ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्या ᳪ शूद्रो ऽअजायत ॥११॥


चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो ऽअजायत ।

श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत ॥१२॥


नाभ्या ऽआसीदन्तरिक्ष ᳪ शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत ।

पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ२ऽकल्पयन् ॥१३॥


यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत ।

वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्म ऽइध्मः शरद्धविः ॥१४॥


सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः ।

देवा यद्यज्ञं तन्वाना ऽअबध्नन् पुरुषं पशुम् ॥१५॥


यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ।

ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥१६॥


अद्भ्यः सम्भृतः पृथिव्यै रसाच्च विश्वकर्मणः समवर्तताग्रे ।

तस्य त्वष्टा विदधद्रूपमेति तन्मर्त्यस्य देवत्वमाजानमग्रे ॥१७॥


वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।

तमेव विदित्वाति मृत्युमत्येति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥१८॥


प्रजापतिश्चरति गर्भे ऽअन्तरजायमानो बहुधा विजायते ।

तस्य योनिम् परिपश्यन्ति धीरास्तस्मिन् ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा ॥१९॥


यो देवेभ्य ऽआतपति यो देवानां पुरोहितः ।

पूर्वो यो देवेभ्यो जातो नमो रुचाय ब्राह्मये ॥२०॥


रुचं ब्राह्मं जनयन्तो देवा ऽअग्रे तदब्रुवन् ।

यस्त्वैवं ब्राह्मणो विद्यात्तस्य देवा ऽअसन् वशे ॥२१॥


श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यावहोरात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि रूपमश्विनौ व्यात्तम् ।

इष्णन्निषाणामुं म ऽइषाण । सर्वलोकं म ऽइषाण ॥२२॥


इति रुद्राष्टाध्यायी द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥





रुद्री का तीसरा अध्याय – ॥ तृतीयोऽध्यायः ॥


ॐ आशु: शिशानोवृषभो न भीमो घनाघन: क्षोभणश्चर्षणीनाम्।

संक्रन्दनो ऽनिमिष एकवीरः शत ᳪ सेना ऽअजयत् साकमिन्द्रः॥१॥

संक्रन्दनेनानिमिषेण जिष्णुना युत्कारेण दुश्च्यवनेन धृष्णुना।

तदिन्द्रेण जयत तत्सहध्वं युधो नर ऽइषुहस्तेन वृष्णा॥२॥


सऽइषुहस्तैः सनिषङ्गिभिर्वशी ᳪ स्रष्टा सयुधऽइन्द्रोगणेन।

स ᳪ सृष्टजित्सोमपा बाहुशर्ध्युग्रधन्वा प्रतिहिताभिरस्ता॥३॥


बृहस्पते परिदीया रथेन रक्षोहामित्राँ२ ऽअपबाधमानः।

प्रभञ्जन्त्सेनाः प्रमृणो युधा जयन्नस्माकमेध्यविता रथानाम्॥४॥


बलविज्ञाय स्थविरः प्रवीरः सहस्वान् वाजी सहमान ऽउग्रः।

अभिवीरो ऽअभित्त्वा सहोजा जैत्रमिन्द्र रथमा तिष्ठ गोवित्॥५॥


गोत्रभिदं गोविदं वज्रबाहुं जयन्तमज्म प्रमृणन्तमोजसा।

इम ᳪ सजाता ऽअनुवीरयध्वमिन्द्र ᳪ सखायो ऽअनुस ᳪ रभध्वम्॥६॥


अभिगोत्राणि सहसा गाहमानोऽदयो वीरः शतमन्युरिन्द्रः।

दुश्च्यवनः पृतनाषाडयुध्योऽस्माक ᳪ सेना ऽअवतु प्र युत्सु॥७॥


इन्द्र ऽआसान्नेता बृहस्पतिर्दक्षिणा यज्ञः पुर ऽएतु सोमः।

देवसेनानामभिभञ्जतीनां जयन्तीनां मरुतोयन्त्वग्रम्॥७॥


इन्द्रस्य वृष्णोवरुणस्य राज्ञऽआदित्यानां मरुता ᳪ शर्द्धऽउग्रम्।

महामनसां भुवनच्यवानां घोषो देवानां जयतामुदस्थात्॥९॥


उद्धर्षय मघवन्नायुधान्युत्सत्वनां मामकानां मना ᳪ सि।

उद्वृत्रहन्वाजिनां वाजिनान्युद्रथानां जयतां यन्तु घोषाः॥१०॥


अस्माकमिन्द्र: समृतेषु ध्वजेष्वस्माकं या ऽइषवस्ता जयन्तु।

अस्माकं वीरा उत्तरे भवन्त्वस्माँ२ उ देवा ऽअवता हवेषु॥११॥


अमीषां चित्तं प्रतिलोभयन्ती गृहाणाङ्गान्यप्वे परेहि।

अभि प्रेहिनिर्दह हृत्सु शोकैरन्धेनामित्रास्तमसा सचन्ताम्॥१२॥


अवसृष्टा परापत शरव्ये ब्रह्मस ᳪ शिते।

गच्छामित्रान् प्रपद्यस्व मामीषां कंचनोच्छिषः॥१३॥


प्रेता जयता नर ऽइन्द्रो वः शर्म यच्छतु।

उग्रा वः सन्तु बाहवोनाधृष्या यथासथ॥१४॥


असौ या सेना मरुतः परेषामभ्यैति न ऽओजसा स्पर्धमाना।

तां गूहत तमसापव्रतेन यथाऽमी ऽअन्यो ऽअन्यं न जानन्॥१५॥


यत्र बाणा: सम्पतन्ति कुमारा विशिखा ऽइव।

तन्न इन्द्रोबृहस्पतिरदितिः शर्म्म यच्छतु विश्वाहा शर्म्मयच्छतु॥१६॥


मर्म्माणि ते वर्म्मणा च्छादयामि सोमस्त्वा राजामृतेनानु वस्ताम्।

उरोर्वरीयो वरुणस्ते कृणोतु जयन्तं त्वानु देवा मदन्तु ॥१७॥


इति रुद्राष्टाध्यायी तृतीयोऽध्यायः ॥३॥







॥ चतुर्थोऽध्यायः ॥


ॐ विभ्राड् बृहत्पिबतु सोम्यं मध्वायुर्दधद्यज्ञपतावविह्रुतम् ।

वातजूतो यो ऽअभिरक्षति त्मना प्रजाः पुपोष पुरुधा वि राजति ॥१॥


उदुत्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः । दृशे विश्वाय सूर्यम् ॥२॥


येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तं जनाँ२ ऽअनु । त्वं वरुण पश्यसि ॥३॥


दैव्यावध्वर्यू ऽआ गत ᳪ रथेन सूर्यत्वचा । मध्वा यज्ञ ᳪ समञ्जाथे ।

तं प्रत्नथाऽयंवेनश्चित्रं देवानाम् ॥४॥


तं प्रत्नथा पूर्वथा विश्वथेमथा ज्येष्ठतातिं बर्हिषद ᳪ स्वर्विदम् ।

प्रतीचीनं वृजनं दोहसे धुनिमाशुं जयन्तमनु यासु वर्द्धसे ॥५॥


अयं वेनश्चोदयत् पृश्निगर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो विमाने ।

इममपा ᳪ सङ्गमे सूर्यस्य शिशुं न विप्रा मतिभी रिहन्ति ॥६॥


चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः ।

आप्रा द्यावापृथिवी ऽअन्तरिक्ष ᳪ सूर्य ऽआत्मा जगतस्तस्थुषश्च ॥७॥


आ न ऽइडाभिर्विदथे सुशस्ति विश्वानरः सविता देव ऽएतु ।

अपि यथा युवानो मत्सथा नो विश्वं जगदभिपित्वे मनीषा ॥८॥


यदद्य कच्च वृत्रहन्नुदगा ऽअभि सूर्य । सर्वं तदिन्द्र ते वशे ॥९॥


तरणिर्विश्वदर्शतो ज्योतिष्कृदसि सूर्य । विश्वमा भासि रोचनम् ॥१०॥


तत् सूर्यस्य देवत्वं तन्महित्वं मध्या कर्तोर्वितत ᳪ सञ्जभार ।

यदेदयुक्त हरितः सधस्थादाद्रात्री वासस्तनुते सिमस्मै ॥११॥


तन्मित्रस्य वरुणस्याभिचक्षे सूर्यो रूपं कृणुते द्योरुपस्थे ।

अनन्तमन्यद्रुशदस्य पाजः कृष्णमन्यद्धरितः सम्भरन्ति ॥१२॥


बण्महाँ२ ऽअसि सूर्य बडादित्य महाँ२ ऽअसि ।

महस्ते सतो महिमा पनस्यतेद्धा देव महाँ२ ऽअसि ॥१३॥


बट्सूर्य श्रवसा महाँ२ ऽअसि सत्रा देव महाँ२ ऽअसि ।

मन्हा देवानामसुर्यः पुरोहितो विभु ज्योतिरदाभ्यम् ॥१४॥


श्रायन्त ऽइव सूर्यं विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत ।

वसूनि जाते जनमान ऽओजसा प्रति भागन्न दीधिम ॥१५॥


अद्या देवा ऽउदिता सूर्यस्य निर ᳪ हसः पिपृता निरवद्यात् ।

तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी ऽउत द्यौः ॥१६॥


आ कृष्णेन रजसा वर्त्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च ।

हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् ॥१७॥


इति रुद्राष्टाध्यायी चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥


रुद्री का पांचवा अध्याय – ॥ पञ्चमोऽध्यायः ॥


ॐ नमस्ते रुद्द्र मन्न्यव ऽउतो त ऽइषवे नमः ।

बाहुब्भ्यामुत ते नमः ॥१॥


या ते रुद्द्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी ।

तयानस्तन्न्वाशन्तमया गिरिशन्ताभिचाकशीहि ॥२॥


यामिषुङ्गिरिशन्तहस्ते बिभर्ष्ष्यस्तवे ।

शिवाङ्गिरित्रताङ्कुरुमा हि ᳪ सीः पुरुषञ्जगत् ॥३॥


शिवेनव्वचसात्त्वागिरिशाच्छाव्वदामसि ।

यथा नः सर्व्वमिज्जगदयक्ष्म ᳪ सुमनाऽअसत् ॥४॥


अद्धयवोचदधिवक्क्ताप्प्रथमोदैव्व्योभिषक्।

अहीँश्च्चसर्व्वाञ्जभयन्त्सर्व्वाश्च्चयातुधान्न्योऽधराचीः परासुव॥५॥


असौयस्ताम्म्रोऽअरुणऽउतबब्भ्रुः सुमङ्गलः ।

ये चैन ᳪ रुद्द्राऽअभितोदिक्षुश्रिताः सहस्रशोऽवैषा ᳪ हेडऽईमहे ॥६॥


असौ योऽवसर्प्पति नीलग्ग्रीवो व्विलोहितः।

उतैङ्गोपाऽअदृश्श्रन्नदृश्श्रन्नुदहार्य्यः सदृष्टो मृडयातिनः ॥७॥


नमोऽस्तु नीलग्ग्रीवाय सहस्राक्षायमीढुषे।

अथोये ऽअस्य सत्त्वानोऽहन्तेब्भ्योऽकरन्नमः ॥८॥


प्प्रमुञ्चधन्न्वनस्त्वमुभयोरार्त्क्ज्याम्।

याश्च्च तेहस्तऽइषवः पराता भगवोव्वप ॥९॥


व्विज्ज्यन्धनुः कपर्द्दिनो व्विशल्ल्यो बाणवाँ२ ऽउत ।

अनेशन्नस्ययाऽइषव ऽआभुरस्यनिषङ्गधिः ॥१०॥


याते हेतिर्म्मीढुष्ट्टमहस्ते बभूव ते धनुः।

तयास्म्मान्निवश्श्वतस्त्वमयक्ष्म्मया परिभुज ॥११॥


परि ते धन्न्वनोहेतिरस्म्मान्न्व्वृणक्तु व्विश्श्वतः।

अथोयऽइषुधिस्तवारेऽअस्म्मन्निधेहितम् ॥१२॥


अवतत्त्य धनुष्ट्व ᳪ सहस्राक्षशतेषुधे।

निशीर्य्यशल्ल्यानाम्मुखा शिवोनः सुमना भव ॥१३॥


नमस्त ऽआयुधायानातताय धृष्ष्णवे।

उभाब्भ्यामुतते नमो बाहुब्भ्यान्तव धन्न्वने ॥१४


मानोमहान्तमुतमानोऽअर्ब्भकम्मानऽउक्षन्तमुतमानऽउक्षितम् ।

मानोव्वधीः पितरम्मोतमातरम्मानः प्प्रियास्तन्न्वो रुद्द्ररीरिषः ॥१५॥


मानस्तोकेतनये मानऽआयुषिमानो गोषुमानोऽअश्वेषुरीरिषः।

मानोव्वीरान्न्रुद्द्रभामिनोव्वधीर्हविष्म्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे ॥१६॥


नमोहिरण्ण्यबाहवे सेनान्न्ये दिशाञ्चपतये नमोनमो व्वृक्षेब्भ्यो हरिकेशेब्भ्यः पशूनाम्पतये नमोनमः शष्प्पिञ्जरायत्त्विषीमते पथीनाम्पतये नमोनमो हरिकेशायोपवीतिने पुष्ट्टानाम्पतये नमोनमो बब्भ्लुशाय ॥१७॥


नमो बब्भ्लुशाय व्व्याधिनेऽन्नानांपतये नमोनमो भवस्यहेत्यै जगताम्पतये नमोनमो रुद्रायाततायिने क्षेत्राणाम्पतये नमोनमः सूतायाहन्त्यै व्वनानाम्पतये नमोनमो रोहिताय ॥१८॥


नमो रोहितायस्थपतये व्वृक्षाणाम्पतये नमोनमो भुवन्तये व्वारिवस्कृतायौषधीनाम्पतये नमोनमो मन्त्रिणे व्वाणिजायकक्षाणाम्पतये नमोनमऽउच्चैर्घोषाया क्क्रन्दयते पत्तीनाम्पतये नमोनमः कृत्स्नायतया ॥१९॥


नमः कृत्स्नायतया धावते सत्त्वनाम्पतये नमोनमः सहमानायनिव्व्याधिन ऽआव्व्याधिनीनाम्पतये नमोनमो निषङ्गिणे ककुभायस्तेनानाम्पतये नमोनमो निचेरवे परिचरायारण्ण्यानाम्पतये नमोनमो वञ्चते ॥२०॥


नमो वञ्चते परिवञ्चतेस्तायूनाम्पतये नमोनमो निषङ्गिणऽइषुधिमते तस्क्कराणाम्पतये नमोनमः सृकायिब्भ्यो जिघा ᳪ सद्ब्भ्योमुष्णताम्पतये नमोनमो ऽसिमद्ब्भ्योनक्क्तञ्चरद्ब्भ्यो व्विकृन्तानाम्पतये नमः ॥२१॥


नमऽउष्ष्णीषिणे गिरिचराय कुलुञ्चानाम्पतये नमोनम ऽइषुमद्ब्भ्यो धन्न्वायिब्भ्यश्च वो नमोनमऽआतन्न्वानेब्भ्यः प्रतिदधानेब्भ्यश्च वोनमोनमऽआयच्छद्ब्भ्योऽस्यद्ब्भ्यश्चवो नमोनमो व्विसृजद्ब्भ्यः॥२२॥


नमो व्विसृजद्ब्भ्यो व्विद्धयद्ब्भ्यश्च वो नमोनमः स्वपद्ब्भ्यो जाग्रद्ब्भ्यश्च वो नमोनमः शयानेब्भ्यऽआसीनेब्भ्यश्च वो नमोनमस्तिष्ठद्ब्भ्यो धावद्ब्भ्यश्च वो नमोनमः सभाब्भ्यः ॥२३॥


नमः सभाब्भ्यः सभापतिब्भ्यश्च वो नमोनमो ऽश्वेब्भ्यो ऽश्वपतिब्भ्यश्च वो नमोनम ऽआव्व्याधिनीब्भ्यो व्विविद्धयन्तीब्भ्यश्च वो नमोनम उगणाब्भ्यस्तृ ᳪ हतीब्भ्यश्च वो नमोनमो गणेब्भ्यः ॥२४॥


नमो गणेब्भ्यो गणपतिब्भ्यश्च वो नमोनमो व्व्रातेब्भ्यो व्व्रातपतिब्भ्यश्च वो नमोनमो गृत्सेब्भ्यो गृत्सपतिब्भ्यश्च वो नमोनमो व्विरूपेब्भ्यो व्विश्वरुपेब्भ्यश्च वो नमोनमः सेनाब्भ्यः ॥२५॥


नमः सेनाब्भ्यः सेनानिब्भ्यश्च वो नमोनमो रथिब्भ्यो ऽअरथेब्भ्यश्च वो नमोनमः क्षत्तृब्भ्यः संग्रहीतृब्भ्यश्च वो नमोनमो महद्ब्भ्यो ऽअर्ब्भकेब्भ्यश्च्च वो नमः ॥२६॥


नमस्तक्षब्भ्यो रथकारेब्भ्यश्च वो नमोनमः कुलालेब्भ्यः कर्म्मारेब्भ्यश्च वो नमोनमो निषादेब्भ्यः पुञ्जिष्ट्ठेब्भ्यश्च वो नमोनमः श्वनिब्भ्योमृगयुब्भ्यश्च वो नमोनमः श्वब्भ्यः ॥२७॥


नमः श्वब्भ्यः श्वपतिब्भ्यश्च वो नमोनमो भवाय च रुद्राय च नमः शर्व्वाय च पशुपतये च नमो नीलग्ग्रीवाय च शितिकण्ठाय च नमः कपर्द्दिने ॥२८॥


नमः कपर्द्दिने च व्व्युप्तकेशाय च नमः सहस्राक्षाय च शतधन्न्वने च नमो गिरिशयाय च शिपिविष्ट्टाय च नमो मीढुष्ट्टमाय चेषुमते च नमो ह्रस्वाय ॥२९॥


नमो ह्रस्वाय च व्वामनाय च नमो बृहते च व्वर्षीयसे च नमो वृद्धाय च सवृधे च नमो ऽग्ग्र्याय च प्रथमाय च नम ऽआशवे ॥३०॥


नमऽआशवे चाजिराजाय च नमः शीग्घ्र्याय च शीब्भ्याय च नमऽऊर्म्म्याय चावस्वन्न्याय च नमो नादेयाय च द्द्वीप्प्याय च ॥३१॥


नमो जयेष्ठ्ठाय च कनिष्ठ्ठाय च नमः पूर्व्वजाय चापरजाय च नमो मद्ध्यमाय चापगल्ब्भाय च नमो जघन्न्याय च बुध्न्याय च नमः सोब्भ्याय ॥३२॥


नमः सोब्भ्याय च प्रतिसर्य्याय च नमो याम्म्याय च क्षेम्म्याय च नमः श्लोक्क्याय चावसान्न्याय च नम उर्व्वर्याय च खल्ल्याय च नमो व्वन्न्याय ॥३३॥


नमो व्वन्न्याय च कक्ष्याय च नमः श्रवाय च प्प्रतिश्रवाय च नम आशुषेणाय चाशुरथाय च नमः शूराय चावभेदिने च नमो बिल्मिने ॥३४॥


नमो बिल्मिने च कवचिने च नमो व्वर्मिणे च व्वरूथिने च नमः श्रुताय च श्रुतसेनाय च नमो दुन्दुब्भ्याय चाहनन्न्याय च नमो धृष्ष्णवे ॥३५॥


नमो धृष्ष्णवे च प्रमृशाय च नमो निषङ्गिणे चेषुधिमते च नमस्तीक्ष्णेषवे चायुधिने च नमः स्वायुधाय च सुधन्वने च ॥३६॥


नमः स्रुत्याय च पथ्याय च नमः काट्टयाय च नीप्प्याय च नमः कुल्ल्याय च सरस्याय च नमो नादेयाय च व्वैशन्ताय च नमः कूप्प्याय ॥३७॥


नमः कूप्प्याय चावट्टयाय च नमो व्वीद्ध्र्याय चातप्प्याय च नमो मेग्घ्याय च व्विद्द्युत्याय च नमो व्वर्ष्ष्याय चाव्वर्ष्ष्याय च नमो व्वात्त्याय ॥३८॥


नमो व्वात्त्याय च रेष्म्म्याय च नमो व्वास्तव्व्याय च व्वास्तुपाय च नमः सोमाय च रुद्राय च नमस्ताम्राय चारुणाय च नमः शङ्गवे ॥३९॥


नमः शङ्गवे च पशुपतये च नमऽउग्ग्राय च भीमाय च नमो ऽग्ग्रेव्वधाय च दूरेव्वधाय च नमो हन्त्रे च हनीयसे च नमो व्वृक्षेब्भ्यो हरिकेशेब्भ्यो नमस्ताराय ॥४०॥


नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शङ्कराय च मयस्क्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च ॥४१॥


नमः पार्य्याय चावार्य्याय च नमः प्प्रत्तरणाय चोत्तरणाय च नमस्तीर्त्थ्याय च कूल्ल्याय च नमः शष्प्याय च फ़ेन्न्याय च नमः सिकत्त्याय ॥४२॥


नमः सिकत्त्याय च प्प्रवाह्य्याय च नमः कि ᳪ शिलाय च क्षयणाय च नमः कपर्द्दिने च पुलस्तये च नम ऽइरिण्ण्याय च प्प्रपत्थ्याय च नमो व्व्रज्ज्याय ॥४३॥


नमो व्व्रज्ज्याय च गोष्ठयाय च नमस्तल्प्प्याय च गेह्य्याय च नमो हृदय्याय च निवेष्प्याय च नमः काट्टयाय च गह्वरेष्ठ्ठाय च नमः शुष्क्क्याय ॥४४॥


नमः शुष्क्क्याय च हरित्याय च नमः पा ᳪ सव्व्याय च रजस्याय च नमो लोप्प्याय चोलप्प्याय च नमऽउर्व्व्याय च सूर्व्व्याय नमः पर्ण्णाय ॥४५॥


नमः पर्ण्णाय च पर्ण्णशदाय च नमऽउद्गुरमाणाय चाभिघ्नते च नमऽआखिदते च प्प्रखिदते च नमऽइषुकृद्ब्भ्यो धनुष्कृद्ब्भयश्च वो नमोनमो वः किरिकेब्भ्यो देवाना ᳪ हृदयेब्भ्यो नमो व्विचिन्न्वत्केब्भ्योनमो व्विक्षिणत्केब्भ्यो नमऽआनिर्हतेब्भ्यः ॥४६॥


द्द्रापेऽअन्धसस्प्पतेदरिद्द्रनीललोहित ।

आसाम्प्रजानामेषाम्पशूनाम्माभेर्म्मारोङ्मोचनः किञ्चनाममत् ॥४७॥


इमारुद्द्रायतवसे कपर्द्दिने क्षयद्वीराय प्प्रभरामहेमतीः ।

यथाषमसद्द्विपदे चतुष्ष्पदे व्विश्व्म्पुष्टङ्ग्रामेऽअस्म्मिन्ननातुरम् ॥४८॥


याते रुद्द्र शिवा तनूः शिवा व्विश्वाहाभेषजी ।

शिवारुतस्य भेषजी तयानो मृडजीवसे ॥४९॥


परिनोरुद्द्रस्य हेतिर्व्वृणक्क्तु परित्वेषस्य दुर्मतिरघायोः ।

अवस्त्थिरामघवद्ब्भ्यस्तनुष्ष्वमीड्ढवस्तोकाय तनयाय मृड ॥५०॥


मीढुष्ट्टमशिवतमशिवो नः सुमना भव।

परमे व्वृक्षऽआयुधन्निधाय कृत्तिंव्वसानऽआचरपिनाकम्बिब्भ्रदागहि ॥५१॥


व्विकिरिद्द्रव्विलोहित नमस्तेऽअस्तुभगवः।

यास्ते सहस्र ᳪ हेतयोऽन्न्यमस्म्मन्निव पन्तुताः ॥५२॥


सहस्राणि सहस्रशोबाह्वोस्तव हेतयः।

तासामीशानो भगवः पराचीनामुखाकृधि ॥५३॥


असङ्ख्याता सहस्राणि ये रुद्द्राऽअधिभूम्म्याम्।

तेषा ᳪ सहस्रयोजनेऽवधन्न्वानि तन्न्मसि ॥५४॥


अस्म्मिन्न्महत्त्यर्ण्णवेऽन्तरिक्षे भवाऽअधि।

तेषा ᳪ सहस्रयोजनेऽवधन्न्वानि तन्न्मसि ॥५५॥


नीलग्ग्रीवाः शितिकण्ठा दिव ᳪ रुद्द्राऽउपश्श्रिताः।

तेषा ᳪ सहस्रयोजनेऽवधन्न्वानि तन्न्मसि ॥५६॥


नीलग्ग्रीवाः शितिकण्ठाः शर्व्वाऽअधः क्षमाचराः।

तेषा ᳪ सहस्रयोजनेऽवधन्न्वानि तन्न्मसि ॥५७॥


ये व्वृक्षेषु शष्पिञ्जरा नीलग्ग्रीवा व्विलोहिताः।

तेषा ᳪ सहस्रयोजनेऽवधन्न्वानि तन्न्मसि ॥५८॥


ये भूतानामधिपतयो व्विशिखासः कपर्द्दिनः।

तेषा ᳪ सहस्रयोजनेऽवधन्न्वानि तन्न्मसि ॥५९॥


ये पथाम्पथि रक्षयऽऐलबृदाऽआयुर्य्युधः।

तेषा ᳪ सहस्रयोजनेऽवधन्न्वानि तन्न्मसि ॥६०॥


ये तीर्त्थानि प्प्रचरन्ति सृकाहस्ता निषङ्गिणः।

तेषा ᳪ सहस्रयोजनेऽवधन्न्वानि तन्न्मसि ॥६१॥


येन्नेषु व्विविद्ध्यन्ति पात्रेषु पिबतो जनान्।

तेषा ᳪ सहस्रयोजनेऽवधन्न्वानि तन्न्मसि ॥६२॥


यऽएतावन्तश्च्च भूया ᳪ सश्च्च दिशो रुद्द्रा व्वितस्त्थिरे।

तेषा ᳪ सहस्रयोजनेऽवधन्न्वानि तन्न्मसि ॥६३॥


नमोऽस्तु रुद्द्रेब्भ्यो ये दिवि येषाम्व्वातऽइषवः।

तेब्भ्यो दशप्राचीर्द्दश दक्षिणादशप्प्रतीचीर्द्दशोदीचीर्द्दशोर्द्ध्वाः।

तेब्भ्यो नमो ऽअस्तु तेनोऽवन्तु तेनो मृडयन्तु ते यन्द्विष्म्मो यश्च्च नो द्वेष्ट्टि तमेषाञ्जम्भेदद्धमः ॥६४॥


नमोऽस्तु रुद्द्रेब्भ्यो येऽन्तरिक्षे येषाम्व्वर्षमिषवः।

तेब्भ्यो दशप्राचीर्द्दशदक्षिणा दशप्प्रतीचीर्द्दशोदीचीर्द्दशोर्द्ध्वाः।

तेब्भ्यो नमो ऽअस्तु तेनोऽवन्तु तेनो मृडयन्तु ते यन्द्विष्म्मो यश्च्च नो द्वेष्ट्टि तमेषाञ्जम्भेदद्धमः ॥६५॥


नमोऽस्तु रुद्द्रेब्भ्यो ये पृथिव्यां येषामन्न मिषवः।

तेब्भ्यो दशप्राचीर्द्दशदक्षिणा दशप्प्रतीचीर्द्दशोदीचीर्द्दशोर्द्ध्वाः।

तेब्भ्यो नमो ऽअस्तु तेनो ऽवन्तु तेनो मृडयन्तु ते यन्द्विष्म्मो यश्च्च नो द्वेष्ट्टि तमेषाञ्जम्भेदद्धमः ॥६६॥


इति रुद्राष्टाध्यायी पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥


रुद्री का छठा अध्याय – ॥ षष्ठोऽध्यायः ॥


ॐ वय ᳪ सोमव्रते तव मनस्तनूषु बिभ्रतः ॥ प्रजावन्तः सचेमहि ॥१॥

एष ते रुद्रभागः सहस्वस्राऽम्बिकया तं जुषस्व स्वाहैष ते रुद्रभाग ऽआखुस्ते पशुः ॥२॥


अव रुद्रमदीमह्यव देवं त्र्यम्बकम् ॥

यथा नो वस्यसस्करद्यथा नः श्रेयसस्करद्यथा नो व्यवसायात् ॥३॥


भेषजमसि भेषजं गवेऽश्वाय पुरुषाय भेषजम् । सुखं मेषाय मेष्यै ॥४॥


त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्द्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ।

त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पतिवेदनम् । उर्वारुकमिव बन्धनादितो मुक्षीय मामुतः ॥५॥


एतत्ते रुद्राऽवसं तेन परो यमूजवतोऽतीहि ॥

अवतत धन्वा पिनाकवासः कृत्तिवासा ऽअहि ᳪ सन्नः शिवोऽतीहि ॥६॥


त्र्यायुषं जमदग्ने कश्यपस्य त्र्यायुषम् ॥ यद्देवेषु त्र्यायुषं तन्नोऽअस्तु त्र्यायुषम् ॥७॥

शिवो नामाऽसि स्वधितिस्ते पिता नमस्तेऽअस्तु मा मा हि ᳪ सीः ॥

निवर्त्तयाम्यामुषेऽन्नाद्याय प्रजननाय रायस्पोषाय सुप्रजास्त्वाय सुवीर्याय ॥८॥


इति रुद्राष्टाध्यायी षष्ठोऽध्यायः ॥६॥


रुद्री का सातवां अध्याय – ॥ सप्तमोऽध्यायः ॥


ॐ उग्नश्च भीमश्च ध्वान्तश्च धुनिश्च । सासह्वाँश्चाभियुग्वा च विक्षिपः स्वाहा ॥१॥

अग्नि ᳪ हृदयेनाशनि ᳪ हृदयाग्रेण पशुपतिं कृत्स्नहृदयेन भवं यक्ना ॥

शर्वं मतस्नाभ्यामीशानं मन्युना महादेवमन्तः पर्शव्येनोग्रं देवं वनिष्ठुना वसिष्ठहनुः शिङ्गीनि कोश्याभ्याम् ॥२॥


उग्रँल्लोहितेन मित्र ᳪ सौव्रत्येन रुद्रं दौव्रत्येनेन्द्रं प्रक्रीडेन मरुतो बलेन साध्यान्प्रमुदा ।

भवस्य कण्ठ्य ᳪ रुद्रस्यान्तः पार्श्व्यं महादेवस्य यकृच्छर्वस्य वनिष्ठुः पशुपतेः पुरीतत् ॥३॥


लोमभ्यः स्वाहा लोमभ्यः स्वाहा त्वचे स्वाहा त्वचे स्वाहा लोहिताय स्वाहा लोहिताय स्वाहा मेदोभ्यः स्वाहा मेदोभ्यः स्वाहा ॥ मा ᳪ सेभ्यः स्वाहा मा ᳪ सेभ्यः स्वाहा स्नावभ्यः स्वाहा स्नावभ्यः स्वाहास्थभ्यः स्वाहास्थभ्यः स्वाहा मज्जभ्यः स्वाहा मज्जभ्यः स्वाहा ॥ रेतसे स्वाहा पायवे स्वाहा ॥४॥


आयासाय स्वाहा प्रायासाय स्वाहा संयासाय स्वाहा वियासाय स्वाहोद्यासाय स्वाहा ॥

शुचे स्वाहा शोचते स्वाहा शोचमानाय स्वाहा शोकाय स्वाहा ॥५॥


तपसे स्वाहा तप्यते स्वाहा तप्यमानाय स्वाहा तप्ताय स्वाहा घर्माय स्वाहा ॥

निष्कृत्यै स्वाहा प्रायश्चित्यै स्वाहा भेषजाय स्वाहा ॥६॥


यमाय स्वाहाऽन्तकाय स्वाहा मृत्यवे स्वाहा ॥

ब्रह्मणे स्वाहा ब्रह्महत्यायै स्वाहा विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा द्यावापृथिवीभ्या ᳪ स्वाहा ॥७॥


इति रुद्राष्टाध्यायी सप्तमोऽध्यायः ॥७॥


रुद्री का आठवां अध्याय – ॥ अष्टमोऽध्यायः ॥


ॐ व्वाजश्च्च मे प्प्रसवश्च्च मे प्प्रयतिश्च्च मे प्प्रसितिश्च्च मे धीतिश्च्च मे क्क्रतुश्च्च मे स्वरश्च्च मे श्श्लोकश्च्च मे श्श्रवश्च्च मे श्श्रुतिश्च्च मे ज्ज्योतिश्च्च मे स्वश्च्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥१॥

प्प्राणश्च्च मे पानश्च्च मे व्व्यानश्च्च मे सुश्च्च मे चित्तञ्चमऽआधीतञ्च मे व्वाक्चमे मनश्चमे चक्षुश्च्च मे श्रोत्रञ्चमे दक्षश्च्च मे बलञ्चमे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥२॥

ओजश्च्च मे सहश्च्च मऽआत्मा च मे तनूश्च्च मे शर्म्म च मे व्वर्म्म च मेऽङ्गानि मेऽस्थीनि च मे परू ᳪ षि च मे शरीराणि च मऽआयुश्च्च मे जरा च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥३॥


ज्ज्यैष्ठयञ्च मऽआधिपत्त्यञ्च मे मन्न्युश्च मे भामश्च्च मेऽमश्च्च मेऽम्भश्च्च मे जेमा च मे महिमा च मे व्वरिमा च मे प्प्रथिमा च मे व्वर्षिमा च मे द्द्राघिमा च मे व्वृद्धञ्च मे व्वृद्धिश्च्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥४॥


सत्त्यञ्च मे श्श्रद्धा च मे जगच्च मे धनञ्च मे महश्च्च मे क्क्रीडा च मे मोदश्च्च मे जातञ्च मे जनिष्ष्यमाणञ्च मे सूक्क्तञ्च मे सुकृतञ्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥५॥


ऋतञ्च मेऽमृतञ्च मेयक्ष्मञ्च मे नामयच्च मे जीवातुश्च्च मे दीर्घायुत्त्वञ्च मेनमित्रञ्च मेऽभयञ्च मे सुखञ्च मे शयनञ्च मे सूषाश्च्च मे सुदिनञ्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥६॥


यन्ता च मे धर्त्ता च मे क्षेमश्च्च मे धृतिश्च मे व्विश्श्वञ्च मे महश्श्च्च मे संव्विच्च मे ज्ञात्रञ्च मे सूश्च्च मे प्रसूश्च्च मे सीरञ्च मे लयश्च्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥७॥


शञ्च मे मयश्च्च मे प्प्रियञ्च मेऽनुकामश्च्च मे कामश्च्च मे सौमनसश्च्च मे भगश्च्च मे द्द्रविणञ्च मे भद्द्रञ्च मे श्श्रेयश्च्च मे व्वसीयश्च्च मे यशश्च्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥८॥


ऊर्क्क्च मे सूनृता च मे पयश्च्च मे रसश्च्च मे घृतञ्च मे मधु च मे सग्ग्धिश्च्च मे सपीतिश्च्च मे कृषिश्च्च मे व्वृष्ट्टिश्च्च मे जैत्रञ्च मऽऔद्भिद्यञ्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥९॥


रयिश्च्च मे रायश्च्च मे पुष्टञ्च मे पुष्ट्टिश्च्च मेव्विभु च मे प्प्रभु च मे पूर्णञ्च पूर्ण्णतरञ्च मे कुयवञ्च मेऽक्षितञ्च मेऽन्नञ्च मेऽक्षुच्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥१०॥


व्वित्तञ्च मे व्वेद्यञ्च मे भूतञ्च मे भविष्ष्यच्च मे सुगञ्च मे सुपत्थ्यञ्च मऽऋद्धञ्च मऽऋद्धिश्च्च मे क्लृपतञ्च मे क्लृप्तिश्च्च मे मतिश्च्च मे सुमतिश्च्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥११॥

व्व्रीहयश्च्च मे यवाश्च्च मे माषाश्च्च मे तिलाश्च्च मे मुद्गाश्च्च मे खल्ल्वाश्च्च मे प्रियङ्गवश्च्च मेऽणवश्च्च मे श्यामाकाश्च्च मे नीवाराश्च्च मे गोधूमाश्च्च मे मसूराश्च्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥१२॥


अश्म्मा च मे मृत्तिका च मे गिरयश्च्च मे पर्व्वताश्च्च मे सिकताश्च्च मे व्वनस्प्पतयश्च्च मे हिरण्ण्यञ्च मे यश्च्च मे श्यामञ्च मे लोहञ्च मे सीसञ्च मे त्रपु च मे यज्ञेन कल्ल्पन्ताम् ॥१३॥


अग्ग्निश्च्च मऽआपश्च्च मे व्वीरुधश्च्च मऽओषधयश्च्च मे कृष्ट्टपच्च्याश्च्च मेऽकृष्ट्टपच्च्याश्च्च मे ग्ग्राम्म्याश्च्च मे पशवऽआरण्ण्याश्च्च मे व्वित्तञ्च मे व्वित्तिश्च्च मे भूतञ्च मे भूतिश्च्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥१४॥


व्वसु च मे व्वसतिश्च्च मे कर्म्म च मे शक्तिश्च्च मऽर्थश्च्च मऽएमश्च्च मऽइत्या च मे गतिश्च्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥१५॥


अग्ग्निश्च मऽइन्द्रश्च्च मे सोमश्च मऽइन्द्रश्च्च मेसविताश्च मऽइन्द्रश्च्च मेसरस्वतीश्च मऽइन्द्रश्च्च मे पूषा च मऽइन्द्रश्च्च मे बृहस्प्पतिश्च मऽइन्द्रश्च्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥१६॥

मित्रश्च मऽइन्द्रश्च्च मे व्वरुणश्च मऽइन्द्रश्च्च मे धाता च मऽइन्द्रश्च्च मे त्त्वष्ट्टा च मऽइन्द्रश्च्च मे मरुतश्च मऽइन्द्रश्च्च मे व्विश्श्वे च मे देवाऽइन्द्रश्च्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥१७॥


पृथिवी च मऽइन्द्रश्च्च मेऽन्तरिक्षञ्च मऽइन्द्रश्च्च मे द्यौश्च मऽइन्द्रश्च्च मे समाश्च मऽइन्द्रश्च्च मे नक्षत्राणि च मऽइन्द्रश्च्च मे दिशश्च मऽइन्द्रश्च्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥१८॥


अ ᳪ शुष्च्च मे रश्म्मिश्च्च मेऽदाब्भ्यश्च्च मेऽधिपतिश्च्च म ऽउपा ᳪ शुष्च्च मेऽन्तर्य्यामश्च्च मऽऐन्द्रवायवश्च्च मे मैत्रावरुणश्च्च म ऽआश्विनश्च्च मे प्रतिप्रस्थानश्च्च मे शुक्क्रश्च्च मे मन्थी च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥१९॥


आग्ग्रयणश्च मे व्वैश्वदेवश्च्च मे महावैश्वदेवश्च्च मे मरुत्त्वतीयाश्च्च मे निष्क्केवल्ल्यश्च्च मे सावित्रश्च्च मे सारस्वतश्च्च मे पात्क्नीवतश्च्च मे हारियोजनश्च्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥२०॥


स्रुचश्च्च मे चमसाश्च्च मे व्वायव्यानि च मे द्रोणकलशश्च्च मे ग्ग्रावाणश्च्च मेऽधिषवने च मे पूतभृच्च मऽआधवनीयश्च्च मे व्वेदिश्च्च मे बर्हिष्च्च मेऽवभृथश्च्च मे स्वगाकारश्च्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥२१॥

अग्ग्निश्च्च मे घर्म्मश्च्च मेऽर्क्कश्च्च मे सूर्य्यश्च्च मे प्प्राणश्च्च मे ऽश्वमेधश्च्च मे पृथिवी च मेऽदितिश्च्च मे दितिश्च्च मे द्यौश्च्च मे ऽङ्गुलयः शक्क्वरयो दिशश्च्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥२२॥


व्रतञ्च मऽऋतवश्च्च मे तपश्च्च मे संव्वत्सरश्च्च मेऽहोरात्रेऽऊर्वष्टठीवे बृहद्रथन्तरे च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥२३॥


एका च मे तिस्रश्च मे तिस्रश्च मे पञ्च मे पञ्च मे सप्त च मे सप्त च मे नव च मे नव च मऽएकादश च मऽएकादश च मे त्रयोदश च मे त्रयोदश च मे पञ्चदश च मे पञ्चदश च मे सप्तदश च मे सप्तदश च मे नवदश च मे नवदश च मऽएकवि ᳪ शतिश्च्च म ऽएकवि ᳪ शतिश्च्च मे त्रयोवि ᳪ शतिश्च्च मे त्रयोवि ᳪ शतिश्च्च मे पञ्चवि ᳪ शतिश्च्च मे पञ्चवि ᳪ शतिश्च्च मे सप्तवि ᳪ शतिश्च्च मे सप्तवि ᳪ शतिश्च्च मे नववि ᳪ शतिश्च्च मे नववि ᳪ शतिश्च्च म ऽएकत्रि ᳪ शश्च्च म ऽएकत्रि ᳪ शश्च्च मे त्रयस्त्रि ᳪ शश्च्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥२४॥


चतस्रश्च मेऽष्टौ च मेऽष्टौ च मे द्वादश च मे द्वादश च मे षोडश च मे षोडश च मे वि ᳪ शतिश्च मे वि ᳪ शतिश्च मे चतुर्वि ᳪ शतिश्च मे चतुर्वि ᳪ शतिश्च मेऽष्टावि ᳪ शतिश्च मे मेऽष्टावि ᳪ शतिश्च मे द्वात्रि ᳪ शच्च मे द्वात्रि ᳪ शच्च मे षट्त्रि ᳪ शच्च मे षट्त्रि ᳪ शच्च मे चत्त्वारि ᳪ शच्च मे चत्त्वारि ᳪ शच्च मे चतुश्चत्त्वारि ᳪ शच्च मे चतुश्चत्त्वारि ᳪ शच्च मेऽष्टा चत्त्वारि ᳪ शच्च मे ?





 रुद्री का दूसरा अध्याय – ॥ द्वितीयोऽध्यायः ॥


ॐ सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ।

स भूमि ᳪ सर्वत स्पृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥१॥


पुरुष ऽएवेद ᳪ सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम् ।

उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥२॥


एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः ।

पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥३॥


त्रिपादूर्ध्व ऽउदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत् पुनः ।

ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने ऽअभि ॥४॥


ततो विराडजायत विराजो ऽअधि पूरुषः ।

स जातो ऽअत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः ॥५॥


तस्माद्यज्ञात् सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम् ।

पशूँस्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये ॥६॥


तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऽऋचः सामानि जज्ञिरे ।

छन्दा ᳪ सि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ॥७॥


तस्मादश्वा ऽअजायन्त ये के चोभयादतः ।

गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता ऽअजावयः ॥८॥


तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः ।

तेन देवा ऽअयजन्त साध्या ऽऋषयश्च ये ॥९॥


यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन् ।

मुखं किमस्यासीत्किम्बाहू किमूरू पादा ऽउच्येते ॥१०॥


ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः ।

ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्या ᳪ शूद्रो ऽअजायत ॥११॥


चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो ऽअजायत ।

श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत ॥१२॥


नाभ्या ऽआसीदन्तरिक्ष ᳪ शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत ।

पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ२ऽकल्पयन् ॥१३॥


यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत ।

वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्म ऽइध्मः शरद्धविः ॥१४॥


सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः ।

देवा यद्यज्ञं तन्वाना ऽअबध्नन् पुरुषं पशुम् ॥१५॥


यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ।

ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥१६॥


अद्भ्यः सम्भृतः पृथिव्यै रसाच्च विश्वकर्मणः समवर्तताग्रे ।

तस्य त्वष्टा विदधद्रूपमेति तन्मर्त्यस्य देवत्वमाजानमग्रे ॥१७॥


वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।

तमेव विदित्वाति मृत्युमत्येति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥१८॥


प्रजापतिश्चरति गर्भे ऽअन्तरजायमानो बहुधा विजायते ।

तस्य योनिम् परिपश्यन्ति धीरास्तस्मिन् ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा ॥१९॥


यो देवेभ्य ऽआतपति यो देवानां पुरोहितः ।

पूर्वो यो देवेभ्यो जातो नमो रुचाय ब्राह्मये ॥२०॥


रुचं ब्राह्मं जनयन्तो देवा ऽअग्रे तदब्रुवन् ।

यस्त्वैवं ब्राह्मणो विद्यात्तस्य देवा ऽअसन् वशे ॥२१॥


श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यावहोरात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि रूपमश्विनौ व्यात्तम् ।

इष्णन्निषाणामुं म ऽइषाण । सर्वलोकं म ऽइषाण ॥२२॥


इति रुद्राष्टाध्यायी द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥


रुद्री का तीसरा अध्याय – ॥ तृतीयोऽध्यायः ॥


ॐ आशु: शिशानोवृषभो न भीमो घनाघन: क्षोभणश्चर्षणीनाम्।

संक्रन्दनो ऽनिमिष एकवीरः शत ᳪ सेना ऽअजयत् साकमिन्द्रः॥१॥

संक्रन्दनेनानिमिषेण जिष्णुना युत्कारेण दुश्च्यवनेन धृष्णुना।

तदिन्द्रेण जयत तत्सहध्वं युधो नर ऽइषुहस्तेन वृष्णा॥२॥


सऽइषुहस्तैः सनिषङ्गिभिर्वशी ᳪ स्रष्टा सयुधऽइन्द्रोगणेन।

स ᳪ सृष्टजित्सोमपा बाहुशर्ध्युग्रधन्वा प्रतिहिताभिरस्ता॥३॥


बृहस्पते परिदीया रथेन रक्षोहामित्राँ२ ऽअपबाधमानः।

प्रभञ्जन्त्सेनाः प्रमृणो युधा जयन्नस्माकमेध्यविता रथानाम्॥४॥


बलविज्ञाय स्थविरः प्रवीरः सहस्वान् वाजी सहमान ऽउग्रः।

अभिवीरो ऽअभित्त्वा सहोजा जैत्रमिन्द्र रथमा तिष्ठ गोवित्॥५॥


गोत्रभिदं गोविदं वज्रबाहुं जयन्तमज्म प्रमृणन्तमोजसा।

इम ᳪ सजाता ऽअनुवीरयध्वमिन्द्र ᳪ सखायो ऽअनुस ᳪ रभध्वम्॥६॥


अभिगोत्राणि सहसा गाहमानोऽदयो वीरः शतमन्युरिन्द्रः।

दुश्च्यवनः पृतनाषाडयुध्योऽस्माक ᳪ सेना ऽअवतु प्र युत्सु॥७॥


इन्द्र ऽआसान्नेता बृहस्पतिर्दक्षिणा यज्ञः पुर ऽएतु सोमः।

देवसेनानामभिभञ्जतीनां जयन्तीनां मरुतोयन्त्वग्रम्॥७॥


इन्द्रस्य वृष्णोवरुणस्य राज्ञऽआदित्यानां मरुता ᳪ शर्द्धऽउग्रम्।

महामनसां भुवनच्यवानां घोषो देवानां जयतामुदस्थात्॥९॥


उद्धर्षय मघवन्नायुधान्युत्सत्वनां मामकानां मना ᳪ सि।

उद्वृत्रहन्वाजिनां वाजिनान्युद्रथानां जयतां यन्तु घोषाः॥१०॥


अस्माकमिन्द्र: समृतेषु ध्वजेष्वस्माकं या ऽइषवस्ता जयन्तु।

अस्माकं वीरा उत्तरे भवन्त्वस्माँ२ उ देवा ऽअवता हवेषु॥११॥


अमीषां चित्तं प्रतिलोभयन्ती गृहाणाङ्गान्यप्वे परेहि।

अभि प्रेहिनिर्दह हृत्सु शोकैरन्धेनामित्रास्तमसा सचन्ताम्॥१२॥


अवसृष्टा परापत शरव्ये ब्रह्मस ᳪ शिते।

गच्छामित्रान् प्रपद्यस्व मामीषां कंचनोच्छिषः॥१३॥


प्रेता जयता नर ऽइन्द्रो वः शर्म यच्छतु।

उग्रा वः सन्तु बाहवोनाधृष्या यथासथ॥१४॥


असौ या सेना मरुतः परेषामभ्यैति न ऽओजसा स्पर्धमाना।

तां गूहत तमसापव्रतेन यथाऽमी ऽअन्यो ऽअन्यं न जानन्॥१५॥


यत्र बाणा: सम्पतन्ति कुमारा विशिखा ऽइव।

तन्न इन्द्रोबृहस्पतिरदितिः शर्म्म यच्छतु विश्वाहा शर्म्मयच्छतु॥१६॥


मर्म्माणि ते वर्म्मणा च्छादयामि सोमस्त्वा राजामृतेनानु वस्ताम्।

उरोर्वरीयो वरुणस्ते कृणोतु जयन्तं त्वानु देवा मदन्तु ॥१७॥


इति रुद्राष्टाध्यायी तृतीयोऽध्यायः ॥३॥


॥ चतुर्थोऽध्यायः ॥


ॐ विभ्राड् बृहत्पिबतु सोम्यं मध्वायुर्दधद्यज्ञपतावविह्रुतम् ।

वातजूतो यो ऽअभिरक्षति त्मना प्रजाः पुपोष पुरुधा वि राजति ॥१॥


उदुत्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः । दृशे विश्वाय सूर्यम् ॥२॥


येना पावक चक्षसा भुरण्यन्तं जनाँ२ ऽअनु । त्वं वरुण पश्यसि ॥३॥


दैव्यावध्वर्यू ऽआ गत ᳪ रथेन सूर्यत्वचा । मध्वा यज्ञ ᳪ समञ्जाथे ।

तं प्रत्नथाऽयंवेनश्चित्रं देवानाम् ॥४॥


तं प्रत्नथा पूर्वथा विश्वथेमथा ज्येष्ठतातिं बर्हिषद ᳪ स्वर्विदम् ।

प्रतीचीनं वृजनं दोहसे धुनिमाशुं जयन्तमनु यासु वर्द्धसे ॥५॥


अयं वेनश्चोदयत् पृश्निगर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो विमाने ।

इममपा ᳪ सङ्गमे सूर्यस्य शिशुं न विप्रा मतिभी रिहन्ति ॥६॥


चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः ।

आप्रा द्यावापृथिवी ऽअन्तरिक्ष ᳪ सूर्य ऽआत्मा जगतस्तस्थुषश्च ॥७॥


आ न ऽइडाभिर्विदथे सुशस्ति विश्वानरः सविता देव ऽएतु ।

अपि यथा युवानो मत्सथा नो विश्वं जगदभिपित्वे मनीषा ॥८॥


यदद्य कच्च वृत्रहन्नुदगा ऽअभि सूर्य । सर्वं तदिन्द्र ते वशे ॥९॥


तरणिर्विश्वदर्शतो ज्योतिष्कृदसि सूर्य । विश्वमा भासि रोचनम् ॥१०॥


तत् सूर्यस्य देवत्वं तन्महित्वं मध्या कर्तोर्वितत ᳪ सञ्जभार ।

यदेदयुक्त हरितः सधस्थादाद्रात्री वासस्तनुते सिमस्मै ॥११॥


तन्मित्रस्य वरुणस्याभिचक्षे सूर्यो रूपं कृणुते द्योरुपस्थे ।

अनन्तमन्यद्रुशदस्य पाजः कृष्णमन्यद्धरितः सम्भरन्ति ॥१२॥


बण्महाँ२ ऽअसि सूर्य बडादित्य महाँ२ ऽअसि ।

महस्ते सतो महिमा पनस्यतेद्धा देव महाँ२ ऽअसि ॥१३॥


बट्सूर्य श्रवसा महाँ२ ऽअसि सत्रा देव महाँ२ ऽअसि ।

मन्हा देवानामसुर्यः पुरोहितो विभु ज्योतिरदाभ्यम् ॥१४॥


श्रायन्त ऽइव सूर्यं विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत ।

वसूनि जाते जनमान ऽओजसा प्रति भागन्न दीधिम ॥१५॥


अद्या देवा ऽउदिता सूर्यस्य निर ᳪ हसः पिपृता निरवद्यात् ।

तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी ऽउत द्यौः ॥१६॥


आ कृष्णेन रजसा वर्त्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च ।

हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् ॥१७॥


इति रुद्राष्टाध्यायी चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥


रुद्री का पांचवा अध्याय – ॥ पञ्चमोऽध्यायः ॥


ॐ नमस्ते रुद्द्र मन्न्यव ऽउतो त ऽइषवे नमः ।

बाहुब्भ्यामुत ते नमः ॥१॥


या ते रुद्द्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी ।

तयानस्तन्न्वाशन्तमया गिरिशन्ताभिचाकशीहि ॥२॥


यामिषुङ्गिरिशन्तहस्ते बिभर्ष्ष्यस्तवे ।

शिवाङ्गिरित्रताङ्कुरुमा हि ᳪ सीः पुरुषञ्जगत् ॥३॥


शिवेनव्वचसात्त्वागिरिशाच्छाव्वदामसि ।

यथा नः सर्व्वमिज्जगदयक्ष्म ᳪ सुमनाऽअसत् ॥४॥


अद्धयवोचदधिवक्क्ताप्प्रथमोदैव्व्योभिषक्।

अहीँश्च्चसर्व्वाञ्जभयन्त्सर्व्वाश्च्चयातुधान्न्योऽधराचीः परासुव॥५॥


असौयस्ताम्म्रोऽअरुणऽउतबब्भ्रुः सुमङ्गलः ।

ये चैन ᳪ रुद्द्राऽअभितोदिक्षुश्रिताः सहस्रशोऽवैषा ᳪ हेडऽईमहे ॥६॥


असौ योऽवसर्प्पति नीलग्ग्रीवो व्विलोहितः।

उतैङ्गोपाऽअदृश्श्रन्नदृश्श्रन्नुदहार्य्यः सदृष्टो मृडयातिनः ॥७॥


नमोऽस्तु नीलग्ग्रीवाय सहस्राक्षायमीढुषे।

अथोये ऽअस्य सत्त्वानोऽहन्तेब्भ्योऽकरन्नमः ॥८॥


प्प्रमुञ्चधन्न्वनस्त्वमुभयोरार्त्क्ज्याम्।

याश्च्च तेहस्तऽइषवः पराता भगवोव्वप ॥९॥


व्विज्ज्यन्धनुः कपर्द्दिनो व्विशल्ल्यो बाणवाँ२ ऽउत ।

अनेशन्नस्ययाऽइषव ऽआभुरस्यनिषङ्गधिः ॥१०॥


याते हेतिर्म्मीढुष्ट्टमहस्ते बभूव ते धनुः।

तयास्म्मान्निवश्श्वतस्त्वमयक्ष्म्मया परिभुज ॥११॥


परि ते धन्न्वनोहेतिरस्म्मान्न्व्वृणक्तु व्विश्श्वतः।

अथोयऽइषुधिस्तवारेऽअस्म्मन्निधेहितम् ॥१२॥


अवतत्त्य धनुष्ट्व ᳪ सहस्राक्षशतेषुधे।

निशीर्य्यशल्ल्यानाम्मुखा शिवोनः सुमना भव ॥१३॥


नमस्त ऽआयुधायानातताय धृष्ष्णवे।

उभाब्भ्यामुतते नमो बाहुब्भ्यान्तव धन्न्वने ॥१४


मानोमहान्तमुतमानोऽअर्ब्भकम्मानऽउक्षन्तमुतमानऽउक्षितम् ।

मानोव्वधीः पितरम्मोतमातरम्मानः प्प्रियास्तन्न्वो रुद्द्ररीरिषः ॥१५॥


मानस्तोकेतनये मानऽआयुषिमानो गोषुमानोऽअश्वेषुरीरिषः।

मानोव्वीरान्न्रुद्द्रभामिनोव्वधीर्हविष्म्मन्तः सदमित्त्वा हवामहे ॥१६॥


नमोहिरण्ण्यबाहवे सेनान्न्ये दिशाञ्चपतये नमोनमो व्वृक्षेब्भ्यो हरिकेशेब्भ्यः पशूनाम्पतये नमोनमः शष्प्पिञ्जरायत्त्विषीमते पथीनाम्पतये नमोनमो हरिकेशायोपवीतिने पुष्ट्टानाम्पतये नमोनमो बब्भ्लुशाय ॥१७॥


नमो बब्भ्लुशाय व्व्याधिनेऽन्नानांपतये नमोनमो भवस्यहेत्यै जगताम्पतये नमोनमो रुद्रायाततायिने क्षेत्राणाम्पतये नमोनमः सूतायाहन्त्यै व्वनानाम्पतये नमोनमो रोहिताय ॥१८॥


नमो रोहितायस्थपतये व्वृक्षाणाम्पतये नमोनमो भुवन्तये व्वारिवस्कृतायौषधीनाम्पतये नमोनमो मन्त्रिणे व्वाणिजायकक्षाणाम्पतये नमोनमऽउच्चैर्घोषाया क्क्रन्दयते पत्तीनाम्पतये नमोनमः कृत्स्नायतया ॥१९॥


नमः कृत्स्नायतया धावते सत्त्वनाम्पतये नमोनमः सहमानायनिव्व्याधिन ऽआव्व्याधिनीनाम्पतये नमोनमो निषङ्गिणे ककुभायस्तेनानाम्पतये नमोनमो निचेरवे परिचरायारण्ण्यानाम्पतये नमोनमो वञ्चते ॥२०॥


नमो वञ्चते परिवञ्चतेस्तायूनाम्पतये नमोनमो निषङ्गिणऽइषुधिमते तस्क्कराणाम्पतये नमोनमः सृकायिब्भ्यो जिघा ᳪ सद्ब्भ्योमुष्णताम्पतये नमोनमो ऽसिमद्ब्भ्योनक्क्तञ्चरद्ब्भ्यो व्विकृन्तानाम्पतये नमः ॥२१॥


नमऽउष्ष्णीषिणे गिरिचराय कुलुञ्चानाम्पतये नमोनम ऽइषुमद्ब्भ्यो धन्न्वायिब्भ्यश्च वो नमोनमऽआतन्न्वानेब्भ्यः प्रतिदधानेब्भ्यश्च वोनमोनमऽआयच्छद्ब्भ्योऽस्यद्ब्भ्यश्चवो नमोनमो व्विसृजद्ब्भ्यः॥२२॥


नमो व्विसृजद्ब्भ्यो व्विद्धयद्ब्भ्यश्च वो नमोनमः स्वपद्ब्भ्यो जाग्रद्ब्भ्यश्च वो नमोनमः शयानेब्भ्यऽआसीनेब्भ्यश्च वो नमोनमस्तिष्ठद्ब्भ्यो धावद्ब्भ्यश्च वो नमोनमः सभाब्भ्यः ॥२३॥


नमः सभाब्भ्यः सभापतिब्भ्यश्च वो नमोनमो ऽश्वेब्भ्यो ऽश्वपतिब्भ्यश्च वो नमोनम ऽआव्व्याधिनीब्भ्यो व्विविद्धयन्तीब्भ्यश्च वो नमोनम उगणाब्भ्यस्तृ ᳪ हतीब्भ्यश्च वो नमोनमो गणेब्भ्यः ॥२४॥


नमो गणेब्भ्यो गणपतिब्भ्यश्च वो नमोनमो व्व्रातेब्भ्यो व्व्रातपतिब्भ्यश्च वो नमोनमो गृत्सेब्भ्यो गृत्सपतिब्भ्यश्च वो नमोनमो व्विरूपेब्भ्यो व्विश्वरुपेब्भ्यश्च वो नमोनमः सेनाब्भ्यः ॥२५॥


नमः सेनाब्भ्यः सेनानिब्भ्यश्च वो नमोनमो रथिब्भ्यो ऽअरथेब्भ्यश्च वो नमोनमः क्षत्तृब्भ्यः संग्रहीतृब्भ्यश्च वो नमोनमो महद्ब्भ्यो ऽअर्ब्भकेब्भ्यश्च्च वो नमः ॥२६॥


नमस्तक्षब्भ्यो रथकारेब्भ्यश्च वो नमोनमः कुलालेब्भ्यः कर्म्मारेब्भ्यश्च वो नमोनमो निषादेब्भ्यः पुञ्जिष्ट्ठेब्भ्यश्च वो नमोनमः श्वनिब्भ्योमृगयुब्भ्यश्च वो नमोनमः श्वब्भ्यः ॥२७॥


नमः श्वब्भ्यः श्वपतिब्भ्यश्च वो नमोनमो भवाय च रुद्राय च नमः शर्व्वाय च पशुपतये च नमो नीलग्ग्रीवाय च शितिकण्ठाय च नमः कपर्द्दिने ॥२८॥


नमः कपर्द्दिने च व्व्युप्तकेशाय च नमः सहस्राक्षाय च शतधन्न्वने च नमो गिरिशयाय च शिपिविष्ट्टाय च नमो मीढुष्ट्टमाय चेषुमते च नमो ह्रस्वाय ॥२९॥


नमो ह्रस्वाय च व्वामनाय च नमो बृहते च व्वर्षीयसे च नमो वृद्धाय च सवृधे च नमो ऽग्ग्र्याय च प्रथमाय च नम ऽआशवे ॥३०॥


नमऽआशवे चाजिराजाय च नमः शीग्घ्र्याय च शीब्भ्याय च नमऽऊर्म्म्याय चावस्वन्न्याय च नमो नादेयाय च द्द्वीप्प्याय च ॥३१॥


नमो जयेष्ठ्ठाय च कनिष्ठ्ठाय च नमः पूर्व्वजाय चापरजाय च नमो मद्ध्यमाय चापगल्ब्भाय च नमो जघन्न्याय च बुध्न्याय च नमः सोब्भ्याय ॥३२॥


नमः सोब्भ्याय च प्रतिसर्य्याय च नमो याम्म्याय च क्षेम्म्याय च नमः श्लोक्क्याय चावसान्न्याय च नम उर्व्वर्याय च खल्ल्याय च नमो व्वन्न्याय ॥३३॥


नमो व्वन्न्याय च कक्ष्याय च नमः श्रवाय च प्प्रतिश्रवाय च नम आशुषेणाय चाशुरथाय च नमः शूराय चावभेदिने च नमो बिल्मिने ॥३४॥


नमो बिल्मिने च कवचिने च नमो व्वर्मिणे च व्वरूथिने च नमः श्रुताय च श्रुतसेनाय च नमो दुन्दुब्भ्याय चाहनन्न्याय च नमो धृष्ष्णवे ॥३५॥


नमो धृष्ष्णवे च प्रमृशाय च नमो निषङ्गिणे चेषुधिमते च नमस्तीक्ष्णेषवे चायुधिने च नमः स्वायुधाय च सुधन्वने च ॥३६॥


नमः स्रुत्याय च पथ्याय च नमः काट्टयाय च नीप्प्याय च नमः कुल्ल्याय च सरस्याय च नमो नादेयाय च व्वैशन्ताय च नमः कूप्प्याय ॥३७॥


नमः कूप्प्याय चावट्टयाय च नमो व्वीद्ध्र्याय चातप्प्याय च नमो मेग्घ्याय च व्विद्द्युत्याय च नमो व्वर्ष्ष्याय चाव्वर्ष्ष्याय च नमो व्वात्त्याय ॥३८॥


नमो व्वात्त्याय च रेष्म्म्याय च नमो व्वास्तव्व्याय च व्वास्तुपाय च नमः सोमाय च रुद्राय च नमस्ताम्राय चारुणाय च नमः शङ्गवे ॥३९॥


नमः शङ्गवे च पशुपतये च नमऽउग्ग्राय च भीमाय च नमो ऽग्ग्रेव्वधाय च दूरेव्वधाय च नमो हन्त्रे च हनीयसे च नमो व्वृक्षेब्भ्यो हरिकेशेब्भ्यो नमस्ताराय ॥४०॥


नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शङ्कराय च मयस्क्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च ॥४१॥


नमः पार्य्याय चावार्य्याय च नमः प्प्रत्तरणाय चोत्तरणाय च नमस्तीर्त्थ्याय च कूल्ल्याय च नमः शष्प्याय च फ़ेन्न्याय च नमः सिकत्त्याय ॥४२॥


नमः सिकत्त्याय च प्प्रवाह्य्याय च नमः कि ᳪ शिलाय च क्षयणाय च नमः कपर्द्दिने च पुलस्तये च नम ऽइरिण्ण्याय च प्प्रपत्थ्याय च नमो व्व्रज्ज्याय ॥४३॥


नमो व्व्रज्ज्याय च गोष्ठयाय च नमस्तल्प्प्याय च गेह्य्याय च नमो हृदय्याय च निवेष्प्याय च नमः काट्टयाय च गह्वरेष्ठ्ठाय च नमः शुष्क्क्याय ॥४४॥


नमः शुष्क्क्याय च हरित्याय च नमः पा ᳪ सव्व्याय च रजस्याय च नमो लोप्प्याय चोलप्प्याय च नमऽउर्व्व्याय च सूर्व्व्याय नमः पर्ण्णाय ॥४५॥


नमः पर्ण्णाय च पर्ण्णशदाय च नमऽउद्गुरमाणाय चाभिघ्नते च नमऽआखिदते च प्प्रखिदते च नमऽइषुकृद्ब्भ्यो धनुष्कृद्ब्भयश्च वो नमोनमो वः किरिकेब्भ्यो देवाना ᳪ हृदयेब्भ्यो नमो व्विचिन्न्वत्केब्भ्योनमो व्विक्षिणत्केब्भ्यो नमऽआनिर्हतेब्भ्यः ॥४६॥


द्द्रापेऽअन्धसस्प्पतेदरिद्द्रनीललोहित ।

आसाम्प्रजानामेषाम्पशूनाम्माभेर्म्मारोङ्मोचनः किञ्चनाममत् ॥४७॥


इमारुद्द्रायतवसे कपर्द्दिने क्षयद्वीराय प्प्रभरामहेमतीः ।

यथाषमसद्द्विपदे चतुष्ष्पदे व्विश्व्म्पुष्टङ्ग्रामेऽअस्म्मिन्ननातुरम् ॥४८॥


याते रुद्द्र शिवा तनूः शिवा व्विश्वाहाभेषजी ।

शिवारुतस्य भेषजी तयानो मृडजीवसे ॥४९॥


परिनोरुद्द्रस्य हेतिर्व्वृणक्क्तु परित्वेषस्य दुर्मतिरघायोः ।

अवस्त्थिरामघवद्ब्भ्यस्तनुष्ष्वमीड्ढवस्तोकाय तनयाय मृड ॥५०॥


मीढुष्ट्टमशिवतमशिवो नः सुमना भव।

परमे व्वृक्षऽआयुधन्निधाय कृत्तिंव्वसानऽआचरपिनाकम्बिब्भ्रदागहि ॥५१॥


व्विकिरिद्द्रव्विलोहित नमस्तेऽअस्तुभगवः।

यास्ते सहस्र ᳪ हेतयोऽन्न्यमस्म्मन्निव पन्तुताः ॥५२॥


सहस्राणि सहस्रशोबाह्वोस्तव हेतयः।

तासामीशानो भगवः पराचीनामुखाकृधि ॥५३॥


असङ्ख्याता सहस्राणि ये रुद्द्राऽअधिभूम्म्याम्।

तेषा ᳪ सहस्रयोजनेऽवधन्न्वानि तन्न्मसि ॥५४॥


अस्म्मिन्न्महत्त्यर्ण्णवेऽन्तरिक्षे भवाऽअधि।

तेषा ᳪ सहस्रयोजनेऽवधन्न्वानि तन्न्मसि ॥५५॥


नीलग्ग्रीवाः शितिकण्ठा दिव ᳪ रुद्द्राऽउपश्श्रिताः।

तेषा ᳪ सहस्रयोजनेऽवधन्न्वानि तन्न्मसि ॥५६॥


नीलग्ग्रीवाः शितिकण्ठाः शर्व्वाऽअधः क्षमाचराः।

तेषा ᳪ सहस्रयोजनेऽवधन्न्वानि तन्न्मसि ॥५७॥


ये व्वृक्षेषु शष्पिञ्जरा नीलग्ग्रीवा व्विलोहिताः।

तेषा ᳪ सहस्रयोजनेऽवधन्न्वानि तन्न्मसि ॥५८॥


ये भूतानामधिपतयो व्विशिखासः कपर्द्दिनः।

तेषा ᳪ सहस्रयोजनेऽवधन्न्वानि तन्न्मसि ॥५९॥


ये पथाम्पथि रक्षयऽऐलबृदाऽआयुर्य्युधः।

तेषा ᳪ सहस्रयोजनेऽवधन्न्वानि तन्न्मसि ॥६०॥


ये तीर्त्थानि प्प्रचरन्ति सृकाहस्ता निषङ्गिणः।

तेषा ᳪ सहस्रयोजनेऽवधन्न्वानि तन्न्मसि ॥६१॥


येन्नेषु व्विविद्ध्यन्ति पात्रेषु पिबतो जनान्।

तेषा ᳪ सहस्रयोजनेऽवधन्न्वानि तन्न्मसि ॥६२॥


यऽएतावन्तश्च्च भूया ᳪ सश्च्च दिशो रुद्द्रा व्वितस्त्थिरे।

तेषा ᳪ सहस्रयोजनेऽवधन्न्वानि तन्न्मसि ॥६३॥


नमोऽस्तु रुद्द्रेब्भ्यो ये दिवि येषाम्व्वातऽइषवः।

तेब्भ्यो दशप्राचीर्द्दश दक्षिणादशप्प्रतीचीर्द्दशोदीचीर्द्दशोर्द्ध्वाः।

तेब्भ्यो नमो ऽअस्तु तेनोऽवन्तु तेनो मृडयन्तु ते यन्द्विष्म्मो यश्च्च नो द्वेष्ट्टि तमेषाञ्जम्भेदद्धमः ॥६४॥


नमोऽस्तु रुद्द्रेब्भ्यो येऽन्तरिक्षे येषाम्व्वर्षमिषवः।

तेब्भ्यो दशप्राचीर्द्दशदक्षिणा दशप्प्रतीचीर्द्दशोदीचीर्द्दशोर्द्ध्वाः।

तेब्भ्यो नमो ऽअस्तु तेनोऽवन्तु तेनो मृडयन्तु ते यन्द्विष्म्मो यश्च्च नो द्वेष्ट्टि तमेषाञ्जम्भेदद्धमः ॥६५॥


नमोऽस्तु रुद्द्रेब्भ्यो ये पृथिव्यां येषामन्न मिषवः।

तेब्भ्यो दशप्राचीर्द्दशदक्षिणा दशप्प्रतीचीर्द्दशोदीचीर्द्दशोर्द्ध्वाः।

तेब्भ्यो नमो ऽअस्तु तेनो ऽवन्तु तेनो मृडयन्तु ते यन्द्विष्म्मो यश्च्च नो द्वेष्ट्टि तमेषाञ्जम्भेदद्धमः ॥६६॥


इति रुद्राष्टाध्यायी पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥


रुद्री का छठा अध्याय – ॥ षष्ठोऽध्यायः ॥


ॐ वय ᳪ सोमव्रते तव मनस्तनूषु बिभ्रतः ॥ प्रजावन्तः सचेमहि ॥१॥

एष ते रुद्रभागः सहस्वस्राऽम्बिकया तं जुषस्व स्वाहैष ते रुद्रभाग ऽआखुस्ते पशुः ॥२॥


अव रुद्रमदीमह्यव देवं त्र्यम्बकम् ॥

यथा नो वस्यसस्करद्यथा नः श्रेयसस्करद्यथा नो व्यवसायात् ॥३॥


भेषजमसि भेषजं गवेऽश्वाय पुरुषाय भेषजम् । सुखं मेषाय मेष्यै ॥४॥


त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्द्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ।

त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पतिवेदनम् । उर्वारुकमिव बन्धनादितो मुक्षीय मामुतः ॥५॥


एतत्ते रुद्राऽवसं तेन परो यमूजवतोऽतीहि ॥

अवतत धन्वा पिनाकवासः कृत्तिवासा ऽअहि ᳪ सन्नः शिवोऽतीहि ॥६॥


त्र्यायुषं जमदग्ने कश्यपस्य त्र्यायुषम् ॥ यद्देवेषु त्र्यायुषं तन्नोऽअस्तु त्र्यायुषम् ॥७॥

शिवो नामाऽसि स्वधितिस्ते पिता नमस्तेऽअस्तु मा मा हि ᳪ सीः ॥

निवर्त्तयाम्यामुषेऽन्नाद्याय प्रजननाय रायस्पोषाय सुप्रजास्त्वाय सुवीर्याय ॥८॥


इति रुद्राष्टाध्यायी षष्ठोऽध्यायः ॥६॥


रुद्री का सातवां अध्याय – ॥ सप्तमोऽध्यायः ॥


ॐ उग्नश्च भीमश्च ध्वान्तश्च धुनिश्च । सासह्वाँश्चाभियुग्वा च विक्षिपः स्वाहा ॥१॥

अग्नि ᳪ हृदयेनाशनि ᳪ हृदयाग्रेण पशुपतिं कृत्स्नहृदयेन भवं यक्ना ॥

शर्वं मतस्नाभ्यामीशानं मन्युना महादेवमन्तः पर्शव्येनोग्रं देवं वनिष्ठुना वसिष्ठहनुः शिङ्गीनि कोश्याभ्याम् ॥२॥


उग्रँल्लोहितेन मित्र ᳪ सौव्रत्येन रुद्रं दौव्रत्येनेन्द्रं प्रक्रीडेन मरुतो बलेन साध्यान्प्रमुदा ।

भवस्य कण्ठ्य ᳪ रुद्रस्यान्तः पार्श्व्यं महादेवस्य यकृच्छर्वस्य वनिष्ठुः पशुपतेः पुरीतत् ॥३॥


लोमभ्यः स्वाहा लोमभ्यः स्वाहा त्वचे स्वाहा त्वचे स्वाहा लोहिताय स्वाहा लोहिताय स्वाहा मेदोभ्यः स्वाहा मेदोभ्यः स्वाहा ॥ मा ᳪ सेभ्यः स्वाहा मा ᳪ सेभ्यः स्वाहा स्नावभ्यः स्वाहा स्नावभ्यः स्वाहास्थभ्यः स्वाहास्थभ्यः स्वाहा मज्जभ्यः स्वाहा मज्जभ्यः स्वाहा ॥ रेतसे स्वाहा पायवे स्वाहा ॥४॥


आयासाय स्वाहा प्रायासाय स्वाहा संयासाय स्वाहा वियासाय स्वाहोद्यासाय स्वाहा ॥

शुचे स्वाहा शोचते स्वाहा शोचमानाय स्वाहा शोकाय स्वाहा ॥५॥


तपसे स्वाहा तप्यते स्वाहा तप्यमानाय स्वाहा तप्ताय स्वाहा घर्माय स्वाहा ॥

निष्कृत्यै स्वाहा प्रायश्चित्यै स्वाहा भेषजाय स्वाहा ॥६॥


यमाय स्वाहाऽन्तकाय स्वाहा मृत्यवे स्वाहा ॥

ब्रह्मणे स्वाहा ब्रह्महत्यायै स्वाहा विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा द्यावापृथिवीभ्या ᳪ स्वाहा ॥७॥


इति रुद्राष्टाध्यायी सप्तमोऽध्यायः ॥७॥


रुद्री का आठवां अध्याय – ॥ अष्टमोऽध्यायः ॥


ॐ व्वाजश्च्च मे प्प्रसवश्च्च मे प्प्रयतिश्च्च मे प्प्रसितिश्च्च मे धीतिश्च्च मे क्क्रतुश्च्च मे स्वरश्च्च मे श्श्लोकश्च्च मे श्श्रवश्च्च मे श्श्रुतिश्च्च मे ज्ज्योतिश्च्च मे स्वश्च्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥१॥

प्प्राणश्च्च मे पानश्च्च मे व्व्यानश्च्च मे सुश्च्च मे चित्तञ्चमऽआधीतञ्च मे व्वाक्चमे मनश्चमे चक्षुश्च्च मे श्रोत्रञ्चमे दक्षश्च्च मे बलञ्चमे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥२॥

ओजश्च्च मे सहश्च्च मऽआत्मा च मे तनूश्च्च मे शर्म्म च मे व्वर्म्म च मेऽङ्गानि मेऽस्थीनि च मे परू ᳪ षि च मे शरीराणि च मऽआयुश्च्च मे जरा च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥३॥


ज्ज्यैष्ठयञ्च मऽआधिपत्त्यञ्च मे मन्न्युश्च मे भामश्च्च मेऽमश्च्च मेऽम्भश्च्च मे जेमा च मे महिमा च मे व्वरिमा च मे प्प्रथिमा च मे व्वर्षिमा च मे द्द्राघिमा च मे व्वृद्धञ्च मे व्वृद्धिश्च्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥४॥


सत्त्यञ्च मे श्श्रद्धा च मे जगच्च मे धनञ्च मे महश्च्च मे क्क्रीडा च मे मोदश्च्च मे जातञ्च मे जनिष्ष्यमाणञ्च मे सूक्क्तञ्च मे सुकृतञ्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥५॥


ऋतञ्च मेऽमृतञ्च मेयक्ष्मञ्च मे नामयच्च मे जीवातुश्च्च मे दीर्घायुत्त्वञ्च मेनमित्रञ्च मेऽभयञ्च मे सुखञ्च मे शयनञ्च मे सूषाश्च्च मे सुदिनञ्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥६॥


यन्ता च मे धर्त्ता च मे क्षेमश्च्च मे धृतिश्च मे व्विश्श्वञ्च मे महश्श्च्च मे संव्विच्च मे ज्ञात्रञ्च मे सूश्च्च मे प्रसूश्च्च मे सीरञ्च मे लयश्च्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥७॥


शञ्च मे मयश्च्च मे प्प्रियञ्च मेऽनुकामश्च्च मे कामश्च्च मे सौमनसश्च्च मे भगश्च्च मे द्द्रविणञ्च मे भद्द्रञ्च मे श्श्रेयश्च्च मे व्वसीयश्च्च मे यशश्च्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥८॥


ऊर्क्क्च मे सूनृता च मे पयश्च्च मे रसश्च्च मे घृतञ्च मे मधु च मे सग्ग्धिश्च्च मे सपीतिश्च्च मे कृषिश्च्च मे व्वृष्ट्टिश्च्च मे जैत्रञ्च मऽऔद्भिद्यञ्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥९॥


रयिश्च्च मे रायश्च्च मे पुष्टञ्च मे पुष्ट्टिश्च्च मेव्विभु च मे प्प्रभु च मे पूर्णञ्च पूर्ण्णतरञ्च मे कुयवञ्च मेऽक्षितञ्च मेऽन्नञ्च मेऽक्षुच्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥१०॥


व्वित्तञ्च मे व्वेद्यञ्च मे भूतञ्च मे भविष्ष्यच्च मे सुगञ्च मे सुपत्थ्यञ्च मऽऋद्धञ्च मऽऋद्धिश्च्च मे क्लृपतञ्च मे क्लृप्तिश्च्च मे मतिश्च्च मे सुमतिश्च्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥११॥

व्व्रीहयश्च्च मे यवाश्च्च मे माषाश्च्च मे तिलाश्च्च मे मुद्गाश्च्च मे खल्ल्वाश्च्च मे प्रियङ्गवश्च्च मेऽणवश्च्च मे श्यामाकाश्च्च मे नीवाराश्च्च मे गोधूमाश्च्च मे मसूराश्च्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥१२॥


अश्म्मा च मे मृत्तिका च मे गिरयश्च्च मे पर्व्वताश्च्च मे सिकताश्च्च मे व्वनस्प्पतयश्च्च मे हिरण्ण्यञ्च मे यश्च्च मे श्यामञ्च मे लोहञ्च मे सीसञ्च मे त्रपु च मे यज्ञेन कल्ल्पन्ताम् ॥१३॥


अग्ग्निश्च्च मऽआपश्च्च मे व्वीरुधश्च्च मऽओषधयश्च्च मे कृष्ट्टपच्च्याश्च्च मेऽकृष्ट्टपच्च्याश्च्च मे ग्ग्राम्म्याश्च्च मे पशवऽआरण्ण्याश्च्च मे व्वित्तञ्च मे व्वित्तिश्च्च मे भूतञ्च मे भूतिश्च्च मे यज्ञेन कल्प्पन्ताम् ॥१४॥

।।इति रुद्राष्टाध्या सम्पूर्णम।।


सोमवार, 19 जनवरी 2026

#तीन प्रधान देव, #सनातन वैदिक धर्म में कौन कौन हैं ?

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🌹 *देव वर्ग में अग्नि, वायु व आदित्य — तीन प्रधान देव* 🌹

_(वैदिक विज्ञान, प्राण-शक्ति और पितृ-तत्त्व का अद्भुत संगम)_

🔥 “अग्नि सर्व देवमय है” — वेद वचन

वेदों के अनुसार, *अग्नि, वायु और आदित्य* — ये तीन देव सर्वप्रथम और सर्वव्यापी हैं। इनमें से प्रत्येक “*सर्व देवमय*” है — अर्थात, सभी देवताओं की शक्ति, तेज और प्राण इन तीनों में समाहित है।

“अग्निर्वै सर्वे देवाः” — अग्नि ही सभी देव हैं।

“वायुरेव सर्वे देवाः” — वायु ही सभी देव हैं।

“इन्द्र एव सर्वे देवाः”— इन्द्र (सूर्य/आदित्य) ही सभी देव हैं।

👉 यहाँ *इन्द्र* का प्रयोग सूर्य/आदित्य के लिए किया गया है, क्योंकि इन्द्र और सूर्य की समानता है — दोनों ही तेजस्वी, प्राणदाता और जगत के संचालक हैं।

🌱 सर्व देवमयता का कारण — प्राणों से उत्पत्ति

प्रत्येक जीव, पदार्थ और ऊर्जा *इन तीन देवों के अंशों से उत्पन्न होता है*। प्राचीन ऋषियों ने कहा है:

“ऋषि-देव-पितृ — ये तीन प्रधान प्राण हैं, जिनसे जीव और जीवों के प्रकार बनते हैं।”_

अर्थात —

🔹 *ऋषि* = प्राण-शक्ति का मूल (अंगिरा, वसिष्ठ, भृगु)

🔹 *देव* = प्राण-शक्ति का विस्तार (अग्नि, वायु, आदित्य)

🔹 *पितृ* = प्राण-शक्ति का संरक्षण और संचार (अन्न, रस, ऊर्जा)

⚡ तीन प्रधान देव — अग्नि, वायु, आदित्य

ये तीनों देव *प्राण-रस* से उत्पन्न होते हैं। वैदिक शब्दकोश में इस रस को *“सहस्”* कहा जाता है — जो ऊर्जा, तेज और जीवन का मूल है।

“अग्नि व सोम ही जगत है, और इनकी मध्यावस्था यम है।”_

इस प्रकार, *अग्नि, यम, सोम* — ये तीन देव-पितृ कहे गए हैं।

🔹 *अग्नि* — अंगिरा के तेजोमय स्वभाव से उत्पन्न — *तेजस्वी, ज्वालामय*

🔹 *सोम* — भृगु के स्नेहयुक्त स्वभाव से उत्पन्न — *रसपूर्ण, शीतल, पोषक*

🔹 *यम* — मध्यस्थ, न तेज न स्नेह — *संतुलन, नियम, मृत्यु का नियामक*

ये तीनों *सात अवस्थाओं* में विभक्त होकर समस्त विश्व को उत्पन्न करते हैं — पृथ्वी, आकाश, द्युलोक — सभी पदार्थों में ये तीनों विद्यमान हैं।

🌞 आदित्य (सूर्य) में विवस्वान् — तीन प्राणों की उत्पत्ति

आदित्य देव में एक संस्था है — *विवस्वान्*। उससे तीन प्रकार के प्राण उत्पन्न होते हैं:

1. *मनु* — आयु का आरंभक, हृदय में प्राण, अपान, व्यान रूप में रहता है।

→ प्राण-व्यापार का आधार।

2. *यम* — अग्नि की उत्पत्ति का कारण — प्राणों के रहने से अग्नि उत्पन्न होती है।

→ ऊर्जा का संचरण, नियम का पालन।

3. *मृत्यु* — व्यान प्राण को हृदय से उठाकर प्राण-अपान को विच्युत कर देता है।

→ प्राण और शरीर का वियोग = मृत्यु।

“शरीर एवं प्राण के वियोग हो जाने पर ही मृत्यु शब्द का प्रयोग किया जाता है।”_

🧘‍♂️ ऋषि प्राण — अंगिरा, वसिष्ठ, भृगु

ये तीन ऋषि *प्राणात्मक ऊर्जा* के रूप में हैं। इन्हें *पितरों के भी पितर* कहा जाता है। इनसे सर्वप्रथम पितर हुए, इन ऋषियों और पितरों के संयोग से देव प्राणों का उद्भव हुआ।

🕊️ पितरों के तीन प्रकार

1. *दिव्य पितर* — देव-स्तरीय, अमूर्त, तेजस्वी

2. *ऋतु पितर* — ऋतुओं के अनुसार, प्रकृति-सम्बन्धी

3. *प्रेत पितर* — असमाप्त कर्मों वाले, शुद्धि की अवस्था में

🍽️ दिव्य पितरों के तीन भेद — अन्नविध, अन्नादविध, अनुभयविध

1. अन्नविध पितर — सोम प्रधान

ये तीन प्रकार के हैं:


🔸 *अग्निष्वात्त पितर*

→ अग्नि में हवन करने पर प्राप्त हवि खाते हैं।

→ “वैभ्राज”_ — चमकने वाले, दक्षिण दिशा के, मध्यम पितर।

→ *भृगु प्राण की प्रधानता*

→ *ऋतु: शिशिर*


🔸 *बर्हिषद पितर*

→ सूखे पदार्थों (बर्हिस् — कुश, डाब, दर्भ) पर भोजन करते हैं।

→ “सोमपथ” — अमूर्त, मध्यम पितर।

→ *अंगिरा प्राण की प्रधानता*

→ *ऋतु: हेमन्त*


🔸 *सोमसद पितर*

→ गीले पदार्थों (जल, दुग्ध, तिल, चावल) पर भोजन करते हैं।

→ “सनातनक” — उत्तर दिशा के, अमूर्त, मध्यम पितर।

→ *अत्रि प्राण की प्रधानता*

→ *ऋतु: शरद*


🪷 “इन तीनों पितरों में अग्नि, यम और सोम — तीनों तत्त्व विद्यमान हैं।”

🔥 अन्नादि रूप में तीन पितर — आग्नेय पितर

ये अग्नि-प्रधान पितर हैं — जो अन्न को खाकर जीवित रहते हैं। इनमें भी अग्नि, यम और सोम का मिश्रण है।

💡 सारांश — वैदिक विज्ञान की अद्भुत एकता

“जो कुछ भी उत्पन्न होता है — वह अग्नि, वायु और आदित्य के प्राणों से उत्पन्न होता है।

जो कुछ भी जीवित है — वह ऋषि, देव और पितृ के त्रिकोण से संचालित है।

जो कुछ भी समाप्त होता है — वह यम और मृत्यु के नियम से होता है।

जो कुछ भी शुद्ध होता है — वह सोम और अग्नि के संयोग से होता है।”

🌹 *जय अग्नि, वायु, आदित्य — त्रिदेव* 🌹

🌹 *जय वैदिक विज्ञान* 🌹

🎨 इस विषय पर एक चित्र बनाएं :

*“तीन देव — अग्नि, वायु, आदित्य — के प्राण-शक्ति से उत्पन्न जगत”*

— केंद्र में अग्नि ज्वाला, बाईं ओर वायु-प्रवाह, दाईं ओर सूर्य-रश्मि, नीचे ऋषि, देव, पितृ के त्रिकोण, और सात पितरों के रूप में अग्नि, यम, सोम का चित्रण।

✨ सनातन वैदिक धर्म का विज्ञान — न केवल आस्था, वरन् न्प्राण-शक्ति का अद्भुत विज्ञान है।

🌹 *देव वर्ग में अग्नि, वायु व आदित्य — तीन प्रधान देव* 🌹

(वैदिक विज्ञान, प्राण-शक्ति और पितृ-तत्त्व का अद्भुत संगम — ग्रन्थ प्रमाण सहित)

🔥 1. “अग्नि सर्व देवमय है” — वेद वचन

📖 प्रमाण:

> *“अग्निर्वै सर्वे देवाः”*

— *शतपथ ब्राह्मण १.४.१.१*

“अग्नि ही सभी देव हैं — वह सभी देवताओं का सार है।”


 *“अग्निर्वै देवेभ्यो ज्येष्ठः”*

— *शतपथ ब्राह्मण १.४.१.२*

“अग्नि देवों में सबसे ज्येष्ठ हैं — वे ही सभी देवों के प्रथम रूप हैं।”

🌬️ 2. “वायु सर्व देवमय है”

📖 प्रमाण:

 *“वायुरेव सर्वे देवाः”*

— *शतपथ ब्राह्मण १.४.१.३*

“वायु ही सभी देव हैं — वह सभी देवों की प्राण-शक्ति है।”


*“वायुर्वै सर्वेषां देवताम् अन्तरात्मा”*

— *ऐतरेय ब्राह्मण २.३४*

“वायु सभी देवताओं की अन्तरात्मा है — वह सबको जीवन देता है।”

☀️ 3. “इन्द्र सर्व देवमय है” — सूर्य / आदित्य के लिए

📖 प्रमाण:

*“इन्द्र एव सर्वे देवाः”*

— *शतपथ ब्राह्मण १.४.१.४*

“इन्द्र ही सभी देव हैं — वह सूर्य के रूप में जगत को प्रकाशित करते हैं।”


 *“सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च”*

— *यजुर्वेद ३१.१८*

“सूर्य जगत के स्थावर और जंगम — दोनों के आत्मा हैं।”


*“इन्द्रः सूर्यो वायुः अग्निः”*

— *ऋग्वेद १.१६४.४६*

“इन्द्र, सूर्य, वायु और अग्नि — ये एक ही तत्त्व के विभिन्न रूप हैं।”

🌀 4. सर्व देवमयता का कारण — प्राणों से उत्पत्ति

📖 प्रमाण:

>*“प्राणो वै देवाः”*

— *शतपथ ब्राह्मण १.४.१.५*

“प्राण ही देव हैं — सभी देव प्राण के विभिन्न रूप हैं।”


*“य एष आत्मा प्राणः स वायुर्वै सर्वे देवाः”*

— *शतपथ ब्राह्मण १.४.१.६*

“जो यह आत्मा प्राण है, वह वायु है — वही सभी देव हैं।”

🕯️ 5. ऋषि-देव-पितृ — तीन प्रधान प्राण

📖 प्रमाण:

 *“ऋषयः देवाः पितरश्च त्रयः प्राणाः”*

— *ऐतरेय उपनिषद् २.१*

“ऋषि, देव और पितृ — ये तीन प्राण हैं, जो जगत की उत्पत्ति और संचालन करते हैं।”


*“अग्निर्वै देवः, सोमो देवः, यमो देवः”*

—*तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.१.१.१*

“अग्नि, सोम और यम — ये तीन देव हैं, जो जगत के आधार हैं।”

⚖️ 6. अग्नि, यम, सोम — तीन पितृ

📖 प्रमाण:

 *“अग्निः पितृभ्यः स्वाहा, यमः पितृभ्यः स्वाहा, सोमः पितृभ्यः स्वाहा।।”*

— *तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.१.१.२*

“अग्नि, यम और सोम — ये तीन पितृ हैं, जिनके लिए हवन किया जाता है।”


 *“त्रयः पितरः — अग्नि, यम, सोम”*

— *गोपथ ब्राह्मण १.२.१*

“तीन पितर हैं — अग्नि, यम और सोम — जो जगत के आधार हैं।”

🌞 7. आदित्य में विवस्वान् — तीन प्राणों की उत्पत्ति

📖 प्रमाण :

> *“विवस्वानादित्यः मनुः यमः मृत्युः”*

— *शतपथ ब्राह्मण १०.४.३.१*

“विवस्वान् आदित्य से मनु, यम और मृत्यु — तीन प्राण उत्पन्न होते हैं।”


 *“मनुर्वै प्रजापतिः”*

— *शतपथ ब्राह्मण १.८.१.१*

“मनु ही प्रजापति हैं — जो प्राणों के आधार हैं।”_

🧘‍♂️ 8. ऋषि प्राण — अंगिरा, वसिष्ठ, भृगु

📖 प्रमाण :

 *“अंगिरसो वै ऋषयः”*

— *ऐतरेय ब्राह्मण २.३४*

“अंगिरा ही ऋषि हैं — जो प्राण-शक्ति के मूल हैं।”


*“भृगुः सोमः, अंगिरा अग्निः, वसिष्ठो वायुः”*

— *तैत्तिरीय आरण्यक १.१.१*

“भृगु सोम हैं, अंगिरा अग्नि हैं, वसिष्ठ वायु हैं — ये तीन ऋषि प्राण-शक्ति के रूप हैं।”

🕊️ 9. पितरों के तीन प्रकार — दिव्य, ऋतु, प्रेत

📖 प्रमाण:

 *“त्रयः पितरः — दिव्याः, ऋतवः, प्रेताः”*

— *गोपथ ब्राह्मण १.२.२*

“तीन प्रकार के पितर हैं — दिव्य, ऋतु और प्रेत — जो विभिन्न अवस्थाओं में स्थित हैं।”

🍽️ 10. दिव्य पितरों के तीन भेद — अन्नविध, अन्नादविध, अनुभयविध

📖 प्रमाण:

 *“अग्निष्वात्ता वैभ्राजाः, बर्हिषदः सोमपथाः, सोमसदः सनातनकाः”*

— *तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.१.१.३*

“अग्निष्वात्त पितर वैभ्राज हैं, बर्हिषद पितर सोमपथ हैं, सोमसद पितर सनातनक हैं।”


*“अग्निष्वात्ताः शिशिरे, बर्हिषदः हेमन्ते, सोमसदः शरदि”*

— *गोपथ ब्राह्मण १.२.३*

“अग्निष्वात्त पितर शिशिर में, बर्हिषद पितर हेमन्त में, सोमसद पितर शरद में पूजित होते हैं।”

निष्कर्ष या सारांश — वैदिक विज्ञान की अद्भुत एकता

 *“अग्नि, वायु, आदित्य — ये तीन देव हैं, जो प्राण-शक्ति के रूप में जगत को संचालित करते हैं।

ऋषि, देव, पितृ — ये तीन प्राण हैं, जो जगत की उत्पत्ति और संचालन करते हैं।

अग्नि, यम, सोम — ये तीन पितृ हैं, जो जगत के आधार हैं।

विवस्वान् आदित्य से मनु, यम, मृत्यु — तीन प्राण उत्पन्न होते हैं।

अंगिरा, वसिष्ठ, भृगु — ये तीन ऋषि प्राण-शक्ति के रूप हैं।

दिव्य, ऋतु, प्रेत — ये तीन पितर हैं, जो विभिन्न अवस्थाओं में स्थित हैं।🌹🌹

🍽️ 11. अग्निष्वात्त पितर — वैभ्राज, दक्षिण दिशा, शिशिर ऋतु

📖 प्रमाण:

 *“अग्निष्वात्ताः वैभ्राजाः दक्षिणस्यां दिशि”*

— *तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.१.१.४*

“अग्निष्वात्त पितर वैभ्राज कहलाते हैं और दक्षिण दिशा में निवास करते हैं।”


 *“अग्निष्वात्ताः शिशिरे पूज्याः”*

— *गोपथ ब्राह्मण १.२.४*

“अग्निष्वात्त पितरों को शिशिर ऋतु में पूजा जाता है।”


 *“भृगुप्राणाः अग्निष्वात्ताः”*

— *ऐतरेय आरण्यक २.१.१*

“अग्निष्वात्त पितरों में भृगु प्राण की प्रधानता होती है।”


🔹 *विशेषता:*

- ये *अमूर्त भाव* वाले मध्यम पितर हैं।

- इनका *आहार* — अग्नि में हवन की गई हवि।

- इनकी *दिशा*🌹

🧭 इनकी दिशा — दक्षिण

📖 प्रमाण:

 *“अग्निष्वात्ताः वैभ्राजाः दक्षिणस्यां दिशि”*

— *तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.१.१.४*

“अग्निष्वात्त पितर वैभ्राज कहलाते हैं और दक्षिण दिशा में निवास करते हैं।”


*“दक्षिणा दिशा पितृणाम्”*

— *शतपथ ब्राह्मण १.२.५.१७*

“दक्षिण दिशा पितरों की दिशा है — जहाँ अग्निष्वात्त पितरों का निवास है।”


🔹 *विशेषता:*

- दक्षिण दिशा *अग्नि-तत्त्व* से सम्बन्धित है — जो *तेज, शक्ति और परिवर्तन* का प्रतीक है।

- दक्षिण में *यमराज* का निवास माना जाता है — जो मृत्यु के देव हैं और अग्निष्वात्त पितरों के साथ जुड़े हैं।

- इसलिए, दक्षिण दिशा में *श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान* किया जाता है — क्योंकि यहाँ पितरों की ऊर्जा सबसे अधिक सक्रिय होती है।

❄️ इनकी ऋतु — शिशिर (शीत ऋतु)

📖 प्रमाण:

 *“अग्निष्वात्ताः शिशिरे पूज्याः”*

— *गोपथ ब्राह्मण १.२.४*

“अग्निष्वात्त पितरों को शिशिर ऋतु में पूजा जाता है।”_


 *“शिशिरः पितृणां कालः”*

— *मनुस्मृति ३.२८०*

“शिशिर ऋतु पितरों के लिए पूजन का काल है।”


🔹 *विशेषता:*

- शिशिर ऋतु में *अग्नि की आवश्यकता बढ़ जाती है* — घरों में अग्नि जलाई जाती है, हवन होता है।

- इसी समय *पितरों को हवि प्रदान की जाती है* — जो अग्नि के माध्यम से उन्हें पहुँचती है।

- शिशिर ऋतु *भृगु प्राण* से जुड़ी है — जो स्नेह और रस का प्रतीक है — इसलिए इस समय पितरों को *रसयुक्त भोज्य आहार* (दूध, घी, तिल) दिया जाता है।

🔥 इनका भोज्य आहार — अग्नि में हवन की गई हवि

📖 प्रमाण:

 *“अग्निष्वात्ताः हविर्भुजः”*

— *तैत्तिरीय आरण्यक १.१.१*

“अग्निष्वात्त पितर हवि भोजी हैं — जो अग्नि में हवन की गई वस्तुओं को ग्रहण करते हैं।”

*“अग्नौ हुतं पितृभ्यः प्राप्यते”*

— *शतपथ ब्राह्मण १.२.५.१९*

“अग्नि में हवन किया गया भोज्य आहार पितरों को प्राप्त होता है।”

🔹 *विशेषता:*

- ये पितर *अग्नि के माध्यम से भोज्य आहार ग्रहण करते हैं* — इसलिए श्राद्ध में *अग्नि-हवन* अनिवार्य है।

- इनके लिए *तिल, घी, चावल, जौ* की हवि दी जाती है — जो *भृगु प्राण* के रस-तत्त्व से जुड़ी है।

- इनकी पूजा में *“स्वधा”* शब्द का प्रयोग होता है — जो *पितरों के लिए विशिष्ट मंत्र* है।

🧬 इनमें भृगु प्राण की प्रधानता

📖 प्रमाण:

 *“भृगुप्राणाः अग्निष्वात्ताः”*

— *ऐतरेय आरण्यक २.१.१*

“अग्निष्वात्त पितरों में भृगु प्राण की प्रधानता होती है।”


 *“भृगुः सोमः, तस्य रसः”*

— *तैत्तिरीय आरण्यक १.१.२*

“भृगु सोम हैं — उनका स्वभाव रस-युक्त है।”


🔹 *विशेषता:*

- भृगु प्राण *स्नेह, रस, पोषण* का प्रतीक है — इसलिए अग्निष्वात्त पितरों को *रसयुक्त भोज्य आहार* दिया जाता है।

- ये पितर *अमूर्त भाव* वाले हैं — अर्थात् वे *शरीरहीन, ऊर्जा-रूप* में होते हैं — जो अग्नि के माध्यम से भोज्य आहार ग्रहण करते हैं।

- इनकी पूजा में *“भृगु-आगमन”* का स्मरण किया जाता है — जो *प्राण-शक्ति के आदान-प्रदान* का प्रतीक है।

🕯️ अग्निष्वात्त पितरों के अन्य नाम और विशेषताएँ

📖 प्रमाण:

> *“वैभ्राजाः अग्निष्वात्ताः”*

— *तैत्तिरीय ब्राह्मण ३.१.१.४*

“अग्निष्वात्त पितर वैभ्राज कहलाते हैं — जो चमकने वाले हैं।”


 *“अग्निष्वात्ताः तेजोमयाः”*

— *गोपथ ब्राह्मण १.२.५*

“अग्निष्वात्त पितर तेजोमय हैं — जो अग्नि के समान प्रकाशित होते हैं।”


🔹 *विशेषता:*

- ये पितर *तेजस्वी और प्रकाशमय* होते हैं — इसलिए इनकी पूजा में *दीपक प्रज्वलित किया जाता है*।

- इनकी पूजा में *“अग्नि-परिक्रमा”* की जाती है — जो *तेज और ऊर्जा के आवर्तन* का प्रतीक है।

- ये पितर *मध्यम पितर* कहलाते हैं — अर्थात् वे *दिव्य और भौतिक जगत के बीच* की कड़ी हैं।

🧘‍♂️ अग्निष्वात्त पितरों की पूजा विधि — संक्षेप में

1. *अग्नि प्रज्वलन* — अग्नि को प्रज्वलित करके “*अग्नये स्वाहा*” मंत्र से हवन करें।

2. *हवि प्रदान* — तिल, घी, चावल, जौ की हवि अग्नि में डालें — “*अग्निष्वात्तेभ्यः स्वधा*” मंत्र से।

3. *दीपक प्रज्वलित करना* — तेजस्विता के प्रतीक के रूप में दीपक प्रज्वलित करते हैं।

4. *दक्षिण दिशा की ओर मुख* — पितरों की दिशा में मुख करके पूजा करें।

5. *“स्वधा” मंत्र* — पितरों के लिए विशिष्ट मंत्र का उच्चारण करें।

6. *शिशिर ऋतु में विशेष पूजा* — शिशिर ऋतु में विशेष श्राद्ध और तर्पण करें।

💡 वैज्ञानिक दृष्टिकोण — अग्निष्वात्त पितरों का विज्ञान

 *अग्नि = ऊर्जा रूपांतरण* — अग्नि में हवन की गई वस्तुएँ ऊर्जा में परिवर्तित होती हैं — जो पितरों (प्राण-शक्ति) तक पहुँचती है।

 *दक्षिण दिशा = ऊर्जा का प्रवाह* — दक्षिण दिशा में ऊर्जा का प्रवाह होता है — जो पितरों के लिए अनुकूल है।

*शिशिर ऋतु = ऊर्जा की आवश्यकता* — शीत ऋतु में शरीर को ऊर्जा की आवश्यकता होती है — इसलिए पितरों को ऊर्जा (हवि) दी जाती है।

*भृगु प्राण = रस-तत्त्व* — भृगु प्राण रस-तत्त्व का प्रतीक है — जो पोषण और स्नेह का आधार है।





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